श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 711–720

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 711–720

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अधि ० १० सू ० १ ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दो - दोकासहित ६७७ तदपि पूर्ववत्त्वेनैवाचमनस्य प्रत्युक्तम् । अत एवाचमनस्याविधित्सितत्वादेतमेव तदनम-नग्नं कुर्वन्तो मन्यन्त इत्यत्रैव काण्वाः पर्यवस्यन्ति, नामनन्ति ' तस्मात्रेदंवित् ' इत्यादि । तस्मान्माध्यंदिनानामपि पाठे आचमनानुवादेनैवंवित्त्वमेव प्रकृतप्राणवासोवित्त्वं विधीयत इति प्रतिपत्तव्यम् । योऽप्ययमभ्युपगमः क्वचिदाचमनं विधीयताम्, कचिद्वासोविज्ञान-मिति, सोऽपि न साधुः, आपो वास इत्यादिकाया वाक्यप्रवृत्तेः सर्वत्रैकरूप्यात्, तस्मा-द्वासोविज्ञानमेवेह विधीयते, नाचमनमिति न्याय्यम् ॥ १८ ॥

( १० समानाधिकरणम् । सू ० १ ९ ) समान एवं चामेदात् ॥ १ ९ ॥ पदच्छेद – समाने, एवम्, च, अभेदात् । सूत्रार्थ - जैसे भिन्न शाखाओं में विद्या एक और गुणोंका उपसंहार है, ( एवम् ) वैसे ( समाने ) एक शाखा में भी हो सकता है, ( अभेदात् ) क्योंकि उपास्यका अभेद है । * वाजसनेयिशाखायामग्निरहस्ये शाण्डिल्यनामाङ्किता विद्या विज्ञाता । तत्र च गुणाः श्रूयन्ते – ' स आत्मानमुपासीत मनोमयं प्राणशरीरं मारूपम् ' इत्येवमादयः । तस्यामेव शाखायां वृहदारण्यके पुनः पठ्यते ' मनोमयोऽयं पुरुषो भाः सत्यस्तस्मिन्नन्तर्हृदये यथा व्रीहिर्वा यवो वा स एष सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किंच ' ( बृह ० ५ | ६ | १ ) इति । तत्र संशयः - किमियमेका विद्याऽग्निरहस्य बृहदारण्यकयोर्गुणोपसंहारश्च, उत द्वे इमे विद्ये गुणानुपसंहारश्चेति । किं तावत्प्राप्तम्? विद्याभेदो गुणव्यवस्था चेति । कुतः? पौनरुक्त्यप्रसङ्गात् । भिन्नासु हि शाखास्वध्येतृवेदितृभेदात्पौनरुक्त्यपरिहारमालोच्य होनेसे निराकृत है । अतएव ( अविधेय होनेसे ) आचमनकी विधि अमीष्ट न होनेके कारण ' एतमेव ० ' ' इसीको प्राणको अनग्न करते हुए मानते हैं ' यहाँ पर काण्व पर्यवसान करते हैं और ' तस्मादेवंवित् ' इत्यादि नहीं मानते हैं । इससे माध्यन्दिन शाखावालोंके पाठमें मो आचमनके अनुवादसे ' एवंवित्त्वम् ' ऐसा जाननेवाले को ही प्रकृत प्राणको वस्त्र जाननेवाला विधान किया जाता है, ऐसा समझना चाहिए । कहीं पर आचमनका विधान किया जाता है और कहींपर वस्त्रविज्ञानका, यह जो स्वीकार है वह भी ठोक नहीं है, क्योंकि ' जल वस्त्र है ' इत्यादि वाक्यकी प्रवृत्ति सर्वत्र एकरूप है । अतः यहाँ वस्त्र-विज्ञानका ही अभिधान किया जाता है आचमनका नहीं, यह युक्त है ॥ १८ ॥

वाजसनेयो शाखा के अग्निरहस्य में शाण्डिल्य नामक अङ्कित विद्या विज्ञात है, उसमें ' स आत्मानमुपासीत ० ' ( वह मनोमय, प्राणशरीर, प्रकाशरूप आत्माकी उपासना करे ) इत्यादि गुण सुने जाते हैं । और उसी शाखाके बृहदारण्यकमें पुनः ' मनोमयोऽयं पुरुषो ० ' ( प्रकाश ही जिसका सत्य - स्वरूप है, ऐसा यह पुरुष मनोमय है, वह उस अन्तर्हृदयमें जैसा धान अथवा यव होता है उतने ही परिमाणवाला है । वह यह सबका स्वामी और अधिपति है, तथा यह जो कुछ है सभीका प्रकर्ष-रूपसे शासन करता है ) इसप्रकार पढा जाता है । यहाँ संशय होता है - प्रग्निरहस्य और बृहदारण्यक इन दोनोंमें क्या यह एक विद्या और गुणोंका उपसंहार है अथवा वे दो विद्याएँ हैं और गुणोंका उप-संहार नहीं है? तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - विद्याका भेद और गुणोंकी व्यवस्था है, ऐसा प्राप्त होता है । किससे? इससे कि पुनरुक्तिका प्रसङ्ग है । मिन्न शाखाओं में अध्येता और वेदिताके भेदसे सत्यानन्दी - दीपिका # जैसे ' अग्निहोत्रं जुहोति ' इस अग्निहोत्र वाक्यमें होमरूप कर्मको विधि है और ' दध्ना जुहोति ' इस वाक्य में दधि गुणकी विधि है, वैसे यहाँ भी विद्याका भेद नहीं होना चाहिए । इसका

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६७८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ विद्यैकत्वमध्यवसायैकत्रातिरिक्ता गुणा इतरत्रोपसंहियन्ते प्राणसंवादादिष्वित्युक्तम् । एकस्यां पुनः शाखायामध्ये तृवेदितृभेदाभावादशक्यपरिहारे पौनरुक्त्ये न विप्रकृष्टदेश-स्थैका विद्या भवितुमर्हति । न चात्रैकमाम्नानं विद्याविधानार्थमपरं गुणविधानार्थमिति विभागः संभवति, तदा ह्यतिरिक्ता एव गुणा इतरत्रेतरत्र चाम्नायेरन्न समानाः, समाना अपि तूभयत्राम्नायन्ते मनोमयत्वादयः । तस्मान्नान्योन्यं गुणोपसंहार इति । * एवं प्राप्ते महे - यथा भिन्नासु शाखासु विद्यैकत्वं गुणोपसंहारश्च भवत्येवमेकस्यामपि शाखायां भवितुमर्हति उपास्याभेदात् । तदेव हि ब्रह्म मनोमयत्वादिगुणकमुभयत्राप्यु पास्यमभिन्नं प्रत्यभिजानीमः । उपास्यं च रूपं विद्यायाः । नच विद्यमाने रूपाभेदे विद्या-भेदमध्यवसातुं शक्नुमः । नापि विद्याऽभेदे गुणव्यवस्थानम् । ननु पौनरुक्त्यप्रसङ्गा-द्विद्याभेदोऽध्यवसितः, नेत्युच्यते, अर्थविभागोपपत्तेः । एकं ह्याम्नानं विद्याविधानार्थम-परं गुणविधानार्थमिति न किंचिन्नोपपद्यते । नन्वेवं सति यदपठितमग्निरहस्ये, तदेव बृहदारण्यके पठितव्यम् - ' स एष सर्वस्येशानः ' इत्यादि । यत्तु पठितमेव ' मनोमयः ' इत्यादि, तन्न पठितव्यम् । नैष दोषः, तद्वलेनैव प्रदेशान्तरपठितविद्याप्रत्यभिज्ञानात् । समान गुणाम्नानेन हि विप्रकृष्टदेशां शाण्डिल्यविद्यां प्रत्यभिज्ञाप्य तस्यामीशानत्वाद्युप-दिश्यते । अन्यथा हि कथं तस्यामयं गुणविधिरभिधीयते? अपि चाप्राप्तांशोपदेशेनार्थवति पुनरुक्ति परिहारका पर्यालोचनकर विद्याकी एकताका निश्चय कर एक विद्या में मिन्न गुणोंका अन्य विद्या में उपसंहार होता है, प्राणसंवाद आदिमें ऐसा कहा गया है, और एक शाखा में अध्येता और वेदिताका भेद न होनेसे पुनरुक्तिका परिहार अशक्य होनेपर दूर स्थानमें स्थित एक विद्या नहीं हो सकती । और यहाँ एक श्रुति विद्या विधानके लिए और दूसरी श्रुति गुणविधान के लिए हो, ऐसा विभाग भी नहीं हो सकता ऐसी अवस्थिति में अतिरिक्त गुणोंकी ही भिन्न - भिन्न स्थलोंमें श्रुति होगी न कि समान गुणोंको । परन्तु दोनों स्थलों में मनोमयत्व आदि समान गुणों की श्रुति है, इसलिए एक दूसरेके गुणों का उपसंहार नहीं है । सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होने पर हम कहते हैं -- जैसे भिन्न - भिन्न शाखाओं में विद्याका अभेद और गुणोंका उपसंहार होता है, वैसे एक शाखा में मी होना चाहिए, क्योंकि उपास्यका अभेद है । मनोमयत्व आदि गुणोंसे युक्त वही एक ब्रह्म दोनों स्थलोंमें मी उपास्य है, ऐसी हम प्रत्यभिज्ञा करते हैं । और विद्याका रूप उपास्य है, रूपके अभेदके विद्यमान होने पर विद्या - भेदके निश्चय करने के लिए हम समर्थ नहीं हैं । विद्याके अभेद होनेपर गुणोंकी पृथक् व्यवस्था मी नहीं है । परन्तु पुनरुक्ति के प्रसंगसे विद्याका भेद निश्चित किया गया है? नहीं, ऐसा कहते हैं-क्योंकि अर्थका विभाग हो सकता है ।- एक श्रुति विद्या विधानके लिए और दूसरी श्रुति गुणविधानके लिए है, इसप्रकार कुछ भी अनुपपन्न नहीं होता । परन्तु ऐसा होने पर अग्निरहस्य में जो गुण अपठित हैं उन्हींको बृहदारण्यकमें ' स एष सर्वस्येशान: ' ( वह यह सबका स्वामी है ) इत्यादि वे ही गुण पढने चाहिए, और जो ' मनोमयः ' इत्यादि पठित हैं उनको नहीं पढना चाहिए । यह दोष नहीं है, क्योंकि उसके बलसे ही अन्य प्रदेशमें पठित विद्याका प्रत्यभिज्ञान होता है । समान गुणोंकी श्रुतिसे दूर स्थानमें स्थित शाण्डिल्यविद्याका प्रत्यभिज्ञान कराकर उसमें ईशानत्व - स्वामित्व आदिका उपदेश सत्यानन्दी - दीपिका समाधान ' न च ' इत्यादिसे करते हैं । यह विद्याका अभेद और गुणोंका उपसंहार मानें तो समान गुणोंकी पुनरुक्ति व्यथं होगी, इसलिए अभ्यास से प्रयाज आदि भेदके समान विद्याका भेद है । पूर्वपक्ष में विद्याका भेद और गुणों का अनुपसंहार है, सिद्धान्तमें विद्याका अभेद और गुणोंका उपसंहार है । * जहाँ बहुत गुणोंका श्रवण हो वह प्रधानविधि और अन्य स्थलमें उसका अनुवादकर गुणविधि होती है, अतः बृहदारण्यकमें प्रधानविधि और अग्निरहस्यमें गुणविधि है । यह न्याय-

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अधि ० ११ सू ० २० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६७ ९ वाक्ये संजाते प्राप्तांशपरामर्शस्य नित्यानुवादतयाऽप्युपपद्यमानत्वान्न तद्वलेन प्रत्यभिज्ञो पेक्षितुं शक्यते । तस्मादत्र समानायामपि शाखायां विद्यैकत्वं गुणोपसंहारश्चेत्युपपन्नम् ॥ ( १ ९ संबन्धाधिकरणम् । सू ० २०-२१ ) संबन्धादेवमन्यत्रापि ॥ २० ॥

पदच्छेद -- सम्बन्धात् एवम्, अन्यत्र, अपि । सूत्रार्थ - ( सम्बन्धात् ) एक शाखा में विभागरूपसे अधीत शाण्डिल्यविद्या में एक विद्या-त्वसम्बन्धसे परस्पर गुणोपसंहार जैसे पूर्वमें कहा गया है, ( एवम् ) वैसे ( अन्यत्रापि ) अन्य स्थलमें-सत्यविद्या में भी एक विद्यात्व सम्बन्धसे परस्पर गुणोपसंहार हो सकता है । * बृहदारण्यके ' सत्यं ब्रह्म ' ( बृह ० ५।५।१ ) इत्युपक्रम्य ' तद्यात्तसत्यमसौ स आदित्यो य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषो यश्चायं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषः ' ( बृह ० ५/५/२ ) इति तस्यैव सत्यस्य ब्रह्मणोऽधिदैवतमध्यात्मं चायतनविशेषमुपदिश्य व्याहृतिशरीरत्वं च संपाद्य द्वे उप-निषदावुपदिश्येते । तस्योपनिषदहरित्यधिदैवतम् । तस्योपनिषदहमित्यध्यात्मम् । तत्र संशयः - किमविभागेनैवोभे अप्युपनिषदावुभयत्रानुसंघातव्ये, उत विभागेनैकाऽधिदैवत-मेकाऽध्यात्म मिति । तत्र सूत्रेणैवोपक्रमते । यथा शाण्डिल्यविद्यायां विभागेनाप्यधीतायां किया जाता है, नहीं तो उसमें यह गुण विधान कैसे कहा जायगा । किव अप्राप्त अंशके उपदेशसे वाक्यके अर्थवान् होनेपर प्राप्त अंशका परामर्शं नित्य अनुवादरूपसे भी उपपन्न होता है, अतः उसके बलसे प्रत्यभिज्ञाकी उपेक्षा नहीं की जा सकती है । इसलिए यहाँ एक शाखामें मी विद्याका एकत्व और गुणोंका उपसंहार है ऐसा उपपन्न होता है ॥। १ ९ ॥ बृहदारण्यकर्मे ' सत्यं ब्रह्म ' ( सत्य ब्रह्म है ) इसप्रकार उपक्रमकर ' तद्यत्तत्सत्यमसौ ० ' ( वह जो सत्य है, सो यह आदित्य है । जो इस आदित्य - मण्डल में पुरुष है और जो भी यह दक्षिणनेत्र में पुरुष है ) इसप्रकार उसी सत्य ब्रह्मके अधिदैवंत और अध्यात्म स्थानविशेषका उपदेशकर व्याहृति शरीरत्वका संपादनकर दो उपनिषदोंका - रहस्यनामोंका उपदेश किया जाता है । ' अहः ' उसका अधि-दैवत उपनिषद् - रहस्य नाम है, ' अहम् ' उसका अध्यात्म उपनिषद् रहस्य नाम है । यहाँ संशय होता है कि क्या अविभागसे ही दोनों उपनिषदोंका दोनों स्थलोंमें अनुसंधान करना चाहिए अथवा विभागसे ही एक अधिदैवत और एक अध्यात्मका? उसपर सूत्रसे ही उपक्रम करते हैं— जैसे विभागसे अधीत होनेपर भी शाण्डिल्यविद्या में गुणोंका उपसंहार कहा गया है, ऐसे इसप्रकारके विषयमें अन्य स्थलोंमें भी सत्यानन्दी - दीपिका निर्णयका मत है, किन्तु रत्नप्रमामें अग्निरहस्यमें प्रधानविधि और वृहदारण्यकमें गुणविधि मानी गई है । इसप्रकार विभागके उपपन्न होनेपर विद्या एक है ॥ १ ९ ॥ * यहाँ आदित्यपदसे आदित्यमण्डलका ग्रहण नहीं है, किन्तु उस मण्डलमें इन्द्रियात्मक जो पुरुष है, वही अध्यात्म नेत्र स्थानमें स्थित है, ऐसा उपदेशकर ' तस्य भूरिति शिरः ' भुव इति बाहु, स्वरिति प्रतिष्ठा ' ( बृह ० ५/५/३ ) ( उसका ' भू ' यह शिर है, ' भुव ' यह बाहु है और ' स्वः ' यह पाद हैं ) इसप्रकार व्यहृतिरूप शरीर कहकर दो उपनिषदोंका - देवताके रहस्यनामोंका - श्रुतिसे उपदेश किया जाता है । उस आदित्य- मण्डलस्थ पुरुषका नाम ' अह ' है, क्योंकि वह प्रकाशक है | नेत्रस्थ पुरुषका नाम ' अहम् ' है, क्योंकि वह प्रत्यक है । इसप्रकार अधिदैवत और अध्यात्म ये दो नाम इस अधिकरण के विषय हैं । यहाँ जिसके ये दो नाम हैं, उस सत्यसंज्ञक ब्रह्मके एक होनेसे और उसके स्थानभेदका कथन होनेसे ' तत्र ' इत्यादिसे संशय कहते हैं । जैसे पूर्व अधिकरण में विद्याके एक

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६८० ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ गुणोपसंहार उक्त एवमन्यत्राप्येवं जातीय के विषये भवितुमर्हति एकविद्याभिसंबन्धात् । एका हीयं सत्यविद्याऽधिदैवमध्यात्मं चाधीता, उपक्रमाभेदादूव्यतिषक्तपाठाच्च । कथं तस्यामुदितो धर्मस्तस्यामेव न स्यात्? यो ह्याचार्ये कश्चिदनुगमनादिराचारचोदितः स ग्रामगतेऽरण्यगते च तुल्यवदेव भवति । तस्मादुभयोरप्युपनिषदोरुभयत्र प्राप्तिरिति | २० | एवं प्राप्ते प्रतिविधत्ते-न वा विशेषात् ॥ २१ ॥

पदच्छेद - न, वा, विशेषात् । सूत्रार्थ - ( न वा ) दोनों उपनिषदोंकी दोनों स्थलोंमें प्राप्ति नहीं है, ( विशेषात् ) क्योंकि विशेष है अर्थात् उपासनाका स्थानविशेषके साथ सम्बन्ध है । * न वोभयोरुभयत्र प्राप्तिः । कस्मात्? विशेषात् । उपासनस्थानविशेषोपनि-बन्धादित्यर्थः । कथं स्थानविशेषोपनिबन्ध इति? उच्यते- ' य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषः ' ( बृह ० ५।५।३ ) इति ह्याधिदैविकं पुरुषं प्रकृत्य तस्योपनिषदहरिति श्रावयति । ' योऽयं दक्षिणे-ऽक्षन्पुरुषः ' ( बृह ० ५।५।४ ) इति ह्याध्यात्मिकं पुरुषं प्रकृत्य तस्योपनिषदहमिति । तस्येति चैतत्संनिहितावलम्बनं सर्वनाम, तस्मादायतनविशेषव्यपाश्रयेणैवैते उपनिषदावुप-होना चाहिए, क्योंकि एक विद्याका सम्बन्ध है । उपक्रमका अभेद होने से और परस्पर सम्बद्ध पाठ होनेसे अधिदेवत और अध्यात्मरूपसे अधीत यह सत्यविद्या एक ही है । उस एक विद्यामें कथित धमं उसीमें क्यों न हों? क्योंकि जो आचार्यके विषय में कोई अनुगन आदि आचार विहित है, वह ग्रामगत आचार्यमें अथवा अरण्यगत आचार्यमें एक - सा ही होता है । इसलिए दोनों उपनिषदोंकी भी दोनों स्थलोंमें प्राप्ति है ॥ २० ॥

ऐसा प्राप्त होनेपर समाधान करते हैं-अथवा दोनोंकी दोनों स्थलोंमें प्राप्ति नहीं है, किससे? विशेषसे – उपासनाका स्थान - विशेषके साथ सम्बन्ध होनेसे । स्थानविशेषके साथ उपनिबन्ध ( सम्बन्ध ) किस प्रकार है? इस पर कहते हैं-' य एष एतस्मिन् ० ' ( जो यह इस मण्डलमें पुरुष है ) इस प्रकार आधिदैविक पुरुषको प्रस्तुतकर ' तस्यो-पनिषदहः ' उसका उपनिषद् - रहस्य नाम ' अहः ' है, ऐसा श्रुति श्रवण कराती है, और ' योऽयं ० ' ( जो यह दक्षिण अक्षिमें पुरुष है ) इस प्रकार आध्यात्म पुरुषका उपक्रमकर ' उसका उपनिषद् - रहस्य नाम ' अहम् ' है, ऐसा श्रवण कराती है । ' तस्य ' यह शब्द संनिहितका आलम्बन करनेवाला सर्वनाम है, इसलिए स्थान विशेष अवलम्बनसे ये दोनों उपनिषद् - रहस्य उपदेश किये जाते हैं । अतः दोनोंकी सत्यानन्दी -दीपिका होनेसे परस्पर गुणोंका उपसंहार है, वैसे भिन्न स्थलस्थ एक विद्यामें भी गुणोंका उपसंहार हो सकता है । ' सत्यं ब्रह्म ' इसप्रकार उपक्रमका अभेद है, और ' तावेतौ अक्ष्यादित्यपुरुषौ अन्योन्यस्मिन् प्रतिष्ठितौ ० ' ( बृह ० ५/५ | १ ) ( वे ये दोनों - अक्षि पुरुष और आदित्य पुरुष एक दूसरेमें प्रतिष्ठित हैं ) सूर्य किरणोंकी चक्षुमें और चक्षुकी आदित्य में प्रतिष्ठा है । इस रीतिसे उपक्रमके अभेद और परस्पर सम्बन्धित पाठसे विद्या एक है, अतः दोनों उपनिषदोंकी दोनों स्थलोंमें प्राप्ति है । पूर्वपक्षमें प्रत्येक स्थानमें दोनों नामोंका अनुष्ठान है, सिद्धान्त में जिस - जिस स्थान में जो - जो नाम है उस उसका अनुष्ठान है | २० || # ये दोनों नाम भिन्न - भिन्न उपासना स्थानके साथ सम्बन्ध रखते हैं । अतः ' तस्योपनिषदहः ' और ' तस्योपनिषदहम् ' उस आदित्य पुरुषका नाम ' अहः ' और अक्षिस्य पुरुषका नाम ' अहम् ' है ।

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अधि ० ११ सू ० २२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६८१ दिश्येते । कुत उभयोरुभयत्र प्राप्तिः? नन्वेक एवायमधिदैवतमध्यात्मं च पुरुषः, एक-स्यैव सत्यस्य ब्रह्मण आयतनद्वयप्रतिपादनात् । सत्यमेवमेतत् एकस्यापि त्ववस्था-विशेषोपादानेनैवोपनिषद्विशेषोपदेशात्तदवस्थस्यैव सा भवितुमर्हति । अस्ति चायं दृष्टान्तः - सत्यप्याचार्यस्वरूपानपाये, यदाचार्यस्यासीनस्यानुवर्तनमुक्तं न तत्तिष्ठतो भवति । यच्च तिष्ठत उक्तं न तदासीस्येति । ग्रामारण्ययोस्त्वाचार्यस्वरूपानपायात्तत्स्वरू-पानुबद्धस्य च धर्मस्य ग्रामारण्यकृतविशेषाभावादुभयत्र तुल्यवद्भाव इत्यदृष्टान्तः सः । तस्माद्व्यवस्थाऽनयोरुपनिषदोः ॥ २१ ॥

दर्शयति च ॥ २२ ॥

पदच्छेद - दर्शयति, च । सूत्रार्थ - और ' तस्यैतस्य तदेव रूपम् ' इत्यादि श्रुति ऐसा ही दिखलाती है । * अपि चैवजातीयकानां धर्माणां व्यवस्थेति लिङ्गदर्शनं भवति - ' तस्यैतस्य तदेव रूपं यदमुष्य रूपं यावमुष्य गेष्णौ तौ गेष्णौ यन्नाम तन्नाम ' ( छा ० १/७/५ ) इति । कथमस्य लिङ्गत्वमिति? तदुच्यते - अक्ष्यादित्यस्थानभेदभिन्नान्धर्मानन्योन्यस्मिन्ननुपसंहार्यान्पश्य-न्निहातिदेशेनादित्यपुरुषगतान्रूपादीनक्षिपुरुषे उपसंहरति — ' तस्यैतस्य तंदेव रूपम् '

( छा ० १/७/५ ) इत्यादिना । तस्माद्व्यवस्थिते एवैते उपनिषदाविति निर्णयः ॥ २३ ॥

दोनों स्थलों में कैसे प्राप्ति हो सकती है? परन्तु अधिदेवित और अध्यात्मरूपसे यह एक ही पुरुष है, क्योंकि एक ही सत्य ब्रह्मका दो स्थानों में प्रतिपादन है । हाँ, यह ठीक है, परन्तु एक ब्रह्मके भी अवस्थाविशेषके ग्रहणसे उपनिषद् - विशेषका उपदेश होनेसे उस अवस्थामें आए हुएका ही वह उपनिषद् हो सकता है । और यह दृष्टान्त भी है - आचार्यके स्वरूपका अपाय - विनाश न होनेपर भी बैठे हुए आचार्यका जो अनुवर्तन कहा गया है वह खड़े हुएका नहीं होता, और जो खड़े हुएका कहा गया है वह बैठे हुएका नहीं होता । परन्तु ग्राम और अरण्यमें तो आचार्यके स्वरूपका अपाय न होनेसे और स्वरूपके साथ अनुबद्ध - सम्बन्धित घर्ममें ग्राम और अरण्यकृत विशेष न होनेसे दोनों स्थलोंमें एक - सा भाव है, इसलिए वह दृष्टान्त नहीं है, अतः इन दोनों उपनिषदोंकी व्यवस्था है ॥ २१ ॥

और इसप्रकारके धर्मोकी व्यवस्था है- उनका परस्पर उपसंहार नहीं है, इस विषय में ' तस्यै -तस्य ० ' ( उस इस चक्षुस्थ पुरुषका वही रूप है जो इस आदित्यान्तर्गत पुरुषका रूप है । जो उस पुरुष के पर्व ( गिट्टे ) हैं वही इसके पर्व हैं, जो उसका नाम है वही इसका नाम है ) यह लिङ्गदर्शन है । यह लिङ्गदर्शन कैसे है? उसे कहते हैं - अक्षि और आदित्य इस स्थानभेदसे भिन्न परस्परमें उपसंहारके अयोग्य इन धर्मोको देखकर श्रुति आदित्य पुरुष गत रूप आदिका यहाँ अतिदेशसे अक्षि पुरुष में ' तस्यैतस्य ते देव रूपम् ' इत्यादिसे उपसंहार करती है । इसलिए ये दोनों उपनिषद् - रहस्य व्यवस्थित हैं, ऐसा निणं है ॥ २२ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका इन दोनों वाक्योंमें सर्वनाम ' तत् ' पद निकटवर्तीका ही आलम्बन करता है, इसलिए प्रथम ' तत् ' शब्द आदित्यस्थ पुरुषका और द्वितीय ' तत् ' पद अक्षिस्थ पुरुषका परामर्श करता है, क्योंकि स्थानभेदसे विशेष्यका भी भेद माना जाता है । विशेष्यके एक होनेपर भी विशेषण युक्त होनेसे विशिष्टमें भेद माना गया है, इसलिए इन दोनों उपनिषदोंकी - ' अहः ' और ' अहम् ' नामोंकी भिन्न - भिन्न व्यवस्था है अर्थात् सत्यविद्या एक होनेपर भी अधिदैवित और अध्यात्मभेद से भिन्न है ॥ २१ ॥

* ' अहः ' और ' अहम् ' इन नामोंकी व्यवस्था में अतिदेश ही लिङ्ग है, यह ' दर्शयति च ' इससे दिखलाते हैं । विद्याके अभिन्न होनेसे हो यदि धर्मोंका उपसंहार हो तो ' तस्यैतस्य ' यह अतिदेश व्यर्थं होगा, इसलिए एक विद्यामें भी स्थानभेदसे कथित गुणोंका उपसंहार नहीं हो सकता ॥ २२ ॥

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६८२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ ( १२ संभृत्यधिकरणम् । सू ० २३ ) संभृतिद्युव्याप्त्यपि चातः ॥ २३ ॥

पदच्छेद- संभतिद्युव्याप्ति, अपि · च, छत ॥ सूत्रार्थ - ( संभृतिद्युव्याप्ति ) संभृति, द्यव्याप्ति आदि विभूतियोंका भी शाण्डिल्यविद्या आदिमें उपसंहार नहीं करना चाहिए, ( अतरच ) क्योंकि आयतन विशेषका योग है । * ' ब्रह्मज्येष्ठा वीर्या संभृतानि ब्रह्माग्रे ज्येष्ठं दिवमाततान ' इत्येवं राणायनीयानां खिलेषु वीर्य संभृतिद्युनि वेशप्रभृतयो ब्रह्मणो विभूतयः पठ्यन्ते । तेषामेव चोपनिषदि शाण्डिल्य -विद्याप्रभृतयो ब्रह्मविद्याः पठ्यन्ते । तासु ब्रह्मविद्यासु ता ब्रह्मविभूतय उपसंहियेरन्न वेति विचारणायां ब्रह्मसंबन्धादुपसंहारप्राप्तावेवं पठति । संभृतिद्युव्याप्तिप्रभृतयो विभूतयः शाण्डिल्यविद्याप्रभृतिषु नोपसंहर्तव्याः, अत एव चायतनविशेषयोगात् । तथा हि शाण्डिल्यविद्यायां हृदयायतनत्वं ब्रह्मण उक्तम्- ' एष म आत्माऽन्तर्हृदये ' ( छा ० ३।१४।३ ) इति । तद्वदेव दहरविद्यायामपि ' दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः ' ( छा ० ८ | १ | १ ) इति । उपकोसलविद्यायां त्वक्ष्यायतनत्वम् ' य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते ' ( छा ० 81१५1१ ) इति । एवं तत्र तत्र तत्तदाध्यात्मिकमायतनमेतासु विद्यासु प्रतीयते । आधिदैविक्यस्त्वेता विभूतयः संभृतिद्युव्याप्तिप्रभृतयः, तासां कुत एतासु प्राप्तिः? नन्वेतास्वप्याधिदैविक्यो विभूतयः श्रूयन्ते - ' ज्यायान्दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः ( छा ० ३ | १४ | ३ ) एष उ एव मामनीरेष हि सर्वेषु लोकेषु माति ' ( छा ० ४।१५।४ ) ' यावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाश उभे अस्मिन्द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते ' ( छा ० ८1१1३ ) इत्येवमाद्याः । ' ब्रह्मज्येष्ठा ० ' ( ब्रह्म ही जिनका कारण है, ऐसे पराक्रम विशेष ( निर्विघ्न समृद्ध हुए वह ज्येष्ठ ब्रह्म देवताओंकी उत्पत्तिके पूर्व स्वर्गमें व्याप्त नीय शाखावालोंके खिलकाण्डों में वीयं समृद्धि, स्वर्गव्याप्ति आदि ब्रह्मकी और उन्हींके उपनिषद्में शाण्डिल्यविद्या आदि ब्रह्मविद्याएं पढी जाती हैं ब्रह्मविभूतियोंका उपसंहार होना चाहिए अथवा नहीं? ऐसा विचार सम्बन्धसे उपसंहार प्राप्त होनेपर ऐसा कहते हैं — संभृति, द्युव्याप्ति आदि आदिमें उपसंहार नहीं होना चाहिए, अतएव च आयतनविशेष के सम्बन्धसे सन्ति चान्या आयतन -आकाशको उत्पन्न करना ) हुआ ) इस प्रकार राणाय-विभूतियां कही जाती हैं ॥ उन ब्रह्मविद्याओंमें उन उपस्थित होनेपर ब्रह्मके विभूतियों का शाण्डिल्यविद्या । जैसे कि शाण्डिल्यविद्यामें ' एष म आत्मान्तर्हृदये ' ( यह मेरा आत्मा हृदयके मीतर है ) इस प्रकार ब्रह्मका हृदय आयतन कहा गया है । उसी प्रकार दहरविद्या में भी ' दहरं पुण्डरीकं ० ' ( इस ब्रह्मपुरके मीतर जो यह सूक्ष्म कमलाकार स्थान है, इसमें जो सूक्ष्म आकाश है ) इस प्रकार ब्रह्मका हृदय स्थान कहा गया है । उपकोसलविद्यामें तो ' य एषो ० ' ( जो यह अक्षिमें पुरुष दिखाई देता है ) इस तरह ब्रह्मका नेत्र स्थान कहा गया है । इस प्रकार तत् तत् स्थलमें तत् - वत् आध्यात्मिक आयतन इन विद्याओं में प्रतीत होता है । परन्तु संभृति, व्याप्ति आदि ये विभूतियाँ आधिदैविकी हैं, उन विभूतियोंकी इन विद्याओंमें प्राप्ति किस प्रकार हो सकती है! इन विद्याओंमें भी आधिदैनिकी विभूतियोंकी ' ज्यायान्दिवो ० ' ( आत्मा द्यु लोकसे बड़ा, इन लोकोंसे बड़ा है ) ' एष उ एव ० ' ( यही आत्मा मामनी है, क्योंकि सम्पूर्ण लोकोंमें आदित्य, चन्द्र और अग्नि आदिके रूपमें यही दीप्त होता है ) ' यावान्वा ० ' ( जितना यह भौतिक आकाश है उतना सत्यानन्दी -दीपिका * ब्रह्मकी वीयं समृद्धि स्वगं व्याप्ति आदि विभूतियां कही गई हैं, उनका ब्रह्मके साथ सम्बन्ध होनेसे सब ब्रह्मविद्याओंमें उपसंहार पूर्वपक्ष है । सिद्धान्तमें इनका उपसंहार नहीं है ॥ २३ ॥

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अधि ० १३ सू ० २४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६८३ विशेषहीना अपीह ब्रह्मविद्याः षोडशकलाद्याः । सत्यम्, एवमेतत्, तथाप्यत्र विद्यते विशेषः संभृत्याद्यनुपसंहारहेतुः । समान गुणाम्नानेन हि प्रत्युपस्थापितासु विप्रकृष्टदेशा-स्वपि विद्यासु विप्रकृष्टदेशा गुणा उपसंहियेरन्निति युक्तम्, संभृत्यादयस्तु शाण्डिल्या-दिवाक्यगोचराश्च मनोमयत्वादयो गुणाः परस्परव्यावृत्तस्वरूपत्वान्न प्रदेशान्तरवर्ति-विद्या प्रत्युपस्थापनक्षमाः । नच ब्रह्मसंबन्धमात्रेण प्रदेशान्तरवर्तिविद्या प्रत्युपस्थापन-मित्युच्यते, विद्याभेदेऽपि तदुपपत्तेः । एकमपि हि ब्रह्म विभूतिभेदैरनेकधोपास्यत इति स्थितिः, परोवरीयस्त्वादिवद्भेददर्शनात् । तस्माद्वीर्यसंभृत्यादीनां शाण्डिल्यविद्या-दिष्वनुपसंहार इति ॥ २३ ॥

( १३ पुरुषाद्यधिकरणम् । सू ० २४ ) पुरुषविद्यायामिव चेतरेषामनाम्नानात् ॥ २४ ॥

पदच्छेद - पुरुष विद्यायाम्, इव, च, इतरेषाम्, अनाम्नानात् । सूत्रार्थ - ( पुरुषविद्यायामिव ) ताण्डी आदिमें पुरुष विद्यामें जिस प्रकार पुरुषकी यज्ञरूपसे कल्पना की जाती है, उसी प्रकार ( इतरेषाम् ) तैत्तिरीयोंकी पुरुषविद्या में ( अनाम्नानात् ) पठितं न होनेसे ताण्डी आदि गत पुरुष यज्ञधमं तैत्तिरीयकमें उपसंहार नहीं करने चाहिए । * अस्ति ताण्डिनां पैङ्गिनां च रहस्यब्राह्मणे पुरुषविद्या । तत्र पुरुषो यज्ञः कल्पितः । तदीयमायुस्त्रेधा विभज्य सवनत्रयं कल्पितम् । अशिशिषादीनि च दीक्षा-दिभावेन कल्पितानि । अन्ये च धर्मास्तत्र समधिगता आशीर्मन्त्रप्रयोगादयः । तैत्ति-ही हृदयान्तर्गत आकाश है, द्युलोक और पृथिवी ये दोनों लोक सम्यक् प्रकारसे इसके भीतर ही स्थित हैं ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं और इस प्रकरण में स्थानविशेष रहित भी अन्य षोडशकला आदि ब्रह्मविद्याएँ हैं । यह सत्य ही है, तो मी यहाँ विशेष है वह संभृति आदिके अनुपसंहारका हेतु है, क्योंकि समान गुणों श्रुति उपस्थापित दूर स्थानों में स्थित विद्याओंमें भी दूर स्थानस्थ गुणों का उपसंहार होना चाहिए, यह युक्त है | परन्तु संभृति आदि गुण और शाण्डिल्य आदि वाक्य विषयक मनोमयत्व आदि गुण परस्पर व्यावृत्त ( भिन्न ) स्वरूपवाले होने से अन्य प्रदेश में स्थित विद्याके उपस्थापन करनेमें समर्थ नहीं हैं । उसीप्रकार केवल ब्रह्म सम्बन्धसे अन्य प्रदेशवर्ती विद्याका उपस्थापन होता है, ऐसा नहीं कहा जाता है, कारण कि विद्याके भेद होनेपर भी ब्रह्मका सम्बन्ध उपपन्न होता है । एक ब्रह्मकी भी भिन्न-भिन्न विभूतियों द्वारा अनेकप्रकारसे उपासना की जाती है, ऐसी स्थिति है, क्योंकि परोवरीयस्त्व आदिके समान भेद देखने में आता है । इसलिए वीयं संभृति आदि गुणोंका शाण्डिल्यविद्या आदिमें उपसंहार नहीं है | २३ | ताण्डी और पैङ्गीके रहस्यब्राह्मणमें पुरुषविद्या है, वहाँ पुरुष यज्ञरूपसे कल्पित है, उसकी आयुका तीन प्रकार विभागकर तीन सवन कल्पित किये गये हैं, मोजनकी इच्छा आदि दीक्षा आदि भावसे कल्पित किये गये हैं । आशीर्वाद प्रयोग, मन्त्र प्रयोग आदि अन्य धर्मं वहाँपर समधिगत हैं । तैत्तिरीयक मी ' तस्यैवं विदुषो ० ' ( उस ऐसा जाननेवालेके यज्ञका आत्मा यजमान है और श्रद्धा पत्नी है ) इस अनुवाकसे किसी पुरुषयज्ञ की कल्पना करते हैं । यहाँ संशय होता है कि क्या जो पुरुषके धर्म अन्योन्य सत्यानन्दी -दीपिका * छान्दोग्यगत विद्याको कहते हैं - ' पुरुषो वा यज्ञस्तस्य ' ( छा ० ३।१६।१ ) ' पुरुष ही यज्ञ है उसके जो चौबीस वर्षं हैं वह प्रातः सवन है ' ' उसके जो चौवालीस वर्षं हैं वह माध्यन्दिन सवन है ' ' उसके जो अवशिष्ट अड़तालीस वर्ष हैं वह तृतीय सवन है ' ( छा ० ३ | १६ | ३ ) सोमयागमें सोमरस निकालने समयको संवन कहा जाता है । इस प्रसिद्ध यज्ञके सादृश्यके लिए इन तीन सवनोंकी कल्पना-की गई है । ' स यदशिशिषति ० ' ( वह जो खानेकी अभिलाषा करता है, जो पीना चाहता है जो रमण

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६८४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ रीयका अपि कंचित्पुरुषयज्ञं कल्पयन्ति - ' तस्यैवं विदुषो यज्ञस्यात्मा यजमानः श्रद्धा पत्नी ' ( नारा ० ८० ) इत्येतेनानुवाकेन । तत्र संशयः - किं य इतरत्रोक्ताः पुरुषयज्ञस्य धर्मास्ते तैत्ति-रीयकेषूपसंहर्तव्याः, किं वा नोपसंहर्तव्या इति? पुरुषयज्ञत्वाविशेषादुपसंहारप्राप्तावा-चक्ष्महे - नोपसंहर्तव्या इति । कस्मात्? तद्रूपप्रत्यभिज्ञानाभावात् । तदाहाचार्यः - पुरुष -विद्यायामिवेति । यथैकेषां शाखिनां ताण्डिनां पैङ्गिनां च पुरुष विद्यायामाम्नानं नैवमितरेषां तैत्तिरीयाणामाम्नानमस्ति । तेषां होतरविलक्षणमेव यज्ञसंपादनं दृश्यते पत्नीयजमानवे-दिवेदबर्हिर्यू पाज्यपश्वृत्विगाद्यनुक्रमणात् । यदपि सवनसंपादनं तदपीतर विलक्षणमेव-' यत्प्रातर्मध्यंदिन सायं च तानि ' ( नारा ० ८० ) इति । यदपि किंचिन्मरणावभृथत्वादिसाम्यं " शाखा में उक्त हैं वे तैत्तिरीयकों में उपसंहार नहीं होने चाहिए अथवा क्या उपसंहार होने चाहिए? पुरुष यज्ञत्वके अविशेष होनेसे उपसंहार प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - उपसंहार नहीं होना चाहिए, किससे? उसके रूपका प्रत्यभिज्ञान न होनेसे । उसे आचार्य कहते हैं - ' पुरुष विद्यायामिव ' जैसे एक शाखावालोंकी ताण्डी और पैङ्गियोंकी पुरुषविद्या में श्रुति है, वैसे अन्य तैत्तिरीयकों की श्रुति नहीं है । उनका यज्ञ संपादन अन्यसे विलक्षण देखने में आता है, क्योंकि उसमें पत्नी, यजमान, वेद, वेदी, बर्हि, यूप, आज्य, पशु, ऋत्विक् आदिका अनुक्रम है । और जो मी सवन संपादन है वह मी ' यत्प्रातर्मध्यंदिनं सायं च तानि ' ( जो प्रातः, मध्यदिन और सायंकाल हैं वे सवन हैं ) इसप्रकार छान्दोग्यगत सवन संपादनसे विलक्षण सत्यानन्दी - दीपिका ( प्रसन्न ) नहीं होता वही इसकी दीक्षा है और पुनः वह जो खाता है जो पीता है जो रति करता है वह उपसदोंकी सदृश्यताको प्राप्त होता है [ दोक्षणीयेष्टि, प्रयणीयेष्टि, उपसदिष्टि, उदयनीयेष्टि और अव-भृथेष्टि इस प्रकार पाँच उपसदिष्टियाँ होती हैं ] तथा जो हँसता है, मक्षण करता है जो मैथुन करता है वे स्तुत शास्त्रकी समानताको प्राप्त होते हैं, तथा जो तप, दान आदि हैं वह इसकी दक्षिणा है, मरण हो अवभृथ स्नान है | ( छा ० ३१ ३,४,५ ) वसु आदि अथवा ये मेरे प्राण प्रातः सवन और माध्यन्दिन सवन हैं । इस प्रकार ये तीन सवन आयुपर्यन्त चलते रहते हैं । यह आशीष - फल- कामना है ' अक्षितमस्यच्युतमसि प्राणस शितमसि ' ( छा ० ३ | १७१४ ) ( तू अक्षय है, तू अच्युत - अविनाशी है और अतिसूक्ष्म प्राण है ) इस प्रकार एक सौ चालीस वर्षं जीवन फल है, ऐसा दिखलाया गया है । संशयके लिए अन्य शाखा में पुरुषं विद्याको ' तैत्तिरीयक ' इत्यादिसे कहते हैं - पहाँ पर ' विदुषो यज्ञस्य ' इन षष्ठी विभक्तयन्त दो पदोंका सामानाधिकरण्य है अथवा वैयधिकरण्य? इसका निश्चय न होने से संशय होता है । पूर्वपक्षमें गुणोंका उपसंहार और सिद्धान्त में गुणोंका अनुपसंहार है । ' तस्यैवं विदुषो यज्ञस्य ' ( उस ऐसा जाननेवालेके यज्ञका आत्मा यजमान है, श्रद्धा पत्नी, शरीर समिधा, उरु स्थल वेदी, रोम बहि - कुशा, वेद- कुशमुष्टि शिखा, हृदय यूप, काम आज्य, मन्यु-क्रोध- पशु, तप अग्नि शमन करनेवाला दम दक्षिणा, वाणी होता, प्राण उद्गाता, नेत्र सर्वयु और मन ब्रह्मा है ) इस प्रकार अनेक धर्मोकी विषमता होनेसे एकरूपकी प्रत्यभिज्ञा नहीं होती । छान्दोग्यमें तीन प्रकारसे विभक्त किये गये बायुमें सवनत्वकी कल्पना की गई है और तैत्तिरीयक प्रातःकाल आदिमें सवनत्वको कल्पना की गई है, इसप्रकार दोनों में वैलक्षण्य है, अतः गुणोंका उपसंहार नहीं होना चाहिए । * ‘ यन्मरणं तदवभृथः यद्रमते तदुपसदः ' ( तै ० ६ | ५ | २ | १ ) ऐसा तैत्तिरीयकमें बल्प सादृश्य अधिक वैषम्यको अपने अनुकूल नहीं कर सकता । जैसे हाथी और ऊँठमें चार पादका अल्प साम्य दोनोंके हाथी अथवा ऊँठ होनेमें समर्थ नहीं है । छान्दोग्यमें पुरुष और यज्ञका ऐक्य है और तैत्तिरीयकमें भेद है, इस दूसरे वैरूप्यको ' न च ' इत्यादिसे कहते हैं ॥ २४ ॥

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अधि ० १४ सू ० २५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी- दीपिकासहित ६८५ तदप्यल्पीयस्त्वाद्भूयसा वैलक्षण्येनाभिभूयमानं न प्रत्यभिज्ञापनक्षमम् । नच तैत्तिरीयके पुरुषस्य यज्ञत्वं श्रूयते, विदुषो यज्ञस्येति हि न चैते समानाधिकरणे षष्ठयौ - विद्वानेव यो यज्ञस्तस्येति । नहि पुरुषस्य मुख्यं यज्ञत्वमस्ति । व्यधिकरणे त्वेते षष्ठयौ - विदुषो यो यज्ञ-स्तस्येति । भवति हि पुरुषस्य मुख्यो यज्ञसंबन्धः । सत्यां च गतौ मुख्य एवार्थ आश्रयितव्यो न भाक्तः । ' आत्मा यजमानः ' इति च यजमानत्वं पुरुषस्य निब्रुवन्वै यधिकरण्येनैवास्य यज्ञ-संबन्धं दर्शयति । अपि च तस्यैवंविदुष इति सिद्धवदनुवादश्रुतौ सत्यां पुरुषस्य यज्ञभाव-मात्मादीनां च यजमानादिभावं प्रतिपित्समानस्य वाक्यभेदः स्यात् । अपि च ससंन्यासामा-त्मविद्यां पुरस्तादुपदिश्यानन्तरं तस्यैवंविदुष इत्याद्यनुक्रमणं पश्यन्तः पूर्वशेष एवैष आम्नायो न स्वतन्त्र इति प्रतोमः । तथा चैकमेव फलमुभयोरप्यनुवाकयोरुपलभामहे-' ब्राह्मणो महिमानमाप्नोति ' ( नारा ० ८० ) इनि । इतरेषां त्वनन्यशेषः पुरुषविद्यास्नायः, आयुरभि वृद्धिफलो हासौ, ' प्रह षोडशं वर्षशतं जीवति य एवं वेद ' ( छा ० ३ | ३६ | ७ ) इति समभिव्याहारात् । तस्माच्छाखान्तराघोतानां पुरुषविद्या धर्माणामाशीर्मन्त्रादीनामप्राप्तिस्तैत्तिरीयके ॥ २४ ॥

( १४ वेधाद्याधिकरणम् । सू ० २५ ) वेधाद्यर्थभेदात् ॥ २५ ॥

सूत्रार्थ - इन मन्त्रों और कर्मोंका विद्यानें उपसंहार नहीं होना चाहिए, क्योंकि वेध आदि का भेद है । अस्त्याथर्वणिकानामुपनिषदारम्भे मन्त्रसमाम्नाय: - ' सर्व प्रविध्य हृदयं प्रविध्य धमनीः प्रवृज्य शिरोऽभिप्रवृज्य त्रिधा विपृक्तः ' इत्यादिः । ताण्डिनाम्- ' देव सवितः प्रसुद यज्ञम् ' इत्यादिः । ही है, और उन दोनों विद्याओंमें जो कुछ थोड़ा - सा मी मरणावभृथत्व आदि साम्य है, वह भी बहुत अल्प होनेसे अधिक वैलक्षण्यसे अभिभूत हुआ प्रत्यभिज्ञान कराने में असमर्थ है, तैत्तिरीयकगत पुरुषमें यज्ञत्व श्रुति नहीं है । और ' विदुषो यज्ञस्य ' ये दोनों सामानाधिकरण्य षष्ठी नहीं हैं, विद्वान् ही जो यज्ञ है उसका, इसप्रकार, क्योंकि पुरुष मुख्य यज्ञ नहीं है, किन्तु विद्वान् जो यज्ञ उसका, इस प्रकार ये दोनों षष्ठी व्यधिकरण में हैं । कारण कि पुरुषमें मुख्य यज्ञ सम्बन्ध होता है । व्यवस्था हो सकने पर मुख्य अर्थका ही आश्रयण होना चाहिए गौणका नहीं । ' आत्मा यजमानः ' ( आत्मा यजमान है ) यह भी पुरुषमें यजमानत्व कहता हुआ वैयधिकरण्यरूपसे ही उसमें यज्ञत्व सम्बन्ध दिखलाता है । और भी ' तस्यैवं विदुषः ' ( उस ऐसा जानेवालेका ) ऐसे सिद्धके समान अनुवादरूप श्रुतिके होनेपर पुरुषमें यज्ञमाव और आत्मा आदिमें यजमान जायगा । और संन्यास सहित क्रमणको देखते हुए यह श्रुति महिमानमाप्नोति ' ( ब्रह्मकी उपलब्ध करते हैं । दूसरोंको -नहीं है, ' एष ह ० ' ( जो ऐसा आयुकी अभिवृद्धि फलवाली है आदि भावके प्रतिपादनकी इच्छा रखनेवालेके मतमें वाक्यभेद हो आत्मविद्याका पूर्व में उपदेशकर अनन्तर ' तस्यैवं विदुषः ' इत्यादि अनु-पूर्वशेष ही है स्वतन्त्र नहीं है, ऐसा हम जानते हैं । और ' ब्रह्मणो महिमाको प्राप्त होता है ) इसप्रकार दोनों अनुवाकोंका एक ही फल हम पैङ्गी और ठाण्डियोंको पुरुषविद्या श्रुति तो किसी अन्यका शेष ( अङ्ग ) जानता है वह एक सौ सोलह वर्षं जीवित रहता है ) इस प्रकार यह श्रुति , क्योंकि ऐसा समभिव्याहार - सहोच्चारण है । इससे सिद्ध होता है कि अन्य शाखाओंमें अधीत आशीर्वाद, मन्त्र आदि पुरुषविद्याके धर्मोकी तैत्तिरीयकमें प्राप्ति नहीं है | २४ | आथर्वणकों ( अथर्ववेदियों ) के उपनिषद् के आरम्भ में ' सर्व प्रविध्य ० ' ( हे देव! मेरे शत्रुके सब अङ्गोंको छिन्न भिन्नकर, विशेषतः हृदयको विदीर्णकर शिराओंको तोड़ डाल, मस्तकका सर्व ओरसे नाश कर, इसप्रकार मेरा शत्रु तीन प्रकारसे छिन्न भिन्न हो ) इत्यादि मन्त्र श्रुति है । और

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६८६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य अ ० ३ पा ० ३ शाट्यायनिनाम्- ' श्वेताश्वो हरितनीलोऽसि ' इत्यादिः । कठानां तैत्तिरीयाणां च - ' शं नो मित्रः शं वरुणः ' ( तै ० १।१।१ ) इत्यादिः । वाजसनेयिनां तूपनिषदारम्भे प्रवर्ग्यब्राह्मणं पठ्यते-' देवा ह वै सत्रं निषेदुः ' इत्यादिः । कौषीतकिनामप्यग्निष्टोमब्राह्मणम् -'ब्रह्म वा अग्निष्टोमो ब्रह्मैव तदहर्ब्रह्मणैव ते ब्रह्मोपयन्ति तेऽमृतत्वमाप्नुवन्ति य एतदहरुपयन्ति इति । किमिमे सर्वे प्रविध्या-दयो मन्त्राः प्रवर्ग्यादीनि च कर्माणि विद्यासूपसंहियेरनिक वा नोपसंहियेरन्निति मीमांसा-महे । किं तावन्नः प्रतिभाति? * उपसंहार एवैषां विद्यास्वितिः । कुतः? विद्याप्रधानाना-मुपनिषद्ग्रन्थानां समोपे पाठात् । नन्वेषां विद्यार्थतया विधानं नोपलभामहे, बाढम् -अनुपलभमाना अपि त्वनुमास्यामहे, संनिधिसामर्थ्यात् । नहि संनिधेरर्थवस्वे संभवत्यक-स्मादसावनाश्रयितुं युक्तः । ननु नैषां मन्त्राणां विद्याविषयं किंचित्सामर्थ्यं पश्यामः । कथं च प्रवर्ग्यादीनि कर्माण्यन्यार्थत्वेनैव विनियुक्तानि सन्ति विद्यार्थत्वेनापि प्रतिपद्येमहीति? नैष दोषः । सामर्थ्यं तावन्मन्त्राणां विद्याविषयमपि किंचिच्छक्यं कल्पयितुम्, हृदयादि संकीर्तनात् । हृदयादीनि हि प्रायेणोपासनेष्वायतनादिभावेनोपदिष्ठानि ताण्डियोंके उपनिषद्के आरम्भ में ' देवः सवितः ० ' ( हे विश्व प्रकाशक! हे उत्पत्तिका हेतु भूत सूर्य-देव! तुम यज्ञ और यज्ञपतिको उत्पन्न करो ) इत्यादि मन्त्र पाठ है । शाट्यायनियोंके उपनिषद् के आरम्भमें ' श्वेताश्वो ० ' ( श्वेत अश्ववाले हे इन्द्र! तुम हरितमणिके समान नील हो ) इत्यादि श्रुति है । कठ और तैत्तिरीयोंके उपनिषद् के आरम्भ में ' शं नो ० ' ( मित्र - आदित्य! हमारे लिए सुखकर हो, वरुण हमारे लिए सुखकर हो ) इत्यादि मन्त्र हैं । वाजसनेयी शाखावालोंके उपनिषद्के आरम्भ में ' देवा ह वै ० ' ( पूर्वकालमें इन्द्र आदि देवता सत्र याग करने को बैठे ) इत्यादि प्रवग्यं ब्राह्मण पढा जाता है । कौषीतकियोंके मी ' ब्रह्म वा ० ' ( अग्निष्टोम ब्रह्म ही है, जिस दिनमें वह किया जाय वह दिन ब्रह्म है, ब्रह्म वह ब्रह्मको प्राप्त होता है, जो उस दिवसमें कर्म करता है वह अमृतत्वको प्राप्त होता है ) इस नकार अग्निष्टोमब्राह्मण है । क्या ये सब प्रविष्य आदि मन्त्र और प्रवग्यं आदि कर्म विद्याओंमें उपसंहार करने चाहिए अथवा उपसंहार नहीं करने चाहिए? इसप्रकार हम विचार करते हैं, तब हमें क्या प्रतीत होता है? पूर्वपक्षी - इनका विद्याओंमें उपसंहार ही है । किससे? इससे कि उनका विद्या प्रधान उपनिषद् ग्रन्थोंके समीप पाठ है । परन्तु इनका विद्याके प्रयोजनरूप से विधान हमें उपलब्ध नहीं होता? हाँ, ठीक है । यद्यपि इनका विधान उपलब्ध नहीं होता, तो मी हम संनिधिको सामथ्यसे विधानका अनुमान करेंगे, क्योंकि संनिधिमें प्रयोजनवत्त्व संभव होनेपर विना कारण उसका अवलम्बन न करना युक्त नहीं है । परन्तु इन मन्त्रोंमें विद्याविषयक कुछ भी सामर्थ्य हम नहीं देखते हैं और प्रवर्ग्य आदि कर्म जो अन्य प्रयोजनके लिए ही प्रयुक्त हैं, वे विद्यारूप प्रयोजन के लिए भी हैं, ऐसा हम कैसे समझें यह दोष नहीं है, उन मन्त्रोंमें विद्याविषयक भी कुछ सामर्थ्य की कल्पना की जा सकती है, क्योंकि हृदय आदिका संकीर्तन है । उपासनाओं में प्रायः हृदय आदिका स्थान आदि मावसे उपदेश दिया गया है, और उसके द्वारा ' हृदयं प्रविध्य ' इसप्रकारके सत्यानन्दी - दीपिका * ' फलवत्संनिधावफलं तदङ्गम् ' ( फलवालेको संनिधिमें फल रहित उसका अङ्ग होता है ) इस न्याय से अन्यत्र विनियुक्त भी ये मन्त्र और विद्याके अङ्ग हो सकते हैं, अतः इनका उपसंहार होता है 1 । यद्यपि इनका विद्याके प्रयोजनरूपसे विधान नहीं है, तो भी ' मन्त्रादयः तत्तद्विद्याशेषाः फलवद्विद्यासंनिहितत्वात् तैत्तिरीयकगतपुरुषयज्ञवत् ' ( मन्त्र आदि तत् तत् विद्या के अङ्ग हैं, फल-वाली विद्या संनिहित होनेसे, तैत्तिरीय गत पुरुष यज्ञके समान ) इस प्रकार हम उसका अनुमान करेंगे । क्योंकि तत् तत् वाक्यसे अन्यत्र विनियुक्त कर्मोका मी संनिधिसे विद्यामों में विनियोग विरुद्ध