श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 681–690

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 681–690

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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६४७ कुतो विज्ञानभेदाभेदचिन्तावसरः? नहि कर्मबहुत्ववद् ब्रह्मबहुत्वमपि वेदान्तेषु प्रतिपिपाद-यिषितमिति शक्यं वक्तुम्, ब्रह्मण एकत्वादेकरूपत्वाच्च । न चैकरूपे ब्रह्मण्यनेकरूपाणि विज्ञानानि संभवन्ति । न ह्यन्यथाऽर्थोऽन्यथा ज्ञानमित्यभ्रान्तं भवति । यदि पुनरेकस्मि ब्रह्मणि बहूनि विज्ञानानि वेदान्तान्तरेषु प्रतिपिपादयिषितानि तेषामेकमभ्रान्तम्, भ्रान्ता-नीतराणीत्यनाश्वासप्रसङ्गो वेदान्तेषु । तस्मान्न तावत्प्रतिवेदान्तं ब्रह्मविज्ञानभेद आशङ्कितुं शक्यते । * नाप्यस्य चोदनाद्यविशेषादभेद उच्येत, ब्रह्मविज्ञानस्याचोदनालक्षणत्वात् । अविधिप्रधानैर्हि वस्तुपर्यवसायिभिर्ब्रह्मवाक्यै ब्रह्मविज्ञानं जन्यत इत्यवोचदाचार्यः ' तत्तु समन्वयात् ' ( ब्रह्मसून्न १।१।४ ) इत्यत्र । तत्कथमिमां भेदाभेदचिन्तामारभत इति? तदुच्यते-सगुणब्रह्मविषया प्राणादिविषया चेयं विज्ञानभेदाभेदचिन्तेत्यदोषः । तत्र हि कर्मवदुपास-नानां भेदाभेदौ संभवतः, कर्मवदेव चोपासनानि दृष्टफलान्यदृष्टफलानि चोच्यन्ते, क्रम-मुक्तिफलानि कानिचित्सम्यग्ज्ञानोत्पत्तिद्वारेण तेष्वेषा चिन्ता संभवति किं प्रतिवेदान्तं विज्ञानभेद आहोस्विन्नेति? तत्र पूर्वपक्षहेतवस्तावदुपन्यस्यन्ते – नाम्नस्तावद्भेदप्रति-समान एक रस विज्ञेय ब्रह्मका अवधारण किया गया है, उसमें विज्ञानके भेद अथवा अभेदके विचारका अवसर ही कहाँ है? क्योंकि ब्रह्मके एक और एक रूप होनेसे कर्म बहुतके समान ब्रह्मके बहुत्वका प्रतिपादन वेदान्तोंमें अभीष्ट है, ऐसा नहीं कहा जा सकता, और एकरूप ब्रह्ममें अनेक प्रकारके विज्ञानोंका संभव नहीं है, क्योंकि अन्य प्रकारका अर्थ और अन्य प्रकारका विज्ञान अभ्रान्त-यथार्थं नहीं होता । यदि एक ब्रह्ममें अनेक विज्ञानोंका भिन्न - भिन्न वेदान्तों में प्रतिपादन अभीष्ट हो तो उनमें से एक अभ्रान्त और अन्य भ्रान्त हैं, इस प्रकार वेदान्तों में अविश्वास प्रसङ्ग हो जायगा । इसलिए प्रत्येक वेदान्त में ब्रह्म विज्ञानभेदकी आशङ्का नहीं की जा सकती है । और चोदना आदिके अविशेषसे विज्ञानका अभेद भी नहीं कहा जाता, क्योंकि ब्रह्मविज्ञान अचोदनात्मक है । अविधि प्रधान और वस्तु रयंवसायी ब्रह्मवाक्योंसे ब्रह्मविज्ञान उत्पन्न किया जाता है, इसप्रकार आचार्यने ' तत्तु समन्वयात् ' इस सूत्र में कहा है । तो पुनः इस भेद और अभेद विचारको क्यों आरम्भ करते हो? सि ० - इसपर कहते हैं - यह विज्ञानके भेद और अभेदका विचार सगुणब्रह्म विषयक और प्राण आदि विषयक है, इसलिए कोई दोष नहीं है । यहाँ कर्मके समान उपासनाओंका भेद और भेद संभव है, क्योंकि उपासनाएँ कर्मके समान ही दृष्ट फल और अदृष्ट फलवाली कही जाती हैं । और कई एक तत्त्वज्ञानकी उत्पत्ति द्वारा क्रममुक्ति फलवाली कही जाती हैं । उनमें यह विचार होता है कि क्या प्रत्येक वेदान्तमें विज्ञानभेद है अथवा नहीं? यहाँ पूर्वपक्ष के हेतुओंका उपन्यास किया जाता है । पूर्वपक्षी - नाम भेद-प्रतिपत्ति हेतुरूपसे ज्योतिरादिमें प्रसिद्ध है । अन्य वेदान्तों में विहित विज्ञानों में तैत्तिरीयक, वाजसनेयक, सत्यानन्दी - दीपिका ' तत्त्वमसि ' आदि वाक्यार्थं निर्धारण के उपयोगी सगुण उपासनाके विषयमें विचार किया जाता है । इसप्रकार हेतुहेतुमद्भावसंगतिसे कहते हैं । पूर्वपक्षमें उपासनाओंका भेद है और सिद्धान्तमें उपासनां एक है, इसपर विचार किया जाता है । परन्तु वेद्यके भेद होनेपर विज्ञानका भेद होता है किन्तु ब्रह्म तो पूर्वापार भेद रहित एक रूप है, अतः उसमें ज्ञान भेदका अवसर ही नहीं है । यदि भेद रहित ब्रह्ममें ज्ञान भेदकी कल्पनाकी जायगी तो वह ज्ञानभेद यथार्थं नहीं होगा, अत: निधर्मक एक ब्रह्ममें ज्ञानभेदकी कल्पना नहीं करनी चाहिए । * यद्यपि यह विज्ञानके भेद और अभेदका विचार निर्विशेष अद्वितीय ब्रह्मविषयक नहीं है, तो मी गुणब्रह्म विषयक और प्रणादि विषयक हो सकता है, क्योंकि पञ्चाग्निविद्या, प्राणविद्या, दहर-

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६४८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ पत्तिहेतुत्वं प्रसिद्धं ज्योतिरादिषु । अस्ति चात्र वेदान्तान्तरविहितेषु विज्ञानेष्वन्यदन्यन्नाम तैत्तिरीयकं वाजसनेयकं कौथुमकं कौषीतकं शाट्यायन कमित्येवमादि । तथा रूपभेदोऽपि कर्मभेदस्य प्रतिपादकः प्रसिद्धो वैश्वदेव्यामिक्षा वाजिभ्यो वाजिनमित्येवमादिषु । अस्ति चात्र रूपभेदः । तद्यथा – केचिच्छा खिनः पञ्चाग्निविद्यायां षष्ठमपरमग्निमामनन्त्यपरे पुनः पञ्चैव पठन्ति । तथा प्राणसंवादादिषु केचिदूनान्वागादीनामनन्ति केचिदधिकान् । तथा धर्मविशेषोऽपि कर्मभेदस्य प्रतिपादक आशङ्कितः कांरीर्यादिषु । अस्ति चात्र धर्म-विशेषः -- यथाथर्वणिकानां शिरोव्रतमिति । एवं पुनरुक्त्यादयोऽपि भेदहेतवो यथासंभवं वेदान्तान्तरेषु योजयितव्याः । तस्मात्प्रतिवेदान्तं विज्ञानभेद इति । एवं प्राप्ते ब्रूमः-कौथुमक, कौषीतक और शाट्यायन इत्यादि भिन्न - भिन्न नाम हैं । और इसी प्रकार ' वैश्वदेव्यामिशा ० ' ( विश्वदेवोंको अमिक्षा और वाजि देवताओंको वाजिन ) इत्यादिमें रूपभेद भी कर्मभेदका प्रतिपादक प्रसिद्ध है । और यहाँ रूपभेद है, जैसे कि कोई शाखावाले पञ्चाग्निविद्यामें अन्य छठवीं अग्नि भी कहते हैं, और अन्य पाँच ही पढ़ते हैं । इस प्रकार प्राणसंवाद आदिमें कोई शाखावाले न्यून वाग् आदि कहते हैं और कोई लोग अधिक वाक् आदिका पाठ करते हैं । इस प्रकार धर्मविशेष भी कर्मभेदका प्रतिपादक कार्यादिमें आशङ्कित है । और यहाँ धर्मविशेष भी है - जैसे कि आयर्वणिकोंका शिरोव्रत । इस प्रकार पुनरुक्ति आदि भेदके हेतुओंकी वेदान्तोंमें यथासंभव योजना करनी चाहिए । इसलिए प्रत्येक वेदान्तमें विज्ञानका भेद है । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - सब वेदान्त प्रत्यय - विज्ञान ० सत्यानन्दी - दीपिका विद्या, वैश्वानर आदि विद्या परस्पर भिन्न हैं, ऐसा ' नानाशब्दादिभेदात् ' ( ब्रह्मसूत्र ३।३।५८ ) इस सूत्रमें कहा जायेगा । यहाँ तो परस्पर भिन्न - भिन्न वे विद्याएँ क्या प्रत्येक शाखा में भिन्न - भिन्न हैं अथवा नहीं? इसप्रकार नाम आदिके भेदसे और विधि आदिके समान होनेसे सन्देह होता है । पूर्वमीमांसाके शाखान्तर अधिकरणमें पूर्वपक्षका यह सूत्र है - " नामरूपधर्मविशेषपुनरुक्तिनिन्दाशक्तिसमाप्तिवचन-प्रायश्चित्तान्यार्थदर्शनाच्छाखान्तरे कर्मभेदः स्यात् ' ( जै ० सू ० २।४।८ ) ( नाम, रूप, धर्मविशेष, पुनरुक्ति, निन्दा, अशक्ति, समाप्तिवचन, प्रायश्चित्त, अन्यार्थदर्शन इनसे अन्य शाखामें कर्मभेद होना चाहिए ) ये सब कर्मके भेदमें हेतु हैं । जैसे ' अथैष ज्योतिरथैष सर्वज्योतिरेतेन सहस्रदक्षिणेन यजेत ' ( अनन्तर सहस्र दक्षिणा से यह ज्योतिः नामक याग करे ) यहाँ नामभेदसे यह ज्योति याग ज्योतिष्टोम या से भिन्न है । और ' विश्वेदेवोंको अमिक्षा ( पनीर ) और वाजिदेवोंको वाजिन- द्रव भाग दे ' यागका रूप द्रव्य और देवता हैं, उससे ही याग सिद्ध होता है, अतः यहाँ विश्वे देवताके उद्देश्यसे अमिक्षा द्रव्यवाले यागमें, वाजिन गुण विधि नहीं हो सकती, क्योंकि यागका रूप द्रव्य और देवता भिन्न - भिन्न हैं । अतः ये कर्म भिन्न - भिन्न हैं, वैसे प्रकरणमें तैत्तिरीयक, वाजसनेयक आदि नामभेदसे उपासनाएं भिन्न - भिन्न हैं । भाष्य में आदि पदसे ' ऐन्द्रं दधि ' ऐन्द्रं पयः ' इत्यादि द्रव्यभेद से मी कर्मभेद ग्राह्य है, उसी प्रकार प्रकरण में भी नाम और रूपभेद से वाजसनेयी पञ्चाग्नि और छान्दोगों की fo विद्याका भेद है । इसप्रकार छान्दोग्यमें रेत रहित वागू आदि पाँच अग्नियाँ और रेतसहित वाग् आदि वाजसनेयियों के मंतमें छ अग्नियाँ हैं, अतः प्राण आदि विद्याका भेद है । कारोरिवाक्योंके अध्ययनमें तैत्तिरीय शाखावाले भूमिमें भोजन करते हैं, यह उन्हींका धर्मविशेष है, और अन्य शाखावाले ऐसा नहीं करते, क्योंकि वह उनका धर्म नहीं है । इसप्रकार अन्य शाखाओं में धर्मविशेषोंसे जैसे कर्मभेद शङ्कित है, वैसे प्रकृतमें भी मुण्डकोपनिषद् के अध्ययनमें जिन लोगों का माथेपर अङ्गार-पात्र ( मस्म ) धारण करना धर्मविशेष है अन्योंका नहीं, अतः धर्मविशेषसे विद्याका भेदशङ्कित है । पुनरुक्ति - अभ्यास, जैसे ' समिधो यजति ' ' तनूनपातं यजति ' यहाँपर ' यजति ' के पुनः पुनः कथनसे

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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ६४ ९ सर्ववेदान्तप्रत्ययानि विज्ञानानि तस्मिंस्तस्मिन्वेदान्ते तानि तान्येव भवितुमर्हन्ति । कुतः? चोदनाद्यविशेषात् । आदिग्रहणेन शाखान्तराधिकरणसिद्धान्तसूत्रोदिता अभेद-हेतव इद्दाकृष्यन्ते । संयोगरूपचोदनाख्या विशेषादित्यर्थः । यथैकस्मिन्नग्निहोत्रे शाखा-भेदेऽपि पुरुषप्रयत्नस्तादृश एव चोद्यते जुहुयादिति । एवम् ' यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ' ( बृह ० ६ । १ । १, छा ० ५1१1१ ) इति वाजसनेयिनां छन्दोगानां च ताद्दश्येव चोदना । तत् तत् वेदान्त में वे वे ही हो सकते हैं । किससे? इससे कि चंदना आदि अविशेष हैं, आदि पदके ग्रहणसे शाखान्तर अधिकरणमें सिद्धान्तसूत्रों में प्रतिपादित अभेद हेतुओंका यहाँ आकर्षण किया जाता है, क्योंकि संयोग, रूप, चोदना और समाख्याका प्रत्येक शाखा में वैलक्षण्य नहीं है, ऐसा अर्थ है । जैसे एक अग्निहोत्र में शाखाभेद होनेपर भी ' जुहुयात् ' वैसा ही पुरुषप्रयत्न विहित है, वैसे ही ' यो ह व ० ' ( जो ज्येष्ठत्वं और श्रेष्ठत्व गुणविशिष्टको जानता है ) इस प्रकार वाजसनेयी और छान्दोगोंकी सत्यानन्दी - दीपिका " पाँच प्रयाजोंका परस्पर भेद सिद्ध होता है, अन्यथा - एक कर्म माननेसे ' यजति ' का पुनः पुनः कथन ब्यर्थं है । वैसे अन्य शाखा में भी अभ्याससे विद्याका भेद है । आदि पदसे निन्दादिका ग्रहण है । ' निन्दावचन – ' प्रातः प्रातरनृतं ते वदन्ति पुरोदयाज्जुह्वति अग्निहोत्रम् ' ( जो सूर्योदयसे पहले अग्निहोत्र करते हैं वे प्रातः अनृत बोलनेवाले होते हैं ) इससे अनुदित होमकी और " यदुदिते सूर्ये प्रातर्जुहुयात् ' ( जो सूर्यके उदित होनेपर प्रातः होम करता हैं वह अतिथिके चले जानेपर शून्य ग्रहमें भोजन ले आता है उसके समान है ) इस वाक्यसे ' उदित होमकी निन्दा श्रुत है, अत: दोनों होमोंका भेद है, क्योंकि एक पुरुष उदित और अनुदित होमका अनुष्ठान नहीं कर सकता । उदित तथा अनुदित होमके अतिक्रमण से प्रायश्चित्तका विधान है । इसका प्रायश्चित्त के विधानसे मो दोनों होमों-• में भेद है । ये निन्दा & और प्रायश्चित वेदान्त विद्यामें नहीं हैं, अतः उनका उदाहरण नहीं दिया गया है । अशक्ति - जैसे सब शाखाओंमें विहित कर्मके जानने और करनेमें एक व्यक्तिकी असामथ्यसे कर्मका भेद है, वैसे सब वेदान्तके अध्ययन और ज्ञानमें अथवा उपासना करनेमें एक व्यक्तिकी शक्ति न होने से तत् तत् वेदान्तमें विद्याका भेद शङ्कित है । समाप्ति - सब शाखाओंकी एक रूप समाप्ति नहीं कही जांती, किन्तु अन्य शाखाकी अन्यत्र कर्ममें समाप्ति कही जाती है, इसप्रकार समाप्तिवचन भेदसे भी कर्मका भेद शङ्कत है, वैसे किसी वेदान्तगत ओंकारको सर्वात्मतामें किसीकी अन्यत्र समाप्ति है, इससे विद्याका भेद यति है । अन्यार्थदर्शन -- अथर्ववादसे जैसे कर्मका भेद शति है, वैसे प्रकृत में विद्याका भेद शङ्कत है । इस प्रकार पूर्वपक्ष सूत्रमें कर्मभेदके लिए कथित हेतुओंको दिखलाया गया है । अब उनमेंसे कोई हेतु सिद्धान्त और पूर्वपक्ष दोनों में यहाँ उपयुक्त होते हैं । वैसे शब्दान्तर, अभ्यास, संख्या, गुण, क्रिया और नामधेय कर्मके भेदक हैं । उनमें नाम, गुण, रूप और अभ्यास इन चारोंका व्याख्यान हो चुका है । किञ्च ' यजेत, जुहुयात् ' इसप्रकार प्रकृति शब्दके भेदसे तत् तत् अवच्छिन्न भवनारूप कर्मका भेद है, वैसे यहाँ भी ' वेद, उपास्ते ' इत्यादि शब्द भेदसे विद्याका भेद है । ' तिस्र-आहुती जुहोति ' ( तीन आहुति करे ) इसमें जैसे संख्या से कर्मभेद है, वैसे ' द्वौ संवगौ ' ( छा ० ४।३।४ ) ( देवताओं में वायु और इन्द्रियोंमें प्राण - संवर्ग है ) इसमें द्वित्व संख्यासे संवर्गविद्याका भेद है । नित्य अग्निहोत्रके प्रकरणसे अन्य प्रकरणमें कुण्डपायियों के अयन नामक संवत्सर सत्र में ' मासमग्निहोत्रं जुह्वति ' ( मासपर्यन्त अग्निहोत्र करे ) इसमें श्रुत अग्निहोत्र अन्य प्रकरणमें स्थित होनेके कारण भिन्न कर्म है, इसप्रकार सिद्ध किया गया है, वैसे यहाँ वेदान्तभेद और प्रकरणभेद होनेसे उपासना का भी भेद है । * उक्त नाम आदिसे प्रत्येक शाखामें अग्निहोत्र आदि कर्मोंका भेद प्राप्त होनेपर शाखान्तरा-घिकरणमें सिद्धान्त सूत्र है- ' एकं वा संयोगरूपचोदनाख्या विशेषात् ' ( जै ० सू ० २०४ ९ ) ( प्रयोजनका

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६५० ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ प्रयोजन संयोगोऽप्य विशिष्ट एव - ' ज्येष्ठश्र श्रेष्ठश्च स्वानां भवति ' ( बृह ०६।१।१ ) इति । रूपमप्यु -भयत्र तदेव विज्ञानस्य, यदुत ज्येष्ठश्रेष्ठादिगुणविशेषणान्वितं प्राणतत्त्वम् । यथा च द्रव्यदेवते यागस्य रूपम्, एवं विज्ञेयं रूपं विज्ञानस्य, तेन हि तद्रूप्यते । समाख्याऽपि सैव - प्राण विद्येति । तस्मात्सर्ववेदान्तप्रत्ययत्वं विज्ञानानाम् । एवं पञ्चाग्निविद्या वैश्वान-रविद्या शाण्डिल्यविद्येत्येवमादिषु योजयितव्यम् । ये तु नामरूपादयो भेदहेत्वाभासास्ते प्रथम एव काण्डे ' न नाम्ना स्यादचोदनाभिधानत्वात् ' इत्यारभ्य परिहृताः ॥ १ ॥

इहापि कंचिद्विशेषमाशङ्कय परिहरति-भेदान्न ेति चेन्न कस्यामपि ॥ २ ॥

पदच्छेद – भेदात्, नं, इति · चेत्, न, एकस्याम् अपि । वैसी एक - सी चोदना है । और ' ज्येष्ठश्च ० ' ( वह अपनी ज्ञातिमें ज्येष्ठ और श्रेष्ठ होता है ) इस तरह प्रयोजनका संयोग भी समान है । दोनों स्थलों में विज्ञानका रूप भी वही है जो ज्येष्ठ और श्रेष्ठ आदि गुणरूप • विशेषणों से युक्त प्राणतत्त्व है । जैसे द्रश्य और देवता यागके रूप हैं, वैसे ही विज्ञानका विज्ञेय रूप है, क्योंकि उससे उसका निरूपण किया जाता है । इसी प्रकार समाख्या- संज्ञा भी वही प्राण-विद्या है । इससे विज्ञानोंमें सर्वं वेदान्त प्रत्ययत्व है । एवं प्रश्वाग्निविद्या, वैश्वानर विद्या, शाण्डिल्यविद्या आदिमें योजना करनी चाहिए । जो नाम, रूप आदि भेद हेतु से हैं, प्रथम काण्डमें ही ' न नाम्ना ० ' ( नामसे भेद न होगा, क्योंकि चोदनासे अभिधान नहीं है ) ऐसा आरम्भकर परिहृत किये गये हैं ॥ १ ॥

यहाँ भी किसी विशेषकी आशङ्काकर परिहार करते हैं--सत्यानन्दी - दीपिका संयोग, रूप- द्रव्य और देवता, चोदना- पुरुषप्रयत्न और आख्या - नाम समान होनेसे शाखान्तरमें एक ही कम है ) चोदनाका अर्थं विधिवाक्य अथवा पुरुषप्रयत्न है ' चोदनेति क्रियाप्रवर्तकं वचनमाहु-शबरस्वामिनः ' ( शबरस्वामी क्रिया प्रवर्तक वचनको चोदना कहते हैं ) जैसे ' जुहुयात् ' ' हु ' धातुका अर्थ होम है, तद्विषयक पुरुषप्रयत्न जैसे यहां एक है, वैसे ही ' वेद, उपास्ते ' इत्यादिमें भी पुरुष प्रयत्न एक है । जैसे ज्येष्ठत्व, श्रेष्ठत्व आदि गुणोंसे युक्त प्राणविद्या एक है, वैसे फल संयोग आदिके समान होनेसे पचाग्निविद्या भी एक ही है । इस प्रकार शाखा भिन्न होनेपर भी विद्याओं में भेद नहीं है । पूर्वपक्षीसे कर्मके भेदमें प्रतिपादित हेतु वस्तुतः वे हेतु नहीं हेत्वाभास हैं । जैसे- ' काठक ' आदि नामसे कर्म भेद युक्त नहीं है, क्योंकि चोदनाका अभिधान नहीं है । काठक आदि ग्रन्थोके नाम हैं कर्मके नहीं, अतः पृथक् नामवाले शाखा ग्रन्थोंके भेद होनेपर भी उनसे विहित कर्म एक ही है । इससे वे कर्म भी उस ग्रन्थके नामसे कहे जाते हैं । उनमें पृथक् शक्ति की कल्पना गौरव है । पृथक् शाखा ग्रन्थोंमें थोड़ा - सा भेद होनेपर भी कर्म एक ही है । रूप द्रव्य और देवता ) भी कर्मका भेदक नहीं है, क्योंकि समान है । इस प्रकार नामके भेदसे विद्याका मी भेद नहीं है । धर्मविशेष भी भेदक नहीं है, क्योंकि वह अध्ययनका अङ्ग है कर्मका नही | पृथक् शाखाओंमें पुनरुक्ति सिद्ध नहीं है । निन्दा और अन्यार्थदर्शन भी कर्म भेदके साधक नहीं हैं, क्योंकि वे तत् तत् विधिमें स्तुतिमात्र हैं । अशक्ति भी भेदसाधक नहीं है, क्योंकि अनेक शाखाओंके अध्ययनमें अशक्ति होनेपर भी अपनी शाखाओं में अनुक्तकी अपेक्षा होनेसे अन्य शाखासे उसका ग्रहण सम्भव है । एक भी कर्ममें अङ्ग लोप-वैगुण्य आदि होनेसे प्रायश्चित्त हो सकता है, अतः प्रायश्चित्त भी कर्मका भेदक नहीं है । इसी प्रकार समाप्तिवचनका भेद भी भेद प्रयोजक नहीं है । इस रीति से कर्मके अभेद साधक प्रमाणोंका प्राबल्य होनेसे भेद साधक हेतु परिहृत हैं । पूर्वपक्ष में विद्याके भेदसे गुणोंका अनुपसंहार है, सिद्धान्त में विद्याके एक होने से गुणोंका उपसंहार है ॥ १ ॥

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अधि ० १ सू ० २ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दोकासहित ६५१ सूत्रार्थ - ( इति चेत् ) यदि कहो कि ( भेदात् ) जैसे द्रव्य और देवताके भेदसे यागका भेद होता है, वैसे वेद्यके भेदसे विद्याका भेद है, ( न ) तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि ( एकस्यामपि ) एक विद्या में भी इस प्रकारका गुण भेद उपपन्न होता है । * स्यादेतत् - सर्ववेदान्तप्रत्ययत्वं विज्ञानानां गुणभेदान्नोपपद्यते । तथाहि वाज-सनेयिनः पञ्चाग्निविद्यां प्रस्तुत्य षष्ठमपरमग्निमामनन्ति - तस्याग्निरेवाग्निर्भवति ' ( बृह ० ६।२।१४ ) इत्यादिना । छन्दोगास्तु तं नामनन्ति पञ्चसंख्ययैव च त उपसंहरन्ति - ‘ अथ ह य एतानेवं पञ्चाग्नीन्वेद ' ( छा ० ५।१०।१० ) इति । येषां च स गुणोऽस्ति, येषां च नास्ति, कथमुभयेषामेका विद्योपपद्येत? न चात्र गुणोपसंहारः शक्यते प्रत्येतुम् 9 पञ्चसंख्या-विरोधात् । तथा प्राणसंवादे श्रेष्ठादन्यांश्चतुरः प्राणान्वाक्चक्षुः श्रोत्रमनांसि छन्दोगा आमनन्ति । वाजसनेयिनस्तु पञ्चममध्यामनन्ति - रेतो वै प्रजापतिः प्रजायते ह प्रजया पशुभिर्यं एवं वेद ' ( बृह ० ६।१।६ ) इति । आवापोद्वापभेदाच्च वेद्यभेदो भवति, वेद्यभेदाच्च विद्याभेदः द्रव्यदेवताभेदादिव यागस्येति चेत् - नैष दोषः, यत एकस्यामपि विद्यायामेवजातीयको गुणभेद उपपद्यते । यद्यपि षष्ठस्याग्नेरुपसंहारो न संभवति, तथापि द्युप्रभृतीनां पञ्चाना-वह हो, परन्तु विज्ञानोंमें सर्ववेदान्त प्रत्ययत्व गुणभेदसे उपपन्न नहीं होता, क्योंकि वाजसनेयी शाखावाले पञ्चाग्निविद्याको प्रस्तुतकर ' तस्याग्निरेव ० ' ( उस - आहुति भूत पुरुषका प्रसिद्ध अग्नि ही अग्नि है ) इत्यादिसे अन्य षष्ठ अग्नि कहते हैं । छान्दोग तो उसका कथन नहीं करते किन्तु ' अथ ह य ० ' ( किन्तु जो इसप्रकार इन पाँच अग्नियोंको जानता है ) इसप्रकार वे पाँच संख्यासे उपसंहार करते हैं । जिनके मत में वह गुण है और जिनके मत में वह गुण नहीं है उन दोनोंकी एक विद्या किस प्रकार उपपन्न होगी । और यहाँ गुणका उपसंहार भी नहीं जाना जा सकता, क्योंकि पाँच संख्याका विरोध है । उसीप्रकार प्राणसंवादमें श्रेष्ठ प्राणसे अन्य वाक्, चक्षु, श्रोत्र और मन इन चार प्राणोंका छान्दोग कथन करते हैं, और वाजसनेयी तो ' रेतो वै प्रजापतिः ० ' ( रेत ही प्रजापति हैं, जो ऐसा जानता है, वह प्रजा और पशुओंसे सम्पन्न होता है ) इस तरह पञ्चमका भी कथन करते हैं । आवाप ( डालना ) उद्वाप ( निकालना ) के भेदसे वेद्यका भेद होता है, वेद्यके भेदसे विद्याका भेद होता है । जैसे द्रव्य और देवताके भेदसे यागका भेद होता है । ऐसा यदि कहो तो यह दोष नहीं है, क्योंकि एक विद्यामें भी इसप्रकारका गुणभेद उपपन्न होता है । यद्यपि षष्ठ अग्निका उपसंहार संभव नहीं है, तो मी द्यु आदि पाँच अग्नियोंका दोनों स्थलों ( वाजसनेयी और छान्दोग ) में प्रत्यभि-सत्यानन्दी -दीपिका * वाजसनेयी छः अग्नियाँ मानते हैं और छान्दोग पाँच, अतः संख्या आदिके भेदसे विद्याका भेद होना चाहिए । जैसे एक शाखा में अग्नीषोमीय यागमें एकादश कपालोंका कथन और अन्य शाखा में द्वादश कपालोंका निर्वाप प्रतिपादित है, इससे वहाँ संख्याके भेदसे शाखान्तरका कर्म भी भिन्न माना गया है? यह वेदान्वशास्त्र पूर्वमीमांसा से पृथक् शास्त्र है, अतः यहाँ कर्म न्यायकी समानता नहीं है, क्योंकि यह उपासना मानसिक विद्या है, इससे पुनरुक्ति नहीं है । परन्तु उस मृत. पुरुष दाहके लिए अन्त्येष्टिगत छठवीं अग्निको वाजसनेयियोंने प्रसिद्ध अग्निके समान स्वीकृत किया है, उसका छान्दोगोंने पाँच अग्नियों में अन्तर्भाव किया है, अतः रूपका भेद नहीं है । छान्दोग रेतको न लेकर प्राणके साथ वाणी, चक्षु, श्रोत्र और मनको लेकर पाँच अग्नियाँ मानते हैं और वाजसनेयियोंने जननशक्ति गुणविशिष्ट रेतको अधिक लेकर छ । अग्नियाँ स्वीकार की हैं, इस थोड़े भेदको लेकर विद्याका भेद सिद्ध नहीं होता । यहाँ तक तो गुणभेदको मानकर विद्याका अभेद कहा गया है । सब उसे अस्वीकार कर ' पठ्यतेऽपि ' इत्यादिसे कहते हैं ।

पृष्ठ 686

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६५२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ मग्नीनामुभयत्र प्रत्यभिज्ञायमानत्वान्न विद्याभेदो भवितुमर्हति । नहि षोडशिग्रहणा-ग्रहणयोरतिरात्रो भिद्यते । पठ्यतेऽपि च षष्ठोऽग्निश्छन्दोगैः - ' तं प्रेतं दिष्टमितोऽग्नय एवं हरन्ति ' ( छा ० ५।९ ।२ ) इति । वाजसनेयिनस्तु सांपादिकेषु पञ्चस्वग्निष्वनुवृतायाः समिद्धूमादिकल्पनाया निवृत्तये ' तस्याग्निरेवाग्निर्भवति समित्समित् ' ( बृह ० ६।२।१४ ) इत्यादि समामनन्ति, स नित्यानुवादः । अथाप्युपासनार्थ एष वादस्तथापि स गुणः शक्यते छन्दोगैरप्युपसंहर्तुम् । न चात्र पञ्चसंख्या विरोध आशङ्कयः, सांपादिकाग्न्यभिप्राया ह्येषा पञ्चसंख्या. नित्यानुवादभूता न विधिसमवायिनीत्यदोषः । एवं प्राणसंवादादिष्व-प्यधिकस्य गुणस्येतरत्रोपसंहारो न विरुध्यते । नचावापोद्वापभेदाद्वेद्यभेदो विद्याभेद-श्राशङ्कयां, कस्यचिद्वेद्यांशस्यावापोद्वापयोरपि भूयसो वेद्यराशेरभेदावगमात् । तस्मा-दैकविद्यमेव ॥ २ ॥

स्वाध्यायस्य तथात्वेन हि समाचारेऽधिकाराच्च सववच्च तन्नियमः ॥ ३ ॥

पदच्छेद – स्वाध्यायस्य, तथात्वेन, हि, समाचारे, अधिकारात्, च, सववत्, च, तन्नियमः । सूत्रार्थ - ( स्वाध्यायस्य ) यह शिरोव्रत स्वाध्यायका धर्म है विद्याका नहीं, ( हि ) क्योंकि ( समाचारे ) वेद व्रतोपदेशक सूत्र ग्रन्थमें ( तथात्वेन ) वह स्वाध्यायके धर्मरूप से विहित है, ( अधि-कारात् ) कारण कि ' नैतदचीणवतोऽधीते ' यह उसका प्रकरण है । ( च ) और इसत्रकार ( सववत् ) ' सव होम के समान ' ( तन्नियमः ) यह आथर्वणिकोंका नियम है । यदप्युक्तम् - आथर्वणिकानां विद्यां प्रति शिरोव्रताद्यपेक्षणादन्येषां च तदनपेक्षणा-द्विद्याभेद इति, तत्प्रत्युच्यते - स्वाध्यायस्यैष धर्मो न विद्यायाः, कथमिदमवगम्यते? यतस्त-थात्वेन स्वाध्यायधर्मत्वेन समाचारे वेदव्रतोपदेशपरे ग्रन्थे, आथर्वणिका इदमपि वेदव्रत-ज्ञान होनेसे विद्याका भेद नहीं हो सकता । अतिरात्रयाग में षोडशिपात्र के ग्रहण और अग्रहण से अनि-रात्रयागका भेद नहीं होता । और ' तं प्रेतं ० ' ( कर्म वश परलोक में प्रस्थित हुए उस मृतकको ज्ञातिवाले अग्नि प्रति ही ले जाते हैं ) इसप्रकार छान्दोग षष्ठ अग्निको मो पढते हैं । वाजसनेयी तो उपासना के लिए सांपादिक - आरोपित पाँच अग्नियोंमें अनुवृत्त समिधू, धूम आदि कल्पनाकी निवृत्तिके लिए ' तस्याग्निरेव ० ' ( उस मृतक पुरुषके दाहके लिए प्रसिद्ध अग्नि ही अग्नि है और प्रसिद्ध समिध् ही समिध् है ) इत्यादि कहते हैं । वह नित्य अनुवाद है । यदि यह वाद उपासनाके लिए हो तो मो छान्दोग उस गुणका उपसंहार कर सकते हैं, अतः यहाँ पाँच संख्या के विरोध की आशङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह पाँच संख्या उपासना के लिए आरोपित अग्निके अभिप्रायसे नित्य अनुवादरूप है विधि सम्बन्धी नहीं है, इसलिए कोई दोष नहीं है । इसीप्रकार प्राणसंवाद आदिमें भी अधिक गुणका अन्यत्र उपसंहार विरुद्ध नहीं है । और न आवाप, उद्वापके भेदसे वेद्यभेद और विद्याभेदकी आशङ्का करनी चाहिए, क्योंकि किसी वेद्यांशके आवाप और उद्वापमें भी महान् वेद्य राशिका अभेद अवगत होता है, इससे एक ही विद्या है ॥ २ ॥

जो यह भी कहां गया है कि आथर्वणिकोंको विद्याके लिए शिरोव्रत आदिकी अपेक्षा है और अन्य छान्दोगोंको उसकी अपेक्षा नहीं है, इससे विद्याका भेद है, उसका निराकरण किया जाता है - यह शिरोव्रत आदि स्वाध्यायका धर्म है विद्याका नहीं है, यह कैसे अवगत हो? इससे कि इस-सत्यानन्दी - दीपिका # अनग्नि द्य आदि पाँच में उपासना के लिए कल्पित अग्नित्व स्वीकार किया गया है, अतः उनका कल्पित पञ्चत्व अनुवादमात्र है ध्येयरूपसे उनका विधान नहीं है, अतः कोई विरोध नहीं है । अतः वेद्यके एक होने से विद्या भी एक ही है ॥ २ ॥

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अधि ० १ सू ० ४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी- दीपिकासहित ६५३ त्वेन व्याख्यातमिति समामनन्ति । ' नैतदचीर्णव्रतोऽधीते ' ( मु ० ३।२।११ ) इति बाधिकृत-विषयादेतच्छब्दादध्ययनशब्दाच्च स्वोपनिषदध्ययनधर्म एवैष इति निर्धार्यते । ननु च ‘ तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवद्यैस्तु चीर्णम् ' ( मुण्ड ० ३।२।१० ) इति ब्रह्मविद्या-संयोगश्रवणादेकैव सर्वत्र ब्रह्मविद्येति संकीर्येतैष धर्मः, न, तत्राप्येतामिति प्रकृतप्रत्यव-मर्शात् । प्रकृतत्वं च ब्रह्मविद्याया ग्रन्थविशेषापेक्षमिति ग्रन्थविशेष संयोग्येवैष धर्मः । सववच्च तन्नियम इति निदर्शननिर्देशः । यथा च सवाः सप्त सौर्यादयः शतौदन पर्यन्ता वेदान्तरोदितत्रेतान्यनभिसंबन्धाद ( थर्वणोदितैकाग्न्यभिसंबन्धाच्चाथर्वणिकानामेव निय म्यन्ते, तथैवायमपि धर्मः स्वाध्याय विशेष संबन्धात्तत्रैव नियम्यते । तस्मादप्यनवद्यं विद्यैकत्वम् ॥ ३ ॥

दर्शयति च ॥ ४ ॥

पदच्छेद - दर्शयति च । सूत्रार्थ - और ' सर्वे वेदा ' इसप्रकार वेद मो सब वेदान्तों में विद्याका एकत्व दिखलाता है । दर्शयति च वेदोऽपि विद्यैकत्वं सर्ववेदान्तेषु, वेद्यैकत्वोपदेशात् ' सर्वे वेदा यत्पद-मामनन्ति ' ( क ० २।१५ ) इति । तथा ' एतं ह्येव बह वृचा महत्युक्थे मीमांसन्त एतमग्नावध्वर्यव एतं महाव्रते छन्दोगाः ' इति च । तथा ' महद्भयं वज्रमुद्यतम् ' ( क ० ६।२ ) इति काठक उक्तस्ये-श्वरगुणस्य भयहेतुत्वस्य तैत्तिरीयके भेददर्शननिन्दायै परामर्शो दृश्यते – ' यदा होवैष एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते । अथ तस्य मयं भवति । तत्त्वेव मयं विदुषोऽमन्वानस्य ' ( तै ० २।७।१ ) इति । तथा वाजसनेयके प्रादेशमात्र संपादित्स्य वैश्वानरस्य छान्दोग्ये सिद्धवदुपादानम् -‘ यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रममिविमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते ' ( छा ० ५/१८ | १ ) इति । तथा सर्व-प्रकार स्वाध्यायके धर्मरूपसे समाचारमें - वेदके व्रतोंके उपदेश परक सूत्रग्रन्थमें यह भी वेद व्रतरूपसे व्याख्यात है, ऐसा आर्थवणिक लोग कहते हैं । ' नैतदचीर्णव्रतोऽधीते ' ( शिरोव्रतका अनुष्ठान नहीं किया है वह इसका अध्ययन नहीं कर सकता ) इसप्रकार अधिकृत विषयक ' एतत् ' शब्द से और ' अध्ययन ' शब्दसे भी यह अपने उपनिषद् अध्ययनका ही धर्म है, ऐसा निर्धारित किया जाता है । परन्तु ' तेषामेवैताम् ० ' ( जिन्होंने विधिवत् शिरोव्रतका अनुष्ठान किया है उन्होंमें ही यह ब्रह्मविद्या कहनी चाहिए ) इस प्रकार ब्रह्मविद्या के संयोगका श्रवण होनेसे सब शाखाओं में एक ही ब्रह्मविद्या है, इसलिए यह शिरोव्रत धर्म भी सर्वत्र सम्बधित होगा? ऐसा नहीं, क्योंकि वहाँपर भी ' एताम् ' इससे प्रकृत ब्रह्मविद्याका परामर्श है, और ब्रह्मविद्या में प्रकृतत्व ग्रन्थविशेषकी अपेक्षासे है, इसलिए यह धर्मं मी ग्रन्थविशेषका संयोगी - सम्बन्धी होगा । ' सववच्च तन्नियमः ' यह दृष्टान्तका निर्देश है । जैसे शतौदनपर्यन्त सौर्यादि सात होमोंका अन्य वेदमें कथित त्रेताग्नि - दक्षिणाग्नि, गार्हपत्य और आहवनीय अग्निके साथ सम्बन्ध न होनेसे और आथवंण उदित एक ऋषि नामक अग्नि के साथ सम्बन्ध होने से आणिकही ( वे होम हैं ) यह नियम किया गया है, वैसे हो यह धर्म मी स्वाध्याय विशेष के सम्बन्धसे अथर्वणिकोंमें ही नियमित होता है । इससे भी विद्याका एकत्व निर्दोष है ॥ ३ ॥

और वेद मी विद्याका एकत्व दिखलाता है, क्योंकि ' सर्वे वेदा ० ' ( सब वेद जिस पदका प्रति-पादन करते हैं ) इसप्रकार सब वेदान्तोंमें विद्या के एकत्वका उपदेश है, और ' एतं ह्येव ० ' ( इसीका बह, वृच ऋग्वेदी महान् उक्थमें विचार करते हैं, अध्वर्युं इसका अग्निमें और छान्दोग इसका महाव्रतमें विचार करते हैं ) तथा ' महद्भयं ० ' ( वह ब्रह्म महान् मयरूप बौर उठे हुए वज्र के समान हैं ) इस प्रकार वाठकमें उक्त मयहेतुत्व ईश्वर- गुणका ' यदा ह्येवैष ० ' ( और जब यह अज्ञानी इस अद्वय आत्मा में थोड़ा सा - भी भेद करता है तो इसे मय प्राप्त होता है, क्योंकि वह ब्रह्म ही भेददर्शी विद्वानके लिए मरूप है ) इस प्रकार तैत्तिरीयकमें भेददर्शनकी निन्दाके लिए परामर्श देखा जाता है और वाजस-

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III ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ वेदान्तप्रत्ययत्वेनान्यत्र विहितानामुक्थादीनामन्यत्रोपासनविधानायोपादानात्प्रायदर्शन-न्यायेनोपासनानामपि सर्ववेदान्तप्रत्ययत्वसिद्धिः ॥ ४ ॥

( २ उपसंहाराधिकरणम् । सू ०५ ) उपसंहारोऽभेदाद्विधिशेषवत्समाने च ॥ ५ ॥

पदच्छेद - उपसंहारः, अर्थाभेदात्, विधिशेषवत् समाने, च. । सूत्रार्थ - ( विधिशेषवत् ) जैसे सर्वत्र अग्निहोत्र एक होनेसें उसके शेष गुणोंका उपसंहार होता है, वैसे ही ( समाने ) उपासना में मी ( उपसंहार ) गुणोपसंहार करना चाहिए, ( अर्थाभेदात् ) क्योंकि उपास्यके गुणोंसे प्राप्य आसनारूप अर्थका सब शाखाओं में अभेद हैं । * इदं प्रयोजनसूत्रम् । स्थिते चैवं सर्ववेदान्तप्रत्ययत्वे सर्वविज्ञानानामन्यत्रोदि-तानां विज्ञानगुणानामन्यत्रापि समाने विज्ञान उपसंहारो भवति, अर्थाभेदात् । य एव हि तेषां गुणानामेकत्रार्थो विशिष्टविज्ञानोपकारकः स एवान्यत्रापि । उभयत्रापि हि तदे -वैकं विज्ञानम्, तस्मादुपसंहारः । विधिशेषवत् । यथा विधिशेषाणामग्निहोत्रादिधर्माणां तदेवैकमग्निहोत्रादि कर्म सर्वत्रेत्यर्थाभेदादुपसंहरणमेवमिहापि । यदि हि विज्ञानभेदो भवेत्ततो विज्ञानान्तरनिबद्धत्वाद्गुणानां प्रकृतिविकृतिभावाभावाच्च न स्यादुपसंहारः । विज्ञानैकत्वे तु नैवमिति । अस्यैव तु प्रयोजन सूत्रस्य प्रपञ्चः सर्वाभेदादित्यारभ्य भविष्यति । नेयक में प्रादेशमात्रसे संपादित वैश्वानरका, ' यस्त्वेतमेवं ० ' ( जो कोई ' यही मैं हूँ ' इसप्रकार अभिमानका विषय होनेवाले इस प्रादेशमात्र वैश्वानर आत्माकी उपासना करता है ) इसप्रकार छान्दोग्यमें सिद्धके समान उपादान है । इसप्रकार सर्ववेदान्त प्रत्ययरूपसे अन्यत्र विहित उक्थ आदिका अन्यत्र उपासना विधान के लिए ग्रहण होने से प्रायदर्शनन्यायसे उपासनाओं में भी सर्ववेदान्त प्रत्ययत्वकी सिद्धि होती है ।४ । यह प्रयोजन सूत्र है | इस प्रकार सम्पूर्ण विज्ञानों में सर्ववेदान्त प्रत्ययत्व सिद्ध होनेपर अन्य शाखाओं में उक्त विज्ञानके गुणोंका अन्य शाखा में भो समान विज्ञानमें उपसंहार होता है, क्योंकि अर्थका अभेद है । उन गुणोंका एक शाखा में विशिष्ट विज्ञानका उपकारकत्व जो एक प्रयोजन है वही अन्य शाखामें भी है । दोनों स्थलों में भी वही एक विज्ञान है, इसलिए गुणोंका उपसंहार है । ' विधिशेषवत् ' - विधिशेषके समान । जैसे विध्यङ्ग अग्निहोत्र आदि धर्मोंका वही अग्निहोत्र आदि कमं सर्वत्र एक है । इसप्रकार अर्थ- प्रयोजनके अभेद होने से उन सब धर्मोंका उपसंहार होता है, उसीप्रकार प्रयोजनके अभिन्न होनेसे यहाँ भी धर्मोंका उपसंहार है । यदि शाखाभेदसे विज्ञानका भेद हो तो उस विज्ञान से भिन्न अन्य विज्ञानमें गुणोंके निरुद्ध होनेसे और प्रकृति विकृतिमावके न होने से उपसंहार नहीं होगा । किन्तु विज्ञानके एक होनेपर तो ऐसा नहीं होगा । इसी प्रयोजन सूत्रका विस्तार ' सर्वाभेदात् '

( ब्रह्मसूत्र ३।३।२५ ) इस सूत्र के आरम्भसे होगा ॥ ५ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका * जैसे वेद्य एक होनेसे ब्रह्मविद्या एक है, वैसे उसके समीप पठित होनेसे सगुणविद्या भी सब शाखाओं में एक ही है । इसको सूत्रकार ' दर्शयति च ' इत्यादिसे दिखलाते हैं । जो एक वेदान्तमें विहित उपासनाका अन्य शाखामें सिद्धके समान ग्रहण उसे प्रायदर्शनन्याय कहा जाता है, अतः ब्रह्मविद्या अभिन्न होने के समान उक्थ आदि उपासनाएँ भी सभी शाखाओं में एक ही हैं ॥ ४ ॥

* शाखाओंका भेद होनेपर भी समान विद्या में श्रुत गुण श्रुतिके अनुसार व्यवस्थित हैं अथवा एक शाखा अश्रुत गुणोंका अन्य शाखा से उपसंहार है । इस प्रकार सन्देह होनेपर पूर्वपक्ष में विद्या एक होनेपर मी तत् तत् शाखामें उक्त गुणोंसे ही उपकारकी सिद्धि होनेसे शाखा - भेदसे गुण व्यवस्थित हैं । सिद्धान्ती - प्रधानके एक होनेपर तत् तत् उपकारक बङ्गोंके उपसंहार में ' विधिशेषवत् '

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अधि ० ३ सू ० ६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६५५ ( ३ अन्यथात्वाधिकरणम् । सू ० ६-८ ) अन्यथात्वं शब्दादिति चेन्नाविशेषात् ॥ ६ ॥

पदच्छेद --- अन्यथात्वम्, शब्दात् इति चेत्, न, अविशेषात् । सूत्रार्थ - ( शब्दात् ) ' त्वं न उद्गाय ' ' तमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे ' इत्यादि श्रुति ( अन्यथात्वम् ) विद्याका भेद होना चाहिए, ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है, ( अविशेषात् ) क्योंकि श्रुतियोंके अभिप्रायमें विशेषता नहीं है, अतः विद्याका भेद नहीं है । * वाजसनेयके ' ते ह देवा ऊचुर्हन्तासुरान्यज्ञ उद्गीथेनात्ययामेति ' ( बृह ० १।३।१ ) ‘ ते ह वाचमूचुस्त्वं न उद्गाय ' ( बृह ० १।३।२ ) इति प्रक्रम्य वागादीन्प्राणानसुरपाप्मविद्धत्वेन निन्दित्वा मुख्य प्राणपरिग्रहः पठ्यते - ' अथ हेममासन्यं प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्य एष प्राण उद्गायत् ' ( बृह ० १।३।७ ) इति । तथा छान्दोग्येऽपि - ' तद्ध देवा उद्गीथमाजहुरने नैनानभिभविष्यामः ' ( छा ० १ | २ | १ ) इति प्रक्रम्येतरान्प्राणान सुरपाप्मविद्धत्वेन निन्दित्वा तथैव मुख्यप्राणपरिग्रहः पठ्यते- ' अथ ह य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासांचक्रिरे ' ( छा ० १।२।७ ) इति । उभयत्रापि च प्राणप्रशंसया प्राणविद्याविधिरध्यवसीयते । तत्र संशयः-किमत्र विद्याभेदः स्यादाहोस्विद्विद्यैकत्वमिति? किं तावत्प्राप्तम्? पूर्वेण न्यायेन विद्यै-वाजसनेयक में ' ते ह देवा ऊचुः ० ' ( उन देवताओंने कहा, हम इस यज्ञमें उद्गीथसे असुरोंका अतिक्रमण करें ) ' ते ह वाचमूचुः ० ' ( उन देवताओंोंने वाक्से कहा, ' तुम हमारे लिए उद्गान करो ' वाणी - बहुत अच्छा ) इस प्रकार उपक्रमकर वाक् आदि प्राण असुर - पापोंसे माक्रान्त हैं, इस प्रकार उनकी निन्दा कर ' अथ हेममासन्यं ० ' ( फिर अपने मुखमें रहनेवाले प्राणसे कहा, ' तुम हमारे लिए उद्गान - उद्गाता सम्बन्धी कर्म करो ' ' तब बहुत अच्छा ' ऐसा कहकर इस प्राणने उनके लिए उद्गान किया ) इस प्रकार मुख्य प्राणका प्ररिग्रह कहते हैं । ऐसे ही छान्दोग्य में भी ' तद्ध देवा ० ' ( उनमें से देवताओंने यह सोचकर कि इसके द्वारा इनका पराभव करेंगे, उद्गीथका अनुष्ठान किया ) इसप्रकार उपक्रमकर अन्य प्राणोंके असुरोंके पापोंसे आक्रान्त होनेसे उनकी निन्दाकर वैसे ही ' अथ ह य ० ' ( पुन यह जो प्रसिद्ध मुख्य प्राण है उसीके रूपमें उद्गीथकी उपासना उसकी उद्गीथरूपसे उपासना की ) इस प्रकार मुख्य प्राणका परिग्रह करते हैं । वाजसनेयक और छान्दोग्य दोनोंमें भी प्राणकी प्रशंसासे प्राण-विद्याविधिका निश्चय होता है । यहाँ संशय होता है कि क्या यहाँ विद्याका भेद है अथवा विद्या एक है? तब क्या प्राप्त होता है? पूर्व न्यायसे विद्या एक है, यह प्राप्त होता है । परन्तु उपक्रमके भेद से सत्यानन्दी - दीपिका इत्यादिसे दृष्टान्त कहते हैं । शङ्का - जैसे आग्नेय यागमें अन्वित गुणोंकी उससे भिन्न सौयंयागमें प्राप्ति होती है, वैसे ही एक विद्यास्थित गुणोंका अन्य विद्यामें उपसंहार क्यों न हो? समाधान - ' प्रकृतिवद्वि-कृतिः कर्तव्यः ' ( प्रकृति यागके समान विकृति याग करना चाहिए ) ' यत्र समग्राङ्गोपदेशः सा प्रकृतिः ” ( विघिसे जिसमें समग्र अङ्गोका उपदेश हो वह प्रकृति याग है ) ' यत्र वैशेषिकाङ्गानामुपदेशः सा विकृति: ' ( प्रकृति यागके समान और विशेष अङ्गों का जहाँ उपदेश हो वह विकृति याग है ) यहां आग्नेय याग प्रकृति है और सोयं याग विकृति है, यह उक्त न्याय कर्मोंमें तो युक्त है । परन्तु इस प्रकारका प्रकृति - विकृतिभाव ही विद्याओं में असिद्ध है, अतः उसकी यहाँ प्राप्ति नहीं है । इस प्रकार विद्याके एक होनेसे गुणोंका उपसंहार सिद्ध है ॥ ५ ॥

* पूर्वाधिकरणोंमें विद्याओंके प्रतिपादक वाक्योंमें अविशेष होनेसे समानरूपसे विद्याका एकत्व कहा गया है । अब इस अधिकरण में उसका अपवाद करते हैं । यहाँ पूर्वाधिकरण सिद्धान्त-

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६५६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ कत्वमिति । ननु न युक्तं विद्यैकत्वं, प्रक्रमभेदात् । अन्यथा हि प्रक्रमन्ते वाजसनेयिनोऽ-न्यथा छान्दोगाः -'त्वं न उद्गाय ' ( बृह ० १ | ३ | २ ) इति वाजसनेयिन उद्गीथस्य कर्तुत्वेन प्राणमामनन्ति । छन्दोगास्तूद्गीथत्वेन ' तमुद्गीथमुपासांचक्रिरे ' ( छा ० १ | २ | ७ ) इति । तत्कथं विद्यैकत्वं स्यादिति चेत् - नैष दोषः, न ह्येतावता विशेषेण विद्यैकत्वभपगच्छति, अवि-शेषस्यापि बहुतरस्य प्रतीयमानत्वात् । तथाहि देवासुर संग्रामोपक्रमत्वमसुरात्ययाभिप्राय उद्गीथोपन्यासो वागादिसंकीर्तनं तन्निन्दया मुख्यप्राणव्यपाश्रयस्तद्वीर्याच्चासुरविध्वं-सनमश्मलोष्ट निदर्शनेनेत्येवं बहवोऽर्था उभयत्राप्यविशिष्टाः प्रतीयन्ते । वाजसनेयके ऽपि चोद्गीथसामानाधिकरण्यं प्राणस्य श्रुतम् - ' एष उ वा उद्गीथः ' ( बृह ० १।३।२३ ) इति ।

तस्माच्छान्दोग्येऽपि कर्तृत्वं लक्षयितव्यम् । तस्माच्च विद्यैकत्वमिति ॥ ६ ॥

न वा प्रकरणभेदात्परोवरीयस्त्वादिवत् ॥ ७ ॥

पदच्छेदन, वा, प्रकरणभेदात् परोवरीयस्त्वादिवत् । सूत्रार्थ - ( प्रकरणभेदात् ) प्रकरण मेदसे ( न वा ) द्या एक नहीं है, ( परोवरीयस्त्वादि-वत् ) जैसे ' एष परोवरीयानुद्गीथः ' इस श्रुतिसे विहित परोवरीयस्त्वादि गुण विशिष्ट उद्गीथ उपासना, चक्षु, आदित्य आदि गत हिरण्यश्मश्रुत्व आदि गुण विशिष्ट उद्गीथोपासनासे भिन्न है । * न वा विद्यैकत्वमत्र न्याय्यः, विद्याभेद एवात्र न्याय्यः । कस्मात्? प्रकरणभेदा-दिति, प्रक्रमभेदादित्यर्थः । तथाहि - इह प्रक्रमभेदो दृश्यते छान्दोग्ये तावत्- ' ओमित्येतद-क्षरमुद्गीथमुपासीत ' ( छा ० १।१।१ ) इत्येवमुद्गीथावयवस्यों कारस्योपास्यत्वं प्रस्तुत्य रसत-विद्याका एकत्व युक्त नहीं है । क्योंकि वाजसनेयी अन्य प्रकारसे उपक्रम करते हैं और छान्दोग अन्य रीतिसे ' त्वं न उद्गाय ' इसप्रकार वाजसनेयी प्राणको उद्गीथका कर्तारूपसे कहते हैं, और छान्दोग तो ' तमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे ' ( उसकी उद्गीथरूपसे उपासना करें ) इसतरह प्राणको उद्गीथरूपसे ( कर्म-रूपसे ) कहते हैं, तो इससे विद्याका एकत्व कैसे होगा । पू ० - ऐसा यदि कहो, तो यह दोष नहीं है, क्योंकि इतने विशेषसे विद्याका एकत्व निवृत्त नहीं होता, कारण कि बहुत - सा अविशेष भी प्रतीत होता है । जैसे कि देवासुर संग्रामका उपक्रम, असुरोंके पराभव के लिए संवाद, उद्गोथका उपन्यास, वाक् आदिका संकीर्तन, उनकी निन्दासे मुख्य प्राणका आश्रय और पाषाण लोष्टके दृष्टान्तसे उस प्राणके वीर्यं पराक्रम द्वारा असुरोंका विध्वंस, इसप्रकारके बहुत अर्थं दोनों शाखाओंमें मो समान प्रतीत होते हैं । और ' एष उ वा उद्गीथ ' ( यह उद्गीथ है ) इसप्रकार वाजसनेयकमें भी प्राणकी उद्गीथ-सामानाधिकरण्य श्रुति है । इससे छान्दोग्यमें भी प्राण में कर्तृत्वकी लक्षणा करनी चाहिए । इसलिए विद्या एक है || ६ || सिद्धान्ती - यहाँ विद्याका एकत्व उचित नहीं है, किन्तु विद्याका भेद ही उचित है, किससे? प्रकरणके भेदसे, उपक्रमके भेदसे, ऐसा अर्थ है । जैसे कि ' ओमित्येतदक्षरम् ० ' ( ॐ यह अक्षर उद्गीथ है, इसकी उपासना करनी चाहिए ) इस प्रकार उद्गीथके अवयव ओंकारमें उपास्यत्व प्रस्तुत सत्यानन्दी - दीपिका न्यायसे ‘ उद्गीथविद्या ' इसप्रकार एक संज्ञा होने से एक विद्या है, इससे पूर्वपक्ष में परस्पर गुणोंका उपसंहार फल है, यह पूर्वपक्ष सूत्र है । सिद्धान्त में संज्ञा एक होनेपर भी विद्याके एकल्वका अपवाद होने से गुणका अनुपसंहार है । इसलिए कर्ता और कर्मरूप उपास्य के भेदसे विद्याका भेद है || ६ ॥ * बहुत से विरुद्ध रूपोंके भेदसे विद्या एक नहीं है, ऐसा ' न वा ' इत्यदिसे सिद्धान्त कहते हैं । और ' पृथिव्यादिरसानां रसतम ओङ्कारः ' ( पृथिवी आदि रसोंका रसतम ॐ कार है ) आप्ति, समृद्धि