श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 81–90
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 81–90
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अधि ० ४ सू ० ४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ४७ नादिक्रियान्तरविधानार्थत्वं वा । नहि परिनिष्ठित वस्तुप्रतिपादनं संभवति; प्रत्यक्षादिविषय-त्वात्परिनिष्टिवस्तुनः; तत्प्रतिपादने च हेयोपादेयरहिते पुरुषार्थाभावात् । अत एव ' सोऽरोदीत् ' इत्येवमादीनामानर्थक्यं मा भूदिति ' विधिना त्वेकवाक्यत्वात्स्तुत्यर्थेन विधीनां स्युः ' ( जै ० सू ० १।२।७ ) इति स्तावकत्वेनार्थवत्त्वमुक्तम् । मन्त्राणां च ' इषे त्वा ' इत्यादीनां क्रियातत्साधनाभिधायित्वेन कर्मसमवायित्वमुक्तम् । न क्वचिदपि वेदवाक्यानां विधि-अङ्ग हैं, अथवा उपासना आदि अन्य क्रियाओंके विधान के लिए हैं । किन्तु सिद्ध वस्तुका प्रतिपादन तो वेदान्तोंका प्रयोजन ] सम्भव नहीं है, क्योंकि सिद्ध वस्तु प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंका विषय है और हेयोपादेयसे रहित उसके प्रतिपादन करनेमें पुरुषार्थ भी नहीं है । इसी कारण से ' सोऽरोदीत् ' ( वह रोया ) इत्यादि वाक्य अनर्थक न हों, इसलिए ' विधिना ० ( विधि वाक्योंके साथ अर्थवाद आदि वाक्योंकी एक वाक्यता है, क्योंकि अर्थवाद वाक्य विधेयकी स्तुतिके लिए होते हैं ) इसप्रकार स्तुति परक होनेसे सार्थक कहे गए हैं और ' इषे त्वा ' ( हे इषे! शाखाओ ) तुझे अन्नके लिए काटता हूँ ) इत्यादि मन्त्र क्रिया तथा उसके साधनोंका अभिधायी होनेसे कर्म सम्बन्धी कहे गए हैं । किसी भी प्रकरण में विधि वाक्योंके साथ सम्बन्ध प्राप्त किए विना वेद - वाक्योंकी अर्थवत्ता न देखी गई है और न उपपन्न ही है । सिद्ध वस्तुके स्वरूपमें विधि नहीं हो सकती, क्योंकि विधि क्रिया विषयक सत्यानन्दी - दीपिका * ' आम्नायस्य ' इस पूर्वपक्ष सूत्र से यह अभिव्यक्त किया जाता है कि विधि, निषेध, अर्थवाद, मन्त्र और नामधेयात्मक समस्त वेद साक्षात् या परम्परासे यज्ञ आदि क्रियाओं तथा उनके उपकरण अङ्गों का प्रतिपादक है, जैसे- ' स्वर्गकामो यजेत ' ' दध्ना जुहोति ' इत्यादि । ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ’ ' सदेव सोम्येदमग्र आसीत् ' इत्यादि वेदभाग- वेदान्त वाक्य याग आदि क्रियापरक नहीं हैं, किन्तु सिद्ध वस्तु ब्रह्मपरक हैं, अतः वे निष्फल हैं अर्थात् अप्रमाणरूप हैं, ऐसी स्थिति में ब्रह्म शास्त्र प्रमाणक कैसे हो सकता है? * ‘ स्वाध्यायोऽध्येतव्यः ' ( अङ्गों सहित स्ववेदका अध्ययन करना चाहिए ) इस अध्ययन विधिसे गृहीत वेदान्त - वाक्योंको निष्फल मानना युक्त नहीं है । पू ० - यदि वेदान्त - वाक्य साक्षात् क्रिया परक नहीं हैं तो क्रियाके अङ्गभूत कर्ता तथा देवताका ज्ञान कराते हुए क्रियाके अङ्ग हो सकते हैं । जैसे ' तत्त्वमसि ' इस वाक्यमें ईश्वर वाचक ' तत् ' पद क्रियाके अङ्ग भूत देवताका और जीव वाचक ' त्वम् ' पद याग कर्ताका बोधक है । इसप्रकार ' तत् ' और ' त्वम् ' पद देवता और कर्ताकी स्तुतिके लिए हैं और ' विविदिषन्ति ' ( जाननेकी इच्छा करें ) आदि श्रुतिवाक्य फलकी स्तुति करते हैं । इसतरह वेदान्तवाक्य कर्ता, देवता तथा फल आदिकी स्तुतिद्वारा क्रियाके अङ्ग होकर सफल होते हैं । सि ० – परन्तु कर्मके प्रकरणमें अपठित वेदान्तवाक्य कर्मके अङ्ग कैसे होंगे? पू ० – वे उपासना विधि अङ्ग होंगे । यद्यपि ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' श्रुति प्रतिपादित यह अभेद असत् है, तो भी असत् अभेदका अपनेमें आरोपकर अभेदरूपसे उपासना करनी चाहिए । सि ० – वेदान्त वाक्योंको श्रुति प्रतिपादित सिद्ध वस्तु ब्रह्म परकं न मानकर क्रियापरक माननेमें क्या प्रयोजन है? पू ० – प्रयोजन ग्रह है कि सिद्ध वस्तु वेदद्वारा जानने योग्य नहीं है, क्योंकि वह प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंका विषय है । वेद तो प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंके अविषय स्वर्ग आदि फल और उनके साधन भूत यज्ञ आदि कर्मोंका प्रतिपादक है । ' अज्ञातज्ञापकत्वं ( हि ) वेदानां प्रामाण्यम् ' ( प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे अज्ञात वस्तुका ज्ञापकत्व ही वेदोंका वेदत्व - प्रामाण्य है ) यदि वेद ज्ञात ( सिद्ध ) वस्तुका वर्णन करे तो वह अनुवादक
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४८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ संस्पर्शमन्तरेणार्थवत्ता दृट्रोपपन्ना वा * न च परिनिष्ठिते वस्तुस्वरूपे विधिः संभवति, क्रियाविषयत्वाद्विधेः । तस्मात्कमपेिक्षितकर्तृस्वरूपदेवतादिप्रकाशनेन क्रियाविधिशेषत्वं वेदान्तानाम् । अथ प्रकरणान्तरभयान्नैतदभ्युपगम्यते, तथापि स्ववाक्यगतोपासनादि-कर्मपरत्वम् । तस्मान्न ब्राह्मणः शास्त्रयोनित्वमिति प्राप्ते; उच्यते-होती है, इसलिए कर्म में अपेक्षित कर्ता तथा देवता आदिके स्वरूपका प्रकाशन करने से वेदान्त क्रिया विधिके अङ्ग हैं | यदि अन्य प्रकरणके भय से यह स्वीकार न किया जाय तो भी स्व ( वेदान्त ) वाक्योंमें उपलब्ध उपासना आदि कर्म परक हैं । इसलिए ब्रह्ममें शास्त्र प्रमाण नहीं है । ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं-सत्यानन्दी - दीपिका मात्र होगा, इससे वेदोंमें प्रामाण्य सिद्ध नहीं होगा । इसलिए वेदान्त वाक्योंको सिद्ध वस्तु परक न मानकर कर्म अथवा उपासना के लिए मानना युक्त है । तात्पर्य यह है कि हेय तथा उपादेयसे रहित सिद्ध वस्तु का प्रतिपादन अथवा उसका ज्ञान निष्फल है, क्योंकि लोकमें ऐसा देखा जाता है कि दुःख हेय है, अत: उसकी निवृत्तिके लिए प्रवृत्ति होती है और सुख उपादेय है तो उसकी प्राप्ति के लिए प्रवृत्ति होती है । परन्तु सिद्ध वस्तु होनेसे ब्रह्म न हेय है और न उपादेय ही, अतः उसका प्रतिपादन निष्फल है । किन्तु याग और उपासना दुःखकी निवृत्ति तथा सुखकी प्राप्ति के साधन हैं, अत: उनका प्रतिपादन सफल है, इसलिए वेदान्तोंको भी उनका ही अङ्ग मानना युक्त है । ** यज्ञ आदि अनुष्ठानों में अनुपयोगी वेदान्त वाक्य निष्फल तथा अप्रमाणरूप हैं, इसलिए अप्रमाणरूप वेदान्तवाक्योंसे प्रतिपादित सिद्ध वस्तुका ज्ञान भी निष्फल है । मीमांसा दर्शनमें पूर्व-पक्ष सूत्रका यदि यही अभिप्राय है तो ' सोऽरोदीत् ' ( वह रोया ) यह वेद वाक्य भी कर्म न होनेसे निष्फल होगा? मीमांसा दर्शन में सिद्धान्ती - जैसे + ' ' देवैर्निरुद्धः सोऽग्निर रोदीत् ' ( देवोंसे निरुद्ध हुआ अग्नि रोया ) यह वाक्य असे उत्पन्न रजतकी निन्दा द्वारा ' बर्हिषि रजतं न देयम् ' ( पुनराधान प्रकरण में पठित बहियागमें यजमानद्वारा ऋत्विजोंके लिए दक्षिणारूपसे रजत नहीं देना चाहिए ) इस सफल निषेध वाक्यका अङ्ग है । वेदोंमें याग आदि क्रियाके अप्रतिपादक तथा सिद्ध वस्तु के प्रतिपादक वाक्य अर्थवाद कहे जाते हैं । वे वेद विहित विधेयार्थकी स्तुतिद्वारा अथवा निषिद्धार्थ -की निन्दाद्वारा विधि तथा निषिद्ध क्रियाके अङ्ग होकर सफल होते हैं । अर्थवादके अनन्तर मन्त्रोंका विचार है— ' इषे त्वा ' इस मन्त्रमें क्रिया पदके अश्रुत होनेसे ' छिनद्मि क्रिया पदका अध्याहार किया गया है जिससे शाखाके छेदनकी प्रतीति होती है और ' इषे त्वा छिनद्मि ' ऐसा मंत्रका स्वरूप सिद्ध होता है । ' अग्निर्मूर्धा ' इत्यादि मन्त्रोंमें क्रियाके साधन भूत देवताकी प्रतीति होती है । इस प्रकार श्रुति द्वारा मन्त्रोंका क्रतुमें विनियोग होता है । अब यहाँ सन्देह उत्पन्न होता है कि क्या वे मन्त्र उच्चारण मात्रसे अदृष्ट फलको उत्पन्नकर यागके उपकारक होते हैं अथवा दृष्टार्थके स्मरणसे उपकारक होते हैं? यदि मन्त्र दृष्ट अर्थके स्मरण मात्रसे उपकारक हों तो अध्ययन कालमें अवगत भन्त्रके + किसी समय देवासुर संग्राम होनेपर देवोंने बहुमूल्य वस्तुएँ अग्निको सौंपकर कहा — हे अग्ने! युद्ध में यदि हम लोगोंका विजय हुआ तो ठीक, नहीं तो ये सब वस्तुएँ उपयोगी सिद्ध होंगी, ऐसा कहकर सब देव युद्धार्थ चले गये । दूसरी ओर अग्नि लोभवश सब वस्तुएँ लेकर चम्पत हो गया, दैववश देवगण विजय पाकर उस स्थानमें अग्निको न देख उसकी खोज की उससे सब वस्तुएं छीन लीं, तो अग्नि रोया तब उसकी अश्रुधारासे रजत उत्पन्न हुआ ।
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अधि ० ४ सू ० ४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ४ ९ तत्तु समन्वयात् ॥ ४ ॥
पदच्छेद - तत्, तु, समन्वयात् । सूत्रार्थ - ( तु ) शब्द पूर्व पक्षकी व्यावृत्तिके लिए है । ( तत् ) वह ब्रह्म स्वतन्त्र रूपसे वेदान्त वाक्योंद्वारा ही अवगत होता है, ( समन्वयात् ) क्योंकि सम्पूर्ण वेदान्त वाक्य उसके प्रतिपादनमें तात्पर्य से समन्वित हैं । तुशब्दः पूर्वपक्षव्यावृत्त्यर्थः । तद् ब्रह्म सर्वज्ञं सर्वशक्ति जगदुत्पत्तिस्थितिलयकारणं ' तु ' शब्द पूर्व पक्षके निराकरणके लिए है । सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, तथा जगत् की उत्पत्ति, सत्यानन्दी - दीपिका स्मृति तो चिन्तन आदि से भी सम्भव है । इसलिए मन्त्रोंका उच्चारण अदृष्ट फलको उत्पन्नकर उपकारक होता है, यह पूर्वं पक्ष है । मीमांसासिद्धान्तमें - ' अविशिष्टस्तु वाक्यार्थः ' ( जै ० सू ० १।२।४० ) ( लौकिक तथा वैदिक वाक्यार्थं समान है अर्थात् जैसे लोकमें वाक्य दृष्ट फलरूप अर्थवाला होता है वैसे ही वेदमें भी वाक्यत्व समान होनेसे मन्त्रोंका दृष्टार्थं रूप फल होना चाहिए, इसलिये मन्त्र दृष्टार्थक हैं अर्थात् उच्चारणसे प्रत्यक्ष फलवाले अर्थोंका ज्ञान कराकर यज्ञके उपकारक होते हैं ) क्योंकि जब दृष्ट फलका सम्भव हो तो अदृष्टार्थकी कल्पना गौरव मात्र ही है । इसलिए फल विशिष्ट यज्ञ आदि अनुष्ठानोंको जिन क्रियाओं और उनके साधनोंकी अपेक्षा होती है उनका स्मरण मन्त्रोंसे होता है । इस प्रकार मन्त्र कर्मके अङ्ग होते हैं । ' मन्त्रैरेवार्थः स्मर्तव्यः ' ( मन्त्रोंसे ही अर्थं ( देवता आदि ) का स्मरण करना चाहिए ) इस नियम के अनुसार मन्त्रोंका अदृष्ट फल भी होता है । अब प्रसङ्ग वश पर्दैकवाक्यता तथा वाक्यैकवाक्यताका विचार किया जाता है— अर्थवाद वाक्यमें अनेक पद होनेपर भी उन सबका स्तुति अथवा निन्दा एक ही अर्थ है, इससे अर्थवादवाक्यों को एक पद कहा गया है, इसलिए स्तुति आदि द्वारा अर्थवादकी विधिके साथ पदैकवाक्यता है । मन्त्र और अङ्गवाक्य स्वार्थंका बोध कराके विधि वाक्यमें अन्वित होते हैं, इसलिए विधि वाक्योंके साथ वाक्यार्थ ज्ञानद्वारा मन्त्र और अङ्गवाक्योंकी वाक्यैकवाक्यता है । सारांश यह है कि जैसे अर्थवाद वाक्य सिद्ध अर्थका ज्ञान कराते हुए विधेयकी स्तुतिद्वारा विधि वाक्योंके अङ्ग होकर सार्थक होते हैं, वैसे ही वेदान्त वाक्य भी सिद्ध ब्रह्म रूप अर्थका बोध कराते हुए विधिके अङ्ग होकर ही सार्थक हो सकते हैं अन्यथा नहीं, इसलिए वेदान्त वाक्योंको भी विधिका अङ्ग मानना चाहिए । * सि ० - वेदान्त वाक्योंको. अन्य विधिका अङ्ग माननेकी अपेक्षा ब्रह्ममें ही विधि क्यों न मानी जाय? पू ० - ' न च ' इत्यादिसे कहते हैं - सिद्ध वस्तु में विधि नहीं हो सकती, क्योंकि विधि क्रिया-विषयक होती है । सि ० - ' दना जुहोति ' ( दधिसे होन करे ) यहाँ सिद्ध वस्तु दधिमें विधि क्यों मानी गई है? पू ० यह विधि यागरूप क्रियाके लिए है, क्योंकि यागरूप क्रिया द्रव्य और देवताके विना सिद्ध नहीं हो सकती, इसलिए दधि द्रव्य यागरूप क्रिया सिद्धयर्थं होनेसे क्रिया ही है । किन्तु ब्रह्म तो निष्क्रिय होनेसे साध्य नहीं है, अतः वेदान्त - वाक्य कर्ममें अपेक्षित कर्ता, देवता आदिके स्वरूपका स्मरण कराते हुए विधिके अङ्ग हो सकते हैं, यह भट्टमत है । अब ' अथ ' इत्यादिसे दूसरे पक्षका उल्लेख करते हैं । इसलिए ' शास्त्रयोनित्वात् ' इस तृतीय सूत्र से ब्रह्म शास्त्र प्रमाणक सिद्ध नहीं हो सकता । इस प्रकार आक्षेप संगतिसे पूर्व पक्ष प्राप्त होनेपर भगवान् भाष्यकार ' उच्यते ' से सिद्धान्त पक्ष उपस्थित करते हैं । * इस चतुर्थ सूत्रकी विशेषता यह है कि इसमें एक ऐसा हेतु दिया गया है जो कि वेदान्त-
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५० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ वेदान्तशास्त्रादेवावगम्यते । कथम्? * समन्वयात् । सर्वेषु हि वेदान्तेषु वाक्यानि तात्प-येणैतस्यार्थस्य प्रतिपादकत्वेन समनुगतानि । ' सदेव सोम्येदमग्र आसीत् । ' ' एकमेवाद्वितीयम् ' . ( छान्दो ० ६ | २ | १ ) ' आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् ' ( ऐत ० २।१।१।१ ) ' तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपर-मनन्तरमबाह्यम् ’ । ‘ अयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूः ' ( बृह ० २।५।१ ९ ) ' ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्तात् ' ( मुण्ड ० २।२ स्थिति तथा लयका कारण भूत, वह ब्रह्म वेदान्त वाक्योंसे ही अवगत होता है । कैसे? समन्वयसे । क्योंकि ' सदेव सोम्य ० ( हे प्रियदर्शन! यह सब उत्पत्ति के पहले एकमात्र अद्वितीय सत् ही था ) ' आत्मा वा ० ( यह सब उत्पत्तिके पहले एकमात्र आत्मा ही था ) ' तदेतद् ' ( तत् - वह मायारूप उपाधिसे बहुत रूपोंको प्राप्त हुआ जो ब्रह्म है, एतद् - यह अपूर्व, ( कारण रहित ), अनपर ( कार्य रहित ), अनन्तर ( विजातीय द्रव्यसे रहित ), अबाह्य ( अद्वितीय ) है | यह आत्मा ही सबका अनुभव करने वाला ब्रह्म है ) ' ब्रह्मैवेदम् ' ( यह अमृत ( अविनाशी ) ब्रह्म ही आगे है ) इत्यादि वाक्य सब वेदान्तोंमें तात्पर्य से इसी अर्थ में प्रतिपादक रूपसे समनुगत अर्थात् समन्वित हैं । वेदान्त - वाक्योंमें प्राप्त सत्यानन्दी - दीपिका वाक्योंकी सार्थकताको स्पष्ट करता हैं । वह हेतु है ' समन्वय ' । सम्पूर्णं वेदान्त वाक्यं समन्वित तात्पर्य से सिद्ध वस्तु ब्रह्मका ज्ञान कराते हैं । अतः वे न तो कर्मके अङ्ग हैं और न उपासनाके ही, वेदान्त-वाक्योंका मुख्य तात्पर्यं ब्रह्म में है 1 । जैसे ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' सत्य, ज्ञान तथा अनन्त इन पदोंसे एक अखण्ड ब्रह्म ही अवगत होता है । किश्व उपक्रमादि लिङ्गों से भी वेदान्त - वाक्योंका तात्पर्य अद्वितीय ब्रह्ममें ही सिद्ध होता है । यथा - - ' ' उपक्रमोपसंहारवभ्यासोऽपूर्वताफलम् | अर्थवादोपपत्ती च लिङ्गं - तात्पर्यनिर्णये ॥ ” उपक्रम ( आरम्भ ), उपसंहार ( समाप्ति ) इन दोनोंकी एक वाक्यता, अभ्यास ( पुन: पुन: कथन ), अपूर्वता ( अन्य प्रमाणकी अविषयता ), फल ( मोक्ष ), अर्थवाद ( अद्वैत की स्तुति या द्वैतकी निन्दा द्योतक वाक्य ), उपपत्ति ( युक्ति ) ये तात्पर्यके निर्णायक लिङ्ग हैं । ' सदेव सोम्येदमग्र आसीत् ' ( छान्दो ० ६ । २ ।१ ) ( उद्दालक - हे सोम्य! यह सारा जगत् सृष्टिके पूर्वं सत् ही था ) इस श्रुति - वाक्य में ' एव ' शब्द नियमका वाचक है, यह ब्रह्मसे जगत् की भिन्न सत्ताका निषेध करता है अर्थात् ब्रह्मसे जगत् की भिन्न सत्ता नहीं है । ' एकमेवाद्वितीयम् ' इस वाक्य में ' एकम्, एव, अद्वितीयम् ' ये तीन पद क्रमशः, सजातीय, विजातीय और स्वगत भेदका ब्रह्ममें निषेध करते हैं । इस प्रकार अद्वितीय ब्रह्मका उपक्रमकर ' ऐतदात्म्यमिदं सर्वम् ' ( छान्दो ० ६ ८७ ) ( यह सब आत्म-स्वरूप ही है ) इस तरह उपसंहार किया है अर्थात् प्रकरणके आरम्भमें तथा अन्तमें एक अद्वितीय ब्रह्मका ही प्रतिपादन है! अभ्यास – ' तत्त्वमसि ' ( छान्दो ० ६६८७ ) ( वह तू ही है ) इस वाक्यका उपदेश उद्दालकने अपने पुत्र श्वेतकेतु के प्रति नौ वार किया है । यह पुनरुक्ति भी तात्पर्यं निर्णय में सहायक है । ' अपूर्वता - ' अत्र वाव किल सत् सोम्य न निभालयसेऽत्रैव किलेति ' ( छन्दो ० ६।१३।२ ) हे सोम्य! जैसे नमक जलमें रहता हुआ भी तुमको नहीं दिखाई देता, निश्चित इसी जलमें है, वैसे ही इस शरीर में विद्यमान सद्ब्रह्मका प्रत्यक्षादि प्रमाणसे अनुभव नहीं होता, किन्तु वेदान्त वाक्योंसे इसी शरीरमें उसका अपरोक्ष हो सकेगा ) ' तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि ' ( बृह ० ३।९ ।२६ ) " नावे-दविन्मनोते तं बृहन्तम् " इत्यादि वाक्यों द्वारा ब्रह्ममें अपूर्वता कही गई है अर्थात् ब्रह्म वेदान्तातिरिक्त प्रमाणका विषय नहीं है । फल – ' आचार्यवान् पुरुषो वेद ' तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्यें ' ( छान्दो ० ६।१४।२ ) ( आचार्यवान् पुरुष ही उस प्रत्यगभिन्न ब्रह्मतत्त्वको जानता है, उसके लिए मोक्ष होने में
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अधि ० ४ सू ० ४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५१ ( ११ ) इत्यादीनि । न च तद्गतानां पदानां ब्रह्मस्वरूपविषये निश्चिते समन्वयेऽवगम्यमानेऽ र्थान्तरकल्पना युक्ताः श्रुतहान्यश्रुतकल्पनाप्रसङ्गात् । न च तेषां कर्तृस्वरूपप्रतिपादनपरता-वसीयते, ' तत्केन कं पश्येत् ' ( बृह ० २।४।१३ ) इत्यादिक्रियाकारक फलनिराकरणश्रुतेः । न च परिनिष्ठित वस्तुस्वरूपत्वेऽपि प्रत्यक्षादिविषयत्वं ब्रह्मणः; ' तत्त्वमसि ' ( छान्दो ० ६।८।७ ) इति पदोंका ब्रह्मस्वरूपके विषय में निश्चित समन्वय जान लेनेपर अन्यार्थ ( कार्यरूप अर्थ ) की कल्पना युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा करनेसे श्रुत ( श्रुति प्रतिपादितब्रह्म अर्थ की हानि और अश्रुत - श्रुति अप्रतिपादित यागादि क्रिया ) अर्थकी कल्पना करनी पड़ेगी । और इन वाक्योंका कर्ताके स्वरूप प्रतिपादन में तात्पर्यं निश्चित नहीं हो सकता । क्योंकि ' तत्केन ० ' ( ब्रह्म विद्या कालमें कौन कर्ता, किस करणसे किस विषयको देखे ) इत्यादि श्रुति क्रिया, कारक और फलका निषेध करती है । सिद्ध वस्तु स्वरूप होनेपर भी ब्रह्म प्रत्यक्षादि प्रमाणोंका विषय नहीं है, क्योंकि ' तत्त्वमसि ' इस वेदान्त शास्त्रके विना ब्रह्मात्ममाव अवगत नहीं होता । हेयोपादेय रहित होनेसे ब्रह्मका उपदेश निष्फल है, यह जो कहा सत्यानन्दी - दीपिका उतना ही विलम्ब है जबतक उसका शरीर - लिङ्गशरीर पात नहीं होता ) इसमें ब्रह्मज्ञानका फल कहा गया है । अर्थवाद - श्वेतकेतुके अभिमान निवृत्तिके लिए पिता उद्दालकने पूछा क्या तुम उसे जानते हो ‘ येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति ' ( छान्दो ० ६ | १ | ३ ) ( जिसके द्वारा अश्रुत श्रुत, अमत मत, अविज्ञात विशेष रूपसे ज्ञात हो जाता है ) इत्मादि श्रुति वचन प्रशंसा रूप अर्थवाद है । ' मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानैव पश्यति ' ( कठ ० २।१० ) ( जो मनुष्य इस अद्वैत ब्रह्ममें नानात्व ( भेद - सा ) देखता है, वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है ) इत्यादि श्रुति वचन निन्दारूप अर्थवाद है । उपपत्ति - ' यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृण्मयं विज्ञातं स्यात् वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ( छा ० ६ ११४, ७ ) ( हे सोम्य! जिस प्रकार मृत्तिकाके पिण्ड द्वारा सम्पूर्णं मृण्मय घटादि पदार्थोंका ज्ञान हो जाता है, विकार केवल वाणीके आश्रयभूत नाममात्र हैं, क्योंकि मृत्तिकामें घटादि नाम और घटादि आकार कल्पित है, सत्य तो केवल मृत्तिका ही है ) जैसे घटादिकी अपने कारण भूत मृत्तिकासे भिन्न सत्ता नहीं है, वैसे ही आकाश आदि प्रपञ्च भी कारण ब्रह्मसे भिन्न नहीं है अर्थात् ब्रह्म ही है, यह उपपत्ति है । इस प्रकार प्रत्येक वेदान्तमें कहीं तात्पर्यके बोधक सब लिङ्ग और कहीं अलग - अलग देखनेमें आते हैं । माष्यस्थ ' आदि ' पदसे ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इत्यादि वाक्योंका ग्रहण करना चाहिए । वेदान्त - वाक्योंके तात्पर्यका विषय मले ही ब्रह्म हो, परन्तु उनका अर्थ यागादि रूप कार्य क्यों न हो? इस शङ्काका ' न च ' इत्यादि भाष्यसे समाधान करते हैं । * यहाँ अर्थवाद न्याय भी ठीक नहीं है, क्योंकि अर्थवाद वाक्योंका स्वार्थमें तात्पर्य नहीं होता । इसलिए वे यागादि क्रियाके अङ्गभूत द्रव्य देवता आदिके स्तुत्यर्थक होते हैं । परन्तु ' यत्परः शब्दः स शब्दार्थः ' ( जो शब्द जिस अर्थका प्रतिपादक होता है या जिस अर्थमें उसका तात्पर्य होता है, वही उस शब्दका अर्थ होता है ) इस न्यायसे भी विरोध होता है । इसलिए ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इन पदोंका तात्पर्यं ब्रह्ममें है और उनका अर्थ ब्रह्म ही है । मीमांसकने जो पहले कहा था कि ' जैसे घटादि सिद्ध पदार्थं प्रत्यक्षादि प्रमाणके विषय होनेसे वेदार्थ नहीं हैं, वैसे सिद्ध ब्रह्म मी प्रत्यक्षादि प्रमाणका विषय होने से वेदका अर्थ नहीं हो सकता अर्थात् ब्रह्ममें वेदप्रमाण नहीं है । इसपर ' न च ' इत्यादिसे कहते हैं । * जो यह कहा गया है कि वेदान्त उपासना परक हैं, क्या उनमें देवता आदिके प्रतिपादक
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५२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ ब्रह्मात्मभावस्य शास्त्रमन्तरेणानवगम्यमानत्वात् । यत्तु - हेयोपादेयरहितत्वादुपदेशानर्थ-क्यमिति, नैष दोषः: हेयोपादेय शून्यब्रह्मात्मतावगमादेव सर्वक्लेशप्रहाणात्पुरुषार्थसिद्धेः । देवतादिप्रतिपादनस्य तु स्ववाक्यगतोपासनार्थत्वेऽपि न कश्चिद्विरोधः । नतु तथा ब्रह्मण उपासनाविधिशेषत्वं संभवति; एकत्वे हेयोपादेयशून्यतया क्रियाकारकादिद्वैतविज्ञानोप-मदोपपत्तेः । नह्येकत्वविज्ञानेनोन्मथितस्य द्वैतविज्ञानस्य पुनः संभवोऽस्ति, येनोपासना-विधिशेषत्वं ब्रह्मणः प्रतिपद्येत । यद्यप्यन्यत्र वेदवाक्यानांनं विधिसंस्पर्शमन्तरेण प्रमाणत्वं दृष्टम् तथाप्यात्मविज्ञानस्य फलपर्यन्तत्वान्न तद्विषयस्य शास्त्रस्य प्रामाण्यं शक्यं प्रत्या-ख्यातुम् । न चानुमानगम्यं शास्त्रप्रामाण्यं, येनान्यत्र दृष्टं निदर्शनमपेक्ष्येत । तस्मात्सिद्धं ब्रह्मणः शास्त्रप्रमाणकत्वम् । * अत्रापरे प्रत्यवतिष्ठन्ते - यद्यपि शास्त्रप्रमाणकं ब्रह्म, तथापि गया है, वह दोष नहीं है, क्योंकि हेयोपादेय रहित ब्रह्मात्मभावके अवगत होनेसे ही सब क्लेशोंकी निवृत्ति और परमपुरुषार्थको सिद्धि होती है । यदि देवतादिके प्रतिपादक ( प्राण, पञ्चाग्नि आदि ) वाक्य वेदान्त वाक्यगत उपासना परक हों तो भी कोई विरोध नहीं है । परन्तु उसी प्रकार ब्रह्म उपासना विधिका अङ्ग नहीं हो सकता । एकत्व ज्ञान हो जानेपर ब्रह्म हेयोपादेय न होनेसे क्रिया, कारक आदि द्वैतकविज्ञानका बाध हो सकता है । एकत्व विज्ञानसे निवृत्त हुआ मिथ्या द्वैतज्ञानका फिर सम्भव नहीं है, जिससे कि ब्रह्म उपासना विधिका अंग प्राप्त हो । यद्यपि वेदान्त से भिन्न स्थलोंमें अर्थवाद आदि वेदवाक्योंकी विधिके साथ सम्बन्धके विना प्रमाणता देखनेमें नहीं आती, तो भी आत्मज्ञानको आत्मसाक्षात्कार फल पर्यन्त होनेसे ब्रह्म विषयक शास्त्रकी प्रमाणताका खण्डन नहीं किया जा सकता । शास्त्र प्रामाण्य अनुमानगम्य नहीं है जिससे कि वह अन्य स्थलोंमें देखे हुए दृष्टान्तोंकी अपेक्षा करे । इससे सिद्ध हुआ कि ब्रह्मशास्त्र प्रमाणक है । इस विषयमें दूसरे ( वृत्तिकार ) सत्यानन्दी - दीपिका प्राण, पञ्चाग्नि आदि वाक्य उपासना परक हैं अथवा सब वेदान्त? प्रथम पक्ष तो ' देवतादि ' से अंगीकार करते हैं । परन्तु दूसरा पक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि विधि शून्य ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' आदि वेदान्तवाक्य अपने अर्थ प्रतिपादन करने में सफल हैं, अतः वे उपासना परक नहीं हो सकते । किंश्च उन वेदान्तवाक्योंके अर्थरूप ब्रह्मको उपासनाका अंग ज्ञानसे पूर्व मानते हो अथवा पश्चात्? ज्ञानके पहले अध्यस्त गुणयुक्त ब्रह्म उपासनाका अंग भले हो, परन्तु तत्त्वज्ञानके अनन्तर नहीं, इसीको ' न तु तथा ' इत्यादिसे कहते हैं । ' तथा ' अर्थात् प्राणादि देवताके समान । ' ' वायुर्वैक्षेपिष्ठा देवता ' ( वायु शीघ्रगामी देवता है ) ' सोऽरोदीत् ' ( वह अग्नि रोया ) इत्यादि अर्थवाद वाक्य स्तुति या निन्दा द्वारा ही कर्मकाण्ड में विधिसे सम्बद्ध होकर प्रमाणताको प्राप्त होते हैं, अन्यथा नहीं । परन्तु ब्रह्म के यथार्थ स्वरूपके प्रतिपादक ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इत्यादि श्रुति-वाक्योंका प्रामाण्य तो किसी प्रकार भी हटाया नहीं जा सकता । ' वेदान्तः स्वतः प्रमाणं वेदत्वात् स्वर्गकामो यजेत इतिवत् ' वेदान्त वेद होनेसे स्वतः प्रमाण है, जैसे ' स्वर्यकामो यजेत ' इत्यादि वेदवाक्य होनेसे स्वतः प्रमाण हैं । इसलिए वेदान्तवाक्योंका प्रामाण्य अनुमानके अधीन नहीं है । अतएव उनको अपने प्रामाण्यमें किसी दृष्टान्तकी मी अपेक्षा नहीं है । जैसे ' यजेत ' इत्यादि विधिवाक्य फलवाले अज्ञात याग और स्वर्गादि प्रयोजनके ज्ञापक होनेसे प्रमाणरूप हैं, वैसे ही वेदान्तवाक्य भी पूर्व किसी अन्य प्रमाणसे अज्ञात जीव ब्रह्मैक्य अर्थका ज्ञान करानेसे प्रमाणरूप हैं इसप्रकार सम्पूर्ण वेदान्तवाक्य एक अद्वितीय ब्रह्ममें समन्वित हैं, अतः ब्रह्म में वेदान्त शास्त्र ही प्रमाण है । इसका विशेष विवेचन ' गतिसामान्यात् ' ( ब्र ० सू ० १ । १ । १० ) इस सूत्र में किया जायगा ।
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अधि ० ४ सू ० ४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५३ प्रतिपत्तिविधिविषयतयैव शास्त्रेण ब्रह्म समर्प्यते । यथा यूपाहवनीयादीन्यलौकिकान्यपि विधिशेषतया शास्त्रेण समर्प्यन्ते, तद्वत् । कुत एतत्? प्रवृत्तिनिवृत्तिप्रयोजनत्वाच्छास्त्रस्य । तथा हि - शास्त्रतात्पर्यविद आहु: - * ' दृष्टो हि तस्यार्थः कर्मावबोधनम् ' - ( जै ० सू ० १1१1१ ) इति । ' चोदनेति क्रियायाः प्रवर्तकं वचनम् ' | ' तस्य ज्ञानमुपदेश: ' - जै ० सू ० १।१।५ ) ' तद्भूतानां क्रियार्थेन पूर्व पक्ष करते हैं । यद्यपि ब्रह्म शास्त्र प्रमाणक ही है, तथापि प्रतिपत्ति ( उपासना ) विधिके विषय-रूपसे ही शास्त्र ब्रह्मका बोध कराता है । जैसे कि यूप, आहवनीय आदि अलौकिक पदार्थों का भी विधिके अङ्ग रूपसे शास्त्र बोध कराता है । ऐसा क्यों? शास्त्र प्रवृत्ति तथा निवृत्ति प्रयोजनवाला है । इस अर्थमें शास्त्रके तात्पर्यको जाननेवाले कहते हैं - ' दृष्टो हि ० ' ( कर्मोंका ज्ञान कराना ही शास्त्रका दृष्ट फल है ) और ' चोदनेति ० ' ( क्रियाका प्रवर्तक वचन चोदना है ) ' तस्य ० ' ( धर्मका ज्ञापक अपौरुषेय विधि - वाक्य - स्वर्गकामो यजेत आदि उपदेश है ) ' तद्भूतानां ० ( वेदमें सिद्ध अर्थके वाचक पदोंका सत्यानन्दी - दीपिका * ब्रह्म केवल वेदान्त शास्त्र वेद्य है । यह जानकर वृत्तिकार ( उपवर्षाचार्य ) शंका करते हैं पूर्वपक्षमें उपासनासे मुक्तिरूप फल होता है, वेदान्त सिद्धान्त में तत्त्वज्ञान से ही मुक्ति होती है | यद्यपि ब्रह्ममें शास्त्र प्रमाण है, तथापि ' आत्मेत्येवोपासीत् ' यह उपासना विधि है । इस उपासना विधिका विषय ब्रह्म है । उपास्य विना उपासना नहीं हो सकती, इसलिए उपासनाका विधिके विषयभूत ब्रह्ममें भी अवान्तर तात्पर्य है । ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इत्यादि वाक्य उस उपास्य ब्रह्म स्वरूपका प्रतिपादन करते हैं । इसका दृष्टान्तसे स्पष्टीकरण करते हैं-- जैसे ' यूपे पशुं बध्नाति ' ( यज्ञ स्तम्भमें पशुको बाँधे ) ' आहवनीये जुहोति ' ( + आहवनीय अग्निमें हवन करे ) ' इन्द्रं यजेत ' ( इन्द्रका यजन करे ) इन विधियोंमें यूप आदि क्या है? ऐसी जिज्ञासा होनेपर ' यूपं तक्षति ' ( लकड़ीको तक्षण करता है ) अर्थात् लकड़ीको छीलकर आठ कोणवाली बनाता है इस प्रकार संस्कृत लकड़ी यूप कही जाती है । ' अग्निमादधीत ' ( अग्निका आधान करे ) इस प्रकार आधानसे संस्कृत अग्नि आहवनीय है । ' वज्रहस्तः पुरन्दरः ' ( जिसके हाथमें वज्र है वह इन्द्र है, इत्यादि वाक्य विधिके शेष भूत अलोकिक यूप आहवनीय, इन्द्र आदिका प्रतिपादनकर प्रमाणरूप होते हैं अन्यथा नहीं । इसी प्रकार ' आत्मेत्येवोपासीत ' आदि विधि शेष आत्माके ' अयमात्मा ब्रह्म ' इत्यादि वाक्य प्रतिपादक हैं, वे भी अलौकिक ब्रह्मात्माका विधि अङ्ग रूपसे वर्णनकर प्रमाणभूत होते हैं । परन्तु उपक्रम - उपसंहारादि लिङ्गों से वेदान्त शास्त्रका तात्पर्य ब्रह्म ही है तो फिर ब्रह्मको उपासना विधिका अङ्ग क्यों माना जाय? पू ० - शास्त्रके तात्पर्यका निश्चय आप्त वक्ताओंके परम्परा व्यवहारसे होता है । वृद्ध व्यवहारसे यह प्रतीत होता है कि आप्त पुरुष श्रोताकी प्रवृत्ति और निवृत्तिके उद्देश्यसे शब्दका व्यवहार करते हैं । इसी प्रकार शास्त्रके भी प्रवृत्ति और निवृत्ति रूप प्रयोजन हैं । वह भी विधिज्ञान ( कार्य ज्ञान ) से उत्पन्न होता है, अतः वेदान्त शास्त्रका भी विधिमें ही तात्पर्य है, ब्रह्म में नहीं, इसलिए ब्रह्मको भी विधिका अङ्ग मानना चाहिए । इस विषय में वृद्धोंकी भी सम्मति है । * ‘ दृष्टो हि तस्यार्थः ' यह शबर स्वामीकी सम्मति है । ' यजेत, जुहोति इत्यादि वाक्य चोदना + ' पिता वै गार्हपत्योऽग्निर्माताऽग्निर्दक्षिणःस्मृतः । गुरुराहवनीयस्तु साग्नित्रेता गरीयसी ' ( मनु ० २।२३१ ) ( पिता गार्हपत्य अग्नि है, माता दक्षिण अग्नि है, गुरु आहवनीय अग्नि है | ये तीन अग्नि सर्वश्रेष्ठ हैं ) । गृहस्थके घरमें जो हवन आदिके लिए नित्य अग्नि रहता है वह गार्हपत्य है । इससे अन्य अग्नि ग्रहण किये जाते हैं । ' गार्हपत्यादाहवनीयं ज्वलन्तमुद्धरेत् ' ( आश्व ० श्री ० २।२ ) गार्हपत्य से आहवनीयको जलता हुआ लावे | )
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५४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ समाम्नायः'- ( जै ० सू ० १।१।२५ ) ' आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम् - ' ( जै ० सू ० १।२।१ ) इति च । अतः पुरुषं क्वचिद्विषयविशेषे प्रवर्तयत्कुतश्चिद्विषयविशेषान्निवर्तयच्चार्थवच्छास्त्रम् । तच्छेषतया चान्यदुपयुक्तम् । तत्सामान्याद्वेदान्तानामपि तथैवार्थवत्त्वं स्यात् । * सतिच विधिपरत्वे यथा स्वर्गादिकामस्याग्निहोत्रादिसाधनं विधीयत एवममृतत्वकामस्य ब्रह्म-ज्ञानं विधीयत इति युक्तम् । नन्विह जिज्ञास्यवैलक्षण्यमुक्तं कर्मकाण्डे भव्यो धर्मो जिज्ञास्यः; इह तु भूतं नित्यनिवृत्तं ब्रह्म जिज्ञास्यमिति तत्र धर्मज्ञानफलादनुष्टानापेक्षाद्विलक्षणं ब्रह्मज्ञानफलं भवितुमर्हति । नार्हत्येवं भवितुम्; कार्यविधिप्रयुक्तस्यैव ब्रह्मणः प्रतिपाद्य-मानत्वात् । ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' ( बृह ० २।४।५ ) इति । ' य आत्माऽपहतपाप्मा ', क्रिया वाचक पदोंके साथ उच्चारण करना चाहिए ) ' आम्नायस्य ० ' ( वेद क्रियार्थक है, अत क्रियांसे भिन्न सिद्ध अर्थ प्रतिपादक वेद वाक्य निष्फल हैं ) इसलिए पुरुषको किसी एक विषय में प्रवृत्त करता हुआ और किसी एक विषय विशेषसे निवृत्त करता हुआ शास्त्र सार्थक होता है और दूसरे वाक्य इसके अंगभूत होकर उपयुक्त होते हैं । उनके साथ समानता होनेसे वेदान्त वाक्य भी उसी प्रकार सार्थक होते हैं । यदि [ वेदान्त - वाक्य ] विधिपरक हों तो जैसे स्वर्ग आदि कामना वाले पुरुषके लिए अग्निहोत्र आदि साधनों का विधान है, वैसे ही अमृतत्वकी कामना करनेवाले के लिए भी ब्रह्मज्ञानका विधान किया जाता है, ऐसा मानना युक्त है । यदि कहो कि यहाँ जिज्ञास्यका वैलक्षण्य ( भेद ) कहा गया है, कर्मकाण्डमें साध्य धर्म जिज्ञास्य है और ज्ञानकाण्डमें तो नित्य निवृत्त, सिद्ध ब्रह्म जिशास्य है । उनमें अनुष्ठानकी अपेक्षा रखनेवाले धर्मज्ञानके फलसे ब्रह्मज्ञानका फल विलक्षण होना चाहिए । ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि कर्मविधिसे प्रयुक्त होकर ही ब्रह्म प्रतिपाद्यमान है | ' आत्मा ० ' ( याज्ञ-सत्यानन्दी - दीपिका कहलाते हैं । क्रिया, कार्य, कर्म, नियोग, विधि, धर्म और अपूर्व इन सबका एक ही अर्थ है । कहीं तो शास्त्र पुरुषको सुखके साधनमें प्रवृत्त करता हुआ सफल होता है, जैसे ' ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत ' और कहीं दुःखके साधन सुरापान, हिंसा आदिसे पुरुषको निवृत्त करता हुआ सार्थक होता है, जैसे ' सुरां न पिबेत् ' इसलिए विधि, निषेधात्मक वाक्य ही शास्त्र है । उससे भिन्न अर्थवाद आदि वाक्य विधि तथा निषेध वाक्योंके अङ्ग होकर सार्थक होते हैं । अतः कर्मशास्त्र के समान वेदान्तशास्त्र भी शास्त्र है, इस कारण वेदान्त भी क्रियार्थक होकर सार्थक हो सकता है । परन्तु यज्ञादि क्रियाओंके समान वेदान्तमें अधिकारी और विधेय देखने में नहीं आते तो वेदान्तसे कार्यका ज्ञान कैसे होगा? ' सति च ' आदि से समाधान करते हैं । * पूर्वपक्षी - ' सति विधिपरत्वे ' इस भाष्यसे अधिकारी और विधेय सिद्ध करता है, जैसे ' स्वर्गकामो यजेत ' यहाँ स्वर्गकी कामनावाला पुरुष अधिकारी है और उनके लिए अग्निहोत्रादि विधेय हैं । इसी प्रकार ' ब्रह्मभावकामो ब्रह्मवदनं कुर्यात् ' ( भावकी कामनावाला ब्रह्मज्ञान प्राप्त करे ) ' मोक्षकाम आत्मानमुपासीत् ' ( प्रभाकर - मोक्षकी कामनावाला आत्माकी उपासना करे ) अर्थात् ' आत्मो-पासनेन मोक्षजनकं अदृष्टं सम्पादयेत् ' अथवा ' आत्मोपासनजन्यादृष्टेन मोक्षं भावयेत् ' ( आत्मो-पासना से मोक्ष जनक अदृष्ट संपादन करे अथवा आत्मोपासनजन्य अदृष्टसे मोक्षकी भावना करे ) अर्थात् यहाँ अमृतत्वकी कामना करनेवाला पुरुष अधिकारी है और उस फलको प्राप्तिका साधन ब्रह्मज्ञान विधेय है । परन्तु ' अथातो धर्मजिज्ञासा ' तथा ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' इन दोनों सूत्रों की आचार्यों द्वारा पृथक् रचनासे यह सिद्ध होता है कि ब्रह्मज्ञान नित्य फलवाला होनेसे कर्मकी तरह विधेय नहीं है ।
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अधि ० ४ सू ० ४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५५. सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्य: ' ( छान्दो ० ८ | ७ | १ ) ' आत्मेत्येवोपासीत ' ( बृ ० १।४।७ ) आत्मान-मेव लोकमुपासीत ' ( बृ ० १।४।१५ ) ' ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति ' ( मुण्ड ० २।२।९ ) इत्यादिविधानेषु सत्सु - ' कोऽसावात्मा, किं तद्ब्रह्म? ' इत्याकाङ्क्षायां तत्स्वरूपसमर्पणेन सर्वे वेदान्ता उपयुक्ताः- - ' 1 नित्यः सर्वज्ञः सर्वगतो नित्यतृप्तो नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावो विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' इत्येवमादयः । * तदुपासनाच्च शास्त्रदृष्टोऽदृष्टो मोक्षः फलं भविष्यतीति । कर्तव्यविध्यन-प्रवेशे वस्तुमात्रकथने हानोपादानासंभवात् ' सप्तद्वीपा वसुमती ', ' राजासौ गच्छति ' इत्यादिवाक्यवद्वेदान्तवाक्यानामानर्थक्यमेव स्यात् । ननु वस्तुमात्रकथनेऽपि ' रज्जुरियं नायं सर्पः ' इत्यादौ भ्रान्तिजनितभीतिनिवर्तनेनार्थवत्त्वं दृष्टं तथेहान्यसंसार्यात्मवस्तुकथ-नेन संसारित्व भ्रान्ति निवर्तनेनार्थवत्त्वं स्यात् । स्यादेतदेवम्, यदि रजुस्वरूपश्रवण इव सर्प-भ्रान्तिः " संसारित्वभ्रान्तिर्ब्रह्मस्वरूपश्रवणमात्रेण निवर्तत, न तु निवर्ततेः श्रुतब्रह्मणोऽपि यथापूर्वं सुखदुःखादिसंसारिधर्मदर्शनात्, ' श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः ' ( बृह ० २।४।५ ) इति च श्रवणोत्तरकालयोर्मनननिदिध्यासनयोर्विधिदर्शनात् । तस्मात्प्रतिपत्तिविधिविषय-वल्क्य -- हे मैत्रेयी! आत्माका साक्षात्कार करना चाहिए ) ' य आत्मा ० ' ( आत्मा पापरहित है. वह खोज करने योग्य है उसकी जिज्ञासा करनी चाहिए ) ' आत्मव्ये ० ' ( आत्मा है ऐसी उपासना करे ) ' आत्मानमेव ० ' ( ज्ञानस्वरूप आत्माकी उपासना करे ) ' ब्रह्मवेद ० ' ( ब्रह्मको जाननेवाला ब्रह्म ही होता है ) इत्यादि विधानोंके होनेपर ' वह आत्मा कौन है? वह ब्रह्म क्या है? ' ऐसी आकांक्षा होनेपर ब्रह्मके स्वरूपका बोध करानेके लिए ' नित्यः सर्वज्ञः सर्वगतः ० ' ( नित्य सर्वज्ञ और सर्वगत नित्यतृप्त है ) ' नित्यशुद्ध ० ' ( ब्रह्म नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभाव है ) ' विज्ञानं ० ' ( ब्रह्म विज्ञान और आनन्द स्वरूप ) इत्यादि वेदान्त वाक्य उपयुक्त होते हैं । उस ब्रह्मकी उपासनासे शास्त्र अवगत अदृष्ट मोक्षरूप फल. होगा । यदि वेदान्त - वाक्य कर्तव्य विधिके साथ असम्बद्ध होकर वस्तुमात्रका कथन करनेवाले हों तो हानो-पादानका असंभव होनेसे ' सप्तद्वीपा वसुमती ' ( सात द्वीपावली पृथ्वी है ) ' यह राजा जाता है ' इत्यादि वाक्योंके समान वेदान्त - वाक्य प्रयोजन रहित हो जायंगे । परन्तु ' यह रज्जु है सर्प नहीं है ' इत्यादि वस्तु मात्रके कथनमें भी भ्रान्तिसे जनित भयकी निवृत्ति द्वारा अर्थवत्ता ( सार्थकता ) देखी गई है । उसी प्रकार यहाँ प्रसंगमें भी असंसारी आत्मवस्तु के कथनसे संसारित्व भ्रान्तिकी निवृत्ति द्वारा सार्थकता होगी । ऐसा तभी हो सकता है जब कि रज्जु - रूप वस्तुके श्रवणसे जैसे सर्प - भ्रान्ति निवृत्त हो जाती है, वैसे ही ब्रह्म-स्वरूपके श्रवणमात्रसे श्रोताकी संसारित्व भ्रान्ति निवृत्त हो । परन्तु वह निवृत्त नहीं होती, क्योंकि ब्रह्मका श्रवण करनेवाले व्यक्ति में भी पूर्वके समान सुख - दुःखादि संसारिधर्मं देखने में आते हैं । अतएव ' श्रोतव्यो ० ' ( आत्मा श्रोतव्य, मन्तव्य और निदिध्यासितव्य है ) इस प्रकार श्रवणके उत्तरकालके मनन और निदिध्यासनकी विधि देखने में आती है । इसलिए यह स्वीकार करना चाहिए कि उपासना सत्यानन्दी -दीपिका * यदि ज्ञानसे मुक्ति होती तो श्रवणसे उत्पन्न ज्ञानके अनन्तर मनन और निदिध्यासनका विधान न होता । प्रत्यक्ष अनुभव और मननादिके विधान से यह सिद्ध होता है कि वेदान्तोंके श्रवण मात्रसे मोक्ष नहीं होता, किन्तु ब्रह्मकी उपासनासे होता है । प्रवृत्ति तथा निवृत्तिरूप फलके प्रतिपादक वाक्य ही शास्त्र कहलाते हैं । परन्तु सिद्ध अर्थं ब्रह्मके प्रतिपादक वेदान्त वाक्य प्रवृत्ति निवृत्ति रहित होनेसे तथा श्रवणानन्तर मननादिकी विधि होनेसे उपासना विधिके अङ्ग हैं । उपासना भी एक प्रकार से कर्म है, अतः कर्म रूपसे ही शास्त्र ब्रह्ममें प्रमाण है । यह पूर्वपक्षीका अभिप्राय है ।
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५६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पाद १ तयैव शास्त्रप्रमाणकं ब्रह्माभ्युपगन्तव्यमिति । 8 अत्राभिधीयते - नः कर्म ब्रह्मविद्याफलयो-वैलक्षण्यात् । शारीरं वाचिकं मानसं च कर्म श्रुतिस्मृतिसिद्धं धर्माख्यं, यद्विषया जिज्ञासा ' अथातो धर्म - जिज्ञासा ' ( जै ० सू ० १1१1१ ) इति सूत्रिता; अधर्मोऽपि हिंसादिः प्रतिषेधचोदनाल-क्षणत्वाजिज्ञास्यः परिहाराय । तयोश्रोदनालक्षणयोरर्थानर्थयोर्धर्माधर्मयोः फले प्रत्यक्षे सुखदुःखे शरीरवाङ्मनोभिरे वोपभुज्यमाने विषय येन्द्रियसंयोगजन्ये ब्रह्मादिषु स्थावरा-न्तेषु प्रसिद्धे । & मनुष्यत्वादारभ्य ब्रह्मान्तेषु देहवत्सु सुखंतारतम्यमनुश्रूयते ततश्च तद्धे-तोर्धर्मस्य तारतम्यं गम्यते । धर्मतारतम्यादधिकारितारतम्यम् । प्रसिद्धं चार्थित्वसाम-र्थ्यादिकृतमधिकारितारतम्यम् । तथा च यागाद्यनुष्ठायिनामेव विद्यासमाधिविशेषादुत्तरेण पथा गमनं, केवलैरिष्टापूर्तदत्तसाधनैर्धूमादिक्रमेण दक्षिणेन पथा गमनं, तत्रापि सुखतार-विधिका विषय होनेसे ही ब्रह्म शास्त्र प्रमाणक है । इसके उत्तर में सिद्धान्ती कहते हैं ऐसा नहीं है, क्योंकि कर्म और ब्रह्मविद्या के फलमें वैलक्षण्य है । कायिक, वाचिक और मानसिक कर्म श्रुति और स्मृति धर्म नाम से प्रसिद्ध हैं । जिस विषयक जिज्ञासा ' अथातो धर्मजिज्ञासा ' ( वेदाध्ययनके अनन्तर धर्मकी जिज्ञासा करनी चाहिए । इस सूत्र में प्रतिपादित है । इसके साथ ही परिहारके उद्देश्यसे वर्णित प्रतिषेध चोदनात्मक होने से हिंसा आदि रूप अधर्म भी जिज्ञास्य है । और इस चोदनात्मक अर्थ और अनर्थरूप धर्माधर्मका शरीर, वाणी और मन द्वारा उपभुज्यमान तथा विषयेन्द्रिय संयोगसे जन्य प्रत्यक्ष सुख - दुःखरूप फल ब्रह्मादिसे लेकर स्थावर पर्यन्त सबमें प्रसिद्ध ही है । मनुष्यसे लेकर ब्रह्मा पर्यन्त सभी शरीर धारियोंमें सुखका तारतम्य श्रुति कहती है । उससे सुखके साधनभूत धर्मका तारतम्य ज्ञात होता है । धर्मके तारतम्यसे अधिकारीका तारतम्य अवगत होता है । किञ्च फल कामना एवं द्रव्य-रूप सामर्थ्यं आदि कारणोंसे तो अधिकारीका तारतम्य प्रसिद्ध है । और इस प्रकार यागादि अनुष्ठान करनेवाले लोग ही उपासना रूप समाधि विशेषके बलसे उत्तर मार्गसे जाते हैं, तथा केवल इष्ट, पूर्त और दत्त रूप साधनोंसे सम्पन्न पुरुष धूमादि क्रमसे दक्षिण मार्गके द्वारा जाते हैं । वहाँ भी सुखका तारतम्य और इसके साधनोंका तारतम्य यह सब ' यावत्संपात मुषित्वा ० ( वहाँ कर्मोंका क्षय होने तक सत्यानन्दी - दीपिका * ‘ मोक्षकामो ब्रह्मवेदनं कुर्यात् ' इस प्रकार जो मुमुक्षु अधिकारीके लिए ब्रह्मज्ञान विधेय कहा गया है, वह युक्त नहीं है, क्योंकि ब्रह्मस्वरूप नित्य मोक्ष उपासना आदि किसी विधिसे जन्य नहीं है । कर्मोपासनादिका फल जन्य होने से अनित्य है । इस प्रकार दोनोंमें वैलक्षण्य है । किश्व ' स्वर्गकामो यजेत ' इत्यादि विधि वाक्योंसे जैसे धर्म जिज्ञास्य है, वैसे ' मा हिंस्यात् सर्वा भूतानि ' इत्यादि निषेधात्मक वाक्योंसे अधर्म भी जिज्ञास्य है । इस प्रकार विधि तथा निषिद्ध वाक्योंसे धर्म और अधर्म का समानरूपसे ज्ञान होता है । धर्मका फल सुख और अधर्मका फल दुःख ब्रह्मांसे लेकर स्थावर पर्यन्त सब प्राणियों में प्रसिद्ध है । * धर्म तथा उपासना जन्य सुखका तारतम्य इस प्रकार है । सर्व प्रथम मानवीय स्तरके पूर्ण आनंदको श्रुति दिखलाती है— ' सैषानन्दस्य मीमांसा भवति । युवास्यात्साधु युवाध्यायक आशिष्टो टो बलिष्टस्तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात् । स एको मानुष आनन्द: ' ( तै ० २८1१ ) अब यह [ ब्रह्मके ] आनन्दकी मीमांसा है - साधु स्वभाव वाला नवयुवक, वेद पढ़ा हुआ, अत्यन्त आशावान्, अत्यन्त दृढ और बलिष्ठ हो, एवं उसकी यह धन धान्यसे पूर्ण पृथिवी भी हो अर्थात् वह सम्पूर्ण पृथ्वी मण्डलका एकमात्र छत्रपति हो उसका जो आनंद है वह एक मानुष आनन्द है वह आनन्द मनुष्यलोकमें मानवीय स्तरका पूर्ण आनन्द कहा जाता है । मनुष्य, मनुष्य गन्धर्व, देव गन्धर्व,