श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 691–700
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 691–700
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अधि ० ३ सू ० ७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६५७ मादिगुणोपव्याख्यानं तत्र कृत्वा ' अथ खल्वेतस्यैवाक्षरस्योपव्याख्यानं भवति ' ( छा ० १।१।१० ) इति, पुनरपि तमेवोद्गीथावयवमोंकारमनुवर्त्य देवासुराख्यायिकाद्वारेण तम् ' प्राण-मुद्गीथमुपासांचक्रिरे ( छा ० १ | २ | २ ) इत्याह । तत्र यद्युद्गीथशब्देन सकला भक्तिरभिप्रेयेत तस्याश्च कर्तोद्गातत्विक्तत उपक्रमश्चोपरुध्येत लक्षणा च प्रसज्येत । उपक्रमतन्त्रेण चैकस्मिन्वाक्य उपसंहारेण भवितव्यम् । तस्मादत्र तावदुद्गीथावयव ओंकारे प्राण-दृष्टिरुपदिश्यते । वाजसनेयके तूद्गीथशब्देनावयवग्रहणे कारणाभावात्सकलैव भक्तिरा-वेद्यते । ' स्वं न उद्गाय ' ( बृह ० १।३।२ ) इत्यपि तस्याः कर्ताद्गातत्विक्प्राणत्वेन निरूप्यत इति प्रस्थानान्तरम् | यदपि तत्रोद्गीथसामानाधिकरण्यं प्राणस्य तदप्युद्गातृत्वेनैव दिदर्शयिषितस्य प्राणस्य सर्वात्मत्वप्रतिपादनार्थमिति न विद्यैकत्वमावहति । सकल-भक्तिविषय एव च तत्राप्युद्गीथशब्द इति वैषम्यम् । नच प्राणस्योद्गातृत्वमसंभ-वेन हेतुना परित्यज्यते, उद्गीथभाववदुद्गातृभावस्याप्युपासनार्थत्वेनोपदिश्यमान-त्वात् । प्राणवीर्येणैव चोद्गातौद्गात्रं करोतीति नास्त्यसंभवः । तथा च तत्रैव श्रावि-कर और वहाँ रसतम आदि गुणों का उपव्याख्यानकर अनन्तर ' खल्वेतस्यैव ० ' ( निश्चय इसी प्रकृत उद्गीथ अक्षरका उपव्याख्यान होता है ) इस प्रकार यहाँ छान्दोग्यमें उपक्रमभेद देखने में आता है । फिर भी उसी उद्गीथावयव ॐकारकी अनुवृत्तिकर देवासुर आख्यायिका द्वारा उसको ' प्राणमु ० ' ( उन देवोंने नासिकामें स्थित प्राणके रूपमें उद्गीथकी उपासना की ) इस प्रकार श्रुति कहती है । यहाँ - छन्दोग्यमें यदि उद्गीथ शब्दसे सम्पूर्ण साम भक्ति अभिप्रेत हो और उसका कर्ता उद्गाता ऋत्विक हो, तो उपक्रम का बाध होगा और लक्षणा प्रसक्त होगी । एक वाक्यमें उपक्रमके अनुसार उपसंहार होना चाहिए । इससे यहाँ उद्गीथावयव ॐकारमें प्राण दृष्टिका उपदेश है । वाजसनेयकमें तो उद्गीथ शब्दसे अवयव ग्रहण करनेमें कारणके न होनेसे सम्पूर्ण साम भक्ति कही जाती है, ' स्वं न उद्गाय ' इसमें भी उसका कर्ता उद्गाता ऋत्विक् प्राणरूपसे निरूपण किया जाता है, इससे यह अन्य प्रस्थान है । वहाँ भी जो प्राणका उद्गीथके साथ सामानाधिकरण्य है वह भी उद्गातृरूपसे दिखलाने के लिए अभिलषित प्राणमें सर्वात्मत्व प्रतिपादनके लिये है, विद्याके एकत्वका वहन नहीं करता । वहाँ ( वाजसनेयक में ) मी उद्गीथं शब्द सकल भक्ति विषयक ही है इससे दोनों शाखाओंमें वैलक्षण्य है अर्थात् विद्याका भेद है । और प्राणमें उद्गातृत्वका असम्भव हेतु से त्याग नहीं किया जाता, क्योंकि उद्गीथभावके समान उद्गातृ-माव भी उपासना के लिए उपदिश्यमान है, और उद्गाता प्राणकी सामथ्यसे ही ओद्गात्र कर्म करता सत्यानन्दी -दीपिका ऐसे गुणोंका कथनकर गुण विशिष्ट ॐकारमें प्राण दृष्टिका विधान करनेके लिये यह आख्यायिका प्रस्तुत की गयी है । इसी प्रकार छान्दोग्य में प्राण दृष्टिसे उद्गीथावयव ' ॐ ' उपास्य है, और वाजसनेयक में प्राण उपास्य कहा गया है, इस प्रकार उपास्यभेदसे विद्याका भेद है । * वाजसनेयकमें उद्गाता प्राण उपास्य है और छान्दोग्य में ॐकार उपास्य है, इस प्रकार विवक्षितार्थ - अन्तरङ्ग उपास्य भेदके स्पष्ट ग्रहण होनेपर बहिरङ्ग अर्थवादको समतामात्रसे उपासनाका एकत्व युक्त नहीं है । इसमें ' तथाहि ' इत्यादिसे दृष्टान्त कहते हैं । ' वि वा एतं प्रजया पशुभिरर्द्धयति ० ' यह अभ्युदयेष्टि प्रतिपादक वाक्य है । ( यजमानने चतुर्दशीमें अमावस्याकी भ्रान्तिसे दर्शयागके लिये दर्श सम्बन्धी अग्नि आदि देवताके लिये तण्डुल, दधि और दूध रूप हवि पूर्वमें ही इन सबका संकल्प किया है, अनन्तर चन्द्रमाको उदय होते हुए देखता है, इसलिए उस यजमानको कालके विपर्यय जन्य अपराधसे वही संकल्पित हवि प्रजा आदिसे रहित करता है और उसके शत्रुओंकी वृद्धि करता है । इससे कालकी भ्रान्तिवाले यजमानसे जो मध्यम आदि भावसे तीन प्रकारके दधि सहित तण्डुल सङ्कल्प किये गये हैं उनका विभाग करे अर्थात् अग्नि आदि देवतासे वियुक्त करे और
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६५८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ तम् - ' वाचा च ह्येव स प्राणेन चोदगायत् ' ( बृह ० १।३।२४ ) इति । नच विवक्षितार्थभेदेऽव-गम्यमाने वाक्यच्छायानुकारमात्रेण समानार्थत्वमध्यवसातुं युक्तम् । तथाह्यभ्युदय -वाक्ये पशुकामवाक्ये च- ' त्रेधा तण्डुलान्विमजेद्ये मध्यमाः स्युस्तानग्नये दात्रे पुरोडाशमष्टाकपालं कुर्यात् ' इत्यादिनिर्देशसाम्येऽप्युपक्रमभेदादभ्युदयवाक्ये देवतापनयोऽध्यवसितः, पशु-कामवाक्ये तु यागविधिः । तथेहाप्युपक्रमभेदाद्विद्याभेदः । परोवरीयस्त्वादिवत् । यथा परमात्मदृष्ट्यध्याससाम्येऽपि ' आकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम् ' ( छा ० १।९ ।१ ) ‘ स एष परोवरीयानुद्गीथः स एषोऽनन्तः ' ( छा ० १ / ९ / २ ) इति परोवरीयस्त्वगुणविशिष्टमुद्गीथो-पासनमक्ष्यादित्यादिगतहिरण्यश्मश्रुत्वा दिगुणविशिष्टोद्गीथोपासनाद्भिन्नम् । नचेतरेत-रगुणोपसंहार एकस्यामपि शाखायां तद्वच्छा खान्तरस्थेष्वप्येवं जातीयकेषूपासनेष्विति ।७ अतः प्राण में उद्गातृत्वका असम्भव नहीं है । और ' वाचा च ह्येव ० ' ( उद्गाताने प्राण प्रधान वाणीसे और आत्मभूत प्राणसे उद्गान किया ) इस प्रकार वहाँ वाजसनेयकमें ही श्रवण कराया गया है । और इस प्रकार विवक्षित अर्थके भेदके अवगम होनेपर वाक्य छायाके सादृश्यमात्र से समानार्थत्व-एकार्थत्वका निश्चय करना युक्त नहीं है, क्योंकि अभ्युदयेष्टि वाक्यमें और पशुकामेष्टि विधायक वाक्यमें ' त्रेधा तण्डुलान् ० ' ( तण्डुलके तीन भाग करे उनमें जो मध्यम हों उनका दातृत्व गुण विशिष्ट अग्नि लिये अष्ट कपाल पुरोडाश करे ) इत्यादि निर्देश साम्य होनेपर भी उपक्रमके भेदसे अभ्युदयवाक्यमें [ हविका ] पूर्व देवतासे अपनय ( वियोग ) निश्चित किया गया है, और पशुकाम वाक्यमें तो यागकी विधि निश्चित की गई है, वैसे ही यहाँ भी उपक्रमके भेदसे विद्याका भेद है । परोवरीयस्त्वादिके समान । जैसे परमात्मदृष्टिके अध्यासके समान होनेपर भी ' आकाशो ह्येनैभ्यो ० ' ( आकाश ही इन पृथिवी आदिसे बड़ा है, अतः आकाश ही इनका आश्रय है ) ' स एष ० ' ( वह यह उद्गीथ परम उत्कृष्ट है, यह अनन्त है ) इस प्रकार परोवरीयस्त्व गुणविशिष्ट उद्गीथ उपासना अक्षि, आदित्य आदि गत हिरण्यश्मश्रुत्वादिगुण विशिष्ट उद्गीथ उपासनासे भिन्न है, और जैसे एक शाखामें भी अन्योन्य गुणोंका उपसंहार नहीं है, वैसे अन्य शाखा में स्थित इस प्रकारकी उपासनाओंमें भी समझना चाहिए ॥७ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका दातृत्व आदि गुण विशिष्ट अग्नि, इन्द्र और विष्णु जो दर्श देवताओंसे भिन्न देवता हैं उनके उद्देश्य से दधिमें स्थूल तण्डुलोंका चरू बनाकर और गरम दूधमें छोटे तण्डुलोंका चरू बनाकर होम करे । यह पूर्वमीमांसाके ' ६।५।१ ' प्रथमाधिकरण ( अभ्युदयाधिकरण ) का विषय है । इसमें सन्देह होता है कि यह अभ्युदयेष्टि दर्शयागसे भिन्न स्वतन्त्र कर्म है अथवा दर्शयागमें ही केवल देवताका अपनय - परिवर्तन है? पूर्वपक्ष - यहाँ कालके अपराध होनेपर अन्य देवोंसे युक्त दर्शयागसे भिन्न प्रायश्चित्तरूप कर्मका विधान है, जैसे पशुकामेष्टि स्वतन्त्र विहित कर्म है । सिद्धान्ती --- दर्शयागसे भिन्न कर्मका विधान नहीं है, क्योंकि दर्शयागमें पूर्व निश्चित देवताओंको हटाकर दातृत्व आदि गुण विशिष्ट अग्नि आदि अपूर्व देवताओंका विधान किया जाता है । अतः यहाँ दर्शकर्मका भेद नहीं है और ' यः पशुकामः स्यात् सोऽमावस्यामिष्ट्वा वत्सानपाकुर्यात् ' इस विधिसे दर्शयागकी समाप्ति के अनन्तर स्वतन्त्ररूपसे पशुका -मेष्टिका विधान है, अतः समान प्रकरणमें होनेपर भी अभ्युदयेष्टि प्रतिपादक वाक्यके साथ पशुकामेष्टि विधायक वाक्यकी समानता नहीं है । इसी प्रकार प्रकृतमें भी समान निर्देश एक विद्याका प्रयोजक नहीं । इसमें परोवरीयस्त्वगुण विशिष्ट उद्गीथोपासनाको दृष्टान्तरूपसे दिया गया है । जैसे कि आकाश नामक परमात्माकी दृष्टिके आलम्बनरूपसे उद्गीथको अनन्तशब्दसे कहा गया है । यहां आकाशरूपसे उद्गीथोपासनाका विधान है अन्यत्र हिरण्यश्मश्रुरूपसे उद्गीथोपासनाका विधान है । इन दोनोंमें उद्गीथोपासना समान होनेपर भी आकाशत्व और हिरण्यश्मश्रुत्व गुणभेदसे विद्याका
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अधि ० ४ सू ० ८ - ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६५ ९ संज्ञातश्वेतदुक्तमस्ति तु तदपि ॥ ८ ॥
पदच्छेद - संज्ञातः, चेत्, तत्, उक्तम्, अस्ति, तु, तद्, अपि । सूत्रार्थ - ( चेत् ) यदि कहो कि ( संज्ञातः ) दोनों स्थलोंमें ' उद्गीथविद्या ' इस एक संज्ञासे विद्या एक है, तो ( तदुक्तम् ) ' न वा प्रकरणभेदात् ' इस सूत्र में कहा गया है । ( अस्ति तु तदपि ) और जो भिन्न-रूपसे अग्निहोत्र आदि प्रसिद्ध हैं, उनकी भी काठक ग्रन्थमें पठित होनेसे एक काठक संज्ञा होती है । अथोच्येत - संज्ञैकत्वाद्विद्यैकत्वमत्र न्याय्यमुद्गीथ विद्येत्युभयत्राप्येका संज्ञेति-तदपि नोपपद्यते, उक्तं ह्येतत् - ' न वा प्रकरणभेदात्परोवरीयस्त्वादिवत् ' ( ब्रह्मसूत्र ३।३।७ ) इति । तदेव चात्र न्याय्यतरं श्रुत्यक्षरानुगतं हि तत्संज्ञैकत्वं तु श्रुत्यक्षरबाह्यमुद्गीथशब्दमात्र-प्रयोगालौकिकैर्व्यवहर्तृभिरुपचर्यते । अस्ति चैतत्संज्ञैकत्वं प्रसिद्धभेदेष्वपि परोवरी-यस्त्वाद्युपासनेषूद्गीथविद्येति । तथा प्रसिद्धभेदानामप्यग्निहोत्रदर्शपूर्णमासादीनां काठकैकग्रन्थपरिपठितानां काठकसंज्ञैकत्वं दृश्यते, तथेहापि भविष्यति । यत्र तु नास्ति कश्विदेवं जातीय को भेदहेतुस्तत्र भवतु संज्ञैकत्वाद्विद्यैकत्वम् - यथा संवर्गविद्यादिषु || ८ || ( ४ व्याप्यधिकरणम् । सू ० ९ ) व्याप्तेश्च समञ्जसम् ॥ ९ ॥
पदच्छेद - व्याप्तेः च, समञ्जसम् । सूत्रार्थ - ( व्याप्तेः ) ऋक्, यजु और साममें ॐकारकी व्याप्ति है, अतः किस ॐकारको उपासना करनी चाहिए, ऐसी जिज्ञासा होनेपर ' उद्गीथावयव ॐकारकी ' इस प्रकार उद्गीथ ॐकारका विशेषण है, ( समञ्जसम् ) यही पक्ष दोष रहित है । ' च ' शब्द तु शब्द के अर्थ में है, अत: अध्यास, अपवाद और ऐक्य पक्षका निरास होता है । ' ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत ' ( छा ० १ | १ | १ ) इत्यत्राक्षरोद्गीथशब्दयोः सामानाधि करण्ये श्रूयमाणेऽध्यासापवादैकत्वविशेषणपक्षाणां प्रतिभासनात्कतमोऽत्र पक्षो न्याय्यः यदि ऐसा कहा जाय कि संज्ञाके एकत्वसे विद्याका एकत्व यहाँ उचित है, क्योंकि उभयत्र ' उद्गीथ विद्या ' इस प्रकार एक संज्ञा है । वह मी युक्त नहीं है, कारण कि इसका ' न वा प्रकरण-भेदात् ० ' इस सूत्र में निर्णय किया गया है । वही यहाँ प्रकृतमें युक्ततर है, क्योंकि वह श्रुति के अक्षरोंसे अनुगत है, और संज्ञा एकत्व तो श्रुतिके अक्षरोंसे बाह्य है, उद्गीथ शब्दमात्रके प्रयोगसे व्यवहार करनेवाले लौकिक उसका उपचार करते हैं । इस प्रकार प्रसिद्ध भेदवाली परोवरीयस्त्व आदि उपा-सनाओंमें ' उद्गीथविद्या ' इस प्रकार यह संज्ञा एकत्व है । और एक ही काठक ग्रन्थमें पठिन प्रसिद्ध भेदवाले अग्निहोत्र, दर्श, पूर्णमास आदिका मी काठक एक संज्ञात्व देखने में आता है, वैसे यहाँ मी होना चाहिए । परन्तु जहाँ इस प्रकारका कोई भेदका हेतु नहीं है वहाँ संज्ञाके एकत्वसे विद्याका एकत्व हो, जैसे संवर्ग विद्या आदिमें होता है ॥ ८ ॥
' ओमित्येतद् ० ' ( इस उद्गीथावयव ॐ अक्षरकी उपासना करनी चाहिए ) यहाँ अक्षर और उद्गीथ शब्दका सामानाधिकरण्य श्रूयमाण होनेपर अध्यास, अपवाद, एकत्व और विशेषण इन पक्षोंका प्रतिभास होनेसे इनमें कौन - सा पक्ष उचित है, यह विचार होता है । उनमें दो वस्तुओंमें एक सत्यानन्दी - दीपिका भेद है, वैसे ही वाजसनेयक और छान्दोग्यमें समान जातीय विद्याका भी विधानभेद से भेद ही है ॥ ७ ॥
* ॐ अक्षर मोर उद्गीथके सामानाधिकरण्यको इस अधिकरणका विषय बनाकर ' ओमि-त्येतद् ' इत्यादिसे संशय कहते हैं । सामानाधिकरण्य अध्यास, अपवाद, एकत्व और विशेषण - विशेष्य
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६६० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ स्यादिति विचारः । तत्राध्यासो नाम - द्वयोर्वस्तुनोरनिवर्तितायामेवान्यतरबुद्धावन्यतरबु-द्धिरध्यस्यते, यस्मिन्नितर बुद्धिरध्यस्यतेऽनुवर्तत एव तस्मिंस्तद्बुद्धिरध्यस्तेतरबुद्धावपि । यथा नाम्नि ब्रह्मबुद्धावध्यस्यमानायामप्यनुवर्तत एव नामबुद्धिर्न ब्रह्मबुद्धया निवर्तते । यथा वा प्रतिमादिषु विष्ण्वादिबुद्धयध्यासः । एवमिहाप्यक्षर उद्गीथबुद्धिरध्यस्येत, उद्गीथे वाऽक्षरबुद्धिरिति ॥ अपवादो नाम --यत्र कस्मिंश्चिद्वस्तुनि पूर्वनिविष्टायां मिथ्याबुद्धौ निश्चितायां पश्चादुपजायमाना यथार्था बुद्धिः पूर्वनिविष्टाया मिथ्याबुद्धे-निवर्तिका भवति । यथा देहेन्द्रियसंघाते आत्मबुद्धिरात्मन्येवात्मबुद्धया पश्चाद्भाविन्या ' तत्त्वमसि ' ( छा ० ६।८।७ ) इत्यनया यथार्थवुद्धया निवर्त्यते । यथा वा दिग्भ्रान्तिबुद्धिर्दि-ग्याथात्म्यबुद्धया निवर्त्यते । एवमिहाप्यक्षरवुद्धयोद्गीथबुद्विर्दिवर्त्येत, उद्गीथवुद्धया वाऽक्षरबुद्धिरिति । * एकत्वं त्वक्षरोद्गीथशब्दयोर नतिरिक्तार्थवृत्तित्वम् - यथा द्विजोत्तमो ब्राह्मणो भूमिदेव इति । विशेषणं पुनः सर्ववेदव्यापिन ओमित्येतस्याक्षरस्य ग्रहणप्रसङ्ग औद्गात्रविशेषस्य समर्पणम् - यथा नीलं यदुत्पलं तदानयेति । एवमिहा-प्युद्गीथो य ॐकारस्तमुपासीतेति । एवमेतस्मिन्सामानाधिकरण्यवाक्ये विमृश्यमान एते पक्षाः प्रतिभान्ति, तत्रान्यतमनिर्धारणकारणाभावादनिर्धारणप्राप्ताविदमुच्यते - व्याप्तेश्च वस्तुकी बुद्धि निवृत्त हुए विना ही दूसरी बुद्धि अध्यस्त हो वह बध्यास है, जिसमें अन्य बुद्धि अध्यस्त होती है उसमें अन्य बुद्धिके अध्यस्त होनेपर उस वस्तुकी बुद्धि अनुवृत्त होती है । जैसे नाम में ब्रह्मबुद्धिका अध्यास होनेपर भी नामबुद्धि अनुवृत्त होती ही है वह ब्रह्मबुद्धिसे निवृत्त नहीं होती । अथवा जैसे प्रतिमा आदिमें विष्णु आदि बुद्धिका अध्यास होता है वह विष्णु आदि बुद्धिसे निवृत्त नहीं होती । वैसे प्रकृतमें मी अक्षर में उद्गीथ बुद्धिका अध्यास है अथवा उद्गीथमें अक्षर बुद्धिका अध्यास है । जहाँ किसी वस्तु में पूर्व निविष्ट मिथ्याबुद्धिका निश्चय होनेपर पश्चात् उत्पन्न होनेवाली यथार्थं बुद्धि पूर्व निविष्ट मिथ्याबुद्धिकी निवर्तक होती है वह अपवाद है । जैसे देह, इन्द्रिय संघातमें आत्म-बुद्धि ' तत्त्वमसि ' इससे अनन्तर उत्पन्न होनेवाली आत्मामें ही आत्मबुद्धि इस अन्य यथार्थ बुद्धिसे निवृत्त हो जाती है । अथवा जैसे दिशाकी भ्रान्ति बुद्धि दिशाकी यथार्थ बुद्धिसे निवृत्त हो जाती है, वैसे ही यहाँपर भी अक्षर बुद्धिसे उद्गीथ बुद्धि निवृत्त हो जाती है अथवा उद्गीथ बुद्धिसे अक्षर बुद्धि निवृत्त हो जाती है । एकत्व तो अक्षर और उद्गीथ शब्दके अभिन्न अर्थ में वृत्तित्व है, जैसे द्विजोत्तम, ब्राह्मण और भूमिदेव । विशेषण - यह उद्गीय विशेषण सर्व वेदव्यापी ॐ इस अक्षरके ग्रहण के प्रसंग में उद्गाता के कर्म विशेषका समर्पण करता है । जैसे नील जो उत्पल उसे ले आओ अर्थात् नीलगुण विशिष्ट कमल ले आओ, वैसे यहाँ भी उद्गीथ जो ओंकार उसकी उपासना करनी चाहिए । इसप्रकार इस सामानाधिकरण्य वाक्यका विचार करनेपर ये पक्ष प्रतीत होते हैं । उनमें किसी एक के निर्धारण कारणके न होने से अनिर्धारण प्राप्त होनेपर, सिद्धान्ती यह कहते हैं - ' व्याप्तेश्च समञ्जसम् ' ' च ' शब्द तु शब्दके स्थान में है, और तीनों पक्षोंकी व्यावृत्ति प्रयोजनवाला है । इसलिए यहाँ तीनों सत्यानन्दी - दीपिका भाव में होता है । ' भेदबुद्धिपूर्वकाभेदारोप अध्यास: ' ( भेदबुद्धि पूर्वक अभेदका आरोप अध्यास है ) जैसे ‘ सिंहो माणवकः ' ' माणवक सिंह है, माणवकमें माणवकत्व बुद्धि के निवृत्त न होते हुए भी उसमें सिंहबुद्धिसे सिहशब्दका प्रयोग होता है । जैसे यहाँ अध्यास में सामानाधिकरण्य है, वैसे ही प्रकृतमें भी होना चाहिए । * सिद्धान्ती - — जिस उद्गीथबुद्धिका ओंकारमें आरोप किया जाता है, उस उद्गीथ अर्थके वाचक उद्गीथशब्दकी ओंकारमें लक्षणा प्रसक्त होगी अर्थात् उस उद्गीथशब्दका लक्षणावृत्तिसे ओंकार-रूप लक्ष्यार्थं मानना पड़ेगा, क्योंकि ओंकारमें उद्गीथबुद्धिका विषयत्व गोणरूप से प्रतिपादित है । तथा
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अधि ० ४ सू ० ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६६१ समञ्जसमिति । चशब्दोऽयं तुशब्दस्थाननिवेशी पक्षत्रयव्यावर्तनप्रयोजनः । तदिह त्रयः पक्षाः सावद्या इति पर्युदस्यन्ते । विशेषणपक्ष एवैको निरवद्य इत्युपादीयते । तत्राभ्यासे तावद्या बुद्धिरितरत्राध्यस्यते तच्छदस्य लक्षणावृत्तित्वं प्रसज्येत तत्फलं च कल्प्येत । श्रूयत एव फलम् ' आपयिता ह वै कामानां भवति ' ( छा ० १ | १ | ७ ) इत्यादीति चेत् - न, तस्यान्यफलत्वात् । आप्त्यादिदृष्टिफलं हि तन्नोद्गीथाध्यासफलम् । अपवादेऽपि समानः फलाभावः, मिथ्याज्ञाननिवृत्तिः फलमिति चेत् -- न, पुरुषार्थोपयोगानवगमात् । नच कदाचिदयों कारादौ कार बुद्धिर्निवर्तते, उद्गीथाद्वोद्गीथबुद्धिः । न चेदं वाक्यं वस्तु-तत्त्वप्रतिपादनपरम्, उपासनाविधिपरत्वात् । * नाप्येकत्वपक्षः संगच्छते, निष्प्रयोजनं हि तदा शब्दद्वयोकारणं स्यात्, एकेनैव विवक्षितार्थसमर्पणात् । नच हौत्रविषय आध्वर्यवविषये वाऽक्षर ओंकारशब्दवाच्य उद्गीथशब्दप्रसिद्धिरस्ति । नापि सकलायां सानो द्वितीयायां भक्त बुद्गीथशब्दवाच्यायामोंकार शब्दप्रसिद्धिर्येनानतिरिक्तार्थता स्यात् । परिशेषाद्विशेषणपक्षः परिगृह्यते । व्याप्तेः सर्ववेदसाधारण्यात् । सर्वव्याप्यक्षर-मिह मा प्रसज्जीत्यत उद्गीथशब्देनाक्षरं विशेष्यते । कथं नाम? उद्गीथावयवभूत ओंकारो गृह्यतति, नन्वस्मिन्नपि पक्षे समाना लक्षणा, उद्गीथशब्दस्यावयवल-पक्ष सदोष हैं, इससे वे पर्युदस्त हैं । केवल एक विशेषण पक्ष ही निर्दोष है, अतः उसका ग्रहण किया जाता है । उनमेंसे प्रथम अध्यास में तो जो बुद्धि अन्यत्र अध्यस्त होती है, उस शब्दकी लक्षा-वृत्ति प्रसक्त होगी और उसके फलकी कल्पना करनी पड़ेगी । यदि कहो कि ' आपयिता ह ० ' ( वह यजमानकी कामनाओंको प्राप्त करानेवाला होता है ) इत्यादि फल श्रुति है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि उसका अन्य फल है अर्थात् वह अन्यका फल है । अति आदिरूपसे ओंकारको दृष्टिका फल है उद्गीथके अध्यासका फल नहीं है । अपवादमें मी फलका अभाव समान है । यदि कहो कि मिथ्या-ज्ञानकी निवृत्ति उसका फल है, तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि उसका पुरुषार्थरूप फल उपोयोग ज्ञात नहीं होता और कभी भी मोंकारसे मोंकार बुद्धि और उद्गीथसे उद्गीथ बुद्धि निवृत्त नहीं होती, यह वाक्य [ ओमित्येतदक्षमुद्गीथमुपासीत ] वस्तुतत्त्व प्रतिपादन परकं मी नहीं है, कारण कि वह उपासना विधि परक है । इसीप्रकार एकत्व पक्ष भी संगत नहीं है, क्योंकि उस पक्ष में दो वार शब्दका उच्चारण निरर्थक होगा । एक ही वार उच्चारणसे विवक्षितार्थं समर्पित हो जाता है । हौत्रविषयक reat मध्वर्यविषयक ओंकारशब्दवाच्य अक्षर में भी उद्गीथशव्दकी प्रसिद्धि नहीं है । और सामकी उद्गीथशब्दवाच्य सम्पूर्ण दूसरी भक्ति - भागमें भी मोंकारशब्दकी प्रसिद्धि नहीं है, जिससे उसमें एकार्थत्व हो । अतः परिशेषसे विशेषणपक्ष ही परिगृहीत होता है, क्योंकि ओंकारकी व्याप्ति सर्ववेदसाधारण- समान है । सर्वव्यापी ॐ अक्षर यहाँ प्रसक्त न हो, अतः उद्गीथ शब्दसे ॐ अक्षर यहाँ विशेषित किया जाता है, किसप्रकार उद्गीथके अवयवभूत ओंकारका प्रकृतमें ग्रहण किया सत्यानन्दी - दीपिका सम्बन्ध भी असिद्ध होनेसे कल्पनीय होगा, इससे प्रतीकोपासनाका फल भी कल्पनीय होगा, अतः गौरव है | यदि कहो कि ' आपयिता ह वै कामनां भवति ' इस श्रुतिमें फलका श्रवण है? तो यह फल अध्यासका नहीं है, किन्तु उपासनाका है । इसीप्रकार अध्यासके समान अपवादका सो फल नहीं है । * जैसे पटके अवयवों अथवा ग्रामके अवयवरूप कुछ घरोंके जल जानेपर पट जल गया, ग्राम जल गया, ऐसा व्यवहार लोकमें प्रसिद्ध है । इसप्रकार सर्व वेदव्यापी ॐ कारका निराकरण कर उद्गीथके अवयवरूप ॐ कारमें प्राणदृष्टि विधानके लिए विशेषण ही युक्त है, क्योंकि इसमें
कल्पना लाघव है । इससे विशेषण पक्ष निर्दोष है ॥ ९ ॥
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६६२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ क्षणार्थत्वात् । सत्यमेवमेतत्, लक्षणायामपि तु संनिकर्षविप्रकर्षो भवत एव । अध्यास-पक्षे ह्यर्थान्तरबुद्धिरर्थान्तरे निक्षिप्यत इति विप्रकृष्टा लक्षणा विशेषणपक्षे त्ववयविवच-नेन शब्देनावयवः समर्प्यत इति संनिकृष्टश, समुदायेषु हि प्रवृत्ताः शब्दा अवयवेष्वपि प्रवर्तमाना दृष्टाः पटग्रामादिषु । अतश्च व्याप्तेर्हेतोरोमित्येतदक्षरमित्येतस्योद्गीथमित्ये-तद्विशेषणमिति समञ्जसमेतत्, निरवद्यमित्यर्थः ॥ ९ ॥
( ५ सर्वाभेदाधिकरणम् । सू ० १० ) सर्वाभेदादन्यत्रे ॥ १० ॥
पदच्छेद - सर्वाभेदात्, अन्यत्र, इमे । सूत्रार्थ - किसी शाखा में पठित ( इमे ) वसिष्ठत्व आदि गुण ( अन्यत्र ) अन्य शाखामें मी गृहीत होते हैं, ( सर्वाभिदात् ) क्योंकि सब शाखाओं में प्राणविज्ञानका अभेद है । * वाजिनां छन्दोगानां च प्राणसंवादे श्रेष्ठयगुणान्वितस्य प्राणस्योपास्यत्वमुक्तम् । वागादयोऽपि हि तत्र वसिष्ठत्वादिगुणान्विता उक्ताः, ते च गुणाः प्राणे पुनः प्रत्यर्पिता: -' यद्वा अहं वसिष्ठाऽस्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसि ' ( बृह ० ६ | ३ | १४ ) इत्यादिना । अन्येषामपि तु शाखिनां कौषीतकिप्रभृतीनां प्राणसंवादेषु ' अथातो निःश्रेयसादानमेता ह वै देवता भहंश्रेयसे विवदमानाः ' ( कौ ० २।१४ ) इत्येवं जातीयकेषु प्राणस्य श्रेष्ठयमुक्तम्, न त्विमे वसिष्ठत्वादयोऽपि गुणा उक्ताः । तत्र संशयः -- किमिमे वसिष्ठत्वादयो गुणाः कचिदुक्ता अन्यत्राप्यस्ये-रन्नुत नास्येरन्निति । तत्र प्राप्तं तावन्नास्येरन्निति । कुतः? एवंशब्दसंयोगात् । जाय [ इस अभिप्रायसे ] परन्तु इस पक्ष में भी लक्षणाका प्रसंग समान है, कारण कि उद्गीथशब्दका अवयव अर्थ लक्षण से होता है । यह सत्य है, परन्तु लक्षणामें भी वो संनिकर्ष और विप्रकर्ष होता ही है । अध्यास -पक्षमें अन्य अर्थ विषयक बुद्धि दूसरे अर्थ में प्रक्षिप्त होती है, अतः विप्रकृष्ट लक्षाणा है, विशेषणपक्ष में तो अवयवी वाचक शब्दसे अवयव समर्पित होता है, इससे संनिकृष्ट लक्षणा है । समुदायोंमें प्रवृत्त शब्द अवयवोंमें मी प्रवृत्त होते देखे जाते हैं । जैसे पट, ग्राम नदिमें । इसलिए व्याप्ति हेतुसे ' ॐ ' इस अक्षरका ' उद्गोथ ' यह विशेषण है, इसप्रकार यह समञ्जस निर्दोष है, ऐसा अर्थ है ॥ ९ ॥
वाजसनेयी और छान्दोगोंके प्राणसंवादमें श्रेष्ठत्वगुणसे युक्त प्राणको उपास्य कहा गया है, और उसमें वाग् आदि मी वसिष्ठत्व आदि गुणोंसे युक्त कहे गये हैं । और वे गुण ' यद्वा अहं ० ' ( मैं जो प्रतिष्ठा हूँ, सो तुम ही उस प्रतिष्ठा से युक्त हो, ऐसा नेत्रने कहा ) इत्यादिसे पुन: प्राणमें प्रत्यर्पित किये गये हैं । और कौषीतको आदि अन्य शाखावालोंने मी तो ' अथातो निःश्रेयसादानमेता ० ' ( अब श्रेष्ठताका निर्धारण होता है ये देवता अपनी श्रेष्ठताके लिए विवाद करते हुए ) इसप्रकार के प्राणसंवादों-में प्राणको श्रेष्ठ कहा है । परन्तु ये वसिष्ठत्व आदि गुण नहीं कहे गये हैं । वहां संशय होता है कि किसी शाखा में कहे गये ये वसिष्ठत्व व्यादि गुण क्या वे अन्य शाखा में भी लिये जाते हैं अथवा नहीं लिये जाते? नहीं लिये जाते, ऐसा वहाँ प्राप्त होता है । किससे? इससे कि ' एवं ' शब्दका संयोग है | ' अथो य एवं विद्वान् ० ' ( प्राण श्रेष्ठ है, इसप्रकार जाननेवाला जो विद्वान् प्राणमें निःश्रेयसको जानकर सत्यानन्दी -दीपिका * विषय समझानेके लिए वाजसनेयी और छान्दोग उमय सम्मत् अर्थ ' वार्जिनां ' इत्यादिसे कहते हैं 1 । वाणी वसिष्ठत्व गुणवाली है, क्योंकि वाग्मी लोकमें सुखपूर्वकं निवासका दर्शन है, नेत्र प्रतिष्ठा गुणसे युक्त हैं, क्योंकि नेत्रवालोंकी पाद प्रतिष्ठा देखनेमें आती है । श्रोत्र सम्पद् गुण विशिष्ट
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अधि ० ५ सू ० १० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६६३ ' अथो य एवं विद्वान्प्राणे निःश्रेयसं विदित्वा ' ( कौ ० २।१४ ) इति तत्र तत्रैवंशब्देन वेद्यं वस्तु-निवेद्यते । एवंशब्दश्च संनिहितावलम्बनो न शाखान्तरपरिपठितमेवंजातीयकं गुणजातं शक्नोति निवेदयितुम् । तस्मात्स्वप्रकरणस्थैरेव गुणैर्निराकाङ्क्षत्वमिति । * एवं प्राप्ते प्रत्याह- अस्येरन्निमे गुणाः कचिदुक्ता वसिष्ठत्वादयोऽन्यत्रापि । कुतः? सर्वाभेदात् । सर्वत्रैव हि तदेवैकं प्राणविज्ञानमभिन्नं प्रत्यभिज्ञायते, प्राणसंवादादिसारूप्यात् । अभेदे च विज्ञानस्य कथमिमे गुणाः क्वचिदुक्ता अन्यत्र नास्येरन्? नन्वेवंशब्दस्तत्र तत्र भेदेनै-वंजातीयकं गुणजातं वेद्यत्वाय समर्पयतीत्युक्तम् । अत्रोच्यते यद्यपि कौषीतकि ब्राह्मणग-तेनैवंशब्देन वाजसनेयिब्राह्मणगतं गुणजातमसंशब्दितमसं निहितत्वात्तथापि तस्मिन्नेव विज्ञाने वाजसनेयिब्राह्मणगत तेनैवंशब्देन तत्संशब्दितमिति न परशाखागतमप्यभिन्नवि-ज्ञानावबद्धं गुणजातं स्वशाखागताद्विशिष्यते । न चैवं सति श्रुतहानिरश्रुतकल्पना वा भवति । एकस्यामपि हि शाखायां श्रुता गुणाः श्रुता एव सर्वत्र भवन्ति, गुणवतो भेदा-भावात् । नहि देवदत्तः शौर्यादिगुणत्वेन स्वदेशे प्रसिद्धो देशान्तरं गतस्तद्देश्यैरविभा-वितशौर्यादिगुणो यतद्गुणो भवति । यथा च तत्र परिचय विशेषाद्देशान्तरेऽपि देवदत्तगुणा विभाव्यन्ते । एवमभियोगविशेषाच्छाखान्तरेऽप्युपास्या गुणाः शाखान्तरे-श्रेष्ठ होता है ) इसप्रकार तत् तत् स्थलोंमें ' एवं ' शब्दसे वेद्य वस्तु निवेदित की जाती है और संनिहिता-वलम्बी ' एवं ' शब्द अन्य शाखाओं में पठित इस प्रकारके गुण समूहका निवेदन नहीं कर सकता, इसलिए अपने प्रकरण में स्थित गुणोंसे ही निराकांक्षता है । सिद्धान्ती — ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं— कहोंपर उक्त ये वसिष्ठत्व आदि गुण अन्यशाखामें भी गृहीत होते हैं, किससे? इससे कि सर्वत्र अभेद है । सभी शाखाओंमें वही एक अभिन्न प्राणविज्ञान प्रत्यभिज्ञात होता है, क्योंकि प्राण-संवाद आदि समान है । विज्ञानका अभेद होनेपर किसो शाखामें कहे गये ये गुण अन्य शाखाओंमें क्यों नहीं लिये जायँगे । परन्तु ऐसा कहा गया कि ' एवं ' शब्द तत् तत् स्थलमें इसप्रकारके गुण समूहका भेदरूपसे वेद्यत्वके लिए समर्पण करता है । सि ० - इसपर कहते हैं - यद्यपि कौषीतकि ब्राह्मण गत ' एवं ' शब्दसे वाजसनेयी ब्राह्मणगत गुण समुदाय प्रतिपादित नहीं हैं, क्योंकि वे गुण असंनिहित हैं, तथापि उसी विज्ञानमें वाजसनेयी ब्राह्मणगत ' एवं ' शब्द से वे गुणसमूह प्रतिपादित हैं । इसलिए अभिन्न विज्ञानसे अवबद्ध - सम्बद्ध अन्य शाखागत मी गुण समुदाय अग्ने शाखागत गुण समूहसे भिन्न नहीं होते और ऐसा होनेपर श्रुतहानि अथवा अश्रुत कल्पना भी नहीं होती । एक शाखामें भी श्रुत गुण सर्वत्र ही श्रुत होते हैं, क्योंकि गुणवान्के भेदका अभाव है । अपने देशमें शौयं आदि गुणरूपसे प्रसिद्ध देवदत्त अन्य देशमें गया हो उस देशवासियों द्वारा उसके शौर्यं आदि गुण अज्ञात होनेपर भी वह उन गुणोंसे रहित नहीं होता, और जैसे परिचय विशेषसे वहाँ अन्यदेशमे भी देवदत्त सत्यानन्दी- दीपिका हैं, क्योंकि श्रोत्रवालों को ही श्रवण करनेसे सब शास्त्रीय अर्थों की सम्पत्ति होती है, मन आयतन गुण युक्त है, क्योंकि वह वृत्तिद्वारा सब भोग्य पदार्थों का आश्रय है, वे गुण गुणीकी श्रेष्ठताका निश्चय कर वागू आदिसे प्राणमें ही अर्पित किये गये हैं, ऐसा दोनों शाखाओं में सम्मत अर्थ है । अब इस अधिकरणका ' अन्येषाम् ' इत्यादिसे विषय कहते हैं । यहाँपर गुणों का अनुपसंहार पूर्वपक्षका और और उपसंहार सिद्धान्तका फल है । * " कौषीतकिश्रुतिस्थ प्राणः, वसिष्ठत्वादिगुणकः, श्रेष्ठ पाणत्वात् वाजिश्रुतिस्थप्राणवत् " ( कौषीतकी श्रुति में स्थित प्राण वसिष्ठत्व आदि गुणवाला है, श्रेष्ठ प्राण होनेसे, वाजिश्रुतिस्थं प्राणके समान ) इसप्रकार अश्रुत गुणोंका अनुमान होनेपर श्रुतकी हानि नहीं है और अश्रुतकी कल्पना भी नहीं है, क्योंकि कोई विरोध नहीं है । इसको ' न चैवसति ' इत्यादिसे स्पष्ट करते हैं ॥ १० ॥
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६६४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ ऽप्यस्येरन् । तस्मादेकप्रधानसंबद्धा धर्मा एकत्राप्युच्यमानाः सर्वत्रैवोपसंहर्तव्या इति । ( ६ आनन्दाद्यधिकरणम् । सू ० ११-१३ ) आनन्दादयः प्रधानस्य ॥ ११ ॥
पदच्छेद – आनन्दादयः, प्रधानस्य । सूत्रार्थ - ( प्रधानस्य ) ब्रह्म के ( आनन्दादयः ) आनन्दत्व आदि धर्मोका सर्वत्र उपसंहार होना चाहिए, क्योंकि सब शाखाओं में वैद्य ब्रह्म एक है । * ब्रह्मस्वरूपप्रतिपादनपरासु अतिष्वानन्दरूपत्वं विज्ञानघनत्वं सर्गगतत्वं सर्वा-त्मत्वमित्येवं जातीयका ब्रह्मणो धर्माः क्वचित्केचिच्छ्रयन्ते । तेषु संशयः - किमानन्दादयो ब्रह्मधर्मा यत्र यावन्तः श्रूयन्ते तावन्त एव तत्र प्रतिपत्तव्याः, किं वा सर्वे सर्वत्रेति । तत्र यथा श्रुतिविभागं धर्मप्रतिपत्तौ प्राप्तायामिदमुच्यते - आनन्दादयः प्रधानस्य ब्रह्मणो धर्माः सर्वे सर्वत्र प्रतिपत्तव्याः । कस्मात्? सर्वाभेदादेव । सर्वत्र हि तदेवैकं प्रधानं विशेष्यं ब्रह्म न भिद्यते । तस्मात्सार्वत्रिकत्वं ब्रह्मधर्माणाम् तेनैव पूर्वाधिकरणोदितेन देवदत्त-शौर्यादिनिदर्शनेन ॥ ११ ॥
नन्वेवं सति प्रियशिरस्त्वादयोऽपि धर्माः सर्वे सर्वत्र संकर्येरन् । तथाहि-तैत्तिरीयक आनन्दमयमात्मानं प्रक्रम्याम्नायते - ' तस्य प्रियमेव शिरः । मोदो दक्षिणः पक्षः । प्रमोद उत्तरः पक्षः । आनन्द आत्मा । ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' ( तै ० २५ ) इति । अत उत्तरं पठति-के गुण अवभासित होते हैं, वैसे ही सम्बन्ध विशेषसे अन्य शाखाके उपास्य गुण भी दूसरी शाखामें लिये जाते हैं । इसलिए एक शाखामें कहे हुए एक प्रधानके साथ सम्बद्ध धर्मोका सभी शाखाओं में उपसंहार होना चाहिए ॥ १० ॥
ब्रह्मस्वरूपका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंमें बादन्दरूपत्व, निज्ञानघनत्व, सर्वगतत्व और सर्वात्मत्व इसप्रकार के ब्रह्मके धर्म कहीं पर कोई सुने जाते हैं । उनमें संशय होता है — क्या ब्रह्म के आनन्द आदि धर्म जहाँ जितने सुने जाते हैं उतने ही वहाँ प्रतिपत्तव्य हैं अथवा सबकी सर्वत्र प्रति-पत्ति होनी चाहिए? श्रुतिविभाग के अनुसार धर्मोकी प्रतिपत्ति प्राप्त होनेपर यह कहते हैं - प्रधानभूत ब्रह्मके आनन्द आदि सब धर्मं सर्वत्र जानने चाहिए, किससे? सबके साथ अभेद होनेसे ही । वही एक प्रधान विशेष्य ब्रह्म सर्वत्र भिन्न नहीं है । इसलिए पूर्वाधिकरणमें उक्त उसी देवदत्तके शौर्य आदि दृष्टान्त ब्रह्मके धमं सार्वत्रिक हैं ॥ ११ ॥
परन्तु ऐसा होनेपर प्रियशिरस्त्व आदि सब धर्मं भी सर्वत्र संगृहीत होंगे, क्योंकि तैत्तिरीयकमें आनन्दमय आत्माका उपक्रम कर ' तस्य प्रियमेव शिर: ० ' ( उस आनन्दमय आत्माका प्रियं ही शिर है, मोद दक्षिण पक्ष है, प्रमोद उत्तर पक्ष है, आनन्द आत्मा है और ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा है ) ऐसी श्रुति है, इससे उत्तर कहते हैं— सत्यानन्दी - दीपिका * ' आनन्दो ब्रह्म ' इसप्रकार ब्रह्म के साथ सामानाधिकरण्यसे पठित वे आनन्द आदि पद जड़त्व, दुःखत्व, मिथ्यात्व आदि ब्रह्ममें कल्पित विरुद्ध धर्मोकी निवृत्ति द्वारा अखण्ड अद्वय ब्रह्मका लक्षणासे बोध कराते हैं, इसलिए व्यर्थं नहीं हैं । ' सच्चिदानन्द अद्वय निर्विशेष ब्रह्म मैं हूँ ' ऐसा बिशेष ज्ञान जितने पदोंसे संभव हो उतने पदोंका उपसंहार युक्त है, अतः ब्रह्मके आनन्दत्व आदि सभी धर्मों का सब शाखाओं में उपसंहार होना चाहिए ॥। ११ ॥
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अधि ० ६ सू ० १२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६६५ प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिरुपचयापचयौ हि भेदे ॥ १२ ॥
पदच्छेद – प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिः, उपचयापचयो, हि, भेदे । सूत्रार्थ – एक शाखा में श्रुत ( प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिः ) प्रियशिरस्त्वादि धर्मो की सर्वत्र प्राप्ति नहीं है, ( हि ) क्योंकि प्रिय, मोद, प्रमोद और आनन्द ये परस्परकी और अन्य भोक्ताकी अपेक्षासे ( उपचयापचयो ) वृद्धि और ह्रासरूपसे उपलब्ध होते हैं, ये ( भेदे ) भेदमें ही हो सकते हैं, ब्रह्म तो एक है, अतः उसके धर्म नहीं हो सकते । प्रियशिरस्त्वादीनां धर्माणां तैत्तिरीयक आम्नातानां नास्त्यन्यत्र प्राप्तिः । यत्का-रणं प्रियं मोदः प्रमोद आनन्द इत्येते परस्परापेक्षया भोक्त्रन्तरापेक्षया चोपचितापचित-रूपा उपलभ्यन्ते | उपचयापचयौ च सति भेदे संभवतः, निभेदं तु ब्रह्म ' एकमेवाद्वितीयम् ' ( छा ० ६।२।१ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । न चैते प्रियशिरस्त्वादयो ब्रह्मधर्माः, कोशधर्मास्त्वेित इत्युपदिष्टमस्माभिः ' आनन्दमयोऽभ्यासात् ' ( ब्रह्मसूत्र १ | १ | १२ ) इत्यत्र । अपि च परस्मि-ब्रह्मणि चित्तावतारोपायमात्रत्वेनैते परिकल्प्यन्ते, न द्रष्टव्यत्वेन । एवमपि सुतरामन्यत्रा-प्राप्तिः प्रियशिरस्त्वादीनाम् । ब्रह्मधर्मांस्त्वेतान्कृत्वा न्यायमात्रमिदमाचार्येण प्रदर्शितम्-प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिरिति । स च न्यायोऽन्येषु निश्चितेषु ब्रह्मधर्मेषूपासनायोपदिश्यमानेषु नेतव्यः संयद्वामादिषु सत्यकामादिषु च । तेषु हि सत्यप्युपास्यस्य ब्रह्मण एकत्वे, प्रक्रमभेदादुपासनाभेदे सति, नान्योन्यधर्माणामन्योन्यत्र प्राप्तिः । यथा च द्वे नार्यावेकं नृपतिमुपासाते - छत्रेणान्या चामरेणान्या, तत्रोपास्यैकत्वेऽप्युपासनाभेदो धर्मव्यवस्था च भवति -- एवमिहापीति । उपचितापचितगुणत्वं हि सति भेदव्यवहारे सगुणे ब्रह्मण्युप-पद्यते, न निर्गुणे परस्मिन्ब्रह्मणि । अतो न सत्यकामत्वादीनां धर्माणां कचिच्छ्रतानां सर्वत्र प्राप्तिरित्यर्थः ॥ १२ ॥
इतरे त्वर्थसामान्यात् ॥ १३ ॥
पदच्छेद – इतरे, तु, अर्थसामान्यात् । तैत्तिरीयकमें पठित प्रियशिरस्त्वादि धर्मोकी अन्यत्र प्राप्ति नहीं है, क्योंकि प्रिय, मोद, प्रमोद और आनन्द ये परस्परकी और अन्य मोक्ताकी अपेक्षासे उपचित ( वृद्धि ) और अपचित ( हास ) रूपने उपलब्ध होते हैं और उपचय और अपचय भेदके होनेपर संभव हैं । किन्तु ब्रह्म तो ' एकमेवा-द्वितीयम् ' ( एक हो अद्वितीय है ) इत्यादि श्रुतियोंसे भेद रहित ज्ञात होता है । और ये प्रियशिर-स्त्वादि ब्रह्मके धर्म नहीं हैं, किन्तु ये कोशोंके धर्मं हैं । ऐसा हम ' आनन्दमयोऽभ्यासात् ' इस सूत्र में कह चुके हैं । परब्रह्म में चित्तकी अवस्थितिके साधनमात्ररूपसे परिकल्पित किये गये हैं, द्रष्टव्यरूपसे नहीं । इसप्रकार भी प्रियशिरस्त्व आदिकी सुतरां अन्य शाखा में अप्राप्ति है । इन प्रियशिरस्त्व आदिको ब्रह्म - धर्म मानकर प्रियशिरस्त्व आदिकी अप्राप्ति है, यह न्यायमात्र आचार्यने प्रदर्शित किया है । वह न्याय उपासना के लिए उपदिश्यमान संयद्वामत्व आदि और सत्यकामत्व आदि निश्चित ब्रह्मके अन्य धर्मोंमें लेना चाहिए, क्योंकि उनमें उपास्य ब्रह्मके एक होनेपर भी उपक्रमके भेदसे उपासनाका भेद होनेपर अन्योन्य धर्मों की अन्योन्य शाखा में प्राप्ति नहीं है । जैसे दो स्त्रियाँ एक राजाकी उपासना-सेवा करती हैं, एक छत्रसे और दूसरी चँवरसे । उसमें उपास्यके एक होनेपर भी उपासनाका भेद और धर्मकी व्यवस्था होती है, वैसे यहाँ भी होना चाहिए । उपचित और अपचित गुणत्व तो भेद व्यवहारके होनेपर सगुण ब्रह्ममें उपपन्न होता है, निर्गुण परब्रह्म में नहीं । इसलिए किसी शाखा में श्रुत सत्यकामत्व आदि धर्मोकी सब शाखाओं में प्राप्ति नहीं है, ऐसा अर्थ है ॥ १२ ॥
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६६६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ सूत्रार्थ - ( इतरे तु ) आनन्द आदि धर्मोका तो सर्वत्र उपसंहार होना चाहिए, ( अर्थ-सामान्यात् ) क्योंकि प्रतिपाद्य ब्रह्म सर्वत्र एक है । इतरे त्वानन्दादयो धर्मा ब्रह्मस्वरूपप्रतिपादनायैवोच्यमाना अर्थसामान्यात्प्रति-पाद्यस्य ब्रह्मणो धर्मिण एकत्वात्सर्वे सर्वत्र प्रतीयेरन्निति वैषम्यम्, प्रतिपत्तिमात्र प्रयोजना हि त इति ॥ १३ ॥
( ७ आध्यानाधिकरणम् । सू ० १४-१५ आध्यानाय प्रयोजनाभावात् ॥ १४ पदच्छेद - आध्यानाय, प्रयोजनाभावात् । सूत्रार्थ - ' इन्द्रियेभ्यः परा ह्यार्थी ' इस श्रुति में ( मध्यानाय ) लिए पुरुष परत्वसे प्रतिपादित है, अर्थ आदि नहीं, ( प्रयोजनाभावात् पादन में कोई प्रयोजन नहीं है । * काठके हि पठ्यते - ' इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं ( ० ३ | १० ) इत्यारभ्य पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ' ) ॥ आध्यान पूर्वक सम्यग्दर्शन के ) क्योंकि इनके परत्व प्रति-मनः । मनसस्तु परा बुद्धि: ' ( क ० ३ | ११ ) इति । तत्र संशयः - किमिमे सर्व एवार्थादयस्ततस्ततः परत्वेन प्रतिपाद्यन्त उत पुरुष एवैभ्यः सर्वेभ्यः परः प्रतिपाद्यत इति । तत्र तावत्सर्वेषामेवैषां परत्वेन प्रतिपादनमिति भवति मतिः । तथा हि श्रूयते-- ' इदमस्मात्परमिदमस्मात्परम् ' इति । ननु बहुष्वर्थेषु परत्वेन परन्तु ब्रह्मस्वरूपका प्रतिपादन करनेके लिए कहे हुए अन्य आनन्द आदि धर्म अर्थके सामान्यसे प्रतिपाद्य धर्मी ब्रह्मके एक होनेसे सब सर्वत्र प्रतीत होने चाहिए यही वैषम्य है, क्योंकि वे ब्रह्मकी प्रतिपत्ति ज्ञानमात्र प्रयोजनवाले हैं ॥ १३ ॥
काठक में ' इन्द्रियेभ्यः परा ० ' ( इन्द्रियोंकी अपेक्षा उनके विषय पर - सूक्ष्म अथवा श्रेष्ठ हैं, विषयोंसे मन पर है और मनसे बुद्धि पर है ) ऐसा आरम्भकर ' पुरुषान्न ० ' ( पुरुषसे पर और कुछ नहीं है, वही सूक्ष्मत्वको पराकाष्ठा है, वही परागति - उत्कृष्ट गति है ) इसप्रकार कहा जाता है । यहाँ संशय होता है- क्या ये सब अर्थ आदि तत् तत्से पररूपसे प्रतिपादित हैं अथवा पुरुष ही इन सबसे पररूपसे प्रतिपादित है? उसमें इन सबका पररूपसे प्रतिपादन है, ऐसी मति होती है, क्योंकि ' यह इससे पर, यह इससे पर ' ऐसा श्रुति कहती है । परन्तु बहुत अर्थों में पररूपसे प्रतिपादन करना यदि अभीष्ट हो तो वाक्य भेद होगा? यह दोष नहीं है, कारण कि वाक्यके बहुत्वकी उपपत्ति होती है । परत्वसे युक्त अनेक विषयोंके प्रतिपादनके लिए ये अनेक ही वाक्य समर्थ होते हैं । इसलिए इनमें प्रत्येकका पररूपसे प्रतिपादन है । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं- इन सभीसे पुरुष ही पर-सत्यानन्दी - दीपिका * संयद्वामत्व आदि धर्मोसे आनन्द आदि मित्र हैं, क्योंकि इनका केवल ब्रह्मका ज्ञान कराना ही प्रयोजन है । अतः सत्य, ज्ञान, आनन्द, आत्मा और ब्रह्म इन शब्दोंका सर्वत्र उपसंहार ( संग्रह ) करना चाहिए । पूर्वपक्ष में सत्य आदि पदोंके अनुपसंहारसे वाक्यार्थका अनवधारण फल है | सिद्धान्त में तो सत्य आदि पदोंके उपसंहारसे वाक्यार्थका अवधारण फल है ॥ १३ ॥
* पूर्वपक्षी - अर्थ आदिमें भी परत्व मानना चाहिए, क्योंकि इनका ध्यान भी सप्रयोजन है, ' दशमन्वन्तराणीह तिष्ठन्तीन्द्रियचिन्तकाः । भौतिकास्तु शतं पूर्णं सहस्रं त्वमिमानिकाः ॥ बौद्धा दशसहस्राणि तिष्ठन्ति विगतज्वराः । पूर्णं शतसहस्रं तु तिष्ठन्त्यव्यक्तचिन्तकाः ॥ पुरुषं निर्गुणं प्राप्य कालसंख्या न विद्यते । ' ( विष्णुपुराण ) ( इन्द्रियों का ध्यान करनेवाले यहाँ दश मन्वन्तर रहते हैं, भौतिक अभिमान के चिन्तक पूर्ण सौ सहेस्र मन्वन्तर रहते हैं । बुद्धिके चिन्तक दशसहस्र मन्वन्तर कष्ट रहित रहते हैं, अव्यक्तके चिन्तक पूर्ण सौ सहस्र मन्वन्तर रहते हैं 1 । जो