श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 731–740

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 731–740

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अधि ० १८ सू ० ३ ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६२७ चेमेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युपासते ' ( का ० ५।१०।१ ) इति विद्यान्तरशीलिनामपि पञ्चाग्निविद्या-विद्भिः समानमार्गतां गमयति । कथं पुनरवगम्यते विद्यान्तरशीलिनामियं गतिरिति? ननु श्रद्धातपः परायणानामेव स्यात्, तन्मात्रश्रवणात् । नैष दोषः, नहि केवलाभ्यां श्रद्धातपोभ्यामन्तरेण विद्याबलमेषा गतिर्लभ्यते, ' विद्यया तदारोहन्ति यन्त्र कामाः परागताः । न तत्र दक्षिणा ं यन्ति नाविद्वांसस्तपस्विनः ' इति श्रुत्यन्तरात् । तस्मादिह श्रद्धातपोभ्यां विद्यान्तरोपलक्षणम् । वाजसनेयिनस्तु पञ्चाग्निविद्याधिकारेऽधीयते - ' य एवमेतद्विदुर्ये चामी अरण्ये श्रद्धां सत्यमुपासते ' ( बृ ० ६ | १ | १५ ) इति । तत्र श्रद्धालवो ये सत्यं ब्रह्मोपासत इति व्याख्येयम्, सत्यशब्दस्य ब्रह्मण्य सकृत्प्रयुक्तत्वात् । पञ्चाग्निविद्याविदां चेत्थंवित्त-यैवोपात्तत्वाद्विद्यान्तरपरायणानामेवैतदुपादानं न्याय्यम् । ' अथ य एतौ पन्थानौ न विदुस्ते कीटाः पतङ्गा यदिदं दन्दशूकम् ' ( बृह ६।२।१६ ) इति च मार्गद्वयभ्रष्टानां कष्टामधोगतिं गम-यन्ती श्रुतिर्देवयान पितृयाणयोरेवैनानन्तर्भावयति । तत्रापि विद्याविशेषादेषां देवयान-प्रतिपत्तिः । स्मृतिरपि ' शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते । एकया यात्यनावृत्तिमन्य-' तद्य इत्थं विदुः ० ' ( वहाँ इस लोकके प्रति उत्थित हुए अधिकारी गृहस्थोंमें जो इस प्रकार पञ्चाग्निको जानते हैं ) यह श्रुति पञ्चाग्नि विद्याके उपासकों के लिए देवयान पथका अवतरण करती हुई ' ये चेमे ० ' ( और जो अरण्यसे उपलक्षित वैखानस और परिव्राजक श्रद्धा और तपसे उपलक्षित ब्रह्मका ध्यान करते हैं ) अन्य विद्या अनुशीलन करनेवालोंका मी पञ्चाग्निविद्या जाननेवालोंके समान मार्ग ज्ञान कराती है । परन्तु यह कैसे अवगत हो कि अन्य विद्याका अनुशीलन करनेवालोंकी यह गति है? परन्तु श्रद्धा और तपमें संलग्न अरण्यवासियों को ही यह गति प्राप्त होनी चाहिए, क्योंकि केवल उनका श्रवण है । यह दोष नहीं है, कारण कि विद्याबलके विना केवल श्रद्धा और तपसे यह गति प्राप्त नहीं होती, क्योंकि ' विद्यया तदारोहन्ति ० ' ( विद्यासे - उपासनासे उस ब्रह्मलोकको प्राप्त करते हैं, जहाँ जानेवालेकी कामनाएँ निवृत्त यान्त हो जाती हैं, वहाँ दक्षिण मार्ग उपलक्षित केवल कर्मी नहीं जाते और अविद्वान् उपासना रहित तपस्वी भी नहीं जाते ) यह अन्य श्रुति है । इससे ज्ञात होता है कि यहाँ श्रद्धा और तपसे अन्य विद्याओंका उपलक्षण है । वाजसनेयी तो पञ्चाग्निविद्या के प्रकरण में ' य एवमेतद्विदुः ० ' ( वे जो गृहस्थ इस प्रकार इस पञ्चाग्निविद्याको जानते हैं तथा जो संन्यासी अथवा वानप्रस्थ श्रद्धा युक्त होकर सत्यकी उपासना करते हैं ) ऐसा कहते हैं । वहाँ जो श्रद्धालु सत्य ब्रह्मकी उपासना करते हैं, ऐसा व्याख्यान करना चाहिए, क्योंकि सत्य शब्द ब्रह्ममें अनेकवार प्रयुक्त हुआ है । पश्चाग्निविद्या-विदोंका ' य इत्थं विदु: ' इस वाक्य से ' इत्थंवित्त्व ' ( इस प्रकार जाननेवाला ) रूपसे ग्रहण होनेके कारण अन्य विद्या में संलग्न उपासकोंका यह ग्रहण युक्त है । और ' अथ य एतौ ० ' ( और जो उत्तर और दक्षिण दोनों मार्गों को नहीं जानते अर्थात् देवयान एवं दक्षिण मार्गके साधन भूत ब्रह्मोपासना अथवा कर्मका अनुष्ठान नहीं करते वे कीट, पतङ्ग और सर्प आदि होते हैं ) यह श्रुति दोनों मार्गोंसे भ्रष्ट हुए लोगोंको दुःखदायक अधोगतिका बोध कराती हुई देवयान और पितृयानमें ही इन उपासकोंका अन्त-र्भाव करती है । उनमें भी उपासना विशेषसे इन उपासकोंको देवयानकी प्राप्ति होती है । और सत्यानन्दी - दीपिका * तत् तत् स्थलमें मार्ग श्रुति प्रतिदिन मार्ग ध्यानके लिए है, क्योंकि प्रकरणसे मागं ध्यान उपासनाका अङ्ग कहा गया है । जिनमें मागं श्रुति नहीं है वे मार्ग ध्यानके विना भी विद्याकी सामथ्यंसे अचिरादि मार्ग प्राप्त करते हैं । यह सूचित करनेके लिए ' पुनः ' कथन है । इसलिए देवयान मार्गकी प्रतीकसे भिन्न सम्पूर्ण उपासनाओं में समानरूपसे प्राप्ति होती है । पूर्वपक्ष में पूर्वके समान गतिका नियम है, सिद्धान्त में गतिका अनिमम है ॥ ३१ ॥

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६ ९ ८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ या ss वर्तते पुनः ' ( म ० गी ० ८ २६ ) इति । यत्पुनर्देवयानस्य पथो द्विराम्नानमुपकोसल-विद्यायां पञ्चाग्निविद्यायां च तदुभयत्राप्यनुचिन्तनार्थम् । तस्मादनियमः ॥३१ ॥

( १ ९ यावदधिकाराधिकरणम् । सू ० ३२ ) यावदधिकारमवस्थितिराधिकारिकाणाम् ॥ ३२ ॥

पदच्छेद - यावदधिकारम्, अवस्थितिः, आधिकारिकाणाम् । सूत्रार्थ - ( अधिकारकाणाम् ) लोक व्यवस्थाके हेतुभूत अधिकारोंमें विनियुक्त, यथार्थ -ज्ञानसे क्षीण कर्मवाले अपान्तरतमा आदि तत्त्वज्ञानियोंकी ( यावदधिकारम् ) प्रारब्धकर्मों तक ( अवस्थिति: ) अवस्थिति है । * विदुषो वर्तमान देहपातानन्तरं देहान्तरमुत्पद्यते न वेति चिन्त्यते । ननु विद्यायाः साधनभूतायाः संपत्तौ कैवल्यनिर्वृत्तिः स्यान्न वेति नेयं चिन्तोपपद्यते, नहि पाकसाधन-संपत्तावोदनो भवेन्न वेति चिन्ता संभवति, नापि भुञ्जानस्तृप्येन्न वेति चिन्त्यते, उपपन्ना त्वियं चिन्ता, ब्रह्मविदामपि केषांचिदितिहासपुराणयोदे हान्तरोत्पत्तिदर्शनात् । तथाहि-अपान्तरतमा नाम वेदाचार्यः पुराणर्षिर्विष्णुनियोगात्कलिद्वापारयोः संधौ कृष्णद्वैपायनः संबभूवेति स्मरन्ति । वसिष्ठश्च ब्रह्मणो मानसः पुत्रः सन्निमिशापादपगतपूर्वदेहः पुनर्ब्रह्मादेशान्मित्रावरुणाभ्यां संबभूवेति । भृग्वादीनामपि ब्रह्मण एव मानसपुत्राणां वारुणे यज्ञे पुनरुत्पत्तिः श्रूयते । सनत्कुमारोऽपि ब्रह्मण एव मानसः पुत्रः स्वयं रुद्राय वरप्रदानात्स्कन्दत्वेन प्रादुर्बभूव । एवमेव दक्षनारदप्रभृतीनां भूयसी देहान्तरोत्पत्तिः ' शुक्लकृष्णे ० ' ( उपासना और कर्मके अधिकारी जनोंके लिए देवयान और पितृयान मागं सनातन माने गये हैं । इनमें एकके द्वारा गया हुआ परम गतिको प्राप्त होता है और दूसरे द्वारा गया हुआ जन्म मृत्युको प्राप्त होता है ) ऐसी स्मृति भी है । देवयान मार्गका उपकोसलविद्या और पञ्चाग्निविद्यामें जो दो वार कथन है वह दोनों विद्याओंमें ध्यानके लिए है, अतः गतिका अनियम है ॥ ३१ ॥

विद्वानुका वर्तमान शरीर पात होनेपर दूसरा शरीर उत्पन्न होता है कि नहीं? इसप्रकार विचार किया जाता है । परन्तु साधनभूत विद्याकी प्राप्ति होनेपर मोक्ष निष्पन्न होता हैं कि नहीं, यह विचार उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि पाककी साधन सम्पत्ति होनेपर ओदन पाक होगा कि नहीं, ऐसा विचार नहीं हो सकता, और भोजन करनेवाला तृप्त होगा कि नहीं, ऐसा भी विचार नहीं किया जाता । किन्तु यह विचार तो युक्त है, क्योंकि कुछ ब्रह्मवेत्ताओं की मी अन्य शरीरकी उत्पत्ति इतिहास और पुराण में देखने में आती है । जैसे कि अपान्तरतमा नामके वेदाचार्य पुराण ऋषि विष्णुके आदेश से कलि और द्वापुरकी सन्धिमें कृष्णद्वैपायनरूपमें उत्पन्न हुए, ऐसा स्मृतिकार कहते हैं । और वशिष्ठ ब्रह्मा के मानस पुत्र होते हुए निमिके शापसे पूर्व देहका त्यागकर ब्रह्माकी आज्ञासे फिर मित्रा और वरुणसे उत्पन्न हुए । इसीप्रकार ब्रह्मा के मानस पुत्र भृगु आदिकी भी वरुणके यज्ञ में पुनः उत्पत्ति सुनी जाती है । ब्रह्मा के मानस पुत्र सनत्कुमार भी स्वयं रुद्रको वरदान देनेके कारण कार्तिकेयरूपसे उत्पन्न हुए । इसीप्रकार दक्ष नारद आदिकी तत् तत् निमित्तसे अनेक शरीरोंकी उत्पत्ति स्मृतिमें कही जाती है । और श्रुति ( वेद ) में भी मन्त्र और अर्थवादमें प्रायः ऐसा सत्यानन्दी - दीपिका * ' मेधातिथेर्मेष ' इस मन्त्रमें इन्द्रका मेषरूपसे जन्म उपलब्ध होता है । ' वसिष्ठ उर्वशी पुत्रो जात: ' ( वसिष्ठ उवंशीका पुत्र उत्पन्न हुआ ) यह सामवेदका अर्थवाद है । इसप्रकार मोक्ष ज्ञानका फल न होनेसे ब्रह्मलोक प्राप्तिरूप फल सगुणविद्या फलके समान होनेके कारण अचिरादि मार्गका उपसंहार पूर्वपक्ष में फल है, सिद्धान्तमें उपर्युक्त व्यवस्थाकी सिद्धि फल है ।

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अधि ० १ ९ सू ० ३२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६ ९९ कथ्यते तेन तेन निमित्तेन स्मृतौ । श्रुतावपि मन्त्रार्थवादयोः प्रायेणोपलभ्यते । ते च केचित्पतिते पूर्वदेहे देहान्तरमाददते, केचित्तु स्थित एव तस्मिन्योगैश्वर्यवशादनेकदेहा-दानन्यायेन । सर्वे चैते समधिगतसकलवेदार्थाः स्मर्यन्ते । तदेतेषां देहान्तरोत्पत्तिदर्श-नात्प्राप्तं ब्रह्मविद्यायाः पाक्षिकं मोक्ष हेतुत्वमहेतुत्वं वेति । अत उत्तरमुच्यते - न, तेषा-मपान्तरतमः प्रभृतीनां वेदप्रवर्तनादिषु लोकस्थितिहेतुष्वधिकारेषु नियुक्तानामधिकार-तन्त्रत्वात्स्थितेः । यथाऽसौ भगवान्सविता सहस्रयुगपर्यन्तं जगतोऽधिकारं चरित्वा तदवसान उदयास्तमयवर्जितं कैवल्यमनुभवति - ' अथ तत ऊर्ध्वं उदेत्य नैवोदेता नास्तमे-एव ' मध्ये स्थाता ' ( छा ० ३।११।११ ) इति श्रुतेः, यथा च वर्तमाना ब्रह्मविद आरब्ध-भोगक्षये कैवल्यममुभवन्ति, ' तस्य तावदेव चिरं यावन विमोक्ष्येऽथ संपत्स्ये ' ( छा ० ६।१४।२ ) इति श्रुतेः, एवमपान्तरतमःप्रभृतयोऽपीश्वरेण तेषु तेष्वधिकारेषु नियुक्ताः सन्तः सत्यपि सम्यग्दर्शने कैवल्यतावक्षीणकर्माणो यावदधिकारमवतिष्ठन्ते, तदवसाने चापवृज्यन्त इत्यविरुद्धम् । सकृत्प्रवृत्तमेव हि ते फलदानाय कर्माशयमतिवाहयन्तः स्वातन्त्र्येणैव गृहादिव गृहान्तरमन्यमन्यं देहं संचरन्तः स्वाधिकार निर्वर्तनायापरिमुषितस्मृतय एव देहेन्द्रिय प्रकृतिवशित्वान्निर्माय देहान्युगपत्क्रमेण वाऽधितिष्ठन्ति । न चैते जातीस्मरा इत्युच्यन्ते, ' त एवैते ' इति स्मृतिप्रसिद्धेः । यथा हि सुलभा नाम ब्रह्मवादिनी जनकेन विवदितुकामा व्युदस्य स्वं देहं जानकं देहमाविश्य, व्युद्य तेन, पश्चात्स्वमेव देहमाविवेशेति स्मर्यते । यदि ह्युपयुक्ते सकृत्प्रवृत्ते कर्मणि कर्मान्तिरं देहान्तरारम्भकारणमाविर्भवेत्त-उपलब्ध होता है । कई एक तो वे पूर्वदेहके पातं होनेपरं अन्य देह ग्रहण करते हैं, और कई एक तो उस देह के विद्यमान होते ही योग ऐश्वयं बलसे अनेक अन्य शरीर धारण न्यायसे अन्य शरीरका ग्रहण करते हैं । और वे सब समधिगत सकल वेद अर्थवाले सम्यक् ज्ञाता स्मरण किये जाते हैं । इसलिए इनकी देहान्तरोत्पत्ति के दर्शन होनेसे ब्रह्मविद्या मोक्षकी पाक्षिक हेतु है अथवा अहेतु है, ऐसा प्राप्त होता है । सिद्धान्ती - इससे उत्तर कहा जाता है- नहीं, लोक स्थिति के हेतुभूत वेदप्रवर्तन आदि अधिकारों में नियुक्त इन अपान्तरतमा आदिकी अवस्थिति अधिकारके अधीन है । जैसे यह भगवान् सूर्यं सहस्रयुगपर्यन्त जगत्का अधिकार चलाकर उसकी समाप्ति होनेपर उदय और अस्त से रहित कैवल्यका अनुभव करते हैं, क्योंकि ' अथ तत ऊध्वं ० ' ( प्राणियोंके न होनेपर प्रारब्ध कर्म क्षीण होनेपर केवल ब्रह्मस्वरूप हो न उदित ही होगा और न व्यस्त ही होगा केवल मध्यमें - अपने में ही स्थिर रहेगा ) ऐसी श्रुति है । और जैसे वर्तमान ब्रह्मवेत्ता प्रारब्धकर्मो के भोगके क्षय होनेपर कैवल्यका अनुभव करते हैं, क्योंकि ' तस्य तावदेव ० ' ( उसके मोक्ष में उतना ही विलम्ब है जब तक कि वह देह बन्धन - लिङ्ग शरीरसे मुक्त नहीं होता, उसके पश्चात् वह सत्सपन्न - ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ) यह श्रुति है । वैसे ही ईश्वर द्वारा तत् तत् अधिकारोंमें नियुक्त होते हुए अपान्तरतमा आदि ईश्वर कैवल्यके हेतुभूत तत्त्वज्ञानके होनेपर भी कर्मोके क्षीण न होनेतक अधिकारमें रहते हैं और कर्मोंके क्षीण होनेपर मुक्त हो जाते हैं, इसमें कोई विरोध नहीं है, क्योंकि अधिकारका फल देनेके लिए एक वार प्रवृत्त हुए कर्माशयको समाप्त करते हुए एक घरसे दूसरे घरके समान स्वत-न्त्रता से ही अन्य अन्य देहमें संचार करते हुए अपने अधिकारको सम्पन्न करनेके लिए पूर्वं स्मृतिका लोप हुए विना ही देह, इन्द्रियोंकी प्रकृति ( स्वभाव ) को अपने अधीन कर युगपत् अथवा क्रमसे छानेक देहोंका निर्माणकर उसमें अधिष्ठित होते हैं । वे जातिस्मर नहीं कहे जाते, क्योंकि ' त एवैते ० ' ( ये वे ही हैं ) ऐसा स्मृतिमें प्रसिद्ध है । जैसे ' सुलमा नामकी ब्रह्मवादिनी जनकके साथ विवादकी कामनासे अपने देहका त्यागकर जनकके शरीरमें प्रवेशकर उसके साथ विवादकर पश्चात् अपने हो शरीरमें प्रवेश किया ' ऐसी स्मृति है । यदि एक वार प्रवृत्त हुए उपयुक्त कर्ममें दूसरे देहकी उत्पत्ति के

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७०० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ तोऽन्यदप्यदग्धबीजं कर्मान्तरं तद्वदेव प्रसज्येतेति ब्रह्मविद्यायाः पाक्षिकं मोक्षहेतुत्वमहे-तुत्वं वा शङ्कयेत, नत्वियमाशङ्कायुक्ता, ज्ञानात्कर्मबीजदाहस्य श्रुतिस्मृतिप्रसिद्धत्वात् । * तथाहि श्रुतिः - भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । श्रीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ' ( मुण्ड ० २१२१८ ) इति । ' स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः ' ( छा ० ७।२६।२ ) इति चैव-माद्यां । स्मृतिरपि - ' यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन । ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि मस्म-सात्कुरुते तथा ' ( भ ० गो ० ४।३७ ) इति, ' बीजान्यग्न्युपदग्धानि न रोहन्ति यथा पुनः । ज्ञान-दुग्धैस्तथा क्लेशैर्नात्मा संपद्यते पुनः ' इति चैवमाद्या । न चाविद्या दिक्लेशदा हे सति क्लेश-बीजस्य कर्माशयस्यैकदेशदाह एकदेशप्ररोहश्चेत्युपपद्यते, नाग्निदग्धस्य शालिबीज-स्यैकदेशप्ररोहो दृश्यते । * प्रवृत्तफलस्य तु कर्माशयस्य मुक्तेषोरिव वेगक्षयान्निवृत्तिः, ' तस्य तावदेव चिरम् ' ( छा ० ६ | १४ | २ ) इति शरीरपातावधिक्षेपकरणात् । तस्मादुपपन्ना यावदधिकारमाघिकारिकाणामवस्थितिः । नच ज्ञानफलस्यानैकान्तिकता । तथा च श्रुति-रविशेषेणैव सर्वेषां ज्ञानान्मोक्षं दर्शयति- ' तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत्तथर्षीणां तथा मनुष्याणाम् ' ( गृह ० १।४।१० ) इति । ज्ञानान्तरेषु चैश्वर्यादिफलेवासक्ताः स्युर्म-हर्षयः ते पश्चादैश्वर्यक्षयदर्शनेन निर्विण्णाः परमात्मज्ञाने परिनिष्ठाः कैवल्यं प्रापुरित्यु-पपद्यते - ' ब्रह्मणा सह ते सर्वे कारणभूत अन्य कर्मका आविर्भाव उसीप्रकार प्रसक्त होगा । इससे होगी । परन्तु यह आशङ्का युक्त है | जैसे ' मिद्यते हृदयग्रन्थिः ० ' हृदय ग्रन्थि जड़ - चेतन और उनके संशय नष्ट हो जाते हैं और इसके ब्रह्म हूँ ' की प्राप्ति होनेपर सम्पूर्ण संप्राप्ते प्रतिसंचरे । परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम् ' हो तो अन्य मी जिसका बीज दग्ध नहीं हुआ है ऐसा कर्मान्तर ब्रह्मविद्या- पाक्षिक मोक्षका हेतु है अथवा अहेतु है, ऐसी आशङ्का नहीं है, क्योंकि ज्ञानसे कर्म बीजका दाह श्रुति और स्मृति में प्रसिद्ध ( कार्य - कारणरूप से उस परब्रह्मका साक्षात्कार होनेपर इस जीवकी धर्मोंके तादात्म्याध्यासरूप गांठ टूट जाती है, आत्मविषयक सब सब कर्म क्षीण हो जाते हैं ) और ' स्मृतिलम्भे ० ' ( तथा स्मृति- ' मैं ग्रन्थियों की निवृत्ति हो जाती है ) इत्यादि श्रुति है । और ' यथैषांसि ० ' ( हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि इन्धनको भस्ममयकर देती है, वैसे ही ज्ञान सम्पूर्ण कर्मोंको भस्म-मय - निर्बीज कर देता है ) और ' बीजान्यग्न्युपदग्धानि ० ' ( जैसे अग्निसे भूने गये बीज फिर नहीं उगते, वैसे ही ज्ञानाग्निसे दग्ध हुए क्लेशोंसे पुनः शरीर उत्पन्न नहीं होता ) इत्यादि स्मृति मी है । उसीप्रकार अविद्या आदि क्लेशोंके दाह होनेपर क्लेशके बीज कर्माशयके एक देशका दाह हो और एक देशका प्ररोह हो, यह उपपन्न नहीं होता । अग्निसे दग्ध शाली बीजके एक देशका प्ररोह नहीं देखा जाता । जैसे छोड़े हुए बाणकी निवृत्ति वेग क्षय होनेसे होती है, वैसे प्रवृत्त फलवाले कर्माशयको निवृत्ति भी वेगक्षय ( भोगक्षय ) होने पर होती है । क्योंकि ' तस्य तावदेव चिरम् ० ' ( उसे तभी तक विलम्ब है ) इसप्रकार शरीर पात पर्यन्त विलम्ब होता है, इसलिए अधिकार पर्यन्त अधिकारियों की अवस्थिति उपपन्न है | ज्ञानके फलमें व्यभिचार नहीं है, क्योंकि ' तद्यो यो ० ' ( उसे देवों में से जिस-जिसने जाना वही तद्रूप हो गया । इसीप्रकार ऋषियों और मनुष्यों में से भी जिसने उसे जाना वह्न तद्रूप - ब्रह्मरूप हो गया ) यह श्रुति समानरूपसे सबका ज्ञानसे मोक्ष दिखलाती है । ऐश्वर्यं आदि फलको देनेवाली अन्य उपासनाओं में महर्षि लोग आसक्त हुए, अनन्तर वे ऐश्वयं क्षय दर्शनसे विरक्त होकर परमात्माके ज्ञानमें पूर्णरूप से निष्ठावान् होकर कैवल्यको प्राप्त हुए, ऐसा उपपन्न है, क्योंकि सत्यानन्दी -दीपिका * अज्ञानके दो अंश हैं - एक आवरण और दूसरा विक्षेप | आवरण तो ज्ञानसे निवृत्त हो जाता है, जैसे प्रकाशसे अन्धकार | दूसरा विक्षेप - प्रारब्धकमं, वह भोगसे क्षय होता है । इसलिए ज्ञान होनेपर मी प्रारब्ध जन्य शरीर रहता है, अतः ज्ञानके मोक्षरूप फलमें व्यभिचार नहीं है ।

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अधि ० २० सू ० ३३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७०१ इति स्मरणात् । प्रत्यक्षफलत्वाच्च ज्ञानस्य फलविरहाशङ्कानुपपत्तिः । कर्मफले हि स्वर्गादावनुभवानारूढे स्यादाशङ्का भवेद्वा न वेति । अनुभवारूढं तु ज्ञानफलम्, ' यत्सा-क्षादपरोक्षाद्ब्रह्म ' ( बृ ० ३।४।१ ) इति श्रुतेः, ' तत्त्वमसि ' ( ६ / १७ ) इति च सिद्धवदुपदेशात् । नहि ' तत्त्वमसि ' इत्यस्य वाक्यस्यार्थस्तत्त्वं मृतो भविष्यसीत्येवं परिणेतुं शक्यः । ' तद्धैतत्प-श्यन्नृषिर्वामदेवः प्रतिपेदेऽहं मनुवं सूर्यश्व ' ( बृह ७ १ | 8 | ३० ) इति च सम्यग्दर्शन कालमेव

तत्फलं सर्वात्मत्वं दर्शयति । तस्मादैकान्तिकी विदुषः कैवल्यसिद्धिः ॥ ३२ ॥

( २० अक्षरध्यधिकरणम् । सू ० ३३ ) अक्षरधियां त्ववरोधः सामान्यतद्भावाभ्यामौपसदव तदुक्तम् ॥ ३३ ॥

पदच्छेद - अक्षरधियाम्, तु, अवरोधः, सामान्यतद्भ ( वाभ्याम्, औपसदवत्, तद्, उक्तम् । सूत्रार्थ - ( अक्षरधियाम् ) ब्रह्म विषयक विशेष प्रतिषेधक सत्र बुद्धियोंका सर्वत्र ( अवरोध:) उपसंहार होना चाहिए, ( सामान्यतद्भावाभ्याम् ) क्योंकि द्वैत निरसन द्वारा ब्रह्मप्रतिपादन प्रकार सर्वत्र समान है और वही प्रतिपाद्य ब्रह्म सर्वत्र एकरूपसे प्रत्यभिज्ञात होता है । ( मपसदवत् ) जैसे उपसद इष्टि मन्त्र सर्वत्र समान हैं, ( तदुक्तम् ) यह जैमिनीय सूत्रमें कहा गया है । * वाजसनेयके श्रूयते – ' एतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्त्यस्थूलमनण्वहस्वमदी-घूमलोहितमस्नेहम् ' ( बृह ० ३।६।८ ) इत्यादि । तथाऽऽथर्वणे श्रूयते -'अथ यया तदक्षरमाधि-' ब्रह्मणा सह ते ० ' ( महाप्रलय प्राप्त होनेपर और पर हिरण्यगर्भका अन्त होनेपर विमल अन्तःकरणवाले ज्ञानी ब्रह्माके साथ ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त होते हैं ) ऐसी स्मृति - कूर्मपुराण हैं । प्रत्यक्ष फलवाला होने से ज्ञानमें फल अभावको आशङ्का नहीं हो सकती । परन्तु अनुभव में न आनेवाला कर्म - फल स्वर्गं आदिमें ' होगा कि नहीं ' ऐसो आयङ्का हो सकती है । ज्ञानका फल तो अनुभवमें आरूढ है अर्थात् सिद्ध है, क्योंकि ' यत्साक्षादपरोक्षाद्बह्म ' ( जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है ) ऐसी श्रुति है, और ' तत्त्वमसि ' इसप्रकार सिद्धवत् उपदेश है । ' तत्त्वससि ' इस वाक्यका अर्थ ' वह तू मृत होगा ' इसप्रकार परिणित नहीं किया जा सकता । ‘ तद्वैतत् ' ( उसे आत्मरूप से अनुभव करते हुए ऋषि वामदेवने जाना- —मैं मनु हुआ और सूर्य मी ) यह श्रुति तत्त्वज्ञान कालमें ही उसका फल सर्वात्मत्व दिखलाती है । इसलिए विद्वानुकी कैवल्य सिद्धि अव्यभिचरित है ॥ ३२ ॥

वाजसनेयकमें ' एतद्वैत्तदक्षरम् ० ' ( याज्ञवल्क्य - हे गार्गी! जो तुमने मुझसे पूछा कि आकाश किसमें ओत - प्रोत है, वह यह है, ब्रह्मवेत्ता तो उस तत्त्वको अक्षर कहते हैं, वह अस्थूल, अनणु, अह्रस्व, अदीर्घ अलोहित और अस्नेह है ) इत्यादि श्रुति कहती है । उसी प्रकार आथर्वण में ' अथ परा ० सत्यानन्दी - दीपिका * ' तत्त्वमसि ' ( तत् तस्य त्वम् असि भविष्यसि ' तू उपासना करके मरणानन्तर उस ब्रह्मका होगा ) इस श्रुति वाक्यका यह अर्थ नहीं हो सकता, क्योंकि वर्तमानकालके उपदेशमें भविष्यत्का और जीवित दशा में मरणका अध्याहार अयुक्त है और कल्पना गौरव भी है । इसलिए ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि वेदान्तवाक्योंसे आत्मज्ञानके उत्पत्तिकालमें ही विद्वानुको सर्वात्मभाव फल प्राप्त होता है । अतः निर्गुणविद्या में सगुण विद्याके समान अर्चिरादि मार्गका उपसंहार नहीं है ॥ ३२ ॥

* इस अधिकरणमें अक्षर ब्रह्मकी प्रमिति करानेवाले निषेध शब्द विषय हैं, उन श्रुतियोंमें जहाँपर जितने निषेधों का श्रवण है वे सम्पूर्ण द्वैतका निषेध कर सकते हैं कि नहीं? इस प्रकार संभव और असंभव होने के कारण ' तासाम् ' इत्यादिसे संशय कहते हैं । पूर्वपक्ष में लाघव फल है अर्थात् उन निषेध शब्दोंकी तत् - वत् शाखा में व्यवस्था है, सिद्धान्त में दोनों दोषोंका अभाव फल है, क्योंकि यदि श्रुत निषेध शब्दोंसे अश्रुत निषेध शब्द भी लक्ष्य हों, तो लक्षणा प्रसक्त होगी, यदि ये लक्ष्य न हों

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७०२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ गम्यते यत्तदद्देश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णम् ' ( मु ० १ | १ | ५ ) इत्यादि, तथैवान्यत्रापि विशेषनिराकर-णद्वारेणाक्षरं परं ब्रह्म श्राव्यते । तत्र च कचित्केचिदतिरिक्ता विशेषाः प्रतिषिध्यन्ते । तासां विशेषप्रतिषेधबुद्धीनां किं सर्वासां सर्वत्र प्राप्तिरुत व्यवस्थेति संशये, श्रुतिविभागाद्व्य-वस्थाप्राप्तावुच्यते - अक्षर विषयास्तु विशेषप्रतिषेधबुद्धयः सर्वाः सर्वत्रावरोद्धव्याः सामा-न्यतद्भावाभ्याम् – समानो हि सर्वत्र विशेष निराकरणरूपो ब्रह्मप्रतिपादनप्रकारः । तदेव च सर्वत्र प्रतिपाद्यं ब्रह्माभिन्नं प्रत्यभिज्ञायते । तत्र किमित्यन्यत्र कृता बुद्धयोऽन्यत्र न स्युः? तथा च ' आनन्दादयः प्रधानस्य ' ( ब्रह्मसूत्र ३ | ३ | ११ ) इत्यत्र व्याख्यातम् । तत्र विधिरूपाणि विशेषणानि चिन्तितानीह प्रतिषेधरूपाणीति विशेषः । प्रपञ्चार्थश्चायं चिन्ता-भेदः । * औपसदवदिति निदर्शनम् । यथा जामदग्न्येऽहीने पुरोडाशिनीषूपसत्सु चोदि-तासु पुरोडाशप्रदान मन्त्राणाम् ' अग्नेर्वेहोत्रं वेरध्वरम् ' इत्येवमादीनामुद्गातृवेदोत्पन्नानामप्य-ध्वर्युभिरभिसंबन्धो भवति, अध्वर्युकर्तृकत्वात्पुरोडाशप्रदानस्य प्रधानतन्त्रत्वाच्चाङ्गानाम् । ( तथा जिससे वह अक्षर परमात्मा अधिगत होता है, वह परा विद्या है । वह जो अदेश्य - सब बुद्धि इन्द्रियोंका अविषय, अग्राह्य - कर्मेन्द्रियोंका अविषय, अगोत्र- अनन्वय और अवर्ण है ) इत्यादि श्रुति कहती है । इसी प्रकार अन्य शाखा में भी विशेष निराकरण द्वारा अक्षर पर ब्रह्मका श्रवण कराया जाता है । उनमें कहींपर कुछ अतिरिक्त अधिक विशेषोंका प्रतिषेध होता है । क्या उन विशेष प्रतिषेधक बुद्धियोंकी सर्वत्र प्राप्ति है अथवा व्यवस्था है, ऐसा संशय होनेपर श्रुतियोंके विभागसे निषेध बुद्धियोंकी तत्वद् शाखा में व्यवस्था प्राप्त होनेपर कहा जाता है— अक्षर विषयक सब विशेष प्रतिषेधक बुद्धियोंका सर्वत्र उपसंहार होना चाहिए, क्योंकि सामान्य और तद्भाव है । विशेष निराकरणात्मक ब्रह्मका प्रति पादन प्रकार सर्वत्र समान है । और वही प्रतिपाद्य ब्रह्म सर्वत्र अभिन्नरूपसे प्रत्यभिज्ञात होता है । वहाँ एक शाखा में की गई बुद्धियाँ अन्य शाखायें क्यों नहीं होनी चाहिए । उसी प्रकार ' आनन्दादयः प्रधानस्य ' इस सूत्र में व्याख्यान किया गया है । उसमें विधि रूप विशेषणोंका विचार किया गया है और यहाँ निषेधरूप विशेषणोंका विचार किया जाता है, इतना इन दोनों अधिकरणों में विशेष ( भेद ) है । और यह पुन: किये जानेवाला विचार विशेष उसीके विस्तार के लिए है । मोपसदके समान । यह दृष्टान्त है । जैस जमदग्नि द्वारा किये गये अहीन ( चार दिनमें अनुष्ठित अहीन नाकक सोमयाग में पुरोडाश युक्त उपसद इष्टियोंका विधान होनेपर ' अग्नेर्वेहोत्रं वेरध्वरम् ' ( देवताओंका होत्र और अध्वर कर्म अग्निसे ही सम्पन्न होते हैं ) इत्यादि उद्गाताके वेदमें उत्पन्न हुए पुरोडाश प्रदान मन्त्रोंका भी अध्वर्युंके साथ सम्बन्ध होता है, क्योंकि पुरोडाय प्रदान अध्वर्युं कर्तृक होता है और अङ्ग प्रधानके अधीन होते हैं । वैसे ही यहाँ भी अक्षर के अधीन होनेसे जहाँ कहीं पर भी उत्पन्न हुए उनके विशेषणोंका सर्वत्र अक्षरके साथ सम्बन्ध है, ऐसा अर्थ है । वह प्रथम काण्डमें ' गुणमुख्य-सत्यानन्दी - दीपिका तो सम्पूर्ण द्वैतका निषेध बसिद्ध होनेसे निर्विशेष ब्रह्मज्ञानका अभाव दोष होगा, अत: एक शाखागत निषेध वाक्योंका अन्य शाखागत विषेध वाक्योंके साथ एक वाक्यता होनेसे उपसंहार युक्त है । * जमदग्निः पुष्टिकामश्चतूरात्रेणायजत ' ( पुष्टिकी कामनावाले जमदग्निने चार दिनमें अनुष्ठित अहीन नामक सोम याग किया ) जमदग्निकृत होनेसे इस यज्ञका नाम भी जामदग्न्यहीन पड़ा है । उसमें ' पुरोडाशिन्य उपसदो भवन्ति ' इससे पुरोडाश साध्य उपसद इष्टियों का तैत्तिरीयमें विधान है, इन इष्टियों का कर्ता अध्वर्यु ' है, अतः ' अग्नेर्वेर्होत्रं वेरध्वरम् ' इत्यादि सामवेदमें उत्पन्न हुए मन्त्रों का इन उपसद् इष्टियोंमें विनियोग होनेसे अध्वयु से ही उनका प्रयोग होना चाहिए, उद्गातासे नहीं । मन्त्रोंका सामवेदमें उत्पन्न होनेसे उद्गातासे प्रयोग हो और विनियोग विधिसे अध्वर्यु से प्रयोग हो

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अधि ० २१ सू ० ३४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७०३ एवमिहाप्यक्षरतन्त्रत्वात्तद्विशेषणानां यत्र क्वचिदप्युत्पन्नानामक्षरेण सर्वत्राभिसंबन्ध इत्यर्थः । तदुक्तं प्रथमे काण्डे - ' गुणमुख्य व्यतिक्रमे तदर्थत्वान्मुख्येन वेदसंयोगः ' ( जै ० सू ० ३ | ३ | ८ ) इत्यत्र ॥ ३३ ॥

( २१ इयदधिकरणम् । सू ० ३४ ) इयदामननात् ॥ ३४ ॥

सूत्रार्थ - विद्या एक ही है, क्योंकि ' द्वा सुपर्णा ' और ' ऋतं पिबन्ती ' इन दोनों मन्त्रोंमें भी इयत्तासे परिच्छिन्न वेद्य एक ही है । * द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्न-न्यो अभिचाकशीति ' ( मु ० ३ | १ | १ ) इत्यध्यात्माधिकारे मन्त्रमाथर्वणिकाः श्वेताश्वतराश्च पठन्ति । तथा कठाः ' ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ' ( क ० ३ | १ ) इति । किमत्र विद्यैकत्वमुत विद्यानानात्व-मिति संशयः । किं तावत्प्राप्तम्? विद्यानानात्वमिति । कुतः? विशेषदर्शनात् । द्वा सुपर्णे-त्यत्र ह्येकस्य भोक्तृत्वं दृश्यते एकस्य चाभोक्तृत्वं दृश्यते । ' ऋतं पिबन्तौ ' इत्यत्रो भयोरपि भोक्तृत्वमेव दृश्यते तद्वे द्यरूपं भिद्यमानं विद्यां भिन्द्यादित्येवं प्राप्ते ब्रवीति - विद्यैकत्वमिति । व्यतिक्रमे ० ' ( गुण और मुख्यका विरोध होनेपर मन्त्रात्मक वेदका मुख्य - बलवत्तर मध्वर्युंके साथ संप्रयोग है, क्योंकि उत्पत्ति विधि विनियोगके लिए होती है ) यहाँपर कहा गया है ॥ ३३ ॥

' द्वा सुपर्णा ० ' ( सुन्दर पंखवाले नियम्यनियामक माववाले सवंदा साथ ही रहनेवाले, सखा-समान आख्यानवाले दो पक्षी शरीर नामक समान एक वृक्षका आश्रयकर रहते हैं उनमेंसे एक तो क्षेत्रज्ञ स्वादिष्ट कर्मफलका भोग करता है और दूसरा भोग न कर केवल साक्षीरूपसे देखता रहता है ) इसप्रकार अध्यात्मप्रकरणमें आथर्वणिक और श्वेताश्वतर मन्त्र पढ़ते हैं । और ' ऋतं पिबन्तौ ० ' ( ब्रह्मवेत्ता कहते हैं कि शरीरमें बुद्धिरूप गुहाके भीतर प्रकृष्ट ब्रह्म स्थानमें प्रविष्ट हुए अपने कर्म -फलको भोगनेवाले छाया और आतपके समान परस्पर विलक्षण दो [ तत्त्व ] हैं । यही बात जिन्होंने तीन वार नाचिकेताग्निका चयन किया है वे पञ्चाग्निकी उपासना करनेवाले भी कहते हैं ) इसप्रकार कठ शाखावाले कहते हैं । क्या यहाँपर विद्या एक है अथवा नाना है, ऐसा संशय होता है, तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - विद्या नाना । किससे? इससे कि विशेषका दर्शन है । ' द्वा सुर्पणा ' यहाँ एक भोक्तृत्व देखा जाता है और दूसरे में अभोक्तृत्व देखा जाता है । और ' ऋतं पिबन्तौ ' इसमें दोनों में भी भोक्तृत्व ही देखा जाता है । इसलिए वेद्यका रूप भिन्न होता हुआ विद्याको मिन्न करेगा | सिद्धान्ती –—–— ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं — विद्या एक है, किससे? इससे कि दोनों इन सत्यानन्दी - दीपिका इसप्रकार गुण और मुख्यका विरोध होनेपर मुख्य बलवत्तर अध्वर्युके साथ मन्त्रात्मक वेदका संप्रयोग है, क्योंकि उत्पत्ति विधि विनियोगके लिए होती है, यह सूत्र का अर्थ है । सामवेदीय मन्त्र उत्पत्ति परक हैं और उनका विनियोग यजुर्वेद में है, अतः उत्पद्यमान विनियुज्यमानके लिए होता है, इससे उनका अध्वर्युसे ही संप्रयोग होना युक्त है । अधिक शाबरभाष्य में देखना चाहिए ॥ ३३ ॥

* इन दोनों मन्त्रों में प्रतिपादनका प्रकार भिन्न है और ज्ञेय एक मान होता है, अतः ' किम् ' इत्यादि संशय कहते हैं । ' ऋतं पिबन्तौ ' इस ऋतपान वाक्य में ' अक्षरं ब्रह्म यत्परम् ' ( कठ ० १।३।२ ) ( जो परम अक्षर ब्रह्म है ) इन गुणोंका श्रवण है । और ' द्वा सुपर्णा ' इस सुपर्णवाक्य में अनुपयोग आदि धर्म हैं । पूर्वपक्षमें इन धर्मों का परस्पर अनुपसंहार फल है, सिद्धान्तमें धर्मो का उपसंहार माननेपर ब्रह्मस्वरूप प्रतिपादक वाक्योंका एक अर्थ होनेसे उपसंहार है ॥ ३४ ॥

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७०४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ कुतः? यत उभयोरप्यनयोर्मन्त्रयोरियत्तापरिच्छिन्नं द्वित्वोपेतं वेद्यरूपमभिन्नमामनन्ति । ननु दर्शितो रूपभेदः - नेत्युच्यते, उभावप्येतौ मन्त्रौ जीवद्वितीयमीश्वरं प्रतिपादयतः, नार्थान्तरम् । ' द्वा सुपर्णा ' इत्यत्र तावत् ' अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ' इत्यशनायाद्यतीतः पर-मात्मा प्रतिपाद्यते । वाक्यशेषेऽपि च स एव प्रतिपाद्यमानो दृश्यते । ' जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमी -शमस्य महिमानम् ' ( श्वे ० ४ ७ ) इति । ' ऋतं पिबन्तौ ' इत्यत्र तु जीवे पिबत्यशनायाद्यतीतः परमात्मापि साहचर्याच्छत्रिन्यायेन पिबतीत्युपचर्यते, परमात्मप्रकरणं होतत् - ' अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मात् ' ( क ० २।१४ ) इत्युपक्रमात् । तद्विषय एव चात्रापि वाक्यशेषो भवति-' यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् ' ( क ० ३।२ ) इति । ' गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि ' ( ब्रह्मसूत्र ( १२।११ ) इत्यत्र चैतत्प्रपञ्चितम् । तस्मान्नास्ति वेद्यभेदस्तस्माच्च विद्येकत्वम् । अपि च त्रिष्वप्येतेषु वेदान्तेषु पौर्वापर्यालोचने परमात्मविद्यैवावगम्यते । तादात्म्य विवक्षयैव जीवोपादानं नार्थान्तरविवक्षया । नच परमात्मविद्यायां भेदाभेदविचारावतारोऽस्ती-त्युक्तम् । तस्मात्प्रपञ्चार्थ एवैष योगः । तस्माच्चाधिकधर्मोपसंहार ( २२ अन्तराधिकरम् । सू ० ३५-३६ ) अन्तरा भूतग्रामवत्स्वात्मनः ॥ ३५ ॥

पदच्छेद - अन्तरा, भूतग्रामवत्, स्वात्मनः । सूत्रार्थ --- ' यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म ' ' य आत्मा सर्वान्तर: ' इन दोनों स्वात्माके ( अन्तरा ) सर्वान्तरत्वका कथन है । इससे विद्या एक ही है । (

समुदायमें एक ही सर्वान्तर आत्मा प्रतिपादित है ।

इति ॥ ३४ ॥

श्रुतियोंमें भी ( स्वात्मनः ) भूतग्रामवत् ) जैसे भूत-* यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म ' ' य आत्मा सर्वान्तरः ' ( बृह ० ३।४।१ - ३ | ५ | १ ) इत्येवं द्विरुषस्त-कहोलप्रश्नयोनैरन्तर्येण वाजसनेयिनः समामनन्ति । तत्र संशयः - विद्यैकत्वं वा स्याद्विद्या-मन्त्रों में भी इयत्ता से परिच्छिन्न, द्वित्व युक्त वेद्यरूप अभिन्न ही कहते हैं । परन्तु रूपका भेद दिख-लाया गया है? नहीं, ऐसा कहते हैं- ये दोनों मन्त्र भी जीव और द्वितीय ईश्वरका प्रतिपादन करते हैं, भिन्न अर्थका नहीं । ' द्वा सुपर्णा ' इस मन्त्रमें तो ' अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ' बुभुक्षा आदिसे अतीत परमात्माका प्रतिपादन होता है, और ' जुष्टं यदा ० ' ( जब अनेक योगमार्गों से सेवित और देह आदिसे भिन्न परमात्मा और उसकी महिमाको देखता है उस समय शोक रहित हो जाता है ) इस वाक्यशेष में भी वही परमात्मा प्रतिपाद्यमान देखा जाता है । ' ऋतं पिबन्तौ ' इस मन्त्रमें तो जीवके पान करनेपर भूख आदिसे बतीत परमात्मा भी साहचयंसे छत्रिन्यायसे पान करता है, ऐसा उपचार होता है, क्योंकि ' अन्यत्र धर्माद ० ' ( शास्त्रीय धर्मानुष्ठान तथा उसके फल, कर्ता, करण आदिसे पृथक है, अधमंसे पृथक् है ) इस उपक्रमसे यह परमात्माका प्रकरण है । आथर्वणिक आदि वाक्यके समान यहाँ भी ‘ यः सेतुरीजानानामक्षरम् ' ( जो यजन करनेवालोंके लिए सेतुके समान है, जो अक्षर परब्रह्म है ) यह वाक्यशेष परमात्मविषयक ही है । ' गुहा प्रविशवात्मानौ हि ' इस सूत्र में इस विषयका विस्तार पूर्वक विचार किया गया है । इसीसे वेद्यका भेद नहीं है और इससे विद्या एक है । किश्व पूर्वापरका विचार करनेपर इन तीनों ( आथर्वणिक, श्वेताश्वतर और काठक ) वेदान्तों में परमात्म-विद्या ही अवगत होती है और जीवका ग्रहण तो तादात्म्यविवक्षासे है अन्य अर्थकी विवक्षासे नहीं है । इससे परमात्मविद्यामें भेद अथवा अभेदके विचार करनेका अवतरण नहीं है, ऐसा कहा जा चुका है । इसलिए यह सूत्र विस्तारके लिए ही हैं और इससे अधिक धर्मोंका उपसंहार है ॥ ३४ ॥

' यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म ' ( जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है ) ' य आत्मा सर्वान्तर: ' ( जो अल्तमा

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अधि ० २२ सू ० ३६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७०५ नानात्वं वेति? विद्यानानात्वमिति तावत्प्राप्तम्, अभ्याससामर्थ्यात् । अन्यथा ह्यन्यूना-नतिरिक्तार्थे द्विराम्नानमनर्थकमेव स्यात् । तस्माद्यथाऽभ्यासात्कर्मभेद एवमभ्यासा-द्विद्याभेद इत्येवं प्राप्ते प्रत्याह- अन्तराम्नानाविशेषात्स्वात्मनो विद्यैकत्वमिति । सर्वान्तरो हि स्वात्मोभयत्राप्यविशिष्टः पृच्छयते च प्रत्युच्यते च । न हि द्वावात्मानावेकस्मिन्देहे सर्वान्तरौ संभवतः । तदा होकस्याञ्जसं सर्वान्तरत्वमवकल्प्येत, एकस्य तु भूतग्रामव-नैव सर्वान्तरत्वं स्यात् । यथा च पञ्चभूतसमूहे देहे पृथिव्या आपोऽन्तरा अद्द्भ्यस्तेजो-ऽन्तरमिति सत्यप्यापेक्षिकेऽन्तरत्वे नैव मुख्यं सर्वान्तरत्वं भवति, तथेहापीत्यर्थः । अथवा-भूतग्रामवदिति श्रुत्यन्तरं निदर्शयति । यथा - ' एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूता-न्तरात्मा ' ( श्वे ० ६।११ ) इत्यस्मिन्मन्त्रे समस्तेषु भूतग्रामेष्वेक एव सर्वान्तर आत्माम्ना-यते, एवमनयोरपि ब्राह्मणयोरित्यर्थः । तस्माद्वे द्यक्य । द्विद्यैकत्वमिति ॥ ३५ ॥

अन्यथा भेदानुपपत्तिरिति चेनोपदेशान्तरवत् ॥ ३६ ॥

पदच्छेद – अन्यथा, भेदानुपपत्तिः, इति चेत्, न, उपदेशान्तरवत् । सूत्रार्थ - ( अन्यथा ) यदि विद्याका भेद न माना जाय, तो ( भेदानुपपत्तिः ) श्रुतिभेद अनुपपन्न होता है, ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है, क्योंकि ( उपदेशान्तरवत् ) जैसे छान्दोग्यमें ' तत्त्वमसि ' इसका नौ वार अभ्यास होनेपर भी विद्याभेद और अनुपपत्ति नहीं है, वैसे प्रकृत में भी समझना चाहिए । सर्वान्तर है ) इसप्रकार उषस्त और कहोलके दो वार प्रश्नोंमें नैरन्वयंसे वाजसनेयी कहते हैं । यहाँ संशय होता है कि विद्या एक है अथवा विद्या नाना है? पूर्वपक्षी - विद्याएँ अनेक हैं, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि अभ्यासकी सामर्थ्यं है । अन्यथा न्यूनता और अधिकता से रहित अर्थ में दो वार कथन निरर्थक होगा । इससे जैसे ' यजति ' पदके अभ्याससे कर्मका भेद है, वैसे ही अभ्याससे विद्याका भेद है । सिद्धान्ती - – ऐसा प्राप्त होनेपर निराकरण करते हैं- स्वात्मामें सर्वान्तरत्व दोनों श्रुतियोंमें समानरूपसे कहा गया है, अतः विद्या एक है, क्योंकि सबके आभ्यन्तर स्वात्मा के विषय में दोनों स्थलों-में भी समानरूपसे प्रश्न और प्रतिवचन है । एक देहमें दो आत्माओंका सर्वान्तरत्व संभव नहीं है, यदि एकका कहो तो सर्वान्तरत्व मुख्यरूपसे हो सकता है और दूसरेका भूतग्राम के समान सर्वा-न्तरत्व नहीं होगा । जैसे पाँच भूतों के समूहदेह में पृथिवीसे जल आभ्यन्तर है और जलसे तेज आन्तर है इसप्रकार आपेक्षिक आन्तरत्व होनेपर भी उनमें मुख्य सर्वान्तरत्व नहीं है, वैसे यहाँ भी समझना चाहिए, ऐसा अर्थ है । अथवा मूतग्रामवत् अन्य श्रुतिका दृष्टान्त कहते हैं- जैसे ' एको देवः ० ' ( सम्पूर्ण प्राणियों में स्थित एक देव हैं, वह सर्वव्यापक और समस्त भूतोंका अन्तरात्मा है ) इस मन्त्रमें समस्त भूत समुदाय में एक ही सर्वान्तर आत्मा कहा जाता है, वैसे इन दोनों ब्राह्मणोंमें भी एक ही आत्माका

सर्वान्तरत्व है, ऐसा अर्थ है । इसलिए वेद्यके एक होनेसे विद्या मी एक है ॥ ३५ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका * ' यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे व्याचक्ष्व ' ( बृह ० ३।४।१ ) इसप्रकार उषस्त चाक्रायणने याज्ञवल्यसे प्रश्न किया उसके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने प्राण आदिके प्रेरक सबके साक्षी आमाका प्रतिपादन किया, और ' यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म ' ( बृह ० ३।५।१ ) इसतरह कहोलके प्रश्नके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने भूख व्यादिसे अतीत ब्रह्मका प्रतिपादन किया है । इसप्रकार इन दोनों ब्राह्मणोंमें प्रश्न आदिके अभ्यास से और सर्वान्तर के प्रत्यभिज्ञानसे एक विद्या है अथवा अनेक? इस प्रकार संशय होनेपर पूर्वपक्ष में अनेक विद्याएँ हैं, क्योंकि ' समिधो यजति ' ' स्वाहाकारं यजति ' जैसे यहाँ ' यजति ' के अभ्याससे

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७०६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ अथ यदुक्तम् --अनभ्युपगम्यमाने विद्याभेद आम्नानभेदानुपपत्तिरिति तत्परिह-र्तव्यम् । अत्रोच्यते- नायं दोषः, उपदेशान्तरवदुपपत्तेः । यथा ताण्डिनामुपनिषदि षष्ठे प्रपाठके ' स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो ' ( छा ० ६।८।७ ) इति नवकृत्वोऽप्युपदेशे न विद्याभेदो भवत्येवमिहापि भविष्यति । कथं च नवकृत्वोऽप्युपदेशे विद्याभेदो न भवति? उपक्रमो -पसंहाराभ्यामेकार्थतावगमात् ' भूय एव मा भगवान्विज्ञापयतु ' ( छा ० ६६८/७ ) इति चैक-स्यैवार्थस्य पुनः पुनः प्रतिपिपादयिषितव्यत्वेनोपक्षेपात्, आशङ्कान्तर निराकरणेन चास-कृदुपदेशोपपत्तेः । एवमिहापि प्रश्न रूपाभेदात् ' अतोऽन्यदार्तम् ' ( बृह ० ३।४।२-३।५।१ ) इति च परिसमाप्यविशेषादुपक्रमोपसंहारौ तावदेकार्थविषयौ दृश्येते । ' यदेव साक्षादपरोक्षा-द्ब्रह्म ' ( बृह ० ३।५।१ ) इति द्वितीये प्रश्न एवकारं प्रयुञ्जानः पूर्वप्रश्न गतमेवार्थमुत्तरत्रानु-कृष्यमाणं दर्शयति । पूर्वस्मिश्च ब्राह्मणे कार्यकरणव्यतिरिक्तस्यात्मनः सद्भावः कथ्यते, उत्तरस्मिंस्तु तस्यैवाशनायादि संसारधर्मातीतत्वं कथ्यते " इत्येकार्थतोपपत्तिः । तस्मा-देका विद्येति ॥ ३६ ॥

( २३ व्यतिहाराधिकरणम् । सू ० ३७ ) व्यतिहारो विशिषन्ति हीतरवत् ॥ ३७ ॥

पदच्छेद - व्यतिहारः, विशिषन्ति हि इतरवत् । सूत्रार्थ - ( इतरवत् ) सर्वात्मत्व आदि गुणोंके समान ( व्यतिहारः ) यह व्यतिहार भी उपासना के लिए कहा गया है, ( हि ) क्योंकि श्रुतिको कहनेवाले ' त्वं वा महमस्मि ' इस प्रकार उमय-का निर्देशक ( विशिषन्ति ) उन्हें विशिष्ट करते हैं । * तथा — ‘ तद्योऽहं सोऽसौ योऽसौ सोऽहम् ' इत्यादित्यपुरुषं प्रकृत्यैतरेयिणः समा-जो यह कहा गया है कि विद्याभेद स्वीकार न करनेपर मन्त्रोंके भेदकी अनुपपत्ति होती है, उसका परिहार करना चाहिए । इसपर कहते हैं - यह दोष नहीं है, क्योंकि अन्य उपदेशके समान उपपत्ति होती है । जैसे ताण्डियोंके उपनिषद् के छठे अध्याय में ' स आत्मा तत्त्वमसि ' ( वह आत्मा है, श्वेतकेतु! वह तू है ) इसप्रकार पिता उद्दालक द्वारा नौ वार उपदेश किये जानेपर भी विद्याका भेद नहीं है, वैसे यहाँ भी होगा । परन्तु नौ वार उपदेश किये जानेपर भी विद्याका भेद क्यों नहीं होता? इससे नहीं होता कि उपक्रम और उपसंहारसे एक अर्थ अवगत होता है । ' भूय एव ० ' ( हे भगवन्? आप मुझे फिर समझाइये ) इसप्रकार एक ही अर्थंकी पुनः पुनः प्रतिपादनकी इच्छाका विषय होनेसे और अन्य आशङ्का के निवारणसे वार वार उपदेश उपपन्न होता है, अतः विद्याका भेद नहीं होता । वैसे ही यहाँ भी प्रश्नरूपके अभेद होनेसे विद्याका भेद नहीं है । ' अतोऽन्यदार्तम् ' ( उस आत्मा से भिन्न विनाशी है ) इसप्रकार परिसमाप्तिका मी एकरूप होनेसे उपक्रम और उपसंहार एकार्थंविषयक देखनेमें आते हैं । ' यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म ' इसप्रकार द्वितीय प्रश्न में भी ' एव ' का प्रयोग करनेवाले ऋषि पूर्व प्रश्नगत अर्थका उत्तर प्रश्नमें अनुकर्षणकर दिखलाते हैं । पूर्वं ब्राह्मणमें कार्य - करणसे भिन्न आत्माका अस्तित्व कहा जाता है और उत्तर ब्राह्मण में उसको ही भूख आदि संसार धर्मो अतीत कहा जाता है, इसप्रकार एकार्थता उपपन्न होती है, इससे एक विद्या है ॥ ३६ ॥

जैसे ' तद्योऽहं ० ' ( जो मैं हूँ वही आदित्य मण्डलस्य पुरुष है और जो वह है वह मैं हूँ ) इस सत्यानन्दो -दीपिका कर्मका भेद है, वैसे आत्माके अभ्यास से यहाँ विद्यामें भेद है । इसलिए इनके परस्पर धर्मोंका अनुपसंहार है, सिद्धान्त में इनके धर्मोका परस्पर उपसंहार है । सिद्धान्ती - एक विद्या है, क्योंकि दोनों ब्राह्मणोंमें प्रश्न और प्रतिवचन एक आत्मविषयक है । इसलिए वेद्य एक होनेसे विद्या भी एक है ॥ ३५ ॥