श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 701–710

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 701–710

पृष्ठ 701

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 701 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० ७ सू ० १५ ] भाषानुवाद सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६६७ प्रतिपिपादयिषितेषु वाक्यभेदः स्यात्, नैष दोषः, वाक्यबहुत्वोपपत्तेः । बहून्येव होता नि वाक्यानि प्रभवन्ति बहूनर्थान्परत्वोपेतान्प्रतिपादयितुम् । तस्मात्प्रत्येकमेषां परत्वप्रति-पादनमिति । * एवं प्राप्ते ब्रूमः -पुरुष एव ह्येभ्यः सर्वेभ्यः परः प्रतिपाद्यत इति युक्तम्, न प्रत्येकमेषां परत्वप्रतिपादनम् । कस्मात्? प्रयोजनाभावात् । न हीतरेषु परत्वेन प्रतिपन्नेषु किंचित्प्रयोजनं दृश्यते श्रूयते वा । पुरुषे त्विन्द्रियादिभ्यः परस्मिन्सर्वानर्थ-वातातीते प्रतिपन्न दृश्यते प्रयोजनं मोक्षसिद्धिः । तथा च श्रुतिः - ' निचाय्य तन्मृत्युमुखा -त्प्रमुच्यते ' ( क ० ३।१५ ) इति । अपि च परप्रतिषेधेन काष्ठाशब्देन च पुरुषविषयमादरं दर्शयन्पुरुषप्रतिपत्त्यथैव पूर्वापरप्रवाहोक्तिरिति दर्शयति - आध्यानायेति । आध्यानपूर्व-काय सम्यग्दर्शनायेत्यर्थः । सम्यग्दर्शनार्थमेव हीहाध्यानमुपदिश्यते, न स्वाध्यानमेव स्वप्रधानम् ॥ १४ ॥

आत्मशब्दाच्च ॥ १५ ॥

पदच्छेद – आत्मशब्दात्, च । सूत्रार्थ - ' एष सर्वेषु ' इत्यादि श्रुतिसे प्रकृत पुरुष में आत्मशब्दका श्रवण होनेसे यह वाक्य आत्मपरक ही है, क्योंकि श्रुतिसे आत्मा में मानान्तरावेद्यत्व अपूर्वका प्रतिपादन है । * इतश्च पुरुषप्रतिपत्त्यथैवेयमिन्द्रियादिप्रवाहोक्तिः । यत्कारणम् ' एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते । दृश्यते त्वयया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदशिमिः ' ( कठ ० ३।१२ ) इति प्रकृतं पुरुषमात्मेत्याह । अतश्चानात्मत्वमितरेषां विवक्षितमिति गम्यते । तस्यैव च दुर्विज्ञानतां संस्कृतमतिगम्यतां च दर्शयति । तद्विज्ञानायैव यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञः ' ( कठ ० ३।१३ ) इत्या-रूपसे प्रतिपादित है, किन्तु इनमेंसे प्रत्येक अर्थ आदिमें परत्व प्रतिपादन युक्त नहीं है, किससे? इससे कि प्रयोजनका अभाव है, अन्योंके पररूपसे ज्ञात होनेपर कोई प्रयोजन देखा अथवा सुना नहीं जाता । इन्द्रियादिसे पर सर्व अनर्थं समुदायसे रहित परपुरुषके ज्ञात होनेपर तो मोक्षसिद्धिरूप प्रयोजन देखा जाता है, क्योंकि ' निचाय्य तं ० ' ( उस आत्मतत्त्वको जानकर पुरुष मृत्युके मुखसे छूट - मुक्त हो जाता है ) ऐसी श्रुति है । और परके प्रतिषेधसे और काष्ठाशन्दसे पुरुष विषयक आदर दिखलाते हुए पुरुषकी प्रतिपत्ति के लिए ही पूर्वापर प्रवाहको उक्ति है, ऐसा दिखलाते हैं - ' आध्यानाय ' इति I । ' आध्यानपूर्वक तत्त्वज्ञानके लिए ' ऐसा अर्थ है । सम्यग्दर्शनके लिए ही यहाँ आध्यानका उपदेश किया जाता है, आध्यानका ही स्वप्रधानरूपसे उपदेश नहीं किया जाता है ॥ १४ ॥

इससे मी इन्द्रिय आदिके प्रवाहकी उक्ति केवल पुरुषकी प्रतिपत्ति ( ज्ञान ) के लिए ही है, क्योंकि ' एष सर्वेषु भूतेषु ० ' ( सम्पूर्ण भूतों में छिपा हुआ यह आत्मा प्रकाशित नहीं होता । यह तो सूक्ष्मदर्शी पुरुषोंद्वारा अपनी तीव्र और सूक्ष्मबुद्धिसे ही देखा जाता है ) यह श्रुति प्रकृत पुरुषको आत्मरूपसे कहती है । इससे ऐसा ज्ञात होता है कि अन्यों में अनात्मत्व विवक्षित है । और उसीमें सत्यानन्दी - दीपिका निर्गुण पुरुषको प्राप्त करता है उसके लिए कालकी संख्या - अवधि नहीं है ) इसप्रकार प्रामाणिक वाक्यसे भेद मानने में कोई दोष नहीं है, अतः उक्त सब वाक्य प्रत्येक अर्थ आदिको पररूपसे वर्णन करते हैं । पूर्वपक्ष में वाक्यभेद होनेसे विद्याका भेद है, सिद्धान्त में वाक्यकी एकतासे विद्याकी एकता है । * सिद्धान्ती - ' एवं प्राप्ते ब्रूमः ' इत्यादिसे कहते हैं ॥ १४ ॥

* तद्विष्णोः परमं पदम् ' और ' पुरुषान्न परं किञ्चित् ' इसप्रकार उपक्रम और उपसंहारके एक-रूप होने से सब वाक्योंका तात्पर्यं पुरुषके प्रतिपादनमें है । इस प्रकार एकवाक्यता निश्चित होनेपर वाक्यभेद और फलभेदको कल्पना युक्त नहीं है ॥ १५ ॥

पृष्ठ 702

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 702 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६६८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ ध्यानं विदधाति । तद्व्याख्यातम् ' अनुमानिकमप्येकेषाम् ' ( ब्रह्मसूत्र १ | ४ | १ ) इत्यत्र । एवम-नेकप्रकार आशयातिशयः श्रुतेः पुरुषे लक्ष्यते, नेतरेषु । अपि च ' सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्वि-ष्णोः परमं पदम् ' ( क ० ३।९ ) इत्युक्ते, किं तदध्वनः पारं विष्णोः परमं पदमित्यस्यामाका-ङ्क्षायामिन्द्रियाद्यनुक्रमणात्परमपद प्रतिपत्त्यर्थ एवायमाम्नाय इत्यवसीयते ॥ १५ ॥

( ८ आत्मगृहीत्यधिकरणम् । सू ० १६-१७ ) आत्मगृहीतिरितरवदुत्तरात् ॥ १६ ॥

पदच्छेद - आत्मगृहीतिः, इतरवत्, उत्तरात् । सूत्रार्थ - ( आत्मगृहीतिः ) ' आत्मैवेदम ' यहाँ आत्मशब्दसे परमात्मा का ही ग्रहण है अन्यका नहीं, क्योंकि ( इतरवत् ) अन्यके समान, ' आत्मन आकाश: ' इत्यादि अन्य श्रुतियोंमें भी आत्मशब्द से परमात्माका ग्रहण है ( उतरात् ) ' स ईक्षत ' इस प्रकार उत्तर विशेषण वाक्योंसे भी जैसे परमात्माका ही ग्रहण है, वैसे यहाँ मी आत्मशब्द से परमात्माका ही ग्रहण होना चाहिए । * ऐतरेयके श्रूयते - ' आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीन्नान्यत्किंचन मिषत्स ईक्षत लोकान्नु सृजा ' इति ( ऐ ० १।१ ) ' स इमाँलोकानसृजताम्मो मरीचीर्मरमापः ' ( ऐ ० १/२ ) इत्यादि । तत्र संशयः - किं पर एवात्मेहात्मशब्देनाभिलप्यत उतान्यः कश्चिदिति । किं तावत्प्राप्तम्? न परमात्मेहात्मशब्दाभिलप्यो भवितुमर्हतीति । कस्मात्? वाक्यान्वयदर्शनात् । ननु वाक्यान्वयः सुतरां परमात्मविषयो दृश्यते, प्रागुत्पत्तेरात्मैकत्वावधारणात्, ईक्षणपूर्व-कस्रष्टृत्ववचनाच्च । नेत्यच्यते, लोकसृष्टिवचनात् । परमात्मनि हि स्रष्टरि परिगृह्यमाणे महाभूतसृष्टिरादौ वक्तव्या, लोकसृष्टिस्त्विहादावुच्यते । लोकाश्च महाभूतसंनिवेश-दुर्विज्ञेयता और संस्कृतबुद्धि गम्यता दिखलाती है । उसके विज्ञानके लिए ही ' यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञः ० ' ( विवेकी पुरुष वाणीका मनमें उपसंहार करे ) इस प्रकार आध्यानका विधान करती है । उसका ' आनुमानिकम ० ' इस सूत्रमें व्याख्यान किया गया है । इस प्रकार श्रुतिसे अनेक प्रकारका आशया-तिशय तात्पयं पुरुष में लक्षित होता है, अन्योंमें ही नहीं, और ' सोऽध्वनः ० ' ( यह संसार मार्ग से पार होकर उस विष्णु - व्यापक परमात्माके परमपदको प्राप्त करता है ) ऐसा कहने पर मार्ग से पार विष्णुका परम पद क्या है? ऐसी आकांक्षा होनेपर इन्द्रिय व्यादिके अनुक्रमणसे परमपदकी प्रतिपत्ति के लिए ही यह श्रुति है, ऐसा निश्चित होता है ॥ १५ ॥

ऐतरेयक में ' आत्मा वा ० ' ( सृष्टिके पहले यह जगत् एकमात्र आत्मा ही था, उसके सिवा और कोई सक्रिय वस्तु नहीं थी । उसने ईक्षण किया कि लोकोंकी रचना करूँ ) और ' स इमाँल्लोकान-सृजत ० ' ( उसने अम्भ - स्वर्ग, मरीचि - अन्तरिक्ष, मर - मत्यं और आप - पाताल इन लोकोंकी रचना की ) इत्यादि श्रुति है । उसमें संशय होता है- क्या यहाँ आत्मशब्द से परमात्मा कहा जाता है अथवा अन्य कोई? तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - यहाँ आत्मशब्द से परमात्माका अभिधान नहीं हो सकता, किससे? इससे कि वाक्योंका अन्वय ऐसा देखनेमें खाता है । परन्तु वाक्यान्वय तो सुतरां परमात्मा विषयक देखने में आता है । कारण कि उत्पत्ति के पूर्व आत्मैकत्वका अवधारण है और ईक्षण पूर्वक स्रष्टृत्व वचन है । नहीं, ऐसा कहते हैं, क्योंकि लोकसृष्टिका वचन है | परमात्माको स्रष्टा परिगृहीत करनेपर महाभूत सृष्टि पहले कहनी चाहिए थी, किन्तु यहाँ पहले लोकसृष्टि कही जाती है | लोक तो महाभूतोंके आकार विशेष हैं । उसी प्रकार ' अदोऽम्मः ० ' सत्यानन्दी - दीपिका * आत्मशब्दका प्रयोग ब्रह्म और हिरण्यगर्भ ( प्रजापति ) दोनोंमें उपलब्ध होनेसे संशय होता है । पूवपक्षी - यहां वाक्यान्वयसे तो आत्मशब्दसे हिरण्यगर्भ ग्राह्य है परमात्मा नहीं ।

पृष्ठ 703

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 703 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० ८ सू ० १६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६६ ९ विशेषाः । तथा चाम्भःप्रभृतींल्लोकत्वेनैव निर्ब्रवीति - ' अदोऽम्मः परेण दिवम् ' ( ऐ ० १।२ ). इत्यादिना । लोकसृष्टिश्च परमेश्वराधिष्ठितेनापरेण केनचिदीश्वरेण क्रियत इति श्रुति-स्मृत्योरुपलभ्यते । तथाहि श्रुतिर्भवति - ' आत्मैवेदमग्र आसीत्पुरुषविधः ' ( बृह ० १।४।१ ) इत्याद्या | स्मृतिरपि स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते । आदिकर्ता स भूतानां ब्रह्माग्रे समवर्तत इति । ऐतरेयिणोऽपि ' अथातो रेतसः सृष्टिः प्रजायते रेतो देवाः ' इत्यत्र पूर्वस्मिन्प्र-करणे प्रजापति कर्तृकां विचित्रां सृष्टिमामनन्ति । आत्मशब्दोऽपि तस्मिन्प्रयुज्यमानो दृश्यते — ' आत्मैवेदमग्र आसीत्पुरुषविधः ' ( बृह ० १ | ४ | १ ) इत्यत्र । एकत्वावधारणमपि प्रागु-त्पत्तेः स्वविकारापेक्षमुपपद्यते । ईक्षणमपि तस्य चेतनत्वाभ्युपगमादुपपन्नम् । अपि च ‘ ताभ्यो गामानयत्ताभ्योऽश्वमानयत्ताभ्यः पुरुषमानयत्ता अब्रुवन् ' इत्येवंजातीयको भूयान्व्यापार-विशेषो लौकिकेषु विशेषवत्स्वात्मसु प्रसिद्ध इहानुगम्यते । तस्माद्विशेषवानेव कश्चिदि-हात्मा स्यादिति । * एवं प्राप्ते ब्रूम - पर एवात्मेहात्मशब्देन गृह्यत इतरवत् । यथेत-रेषु सृष्टिश्रवणेषु ' तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः ' ( तै ० २1१1१ ) इत्येवमादिषु परस्यात्मनो ग्रहणम् । यथा चेतरस्मिल्लौकिकात्मशब्दप्रयोगे प्रत्यगात्मैव मुख्य आत्म-शब्देन गृह्यते, तथेहापि भवितुमर्हति । यत्र तु ' आत्मैवेदमग्र आसीत् ' ( बृह ० १।४।१ ) इत्येवमादौ ' पुरुषविधः ' ( बृह ० १ | ४ | १ ) इत्येवमादि विशेषणान्तरं श्रने, भवेत्तत्र विशे-पवत आत्मनो ग्रहणम् । अत्र पुनः परमात्मग्रहणानुगुणमेव विशेषणमप्युत्तरमुपलभ्यते-( वह अम्म लोकसे पर है ) इत्यादिसे श्रुति अम्म आदिका लोकरूपसे ही निर्वाचन करती है । लोक सृष्टि परमेश्वरसे अधिष्ठित किसी अन्य ईश्वरसे की जाती है, ऐसा श्रुति और स्मृति में उपलब्ध होता है । क्योंकि ' आत्मैवेदम ० ' ( सृष्टिके पूर्व यह जगत् पुरुषाकार एक आत्मा ही था ) इत्यादि श्रुति है, और ' स वै शारीरी ० ' ( वही प्रथम शरीरी है, वही पुरुष कहा जाता है, चराचर भूतों का आदि कर्ता वह ब्रह्म सबसे पूर्व में था ) ऐसी स्मृति मी है । ऐतरेय शाखावाले भी ' अथातो. ' अनन्तर इससे रेत कार्यं सृष्टि हुई, देवता प्रजापतिके रेत कार्य हैं । ) यहाँ पूर्व प्रकरण में विचित्र सृष्टिको प्रजापति कर्तृक कहते हैं, और ' आत्मैवेदमग्र आसीत्पुरुषविध: ' इसमें आत्मशब्द भी उसमें प्रयुक्त हुआ देखा जाता है, और एकल्वका अवधारण मी उत्पत्तिके पूर्व अपने विकारकी अपेक्षासे उपपन्न होता है, और चेतनत्व स्वीकार होनेसे उसमें ईक्षण मी उपपन्न है । और ' ताभ्यो ० ' ( स्रष्टा उन प्रजाओंके लिए गौ लाया, उनके लिए अश्व लाया, उनके लिए पुरुष - नराकार शरीर लाया, तदनन्तर प्रजाएँ उससे बोलीं ) इसप्रकारका महान् व्यापारविशेष विशेषवान् लौकिक आत्माओंमें प्रसिद्ध है, उसका यहाँ अनु-गम होता है । इसलिए यहाँ विशेष युक्त कोई स्रष्टा आत्मा होना चाहिए । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होने पर हम कहते हैं - यहाँ परमात्मा ही आत्मशब्दसे गृहीत होता है, इतरके समान । जैसे ' तस्माद्वा ० ' ( उस आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ ) इत्यादि अन्य सृष्टि श्रुतियोंमें आत्मशब्द से परमात्माका ग्रहण है । जैसे अन्य लौकिक आत्मशब्द के प्रयोग में आत्मशब्द से मुख्य प्रत्यगात्मा ही गृहीत होता है, वैसे ही यहाँ भी होना चाहिए । जहाँ तो ' आत्मैवेदमग्र आसीत् ' इत्यादिमें ' पुरुषविधः ' इत्यादि विशेषणान्तर सुना जाता है, वहाँ विशेषयुक्त आत्माका ग्रहण होना चाहिए । परन्तु यहाँ तो परमात्मा - ग्रहणके अनुकूल ही ' स ईक्षत ० ' ( उसने ईक्षण किया कि मैं लोकोंकी सृष्टि करूँ ) ' स इमाँल्लोकानसृजत ' सत्यानन्दी - दीपिका * ऐतरेय श्रुति ( ११, १/२ ) का अर्थ पाठक्रमसे न होकर अर्थक्रम से होना चाहिए, उसने महाभूतों की सृष्टिकर इन लोकोंकी सृष्टि की, क्योंकि तैत्तिरीय श्रुतिमें भूतों की प्रथम सृष्टि है । यहाँ ' पाठक्रमादर्थक्रमो बलीय: ' ' पाठक्रमसे अर्थक्रम बलवान् है ' अन्यथा सृष्टि उत्पन्न नहीं होगी । इसलिए ' आत्मैवेदग्र आसीत् ' यहाँ आत्मशब्द से परमात्माका ग्रहण है, हिरण्यगर्भका नहीं ॥ १६ ॥

पृष्ठ 704

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 704 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६७० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य ' स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति ' ( ऐ ० १1१ ) ' स इमाँल्लोकानसृजत ' ( ऐ ० तस्मात्तस्यैव ग्रहणमिति न्याय्यम् ॥ १६ ॥

अन्वयादिति चेत्स्यादवधारणात् ॥ १७ ॥

पदच्छेद -- अन्वयात् इति चेत्, स्यात्, अवधारणात् । सूत्रार्थ - ( इति चेत् ) यदि कहो कि ( अन्वयात् ) वाक्यान्वयके ग्रहण नहीं है, तो यह ( स्यात् ) परमात्माका ही ग्रहण है । ( अवधारणात् ) आत्मैकत्वकाही अवधारण होता है, अतः यहाँ परमात्माका ग्रहण है । [ अ ० ३ पा ० ३ १२ ) इत्येवमादि । देखने से परमात्माका ' आत्मैवेदम ' इत्यादि * वाक्यान्वयदर्शनान्न परमात्मग्रहणमिति पुनर्यदुक्तं तत्परिहर्तव्यमिति । अत्रो-च्यते - स्यादवधारणदिति । भवेदुपपन्नं परमात्मनो ग्रहणम् । कस्मात्? अवधारणात् । परमात्मग्रहणे हि प्रागुत्पत्तेरात्मैकत्वावधारणमाञ्जसमवकल्पते, अन्यथा ह्यनाञ्जसं तत्परिकल्पेत | लोकसृष्टिवचनं तु श्रुत्यन्तरप्रसिद्ध महाभूतसृष्ट्यनन्तरमिति योजयिष्या -मि । यथा ' तत्तेजोऽसृजत ' ( छा ० ६।२।३ ) इत्येतछुच्यन्तरप्रसिद्धवियद्वायुसृष्ट्यनन्तरमित्ययू-युजमेवमिहापि । श्रुत्यन्तरप्रसिद्धो हि समानविषयो विशेषः श्रुत्यन्तरेषूप संहर्तव्यो भवति । योऽप्ययं व्यापारविशेषानुगमस्ताभ्यो गामानयदित्येवमादिः सोऽपि विवक्षितार्थावधारणा-नुगुण्येनैव ग्रहीतव्यः । न हायं सकलः कथाप्रबन्धो विवक्षित इति शक्यते वक्तुम्, तत्प्रतिपत्तौ ( उसने इन लोकोंकी सृष्टि की ) इत्यादि आगेका विशेषण मी उपलब्ध होता । इसलिए यहाँ आत्म-शब्दसे उसीका ग्रहण उचित है ॥ १६ ॥

ऐसा जो कहा गया है कि वाक्यान्वयके दर्शन से परमात्माका ग्रहण नहीं है, तो उसका परि-हार करना चाहिए । इसपर कहते हैं - ' स्यादवधारणात् ' । परमात्माका ग्रहण उपपन्न होगा, किससे? इससे कि ऐसा अवधारण है । परमात्माके ग्रहण होनेपर उत्पत्तिके पूर्व आत्मैकत्व ( एक आत्मा ही था ) अवधारण संगत हो सकता है, अन्यथा वह असंगत हो जायगा । ऐतरेयमें लोकसृष्टि श्रुतिवाक्यको तो अन्य श्रुति- तैत्तिरीय श्रुतिमें प्रसिद्ध महाभूत सृष्टि के अनन्तरयोजना करेंगे । जैसे ' तत्तेजोऽसृजत ' ( उसने तेज उत्पन्न किया ) इस छान्दोग्य वाक्यको अन्य तैत्तिरीय श्रुतिमें प्रसिद्ध आकाश और वायु-की सृष्टिके अनन्तर तेजकी सृष्टि की, ऐसी योजना हमने की है, वैसे यहाँ भी योजना करेंगे, क्योंकि एक श्रुतिमें प्रसिद्ध समान विषयक विशेष अन्य श्रुतिमें उपसंहारके योग्य होता है । और ' स्रष्टाने प्रजाके लिए गौका शरीर बनाया ' इत्यादि जो यह व्यापारविशेषका अनुगम है वह भी विवक्षित अर्थके अवधारण अनुसार ही ग्रहण करना चाहिए । यह सम्पूर्ण कथाग्रन्थ विवक्षित है, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उसकी प्रतिपत्ति में पुरुषार्थ का अभाव है । यहाँ तो ब्रह्मात्मत्व विवक्षित है । सत्यानन्दी - दीपिका * ' आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् ' ' प्रज्ञानं ब्रह्म ' ( प्रज्ञान ब्रह्म है ) इसप्रकार उपक्रम और उपसंहारमें आत्मा और ब्रह्मके श्रवण होनेसे एकत्वका निश्चय होता है । इससे और इस प्रकारके प्रवेश आदि लिङ्गों से लोक स्रष्टृत्व आदि लिङ्गोंके बाघ होनेसे प्रत्यग्ब्रह्मका ही ग्रहण करना चाहिए । स्रष्टा परमेश्वरने जब देवताओंकी सृष्टिकी तब ' ता एनमब्रुवन्नायतनं नः प्रजानीहि ' ( ऐतरेय ) ( उन्होंने उनसे कहा कि हमारे लिए स्थान निर्माण करो जिसमें रहकर अन्न आदिका मक्षण कर सकें, तो उनके लिए गौ आदि शरीर बनाये, परन्तु देवताओंने उनको पसन्द नहीं किया ) अनन्तर ' ताभ्यः पुरुषमानयत्ता अब्रुवन्सुकृतं बतेति पुरुषो वाघ सुकृतम् ' ( ऐत ० ९ ।२।३ ) ( स्रष्टाने उनके लिए मनुष्याकार शरीर बनाया, तब देवता उसे प्राप्तकर बहुत प्रसन्न होकर बोले यह सुन्दर बना है, यह सुकृतमय है, इससे पुण्य आदिका सम्पादन किया जा सकता है ) इसी आशयको कृष्ण यजुर्वेदीय तैत्तिरीयारण्यक के

पृष्ठ 705

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 705 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० ८ सू ० १७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६७१ पुरुषार्थाभावातू । ब्रह्मात्मत्वं त्विह विवक्षितम् । * तथाहि - अम्भःप्रभृतीनां लोकानां लोकपालानां चाग्न्यदीनां सृष्टि शिष्ट्वा करणानि करणायतनं च शरीरमुपदिश्य स एव स्रष्टा ' कथं न्विदं मडते स्यात् ' ( ऐ ० १।३।११ ) इति वीक्ष्येदं शरीरं प्रविवेशेति दर्शयति- ' स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापयत ' ( ऐ ० ११३।१२ ) इति । पुनश्च ' यदि वाचाभिव्याहृतं यदि प्राणेनाभिप्राणितम् ' ( ऐ ० १।३ | ११ ) इत्येवमादिना करणव्यापारविवेचनपूर्वकम् ' अथ कोऽहम् ’ ( ऐ ० १ | ३ | ११ ) इति वीक्ष्य ' स एतमेव पुरुषं ब्रह्म ततममपश्यत् ' ( ऐ ० ३।१३ ) इति ब्रह्मात्मत्व-दर्शनमवधारयति । तथोपरिष्टात् ' एष ब्रह्मैष इन्द्रः ' ( ऐत ० ५१३ ) इत्यादिना समस्तं भेद-जातं सह महाभूतैरनुक्रम्य ' सर्वं तत्प्रज्ञानेनं प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं प्रज्ञा नेत्रो लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठा प्रज्ञानं ब्रह्म ( ऐत ०५ / ३ ) इति ब्रह्मात्मत्वदर्शनमेवावधारयति । तस्मा दिहात्मगृहीतिरित्यनपवादम् । * अपरा योजना - आत्मगृहीतिरितरवदुत्तरात् ॥ वाजसनेयके ' कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तज्योंतिः पुरुषः ' ( बृह ० ४ | ३ | ७ ) इत्यात्मशब्देनोपक्रम्य तस्यैव क्योंकि अम्म आदि लोकों और अग्नि आदि लोकपालोंकी सृष्टिका उपदेश ( रचना ) कर इन्द्रियों और इन्द्रियोंके आयतन शरीरका उपदेश ( रचना ) कर उसो स्रष्टाने ' कथं न्विदं ० ' ( मेरे विना यह कैसे होगा ) ऐसा विचार कर इस शरीर में प्रवेश किया, ऐसा ' स एतमेव ० ' ( वह परमेश्वर इस सीमा ( मूर्द्धा ) को ही विदीर्णकर ब्रह्मरन्ध्र द्वारसे प्रवेशकर गया ) यह श्रुति दिखलाती है । पुनः ' यदि वाचाभिव्याहृतं ० ' ( यदि मेरे विना वाणीसे बोल लिया जाय, यदि प्राणसे प्राणन व्यापार कर लिया जाय ) इत्यादिसे करण व्यापार विवेचन पूर्वक ' अथ कोऽहम् ' ( तो मैं कौन हूँ ) ऐसा विचार कर ‘ स एतमेव ० ' ( इसप्रकार उसने इस पुरुषको ही पूर्णतम ब्रह्मरूपसे देखा ) इसप्रकार श्रुति ब्रह्मात्मत्व दर्शनका अवधारण करती है, उसीप्रकार आगे भी ' एष ब्रह्मेष इन्द्रः ' ( यह ब्रह्म है, यह इन्द्र हैं ) इत्यादिसे महाभूतोंके साथ समस्त भेद समुदायका उपक्रमकर ' सर्वं तत्प्रज्ञा नेत्रं ० ' ( वह सब प्रज्ञानेत्र प्रज्ञा जिसका नेत्र है ऐसा है, प्रज्ञामें- चिदात्मामें प्रतिष्ठित है, लोकप्रज्ञानेत्र - प्रज्ञा - चैतन्य जिसका नेत्र-व्यवहारका कारण है ऐसा, प्रज्ञा ही उसका लय स्थान है, अतः प्रज्ञा ही ब्रह्म है ) यह श्रुति ब्रह्मात्मत्व-दर्शनका ही अवधारण करती है, इसलिए यहां परमात्मा ही गृहीत है, यह निरपवाद - बाधरहित है ।१७ यह दूसरी योजना है - परमात्माका ग्रहण है, अन्यके समान, उत्तरसे । वाजसनेयकमें ' कतम आमेति ० ' ( आत्मा कौन है? [ याज्ञवल्क्य - ] यह जो प्राणोंमें बुद्धि वृत्तियोंके भीतर रहनेवाला विज्ञानमय ज्योति: स्वरूप पुरुष है ) इस प्रकार श्रुति आत्मशब्दसे उपक्रमकर उसीको सर्वं सङ्ग-सत्यानन्दी -दीपिका सायणभाष्यमें इस प्रकार स्पष्ट किया गया है - ' यद्यपि मिथुनजन्माः पश्वादि देहाः सर्वेऽप्यन्नमयास्त-थापि मनुष्यदेहस्य ज्ञानकर्माधिकारित्वेन प्राधान्यमभिप्रेत्य तेषु पुरुषसृष्टिरत्राभिहिता ' ( यद्यपि पशु आदि मिथुन जन्म और सब अन्नमय हैं. तो मी मनुष्य शरीर ज्ञान, कर्ममें अधिकारी होनेसे यहाँ सबसे प्रधान कहा गया है ) इत्यादि कथाके जाननेसे मोक्ष सिद्ध नहीं होता । यहाँ तो ' ब्रह्म सबका आत्मा - स्वरूप है ' केवल यही विवक्षित है, क्योंकि उसके ज्ञानसे परम पुरुषार्थं सिद्ध होता है । * मेरे विना यदि वाणी आदि अपने अपने व्यापार कर लें तो ' मैं कौन हूँ- मैं क्या करने वाला हूँ ' इसप्रकार ' त्वम् ' पदार्थका विचारकर स्वयं ही इसी शोधित व्यात्माको पूर्ण ब्रह्मरूपसे अनुभव किया । इसप्रकार अनुप्रवेश आदि लिङ्गोंसे भी ऐतरेयमें आत्मशंब्दसे परमात्माका ही ग्रहण है, प्रजापतिका नहीं ॥ १७ ॥

* इस व्याख्यानमें गुणोंका उपसंहार अस्पष्ट होनेके कारण पाद संगति ठीक नहीं होती, इस अरुचिसे भगवान् माष्यकार ' अपरा ' इत्यादिसे दूसरी व्याख्या करते हैं । परन्तु यहाँ संशय होता है कि-

पृष्ठ 706

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 706 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६७२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ०३ पा ०३ सर्वसङ्गविनिर्मुक्तत्वप्रतिपादनेन ब्रह्मात्मतामवधारयति । तथा ह्युपसंहरति-- ' स वा एष महानज आत्माऽजरोऽमरोऽमृतोऽमयो ब्रह्म ' ( बृह ० ४।४।२५ ) इति । छान्दोग्ये तु ' सदेव सोम्ये-दमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ' ( छा ० ६।२।१ ) इत्यन्तरेणैवात्मशब्दमुपक्रम्योदर्के ' स आत्मा तत्त्वमसि ' ( छा ० ६।८।७ ) इति तादात्म्यमुपदिशति । तत्र संशयः - तुल्यार्थत्वं किमनयो-रास्नानयोः स्यादतुल्यार्थत्वं वेति । अतुल्यार्थत्वमिति तावत्प्राप्तमतुल्यत्वाद । म्नानयोः । न ह्याम्नानवैषम्ये सत्यर्थ साम्यं युक्तं प्रतिपत्तुम्; आम्नानतन्त्रत्वादर्थपरिग्रहस्य | वाजसने-यके चात्मशब्दोपक्रमादात्मतत्त्वोपदेश इति गम्यते । छान्दोग्ये तूपक्रमविपर्ययादुपदेश-विपर्ययः । ननु छन्दोगानामप्यस्त्युदर्के तादात्म्योपदेश इत्युक्तम् । सत्यमुक्तम्; उपक्रम-तन्त्रत्वादुपसंहारस्य तादात्म्यसंपत्तिः सेति मन्यते । तथा प्राप्तेऽभिधोयते - आत्मगृहीतिः ' सदेव सोम्येदमग्र आसीत् ' ( छा ० ६।२।१ ) इत्यत्र छन्दोगानामपि भवितुमर्हति, इतरवत् । यथा ' कतम आत्मा ' ( बृह ० ४ | ३ | ७ ) इत्यत्र वाजसनेयिनामात्मगृहीतिस्तथैव । कस्मात्? उत्तरात्तादात्म्योपदेशात् ॥ १६ ॥

विनिर्मुक्तत्व प्रतिपादन द्वारा ब्रह्मात्मत्व अवधारण करती है । और ' स वा एष महानज ० ' ( यही वह महान् अज आत्मा अजर, अमर, अमृत एवं अभय ब्रह्म है ) ऐसा उपसंहार करती है । छान्दोग्यमें तो ' सदेव सोम्य ० ' ( हे सोम्य! उत्पत्तिके पूर्व यह जगत् एक अद्वितीय सद्रूप ही था ) इसके अनन्तर ही आत्मशब्दसे उपक्रमकर उपसंहार में ' स आत्मा तत्त्वमसि ' ( वह आत्मा है, वह तू है ) यह श्रुति तादात्म्यका उपदेश करती है । उसमें संशय होता है— क्या इन दोनों श्रुतियोंका तुल्यार्थं है अथवा अतुल्यार्थ है? पूर्वपक्षी - अतुल्यार्थ है, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि दोनों श्रुतियाँ अतुल्य हैं । श्रुतियों के विषम होनेपर अर्थकी समानता जानना युक्त नहीं है, कारण कि अर्थका परिग्रह ( स्वीकार ) श्रविके अधीन है । वाजसनेयकमें तो यह ज्ञात होता है कि आत्मशब्दके उपक्रम से आत्मतत्वका उपदेश है । छान्दोग्यमें तो उपक्रमके विपर्यसे उपदेश विपर्यय है । परन्तु छन्दोगोंके उपसंहार में तादात्म्यका उपदेश है ऐसा कहा गया है । ठीक, कहा गया है । उपसंहार उपक्रमके अधीन है, अतः वह तादात्म्यसंपत्ति ( उपासना ) है, ऐसा मानते हैं । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं -- ' सदेव सोम्येदमग्र आसीत् ' यहाँ पर छन्दोगोंको भी परमात्माका ग्रहण करना चाहिए, अन्यके समान । जैसे ' कतम आत्मा ' यहाँ पर वाजसनेयियोंको परमात्माका ग्रहण है, वैसे ही छन्दोगोंको भी परमात्माका ग्रहण करना चाहिए, किससे? इससे कि " उत्तरात् ' आगे तादात्म्यका उपदेश है ॥ १६ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका छान्दोग्यमें ' सदेव सोम्य ' यह सत् शब्द आत्मवाची है अथवा सत्तारूप जातिका? कारण कि दोनोंमें समानरूपसे सत् शब्दका प्रयोग देखने आत्मा है । इसे ' तन्त्र ' इत्यादिसे दिखलाते हैं । पूर्वपक्षमें उक्त दोनों श्रुतियोंके अर्थका भेद है, क्योंकि दोनों छान्दोग्य श्रुति भिन्न - भिन्न हैं । ' सदेव सोम्य ' यह उपक्रम. है । इसमें सत्ता जाति युक्त सत् और उपसंहारमें ' स आत्मा तत्त्वमसि ' आत्मपदार्थं कहा गया है । इस प्रकार उपक्रम और उपसंहारमें भेद है, तो उनके अधीन होनेवाला अर्थं एक कैसे हो सकेगा? बृहदारण्यकमें तो ' कतम आत्मेति ' आत्मशब्द से उपक्रम है और ' स वा एष महानज आत्मा ' आत्मशब्द से ही उपसंहार है, इस प्रकार उपक्रम और उपसंहारके एक होनेसे अर्थ भी एक ही है । ' आत्मा तत्त्वमसि ' इस उपसंहार वाक्यमें छन्दोगों को भी तादात्म्यका उपदेश है, तथापि यह उपसंहार ' संदेव सोम्य ' इस उपक्रमके अधीन है । उपक्रममें ' सत् ' शब्दका अन्वय है, आत्मशब्दका नहीं, इसलिए यहाँ ' सत् ' शब्दसे परमात्माका उपदेश नहीं है, किन्तु तद्भावसे उपासनाका उपदेश है । पूर्वपक्ष में छान्दोग्यमें ' सत् ' शब्द सत्ता जातिका वाचक होने से ब्रह्मात्मत्व - अभेदरूपसे उपासनाका

पृष्ठ 707

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 707 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० ८ सू ० १७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६७३ * अन्वयादिति चेत्स्यादवधारणात् । यदुक्तम् - उपक्रमान्वयादुपक्रमे चात्मशब्द-श्रवणाभावान्नात्मगृहीतिरिति तस्य कः परिहार इति चेत् - सोऽभिधीयते - स्यादवधा-रणादिति । भवेदुपपन्नेहात्मगृहीतिः । अवधारणात् । तथाहि - ' येनाश्रुतं श्रुतं मवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातम् ' ( छा ० ६ | १ | १ ) इत्येकविज्ञानेन सर्वविज्ञानमवधार्य तत्संपि-पादयिषया ' सदेव ' इत्याह । तच्चात्मगृहीतौ सत्यां संपद्यते । अन्यथा हि योऽयं मुख्य आत्मा स न विज्ञात इति नैव सर्वविज्ञानं संपद्येत । तथा प्रागुत्पत्तेरेकत्वावधारणं जीवस्य चात्मशब्देन परामर्शः स्वापावस्थायां च तत्स्वभावसंपत्तिकथनं परिचोदना-पूर्वकं च पुनः पुनः ' तत्त्वमसि ' ( छा ० ६२८ | ७ ) इत्यवधारणम् - इति च सर्वमेतत्तादात्म्य-प्रतिपादनायामेवाव कल्पते, न तादात्म्यसंपादनायाम् । न चात्रोपक्रमतन्त्रत्वोपन्यासो न्याय्यः । न ह्युपक्रम आत्मत्वसंकीर्तनमनात्मत्वसंकीर्तनं वाऽस्ति । सामान्योपक्रमश्च न वाक्यशेषगतेन विशेषेण विरुध्यते, विशेषाकाङ्क्षित्वात्सामान्यस्य । सच्छन्दार्थोऽपि च पर्यालोच्यमानो न मुख्यादात्मनोऽन्यः संभवति, अतोऽन्यस्य वस्तुजातस्यारम्भण-यदि कहो कि अन्यसे परमात्माका ग्रहण नहीं है, तो हम कहते हैं कि परमात्माका ग्रहण है, क्योंकि अवधारण है | जो यह कहा गया है कि उपक्रमके अन्वयसे उपक्रममें आत्मशब्दका श्रवण न होनेसे परमात्माका ग्रहण नहीं है । यदि कहो कि उसका परिहार क्या है? तो वह कहा जाता है— ' स्यादवधारणात् ' अवधारणसे यहां परमात्माका ग्रहण उपपन्न होता है, क्योंकि ' येनाश्रुतं ० ' ( जिससे अश्रुतश्रुत, अमत मत, और अविज्ञात विज्ञात हो जाता है ) इसप्रकार एक विज्ञानसे सर्व विज्ञानका अवधारणकर उसके संपादन करनेकी इच्छासे ' सदेव ' ऐसा कहा है । वह परमात्माका ग्रहण होनेपर सम्पन्न होता है, अन्यथा जो यह मुख्य आत्मा है वह विज्ञात नहीं है, अत: सर्व विज्ञान सम्पन्न नहीं होगा । उसीप्रकार उत्पत्तिके पूर्व एकत्व अवधारण, जीवका आत्मशब्दसे [ अनेन जीवेनात्मना ] परामर्श, सुषुप्ति अवस्था में जीव सत्से सम्पन्न होता है, यह कथन, प्रश्न पूर्वक पुनः पुनः ' तत्त्वमसि ' इसप्रकार अवधारण, ये सब तादात्म्य प्रतिपादन होनेपर ही संगत होते हैं, तादात्म्यके संपादन ( आरोप ) में नहीं । और यहाँ उपक्रम के अधीन उपन्यास उचित नहीं है, क्योंकि उपक्रममें आत्मत्व संकीर्तन अथवा अनात्मत्व संकीर्तन नहीं है और सामान्य उपक्रम वाक्यशेषगत विशेषसे विरुद्ध नहीं है, कारण कि सामान्य विशेषकी आकांक्षावाला होता है । इसप्रकार पर्यालोचन करते हुए भी मुख्य आत्मासे ' सत् ' शब्दका अर्थं अन्य नहीं हो सकता, क्योंकि इससे अन्य वस्तु समूहमें आरम्भण शब्द आदि मनृतत्व उपपत्ति होती है, और श्रुति वचनकी विषमता मी अर्थकी विषमताको अवश्य नहीं ला सत्यानन्दी - दीपिका उपदेश है, और बृहदारण्यकमें निर्गुण ब्रह्मविद्याका उपदेश है । इस प्रकारके भेद होनेसे एकके गुणोंका अन्य में उपसंहार नहीं हो सकता; सिद्धान्त में दोनों श्रुतियोंद्वारा ब्रह्मविद्याका अभेद होनेसे गुणों का उपसंहार है । सिद्धान्ती - तादात्म्यके उपदेश से यहाँ परमात्माका ही ग्रहण है ॥ १६ ॥

* यहाँ ' सदेव सोम्य ' इस उपक्रममें ' सत् ' शब्द सत्ता जातिका वाचक नहीं है, किन्तु सत्ता के आश्रयका । यद्यपि यहाँ ' सत् ' का सामान्य ज्ञान है, तो मी विशेष जिज्ञासा होनेपर वह आत्मा है, ऐसा कहा गया है, इसलिए अनिर्णीत उपक्रमके अधीन उपसंहार नहीं होता, किन्तु निर्णीत उपसंहारसे ही अनिर्णीत उपक्रमका अर्थ किया जाता है । इससे उपसंहारमें आत्मशब्द होनेसे उपक्रममें ' सत् ' शब्द मी आत्मवाची है, अतः दोनों छान्दोग्य श्रुतियोंमें कोई वैषम्य नहीं है । यदि वचनोंमें अथवा उपक्रममें विषमता मानें तो भी अर्थका भेद नहीं है, क्योंकि वाजसनेयक में ' त्वम् ' अर्थ आत्मा लक्ष्य-रूपसे ददर्थं परब्रह्ममें पर्यवसित है, उसका प्रतिपादन है, छान्दोग्य में ' तत् ' अर्थ ' त्वम् ' अर्थ में पर्यवसित

पृष्ठ 708

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 708 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६७४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ शब्दादिभ्योऽनृतत्वोपपत्तेः । आम्नानवैषम्यमपि नावश्यमर्थवैषम्यमावहति, आहर पात्रं पात्रमाहरेत्येवमादिष्वर्थसाम्येपि तद्दर्शनात् । तस्मादेवंजातीयकेषु वाक्येषु प्रति-पादन प्रकारभेदेऽपि प्रतिपाद्यार्थाभेद इति सिद्धम् ॥ १७ ॥

( ९ कार्याख्यानाधिकरणम् । सू ० १८ ) कार्याख्यानादपूर्वम् ॥ १८ ॥

पदच्छेद -- कार्याख्यानात्, अपूर्वम् । सूत्रार्थ -- ' श्रोत्रिया अशिष्यन्त आचामन्ति ' इत्यादि श्रुति अनग्नता सूचनका ही ( अपूर्वम् ) प्राणविद्याका अङ्गरूपसे अपूर्वका विधान करती है, ( कार्याख्यानात् ) क्योंकि ' द्विजो नित्यमुपस्पर्शेत् ' इत्यादि स्मृतिविधि सम्पूर्ण अनुष्ठानाङ्गरूपसे शुद्धिके लिए विधि प्राप्त आचमनका प्राणविद्या में भी अनग्नता विधानके लिए अनुवाद है । * छन्दोगा वाजसनेयिनश्च प्राणसंवादे श्वादिमर्यादं प्राणस्यान्नमाम्नाय तस्यै-वापो वास आमनन्ति । अनन्तरं च छन्दोगा आमनन्ति - ' तस्माद्वा एतदशिष्यन्तः पुरस्ता-ञ्चोपरिष्टाच्चाद्भिः परिदधति ' ( छा ० ५।२।२ ) इति । वाजसनेयिनस्त्वामनन्ति - ' तद्विद्वांसः श्रोन्निया अशिष्यन्त आचामन्त्यशित्वा चाचामन्त्येतमेव तदनमनग्नं कुर्वन्तो मन्यन्ते ' ( बृह ॰ ६ । १।१४ ) ' तस्मादेवंविदशिष्यन्नाचामेदशित्वा चाचामेदेतमेव तदनमनग्नं कुरुते ' इति । तत्र त्वाच -मनमनग्नताचिन्तनं च प्राणस्य प्रतीयते । तत्किमुभयमपि विधीयत उताचमनमेवोता-नग्नताचिन्तनमेवेति विचार्यते । किं तावत्प्राप्तम्? उभयमपि विधीयत इति । कुतः? सकती, कारण कि. ' आहर पात्रम् ' ( लाओ पात्र ) ' पात्रमाहर ' ( पात्र लाओ ) इत्यादि वाक्यों में अर्थका साम्य होनेपर भी वाक्योंकी विषमता देखने में आती है । इसलिए इसप्रकारके वाक्योंमें प्रति-पादन प्रकार ( शैली ) का भेद होनेपर भी प्रतिपाद्य अर्थका अभेद है, यह सिद्ध हुआ || १७ || छन्दोग और वाजसनेयी प्राणसंवादमें श्वान आदि पर्यन्त प्राणका अन्न कहकर उसीका जल वस्त्र है, ऐसा कहते हैं । और इसके अनन्तर छन्दोग ' तस्माद्वा ० ' ( इसीसे भोजन करनेवाले पुरुष भोजनके पूर्वं और पश्चात् इसका जलसे परिधान - आच्छादन करते हैं ) ऐसा कहते हैं । वाज-सनेयी तो ' तद्विद्वांसः श्रोत्रिया ० ' ( ऐसा जाननेवाले श्रोत्रिय भोजन करनेसे पूर्व आचमन करते हैं तथा भोजनकर आचमन करते हैं । इससे इसीको वे उस प्राणको अनग्न करना मानते हैं ) ऐसा कहते हैं । ' तस्मादेवंविद ० ' ( इसलिए ऐसा जाननेवाला भोजन के पूर्व आचमन करे तथा मोजनकर आचमन करे उसीको वह उस प्राणको अनग्न करता है ) इन शाखाओंमें आचमन और प्राणका अनग्नरूपसे चिन्तन प्रतीत होता है । उसपर विचार किया जाता है कि क्या उन दोनोंका विधान किया जाता है, अथवा आचमनका वा केवल अनग्नता - चिन्तनका ही? तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - दोनोंका ही विधान किया जाता है, किससे? इससे कि दोनोंका ही अवगम होता है । और अपूर्व होनेसे ये दोनों भी विधिके सत्यानन्दी - दीपिका होकर ' तत्त्वमसि ' वाक्यसे प्रतिपादित है, अतः इस तरह प्रकार के भेद होनेपर मी वाक्योंके अर्थका - ऐक्य होनेसे विद्या भी एक ही है । इस अधिकरण के पूर्वपक्ष में तादात्म्यसे हिरण्यगर्भ की उपासना है, सिद्धान्त में ब्रह्मभाव प्रतिपादित है ॥ १७ ॥

* ' मे किमन्नं किं वासः ' ( मेरा क्या अन्न है और क्या वस्त्र है ) इसप्रकार प्राणने वाणी आदिसे पूछा, वाणी आदिने कहा - ' यदिदं किञ्चा श्वभ्य आ कृमिभ्यस्तत्तेऽन्नमापो वसः ' ( कृमिसे लेकर श्वान पर्यन्त जो यह प्रसिद्ध अन्न है वह तेरा अन्न है और जल तेरा वस्त्र है ) इसप्रकार श्वान

पृष्ठ 709

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 709 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० ९ सू ० १८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६७५ उभयस्याप्यवगम्यमानत्वात् । उभयमपि चैतदपूर्वत्वाद्विध्यर्हम् । अथवाऽऽचमनमेव विधी-यते, विस्पष्टा हि तस्मिन्विधिविभक्तिस्तस्मादेवंविदशिष्यन्नाचामेदशित्वा चाचामेदिति । तस्यैव स्तुत्यर्थं मनग्नतासंकीर्तनमिति । एवं प्राप्ते ब्रूमः - नाचमनस्य विधेयत्वमुपपद्यते, कार्याख्यानात् । प्राप्तमेव होदं कार्यत्वेनाचमनं प्रायत्यार्थ स्मृति प्रसिद्धमन्वाख्यायते । नन्वयं श्रुतिस्तस्याः स्मृतेर्मूलं स्यात्, नेत्युच्यते, विषयनानात्वात् । सामान्यविषया हि स्मृतिः पुरुषमात्र संबद्धं प्रायत्यार्थमाचमनं प्रापयति । श्रुतिस्तुप्राणविद्याप्रकरणपठिता तद्विषयमेवाचमनं विदधती विदध्यात् । न च भिन्नविषययोः श्रुतिस्मृत्योर्मूलमूलिमा-वो s वकल्पते । न चेयं श्रुतिः प्राणविद्यासंयोग्यपूर्वमाचमनं विधास्यतीति शक्यमा-श्रयितुम्, पूर्वस्यैव पुरुषमात्र संयोगिन आचमनस्येह प्रत्यभिज्ञायमानत्वात् । अत एव च नोभयविधानम् । उभयविधाने च वाक्यं भिद्येत । तस्मात्प्राप्तमेवाशिशिषतामशितवतां. चोभयत आचमनमनूद्य ' एतमेव तदनमनग्नं कुर्वन्तो मन्यन्ते ( बृह ०६ | १ | १४ ) इति प्राणस्या-नग्नताकरण संकल्पोऽनेन वाक्येनाचमनीया स्वप्सु प्राणविद्या संबन्धित्वेनापूर्व उपदिश्यते । योग्य हैं, अथवा केवल आचमनका ही विधान किया जाता है, क्योंकि उसमें विधि बोधकविभक्ति स्पष्टरूपसे प्रतीत होती है - ' तस्मादेवंविद् ० ' ( इसीसे ऐसा जाननेवाला पुरुष मोजनके पूर्व आचमन करे तथा भोजनकर आचमन करे ) और अनग्नताका संकीर्तन मी उसीकी स्तुति के लिए है । सिद्धान्ती --- ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं- आचमन विधेय नहीं हो सकता, क्योंकि कार्यरूपसे आख्यान है । कार्यरूपसे स्मृति में प्रसिद्ध जो यह आचमन शुद्धिके लिए प्राप्त है, उसका अन्वाख्यान-अनुवाद करता है । परन्तु यह श्रुति उस स्मृतिकी मूल होगी? नहीं, ऐसा कहते हैं क्योंकि विषय नाना - भिन्न - भिन्न हैं । सामान्य विषयक स्मृति शुद्धिके लिए पुरुषमात्र संबन्धित आचमन प्राप्त कराती है, श्रुति तो प्राणविद्याके प्रकरण में पठित है, इसलिए तद्विषयक आचमनका ही विधान करती हुई विधान करेगी । भिन्न विषयक श्रुति और स्मृतिमें मूल मूलिमाव नहीं हो सकता है । और यह श्रुति प्राण-विद्या संयोगो अपूर्व आचमनका विधान करेगो, ऐसा आश्रय नहीं किया जा सकता है । कारण कि पुरुष-मात्र संयोगी पूर्व आचमनका ही यहाँ प्रत्यभिज्ञान होता है, इससे दोनोंका विधान नहीं है । दोनोंका विधान होनेपर वाक्यभेद हो जायगा, इसलिए जो मोजन करना चाहते हैं और जिन्होंने भोजनकर लिया है, उन दोनों को ही प्राप्त हुए आचमनका अनुवादकर ' एतमेव ० ' ( उसोको उस प्राणको अनग्न करते हुए मानते हैं ) इस वाक्यसे प्राणको अनग्न करनेका संकल्प आचमनीय जलमें प्राणविद्याके सत्यानन्दी - दीपिका आदिसे उपलक्षित जो सब प्राणी अन्न खाते हैं वह अन्न तेरा अन्न है और जल वस्त्र है । इसप्रकार उपासकको ध्यान करना चाहिए । इस विषयमें दोनों शाखाओंकी किसी समान श्रुतिको कहकर दोनों शाखाओं की उक्त विशेष श्रुतियां मी ' अनन्तर ' इत्यादिसे उद्धृत की गई हैं । बृहदारण्यकश्रुतिमें आच-मन और अनग्नरूपसे चिन्तन ये दोनों ही अपूर्व हैं । अतः ' तत्किम् ' इत्यादिसे संशय कहते हैं । आचमन और अनग्नरूपसे चिन्तन यदि इन दोनों का विधान मानें तो वाक्य भेद हो जायगा, इस अरुचिसे ' अथवा ' आदिसे अन्य पक्षको कहते हैं । यह आचमन प्रशस्त है, क्योंकि इससे प्राणको अनग्न मानते हैं । पूर्वपक्ष में प्राणविद्याका अङ्गरूपसे अपूर्व आचमनका जो विधान है उसका अन्य शाखाओंमें उपसंहार करना चाहिए, सिद्धान्तमें आचमन विधेय न होनेसे उसका अङ्गरूपसे उपसंहार नहीं है । * प्रसिद्धानुवादेनाप्रसिद्धं विधेयम् ' ( प्रसिद्धका अनुवाद कर अप्रसिद्धका विधान होता है ) इस न्यायसे ' एवम् ' इत्यादिसे सिद्धान्त कहते हैं । किश्व अन्य प्रमाणसे अप्राप्त ही विधेय होता है, बाचमन तो स्मृति विहित है, अतः वह विधेय नहीं हो सकता है । अनग्नतावाद आचमनकी स्तुतिके लिए नहीं है,

पृष्ठ 710

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 710 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६७६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ न चायमनग्नतावाद आचमनस्तुत्यर्थ इति न्याय्यम्, आचमनस्याविधेयत्वात्, स्वयं चान-ग्नतासंकल्पस्य विधेयत्वप्रतीतेः । न चैवं सत्येकस्या चमन स्योभयार्थताभ्युपगता भवति-प्रायत्यार्थता परिधानार्थता चेति, क्रियान्तरत्वाभ्युपगमात् । क्रियान्तरमेव ह्याचमनं नाम प्रायत्यार्थं पुरुषस्याभ्युपगम्यते, तदीयासु त्वप्सु वासःसंकल्पनं नाम क्रियान्तरमेव परि ' धानार्थं प्राणस्याभ्युपगम्यत इत्यनवद्यम् । अपि च ' यदिदं किंवा श्वभ्य आ कृमिभ्य आ कीटपतंगेभ्यस्तत्तेऽन्नम् ' ( बृह ० ६।१।१४ ) इत्यत्र तावन्न सर्वान्नाभ्यवहारश्चोद्यत इति शक्यं वक्तुम्, अशब्दत्वादशक्पत्वाच्च, सर्वं तु प्राणस्यान्न मितीयमन्नदृष्टिश्चोद्यते, तत्साहचर्या -च्चापो वास इत्यत्रापि नापामाचमनं चोद्यते, प्रसिद्धास्वेव त्वाचमनीयास्वप्सुपरिधानदृष्टि-चोद्यत इति युक्तम् । न ह्यर्धवैशसं संभवति । अपि चाचामन्तोति वर्तमानापदेशित्वान्नायं शब्दो विधिक्षमः । ननु मन्यन्त इत्यपि समानं वर्तमानापदेशित्वम् । सत्यमेव तत्, अवश्य-विधेयेत्वन्यतरस्मिन्वासः कार्याख्यानादपां वासः संकल्पनमेवापूर्व विधीयते, नाचमनम्, पूर्ववद्धि तत् - इत्युपपादितम् । यदप्युक्तम् — - विस्पष्टा चाचमने विधिविभक्तिरिति, सम्बन्धिरूपसे अपूर्वं उपदेश किया जाता है । और यह अनग्नतावाद आचमनकी स्तुति के लिए है, यह कथन उचित नहीं है, क्योंकि व्याचमन विधेय नहीं है, और अनग्नता संकल्प स्वयं विधेय प्रतीत होता है । परन्तु ऐसा होनेपर एक आचमनके एक शुद्धि प्रयोजन और दूसरा परिधान प्रयोजन इस प्रकार दो प्रयोजन स्वीकृत नहीं हैं, कारण कि अन्य क्रियाको स्वीकार किया गया है । आचमन अन्य क्रिया है, वह केवल पुरुषकी शुद्धिके लिए अभ्युपगत है और उसीके ( आचमन योग्य ) जलमें वस्त्र-संकल्प अन्य क्रिया है, वही प्राणके परिधानके लिए स्वीकार की जाती है, अतः दोष रहित है । और ' यदिदं किञ्च ० ' ( श्वान, कृमि और कोट पतङ्गोंसे लेकर यह जो कुछ भी है, वह सब तेरा अन्न है ) यहाँ सब अन्नके भक्षणका विधान किया जाता है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह श्रुति प्रतिपादित नहीं है और शक्य भी नहीं है । ' सब प्राणका अन्न है ' यह केवल अन्नदृष्टिका विधान किया जाता है । अत: उसके साहचर्य से ' जल वस्त्र है ' यहाँ भी जलके आचमनका विधान नहीं किया जाता, किन्तु आचमनके योग्य प्रसिद्ध जलमें प्राणके परिधान दृष्टिका विधान किया जाता है, यह युक्त है, कारण कि अर्ध विनाशका सम्भव नहीं है । और मो ' आचामन्ति ' ( आचमन करते हैं ) इस प्रकार वर्तमानका कथन होनेसे यह शब्द विधिके · योग्य नहीं है । परन्तु ' मन्यन्ते ' यहाँ भी तो समान वर्तमानापदेश है? यद्यपि यह ठीक है, तथापि दोनोमें से किसी एकके अवश्य विधेय होनेपर वस्त्रका कार्यरूपसे कथन होनेसे जलका वस्त्ररूपसे अपूर्वं संकल्प ही विधान किया जाता है । आचमन विधेय नहीं है, क्योंकि वह पूर्ववत् - पहले ही स्मृति से प्राप्त है, ऐसा प्रतिपादन किया जा चुका है । और यह मी जो कहा गया है कि आचमनमें विधि विभक्ति ( प्रत्यय ) स्पष्ट है, वह भी आचमनसे पूर्व प्राप्त सत्यानन्दी - दीपिका क्योंकि आचमन स्तुत्य नहीं है । अनग्नताका संकल्प स्वयं विधेय प्रतीत होता है, इसलिए विधेय किसीकी स्तुतिके लिए नहीं होता । याचमनके दो प्रयोजन भी नहीं है, कारण कि आचमन भिन्न क्रिया है और अनग्नता संकल्प - वस्त्रसंकल्प भिन्न क्रिया है । इसलिए उन दोनोंका प्रयोजन भी भिन्न - भिन्न है । * यदिदं ' यहाँ ध्यान विधि और उत्तर वाक्यमें क्रिया विधि इस प्रकार अर्ध विनाश होगा | इसलिए ' आचमेत् ' यह विधि नहीं है, किन्तु ' उपांशुयाजमन्तरा यजति ' इसके द्वारा पूर्व ही विहित होनेके कारण ' विष्णुरुपांशु यष्टव्यः ' ( विष्णु याग करना चाहिए ) इसके समान अनुवाद है, इसलिए ' एवंवित् ० ' यह वाक्य काण्व याखामें पठित नहीं है, यही इसे विधिवाक्य न माननेमें लिङ्ग है, अतः आचमन विधेय नहीं है ॥ १८ ॥