श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 721–730
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 721–730
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अधि ० १४ सू ० २५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ६८७ तद्द्वारेण च हृदयं प्रविध्येत्येवंजातीयकानां मन्त्राणामुपपन्नमुपासना ङ्गत्वम् । दृष्टश्वो-पासनेष्वपि मन्त्रविनियोगः - ' भूः प्रपद्येऽमुनामुनामुना ' ( छा ० ३ | १५/३ ) इत्येवमादिः । तथा प्रवर्ग्यादीनां कर्मणामन्यत्रापि विनियुक्तानां सतामविरुद्धो विद्यासु विनियोगो वाजपेय इव बृहस्पतिसवस्येति । * एवं प्राप्ते ब्रूमः - नैषामुपसंहारो विद्यास्विति । कस्मात्? वेधाद्यर्थभेदात् । हृदयं प्रविध्येत्येवंजातीयकानां हि मन्त्राणां येऽर्था हृदयवेधादयो भिन्ना अनभिसंबद्धास्त उपनिषदुदिताभिर्विद्याभिः, न तेषां ताभिः संगन्तुं सामर्थ्यमस्ति । ननु हृदयस्योपासनेष्वप्युपयोगात्तद्वारक उपासनासम्बन्ध उपन्यस्तः, नेत्युच्यते, हृदय-मात्र संकीर्तनस्य ह्येवमुपयोगः कथंचिदुत्प्रेक्ष्येत, नच हृदयमात्रमत्र मन्त्रार्थः । हृदयं प्रविध्य धमनीः प्रवृज्येत्येवंजातीयको हि न सकलो मन्त्रार्थो विद्याभिरभिसंबध्यते, आभिचारिक विषयो ह्येषोऽर्थः । तस्मादाभिचारिकेण कर्मणा सर्वे प्रविध्येत्येतस्य मन्त्र-स्याभिसंबन्धः । तथा ' देव सवितः प्रसुव यज्ञम् ' इत्यस्य यज्ञप्रसवलिङ्गत्वाद्यज्ञेन कर्मणा संबन्धः, तद्विशेषसंबन्धस्तु प्रमाणान्तरादनुसर्तव्यः । एवमन्येषामपि मन्त्राणां केषां -चिल्लिङ्गेन, केषांचिद्वचनेन, केषांचित्प्रमाणान्तरेणेत्येवमर्थान्तरेषु विवियुक्तानां रहस्य-पठितानामपि सतां न संनिधिमात्रेण विद्याशेषत्वोपपत्तिः । दुर्बलो हि संनिधिः मन्त्रोंको उपासना अङ्गत्व उपपन्न है । उपासनाओं में भी ' भूः प्रपद्येऽमुना ० ' ( इस पुत्रके साथ मैं भूलोकको प्राप्त होता हूँ ) इत्यादि मन्त्रोंका विनियोग देखा गया है । इसीप्रकार अन्यत्र विनियुक्त होते हुए प्रवग्यं यदि कर्मोंका विद्यामें विनियोग वाजपेयमें बृहस्पतिसव के समान अविरुद्ध है । सिद्धान्ती — ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं— इन मन्त्रों और कर्मोंका विद्याओं में उपसंहार नहीं है, किससे? वेध आदि अर्थका भेद होनेसे । ' हृदयं प्रविध्य ' इसप्रकारके मन्त्रोंके जो मर्थ हैं, वे उपनिषद् में उक्त विद्याओंसे भिन्न सम्बन्ध रहित हैं, इसलिए उन मन्त्रोंमें उन विद्याओंके साथ सम्बन्ध होनेकी सामर्थ्यं नहीं है । परन्तु हृदयका उपासनाओं में उपयोग होनेसे उनके द्वारा उपासनाके साथ सम्बन्ध उपन्यस्त है? नहीं, ऐसा कहते हैं- हृदय संकीर्तन मात्र के इसप्रकार के उपयोग की मले किसी प्रकार कल्पना की जाय, परन्तु यहाँ केवल हृदय आथवंण मन्त्रका अर्थ नहीं है । ' हृदयं प्रविध्य धमनीः प्रवृज्य ' इसप्रकारका सम्पूर्ण मन्त्रार्थं विद्याओंके साथ अभिसम्बन्धित नहीं होता, क्योंकि यह अभिचार विषयक अर्थ है, इसलिए ' सर्वं प्रविध्य ' ( शत्रुके सब अङ्गोंको विदीरण कर ) इस मन्त्रका आभिचारिक कर्मके साथ सम्बन्ध है । उसी प्रकार ' देव सवितः प्रसुव यज्ञम् ' इस मन्त्रका यज्ञप्रसव लिङ्गसे यज्ञकर्मके साथ सम्बन्ध है । उसका विशेष सम्बन्ध तो अन्य प्रमाणसे अनुसन्धान करना चाहिए । इसीप्रकार अन्य कुछ मन्त्रोंका भी लिङ्गसे, कुछका वचनसे, कुछका अन्य प्रमाण ( प्रक-रण ) से, ऐसे अन्य अर्थों में विनियोग हुआ है और रहस्य - उपनिषद् में पठित होते हुए भी संनिधि-मात्रसे उनका विद्याशेषत्व उपपन्न नहीं होता, क्योंकि ' श्रुतिलिङ्गवाक्य ० ' ( श्रुति, लिङ्ग, वाक्य, सत्यानन्दी - दीपिका नहीं है । जैसे ' ब्रह्मवर्चसकामो बृहस्पतिसवेन यजेत ' ( ब्रह्मतेजकी कामनावाला बृहस्पतिसव नामका यज्ञ करे ) इस वाक्यसे ब्रह्मवचंस फल में विनियुक्त बृहस्पतिसवका ' वाजपेयेनेष्ट्वा बृहस्पतिसवेन यजेत ' ( वाजपेय यज्ञकर बृहस्पतिसव याग करें ) वाजपेय प्रकरण में स्थित इस वाक्यसे वाजपेयके उत्तर अङ्गरूपसे विरोध नहीं है । पूर्वपक्ष में इन मन्त्रों और कर्मोंका उत् तत् संनिहित विद्यामें उपसंहार होता है, सिद्धान्त में उपसंहार नहीं होता । * पूर्वपक्षीने पहले यह कहा था कि लिङ्गादिसे यद्यपि प्रवर्ग्यादि कर्म अन्यत्र प्रयुक्त होते हैं तो मी संनिधिके बलसे विद्यामें भी इनका विनियोग हो सकता है, क्योंकि विरोध · नहीं है । इसपर सिद्धान्ती ' तथा ' इत्यादिसे आगे कहते हैं-
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६८८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ श्रुत्यादिभ्य इत्युक्तं प्रथमे तन्त्रे - ' श्रुतितिवाक्यप्रकरणस्थानसमाख्यानां समवाये पारदौर्वस्य-मर्थविप्रकर्षात् ' ( जै ० सू ० ३ | ३ | १३ ) इत्यत्र । * तथा कर्मणामपि प्रवर्ग्यादीनामन्यत्र विनि-युक्तानां न विद्याशेषत्वोपपत्तिः, न ह्येषां विद्याभिः सहैकार्थ्यं किंचिदस्ति । वाजपेये तु बृहस्पतिसवस्य स्पष्टुं विनियोगान्तरम् - " वाजपयेनेष्ट्वा बृहस्पतिसवेन यजेत ' इति । अपि चैकोऽयं प्रवर्ग्यः सकृदुत्पन्नो बलीयसा प्रमाणेनान्यत्र विनियुक्तो न दुर्बलेन प्रमाणेना-न्यत्रापि विनियोगमर्हति । अगृह्यमाणविशेषत्वे हि प्रमाणयोरेतदेवं स्यान्नतु बलवद-बलवतोः प्रमाणयोर गृह्यमाणविशेषता संभवति, बलवदबलवत्त्वविशेषादेव । तस्मादेवं-जातीयकानां मन्त्राणां कर्मणां वा न संनिधिपाठमात्रेण विद्याशेषत्वमाशङ्कितव्यम् । अरण्यानुवचनादिधर्मसामान्यान्तु संनिधिपाठ इति संतोष्टव्यम् ॥ २५ ॥
( १५ हान्यधिकरणम् । सू ० २६ ) हानौ तूपाय नरब्दशेषत्वात्कुशा च्छन्दस्तुत्युपगानवत्तदुक्तम् । २६ ॥ पदच्छेद- हानौ, तु, उपायनशब्दशेषत्वात् कुशा च्छन्दस्तुत्युपगानंवत्, तत्, उत्तम् । सूत्रार्थ - ( हानी ) जिन श्रुतियोंमें ब्रह्मज्ञानियों के अन्त समय में ( तु ) केवल पापकी हानि सुनी जाती है, वहाँपर पुत्र आदिके द्वारा दाय आदि उपायनका भो उपादान करना चाहिए, ( उपायन-शब्दशेषत्वात् ) क्योंकि उपायनशब्द हानशब्द अङ्गरूपसे कहा गया है, ( कुशाच्छन्दस्तुत्युपगानवत् ) इसे पूर्वमीमांसा में प्रतिपादित कुशा, छन्द, स्तुति और उपगानके समान समझना चाहिए, ( तदुक्तम् ) कारण कि ' अपितु वाक्यशेषत्वात् ' इस जैमिनीय सूत्रमें ऐसा ही कहा गया है । अथवा हानिशब्द विधूनन अर्थमें ही समझना चाहिए, क्योंकि उपायनयन्दके समीप पठित विधूननशब्द उपाय शब्दका अङ्ग है इसमें पूर्वके समान कुशा आदि दृष्टान्त दिया गया है । अस्ति ताण्डिनां श्रुतिः - ' अश्व इव रोमाणि विधूय पापं चन्द्र इव राहोर्मुखात्प्रमुच्य प्रकरण, स्थान, समाख्याके समवाय- एक ही विषय में यथासम्भव एकसे अधिकका समावेश प्राप्त होनेपर पूर्व - पूर्व की अपेक्षा पर दुर्बल होता है - बाधित होता है, क्योंकि अर्थ- बङ्गाङ्गिनिर्णयरूप विनियोगको बोधन कराने में व्यवहित होने के कारण विलम्बित हो जाता है ) इससूत्र में श्रुति आदिसे संधि दुर्बल है, ऐसा पूर्वमीमांसा ग्रन्थमें कहा गया है । इसीप्रकार अन्यत्र विनियुक्त प्रवग्यं आदि मं भी विद्याके शेष नहीं हो सकते, क्योंकि इनकी विद्याके साथ किश्विदपि एकार्थता नहीं है और ' वाजपेयेनेष्ट्वा ० ' ( वाजपेय याग कर बृहस्पति सव नामक याग करे ) इसप्रकार वाजपेय में तो बृहस्पति-सवका अन्य विनियोग स्पष्ट है । और यह एक प्रवग्यं कर्म एक वार उत्पन्न होकर बलवान् प्रमाणसे एकत्र विनियुक्त हो पुन । उसका दुर्बल प्रमाणसे अन्यत्र भी विनियोग हो, यह युक्त नहीं है, क्योंकि दो प्रमाणों में विशेषता गृहीत न होनेपर तो ऐसा होगा । परन्तु बलवान् और दुर्बल दो प्रमाणोंमें अगृ-हीत विशेषता नहीं हो सकती, कारणकि बलवत्त्व और दुर्बलवत्व विशेष है, इसलिए इस प्रकारके मन्त्रोंमें अथवा कर्मोंमें संनिधि पाठमात्र से विद्याशेषत्वको आशङ्का नहीं करनी चाहिए । अरण्य में उनका अनुवचन आदि समान धर्म होनेसे केवल संनिधिमें पाठ है, ऐसा सन्तोष करना चाहिए || २५ || ' अश्व इव रोमाणि ० ' ( जिस प्रकार अश्व अपने रोएँ झाड़कर रोम कम्पन द्वारा श्रम और धूलि आदि दूर कर निर्मल हो जाता है, वैसे ही हार्द ब्रह्म के ज्ञानसे धर्माधमं रूप पापको झाड़कर सत्यानन्दी - दीपिका * उपनिषद् वाक्योंके साथ वेध आदि सब वाक्योंका अरण्य में जाकर आचार्यद्वारा अध्ययन किया जाता है, अत: अरण्यानुवचन ( अरण्य में अध्ययन ) आदि धर्मोकी समानतासे केवल संनिधिमें पाठ है, अन्य कोई प्रयोजन नहीं है । इसलिए वेध आदि मन्त्रों और प्रवग्यं आदि कर्मोंका विद्याओं में उपसंहार नहीं है ॥ २५ ॥
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अधि ० १५ सू ० २६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६८ ९ धूत्वा शरीरमकृतं कृतात्मा ब्रह्मलोकमभिसंभवामि ' ( छा ० ८ | १३ | १ ) इति । तथाऽऽथर्वणिका-नाम् ' विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ' ( मुण्ड ० ३१२८ ) इति । तथा शाट्यायनिन ' पठन्ति - ' तस्य पुत्रा दायमुपयन्ति सुहृदः साधुकृत्यां द्विषन्तः पापकृत्याम् ' इति । तथैव कौषीतकिनः ' तत्सुकृतदुष्कृते विधूनुते तस्य प्रिया ज्ञातयः सुकृतमुपयन्त्यप्रिया दुष्कृतम् ' ( कौ ० १।४ ) इति । तदिह क्वचित्सुकृतदुष्कृतयोर्हानं श्रूयते, क्वचित्तयोरेव विभागेन प्रियैर-प्रियैश्चोपायनम्, कचित्तभयमपि हानमुपायनं च । तद्यत्रोभयं श्रूयते तत्र तावन्न किंचि-द्वक्तव्यमस्ति । यत्राप्युपायनमेव श्रूयते न हानं तत्राप्यर्थादेव हानं संनिपतति । अन्यै-रात्मीययोः सुकृतदुष्कृतयोरुपेयमानयोरावश्यकत्वात्तद्धानस्य । यत्र तु हानमेव श्रूयते नोपायनं तत्रोपायनं संनिपतेद्वा न वेति विचिकित्सायामश्रवणादसंनिपातः । विद्यान्तर-गोचरत्वाश्च शास्नान्तरीयस्य श्रवणस्य । अपि चात्मकर्तृकं सुकृतदुष्कृतयोर्हानम्, पर-कर्तृकं तूपायनम्, तयोरसत्यावश्यकभावे कथं हानेनोपायनमाक्षिप्येत? तस्मादसंनि-पातो हानावुपायनस्येति । अस्यां प्राप्तौ पठति - हानौ त्विति । हानौ त्वेतस्यां केवलाया-मपि श्रूयमाणायामुपायनं संनिपतितुमर्हति । तच्छेषत्वात् । हामशब्दशेषो ह्युपायन-शब्दः समधिगता कौषित किर हस्ये । तस्मादन्यत्र केवलहानशब्दश्रवणेऽप्युपायनानु-वृत्तिः । यदुक्तमश्रवणाद्विद्यान्तरगोचरत्वादनावश्यकत्वाश्चासंनिपात इति, तदुच्यते-भवेदेषा व्यवस्थोक्तिर्यद्यनुष्ठेयं किंचिदन्यत्र श्रुतमन्यत्र निनीष्येत । नत्विह हानमुपायनं वानुष्ठेयत्वेन संकीर्त्यते विद्यास्तुत्यर्थं स्वनयोः संकीर्तनम् - इत्थं महाभागा विद्या यत्सा-तथा राहुके मुख से निकले हुए चन्द्रमाके समान अनर्थके आश्रयभूत इस शरीरको त्यागकर कृतकृत्य हो ब्रह्मलोकको प्राप्त होता हूँ ) ऐसी वाण्डियोंकी श्रुति है । ' तथा विद्वान् ० ' ( उसी प्रकार विद्वान् नाम-रूपसे मुक्त होकर परात्पर दिव्य पुरुषको प्राप्त हो जाता है ) ऐसी आथवंणिकोंकी श्रुति है । और ' तस्य पुत्रा दायमुप ० ' ( उसके मृतक विद्वान्के पुत्र - शिष्य धनको प्राप्त करते हैं, सुहृद पुण्य कर्म और शत्रु पाप कर्मको प्राप्त करते हैं ) इसी प्रकार शाट्यायनियोंकी श्रुति है । और ' तत्सुकृतदुष्कृते ० ' ( शरीर त्यागके समय विद्वान् उस विद्याबलसे सुकृत और दुष्कृतका त्याग करता है, उसके प्रिय बन्धु सुकृतको और द्वेषी दुष्कृतको प्राप्त होते हैं ) ऐसी कौषीतकियोंकी श्रुति है । इन उदाहृत वाक्योंमें कहीं-पर सुकृत और दुष्कृतके त्यागकी श्रुति है, कहीं पर उन दोनोंके ही विभागसे प्रिय और बप्रिय पुरुषोंसे ग्रहणकी श्रुति है और कहीं पर तो हान और उपायन दोनोंका मी श्रवण है । उसमें जहाँ दोनोंकी श्रुति है वहाँ तो कुछ भी वक्तव्य नहीं है । परन्तु जहाँ ग्रहणकी ही श्रुति है और त्यागकी नहीं है, वहीं मी असे ही त्याग प्राप्त हो जाता है, • क्योंकि दूसरोंसे अपने सुकृत और दुष्कृतके ग्रहण किये जानेपर तो उसका त्याग आवश्यक है । परन्तु जहाँ केवल त्यागका ही श्रवण है उपायन- ग्रहणका नहीं है, वहाँ ग्रहण प्राप्त होता है कि नहीं? ऐसा सन्देह प्राप्त होनेपर ग्रहणका श्रवण न होनेसे ग्रहण प्राप्त नहीं होता । अन्य शाखा में ग्रहणका श्रवण अन्य विद्याविषयक है और सुकृत, दुष्कृतका त्याग आत्मकर्तृक है और उपाय परक है, अतः त्याग और ग्रहण दोनोंका आवश्यकभाव न होनेसे किस प्रकार हानसे उपायनका आक्षेप किया जाय, इससे हानमें उपायनकी प्राप्ति नहीं है । सिद्धान्ती — ऐसी शङ्का-के प्राप्त होनेपर कहते हैं- ' हानौ स्विति ' इस श्रुतिमें केवल हानके श्रूयमाण होनेपर भी उपायनका संनिपात होना युक्त है, क्योंकि उपायन हानका शेष है, कौषीतकिरहस्य में उपायनशब्द हानशब्दके शेषरूपसे समधिगत है । इसलिए अन्य शाखामें केवल हानशब्दकी श्रुति होनेपर भी उपायनकी अनुवृत्ति होती है । और जो यह कहा गया है कि श्रुति न होनेसे, विद्यान्तरका विषय होनेसे, अना-वश्यक होनेसे उपायनका संनिपात प्राप्त नहीं है । उसपर कहते हैं- यदि एक स्थानमें श्रुत अनुष्ठेयको अन्य शाखामें ले जानेकी इच्छा हो तो यह उक्त व्यवस्था हो सकती है, परन्तु यहाँ तो हान ( त्याग )
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६ ९ ० ब्रह्मसूत्र —– शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ मर्थ्यादस्य विदुषः सुकृतदुष्कृते संसारकारणभूते विधूयेते ते चास्य सुहृद्विषत्सु निवि-शेते इति । स्तुत्यर्थं चास्मिन्संकीर्तने हानानन्तरभावित्वेनोपायनस्य क्वचिछ्रुतत्वादन्य-त्रापि हानश्रुतावुपायनानुवृत्तिं मन्यते स्तुतिप्रकर्षलाभाय । प्रसिद्धा चार्थवादान्तरा-पेक्षाऽर्थ वादान्तरप्रवृत्तिः - ' एकविंशो वा इतोऽसावादित्यः ' ( छा ० २।१०।५ ) इत्येवमादिषु । कथं ही हैकविंशतादित्यस्याभिधीयेतानपेक्ष्यमाणेऽर्थवादान्तरे ' द्वादश मासाः पञ्चर्तवस्त्रय इमे लोका असावादित्य एकत्रिंशः ' इत्येतस्मिन् । तथा ' त्रिष्टुभौ भवतः सेद्रियत्वाय ' इत्येवमा-दिवादेषु ' इन्द्रियं वै त्रिष्टुप् ' इत्येवमाद्यर्थवादान्तरापेक्षा दृश्यते । विद्यास्तुत्यर्थत्वाच्चास्यो-पायनवादस्य कथमन्यदीये सुकृतदुष्कृते अन्यैरुपेयेते इति नातीवाभिनिवेष्टव्यम् । उपा-यनशब्दशेषत्वादिति तु शब्दशब्दं समुच्चारयन्स्तुत्यर्थामेव हानावुपायनानुवृत्ति सूचयति । गुणोपसंहारविवक्षायां द्युपायनार्थस्यैव हानानुवृत्तिं ब्रूयात् । तस्माद्गुणोपसंहारविचार-प्रसङ्गेनस्तुत्युपसंहारप्रदर्शनार्थमिदं सूत्रम् । कुशाछन्दस्तुत्युपगानवदित्युपमोपादानम् । अथवा उपायन ( ग्रहण ) अनुष्ठेयरूपसे नहीं कहा जाता है, किन्तु इन दोनोंका केवल विद्याकी स्तुति के लिए संकीर्तन है - ऐसी महाभागाविद्या है जिसकी सामथ्यसे इस विद्वान्के संसारके कारणभूत सुकृत और दुष्कृत छूट ( निवृत्त ) हो जाते हैं, वे इसके सुहृद और द्वेषीमें प्रवेश करते हैं । स्तुत्यथंक इस संकीर्तनमें हान के अनन्तर भाविरूपसे उपायनके कहींपर श्रुत होनेसे अन्य शाखामें भी हानके श्रुत होनेपर स्तुतिप्रकर्षं लाभके लिए उपायनकी अनुवृत्ति मानी जाती है, और एक अर्थवादकी अपेक्षासे अन्य अर्थवादी प्रवृत्ति ' एकविंशो ० ' ( इस लोकसे वह आदित्य निश्चय ही इक्कीसवां है ) इत्यादिमें प्रसिद्ध है, क्योंकि ' द्वादशमासाः ० ' ( द्वादश मास, पाँच ऋतु, ये तीन लोक और यह आदित्य इक्की-सवाँ है ) इस अन्य अर्थवादकी अपेक्षा न होनेपर यहां आदित्यको इक्कीसवां किस प्रकार अभिधान किया जाता है । इस प्रकार ' सेन्द्रियत्व के लिए दो त्रिष्टुम् होते हैं ' । इत्यादि वादोंमें भी ' इन्द्रिय ही त्रिष्टुम् है ' इत्यादि अन्य ( स्थानान्तर स्थित ) अर्थवादकी अपेक्षा देखी जाती है । विद्या स्तुत्यर्थंक होनेसे इस उपायनवादमें अन्य कृत सुकृत- दुष्कृत अन्योंसे कैसे प्राप्त किये जाते हैं, इस प्रकार अत्यन्त अभि-निवेश नहीं करना चाहिए | क्योंकि ' उपायनशब्दशेषत्वात् ' ( उपायन शब्द हानका बङ्ग है ) इस सूत्र में ' शब्द ' पदका उच्चारण करते हुए सूत्रकार सूचित करते हैं कि लिए ही है । यदि गुणोंके उपसंहारकी विवक्षा होती तो उपायन इसलिए गुणोंपसंहार विचारके प्रसंगसे स्तुतिके लिए उपसंहारका सत्यानन्दी - दीपिका * यज्ञकी पुरुषाकार कल्पनाकर उसमें ' सेन्द्रियत्वके लिए ब्राह्मणमें कहा गया है । यद्यपि ' त्रिष्टुम् ' छन्दोमात्र है इन्द्रिय नहीं, बै त्रिष्टुभ् ' इस यजुर्वेदवाक्यके सम्बन्धसे उसमें इन्द्रियत्वकी कल्पना हानमें उपायनकी अनुवृत्ति स्तुति के अर्थकी ही हानमें अनुवृत्ति कहते, प्रदर्शन करने के लिए यह सूत्र है । दो त्रिष्टुम् होते हैं ' ऐसा सामवेद तो भी अन्यप्रकरणस्थ ' इन्द्रियं की जाती है, त्रिष्टुभ् छन्दमें इन्द्रि -यत्वकी कल्पना इसलिए की गई है कि त्रिष्टुम् छन्दमें एकादश अक्षर हैं और इन्द्रियाँ भी एकादश हैं । अन्य शाखागत उपायन दूसरी शाखा में भी स्तुति प्रकर्षके लिए गृहीत है । यदि यहाँ उपायनकी विवक्षा होती है तो सूत्रकार ' उपायनशेषत्वात् ' इस प्रकार उसका उपसंहार करते न कि ' उपायनशब्दशेष-त्वात् ' इस प्रकार उपायनशब्दका । अतः विद्यास्तुतिको सूचित करनेके लिए उपाय शब्दका उपसंहार कहा । यहाँ गुणोंके उपसंहारके विचार प्रसंगसे स्तुतिमें दूसरी स्तुतिके उपसंहारको भी दिखलाया गया है । एक शाखा में स्थिति विशेष अन्य शाखामें भी ग्राह्य है । * उद्गाताओंके स्तोत्र गणनाके लिए दारुमय शिलाकाको कुशा कहा जाता है । छन्दोंमें—
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अधि ० १५ सू ० २६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६ ९ १ तद्यथा भाल्लविनाम् - ' कुशा वानस्पत्याः स्थ ता मा पात ' इत्येतस्मिन्निगमे कुशानामविशेषेण वनस्पतियोनित्वेन श्रवणे शाट्यायनिनामौदुम्बराः कुशा इति विशेषवचनादोदुम्बर्यः कुशा आश्रीयन्ते । यथा च क्वचिद्देवासुरच्छन्दसामविशेषेण पौर्वापर्यप्रसङ्गे ' देवच्छन्दांसि पूर्वाणि ' इति पैङ्गयाम्नानात्प्रतीयते । यथा च षोडशिस्तोत्रे केषांचित्कालाविशेषप्राप्तौ ' समयाध्युषिते सूर्ये ' इत्यार्च श्रुतेः कालविशेषप्रतिपत्तिः । यथैव चाविशेषेणोपगानं केचित्समामनन्ति विशे-षेण भालविनः । यथैतेषु कुशादिषु श्रुत्यन्तरगतविशेषान्वयः, एवं हानावप्युपायनान्वय इत्यर्थः । श्रुत्यन्तरकृतं हि विशेषं श्रुत्यन्तरेऽनभ्युपगच्छतः सर्वत्रैव विकल्पः स्यात् । स चान्याय्यः सत्यां गतौ । तदुक्तं द्वादशलक्षण्याम् - ' अपि तु वाक्यशेषत्वादितरपर्युदासः स्यात्प्र-' कुशाछन्दस्तुत्युपगानवत् ' ' कुशा, छन्द, स्तुति और उपगानके समान इस उपमाका ग्रहण है । जैसे ‘ कुशा वानस्पत्याः ० ' ( हे कुश! तुम वनस्पतिसे उत्पन्न हुए हो, तुम हमारी रक्षा करो ) इस भाल्लवियोंकी श्रुति में कुयोंकी समानरूपसे वनस्पति से उत्पत्तिरूपसे श्रवण होनेपर शाट्यायनियों का ' औदुम्बराः कुशा: ' ( उदम्बरसे उत्पन्न हुए कुशा ) इस प्रकार विशेष वचनके श्रवणसे उदम्बरसे उत्पन्न हुए कुशोंका आश्रवण किया जाता है । जैसे देवछन्द और असुरछन्दका समानरूपसे पूर्वापर प्रसंग होनेपर ' देवच्छन्दासि पूर्वाणि ' ( देव छन्द पूर्व हैं ) ऐसा पैङ्गियोंकी श्रुतिसे प्रतीत होता है 1 । और जैसे षोडशीके स्तोत्रमें कुछको काल विशेष प्राप्त न होनेपर ' समयाध्युषिते सूर्ये ' ( आधे सूर्य अस्त होने के समय षोडशी स्तोत्र करना चाहिए ) ऐसी ऋचाका अध्ययन करनेवालोंकी श्रुति होने से कालविशेष प्रतीत होता है । और जैसे कोई उपगान अविशेषरूपसे कहते हैं मोर माल्लवी विशेषरूपसे उपगान कहते हैं । जैसे इन कुशा आदिमें अन्य श्रुति स्थित विशेषका अन्वय है, वैसे ही हान में उपायनका अन्वय है, ऐसा अर्थ एक बुतिकृत विशेषका अन्य श्रुतिमें स्वीकार न करने वालेको सर्वत्र ही विकल्प हो जायगा । गति व्यवस्थाके होनेपर वह विकल्प उचित नहीं है । द्वादशं अध्यायवाले पूर्वमीमांसा ग्रन्थ में ' अपि तु ० ' ( दीक्षितो न ददाति, न जुहोति न पचति - दीक्षितको दान नहीं करना चाहिए, होम नहीं करना चाहिए और पाक नहीं करना चाहिए ) ऐसी श्रुति है । उससे ' अहरहर्दद्यात् ' ( प्रतिदिन दान करना चाहिए ) इसका ' न दीक्षितो ददाति ' इस वाक्यशेषसे इतर-दीक्षितसे भिन्नका पर्युदास है, क्योंकि यदि पर्युदास न हो, तो प्रतिषेवमें विकल्प होगा, वह अन्याय है ) ऐसा कहा गया है । अथवा इन्हीं विधूनन श्रुतियोंके विषय में इस सूत्र से यह विचार करना सत्यानन्दी -दीपिका ' नवाक्षराणि छन्दांसि आसुराणि अन्यानि देवानि ' ( नौ अक्षरवाले छन्द असुर छन्द हैं और अन्य देव छन्द हैं ) कहीं पर ‘ छन्दोभिः स्तुवते ' ( छन्दोंसे स्तवन करते हैं ) इन मन्त्रोंमें विशेष न होनेसे सब छन्दोंकी प्राप्ति होनेपर ' देवच्छन्दासि पूर्वाणि ' ऐसा पैङ्गियोंकी श्रुतिसे विशेष प्रतीत होता है । स्तुतिमें - अतिरात्र यागमें षोडशी पात्रका ग्रहण होनेपर उसके ग्रहणके अङ्गभूत स्तोत्र कब होते हैं? इसप्रकार छन्दोगों द्वारा पूछे जानेपर ' समयाध्युषिते सूर्ये ' इस श्रुतिसे कालविशेष प्रतीत होता है । उपगान —— ऋत्विज उपगायन्ति ' ( ऋत्विज उपगान करें ) यह सामान्य श्रुति है । इससे ' नाध्वर्युरूप-गायति ' ( अध्वर्यु उपगान न करे ) इस दूसरी श्रुति से अध्वर्युंसे भिन्न ऋत्विज उपगान करें । इस प्रकार विशेषका ग्रहण है । कुशा आदि वाक्योंकी दूसरी विशेष श्रुतियोंके साथ एकवाक्यता इसलिए की गई है कि विकल्प प्राप्त न हो, सामान्य और विशेष इन दोनों श्रुति वाक्योंकी एक वाक्यतारूप गतिके होनेपर वाक्य भेदकर ' अध्वर्यु उपगान न करे ' ऐसा विषेध होने से और ' ऋत्विज उपगान करें ' ऐसी सामान्य श्रुतिके होनेसे ' अध्वर्युं उपगान करें ' ' अध्वर्युं उपगान न करे ' इसप्रकार सर्वत्र विकल्प करना युक्त नहीं है । ' ब्रीहिमियजेत यवैर्वा यजेत ' ( धान अथवा यवोंसे याग करे ) यहाँ तो अगल्या
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६ ९ २ ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ तिषेधे विकल्पः स्यात् ' इति । अथवा - पतास्वेव विधूननश्रुतिष्वेतेन सूत्रेणैतच्चिन्तयित-व्यम् - - किमनेन विधूननवचनेन सुकृतदुष्कृतयोर्ज्ञानमभिधीयते, किंवाऽर्थान्तरमिति । तत्र चैवं प्रापयितव्यम्, न हानं विधूननमभिधीयते - धूञ् कम्पने ' इति स्मरणात्, ' दोधूयन्ते ध्वजाग्राणी ' तिच वायुना चाल्यमानेषु ध्वजाग्रेषु प्रयोगदर्शनात्, तस्माच्चालनं विधूननमभि-धीयते । चालनं तु सुकृतदुष्कृतयोः कंचित्कालं फलप्रतिबन्धनादित्येवं प्रापप्य प्रतिवक्त-व्यम् | हानावेवैष विधूननशब्दो वर्तितुमर्हति उपायनशब्दशेषत्वात् । नहि परपरिग्रह-भूतयोः सुकृतदुष्कृतयोर प्रहीणयोः परैरुपायनं संभवति । यद्यपीदं परकीययोः सुकृतदु-ष्कृतयोः परैरुपायमं नाञ्जसं संभाव्यते, तथापि तत्संकीर्तनात्तावत्तदानुगुण्येन हानमेव विधूननं नामेति निर्णेतुं शक्यते । क्वचिदपि चेदं विधूनन संनिधावुपायनं श्रूयमाणं कुशाछ-न्दस्तुत्युपगानवद्विधूननश्रुत्या सर्वत्रापेक्षमाणं सार्वत्रिक निर्णयकारणं संपद्यते । न च चालनं ध्वजाग्रवत्सुकृतदुष्कृतयोर्मुख्यं संभवति, अद्रव्यत्वात् । अश्वश्च रोमाणि विधून्वा-चाहिए -- क्या इस विधूनन वचन से सुकृत और दुष्कृतके हानका विधान किया जाता है अथवा अन्य अर्थका संशय होने पर ऐसा प्राप्त होना चाहिए कि विधूनन शब्द हानका अभिधान नहीं करता, क्योंकि ' धूञ् कम्पने ' ( धूञ् धातुका अर्थ कम्पन है ) ऐसा पाणिनिकी स्मृति है । और ' दोधूयन्ते ध्वजाग्राणि ' ( ध्वजाके अग्रभाग वार वार हिलते हैं ) इसप्रकार वायु द्वारा चलायमान जाके अग्रभागों में विधूनन शब्दका प्रयोग देखने में आता है, इससे चालन हो विधूतन अभिहित है । सुकृत और दुष्कृतका चालन तो कुछ समय तक फलके प्रतिबन्धसे अभिहित है । ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त कर निराकरण करना चाहिए । यह विधूनन शब्द हानमें ही वर्तने योग्य है, क्योंकि उपायन शब्दका शेष है,. कारण कि दूसरे से परिगृहीत होनेवाले अत्यक्त सुकृत दुष्कृतका अन्यसे उपायन नहीं हो सकता । यद्यपि अन्यके सुकृत और दुष्कृतका अन्यसे उपायन मुख्यरूप से सम्भव नहीं होता, तो मी उसके संकीर्तनसे उसके अनुकूल हान ही विधूनन है, ऐसा निर्णय किया जा सकता है । विधूननकी संनिधिमें कहीं पर भी श्रूयमाण उपायन कुशा, छन्द, स्तुति और उपगानके समान विधूनन श्रुतिसे सर्वत्र अपेक्ष्यमाण होता हुआ सर्वत्र निर्णयका कारण सम्पन्न होता है । और सुकृतदुष्कृतका ध्वजाके सत्यानन्दी - दीपिका विकल्पका आलम्बन युक्त है, क्योंकि विकल्प न्याय संगत नहीं है । ज्योतिष्टोम प्रकरण में ' दीक्षितो न जुहोति ' यह श्रुति है बौर ' यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहुयात् ' यह अन्यत्र श्रुति है । यदि यहाँ ' न दीक्षित ' वाक्य होमका प्रतिषेधक हो, तो यज्ञार्थक होनेसे निषेध अनुष्ठेय है अथवा ' यावज्जीवम् ' इस विधि से होम अनुष्ठेय है? ऐसा विकल्प होगा । परन्तु वह न्याय संगत नहीं है । यहाँ ' यावज्जीव ' वाक्यके प्रति ' न दीक्षित ' वाक्यके शेष होनेसे ' न ' इतर पर्युदासार्थंक है, अतः नकार दीक्षितसे भिन्न लोगोंका लक्षक है होमका प्रतिषेधक नहीं है । परन्तु मीमांसा शास्त्र में ' नन् ' के दो अर्थ माने गये हैं - एक निषेध और दूसरा पर्युदास । ' प्रतिषेधः स विज्ञेयः क्रियया सह यत्र नज् ' ( जहाँपर क्रिया - विधि प्रत्ययके साथ ' नव् ' का सम्बन्ध हो वहाँ प्रतिषेव होता है ) जैसे ' ब्राह्मणो न हन्तव्यः ' | ' पर्युदासः स विज्ञयो यत्रोत्तरपदेन नज् ' ( जहाँ ' नन् ' विधि प्रत्यय में भिन्न धात्वर्थंके साथ अथवा कर्ता आदिके साथ सम्बन्धित हो वह पर्युदास है ) जैसे ' दीक्षितो न जुहोति ' इसका विशेष विस्तार मीमांसा शास्त्रमें देखना चाहिए । इसलिए ' अदीक्षित जीवन पर्यन्त होम करे ' इसप्रकार एक वाक्यता है, ऐसा ' न दीक्षिताधिकरण ' के सिद्धान्तसूत्रका अर्थ है । * इसप्रकार विधूननका हानि अर्थसिद्ध होनेपर जहाँ केवल हानका श्रवण हो वहाँपर मी उपायनका उपसंहार है । यहाँ पूर्वपक्ष में स्तुति प्रकर्षकी असिद्धि है, सिद्धान्त में उसकी सिद्धि है ॥ २६ ॥
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अधि ० १६ सू ० २७ ] भाषानुवाद -सत्यानन्दी - दीपिका सहित ६ ९ ३ नस्त्यजनूरजः सहैव तेन रोमाण्यपि जीर्णानि शातयति ' अश्व इव रोमाणि विधूय पापम् ' ( छा ० ८ । १३ । १ ) इति च ब्राह्मणम् । अनेकार्थत्वाभ्युपगमाच्च धातूनां तदुक्तमिति व्याख्यातम् ॥ २६ ॥
( १६ सांपरायाधिकरणम् । सू ० २७-२८ ) सांपराये तर्तव्याभावात्तथा ह्यन्ये ॥ २७ ॥
पदच्छेद — सांप ये, तर्तव्याभावात्, तथा, हि, अन्ये । सूत्रार्थ - ( सांपराये ) देह त्यागके समय विद्याकी सामर्थ्य से सुकृत, है, ( वर्तव्याभावात् ) क्योंकि विद्वान्को कुछ मध्यमें प्राप्तव्य नहीं है, ( हि ) शाखावाले ' अश्व इव रोमाणि विधूय पापम् ' ( तथा ) ऐसा ही कहते हैं । न स्मरणविरोधः । दुष्कृतकी हानि होती क्योंकि ( अन्ये ) अन्य * देवयानेन पथा पर्यङ्कस्थं ब्रह्माभिप्रस्थितस्य व्यध्वनि सुकृतदुष्कृतयोर्वियोगं कौषी-तकिनः पर्यङ्कविद्यायामामनन्ति स एतं देवयानं पन्थानमासाद्याग्निलोकमागच्छति ' ( कौ ० १।३ ) इत्युपक्रम्य ' स आगच्छति विरजां नदीं तां मनसैवात्येति तत्सुकृतदुष्कृते विधूनुते ' ( कौ ० १४ ) इति । तत्किं यथाश्रुतं व्यध्वन्येव वियोगवचनं प्रतिपत्तव्यमाहोस्विदादावेव देहादपसर्पणे इति विचायां श्रुतिप्रामाण्याद्यथाश्रुति प्रतिपत्तिप्रसक्तौ पठति -सांपराय इति । सांप-राये गमन एव देहादपसर्पण इदं विद्यासामर्थ्यात्सुकृतदुष्कृतहानं भवतीति प्रतिजानीते । हेतुं चाचष्टे - तर्तव्याभावादिति । नहि विदुषः संपरेतस्य विद्यया ब्रह्म संप्रेप्सतोऽन्तराले सुकृतदुष्कृताभ्यां किंचित्प्राप्तव्यमस्ति यदर्थं कतिचित्क्षणानक्षीणे ते कल्प्येयाताम् । अग्रभाग के समान मुख्य चालन नहीं हो सकता, क्योंकि वे अद्रव्य हैं । रोमोंका विधूनन करनेवाला अश्व रजका त्याग करता हुआ उसके साथ जीणं रोमोंको भी झाड़ता है— इस विषय में ' अश्व इव ० II ' ( जैसे अश्व रोमोंका विधूनन करता है, वैसे विद्वान् पापका विधूनन कर ) ऐसा ब्राह्मण है । धातुओंके अनेक अर्थ स्वीकार करनेसे उक्त स्मृतिके साथ विरोध नहीं है । ' तदुक्तम् ' ( वह कहा गया है ) इसका व्याख्यान हो चुका है ॥ २६ ॥
देवयान मार्गसे पर्यंङ्कस्थ ब्रह्मको ओर प्रस्थान करनेवाले पुरुषके सुकृत- दुष्कृतका अर्धमागं में वियोग कौषीतकी शाखावाले पर्यङ्कविद्यामें कहते हैं - ' स एतं देवयानं ० ' ( वह इस देवयान मार्गको प्राप्तकर अग्निलोकको प्राप्त होता है ) ऐसा आरम्भकर ' स आगच्छति ० ' ( वह विरजा नदीको प्राप्त होता है, उसे मनसे ही लांघ जाता है, उससे सुकृत, दुष्कृतका त्याग करता है ) यहाँ श्रुतिके अनुसार उस ( सुकृतदुष्कृत ) का अर्धमार्ग में ही वियोगवचन समझना चाहिए अथवा आरम्भमें ही देह से प्रयाण करनेपर ऐसा विचार प्राप्त होनेपर श्रुतिप्रामाण्यसे श्रुति के अनुसार प्राप्ति प्रसक्त होनेपर [ सूत्रकार ] कहते हैं - ' सांपराये ' । सांपरायसमय में - गमनकालमें देहसे निकलनेपर विद्याकी सामर्थ्य से यह सुकृत, दुष्कृत हान होता है, ऐसी प्रतिज्ञा करते हैं । उसका हेतु कहते हैं - ' तर्तव्या-भावात् ' । विद्यासे ब्रह्म सम्प्राप्तकी इच्छावाले मृत विद्वान्को मध्यमें सुकृत और दुष्कृतद्वारा कुछ मी प्राप्तव्य नहीं है, जिसके लिए कुछ एक क्षणोंके लिए सुकृत और दुष्कृतके क्षीण न होने की कल्पना की जाय । परन्तु उनका विद्यासे विरुद्ध फल है, अतः विद्याकी सामथ्यसे उन दोनोंका क्षय सत्यानन्द - दीपिका * इसमें विद्या सुकृत- दुष्कृतक्षयका हेतु है, इसकी असिद्धि पूर्वपक्षका फल है, सिद्धान्त में उसकी सिद्धि फल है । सिद्धान्ती - देहपातसे पूर्व ही विद्याकी सामथ्यंसे कर्मोंके क्षय होनेपर विद्वान् उत्तर मार्गसे ब्रह्मको प्राप्त होता है, विना कर्मनाश हुए उत्तर मागंसे गमन संभव नहीं है, अतः पाठक्रमसे अर्थक्कम बलवान् है ॥ २७ ॥
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६ ९ ४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ विद्याविरुद्धफलत्वाच्च विद्यासामर्थ्येन तयोः क्षयः, स च यदैव विद्या फलाभिमुखी तदैव भवितुमर्हति । तस्मात्प्रागेव सन्नयं सुकृतदुष्कृतक्षयः पश्चात्पठ्यते । तथा ह्यन्येऽपि शाखिनस्ताण्डिनः शाट्यायनिनश्च प्रागवस्थायामेव सुकृतदुष्कृतहानमामनन्ति - ' अश्व इव रोमाणि विधूय पापम् ' ( छा ० २।१३ | १ ) इति, तस्य पुत्रा दायमुपयन्ति सुहृदः साधुकृत्यां द्विषन्तः पापकृत्याम् ' इति च ॥ २७ ॥
छन्दत उभयाविरोधात् ॥ २८ ॥
पदच्छेद - छन्दतः, उमयाविरोधात् । सूत्रार्थ - ( छन्दतः ) जीवित पुरुष अपनी इच्छासे विद्याका अनुष्ठान कर सकता है, इससे उसका कर्मक्षय भी जीवनकालमें होगा, ( उमयाविरोधात् ) इसप्रकार उपपत्ति और ताण्डी आदि श्रुति दोनोंके साथ विरोध नहीं होगा । यदि च देहादपसृप्तस्य देवयानेन पथा प्रस्थितस्यार्धपथे सुकृतदुष्कृतक्षयोऽभ्युपग-म्येत, ततः पतिते देहे यमनियमविद्याभ्यासात्मकस्य सुकृतदुष्कृतक्षयहेतोः पुरुषप्रयत्न-स्वेच्छातोऽनुष्ठानानुपपत्तेरनुपपत्तिरेव तद्धेतुकस्य सुकृतदुष्कृतक्षयस्य स्यात् । तस्मात्पूर्व-मेव साधकावस्थायां छन्दतोऽनुष्ठानं तस्य स्यात् । तत्पूर्वकं च सुकृतदुष्कृतहान मिति द्रष्टव्यम् । एवं निमित्तनैमित्तिकयोरुपपत्तिस्ताण्डिशाट्यायनिश्रुत्योश्च संगतिरिति ॥२८ ॥
( १७ गतेरर्थवत्त्वाधिकरणम् । सू ० २ ९ -३० ) गतेरर्थवत्वमुभयथाऽन्यथा हि विरोधः ॥ २ ९ ॥ पदच्छेद – गतेः, अर्थतत्त्वम्, उमयथा, अन्यथा, हि, विरोधः । सूत्रार्थ - ( गतेः ) देवयान मार्गकी ( अर्थवत्त्वम् ) अर्थवत्ता ( उभयथा ) विभागसे हो सकती है | सगुणविद्या में देवयानमार्ग है निर्गुणविद्या में नहीं है, ( अन्यथा ) यदि देवयानमार्गका सर्वत्र उपसंहार करें तो ( विरोधः ) ' विद्वान् पुण्यपापे विधूय ' इत्यादि श्रुतिसे विरोध होगा । * क्वचित्पुण्यपापहान संनिधौ देवयानः पन्थाः श्रूयते, क्वचिन्न । तत्र संशयः - किं होता है और वह विद्या जब फलाभिमुख होती है तब उनका क्षय होना युक्त है । इसलिए देहपातसे पहले ही वर्तमान यह सुकृत दुष्कृत क्षय पश्चात् पढा जाता है । इसलिए अन्य ताण्डी और शाट्यायनी शाखावाले भी ‘ अश्व इव ० ' ( जैसे अश्व रोम झाड़ देता है वैसे विद्वान् पाप मुक्त होकर ) और ' तस्य दायमु ० ' ( उस मृत विद्वानके पुत्र- शिष्य धन ग्रहण करते हैं, सुहृद पुण्यकर्म और द्वेषी पापकर्म ग्रहण करते हैं ) इसप्रकार पूर्वावस्थामें ही सुकृत- दुष्कृतकी हानि कहते हैं ॥। २७ ॥ देहसे निष्क्रमित देवयान मार्गसे प्रस्थान करनेवाले पुरुषके सुकृत, दुष्कृतका क्षय यदि अर्धमागं-में स्वीकार किया जाय, तो देहपात होनेपर सुकृत- दुष्कृत क्षयके हेतुभूत यम - नियम सहित विद्याके अभ्यासरूप पुरुषप्रयत्न में अपनी इच्छासे अनुष्ठानकी उपपत्ति न होनेके कारण उससे होनेवालो सुकृत, दुष्कृत क्षयको अनुपपत्ति ही होगी । इससे पूर्व में साधकावस्था में अपनी इच्छासे उसका अनु-ष्ठान होना चाहिए और अनुष्ठान पूर्वक सुकृत, दुष्कृतका हान है, ऐसा समझना चाहिए । इसप्रकार निमित्त, नैमित्तिककी उपपत्ति ताण्डी और शाट्यायनी इन दोनों श्रुतियोंकी संगति होगो ॥ २८ ॥
कहीं पर पुण्य - पाप हाकी संनिधिमें देवयानमार्ग की श्रुति है और कहींपर नहीं है, यहाँ सत्यानन्दी - दीपिका सगुणविद्या में देवयान गति प्रयोजनवाली है और निर्गुणविद्यामें नहीं, अतः समानरूपसे सर्वत्र गमन इष्ट नहीं है | देशसे व्यवहित वस्तुकी प्राप्तिमें तो मार्ग अपेक्षणीय है, किन्तु ब्रह्मविद्या में मागंकी अपेक्षा नहीं है ॥ २ ९ ॥
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अधि ० १७ सू ० ३० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६ ९ ५ हानावविशेषेणैव देवयानः पन्थाः संनिपतेदुत विभागेन कचित्संनिपतेत् कचिन्नेति । यथा तावद्धानावविशेषेणैवोपायनानुवृत्तिरुक्कैवं देवयानानुवृत्तिरपि भवितुमर्हतीत्यस्यां । प्राप्तावचक्ष्महे - गतेदेवयानस्य पथोऽर्थवत्त्वमुभयथा विभागेन भवितुमर्हति क्वचि दर्शवती गतिः क्वचिन्नेति नाविशेषेण । अन्यथा ह्यविशेषेणैवैतस्यां गतावङ्गीक्रियमाणायां विरोधः स्यात् । ' पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ' ( मु ० ३ | १ | ३ ) इस्यस्यां श्रुतौ देशान्तरप्रापणी गतिर्विरुध्येत । कथं हि निरञ्जनोऽगन्ता देशान्तरं गच्छेत्? गन्तव्यं च परमं साम्यं न देशान्तरप्राप्यायत्त मित्यानर्थक्यमेवात्र गतेर्मन्यामहे ॥ २ ९ ॥ उपपन्नस्तल्लक्षणार्थोपलब्धेर्लोकवत् ॥ ३० ॥
पदच्छेद – उपपन्नः, तल्लक्षणार्थोपलब्धेः, लोकवत् । सूत्रार्थ - ( उपपन्नः ) गतिकी विभागसे व्यवस्था युक्त ही है, ( तल्लक्षणार्थोपलब्धे 1 ) क्योंकि गति-कारणभूत अर्थ सगुण उपासनाओंमें उपलब्ध होता है, ( लोकवत् ) जैसे लोकमें सेतु वासियोंको ग्रामकी प्राप्ति के लिए मार्गकी अपेक्षा होती है, किन्तु आरोग्य प्राप्ति में उसकी अपेक्षा नहीं होती, वैसे यहाँ भी है । उपपन्नश्चायमुभयथाभावः - कचिदर्थवती गतिः क्वचिन्नेति, तल्लक्षणार्थोपालब्धेः । गतिकारणभूतार्थः पर्यङ्कविद्यादिषु सगुणेषूपासनेषूपलभ्यते । यत्र हि पर्यारोहणं पर्यङ्कस्थेन ब्रह्मणा संवदनं विशिष्टगन्धादिप्राप्तिश्चेत्येवमादि बहु देशान्तरप्राप्यायत्तं फलं श्रूयते, तत्रार्थवती गतिः । नहि सम्यग्दर्शने तल्लक्षणार्थोपलब्धिरस्ति । न ह्यात्मैकत्व-दर्शिनामातकामानामिव दग्धाशेषक्लेशबीजानामारब्धभोगकर्माशयक्षपणव्यतिरेकेणा-पेक्षितव्यं किंचिदस्ति, तत्रानर्थिका गतिः । लोकवच्चैष विभागो द्रष्टव्यः यथा लोके ग्रामप्राप्तौ देशान्तरप्रापणः पन्था अपेक्ष्यते, नारोग्यप्राप्तावेवमिहापीति । भूयश्चैनं विभागं चतुर्थाध्याये निपुणतरमुपपादयिष्यामः ॥ ३० ॥
संशय होता है कि क्या हानमें समानरूपसे हीं देवयानमार्गका संनिपात है अथवा विभागसे कहींपर संनिपात होता है और कहीं पर नहीं होता? जैसे हानमें समानरूरसे उपायनकी अनुवृत्ति कही गई है, वैसे देवयानकी अनुवृत्ति भी होनी चाहिए । सिद्धान्ती - इसके प्राप्त होनेपर हम कहते हैं— गतिका-देवयानमार्गका अर्थवत्त्व उभयथा - विभागसे होना चाहिए, कहींपर अर्थवती गति है और कहीं पर नहीं । अविशेषसे सर्वत्र गति नहीं है, अन्यथा - अविशेषसे ही इस गतिके अङ्गीकार करनेपर तो विरोध होगा । ' पुण्यपापे ० ' ( विद्वान् पुण्य - पाप दोनोंको त्यागकर निर्मल हो परम साम्य ( ब्रह्म ) को प्राप्त होता है ) इस श्रुतिमें अन्य देश प्रापक गति विरुद्ध है, क्योंकि गति आदि रहित ब्रह्मस्वरूप देशा-न्तर में कैसे जायगा और प्रापणीय परम साम्य देशांन्तर प्राप्तिके अधीन नहीं है । इसलिए हम यहाँ निर्गुणविद्यामें गतिको निष्प्रयोजन मानते हैं ॥ २ ९ ॥ कहीं पर गति प्रयोजनवाली है और कहींपर नहीं, ऐसा दोनों प्रकारका विभाग युक्ति युक्त है, क्योंकि गति कारणक प्रयोजन उपलब्ध होता है । गति कारणभूत प्रयोजन पर्यङ्कविद्या आदि सगुण उपासनाओं में उपलब्ध होता है । उनमें पर्यङ्कारोहण, पर्यङ्कस्थ ब्रह्माके साथ संवाद और विशिष्ट गन्ध आदिकी प्राप्ति, इत्यादि अनेक भिन्न - भिन्न देशोंकी प्राप्तिके अधीन फलकी श्रुति है, वहाँ गति प्रयोजन वाली है, किन्तु तत्त्वज्ञानमें गति कारणभूत अर्थकी उपलब्धि नहीं है, कारण कि आत्मैकत्वदर्शी, आप्तकाम यहाँ दग्ध हो गये हैं सम्पूर्ण क्लेश और उनके कारणीभूत बीज- अविद्या जिनके, उनको एता-हरा महानुभावों को प्रारब्धभोग कर्म और आशय क्षयके अतिरिक्त कुछ मी फल अपेक्षणीय नहीं है । यहाँ गति प्रयोजन रहित है । और यह विभाग लोक व्यवहार के समान समझना चाहिए, जैसे लोकमें ग्राम प्राप्ति के लिए देशान्तर प्रापक मार्गकी अपेक्षा होती है, किन्तु आरोग्य प्राप्तिमें नहीं होती,
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६ ९ ६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ ( १८ अनियमाधिकरणम् । सू ० ३१ ) अनियमः सर्वासामविरोधः शब्दानुमानाभ्याम् ॥ ३१ ॥
पदच्छेद -अनियमः, सर्वासाम्, अविरोधः, शब्दानुमानाभ्याम् । सूत्रार्थ - ( सर्वासाम् ) सभी सगुण उपासनाओं में ( अनियम: ) अविशेषरूपसे देवयान मार्ग होना चाहिए, ( अविरोध: ) इससे - प्रकरण से विरोध नहीं है, ( शब्दानुमानाभ्याम् ) क्योंकि ' तद्य इत्थं विदु: ' इत्यादि श्रुति और ' शुक्लकृष्णे गती ह्येते ' इत्यादि स्मृति है । सगुणासु विद्यासु गतिरर्थवती, न निर्गुणायां परमात्मविद्यायामित्युक्तम् । सगुणा-स्वपि विद्यासु कासुचिद्गतिः श्रूयते - यथा पर्यङ्कविद्यायामुपकोसलविद्यायां पञ्चा निविद्यायां दहरविद्यायामिति । नान्यासु - यथा मधुविद्यायां शाण्डिल्यविद्यायां षोडशकलविद्यायां वैश्वानर विद्यायामिति । तत्र संशयः - किं यास्वेवैषा गतिः श्रूयते तास्वेव नियम्येतोता नियमेन सर्वाभिरेवंजातीय काभिर्विद्याभिरभिसंबध्येतेति । किं तावत्प्राप्तम्? नियम इति । यत्रैव श्रूयते तत्रैव भवितुमर्हति प्रकरणस्य नियामकत्वात् । यद्यन्यत्राश्रूयमाणापि गतिर्विद्यान्तरं गच्छेच्छुत्यादीनां प्रामाण्यं हीयेत, सर्वस्य सर्वार्थत्वप्रसङ्गात् । अपि चार्चिरादिकैकैव गतिरुपकोसलविद्यायां पञ्चाग्निविद्यायां व तुल्यवत्पठ्यते, तत्सर्वार्थत्वेऽनर्थकं पुनर्वचनं स्यात् । तस्मान्नियम इति एवं प्राप्ते पठति -अनियम इति । सर्वासामेवाभ्युदयप्राप्तिफलानां सगुणानां विद्यानाम-विशेषेणैषा देवयानाख्या गतिर्भवितुमर्हति । नन्वनियमाभ्युपगमे प्रकरणविरोध उक्तः । नैषोऽस्ति विरोधः, शब्दानुमानाभ्यां श्रुतिस्मृतिभ्यामित्यर्थः । तथाहि श्रुतिः-' तद्य इत्थं विदु: ' ( छा ० ५1१०1१ ) इति पञ्चाग्निविद्यावतां देवयानं पन्थानमवतारयन्ती ' ये वैसे यहाँ प्रकृतमें भी समझना चाहिए । पुनः इस विभागको चतुर्थ अध्यायमें अधिक निपुणता से उपपादन करेंगे ॥ ३० ॥
सगुण विद्याओं में गति प्रयोजनवाली है, किन्तु निर्गुण परमात्मविद्यामें नहीं, ऐसा पूर्व अधि-करणमें कहा गया है । सगुण विद्याओंमें भी कुछ विद्याओं की गति श्रुति है -- जैसे ' पर्यङ्कविद्या, उप-कोसलविद्या, पञ्चाग्निविद्या और दहरविद्यामें । ' अन्य विद्याओंमें गति श्रुति नहीं है - जैसे ' मधुविद्या, शाण्डिल्यविद्या, षोडशकलविद्या और वैश्वानरविद्यामें । यहाँ संशय होता है- क्या जिनमें यह गतिश्रुति है उनमें ही नियमित है अथवा अनियमसे इस प्रकारकी सभी विद्याओं के साथ सम्बन्धित है, तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - नियम प्राप्त होता है । जिन विद्याओं में गति सुनी जाती है उनमें ही होनी चाहिए, क्योंकि प्रकरण नियामक है । अन्य विद्यामें न सुनी हुई गति भी यदि अन्य विद्या में प्राप्त हो तो श्रुति आदिमें प्रामाण्यकी हानि होगी, कारण कि सबमें सर्वार्थवत्त्व प्रसङ्गहोगा । और अचिरादि एक ही गति उपकोसलविद्या और पञ्चाग्निविद्या में समानरूपसे जैसे पढी जाती है, वह यदि सब विद्याओंके लिए हो तो पुनर्वचन अनर्थक हो जायगा, इसलिए गतिका नियम है I । सि ० - ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं— अनियम है । यह देवयान नामक गति अभ्युदय प्राप्ति फलवाली समस्त सगुण विद्याओं में समानरूपसे होनी चाहिए । परन्तु अनियमको स्वीकार करनेपर प्रकरणका विरोध कहा गया है? यह विरोध नहीं है, क्योंकि इसमें शब्द और अनुमान - श्रुति और स्मृति हैं, ऐसा अर्थ है । जैसे कि सत्यानन्दी -दीपिका * जो प्रकरणके बलसे गतिका नियम कहा गया है, वह श्रुति और स्मृतिसे बाधित है, क्योंकि श्रुति प्रकरण से बलवती है । इसलिए समस्त सगुण उपासनाओंमें समानरूपसे गति होनी चाहिए । ' ये चेमे s-रण्ये. ० ' ' इस श्रुति वाक्य में लक्षणाकी गई है, इससे श्रद्धा और तप अन्य सगुण उपासनाके उपलक्षक हैं ।