श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 741–750

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 741–750

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अधि ० २३ सू ० ३७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीका सहित ७०७ मनन्ति, तथा जाबालाः - ' त्वं वा अहमस्मि भगवी देवतेऽहं वै त्वमसि ' इति । तत्र संशयः-किमिह व्यतिहारेणोभयरूपा मतिः कर्तव्योतैकरूपैवेति? एकरूपैवेति तावदाह । न ह्यत्रा-रमन ईश्वरेणैकत्वं मुक्त्वाऽन्यत्किचिच्चिन्तयितव्यमस्ति । यदि चैवं चिन्तयितव्यो विशेष परिकल्प्येत, संसारिणश्चेश्वरात्मत्वमीश्वरस्य संसार्यात्मत्वमिति । तत्र संसारिणस्ताव-दीश्वरात्मत्वे उत्कर्षो भवेत्, ईश्वरस्य तु संसार्यात्मत्वे निकर्षः कृतः स्यात्, तस्मादैक-रूप्यमेव मतेः । व्यतिहाराम्नायस्त्वेकत्वदृढीकारार्थ इति । एवं प्राप्ते प्रत्याह - व्यति-हारोऽयमाध्यानायाम्नायते, इतरवत् | थेरे गुणाः सर्वात्मत्प्रभृतय आध्यानायाम्ना-यन्ते, तद्वत् । तथा हि विशिषन्ति समाम्नातार उभयोच्चारणेन ' खमहमस्म्यहं च त्वमसि ' इति । तच्चोभयरूपायां मतौ कर्तव्यायामर्थवद्भवति । अन्यथा हीदं विशेषेणोभयाम्ना-नमनर्थकं स्यात्, एकेनैव कृतत्वात् । ननूभयाम्नानस्यार्थविशेषे परिकल्प्यमाने देवतायाः संसार्यात्मत्वापत्तेर्निकर्षः प्रसज्येतेत्युक्तम्- नैष दोषः, ऐकात्म्यस्यैवानेन प्रकारेणानु चिन्त्यमानत्वात् । नन्वेवं सति स एवैकत्वदृढीकार आपद्य ेत । न वयमेकत्वदृढीकारं वारयामः । किं तर्हि? व्यतिहारेणेह द्विरूपा मतिः कर्तव्या, वचनप्रामाण्यात्, नैकरूपे-प्रकार आदित्य पुरुषको प्रस्तुतकर ऐतरेयशाखा वाले कहते हैं, और ' त्वं वा ० ' ( हे देवता! तू हो मैं हूँ और मैं ही तू है ) इस प्रकार जाबाल कहते हैं । यहाँ संशय होता है कि क्या यहाँ व्यतिहार ( विशेषणविशेष्यभाव ) से उमयरूप मति करनी चाहिए अथवा एकरूप ही? पूर्वपक्षी— कहते हैं -एकरूप ही मति करनी चाहिए, क्योंकि इस व्यतिहारमें आत्माका ईश्वरके साथ एकत्व के विना अन्य कुछ भी चिन्तनीय नहीं है । यदि जोवको ईश्वररूपता और ईश्वर में जीवरूपता इस प्रकार चिन्तन योग्य विशेषकी कल्पना की जाय तो संसारी जीवको ईश्वरात्मत्व होनेपर उसका उत्कर्ष होगा और ईश्वरको जीवात्मत्व स्वीकार करनेपर उसका अपकर्ष होगा, इसलिए मति एकरूप ही है । ' त्वं वा ' यह व्यतिहार श्रुति तो एकत्वको दृढ करने के लिए है । सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर निराकरण करते हैं - यह व्यतिहार उपासनाके लिए कहा जाता है, अन्यके समान, जैसे सर्वात्मत्व आदि अन्य गुण उपासना के लिए कहे गये हैं, वैसे यह व्यतिहार भी कहा गया है । क्योंकि श्रुति कहनेवाले ' स्व महमस्म्यहं च त्वमसि ' इसी प्रकार दोनों के उच्चारणसे उन्हें इस तरह विशिष्ट करते हैं । और वह उमयोच्चारण उभयरूपसे मति करनेपर सार्थक होता है, नहीं तो इस विशेषसे उभय श्रुति अनर्थक होगी, क्योंकि एकके उच्चारणसे ही एकरूप मति सिद्ध होगी । परन्तु यह कहा गया है कि उमय श्रतिमें अर्थ विशेषकी कल्पना की जानेपर देवतामें संसारी जीवात्मत्व आजानेसे अपकर्षत्व प्रसक्त होगा । यह दोष नहीं है, क्योंकि एक स्वरूपताका ही इस प्रकारसे अनुचिन्तन है । परन्तु ऐसा होनेपर वही एकत्वका सत्यानन्दी - दीपिका * जीव और ईश्वर दोनोंके परस्पर विशेषण - विशेष्यभावको व्यतिहार कहा जाता है । यह व्यतिहार श्रुति प्रतिपादित होने से और ' उकृष्टदृष्टिर्निकृष्टे कृता फलवती ' ' निकृष्टमें की गई उत्कृष्ट दृष्टि फलवाली होती है ' इस न्यायसे संशय होनेपर उक्त न्यायसे जीवमें ईश्वर बुद्धि करनी चाहिए । पूर्वपक्ष में लाघव फल है, सिद्धान्तमें उमयश्रुति सार्थक है । सिद्धान्ती - " त्वं वा महमस्मि भगवो देवतेऽहं वै त्वमसि ' इन दोनोंका अनुवादकर इतरेतर भावका विधान होता है, अतः दोनोंमें दो प्रकार के चिन्तनका विधान किया जाता है । यदि एक बुद्धिका विधान होता तो ' तत्त्वमलि ' के समान ' योऽसौ सोऽहम् ' ( जो वह है वह मैं हूँ ) ' त्वमहमस्मि ' इस प्रकार एक उच्चारण ही पर्याप्त था, तो पुनः ' तद्योऽहं सोऽसौ ' ( जो मैं हूँ सो वह है ) ' अहं त्वमसि ' ( मैं तू है ) यह उच्चारण व्यर्थ होगा, अतः दोनों उच्चारणोंकी सार्थकता के लिए दो मति करनी चाहिए । संदिग्ध अर्थ में तो उक्त न्याय चरितार्थ हो सकता है, परन्तु यहाँ तो श्रुति प्रमाण है, अतः

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७०८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ त्येतावदुपपादयामः । फलतस्त्वेकत्वमपि दृढीभवति । यथाऽऽध्यानार्थेऽपि सत्यकामादि-गुणोपदेशे तद्गुण ईश्वरः प्रसिद्धयति, तद्वत् । तस्मादयमाध्यातव्यो व्यतिहारः समाने च विषय उपसंहर्तव्यो भवतीति ॥ ३७ ॥

( २४ सत्याद्यधिकरणम् । सू ० ३८ ) सैव हि सत्यादयः ॥ ३८ ॥

पदच्छेद - सा, एव, हि, सत्यादयः । सूत्रार्थ - ( सैंव ) सत्यविद्या एक ही है, ( हि ) क्योंकि ' तद्यत्तत्सत्यम् ' इसमें प्रकृत उपास्य हिरण्यगर्भका आकर्षण है, अतः विद्याका भेद नहीं हैं, इसलिए सभी ( सत्यादयः ) सत्य आदि गुणोंका अन्यत्र भी उपसंहार होना चाहिए । * ‘ स यो हैतं महद्यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्म ' ( बृह ० ५ | ४ | १ ) इत्यादिना वाजसनेयके सत्यविद्यां सनामाक्षरोपासनां विधायानन्तरमाम्नायते - ' तद्यत्तत्सत्यमसौ स आदित्यो य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषो यश्चायं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषः ' ( बृह ० ५/५/२ ) इत्यादि । तत्र संशयः - किं द्वे एते सत्यविद्ये वैकैवेति? द्वे इति तावत्प्राप्तम् । भेदेन हि फलसंयोगो भवति - ' जयती-माँल्लोकान् ' ( बृह ० ५।४।१ ) इति पुरस्तात्, ' हन्ति पाप्मानं जहाति च ' ( बृह ० ५/५/३/४ ) इत्यु-परिष्टात् । प्रकृता कर्षणं तूपास्यैकत्वादिति । एवं प्राप्ते ब्रूमः - एकैवेयं सत्यविद्येति । कुतः? दृढीकरण प्रसक्त होगा । हम एकत्वके दृढीकरणका वारण नहीं करते, किन्तु यहाँ श्रुतिवचन प्रामाण्यसे व्यतिहारसे द्विरूप मति करनी चाहिए एकरूप नहीं, केवल यही हम उपपादन करते हैं । फलत: -अर्थतः तो एकत्व भी दृढ होता है । जैसे सत्यकामत्व आदि गुणोंका उपदेश आध्यानके लिए होनेपर भी उन गुणोंवाला ईश्वर प्रसिद्ध होता है, वैसे यहां भी समझना चाहिए । इसलिए यह व्यतिहार ध्यान करने योग्य है और समान विषयमें उपसंहार करने योग्य है ॥ ३७ ॥

' स यो हैतं ० ' ( जो भी इस महत्, यक्ष - पूज्य प्रथम उत्पन्न हुएको ' यह सत्य ब्रह्म है ' ऐसा जानता है वह इन लोकोंको जीत लेता है ) इत्यादिसे वाजसनेयकमें नाम अक्षरको उपासनाके साथ सत्यविद्याका विधानकर अनन्तर ' तद्यत्तत्सत्यमसौ ० ' ( वह जो सत्य है वह यह आदित्य है । जो इस आदित्य मण्डल में पुरुष है और जो भी यह दक्षिण नेत्रमें पुरुष है ) इत्यादि श्रुति है 1 । उसमें संशय होता है कि क्या ये दो सत्य दिद्याएँ हैं अथवा एक ही है? पूर्वपक्षी - दो हैं, ऐसा प्राप्त होता है । क्योंकि ' जयतीमाँल्लोकान् ' ( वह इन लोकोंको जीत लेता है अर्थात् प्राप्त करता है ) इस प्रकार पूर्वकी उपासना में और ' हन्ति पाप्मानं ० ' ( जो ऐसा जानता है वह पापका नाश करता है और उसे त्याग देता है ) ऐसा अन्तिम उपासनामें फलका संयोग भिन्नरूपसे है । प्रकृतका आकर्षण तो उपास्यके एकत्व से है । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - यह सत्य विद्या एक ही है, किससे? इससे कि सत्यानन्दी - दीपिका अन्योन्यात्मत्वका ध्यान करना चाहिए । ब्रह्म में मनोमयत्व आदिके समान, जीवात्मत्वका ध्यानके लिए आरोप होनेपर भी अपकर्षत्व प्रसक्ता नहीं होता । जहाँ उमय मति होती है, वहाँ एकत्व अर्थसे सिद्ध होता है । इसलिए अहं ग्रहोपासना में इस व्यतिहारका उपसंहार करना चाहिए ॥ ३७ ॥

# ' सत्यम् ' यह नाम ' तत्, यत्, तत् ' इन तीन अक्षरोंका है । प्रथम और अन्तिम अक्षर सत्य हैं और मध्य अक्षर अनृत है । वह दोनों ओरसे सत्यके साथ संपुटित होने से सत्य प्रायः ही होता है, ऐसी सत्यविद्या अङ्गरूपसे नाम अक्षरकी उपासना की गई है । जो वह पूर्वमें कहा गया हृदयाख्य है, वह पूर्वोक्त यक्षत्व आदि गुणवाला ब्रह्म है, वह आदित्य मण्डलमें अक्षिमें जो पुरुष है वह है ।

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अधि ० २४ सू ० ३८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७० ९ ‘ तद्यत्तत्सत्यम् ं ( बृ ० ५।५।२ ) इति प्रकृताकर्षणात् । ननु विद्याभेदेपि प्रकृताकर्षणमुपास्यै-कत्वादुपपद्यत इत्युक्तम् । नैतदेवम्, यत्र तु विस्पष्टात्कारणान्तराद्विद्याभेदः प्रतीयते तत्रै-तदेवं स्यात् । अत्र तूभयथा संभवे तद्यत्तत्सत्यमिति प्रकृताकर्षणात्पूर्वविद्यासंबद्धमेव सत्यमुत्तरत्राकृष्यत इत्येकविद्यात्वनिश्चयः । यत्पुनरुक्तं फलान्तरश्रवणाद्विद्यान्तरमिति, अत्रोच्यते तस्योपनिषदहरहमिति चाङ्गान्तरोपदेशस्य स्तावकमिदं फलान्तरश्रवणमित्य-दोषः । अपि चार्थवादादेव फले कल्पयितव्ये सति विद्येकत्वे चावयवेषु श्रूयमाणानि बहून्यपि फलान्यवयविन्यामेव विद्यायामुपसंहर्तव्यानि भवन्ति । तस्मात्सैवेयमेका सत्य-विद्या तेन तेन विशेषेणोपेताम्नातेत्यतः सर्व एव सत्यादयो गुणा एकस्मिन्नेव. प्रयोगे उपसंहर्तव्याः । केचित्पुनरस्मिन्सूत्र इदं च वाजसनेयकमक्ष्यादित्यपुरुषविषयं वाक्यम्, छान्दोग्ये च- ' अथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते ( छा ० १।६।६ ), ' अथ य एषोऽक्षिण पुरुषो दृश्यते ( छा ० ४।१५ / १ ) इत्युदाहृत्य सैवेयमक्ष्यादित्य पुरुष विषया विद्यो भयत्रैकैवेति कृत्वा सत्यादीन्गुणान्वाजसनेयिभ्यश्छन्दोगानामुपसंहार्यान्मन्यन्ते । तन्न ' तद्यत्तत्सत्यम् ' इस प्रकार प्रकृतका आकर्षण है । परन्तु ऐसा कहा गया है कि विद्याका भेद होनेपर भी प्रकृतका आकर्षण उपास्यके एक होनेसे उपपन्न होता है । किन्तु ऐसा नहीं, जहाँ तो विस्पष्ट अन्य कारण ( प्रकरण ) से विद्याका भेद प्रतीत होता है, वहाँ प्रकृतका आकर्षण उपास्यके एक होनेसे भले ही हो, परन्तु यहाँ तो विद्यांका भेद और अभेद दोनों प्रकारोंसे संभव होनेपर ' तद्यत्तत्सत्यम् ' इस प्रकारका प्रकृतका आक-षंण होने से पूर्व विद्या से सम्बद्ध सत्यका ही उत्तर विद्या में आकर्षण होता है, इससे एक विद्याका निश्चय होता है । और जो यह कहा गया है कि अन्य फलकी श्रुति होनेसे विद्याका भेद है, उसपर कहा जाता है - उसके रहस्य नाम ' अहः ' और ' अहम् ' इसप्रकार अन्य अङ्गके उपदेशमें यह अन्य फलका श्रवण केवल स्तुतिमात्र है, अतः दोष नहीं है । किव अर्थवादसे ही फलकी कल्पना होनेपर विद्याके एकत्व-में अवयवों ( अङ्गों ) में श्रूयमाणं बहुत फलोंका मी अवयविनी विद्यामें उपसंहार होना चाहिए । इसलिए वही एक सत्य विद्या तत् तत् विशेषण से युक्त कही जाती है, अतः सत्य आदि सभी गुणों-का एक ही प्रयोग में उपसंहार होना चाहिए । दूसरे कई टीकाकार इस सूत्रमें वाजसनेयियों का यह वाक्य अक्षिपुरुष और आदित्यपुरुष विषयक है, और छान्दोग्यमें ' अथ य एषो ० ' ( तथा यह जो आदित्य मण्डलके अन्तर्गत सुवर्णमय - सा पुरुष दिखाई देता है ) ' अथ एषो ० ' ( जो यह अक्षिमें पुरुष दिखाई देता है ) इन दोनों वाक्योंका उदाहरण देकर वही यह अक्षिपुरुष और आदित्य-पुरुष विषयक विद्या दोनों स्थलोंमें एक ही है, ऐसा मानकर वाजसनेयियोंके उपसंहार योग्य सत्य सत्यानन्दी - दीपिका उसके ‘ अहः ' और ' अहम् ' दो रहस्य नाम जाननेसे पाप क्षयरूप फल होता है । यहाँ पूर्ववाक्यमें और उत्तरवाक्यमें फल भिन्न - भिन्न है । इस प्रकार श्रुति प्रमाण होनेसे और पूर्वं वाक्यमें जो प्रकृत है उसका उत्तर वाक्यमें आकर्षण होनेसे ' तत्र ' इत्यादिसे संशय कहते हैं । पूर्वपक्ष में गुणोंकी व्यवस्थासे अनुष्ठान हैं, सिद्धान्त में एक अनुष्ठान है । * सिद्धान्ती – केवल विशेष्य ब्रह्मका आकर्षण ठीक नहीं है, क्योंकि ' तत्, यत्, तत् ' इन सर्वनामों से पूर्वोक्त गुणोंसे युक्त ब्रह्मका आकर्षण कर आदित्यस्थान और अक्षिस्थान आदि गुणों का विधान है । इसलिए उपास्यके एक होनेसे विद्या एक है । * इसप्रकार दोनों शाखाओंमें उपक्रमके भेदसे विद्याका भेद है । इसलिए अङ्गभूत विद्यासे सत्य विद्या - हिरण्यगर्भ विद्या भिन्न होने से सत्य व्यादि गुणोंका उपसंहार नहीं है, यह एक देशीका आशय है । सिद्धान्त तो पूर्वमें कहा गया है ॥ ३८ ॥

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७१० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ साधु लक्ष्यते, छान्दोग्ये हि ज्योतिष्टोमकर्मसंबन्धिनीयमुद्गीथव्यपाश्रया विद्या विज्ञायते । तत्र ह्यादिमध्यावसानेषु हि कर्म संबन्धिचिह्नानि भवन्ति ' इयमेवर्गग्निः साम ' ( छा ० ११६३८ ) इत्युपक्रमे, ' तस्यर्चं साम च गेष्णौ तस्मादुद्गीथः ' ( छा ० १।६।८ ) इति मध्ये, ' य एवंविद्वा-न्साम गायति ' ( छा ० १।७।९ ) इत्युपसंहारे । नैवं वाजसनेयके किंचित्कर्मसंबन्धि चिह्न-मस्ति । तत्र प्रक्रमभेदाद्विद्याभेदे सति गुणव्यवस्थैव युक्तेति ॥ ३८ ॥

( २५ कामाद्यधिकरणम् । सू ० ३ ९ ) कामादितरत्र तत्र चायतनादिभ्यः ॥ ३ ९ ॥ पदच्छेद -- कामादि, इतरत्र, तत्र, च, आयतनादिभ्यः । सूत्रार्थ - ( कामादि ) सत्यकामत्व आदि गुण समूहका ( इतरत्र ) सर्व वशित्व आदि गुण समूहका भी ( तत्र ) छान्दोग्यमें उपसंहार होना चाहिए, क्योंकि उन दोनोंमें आयतन आदि समान हैं । ' अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः ' प्रस्तुत्य छन्दोगा अधीयते - ' एष आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको अन्यत्र - बृहदारण्यकमें ( आयतनादिभ्यः ) ( छा ० ८1१1१ ) इति विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः ' ( छा ० ८२११५ ) इत्यादि । तथा वाजसनेयिनः - ' स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिन्छेते सर्वस्य वशी ' ( बृह ०४ | ४ | २२ ) इत्यादि । तत्र विद्यैकत्वं परस्परगुणयोगश्च किं वा नेति संशये विद्यैकत्वमिति । तत्रेद-मुच्यते - कामादीति सत्य कामादीत्यर्थः । यथा देवदत्तो दत्तः, सत्यभामा भामेति । यदेत-च्छान्दोग्ये हृदयाकाशस्य सत्यका मत्वादिगुणजातमुपलभ्यते, तदितरत्र वाजसनेयके ' स व्रा एष महाजन आत्मा ' इत्यत्र संबध्यते, यच्चवाजसनेयके वशित्वाद्युपलभ्यते तदपीतरत्र आदि गुणोंका छन्दोगोंको उपसंहार करना चाहिए, ऐसा मानते हैं । परन्तु यह ठीक ज्ञात नहीं होता, क्योंकि छान्दोग्यमें ज्योतिष्टोम कर्म सम्बन्धी यह उद्गीथाश्रित विद्या ज्ञात होती है, कारण कि उसमें आदि, मध्य और अन्तमें कर्म सम्बन्धी चिह्न है - ' इयमेवग्निः सामः ' ( यह पृथिवी ऋक् और अन्नि साम है ) यह उपक्रममें, ‘ तस्य च ० ' ( ऋक् और साम उसके पर्व हैं, इसीसे वह देव उद्गीथरूप है ) यह मध्यमें और ' य एवं विद्वान् ० ' ( जो इसप्रकार जाननेवाला होकर साम गान करता है ) इसप्रकार उपसंहारमें है । किन्तु इसप्रकार वाजसनेयकमें कोई कर्म सम्बन्धी चिह्न नहीं है । इसलिए यहाँ उप-क्रमके भेदसे विद्याका भेद होनेपर गुणोंकी व्यवस्था ही युक्त है ॥ ३८ ॥

' अथ यदिदम ० ' ( अब इस ब्रह्मपुरके मीतर जो यह सूक्ष्म कमलाकार स्थान है, इसमें जो सूक्ष्म आकाश है ) इसप्रकार उपक्रम कर छन्दोग ' एष आत्मा ० ' ( यह आत्मा धर्माधर्मसे शून्य, जराहीन, मृत्युरहित, शोकातीत, भोजनेच्छारहित, पिपासा रहित, सत्यकाम और सत्यसङ्कल्प है ) इत्यादि पाठ करते हैं । उसीप्रकार वाजसनेयी ' स वा एष महानज ० ' ( वह यह महान् अजन्मा आत्मा जो यह प्राणों में विज्ञानमय है, जो यह हृदयमें आकाश है उसमें शयन करता है, वह सबको वश में रखनेवाला है ) इत्यादि अध्ययन करते हैं । उनमें विद्याका एकत्व और परस्पर गुणों का योग-उपसंहार है अथवा नहीं? ऐसा संशय होनेपर विद्या एक है, यह सिद्धान्त है । उसपर यह कहते हैं - ' कामादि ' सत्यकाम आदि, ऐसा अर्थ है । जैसे कि ' देवदत्त ' ' दत्त ' कहा जाता है और सत्यभामा मामा कही जाती है । छान्दोग्य में हृदयाकाशके जो यह सत्यकामत्व आदि गुण समूह उपलब्ध होता है वह अन्यत्र ' स वा एष महानज आत्मा ' इस वाजसनेयकमें सम्बद्ध होता है और जो वाजसनेयक में वशित्व आदि गुण समूह उपलब्ध होता है वह भी अन्यत्र - छान्दोग्यमें ' य आत्माऽपहतपाप्मा ' यहाँ

पृष्ठ 745

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अधि ० २६ सू ० ४० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७११ छान्दोग्ये ' एष आत्माऽपहतपाप्मा ' ( छा ० ८1१1५ ) इत्यत्र संबध्यते । कुतः? आयतनादिसा-मान्यात् । समानं ह्युभयत्रापि हृदयमायतनं समानश्च वेद्य ईश्वरः समानं च तस्य लोका-संभेदप्रयोजनमित्येवमादि बहु सामान्यं दृश्यते । ननु विशेषोऽपि दृश्यते छान्दोग्ये हृदयाकाशस्य गुणयोगो वाजसनेयके त्वाकाशाश्रयस्य ब्रह्मण इति । न । ' दहर उत्तरेभ्यः ' ( ब्रह्मसूत्र १।३।१४ ) इत्यत्र छान्दोग्येऽप्याकाशशब्दं ब्रह्मैवेति प्रतिष्ठापितत्वात् । अयं त्वत्र विद्यते विशेषः - सगुणा हि ब्रह्मविद्या छान्दोग्य उपदिश्यते, ' अथ य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्ये-तांश्च सत्यान्कामान् ' ( छा ० ८ | १ | ६ ) इत्यात्मवत्कामानामपि वेद्यत्वश्रवणात् । वाजसनेयके तु निर्गुणमेव परं ब्रह्मोपदिश्यमानं दृश्यते, ' अत ऊर्ध्वं विमोक्षाय ब्रूहि ' ( बृह ० ४।३।१४ ), ' असङ्गो ह्ययं पुरुषः ' ( बृह ० ४ | ३ | १५ ) इत्यादिप्रश्नप्रतिवचन समन्वयात् । वशित्वादि तु तत्स्तुत्यर्थमेव गुणजातं वाजसनेयके संकीर्त्यते । तथा चोपरिष्टात् स एष नेति नेत्यात्मा ' ( बृह ० ३।९ ।२६ ) इत्यादिना निर्गुणमेव ब्रह्मोपसंहरति । गुणवंतस्तु ब्रह्मण एकत्वाद्वि-भूतिप्रदर्शनायायं गुणोपसंहारः सूत्रितो नोपासनायेति द्रष्टव्यम् ॥ ३ ९ ॥ ( २६ आदराधिकरणम् । सू ० ४०-४१ ) आदरादलोपः ॥ ४० ॥

पदच्छेद - आदरात्, अलोपः । सूत्रार्थ -- भोजनका लोप होनेपर भी अग्निहोत्रका ( अलोपः ) लोप नहीं है, ( आदरात् ) क्योंकि ' पूर्वोऽतिथिभ्योऽश्नीयात् ' इत्यादि जाबाल श्रुतिने प्राणाग्निहोत्रका आदर किया है । छान्दोग्ये वैश्वानर विद्यां प्रकृत्य श्रूयते - ' तद्यद्भक्तं प्रथममागच्छेत्तद्धोमीयं स यां प्रथमा-माहुतिं जुहुयात्तां जुहुयात्प्राणाय स्वाहा ' ( छा ० ५।१ ९ / १ ) इत्यादि । तत्र पञ्च प्राणाहुतयो विहिताः, तासु च परस्तादग्निहोत्रशब्दः प्रयुक्तः - य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति ' ( छा ० सम्बन्धित होता है, किससे? इससे कि दोनों में आयतन आदि समान हैं । दोनों शाखाओं में हृदय स्थान समान ही है, वेद्य ईश्वर समान है और लोक मर्यादाके असंकर प्रयोजनवाला उसका सेतुत्व समान है, इत्यादि बहुत सामान्य देखा जाता है । परन्तु विशेष भी दिखाई देता है - छन्दोग्यमें हृदयाकाशमें गुणोंका योग है और वाजसनेयक में आकाशके आश्रय ब्रह्ममें गुणोंका योग है । ऐसा नहीं, क्योंकि ' दहर उत्तरेभ्य: ' इस सूत्रमें छान्दोग्यमें भी आकाशशब्द ब्रह्म वाचक हो है, ऐसा सिद्धान्त प्रतिष्ठापित किया गया है । परन्तु यहाँ यह विशेष विद्यमान है - छान्दोग्य में सगुण ब्रह्मविद्या उपदिष्ट है - ' अथ य ० ' ( जो यहाँ आत्मको और सत्यकामोंको जानकर परलोक जाते हैं ) इसप्रकार आत्मा के समान सत्यकामोंमें वेद्यत्वका श्रवण है । वाजसनेयक में तो ' अत ऊर्ध्व ० ' ( अब आगे मुझे मोक्षके लिए उप-देश कीजिए ) ' असङ्गो ह्ययं पुरुषः ' ( यह पुरुष असङ्ग है ) इत्यादि प्रश्न और प्रतिवचन के समन्वयसे निर्गुण परब्रह्म ही उपदिश्यमान दिखाई देता है । इसलिए वशित्व आदि गुण समूह तो उसकी स्तुति-के लिए वाजसने में कहा गया है । उसीप्रकार आगे भी ' स एष ० ' ( नेति नेति, ऐसा कहकर जो निरूपण किया गया है, वह यह आत्मा है ) इत्यादिसे श्रुति निर्गुण ब्रह्मका ही उपसंहार करती है । सगुण ब्रह्मके एक होनेसे उसकी विभूति प्रदर्शनके लिए यह गुणोपसंहार सूत्रित किया गया है । उपा-सनाके लिए नहीं, ऐसा समझना चाहिए ॥ ३ ९ ॥ छान्दोग्यमें वैश्वानर विद्याको प्रस्तुतकर ' तद्यद्भक्तं ० ' ( अत: भोजन के समय जो अन्न पहले आवे, उसका हवन करना चाहिए, उस समय वह मोक्ता जो पहली आहुति दे उसे ' प्राणाय स्वाहा ' ऐसा कहकर दे ) इत्यादि श्रुति है । उसमें पाँच प्राण आहुतिथ विहित हैं । और उनमें बागे ' य एतदेवं ० '

पृष्ठ 746

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७ ९ २ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ ५। २४।२ ) इति, ' यह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते । एवं सर्वाणि भूतान्यग्निहोत्रमुपासते ' ( छा ० ५ / २४।५ ) इति च । तत्रेदं विचार्यते - किं भोजनलोपे लोपः प्राणाग्निहोत्रस्योतालोप इति । तद्यद्भक्तमिति भक्तागमन संयोगश्रवणाद्भक्तागमनस्य च भोजनार्थत्वाद्भोजनलोपे लोपः प्राणाग्निहोत्रस्येति । एवं प्राप्ते न लुप्येतेति तावदाह । कस्मात्? आदरात् । तथा हि वैश्वानरविद्यायामेव जाबालानां श्रुतिः - ' पूर्वोऽतिथिभ्योऽश्नीयात् । यथा ह वै स्वयमहुत्वाऽग्नि-होत्रं परस्य जुहुयादेवं तत् ' इत्यतिथिभोजनस्य प्राथम्यं निन्दित्वा स्वामिभोजनं प्रथमं प्राप-यन्ती प्राणाग्निहोत्रे आदरं करोति । या हि न प्राथम्यलोपं सहते नेतरां सा प्राथम्यव-तोऽग्निहोत्रस्य लोपं सहेतेति मन्यते । * ननु भोजनार्थ भक्तागमनसंयोगाद्भोजन लोपे लोपः प्रापितः - न, तस्य द्रव्यविशेषविधानार्थत्वात् । प्राकृते ह्यग्निहोत्रे पयःप्रभृतीनां द्रव्याणां नियतत्वादि हाप्यग्निहोत्र शब्दात्कौण्डपायिनामयनवत्तद्धर्मप्राप्ती सत्यां भक्त-द्रव्यैकतागुणविशेषविधानार्थमिदं वाक्यं तद्यद्भक्तमिति । अतो गुणलोपे न मुख्यस्येत्येवं प्राप्तम्, भोजनलोपेऽप्यद्भिर्वाऽन्येन वा द्रव्येणाविरुद्धेन प्रतिनिधानन्यायेन प्राणाग्नि-होत्रस्यानुष्ठानमिति ॥ ४० ॥

अत उत्तरं पठति-( जो इस - वैश्वानरको उस प्रकार जाननेवाला पुरुष अग्निहोत्र करता है ) और ' यथेह क्षुधिता वाला. ' ( जिस प्रकार इस लोक में भूखे बालक सब प्रकार माताकी उपासना करते हैं उसी प्रकार सम्पूर्ण प्राणी. इस ज्ञानीके जोजनरूप अग्निहोत्रकी उपासना करते हैं कि यह भोजन कब करेगा ) इस प्रकार अग्निहोत्र शब्द प्रयुक्त है । उसपर यह विचार किया जाता है कि भोजनका लोप होनेपर क्या अग्निहोत्र होमका लोप होता है अथवा लोप नहीं होता? परन्तु ' तद्यद्भक्तम् ' इस प्रकार अन्न आगमन सम्बन्धका श्रवण • होने से और अन्न आगमनको भोजनके लिए होनेसे भोजनका लोप होनेपर प्राणाग्नि होत्रका लोप होना चाहिए? ऐसा प्राप्त होनेपर पूर्वपक्षी कहते हैं- प्राणाग्निहोत्रका लोप नहीं होना चाहिए, किससे? इससे कि उसका श्रुतिमें आदर है । उसी प्रकार वैश्वानरविद्या में जाबालोंकी ' पूर्वोऽतिथिभ्यो ० ' ( उसको अतिथियोंसे पूर्व भोजन करना चाहिए, जैसे वह अपना अग्निहोत्र होम न कर अन्यका अग्निहोत्र होम करे, वैसे ही वह हैं ) यह श्रुति अतिथि भोजनकी प्रथमताकी निन्दाकर स्वामी भोजनको प्रथम प्राप्त कराती हुई प्रणाग्निहोत्र होममे आदर करती है, क्योंकि जो श्रुति प्रथमताका लोप नहीं सह सकती ऐसे प्रथमतावाले अग्निहोत्रका लोप तो बिल्कुल नही सह सकेगी, ऐसा माना जाता है । परन्तु भोजन के लिए अन्नके आगमनका प्राणाग्निहोत्रके साथ सम्बन्ध होनेसे भोजन लोप होनेपर उसका लोप प्राप्त है? नहीं, क्योंकि वह द्रव्य विशेषके विधानके लिए है । प्राकृत अग्निहोत्र में दूध आदि द्रव्योंके नियत होनेसें यहाँ मी अग्निहोत्र शब्दसे कुण्डपायियोंके अयनके समान उसके धर्मकी प्राप्ति होनेपर अन्न रूप द्रव्यके एकतारूप गुण विशेषके विधानके लिए ' तद्यद्भक्तम् ' यह वाक्य है । इसलिए गुणके लोप होनेपर मुख्यका लोप नहीं है, ऐसा प्राप्त हुआ । भोजनका लोप होनेपर भी जलसे अथवा अविरुद्ध अन्य द्रव्यसे प्रतिनिधि न्याय से प्राणाग्निहोत्रका अनुष्ठान है ॥ ४० ॥

इसपर उत्तर कहते हैं-सत्यानन्दी - दीपिका * जैसे कुण्डपायियों के सत्रगत ' मासमग्निहोत्रं जुहोति ' इस मास अग्निहोत्र होममें नित्य अग्निहोत्र वाचक गौण अग्निहोत्रशब्दसे नित्य अग्निहोत्रके धर्म पयः, दधि द्रव्य आदि अतिदेशसे प्राप्त होते हैं, वैसे यहाँ भी प्राणाहुति में अग्निहोत्र शब्दके बलसे पयः, दधि द्रव्य आदि उत्सगंसे प्राप्त होनेपर भोजनार्थं अन्न द्रव्यकी विधिसे उसका अपवाद किया जाता है, अतः अन्न विधिके अपवादार्थक होनेसे अन्नका लोप होनेपर मुख्य अग्निहोत्रका लोप नहीं होता, क्योंकि अपवादके अभाव-

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अधि ० २६ सू ० ४१ ] भाषानुवाद सत्यानन्दी- दीपिकासहित ७१३ उपस्थितेऽतस्तद्वचनात् ॥ ४१ ॥

पदच्छेद - उपस्थिते, अतः, तद्वचनात् । सूत्रार्थ - ( उपस्थिते ) भोजन द्रव्यके उपस्थित होनेपर ( अतः ) इसी प्रथम प्राप्त भोजन द्रव्यसे प्राणाग्निहोत्र करना चाहिए, ( तद्वचनात् ) क्योंकि ' तद्यद्भक्तम् ' इत्यादि वाक्य है, और आदर वचन तो भोजन प्राप्ति दशाको लेकर है । * उपस्थिते भोजनेऽतस्तस्मादेव भोजनद्रव्यात्प्रथमोपनिपतितात्प्राणाग्निहोत्रं निर्वर्तयितव्यम् । कस्मात्? तद्वचनात् । तथा हि - ' तद्यद्भक्तं प्रथममागच्छेत्त होमीयम् ' ( छा ०५ / १ ९ / १ ) इति | सिद्धवद्भक्तोपनिपातपरामर्शेन परार्थद्रव्यसाध्यतां प्राहु-तीनां विदधाति । ता अप्रयोजक लक्षणापन्नाः सत्यः कथं भोजनलोपे द्रव्यान्तरं प्रति-निधापयेयुः । न चात्र प्राकृताग्निहोत्रधर्मप्राप्तिरस्ति । कुण्डपायिनामयने हि ' मासमग्नि-होत्र जुहोति ' इति विध्युद्देशगतोऽग्निहोत्र शब्दस्तद्वद्भावं विधापयेदिति युक्ता तद्धर्म-प्राप्तिः । इह पुनरर्थवादगतोऽग्निहोत्रशब्दो न तद्वद्भावं विधापयितुमर्हति । तद्धर्मप्राप्तौ चाभ्युपगम्यमानायामग्न्युद्धरणादयोऽपि प्राप्येरन् । न चास्ति संभवः । अग्न्युद्धरणं तावद्धोमाघिकरणभावाय । न चायमग्नौ होमः, भोजनार्थताव्याघातप्रसङ्गात् । भोज-नोपनीतद्रव्यसंबन्धाच्चास्य एवैष होमः । तथा च जाबालश्रुतिः ' पूर्वोऽतिथिभ्योऽश्नीयात् ' सिद्धान्ती – भोजनके उपस्थित होनेपर उस प्रथम प्राप्त भोजन द्रव्यसे ही अग्निहोत्र सम्पन्न करना चाहिए, क्योंकि उसका वचन है । जैसे कि ' तद्यद्भक्तं ० ' ( अतः जो अन्न- भोजन प्रथम प्राप्त हो उसका हवन करना चाहिए ) यह श्रुति सिद्धवत् प्रकृत प्राप्त मक्त भोजनका जो आगमन उसके ( तत् शब्द से ) परामर्शसे परार्थं ( भोजनार्थ - तृप्ति के लिए ) द्रव्यसे साध्य प्राण आहुतियोंका विधान करती है । वे आहुतियां तृप्तिरूप अर्थकी अप्रयोजक ' - प्रयोजक लक्षण ( आक्षेपत्व ) के अभावसे युक्त होती हुई मोजन के लोप होनेपर किस प्रकार अन्य द्रव्यका प्रतिनिधापन ( प्रतिनिधिन्यायसे आक्षेप ) कर सकेंगी । और यहाँ प्राकृत अग्निहोत्र धर्मकी प्राप्ति नहीं है । कुण्डपायियों के अयनमें तो ' मासपर्यन्त व्यग्निहोत्र होम करे ' इस विधिके उद्देश्य में प्राप्त जो अग्निहोत्र शब्द है वह ' तद्वद्भाव ' प्राकृत अग्निहोत्रके समान भाव - धर्मं विधान कराएगा, इससे उसमें उसके धर्मको प्राप्ति युक्त है । परन्तु यहां प्राणाग्नि होत्र में अर्थवाद गत अग्निहोत्र शब्द प्रकृत अग्निहोत्रके सहय धर्मोका निधान नहीं करा सकता । यदि प्रकृत अग्निहोत्रके धर्मकी प्राप्ति स्वीकार की जाय तो उस अग्निके उद्धरण आदि भी प्राप्त होने चाहिए । किन्तु यहाँ ( प्राणाग्निहोत्र में ) उनका संभव नहीं है, क्योंकि अग्निका उद्धरण होमके अधिकरणत्वके लिए है, और यह द्रव्यरूप होम प्रकृत अग्निमें नहीं होता, क्योंकि भोजनके लिए हैं, उसका [ प्रकृत सत्यानन्दी - दीपिका में उत्सगंसे प्राप्त पय आदि द्रव्यसे अग्निहोत्रकी निष्पत्ति संभव है । ' गुणलोपे न मुख्यस्य ' ( अङ्गके लोप होनेपर मुख्यका लोप नहीं होता ) यह जैमिनि सूत्र है । आरब्ध नित्य आदि कर्म अवश्य अनुष्ठेय होते हैं । यदि उनमें श्रुत द्रव्यकी प्राप्ति न हो तो प्रतिनिधि द्रव्यसे भी कर्म कर्तव्य है । जैसे श्रुत कुशाके अभाव में शरसे कर्म किया जाता है, यह प्रतिनिधि न्याय है । अतः मोजनके लोप होनेपर मी अन्य पय आदि द्रव्यसे प्राणाग्निहोत्रका अनुष्ठान करना युक्त है । पूर्वपक्ष में भोजन लोप होनेपर भी अन्य द्रव्यसे प्राणाग्निहोत्रका अनुष्ठान है, सिद्धान्तमें उसका लोप है ॥ ४० ॥

४ ' तद्धोमीयम् ' यहां ' तत् ' शब्दसे भोजन के लिए जो सिद्ध अन्न है उसका आश्रयकर मुखगत होमका विधान है । इसलिए प्रकृत अन्नका ' तत् ' पदसे परामर्शकर भोजन के लिए प्राप्त द्रव्यसे १. उद्देश्याभावे सत्युपादेयस्याप्रवृत्तेर्मोजनार्थ हव्य लोपे लोप एव प्राणाग्निहोत्रस्य ।

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७१४ ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ इत्यस्याधारामेवेमां होभनिर्वृत्तिं दर्शयति । अत एव चेहापि सांपादिकान्येवाग्नि-होत्राङ्गानि दर्शयति – ' उर एव वेदिलमानि बर्हिर्हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहव नीयः ' ( छा ० ५।१८।२ ) इति । वेदिश्रुतिश्चात्र स्थण्डिलमात्रोपलक्षणार्था द्रष्टव्या, मुख्या-ग्निहोत्रे वेद्यभावात् तदङ्गानां चेह संपिपादयिषितत्वात् । भोजनेनैव च कृतकालेन संयोगान्नाग्निहोत्रकालावरोधसंभवः । एवमन्येऽप्युपस्थानादयो धर्माः केचित्कथंचिद्वि-रुध्यन्ते । तस्माद्भोजनपक्ष एवैते मन्त्रद्रव्यदेवतासंयोगात्पञ्च- होमा निर्वर्तयितव्याः । यत्त्वादरदर्शनवचनं, तद्भोजनपक्षे प्राथम्यविधानार्थम् । न ह्यस्ति वचनस्यातिभारः । न त्वनेनास्य नित्यता शक्यते दर्शयितुम् । तस्माद्भोजनलोपे लोप एव प्राणाग्निहोत्रस्येति । ( २७ तन्निर्धारणाधिकरणम् । सू ० ४२ ) तन्निर्धारणानियमस्तद्द्दष्टेः पृथग्ध्यप्रतिबन्धः फलम् ॥ ४२ ॥

पदच्छेद - तन्निधारणा नियमः, तद्दृष्टेः, पृथक्, हि, अप्रतिबन्धः फलम् । सूत्रार्थ - ( तन्निर्धारणानियमः ) कर्माजी के आश्रित उपासनाओं का नित्यके समान अनुष्ठान नहीं है, क्योंकि यह अनियम ( तद्दृष्टे: ) ' तेनोमी कुरुतः ' इत्यादि श्रुतिमें प्रतिपादित है । ( पृथग्य प्रतिबन्धः फलम् ) उन उपासनाओंका कर्मफलसे पृथक् अप्रतिबन्ध फल विशेष उपलब्ध होता है । अग्निके सदृश धर्मोके स्वीकार करनेपर ] व्याघात प्रसङ्ग होगा, इसलिए भोजनार्थ प्राप्त द्रव्यके साथ सम्बन्ध होनेसे मुखमें ही यह होम होता है । उसी प्रकार ' पूर्वोऽतिथिभ्योऽश्नीयात् ' यह जाबाल श्रुति भी मुख में ही इस होमकी निष्पत्ति दिखलाती है । इसीसे यहाँ भी कल्पनासे संपादन किये गये अग्निहोत्रके अङ्गोंको ' उर एव ० ' ( इस वैश्वानर उपासकका वक्षःस्थल वेदी है, लोभ दभं हैं, हृदय गापंत्याग्नि है, म अन्वाहायचन ( दक्षिणाग्नि ) और मुख आहवनीय अग्नि है ) यह श्रुति दिखलाती है । यहाँ प्राणानिहोत्र में वेदीकी श्रुति स्थण्डिलमात्र उपलक्षणार्थक समझनी चाहिए, क्योंकि मुख्य अग्निहोत्रमें बेदीका अभाव है और प्राणाग्निहोत्र में उसके अङ्गोंका संपादन करना अभीष्ट है । भोजनके द्वारा ही निश्चित होनेवाले कालके साथ [ प्राणाग्निहोत्रका ] सम्बन्ध होनेसे मुख्य अग्निहोत्र के कालके साथ अवरोध सम्भव नहीं है । इसी प्रकार उपस्थान आदि अन्य भी कई एक धर्म कथंचित् विरुद्ध होते हैं । इसलिए मन्त्र, द्रव्य और देवताके सम्बन्धसे भोजन पक्षमें ये पाँच होम निष्पन्न होने चाहिए । ओर जो आदरदर्शन वचन है, वह तो भोजन पक्षमें प्रथमता विधान करनेके लिए है । इसमें वचनका कोई मार नहीं है, क्योंकि इस ( प्रथमतावचन ) से इस प्राणाग्निहोत्रकी नित्यता नहीं दिखाई जा सकती । इसलिए भोजनके लोप होनेपर प्राणाग्निहोत्रका लोप ही होता है ॥ ४१ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका ' प्राणाय स्वाहा, अपानाय स्वाहा ' इत्यादि पाँच आहुतियाँ सिद्ध होती हैं । भोजनके लोप होनेपर उनका भी लोप ही होता है, इससे ये बाहुतियाँ अन्य द्रव्यका आक्षेप नहीं करतीं । जैसे क्रतुसे प्रयुक्त अप् आनयनके आश्रित गोदोहन पात्रका क्रतुके लोप होनेपर लोप ही होता है । aara - face अग्निहोत्र के धर्मोकी प्राप्ति न होनेसे ही प्राणाग्निहोत्र में कल्पना से अग्निहोत्रके अङ्गोंका संपादन किया गया है, अन्यथा संपादन व्यर्थ हो जायगा । परन्तु जिन श्रुति और स्मृतियों में स्वामी ( उपासक ) का भोजनकाल अतिथि भोजनकालके पश्चात् विहित है, वह ' पूर्वोऽतिथिभ्योऽश्नी-यात् ' इस वचनसे कैसे बाधित होगा? इस विशेषवाक्य से सामान्यवाक्य वाधित होता है, क्योंकि विशेष वचनको सामान्य वचनके बांध में कोई मार नहीं है । सामान्य वचन उपासकसे भिन्न मोक्ता के लिए है । इस प्राथभ्यवचनसे प्राणाग्निहोत्रकी नित्यता सिद्ध नहीं होती । प्राण उपासकको भोजन प्राप्त होनेपर प्राथम्यके अर्थमें आदर होनेसे आदर शब्द अन्यथासिद्ध है । इससे यह शिद्ध हुआ कि भोजनके लोप होनेपर प्राणाग्निहोत्रका लोप ही होता है ॥ ४१ ॥

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अधि ० २७ सू ० ४२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७१५ सन्ति कर्माङ्गव्यपाश्रयाणि विज्ञानानि - ' ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत ' ( छा ० १।१।१ ) इत्येवमादीनि । किं तानि नित्यान्येव स्युः कर्मसु पर्णमयीत्वादिवदुतानित्यानि, गोदो-हनादिवदिति विचारयामः । किं तावत्प्राप्तम्? - नित्यानीति । कुतः? प्रयोगवचनपरिग्र-हात् | अनारभ्याधीतान्यपि ह्येतान्युद्गीथादिद्वारेण क्रतुसंबन्धात्क्रतुप्रयोगवचननेनैवाङ्गा-न्तरवत्संस्पृश्यन्ते । यत्त्वेषां स्ववाक्येषु फलश्रवणम् -'आपयिता ह वै कामानां भवति ' ( छा ० १।१।७ ) इत्यादि, तद्वर्तमानापदेशरूपत्वादर्थवादमात्रमेवापापश्लोकश्रवणादिवन्न फलप्रधा-नम् । तस्माद्यथा ' यस्य पर्णमयी जुहूर्भवति न स पापं श्लोकं शृणोति ' इत्येवमादीनामप्रकरण-पठितानामपि जुह्वादिद्वारेण ऋतुप्रवेशात्प्रकरणपठितवन्नित्यतै त्रमुद्गीथाद्युपासनानाम-पीति । एवं प्राप्ते ब्रूमः तन्निर्धारणनियम इति । यान्येतान्युद्गीथादिकर्मगुणयाथात्म्यनि-धरणानि रसतम आप्तिः समृद्धिर्मुख्यप्राण आदित्य इत्येवमादीनि नैतानि नित्यवत्कर्मसु नियम्येरन । कुतः? तद्दः । तथाह्यनियतत्वमेवजातीयकानां दर्शयति श्रुतिः - तेनोभी कुरुतो यश्चैतदेवं वेद यश्च न वेद ' ( छा ० १ | १ | १० ) इत्यविदुषोऽपि क्रियाभ्यनुज्ञानात् । प्रस्तावा-दिदेवताविज्ञानविहीनानामपि प्रस्तोत्रादीनां याजनाध्यवसानदर्शनात् ' प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्तातां चेदविद्वान्प्रस्तोष्यसि ' ( छा ० १ | १० | ९ ), ' तां चेदविद्वानुद्गास्यति ' ( छ: ०१।१०।१० ) ' तां चेदविद्वान्प्रतिहरिष्यसि ' ( छा ० १ | १० | ११ ) इति च । अपि चैवंजातीयकस्य कर्मव्यपा-' ओमित्येतदक्षरमु ० ' ( उद्गीथके अवयव इस ॐ अक्षरको उपासना करनी चाहिए ) इत्यादि कर्म- ज्योतिष्टोम आदिके अङ्गोंका आश्रयण करनेवाली उपासनाएँ हैं । क्या ये उपासनाएँ कर्मोंमें पर्णमयीत्व आदिके समान नित्य हैं अथवा गोदोहन आदिके समान अनित्य हैं? इस विषयपर हम विचार करते हैं, तो क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी -- नित्य हैं । किससे? इससे कि प्रयोग वचनका परिग्रह है । क्रतुके प्रकरण में न पठित होनेवाली इन उपासनाओंका उद्गीथ आदि द्वारा क्रतुके साथ सम्बन्ध होने से क्रतु प्रयोग वचनसे हो अन्य अङ्गके समान ये भी सम्बन्धवाली होती हैं । जो इन विज्ञानोंका अपने वाक्यों में ' आपयिता ह वै ० ' ( जो विद्वान् उपासक इस प्रकार इस उद्गीथरूप अक्षरकी उपासना करता है वह ( यजमानकी ) ( सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त करानेवाला होता है ) इत्यादि फलका श्रवण है । वह फल श्रवण वाक्यमें वर्तमान कालका उपदेश होने से अर्थवाद मात्र ही है-: - अपाप-श्लोक श्रवण व्यादिके समान फल प्रधान नहीं है । इसलिए जैसे ' यस्य पर्णमयी ० ' ( जिसकी पर्णमयी ( पलायकी ) जुहू होती है वह लोकमें पाप श्लोकका श्रवण नहीं करता ) इत्यादि क्रतुके प्रकरण में अपठितोंका मी जुहू आदि द्वारा क्रतुमें प्रवेश सम्बन्ध होनेसे प्रकरण में पठितके समान नित्यत्व है, वैसे उद्गीथ आदि उपासनाओं को भी समझना चाहिए । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-- उपासना के निर्धारणका अनियम है, ' रसोंमें वह श्रेष्ठ, कामनाओं की प्राप्ति करानेवाला, समृद्धि देनेवाला, मुख्य प्राण आदित्य है ' इत्यादि उद्गीथ आदि कर्माङ्गों यथावत् स्वरूप ' रसतमत्व आदि ' का निर्धारण करनेवाली जो ये उपासनाएं हैं, वेनि कर्माङ्गों के समान [ पर्णमयीत्वके समान ] कर्मोंमें नियमित नहीं होनी चाहिए, क्योंकि श्रुतिमें ऐसा ही दृष्ट है । कारण कि इसी प्रकारकी उपासनाएँ अनित्य हैं, श्रुति दिखलाती है-' तेनोभौ कुरुत: ० ' ( जो उद्गीथावयव भूत इस ॐ अक्षरको रसतमत्व आदि विशिष्ट जानता है और जो नहीं जानता है वे दोनों ही उसके द्वारा कर्म करते हैं ) इसप्रकार अविद्वान् के लिए भी कमंकी अनुज्ञा है | और ' प्रस्तोतर्या ० ' ( हे प्रस्तोता! जो देवता प्रस्ताव - भक्ति में अनुगत है यदि तू उसे विना जाने प्रस्तवन करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा ) ' तां चेदविद्वानुद्गास्यति ० ' ( हे उद्गाता! यदि तू

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७१६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ श्रयस्य विज्ञानस्य पृथगेवै कर्मणः फलमुपलभ्यते कर्मफलसिद्धय प्रतिबन्धस्तत्समृद्धिरति-शयविशेषः कश्चित् ' तेनोभौ कुरुतो यइचैतदेवं वेद यश्च न वेद । नाना तु विद्या चाविद्या च यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति ' ( छा ० १ । १ । १० ) इति । तत्र ' नाना तु ' इति विद्व-दविद्वत्प्रयोगयोः पृथक्करणाद्वीर्यवत्तरमिति च तरप्प्रत्ययप्रयोगाद्विद्याविहीनमपि कर्म वीर्य-वदिति गम्यते । तच्चानित्यत्वे विद्याया उपपद्यते । नित्यत्वे तु कथं तद्विहीनं कर्मवीर्यवदित्य-नुज्ञायेत । सर्वाङ्गोपसंहारे हि वीर्यवत्कर्मेति स्थितिः । तथा लोकसामादिषु प्रतिनियता नि प्रत्युपासनं फलानि शिष्यन्ते- ' कल्पन्ते हास्मै लोका ऊर्ध्वाश्चावृत्ताश्च ' ( छा ० २।२।३ ) इत्येव-मादीनि नचेदं फलश्रवणमर्थवादमात्रं युक्तं प्रतिपत्तुम् । तथा हि गुणवाद आपद्येत । फलोपदेशे तु मुख्यवादोपपत्तिः । प्रयाजादिषु त्वितिकर्तव्यताकाङ्गस्य क्रतोः प्रकृतत्व-तादर्थ्ये सति युक्तं फलश्रुतेरर्थवादत्वम् । तथानारभ्याधीतेष्वपि पर्णमयीत्वादिषु । उसे विना जाने उद्गान करेगा ) और ' तां चेदविद्वान्प्रतिहरिष्यति ० ' ( हे प्रतिहर्ता! यदि तू उसे विना जाने प्रतिहार भक्तिका गान करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा ) इसप्रकार प्रस्ताव आदिके देवता के विज्ञानसे रहित प्रस्तोता आदिमें याजनका निश्चय देखा जाता है । और इसप्रकारके कर्मके आश्रित विज्ञानका कर्मफलसे पृथक् फल उपलब्ध होता है - कर्मफल सिद्धिके प्रतिबन्धसे रहित उसका कोई समृद्धिरूप अतिशय विशेष फल विज्ञानमें उपलब्ध होता है - ' तेनोमौ कुरुतो ० ' ( जो उद्गीथके अव-यव भूत इस ॐ अक्षरको रसतमत्वादि विशिष्ट जानता है अथवा जो नहीं जानता वे दोनों ही उसके द्वारा कर्म करते हैं, किन्तु विद्या और अविद्या दोनों भिन्न भिन्न हैं । जो कर्म विद्या- श्रद्धा और योग से युक्त होकर किया जाता है वही अविद्वान् कर्मसे वीर्यवत्तर - अधिक फलवाला होता है ) इस श्रुतिमें ' नाना तु ' इस शब्द से विद्वान् और अविद्वान् कृत प्रयोगोंमें पृथक्करण होनेसे ' वीर्यवत्तरम् ' इसमें तरप्रत्ययका प्रयोग होनेके कारण उपासना होन कर्म भी वीयंवत् फलवाला होता है, ऐसा ज्ञात होता है । वह विद्या अनित्य होनेपर उपपन्न होता है । यदि विद्या नित्य हो तो उससे विहीन कर्म वीर्यवत् है, ऐसी अनुज्ञा किस प्रकार होती, क्योंकि सब अङ्गोंका उपसंहार होनेपर कमं वीर्यवत् होता है, ऐसी स्थिति है । तथा लोकदृष्टि आदिसे साम आदिकी प्रत्येक उपासना में – ' कल्पन्ते हास्मै. ' ( इससे जो इसप्रकार जाननेवाला पुरुष लोकोंमें पञ्चविध सामकी उपासना करता है उसके प्रति ऊर्ध्वं और अधोमुख लोक मोग्यरूपसे उपस्थित होते हैं ) इत्यादि प्रतिनियत फल उपदिष्ट हैं । बोर यह फल श्रुति अर्थवाद मात्र समझना युक्त नहीं है, क्योंकि उसे अर्थवाद माननेपर गुणवाद प्रसक्त होगा । किन्तु फलके उपदेशमें तो मुख्यवाद उपपन्न होता है । प्रयाज आदिमें तो इतिकर्तव्यता की आङ्काक्षा रखनेवाले क्रतुके प्रकृत होनेसे प्रयाज आदि क्रतुके लिए होनेपर उनमें फल श्रुति अर्थवाद हो यह युक्त है । इसीप्रकार कर्मप्रकरणके आरम्भमें पठित न होनेवाले पर्णमयीत्व आदिमें भी फल-श्रुति अर्थवाद है । अक्रियात्मक पर्णमयीत्व बादिमें आश्रयके बिना फल सम्बन्ध नहीं हो सकता । सत्यानन्दी -दीपिका * ' तेनोभौ कृरुतः ' इसके भी विद्या कर्मका अङ्ग नहीं है । और साम आदिमें ' यह पृथिवी ऋक् है अग्नि साम है ' इसप्रकार लोक दृष्टिरूप उपासनाओं में कर्म - समृद्धि से भिन्न लोक आदि फल श्रुति में प्रतिपादित हैं । किव यूपके लिए प्रथम ' खादिरो यूपो भवति ' इस विधिसे ग्रुप विहित होनेके कारण क्रतुको अङ्गरूप यूपकी आङ्काक्षा नहीं है, ' बैल्वमन्नाद्यकामस्य खादिरं वीर्यकामस्य ' ( अन्नाद्य कामनावालेका बैल्वयूप और वीयंका मनावालेका खादिर यूप हो ) अतः यूपके लिए पुन: बैल्व व्यादिका विधान फलके लिए ही है । इसलिए यह फलार्थं विधि है अर्थवाद नहीं है । इसके अतिरिक्त पणं-मयीत्वको कोई प्रकृतका आश्रय नहीं है, यह जुहूको आश्रय मानें तो जुहूको प्रकृति द्रव्यकी बाङ्काक्षा