श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 751–760

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 751–760

पृष्ठ 751

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अधि ० २८ सू ० ४३ ] भाषानुवाद सत्यानन्दी - दीपिका सहित ७१७ नहि पर्णमयीत्वादीनाम क्रियात्मकानामाश्रयमन्तरेण फलसंबन्धोऽवकल्पते । गोदोहना-दीनां हि प्रकृताप्रणयनाद्याश्रयला भादुपपन्नः फलविधिः । तथा बैल्वादीनामपि प्रकृत-यृपाद्याश्रयलाभादुपपन्नः फलविधिः, नतु पर्णमयीत्वादिष्वेवंविधः कश्चिदाश्रयः प्रकृतोऽ-स्ति । वाक्येनैव तु जुह्राद्याश्रयतां विवक्षित्वा फलेऽपि विधि विवक्षतो वाक्यभेदः स्यात् । उपासनानां तु क्रियात्मकत्वाद्विशिष्टविधानोपपत्तेरुद्गीथाद्याश्रयाणां फले विधानं न विरुध्यते । तस्माद्यथा क्रत्वाश्रयाण्यपि गोदोहनादीनि फलसंयोगादनित्यान्येव-मुद्गीथाद्युपासनान्यपीति द्रष्टव्यम् । अत एव च कल्पसूत्रकारा नैवंजातीय कान्युपास-नानि क्रतुषु कल्पयां चक्रुः ॥४२ ॥

( २८ प्रदानाधिकरणम् । सू ० ४३ ) प्रदानवदेव तदुक्तम् ॥ ४३ ॥

पदच्छेद - प्रदानवत्, एव, तत्, उक्तम् । सूत्रार्थ - ( प्रदानवत् ) ' यथेन्द्राय राज्ञे ' इससे उक्त इन्द्र देवताके अधिराज आदि गुणभेद देवताका भेद होता है, वैसे एक विद्यामें मी वायु होनेपर भी आध्यात्मिक आदि अवस्था भेदसे गुणभेद है, अतः प्रयोग भेद है । इत्यादि सूत्र से जैमिनि मुनिने पूर्वकाण्ड में कहा है । एक होनेपर भी राजा, , प्राणके स्वरूप अभेद ( तदुक्तम् ) ' नाना वा ' * वाजसनेयके - ' वदिष्याम्ये वाहमिति वाग्दधे ( बृह ० १।५।२१ ) इत्यत्राध्यात्मं वागा -दीनां प्राणः श्रेष्ठोऽवधारितोऽधिदैवतमग्न्यादीनां वायुः । तथा छान्दोग्ये ' वायुर्वाव संवर्गः ' ( छा ० ४।३।१ ) इत्यत्राधिदैवतमग्न्यादीनां वायुः संवर्गोऽवधारितः ' प्राणो धाव किन्तु गोदोहन आदिमें तो प्रकृत जल प्रणयन आदि आश्रय लाभ होनेसे फलार्थं विधि उपपन्न है । उसीप्रकार बैल्व आदिमें भी प्रकृत यूप आदि आश्रय लाभ होनेसे फलार्थं विधि उपपन्न है, परन्तु पर्णं-मयीत्व आदिमें इस प्रकारका कोई आश्रय प्रकृत नहीं है, वाक्यसे ही जुहू यादिको आश्रय कहने की इच्छाकर फलमें भी विधिकी विवक्षा करनेवालेको वाक्य भेद होगा । क्रियात्मक होनेसे उपासनाओंका विशिष्ट विधान हो सकता है, अतः उद्गीथ आदिके आश्रित इन उपासनाओंका विधान कर्म फलमें विरुद्ध नहीं है । इसलिए जैसे यज्ञके आश्रित गोदोहन आदि पृथक् फलके सम्बन्धसे अनियमित हैं, वैसे ही उद्गीथ व्यादि उपासनाएँ भी अनियमित हैं, ऐसा समझना चाहिए । अतएव - अनित्य होनेसे ही कल्पसूत्रकारोंने इस प्रकारकी उपासनाओं की क्रतुमें कल्पना नहीं की है ॥ ४२ ॥

वाजसनेयकमें ' वदिष्याम्येवाहमिति ० ' ( ऐसा वाणीने व्रत किया कि ' मैं बोलती ही रहूंगी ' ) यहाँ अध्यात्म वाणी आदिमें प्राण श्रेष्ठ अवधारित है और अधिदैवत अग्नि आदिमें वायु श्रेष्ठ अव-धारित है । तथा छान्दोग्यमें ' वायुर्वाव संवर्ग: ' ( वायु ही संवर्ग है ) यहाँ अधिदैवत अग्नि आदिमें वायु संवगंरूपसे अवधारित है और ' प्राणो वाव संवर्ग: ' ( प्राण ही संवर्ग है ) यहाँ अध्यात्म वाग् सत्यानन्दी - दीपिका होनेके कारण इसी वाक्यसे क्रतुके अङ्गरूपमें जुहूका प्रकृति द्रव्यके साथ सम्बन्ध विधेय होता है पश्चात् निराकांक्ष जुहूका आश्रयण कर उसी प्रकृति जुहू द्रव्यका फल सम्बन्ध विधेय होता है, इसप्रकार वाक्यभेद हो जायगा । और जैसे स्वयं क्रियात्मक होनेसे यागका विधान है, वैसे उपासनाओंका भी क्रियात्मक ( मानसिक क्रियारूप ) होनेसे विशिष्ट विधान युक्त है । इसलिए उपासनाएँ गोदोहन आदिके समान अनित्य होनेसे याग आदि कर्मोंके अङ्ग नहीं हो सकतीं । पूर्वपक्ष में उपासनाएँ प्रयोग में नित्य हैं और सिद्धान्तमें अनित्य हैं ॥ ४२ ॥

* ' वायुर्वाव संवर्गः ' ' प्राणो वाव संवर्गः ' इत्यादि श्रुतिवाक्योंसे वायु और प्राण दोनोंका भेद और ' य प्राणः स वायुः ' इत्यादि श्रुतिवाक्यसे दोनोंका अभेद प्रतिपादित होनेसे ' तत्र ' इत्यादिसे

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II ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ संवर्ग: ' ( छा ० ४।३।२ ) इत्यत्राध्यात्मं वागादीनां प्राणः । तत्र संशयः - किं पृथगेवेमौ वायुप्राणावुपगन्तव्यौ स्यातामपृथग्वेति । अपृथगेवेति तावत्प्राप्तम्, तत्त्वाभेदात् । न ह्याभन्ने तत्त्वे पृथगनुचिन्तनं न्याय्यम् । दर्शयति च श्रुतिरध्यात्ममधिदैवतं च तत्त्वा भेदम् — ' अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशत् ' ( ऐ ० २।४ ) इत्यारभ्य तथा ' त एते सर्व एव समाः सर्वेऽनन्ताः ' ( बृह ० १।५।१३ ) इत्याध्यात्मिकानां प्राणानामाधिदैविकीं विभूतिमात्मभूतां दर्शयति । तथाऽन्यत्रापि तत्र तत्राध्यात्ममधिदैवतं च बहुधा तत्त्वाभेददर्शनं भवति । क्वचिच्च ‘ यः प्राणः स वायुः ' इति स्पष्टमेव वायुं प्राणं चैकं करोति । तथोदाहृतेऽपि वाज-सनेयिब्राह्मणे ‘ यतश्चोदेति सूर्य: ' ( बृह ० १/५/२६ ) इत्यस्मिन्नुपसंहारश्लोके प्राणाद्वा एष उदेति प्राणेऽस्तमेति ' ( बृह ० १/५/२३ ) इति प्राणेनैवोपसंहरन्नेकत्वं दर्शयति । ' तस्मादेकमेव व्रतं चरेत्प्राण्याच्चैवापान्याच्च ' ( बृह ० १/५/२३ ) इति च प्राणव्रतेनैकेनोपसंहरन्नेतदेव द्रढ-यति । तथा छान्दोग्येऽपि परस्तात् ' महात्मनश्चतुरो देव एकः कः स जगार भुवनस्य गोपाः ' ( छा ० ४।३।६ ) इत्येकमेव संवर्ग गमयति, न ब्रवीत्येक एकेषां चतुर्णां संव-गऽपरोऽपरेषामिति । तस्मादपृथक्त्वमुपगमनस्येति । एवं प्राप्ते ब्रूमः - पृथगेव वायु-आदिमें प्राण संवर्गरूपसे अवधारित है । यहाँ संशय होता है कि क्या ये वायु और प्राण पृथक् स्वीकार करने चाहिए अथवा अपृथक् - एक ही? पूर्वपक्षी - स्वरूप के अभेदसे अपृथक् ही है, ऐसा प्राप्त होता है | अभिन्न तत्त्व ( एक स्वरूप ) में पृथग्रू रूप से अनुचिन्तन युक्त नहीं है, ' अग्निर्वाग्भूत्वा ' ( अग्नि वागिन्द्रिय होकर मुखमें प्रवेश किया ) ऐसा आरम्भकर श्रुति अध्यात्म और अधिदेवता स्वरूपाभेद दिखलाती है । उसीप्रकार ' त एते सर्व ० ' ( ये वाकू, मन और प्राण सभी तुल्य हैं, अध्यात्म और अधिभूत समस्त जगत् इन तीनोंसे व्याप्त है, इन तीनोंसे अतिरिक्त कार्यात्मक अथवा करणात्मक कुछ नहीं है, ये सब अनन्त हैं ) यह श्रुतिवाक्य आध्यात्मिक प्राणोंकी स्वरूपभूत आधिदैविक विभूति दिखलाता । इसीप्रकार अन्यत्र भी तत् तत् स्थलमें अध्यात्म और अधिदैवतका बहुधा तत्त्वाभेद दर्शन होता है । और कहीं पर ' यः प्राणः स वायुः ' ( जो प्राण है वह वायु है ) यह श्रुतिवाक्य स्पष्टरूपसे प्राण और वायुमें एकत्वका प्रतिपादन करता है । इसप्रकार उदाहृत वाजसनेयी ब्राह्मण में भी. ' यतोदेति सूर्य: ' ( जिस वायुसे सूर्य उदय होता है ) इस उपसंहारश्लोक में ' प्राणाद्वा ० ' ( यह प्राणसे उदित होता है यह प्राणमें मस्त होता है ) इसप्रकार प्राणने ही उपसंहार करते हुए एकत्व दिखलाता है । ' तस्मादेकमेव ० ' ( अतः एक ही व्रतका आचरण करे, प्राण व्यापार करे और अपान व्यापार करे ) इसप्रकार एक प्राणव्रतसे ही उपसंहार करते हुए उसको ही दृढ करता है । इसप्रकार छान्दोग्यमें भी आगे ' महात्मनश्चतुरो देव ० ' ( भुवनोंके रक्षक उस एक प्रजापतिने चार [ अग्नि, सूर्य, दिक्, चन्द्रमा और वाक्, चक्षु, श्रोत्र और मन ] महात्माओं को ग्रस लिया ) यह श्रुति एक ही संवर्गका बोध कराती है ऐसा नहीं कहती है कि एक चारोंका एक संवर्ग है और दूसरे चारोंका दूसरा, इसलिए उपगमन - अनुचिन्तन पृथक् नहीं है । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - वायु और प्राणका पृथक् हो अनुचिन्तन स्वीकार सत्यानन्दी - दीपिका संशय कहते हैं । ' अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशत् ' ऐसा आरम्भकर ' वायु प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशत् ' ( वायुने प्राण होकर नासिकामें प्रवेश किया ) इसप्रकार पूर्वापरका विचार करनेपर वायु और प्राण एक ही तत्व प्रतीत होते हैं । अतः दोनोंका अपृथग्रूपसे ही अनुचिन्तन है । * सिद्धान्तो —- जैसे ' अग्निहोत्र ' जुहोति ' इससे उत्पन्न एक ही अग्निहोत्रका दधि, तण्डुल आदि भेदसे और सायं प्रातः कालभेदसे प्रयोगका भेद है, वैसे ' अन्नादो मवति य एवं वेद ' ( तै ० ३।९ ।१ ) इसप्रकार उत्पन्न संवर्गविद्या एक है, तो भी उत्पन्न विशिष्ट वायु और प्राण नामक गुणों का भेद

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अधि ० २८ सू ० ४३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७१ ९ प्राणावुपगन्तव्याविति । कस्मात् । पृथगुपदेशात् । आध्यानार्थी हायमध्यात्माधिदेववि-भागोपदेशः, सोऽसत्याध्यानपृथक्त्वेऽनर्थक एव स्यात् । ननूक्तं न पृथगनुचिन्तनं सच्चा-भेदादिति नैष दोषः, तत्त्वाभेदेऽप्यवस्थाभेदादुपदेशभेदवशेनानुचिन्तनभेदोपपत्तेः ।

श्लोकोपन्यासस्य च तत्त्वाभेदाभिप्रायेणाप्युपपद्यमानस्य पूर्वोदितध्येयभेद निराकरणसा-मर्थ्याभावात् । स यथैषां प्राणानां मध्यमः प्राण एवमेतासां देवतानां वायुः ' ( बृह ० १।५।२२ )

इति चोपमानोपमेयकरणात् । एतेन व्रतोपदेशो व्याख्यातः । ' एकमेव व्रतम् ' ( बृह ० १।५।२३ ) इति चैवकारो वागादिव्रतनिवर्तनेन प्राणव्रतप्रतिपत्त्यर्थः । भग्नव्रतानि हि वागादीन्युक्ता -नि ' तानि मृत्युः श्रमो भूत्वोपयेमे ' ( बृह ० १ | ५ | २१ ) इति श्रुतेः, न वायुव्रतनिवृत्त्यर्थः ' अथातो व्रतमीमांसा ' ( बृह ० १।५ | २१ ) इति प्रस्तुत्य तुल्यवद्वायुप्राणयोरभग्नव्रतत्वस्य निर्धारित-त्वात् । ' एकमेव व्रतं चरेत् ' ( बृह ० १।५।२३ ) इति चोक्त्वा ' तेनो एतस्यै देवतायै सायुज्यं सलोकतां जयति ' ( बृह ० १/५/२३ ) इति वायुप्राप्तिं फलं ब्रुवन्वायुव्रतमनिवर्तितं दर्शयति । देवतेत्यत्र वायुः स्यात्, अपरिच्छिन्नात्मकत्वस्य प्रेप्सितत्वात् । पुरस्तात्प्रयोगाच्च ' सैषाऽ-नस्तमिता देवता यद्वायुः ' ( बृह ० १।५।२२ ) इति । तथा ' तौ वा एतौ द्वौ संवर्गों वायुरेव देवेषु प्राणः प्राणेषु ' ( छा ० ४।३।४ ) इति भेदेन व्यपदिशति ' ते वा एते पञ्चान्ये पञ्चान्ये दश सन्त-करना चाहिए, किससे? उनका पृथक् उपदेश होने से । अध्यात्म और अधिदैवत विभागका उपदेश ध्यानके लिए है, किन्तु वह ध्यानके पृथक् न होनेपर व्यर्थ ही होगा । परन्तु यह जो कहा गया है कि स्वरूपके अभेद होनेसे पृथक् अनुचिन्तन नहीं है । यह दोष नहीं है, क्योंकि तत्त्वके अभेद होनेपर भी अवस्थाभेदसे और उपदेशभेद के बलसे अनुचिन्तनका भेद उपपन्न होता है । तत्त्वाभेदके अभि-प्रायसे उपपद्यमान श्लोक उपन्यास में भी पूर्वकथित ध्येय भेदके निराकरणकी सामथ्यं नहीं है, क्योंकि ' स यथैषां ० ' ( जिसप्रकार इन वागादि प्राणोंमें प्राण मध्यम है, उसी प्रकार इन देवताओंमें वायु है ) इसप्रकार उपमान और उपमेयकरण है । इससे व्रतोपदेशका भी व्याख्यान हुआ । ' एकमेव व्रतम् ' ( एक ही व्रत करना चाहिए ) इसमें ' एव ' वागादिका व्रत निवृत्तकर प्राणव्रतकी प्रतिपत्ति के लिए है | क्योंकि ' तानि मृत्यु: ० ' ( मृत्युने श्रमरूप होकर उन इन्द्रियोंका संग्रहण किया ) इन श्रुतिसे वागादि इन्द्रियाँ मग्नव्रत कही गई हैं । परन्तु वह ' एवकार ' वायुव्रतकी निवृत्ति के लिए नहीं है, कारण कि ' अथातो व्रतमीमांसा ' ( अब यहाँसे व्रतका विचार किया जाता है ) इसप्रकार प्रस्तुत कर वायु और प्राणका समानरूपसे अमग्नव्रतत्व निर्धारित किया जाता है । ' एकमेव व्रत चरेत् ' ( एक ही व्रतका आच-रण करे ) ऐसा कहकर ' तेनो एतस्यै ० ' ( उस व्रत से वह इस देवता की ही एकरूपताको और समान स्थानत्वको प्राप्त करता है ) इस तरह श्रुति वायु प्राप्ति फलको कहती हुई वायुव्रतको अनिवर्तित दिखलाती है । यहाँ देवता वायु ही होना चाहिए, क्योंकि अपरिच्छन्नात्मत्व प्रेप्सित है, कारण कि सैषाऽ-नस्तमिता ० ' ( यह जो वायु है वह अस्त न होनेवाला देवता है ) ऐसा पहले प्रयोग किया है । और ' तौ वा एतौ ० ' ( ये दो संवर्ग हैं, अग्नि आदि देवताओंोंमें वायु और वागादि इन्द्रियोंमें मुख्य प्राण संवर्ग है ) इसप्रकार भेदसे व्यपदेश करती है । ' ते वा एते ० ' ( जिनका ग्रसन होता है, ऐसे अग्नि आदि चार और उनका ग्रसन करनेवाला वायु ये पांच वागादिसे अन्य हैं, और इनसे वागादि सत्यानन्दी - दीपिका होने से प्रयोगका भेद है, ऐसा सूत्र से बाहर ' पृथगेव ' इत्यादिसे सिद्धान्त करते हैं और ' तौ वा एतौ द्वौ संवर्गी ' ( छा ० ४।३।३ ) ( वे ये दो संवर्ग हैं ) यह उपास्य भेदवाक्य प्रयोग भेद परक है, इससे ही भेद सिद्ध होता है ।

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७२० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ स्तत्कृतम् ' ( छा ० १।३।८ ) इति च भेदनैवोपसंहरति । तस्मात्पृथगेवोपगमनम् । * प्रदा-नवत् । यथेन्द्राय राज्ञे पुरोडाशमेकादशकपालमिन्द्रायाधिराजायेन्द्राय स्वराज्ञे इत्यस्यां त्रिपुरोडाशिन्यामिष्टौ सर्वेषामभिगमयन्नवद्यत्यछंबट्कारमिति । अतो वचनादिन्द्राभेदाच्च सहप्रदानाशङ्कायां राजादिगुणभेदाद्याज्यानुवाक्याव्यत्यासविधानाच्च यथान्यासमेव देव-तापृथक्त्वात्प्रदान पृथक्त्वं भवति । एवं तत्त्वाभेदेऽव्याध्येयांश पृथक्त्वादाध्यानपृथक्त्व-मित्यर्थः । तदुक्तं संकर्षे -- ' नाना वा देवता पृथग्ज्ञानात् ' इति । तत्र तु द्रव्यदेवताभेदाद्या-गभेदो विद्यते नैवमिह विद्याभेदोऽस्ति, उपक्रमोपसंहाराभ्यामध्यात्माधिदैवोपदेशेष्वेक-विद्याविधानप्रतीतेः । विद्यैक्येऽपि त्वध्यात्माधिदैवभेदात्प्रवृत्तिभेदो भवति, अग्निहोत्र

इव सायंप्रातःकालभेदात् । इत्येतावदभिप्रेत्य प्रदानवदित्युक्तम् ॥ ४३ ॥

( १ ९ लिङ्गभूयस्त्वाधिकरणम् । सू ० ४४-५२ ) लिङ्गभूयस्त्वात्तद्धि बलीयस्तदपि ॥ ४४ ॥

पदच्छेद – लिङ्गभूयस्त्वात्, तत्, हि, बलीयः, तद्, अपि । सूत्रार्थ -- वाजसनेयक अग्नि रहस्यमें अग्निविद्या स्वतन्त्ररूपसे प्रतिपादित है, लिङ्गभूयस्त्वात् ) क्योंकि इसमें ' यत्किञ्चेमानि भूतानि ' इत्यादि अनेक लिङ्ग प्रमाण हैं, और प्रकरण आदिकी अपेक्षासे ( तद्धि ) लिङ्ग हो ( बलीय 1 ) बलवान् है | ( तदपि ) इसको मी ' श्रुतिलिङ्ग ० ' इस सूत्रमें जैमिनि कहा है । चार और प्राण ये पांच अन्य हैं इसप्रकार ये सब दश होते हैं, ये दश कृत ( कृत नामक पासोंसे उप-लक्षित द्यूत हैं ) इसप्रकार भेदसे ही उपसंहार करती है । इसलिए वायु और प्राणका पृथक् ही अनु-चिन्तन है । प्रदानके समान --- जैसे ' इन्द्र राजाके लिए, इन्द्र अधिराजके लिए और इन्द्र स्वराजके लिए ग्यारह कपालवाला पुरोडाश - इन तीन पुरोडाश वाली इष्टि व्यर्थं न हो इस निमित्त से संब देवताओंको हवि प्राप्त करानेके लिए एक साथ ही पुरोडाशोंका अवदान करता है, इस वचनसे और इन्द्रका अभेद होनेसे सह प्रदानको आशङ्का होनेपर राजा आदि ( राजा, अधिराज और स्वराज ) गुणभेद और याज्या और अनुवाक्याके व्यत्यासके विधान होने से लेखक्रमके अनुसार ही देवताके पृथक् होनेसे प्रदान पृथक् है । वैसे ही [ वायु और प्राणके ] स्वरूप अभेद होनेपर भी उपास्य अंश-के पृथक् होनेसे अनुचिन्तन ( उपासना ) पृथक् है, ऐसा अर्थ है । वह संकर्ष ( देवता ) काण्डमें कहा गया है - ' नान वा देवता ० ' ( देवता भिन्न - भिन्न हैं, क्योंकि उनका पृथक् ज्ञान होता हैं ) वहाँ द्रव्य और देवता के भेदसे यागका भेद है, ऐसा यहाँ विद्याभेद नहीं है, क्योंकि उपक्रम और उपसंहार से अध्यात्म और अधिदैव उपदेशों में एक विद्याका विधान प्रतीत होता है । जैसे सायं और प्रातः कालके भेदसे अग्निहोत्र में प्रवृत्तिका भेद होता है, वैसे ही विद्याके एक होनेपर मी अध्यात्म और अधिदैव भेदसे प्रवृत्तिका भेद होता है । इस अभिप्राय से ' प्रदानके समान ' ऐसा कहा गया है ॥ ४३ ॥

सत्यानन्दी -दीपिका * ' इन्द्राय राज्ञे ' यहाँ तीन पुरोडाश जिसमें हों वह त्रिपुरोडाशिनी कहलाती है । उस इष्टिमें सह प्रदान इष्ट है अथवा भेदसे प्रदान इष्ट है? ऐसा सन्देह होनेपर ' सर्वेषाम् ' इत्यादिसे पूर्वपक्ष करते हैं । अब ' राजा ' इत्यादि सिद्धान्त कहते हैं - ' राजा, अधिराज और स्वराज ' इसप्रकार विशेषण के भेदसे विशिष्ट देवताका भेद होता है । अध्वर्युंसे ' अनुब्रूहि ' ऐसा प्रेष करनेपर होतासे जो मन्त्र पढ़ा जाता है वह अनुवाक्या है । ' यज ' ' याज्यां पठ ' ( याज्य मन्त्र पढो ) इस प्रेषके अनन्तरका मन्त्र अनुयाज्या है; ऐसा भेद है । तीन पुरोडाशवाली इष्टिमें प्रथम पुरोडाशमें जो याज्यारूपसे निर्णीत है वह द्वितीय प्रदानमें अनुवाक्या है और जो पूर्व में अनुवाक्या है वह पश्चात् याज्या होती है ।

पृष्ठ 755

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अधि ० २ ९ सू ० ४४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७२१ * वाजसनेयिनोऽग्निरहस्ये ' - नैव वा इदमग्रे सदासीत् ' इत्येतस्मिन्त्राह्मणे मनोऽधि-कृत्याधीयते - ' तत्पत्रिंशत्सहस्राण्यपश्यदात्मनोऽग्नीनर्कान्मनोमयान्मनश्चितः ' इत्यादि । तथैव ' वाक्तिः प्राणचितश्चक्षुश्चितः श्रोत्रचितः कर्मचितोऽग्निचित: ' इति पृथगग्नीनामनन्ति सांपादि-कान् । तेषु संशयः - किमेते मनश्चिदादयः क्रियानुप्रवेशिनस्तच्छेषभूताः, उत स्वतन्त्राः केवलविद्यात्मका इति । तंत्र प्रकरणात्क्रियानुप्रवेशे प्राप्ते स्वातन्त्र्यं तावत्प्रतिजानीते-लिङ्गभूयस्त्वादिति । भूयांसि हि लिङ्गान्यस्मिन्ब्राह्मणे केवलविद्यात्मकत्वमेषामुपोद्बलयन्ति दृश्यन्ते - ' तद्यत्किचे मानि भूतानि मनसां संकल्पयन्ति तेषामेव सा कृति: ' इति, ' तान्हैतानेवंविदे सर्वदा सर्वाणि भूतानि चिन्त्रन्त्यपि स्वपते ' इति चैवंजातीयकानि । तद्धि लिङ्गं प्रकरणाद्वलीयः, तदप्युक्तं पूर्वस्मिन्काण्डे - ' श्रुतिलिङ्ग वाक्य प्रकरणस्थानसमाख्यातां समवाये पारदौर्बल्यमर्थ -विप्रकर्षात् ' ( जै ० सूत्र ३ | ३ | १३ ) इति ॥ ४४ ॥

वाजसनेयियों के अतिरहस्य में - ' नैत्र वा इदम ग्रे ० ' ( उत्पत्तिके पूर्व में यह न सत् ही था ) इस ब्राह्मणमें मनको प्रस्तुतकर ' उस मऩने अपने वर्चनीय [ मनोवृत्ति मावित ] मनोमय मनश्चित् छत्तीस सहस्र अग्नियोंको देखा ' इत्यादि कहते हैं । और ' वाक्से सम्पादित, प्राण - घ्राणसे सम्पादित, बक्षुसे सम्पादित, श्रोत्र से सम्पादित, कर्मसे सम्पादित अग्निसे सम्पादित अपनी अपनी वृत्तिरूप अग्नियों को वाक् प्राण आदिने देखा ' इसीप्रकार भिन्न भिन्न सांपादिक अग्नियोंको कहते हैं । उसमें संशय होता है कि क्या ये मनश्चित् आदि क्रियामें अनुप्रवेशकर उस कर्मके अङ्गभूत हैं अथवा स्वतन्त्र केवल विद्यात्मक हैं? यहाँ प्रकरणसे क्रिया में अनुप्रवेश प्राप्त होनेपर, सिद्धान्ती - स्वतन्त्रताकी प्रतिज्ञा करते हैं- कारण कि बहुत से लिङ्ग हैं । ' तद्यत्किञ्चेमानि ० ' ( उसमें ये भूत - प्राणी मनसे जो कुछ संकल्प करते हैं. वह उन अग्नियोंकी ही कृति - कर्म हैं ) और ' तान्हैतानेवंविदे ० ' ( ऐसी उपासना करनेवाला यदि सोता हो चाहे जागता हो तो भी उसके लिए सर्वदा सब भूत उन उन अग्नियोंका चयन - सम्पादन करते हैं ) इसप्रकारके बहुतसे लिङ्ग इस ब्राह्मण में ' ये अग्नियाँ केवल विद्यात्कक हैं ' ऐसा समर्थन करते हुए देखे जाते हैं । क्योंकि वह लिङ्ग प्रकरणसे बलवान् होता है । वह भी ' श्रुतिलिङ्ग ० ' ( श्रुति, लिङ्ग, वाक्य, प्रकरण, स्थान और समाख्या इनके एक विषय में परस्पर विरोध होनेपर दुर्बल है, क्योंकि स्वार्थं - अपने अर्थका बोध करानेमें उत्तर - उत्तरको पूर्व- पूर्वकी विलम्ब होता है ) इसप्रकार पूर्व काण्डमें कहा गया है ॥ ४४ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका क्योंकि ' व्यत्यासमन्वाह ' यह श्रुति व्यत्याससे विधान करती है, इसलिए श्रतिके पृथक् प्रक्षेप है ॥ ४३ ॥

* ' उत्पत्ति के पूर्व यह जगत् न सत् था और न असत् ' ऐसा उपक्रम उत्तरोत्तर पूर्वं पूर्व से अपेक्षा होनेके कारण अनुसार पुरोडाशका कर मनको सृष्टिको कहकर ' उस मनने अपनेको देखा ' इसप्रकार ईक्षण पूर्वक अग्नियोंको देखा, इस तरह मनके उद्देश्य से ' तत्षट् त्रिंशत् ' इत्यादि मन्त्र कहा गया है । इस मन्त्र में पुरुषके आयुरूपसे कल्पित सौ वर्षके अन्तर्गत छत्तीस सहस्र दिन और रात्रिसे मनोवृत्तियाँ अवच्छिन्न हैं, मनोवृत्तियाँ असंख्य होनेपर मी छत्तीस सहस्र ही कही गई हैं, क्योंकि मनोवृत्तियोंको इष्टकारूपसे ही कल्पना की गई है । अतः मनो-वृत्तियों द्वारा मनसे सम्पादित अग्नियाँ मनश्चित् अग्नियाँ कही जाती हैं । पूर्वपक्ष में प्रकरणसे ये अग्नियाँ कर्मके अङ्गभूत हैं और सिद्धान्त में इनका पुरुषार्थत्व फल है । जो क्रियाका अङ्ग होता है वह विहित कालमें ही अनुष्ठेय होता है, उसका सर्वदा सबसे अनुष्ठान नहीं हो सकता । परन्तु इस मन्त्र में तो ' सर्वदा ' शब्दसे सब कालके लिए विधान किया गया है, और छत्तीस सहस्र इतनी बड़ी संख्या भी मतश्चित् आदि संपादित अग्नियोंको क्रियाके अङ्ग न होनेमें लिङ्ग है । लिङ्ग प्रकरणसे बलवान्

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७२२ ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ पूर्वविकल्पः प्रकरणात्स्यात्क्रिया मानसवत् ॥ ४५ ॥

पदच्छेद – पूर्वविकल्पः, प्रकरणात् स्यात्, क्रिया, मानसवत् । सूत्रार्थ - ये मनश्चित् आदि अग्नियाँ स्वतन्त्र नहीं हैं, किन्तु ( प्रकरणात् ) प्रकरणसे ( पूर्वविकल्पः ) पूर्व में प्रकृत क्रियामय अग्निका यह संकल्पात्मक अग्नि ( क्रिया स्यात् ) अङ्ग है । ( मानसवत् ) जैसे ' मनोग्रहं गृह्णाति ' इत्यादि द्वादशाहमें श्रुत मानस ग्रह बारह दिनके मध्यवर्ती दशम का अङ्ग है । * नैतद्युक्तम् - स्वतन्त्रा एतेऽग्नयोऽनन्यशेषभूता इति । पूर्वस्य क्रियामयस्याग्नेः प्रकरणात्तद्विषय एवायं विकल्पविशेषोपदेशः स्यान्न स्वतन्त्रः । ननु प्रकरणालिङ्गं बलीयः-सत्यमेवमेतत्, लिङ्गमपि त्वेवंजातीयकं न प्रकरणाद्वलीयो भवति । अन्यार्थदर्शनं ह्येतत्, सांपादिकाग्निप्रशंसारूपत्वात् । अन्यार्थदर्शनं चासत्यामन्यस्यां प्राप्तौ गुणवादेनाप्युप-पद्यमानं न प्रकरणं बाधितुमुत्सहते । तस्मात्सांपादिका अप्येतेऽग्नयः प्रकरणात्क्रियानु-प्रवेशिन एव स्युः, मानसवत् । यथा दशरात्रस्य दशमेऽहन्यविवाक्ये पृथिव्या पात्रेण समुद्रस्य सोमस्य प्रजापतये देवतायै गृह्यमाणस्य ग्रहणासादनहवनाहरणोपह्नानभक्ष-णानि मानसान्येवाम्नायन्ते । स च मानसोऽपि ग्रहकल्पः क्रियाप्रकरणात्क्रियाशेष एव भवत्येवमयमप्यग्निकल्प इत्यर्थः ॥ ४५ ॥

यह जो कहा गया है कि ये अग्नियाँ अन्यका अङ्ग न होकर स्वतन्त्र हैं, यह युक्त नहीं है, क्योंकि पूर्व क्रियामय अग्निका प्रकरण होनेसे तद्विषयक ही यह विकल्प विशेषका उपदेश होना चाहिए स्वतन्त्र नहीं । परन्तु लिङ्ग प्रकरणसे बलवान् है? यह कथन ठीक ही है । किन्तु इसप्रकारका लिङ्ग भी प्रकरण से बलवान् नहीं होता, यह लिङ्ग अन्यार्थदर्शन है, क्योंकि सांपादिक अग्निका प्रशंसा रूप है । अन्यार्थदर्शन तो अन्य प्राप्ति न होनेपर गुणवादसे भी उपपन्न होता हुआ प्रकरणका बाघ करने में समर्थ नहीं होता । इसलिए सांपादिक होती हुई भी ये अग्नियां प्रकरणसे क्रियामें अनुप्रवेश करनेवाली ही होनी चाहिए । मानसके समान । जैसे दशरात्र क्रतुके दसवें दिनमें अविवाक्य में पृथिवी-रूप पात्र गृह्यमाण समुद्ररूप सोमका प्रजापति देवताके लिए ग्रहण, आसादन, हवन, आहरण, उपह्वान और मक्षण ये मानस ही श्रुतिमें कहे जाते हैं । जैसे वह मानस ग्रहकल्प भी क्रिया-प्रकरणसे क्रियाका अङ्ग ही होता है, इसप्रकार यह अग्निकल्प भी ऐसा अर्थ है ॥ ४५ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका है । अतः ये भावनात्मक उपासनाएँ किसी कर्मके अङ्ग भूत न होकर स्वतन्त्र हैं ॥ ४४ ॥

* सिद्धान्तका उपक्रमकर पूर्वपक्ष करते हैं- मनश्चित् आदि अग्निके विधान करनेके पूर्वमें ' इष्टकामिरग्निं चिनुते ' ( इंटोंसे अन्निका चयन करते हैं ) इसप्रकार जो कहा गया है, और ' स एष त्विष्ट-काग्निः ' ( यह तो इंटों द्वारा संपादित अग्नि है ) इसप्रकार यज्ञका अङ्गभूत अग्नि सन्निहित है । उसका यह विकल्प- संकल्प विशेषोपदेश है । इसका अभिप्राय यह है कि जैसे क्रियात्मक अग्नि यागका अङ्ग है, वैसे संकल्पमय अग्नि भी यागका अङ्ग है । जो यह गया है कि लिङ्ग प्रकरणसे अधिक बलवान् है । arraft वाक्यगत लिङ्ग प्रकरणसे बलवान् है अथवा अर्थवादगत? प्रथम पक्ष तो स्वीकयं है । द्वितीय पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि मानस अग्नि विधिके अर्थवादगत लिङ्ग अपने अर्थ प्राप्ति में प्रमाणके न होनेसे प्रकरणसे दुर्बल है । इसलिए यह बन्यार्थदर्शन लिङ्ग ( अर्थवादरूप ) है, इसलिए प्रकरण से यह संकल्पमय अग्नि भी क्रियामय अग्निके समान कर्मका अङ्ग है ' | ' मानसवत् ' द्वादशाहे श्रूयते ‘ अनया त्वा पात्रेण समुद्रं रसया प्राजापत्यं मनोग्रहं गृह्णाति ( बारह दिन में होनेवाले सोम याग में सुना जाता है - हे समुद्र! इस पृथिवीरूप पात्रसे सोमरससे कल्पित जिसका प्रजापति देवता है एसे तुझे

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अधि ० २ ९ सू ० ४६-४७-४८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७२३ अतिदेशाच्च ॥ ४६ ॥

पदच्छेद - अतिदेशात् च । सूत्रार्थ - ' एकैक एव तावान् ' इसप्रकार अतिदेशसे भी ये सांपादिक अग्नियां क्रियाके अङ्ग हैं | अतिदेशश्चैषामग्नीनां क्रियानुप्रवेशमुपोद्वलयति - ' षट्त्रिंशत्सहस्राण्यग्नयोऽर्कास्ते-एव तावान्यावानसौ पूर्वः ' इति । सति हि सामान्येऽतिदेशः प्रवर्तते । ततश्च पूर्वणेष्टकाचितेन क्रियानुप्रवेशिनाऽग्निना सांपादिकानग्नीनतिदिशन्क्रियानुप्रवेश मेवैषां द्योतयति ॥ ४६ ॥

विद्यैव तु निर्धारणात् ॥ ४७ ॥

पदच्छेद - विद्या, एव तु निर्धारणात् । सूत्रार्थ - ( तु ) पूर्वपक्ष के निवृत्त्यर्थं है, ( विद्या एव ) विद्यात्मक ही हैं, ( निर्धारणात् ) क्योंकि श्रुतिमें ऐसा ही निर्धारण किया गया है तुशब्दः पक्षं व्यावर्तयति । विद्यात्मका एवैते स्वतन्त्रा क्रियाशेषभूताः । तथा हि निर्धारयति - ते ते विद्याचित एव ' श्चिता भवन्ति ' इति च ॥ ४७ ॥

दर्शनाच्च ॥ ४८ ॥

पदच्छेद - दर्शनात् च । मनश्चित् आदि अग्नियाँ स्वतन्त्र । मनश्चिदादयोऽग्नयः स्युर्न इति, ' विद्यया हैबैत एवंविद-सूत्रार्थ - और इन मनश्चित् आदि अग्नियोंके स्वातन्त्र्यमें लिङ्ग भी देखने में आता है । और ' षट्त्रिंशत् ० ' ( छत्तीस सहस्र पूज्य अग्नियाँ हैं, उनमेंसे एक - एक उतनी है जितनो कि वह पूर्व अग्नि है ) इस प्रकार इन अग्नियोंका अतिदेश क्रियानुप्रवेशकी पुष्टि करता है । क्योंकि सादृश्य होनेपर ही अतिदेश प्रवृत्त होता है । इसलिए पूर्वं ईंटोंसे चित् क्रियानुप्रवेशी अग्नि से सांपादिक अग्नियोंका अतिदेश करती हुई श्रुति इनका क्रियानुप्रवेश ही सूचित करती है ॥ ४६ ॥

' तु ' शब्द पूर्वपक्षकी व्यावृत्ति करता है । विद्यात्मक ये मनश्चित् आदि अग्नियां स्वतन्त्र ही होनी चाहिए, क्रियाके अङ्गभूत नहीं, क्योंकि ' ते है ते ० ' ( वे ये विद्या भावनासे ही सम्पादित हैं, और ' विद्यया ० ' ( इसप्रकार जाननेवाले उपासकको ये अग्नियाँ विद्यासे ही संपादित होती हैं ) इसप्रकार श्रुति निर्धारण करती है ॥ ४७ ॥

सत्यानन्दी -दीपिका अध्वर्यु ग्रहण करता है ) यहाँ यह मानस कर्म उक्त बारह दिनके मध्यवर्ती दसवें दिन अर्थात् आदि और अन्तिम दिन छोड़कर मध्यके दशरात्र ही द्विरात्र आदिमें प्रकृति है उसके धर्मोका ही उनमें अतिदेश होनेके कारण उस मध्यरात्र के दशमदिनमें - ग्यारहवें दिनमें उक्त मानस ग्रह सुना जाता है । इसलिए ऋत्विजोंका ध्यायीरूपसे विधि वाक्यका उच्चारण न होनेके कारण महः ( दशमदिन ) की अविसंज्ञा है, अतः दशम दिन- अविवाक्यमें यह भावनामय मानस कहा है । इसमें ग्रहण - सोम आधारभूत पात्रका उपादान, आसादन- गृहीत पात्रका शास्त्र विहित स्थानमें स्थापन, सोमका होम - हवन है, हुत शेषका ग्रहण - आहरण है, हवनसे बच्चे हुए भागका भक्षण करनेके लिए ऋत्विजोंका परस्पर अनुज्ञाकरण उपह्वान है, उसके अनन्तर शेष मामका मक्षण यह सब मानस ही है अर्थात् यह सब संकेतसे होता है | वह मानसग्रह द्वादशाह सोमयागसे भिन्न स्वतन्त्र दिन है । इस प्रकार शङ्का कर द्वादशाह संज्ञाके साथ विरोध होने से पृथक् दिन नहीं है, किन्तु प्रकरणके बलसे अविवाक्य अहिनुका बङ्ग है । जैसे मानसग्रह प्रकरणके बलसे क्रियाका अङ्ग है, वैसे सांपादिक अग्नियाँ भी प्रकरणसे क्रियां अङ्ग हैं || ४५ ||

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७२४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ ० ३ पा ० ३ दृश्यते चैषां स्वातन्त्र्ये लिङ्गम् । तत्पुरस्ताद्दर्शितम्- ' लिङ्गभूयस्त्वात् ( ब्रह्मसूत्र ३ | ३ | ४४ ) इत्यत्र ॥ ४८ ॥

ननु लिङ्गमप्य सत्यामन्यस्यां प्राप्तावसाधकं कस्यचिदर्थस्येत्यपास्य तत्प्रकरणसाम-| र्थ्यात्क्रियाशेषत्वमध्यवसितमित्यत उत्तरं पठति-श्रुत्यादिवलीयस्त्वाच्च न बाधः ॥ ४ ९ ॥ पदच्छेद - श्रुत्यादिबलीयस्त्त्रात्, च, न, बाधः । सूत्रार्थ - ( च ) और ( श्रुत्यादिबलीयस्त्वात् ) श्रुति आदिके बलवान् होनेसे दुर्बल कर्म प्रकरण से मनश्चित् आदि अग्नियोंके स्वातन्त्र्यका ( न बाधः ) बाध नहीं होता । नैवं प्रकरणसामर्थ्यात्क्रियाशेषत्वमध्यवसाय स्वातन्त्र्यपक्षो बाधितव्यः, श्रुत्या-देर्बलीयस्त्वात् । बलोयांसि हि प्रकरणाच्छुतिलिङ्गवाक्यानीति स्थितं श्रुतिलिङ्गसूत्रे । तानि चेह स्वातन्त्र्यपक्षं साधयन्ति दृश्यन्ते । कथम्? श्रुतिस्तावत्- ' ते ते निद्याचित एव ' इति । तथा लिङ्गम् - ' सर्वदा सर्वाणि भूतानि चिन्वन्त्यपि स्वपते ' इति । तथा वाक्यमपि -' विद्यया हैबैत एवंविदश्चिता भवन्ति ' इति । ' विद्याचित एव ' इति हि सावधारणेयं श्रुतिः क्रिया-नुप्रवेशेऽमीषामभ्युपगम्यमाने पीडिता स्यात् । नन्ववाह्य साधनत्वाभिप्रायमिदमवधारणं भविष्यति । नेत्युच्यते, तदभिप्रायतायां हि विद्याचित इतीयता स्वरूपसंकीर्तनेनैव कृतत्वा-दनर्थकमवधारणं भवेत्, स्वरूपमेव ह्येषामबाह्य साधनमिति । अबाह्यसाधनत्वेऽपि तु मानसग्रह वत्क्रियानुप्रवेशशङ्कायां तन्निवृत्तिफलमवधारणमर्थवद्भविष्यति । तथा ' स्वपते जाग्रते चैवंविदे सर्वदा सर्वाणि भूतान्येतानग्नीश्चिन्वन्ति ' इति सातत्यदर्शन मेषां स्वातन्त्र्येऽवकल्पते, और इन अग्नियोंकी स्वतन्त्रतामें लिङ्ग भी देखा जाता है, वह ' लिङ्गभूयस्त्वात् ' इस सूत्र में पहले दिखलाया गया है ॥ ४८ ॥

परन्तु अन्य प्राप्ति न होनेपर लिङ्ग भी किसी अर्थका साधक नहीं होता, इस प्रकार लिङ्गका त्यागकर प्रकरणकी सामथ्यसे ये अग्नियाँ क्रिया के अङ्गरूपसे निश्चित की गई हैं, इससे उत्तर कहते हैं- --इसप्रकार प्रकरणकी सामर्थ्य से मनश्चित् आदि अग्नियोंमें क्रियाङ्गत्व निश्चित कर स्वातन्त्र्यपक्षका बाध नहीं करना चाहिए, क्योंकि श्रुति आदि बलवान् हैं । श्रुति, लिङ्ग, वाक्य ये प्रकरणसे बलवान् हैं । यह ' श्रुतिलिङ्ग ० ' इस सूत्र में सिद्ध किया गया है । और ये ( श्रुति आदि ) यहाँपर स्वातन्त्र्यपक्षको सिद्ध करते हुए देखे जाते हैं । किस प्रकार? इस प्रकार कि ' ते है ते विद्याचित एव ' ( वे ये अग्नियाँ विद्यासे संपादित ही हैं ) यह श्रुति है । ' सर्वदा ० ' ( सर्वदा सब प्राणी उपासक जागता हो चाहे सोता हो उसके लिए इन अग्नियों का चयन करते हैं ) इस प्रकार यह लिङ्ग है । और ' विद्यया है बैत ० ' ( ऐसा जाननेवाले उपासककी ये अग्नियाँ विद्यासे ही संपादित होती हैं । इस प्रकार यह वाक्य भी है । ' विद्या-चित्त एव ' अवधारण ( एव ) सहित यह श्रुति इन अग्नियोंका क्रियामें अनुप्रवेश स्वीकार करनेपर बाधित हो जायगी । परन्तु यह अवधारण बाह्य साधनामावके अभिप्रायसे होगा? नहीं, ऐसा कहते हैं-यदि उसके अभिप्रायमें हो तो ' विद्याचित ' इतने स्वरूप संकीर्तन से ही ' अबाह्य साधनत्व ' सिद्ध होने से ' एव ' यह अवधारण अनर्थक होगा, क्योंकि बाह्य साधनका अभाव तो इन अग्नियोंका स्वरूप ही है । परन्तु इन अग्नियोंके बाह्य साधनका अभाव होनेपर मी मानसग्रहके समान क्रिया अनुप्रवेशकी शङ्का होनेपर उसकी निवृत्तिरूप प्रयोजन होनेसे अवधारण सार्थक हो जायगा । इस प्रकार ' स्वपते ० ' ( ऐसा जाननेवाला जागता हो चाहे सोता हो उस उपासक के लिए सर्वदा सब प्राणी इन अग्नियों का संम्पादन करते हैं ) यह सातत्यदर्शन इन अग्नियोंके स्वातन्त्र्य होनेपर संगत होता है । जैसे

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अधि ० २ ९ सू ० ५० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ७२५ यथा सांपादिके वाक्प्राणमयेऽग्निहोत्रे ' प्राणं तदा वाचि जुहोति वाचं तदा प्राणे जुहोति ' ( कौ ० २।५ ) इति चोक्त्वोच्यते - ' एते अनन्ते अमृते आहुती जाग्रच्च स्वपंश्च सततं जुहोति ' ( कौषी ० २१५ ) इति, तद्वत् । क्रियानुप्रवेशे तु क्रियाप्रयोगस्याल्पकालत्वेन न सातत्येनैषां प्रयोगः कल्पेत । न चेदमर्थवादमात्रमिति न्याय्यम् । यत्र हि विस्पष्टो विधायको लिङ्गा-दिरुपलभ्यते युक्तं तत्र संकीर्तनमात्रस्यार्थवाद त्वम्, इह तु विस्पष्टविध्यन्तरानुपलब्धेः संकीर्तनादेवैषां विज्ञानविधानं कल्पनीयम् । तच्च यथासंकीर्तनमेव कल्पयितुं शक्यत इति, सातत्यदर्शनात्तथाभूतमेव कल्प्यते । ततश्च सामर्थ्यादेषां स्वातन्त्र्यसिद्धिः । एतेन ' तद्यत्किंचेमानि भूतानि मनसां संकल्पयन्ति तेषामेव सा कृति: ' इत्यादि व्याख्यातम् । तथा

वाक्यमपि एवंविदे ' इति पुरुषविशेष संबन्धमेवैषामाचक्षाणं न क्रतुसंबन्धं मृप्यते ।

तस्मात्स्वातन्त्र्यपक्ष एव ज्यायानिति ॥ ४ ९ ॥

अनुबन्धादिभ्यः प्रज्ञान्तरपृथक्त्ववद्दष्टश्च तदुक्तम् ॥ ५० ॥

पदच्छेद - अनुबन्धादिभ्यः, प्रज्ञान्तरपृथक्त्ववत् दृष्टः, च, तत्, उक्तम् । सूत्रार्थ - ( अनुबन्धादिभ्यः ) अनुबन्ध आदि हेतुओंसे मनश्चित् आदि अग्नियाँ स्वतन्त्र हैं, ( प्रज्ञान्तर पृथक्त्ववत् ) जैसे शाण्डिल्य आदि अन्य विद्याएँ स्वतन्त्र हैं । क्योंकि ( दृष्टश्च ) राजसूय प्रकरण में पठित होनेपर भी अवेष्टि यागका वर्णत्रय से सम्बन्धित होने के कारण प्रकरणसे पृथक्त्व देखा गया है, ( तदुक्तम् ) इस बातको पूर्वमीमांसा में ' क्रत्वर्थायामिति ' इस सूत्र में कहा गया है । * इतश्च प्रकरणमुपमृद्य स्वातन्त्र्यं मनश्विदादीनां प्रतिपत्तव्यम् । यत्क्रियावय-वान्मन आदिव्यापारेष्वनुबध्नाति - ते मनसैवाधीयन्त मनसाचीयन्त मनसैव ग्रहा अगृह्यन्त सांपादिक वाक् प्राणमय अग्निहोत्र में ' प्राणं तदा वाचि ० ' ( ध्यानकाल में प्राणका वाणीमें होम करता है, और ध्यानकाल में वाणीका प्राणमें होम करता है ) ऐसा कहकर ' एते अनन्तेऽमृते ० ' ( इन अनन्त अमृत आहुतियोंका वह जागते अथवा सोते निरन्तर होम करता है ) ऐसा कहा जाता है । इसके समान इन अग्नियोंका क्रियाङ्गत्व नहीं है । क्रिया अनुप्रवेश में तो क्रियाके प्रयोगका अल्पकालत्व होने से इन मनशचित् आदि अग्नियोंका नैरन्तर्य प्रयोग नहीं हो सकेगा । यह अर्थवादमात्र है, यह कथन भी युक्त नहीं है, क्योंकि जहाँ पर लिङ् आदि विधायक विस्पष्ट उपलब्ध होते हों वहाँ पर संकीर्तनमात्रका अर्थवाद युक्त है । परन्तु यहाँ तो विस्पष्ट- प्रत्यक्षरूपसे अन्य विधिकी उपलब्धि न होने से संकीर्तनसे हो इन अग्नियोंके विज्ञानविधानकी कल्पना करनी चाहिए । उसकी संकीर्तन के अनुसार ही कल्पना की जा सकती है, इसलिए सातत्यदर्शन होनेसे वैसे ही [ विज्ञानविधिकी ] कल्पना की जाती है । उससे सामर्थ्य से इनकी स्वातन्त्र्य सिद्धि होती है । इस उक्त न्याय से ' तद्यत्किंचे मानि ० ' ( ये प्राणी मनसे जो कुछ संकल्प करते हैं वह उन अग्नियोंकी ही कृति है ) इत्यादि व्याख्यान हुआ । इसीप्रकार ' एवंविदे ' यह वाक्य भी इन अग्नियोंका पुरुष विशेषके साथ सम्बन्ध कहता हुआ यागके साथ इनके सम्बन्धकी खोज नहीं करता । इसलिए स्वतन्त्रपक्ष ही अधिक श्रेष्ठ है ॥४ ९ ॥ और इससे भी प्रकरणका उपमर्दनकर मनश्चित् आदि अग्नियोंका स्वातन्त्र्य समझना चाहिए, क्योंकि श्रुति क्रियाके अवयवोंको मन आदिके व्यापारोंमें ' ते मनसैवाधीयन्त ० ' ( उन अग्नियोंका मनसे ही आधान करे, मनसे ही ईंटोंका चयन करे मनसे ही यज्ञ पात्र ग्रहण करे, मनसे सत्यानन्दी - दीपिका * यद्यपि मनोवृत्तियोंमें अग्निका ध्यान क्रियाका अङ्ग नहीं है, तो भी वह उद्गीथ ध्यानके समान क्रियाङ्गके आश्रित मानना चाहिए? परन्तु अङ्गाश्रित श्रुतिखे इस श्रुतिका भेद है । मतः क्रियाङ्गरहित मनोवृत्तियों में साङ्ग यज्ञका संपादन पुरुष में यज्ञ ध्यानके समान स्वतन्त्र है ।

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७२६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ मनसाऽस्तुवन्मनसाऽशंसन्यत्किंच यज्ञे कर्म क्रियते यत्किंच यज्ञियं कर्म मनसैव तेषु तन्मनोमयेषु मनश्चित्सु मनोमयमेव क्रियते ' इत्यादिना । संपत्फलो ह्ययमनुबन्धः । न च प्रत्यक्षाः क्रिया-वयवाः सन्तः संपदा लिप्सितव्याः । न चात्रोद्गीथाद्युपासनवत्क्रियाङ्गसंबन्धात्तदनुप्रवेशि त्वमाशङ्कितव्यम् श्रुतिवैरूप्यात् । नात्र क्रियाङ्गं किंचिदादाय तस्मिन्नदो नामाध्यवसि तव्यमिति वदति । षट्त्रिंशत्सहस्राणि तु मनोवृत्तिभेदानादाय तेष्वग्नित्वं ग्रहादींश्च कल्पयति, पुरुषयज्ञादिवत् । संख्या चेयं पुरुषायुषस्याहःसु दृष्टा सती तत्संबन्धिनीषु मनोवृत्तिष्वाप्यत इति द्रष्टव्यम् । एवमनुबन्धात्स्वातन्त्र्यं मनश्चिदादीनाम् । ॐ आदि-शब्दादतिदेशाद्यपि यथासंभवं योजयितव्यम् । तथा हि - ' तेषामेकैक एव तावान्यावानसौ पूर्व ', इति क्रियामयस्याग्नेर्माहात्म्यं ज्ञानमयानामेकैकस्यातिदिशन्क्रियायामनादरं दर्श-यति । नच सत्येव क्रियासंबन्धे विकल्पः पूर्वेणोत्तरेषामिति शक्यं वक्तुम् । नहि येन व्यापारेणाहवनीयधारणादिना पूर्वः क्रियायामुपकरोति, तेनोत्तरे उपकर्तुं शक्नुवन्ति । ही उद्गाता स्तुति करे, मनसे ही होता शंसन- स्तुति करे । जो कुछ यज्ञमें कम किया जाता है ओर यज्ञ सम्बन्धी कर्म किया जाता है, वह सब मनसे ही [ किया जाता है ] उन मनश्चित् मनोमय अग्नियों-में मनोमय ही किया जाता है ) इत्यादिसे सम्बद्ध करती. । कारण कि यह अनुबन्ध सम्पद्रूप फल-वाला है । प्रत्यक्ष सिद्ध क्रियाके अवयवोंको सम्पत् के साथ सम्बन्धित नहीं करना चाहिए । और यहाँ उद्गीथ आदि उपासना के समान क्रिया बङ्गके साथ सम्बन्ध होने से क्रिया अनुप्रवेशत्वकी आशङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि श्रुतियाँ विरूप- असमान हैं । यहाँ किसी क्रिया अङ्गको लेकर उसमें इसका अध्यवसाय करना चाहिए, ऐसा श्रुति नहीं कहती, किन्तु छत्तीस सहस्र मनोवृत्ति भेदोंको लेकर उनमें अग्नित्व और ग्रह आदिकी पुरुषयज्ञ आदिके समान कल्पना करती है और यह छत्तीस सहस्र संख्या पुरुषके आयुष्य के दिनों में प्रत्यक्ष अनुभूत होती हुई तत्सम्बन्धी मनोवृत्तियों में आरोपित की जाती है, ऐसा समझना चाहिए । इसप्रकार अनुबन्धसे मनश्चित् आदि स्वतन्त्र हैं । सूत्रस्थ आदि शब्द से अति-देश आदिकी भी यथा सम्भव योजना करनी चाहिए । जैसे कि ' तेषामेकैक ० ' ( उन सांपादिक अग्नियोंमें एक - एक उतनी है जितनी कि वह पूर्व अग्नि हैं । ) इसप्रकार यह श्रुति क्रियामय अग्नि महात्म्यका ज्ञानमय अग्निमें से एक एकमें अतिदेशकर क्रियामें अनादर दिखलाती है । और क्रिया-सम्बन्ध होनेपर उत्तर अग्नियोंका ( सांपादिक अग्नियोंका ) पूर्व अग्निके साथ विकल्प है, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि जिस आहवनीय हविष्‌के धारण आदि व्यापारसे पूर्व अग्नि क्रियामें उपकारक सत्यानन्दी - दीपिका * यहाँ अतिदेश विकल्पके लिए नहीं है, क्योंकि साध्य वस्तुके एक होनेपर परस्पर अपेक्षा -रहित साधनोंका विकल्प हो सकता है, जैसे व्रीहि और यवका होता है । परन्तु यहाँ तो क्रियाग्नि और ध्यानाग्निका साध्य - फल भिन्न - भिन्न है । इससे समुच्चयका भी निराकरण समझना चाहिए । किञ्च यहाँ क्रियाङ्गत्वको लेकर भी सादृश्य नहीं है, किन्तु अग्नित्व सादृश्य को लेकर अविदेश है, क्योंकि इसमें श्रुति, लिङ्ग, वाक्य, अनुबन्ध, अतिदेश भी प्रमाणरूप हैं । इसका पूर्व मीमांसाके एकादश अध्याय में विचार किया गया है— ' राजा स्वराज्यकामो राजसूयेन यजेत ' ( स्वराज्यकी कामना करनेवाला राजा राजसूय याग करे ) इसप्रकार उपक्रम कर आगे ' आग्नेयोऽष्टाकपालों हिरण्यं दक्षिणा ' ' बैश्वदेवं चरूं पिशङ्गी पठौही दक्षिणा ' ' मैत्रावरुणीमामिक्षां वशा दक्षिणा ' ' बार्हस्पत्यं चरुं शितिपृष्ठो दक्षिणा ' ' ऐन्द्रमेकादश कपालमृषभो दक्षिणा ' इसप्रकार अवेष्टि नामकी पांच इष्टियोंका विधान है । इनमें वर्णके भेदसे प्रयोगका भेद सुना जाता है । यदि ' ब्राह्मणो यजेत ० ' ( यदि ब्राह्मण याग करे तो बाहं-स्पत्य चरुको मध्यमें ( तृतीय ) रखकर आहुति करे और अवशिष्ट घृतका अभिधारण करे - घृतकी धारा दे ) इसप्रकार यदि ' वैश्य हो तो वैश्वदेव चरुको मध्यमें रखकर आहुति करे ' ' यदि क्षत्रिय राजा