श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 761–770
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 761–770
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अधि ० २ ९ सू ० ५ ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७२७ यत्तु पूर्वपक्षेऽप्यतिदेश उपोद्रलक इत्युक्तं सति हि सामान्येऽतिदेशः प्रवर्तत इति, तद-स्मत्पक्षेऽप्यग्नित्व सामान्ये नातिदेशसंभवात्प्रत्युक्तम् । अस्ति हि सांपादिकानामप्यग्नी-नामग्नित्वमिति । श्रुत्यादिनी च कारणानि दर्शितानि । एवमनुबन्धादिभ्यः कारणेभ्यः स्वातन्त्र्यं मनश्चिदादीनाम्, प्रज्ञान्तरपृथक्त्ववत् । यथा प्रज्ञान्तराणि शाण्डिल्यविद्या-प्रभृतीनि स्वेन स्वेनानुबन्धेनानुबध्यमानानि पृथगेव कर्मभ्यः प्रज्ञान्तरेभ्यश्व स्वतन्त्राणि भवन्त्येवमिति । दृष्टश्चावेष्टेः राजसूय प्रकरणपठितायाः प्रकरणादुत्कर्षो वर्णत्रयानुबन्धाद्रा-जयज्ञत्वाच्च राजसूयस्य । तदुक्तं प्रथमे काण्डे - ' कवर्थायामिति चेन्न वर्णत्रयसंयोगात् ' ( जै ० सू ० ११ | ४ | ३० ) इति ॥ ५० ॥
न सामान्यादप्युपलब्धेमृत्युवन्न हि लोकापत्तिः ॥ ५१ ॥
पदच्छेद - न, सामान्यात्, अपि, उपलब्धः, मृत्युवत्, नहि, लोकापत्तिः । सूत्रार्थ - ( सामान्यादपि ) मनश्चित् आदि अग्नियोंका मानस ग्रहके साथ [ मानसत्व ] सादृश्य होनेपर भी ( न ) वे क्रिया अङ्ग नहीं हैं, ( उपलब्ध: ) क्योंकि पूर्वोक्त श्रुति आदि हेतुओंसे स्वतन्त्र उपलब्ध होती हैं । ( मृत्युवत् ) जैसे ' स वा एष ' ' अग्निर्वै मृत्युः ' इत्यादिसे आदित्य पुरुष और अग्नि दोनोंमें मृत्यु शब्द समान होनेपर भी उनका अत्यन्त साम्य नहीं है । अथवा ( नहि लोकापत्तिः ) ' असो वाव लोको ० ' इत्यादिमें ' समिध् ' आदिके स्वादृश्य होनेपर भी द्युलोकमें अग्निश्वकी प्राप्ति नहीं है । यदुक्तं मानसवदिति, तत्प्रत्युच्यते । न मानसग्रह सामान्यादपि मनञ्चिदादीनां क्रियाशेषत्वं कल्प्यम्, पूर्वोक्तेभ्यः श्रुत्यादिहेतुभ्यः केवलपुरुषार्थत्वोपलब्धेः । नहि किंचि-त्कस्यचित्केनचित्सामान्यं न संभवति । न च तावता यथास्वं वैषम्यं निवर्तते । मृत्युवत् । होती है, उस व्यापारसे उत्तर अग्नियाँ उपकारक नहीं हो सकतीं? सादृश्य होनेपर ही अतिदेश प्रवृत्त होता है, इसप्रकार पूर्वपक्षमें मी अतिदेश [ क्रियानुप्रवेशका ] पोषक है, ऐसा जो कहा गया है, वह हमारे पक्षमें भी अग्नित्व सादृश्यसे अतिदेशका सम्भव होनेसे निराकृत हुआ, क्योंकि सपा-दिक अग्नियोंमें अग्नित्व है । इससे श्रुति आदि कारण दिखलाये गये हैं । इसप्रकार अनुबन्ध आदि कारणोंसे मनश्चित् आदि अग्निय स्वतन्त्र हैं, अन्य प्रज्ञाओंकी स्वतन्त्रता के समान । जैसे अपने - अपने अनुबन्ध सम्बन्धित हुई शाण्डिल्यविद्या आदि अन्य प्रज्ञाएँ कर्मों और अन्य प्रज्ञाओंसे पृथक् स्वतन्त्र ही हैं, इसीप्रकार यहाँ भी समझना चाहिए । राजसूय प्रकरण में पठित अवेष्टि नामक इष्टिका प्रकरणसे उत्कर्ष दृष्ट है, क्योंकि तीनों वर्णोंके साथ सम्बन्धित होनेसे राजसूय क्षत्रिययज्ञ है । इस बातको ' क्रत्वर्थायामिति ० ' ( यदि यह कहो कि यह लिङ्गदर्शन क्रत्वर्थं अवेष्टिमें हो तो युक्त नहीं है, क्योंकि अवेष्टिमें ब्राह्मण आदि वर्ण त्रयका सम्बन्ध है ) इसप्रकार पूर्वमीमांसा में कहा गया है ॥ ५० ॥
जो यह कहा गया है कि मानसके समान, उसका निराकरण किया जाता है । मानस ग्रहके साथ सादृश्य होनेपर भी मनश्चित् आदि अग्नियोंमें क्रियाङ्गत्वकी कल्पना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि पूर्वोक्त श्रुति आदि हेतुमसे उनमें केवल पुरुषार्थत्व उपलब्ध होता है । किसीका किसीके साथ कुछ सत्यानन्दी -दीपिका हो तो ऐन्द्र चरु मध्यमें रखकर आहुति करे और अवशिष्ट घृतका अभिधारण करें । ' उसमें आग्नेय आदि चरुमोंमें अङ्गोका विधि शास्त्रसे प्रयोग है । इसीप्रकार ' एतयान्नाद्यकामं याजयेत् ' ( इस अवेष्टि द्वारा अन्नादि कामनावाला यजन करे ) यह एक वचन है । और वह विधि वाक्यसे किया गया प्रयोग राजसूय यागसे बहिर्भूत अन्न आदिकी अभिलाषासे तीन वर्णों द्वारा की जाने वाली अवेष्टि इष्टिमें जानना चाहिए, राजसूययज्ञके अन्तर्गत नहीं । इसका ' क्रत्वर्थायामिति ' इस जैमिनि - सूत्र में निर्णय किया गया है । इसलिए मनश्चित् आदि अग्नियाँ स्वतन्त्र हैं ॥ ५० ॥
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७२८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ यथा ' स वा एष एव मृत्युर्य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषः ' इति ' अग्निर्वै मृत्यु: ' ( बृह ० ३।२।१० ) इति चाग्न्यादित्यपुरुषयोः समानेऽपि मृत्युशब्दप्रयोगे नात्यन्तसाम्यापत्तिः । यथा च ' असो वा लोको गौतमाग्निस्तस्यादित्य एव समित् ' ( छा ० ५ | ४ | १ ) इत्यत्र न समिदादिसा-मान्याल्लोकस्याग्निभावापत्तिस्तद्वत् ॥ ५१ ॥
परेण च शब्दस्य ताद्विध्यं भूयस्त्वात्वनुबन्धः ॥ ५२ ॥
पदच्छेद – परेण च शब्द य, ताद्विध्यम् भूयस्त्वात्, तु, अनुबन्धः । सूत्रार्थ - ( परेण ) ' अयं वात्र लोक.० ' इस उत्तर ब्राह्मणके साथ साम्य होने के कारण ( शब्दस्य ) मध्य ब्राह्मणका ( ताद्विध्यम् ) विद्या विधित्व प्रयोजन लक्षित होता है, क्योंकि ( भूयस्त्वा-वनुबन्धः ) मानस अग्निमें बहुत से अग्निके अन्यत्र संपाद्य होनेसे क्रिया अग्निके साथ उसका पाठ है । परस्तादपि ' अयं वात्र लोक एषोऽग्निश्चित ' इत्यस्मिन्ननन्तरे ब्राह्मणे, ताद्विध्यं केव-लविद्याविधित्वं शब्दस्य प्रयोजनं लक्ष्यते, न शुद्धकर्माङ्गविधित्वम् । तत्र हि - ' विद्यया तदारोहन्ति यत्र कामाः परागताः । न तत्र दक्षिणा यन्ति नाविद्वांसस्तपस्विनः ' इत्यनेन श्लोकेन केवलं कर्म निन्दन्विद्यां च प्रशंसन्निदं गमयति । तथा पुरस्तादपि ' यदेतन्मण्डलं तप ते ' इत्यस्मिन्ब्राह्मणे विद्याप्रधानत्वमेव लक्ष्यते, ' सोऽमृतो भवति मृत्युर्ह्यस्यात्मा भवति ' इति विद्याफलेनैवोपसंहारान्न कर्मप्रधानता । तत्सामान्यादिहापि तथात्वम् । भूयांसस्त्वग्भ्य-वयवाः संपादयितव्या विद्यायामित्येतस्मात्कारणादग्निनाऽनुबध्यते विद्या, न कर्माङ्ग-त्वात् । तस्मान्मनचिदादीनां केवलविद्यात्मकत्वसिद्धिः ॥ ५२ ॥
( ३० ऐकात्म्याधिकरणम् सू ० ५३-५४ ) एक आत्मानः शरीरे भावात् ॥ ५३ ॥
पदच्छेद - एके, आत्मनः शरीरे, भावात् । सामान्य न हो, ऐसा संभव नहीं है, और इतने मात्रसे प्रत्येक वस्तुकी अपनी स्वाभाविक विषमता निवृत्त नहीं हो जाती । मृत्युके समान जैसे ' स वा एष ० ' ( वह यही मृत्यु है जो यह इस मण्डलमें पुरुष है ) और ' अग्निर्वै मृत्यु: ' ( अग्नि ही मृत्यु है ) इसमें अग्नि और आदित्य पुरुष में मृत्यु शब्दका प्रयोग समान होनेपर भी दोनोंमें अत्यन्त साम्यको प्राप्ति नहीं होती । और जैसे ' असौ वाव लोको ० ' ( हे गौतम? यह प्रसिद्ध द्युलोक ही अग्नि है, उसका आदित्य ही समिधा है ) इसमें समिधा बादिके सादृश्यसे द्युलोक में अग्निभावकी प्राप्ति नहीं होती, वैसे ही प्रकरणमें समझना चाहिए ॥ ५१ ॥
आगे मी ' अयं वाव लोको ० ' ( यही लोक यह अग्निश्चित् है ) इस अनन्तर ब्राह्मण में श्रुतिका प्रयोजन ताद्विध्य केवल विद्याविधित्व लक्षित होता है, शुद्ध कर्माङ्गविधित्व नहीं, क्योंकि उसमें ' विद्यया तदारोहन्ति ० ' ( विद्यासे उस स्थानको प्राप्त होते हैं जहाँ मनोरथ प्राप्त होते हैं, वहाँ कर्म कुशल नहीं जाते और अविद्वान् तपस्वी भी नहीं जाते ) इस श्लोक से केवल कर्मकी निन्दा करती हुई और विद्याकी प्रशंसा करती हुई श्रुति यह ( विद्याका प्राधान्य ) बोधित करती है । उसी प्रकार पूर्व में भी ' यदेतन्म-डलं तपति ' ( जो यह मण्डल तपता है ) इस ब्राह्मण में विद्याका प्रधानत्व हो लक्षित होता है । ' सोऽमृतो भवति ० ' ( वह अमृत होता है, क्योंकि मृत्यु उसकी आत्मा है ) इस प्रकार विद्याफलसे हो उपसंहार होनेसे कर्म प्रधानता नहीं है । पूर्व और उत्तर ब्राह्मणत्त्रके सादृश्यसे यहाँ ( मध्यस्थ ब्राह्मणमें ) मी विद्याकी प्रधानता है । परन्तु विद्या में अग्निके बहुत से अवयव संपादन करने योग्य हैं, इसकारण से विद्या अग्निसे सम्बद्ध होती है, कर्मके अङ्गरूप होने नहीं । इसलिए मनश्चित् आदि अग्नियाँ केवल विद्यात्मक हैं, ऐसी सिद्धि होती ॥ ५२ ॥
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अधि ० ३० सू ० ५३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७२ ९ सुत्रार्थ - ( एके ) चार्वाक लोग ( आत्मनः ) देहसे अतिरिक्त आत्माका अस्तित्व नहीं मानते हैं, ( शरीरे ) क्योंकि शरीरके होनेपर ही ( मावात् ) आत्माके धर्मोका अस्तित्व है! इह देहव्यतिरिक्तस्यात्मनः सद्भावः समर्थ्यते बन्धमोक्षाधिकारसिद्धये । न ह्यसति देहव्यतिरिक्त आत्मनि परलोकफलाचोदना उपपद्येरन् कस्य वा ब्रह्मात्मत्वमुपदिश्येत? ननु शास्त्रप्रमुख एव प्रथमे पादे शास्त्रफलोपभोगयोग्य स्य देहव्यतिरिक्तस्यात्मनोऽस्ति-त्वमुक्तम् । सत्यमुक्तं भाष्यकृता, नतु तत्रात्मास्तित्वे सूत्रमस्ति, इह तु स्वयमेव सूत्रकृता तदस्तित्वमाक्षेपपुरःसरं प्रतिष्ठापितम् । इत एव चाकृष्या ss चार्येण शबरस्वामिना प्रमाणलक्षणे वर्णितम् । अत एव च भगवतोपवर्षेण प्रथमे तन्त्रे आत्मास्तित्वाभिधान-प्रसक्तौ शारीरके वक्ष्याम इत्युद्धारः कृतः । इह चेदं चोदनालक्षणेषूपासनेषु विचार्यमा णेष्वात्मास्तित्वं विचार्यते, कृत्स्नशास्त्रशेषत्व प्रदर्शनाय । अपि च पूर्वस्मिन्नधिकरणे प्रक-रणोत्कर्षाभ्युपगमेन मनश्विदादीनां पुरुषार्थत्वं वर्णितम्, कोऽसौ पुरुषः? यदर्था एते मनचिदादय इत्यस्यां प्रसक्ताविदं देहव्यतिरिक्तस्यात्मनोऽस्तित्वमुच्यते । तदस्तित्वाक्षे-पार्थं चेदमादिमं सूत्रम् । आक्षेपपूर्विका हि परिहारोक्तिर्विवक्षितेऽर्थे स्थूणानिखननन्यायेन दृढां बुद्धिमुत्पादयेदिति । अत्रैके देहमात्रात्मदर्शिनो लोकायतिका देहव्यतिरिक्तस्या-त्मनोऽभावं मन्यमानाः समस्तव्यस्तेषु बाह्येषु पृथिव्यादिष्वदृष्टमपि चैतन्यं शरीराका -रपरिणतेषु भूतेषु स्यादिति संभावयन्तस्तेभ्यश्चैतन्यं मदशक्तिवद्विज्ञानं चैतन्य विशिष्टः कायः पुरुष इति चाहुः । स्वर्गगमनायापवर्गगमनाय वा समर्थो देहव्यतिरिक्त आत्माऽ-इस अधिकरणमें बन्ध और मोक्षके अधिकारकी सिद्धिके लिए देहसे पृथक् आत्मा के अस्तित्वका समर्थन किया जाता है । देहसे अतिरिक्त आत्माके न होनेपर परलोक फलवाले विधि-वाक्योंकी उपपत्ति नहीं होगी और शास्त्र किसको ब्रह्मात्मत्वका उपदेश करेगा । परन्तु शास्त्र के आरम्भ [ पूर्वमीमांसा के ] प्रथम पादमें ही शास्त्रोक्त फलके उपभोगके योग्य, देहसे व्यतिरिक्त आत्माका अस्तित्व कहा गया है । ठीक माष्यकार ( यबरस्वामी ) ने ऐसा कहा है । परन्तु वहाँ देहसे अतिरिक्त आत्माका सद्भाव विषयक सूत्र नहीं है । यहीं तो स्वयं ही सूत्रकारने आक्षेप पूर्वक देहसे अतिरिक्त आत्माका अस्तित्व प्रतिष्ठापित किया है । आचार्य शबरस्वामीने यहाँसे ही आकर्षण कर प्रमाणलक्षण ( प्रथम अध्याय ) में देहसे पृथक् आत्माका वर्णन किया है । अतएव भगवान् उपवर्षने पूर्वमीमांसा में आत्माके अस्तित्वके कथनका प्रसंग आनेपर हम इसे शारीरकमें कहेंगे, ऐसा कहकर उपरत हुए हैं अर्थात् प्रकरण समाप्त किया है । और यहाँ चोदना लक्षण - विघिसें ज्ञापित विचार्यमाण उपासनाओं में समस्त शास्त्रका आत्मास्तित्व अङ्ग है, इस प्रदर्शन के लिए आत्मा-के अस्तित्वका यह विचार किया जाता है । किश्च पूर्वं अधिकरणमें क्रतुके प्रकरणसे उत्कर्षं स्वीकारकर मनश्चित् आदि अग्नियोंमें पुरुषार्थत्व वर्णित किया जाता है । वह पुरुष कौन है, जिसके लिए ये मनश्चित् आदि अग्नियाँ हैं? ऐसा प्रश्न उपस्थित होनेपर देहसे अतिरिक्त यह आत्माका अस्तित्व कहा जाता है । उस अस्तित्वके आक्षेपके लिए यह प्रथम सूत्र है । आक्षेप पूर्वक कहा गया परिहार स्थूणानिखनन न्यायसे विवक्षित अर्थमें दृढ बुद्धि उत्पन्न करेगा । आत्मविचारके प्रसङ्गमें देहमात्रको मात्मा देखनेवाले कुछ लोकायतिक लोग देहसे व्यतिरिक्त आत्मा का अभाव मानते हुए समस्त धोर व्यस्त बाह्य पृथिवी आदिमें अदृष्ट भी चैतन्य शरीरके आकारमें परिणत भूतोंमें होना चाहिए, इस सत्यानन्दी - दीपिका चैतन्य विशिष्ट यह भूतोंका संघात्मक देह ही बात्मा है । इसमें ' यदि ' इत्यादिसे अन्वय-व्यतिरेक द्वारा देहको आत्मा सिद्ध करते हैं । किश्व ' मैं गोरा हूँ, मैं कृष्ण हूँ, मैं जाता हूँ ' इत्यादि
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७३० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ स्ति, यत्कृतं चैतन्यं देहे स्यात् । देह एव तु चेतनश्चात्मा चेति प्रतिजानते । हेतुं चाच-क्षते - शरीरे भावादिति । यद्धि यस्मिन्सति भवत्यसति च न भवति तत्तद्धर्मत्वेनाध्यव सीयते यथाऽग्निधर्मावोष्ण्यप्रकाशौ । प्राणचेष्टाचैतन्यस्मृत्यादयश्चात्मधर्मत्वेनाभिमता आत्मवादिनां तेऽप्यन्तरेव देह उपलभ्यमाना बहिश्चानुपलभ्यमाना असिद्धे देहव्यति-रिक्ते धर्मिणि देहधर्मा एव भवितुमर्हन्ति, तस्मादव्यतिरेको देहादात्मन इति ॥ ५३ ॥
एवं प्राप्ते ब्रूमः--व्यतिरेकस्तद्भावाभावित्वान्न तूपलब्धिवत् ॥ ५४ ॥
पदच्छेद - व्यतिरेकः, तद्भावाभावित्वात् न, तु, उपलब्धिवत् । सूत्रार्थ - ( व्यतिरेकः ) आत्मा देहसे व्यतिरिक्त है, ( तद्भावामावित्वात् ) क्योंकि मृतका -वस्था में देहके होनेपर भी आत्मा के चैतन्य आदि धर्मोका अस्तित्व नहीं है । ( नतूपलब्धिवत् ) जैसे भूतोंकी उपलब्धि भूतोंका धर्म नहीं है, वैसे मौतिक देहकी उपलब्धि भी देहका धर्म नहीं है, किन्तु उससे भिन्न है । * नत्वेतदस्ति यदुक्तम्- अव्यतिरेको देहादात्मन इति, व्यतिरेक एवास्य देहाद्भ-वितुमर्हति तद्भावाभाविश्वात् । यदि देहभावे भावाद्देहधर्मत्वमात्मधर्माणां मन्येत ततो देहभावेऽप्यभावादतद्धर्मत्वमेवैषां किं न मन्येत? देहधर्मवैलक्षण्यात् । ये हि देहधर्मा रूपादयस्ते यावद्देहं भवन्ति । प्राणचेष्टादयस्तु सत्यपि देहे मृतावस्थायां न भवन्ति । देह-प्रकार उन भूतोंसे चैतन्यकी संभावना करते हुए मदशक्तिके समान विज्ञान है और चैतन्य विशिष्ट-काय पुरुष है, ऐसा कहते हैं । स्वर्ग में जाने के लिए अथवा मोक्ष प्राप्त करनेके लिए देहसे अतिरिक्त समर्थ आत्मा नहीं है, जिसके प्रभावसे देहमें चैतन्य हो, देह ही चेतन और आत्मा है, ऐसी प्रतिज्ञा करते हैं । इस प्रतिज्ञात अर्थमें होतु कहते हैं— ' शरीरे मावात् ' शरीरके होनेपर ही आत्माके धर्मोका अस्तित्व है । क्योंकि जिसके होनेपर होता है और न होनेपर नहीं होता, वह उसका धर्मरूपसे निश्चित किया जाता है । जैसे अग्निके धर्म औष्ण्य और प्रकाश निश्चित किये जाते हैं । प्राण, चेष्टा, चैतन्य और स्मृति आदि जो आत्मवादियोंके आत्मघमंरूपसे अभिमत हैं, वे भी देहके अन्दर ही उपलब्ध होते हुए बाहर उपलब्ध नहीं होते हुए देहसे व्यतिरिक्त धर्मोके असिद्ध होनेपर देहके ही धर्मं होने चाहिए । इसलिए देहरूप आत्मासे अतिरिक्त आत्मा नहीं है ॥ ५३ ॥
ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-सिद्धान्ती - यह जो कहा गया है कि देहरूप आत्मासे पृथक् आत्मा नहीं है । वह ठीक नहीं है । आत्माका देहसे अतिरिक्त होना ही युक्त है, क्योंकि देहके होनेपर आत्मा के धर्मोंका अभाव है । यदि देहके अस्तित्वमें आत्मधर्मोका सद्भाव होनेसे आत्मधमं देह घमं माने जाँय तो देहके अस्तित्वमें मी आत्मा चैतन्य आदि धर्मोका अभाव होनेसे ये आत्मधर्म देहके धर्मं नहीं है, ऐसा क्यों नहीं माना जाय? क्योंकि वे देहके धर्मोसे विलक्षण हैं । जो रूप आदि देहके धर्म हैं वे देह पर्यन्त हैं और प्राण, चेष्टा आदि तो मरणावस्थामें देहके होनेपर भी नहीं होते । रूप आदि देहके धर्म दूसरों से सत्यानन्दी - दीपिका प्रसिद्ध प्रतीतियों का विषय भी यह देह ही है । अतः देह ही आत्मा है । विशेष विस्तार ( ब्रह्मसूत्र १।१।१ ) में है ॥ ५३ ॥
* देहके रूपादि धर्मं बाह्य और नेत्र आदि इन्द्रियोंसे ग्राह्य हैं और आत्मधमं आन्तर हैं वे स्वयं जाने जाते हैं अथवा दूसरेसे अनुमेय हैं । इसलिए तुमको विना इच्छाके भी अनुमान आदि प्रमाण मानने पड़ेंगे, नहीं तो व्यवहारकी सिद्धि नहीं होगी । जैसे कि मुखाकृति देखने से परपुरुषवर्ती
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अघि ० ३० सू ० ५४ ] भाषानुवाद सत्यानन्दी - दीपिका सहित ७३१ धर्माश्च रूपादयः परैरप्युपलभ्यन्ते, नत्वात्मधर्माश्चैतन्यस्मृत्यादयः । अपि च सति हि तावद्द हे जीवदवस्थायामेषां भावः शक्यते निश्चेतुं, न त्वसत्यभावः । पतितेऽपि कदा-चिदस्मिन्देहे देहान्तरसंचारेणात्मधर्मा अनुवर्तेरन् । संशयमात्रेणापि परपक्षः प्रतिषि-ध्यते । किमात्मकं च पुनरिदं चैतन्यं मन्यते, यस्य भूतेभ्य उत्पत्तिमिच्छतीति परः पर्यनुयोक्तव्यः । नहि भूतचतुष्टयव्यतिरेकेण लोकायतिकः किंचित्तत्त्वं प्रत्येति । यदनुभ वनं भूतभौतिकानाम्, तच्चैतन्यमिति चेत् तर्हि विषयत्वात्तेषां न तद्धर्मत्वमनुवीत, स्वात्मनि क्रियाविरोधात् । न ह्यग्निरुष्णः सत्स्वात्मानं दहति । नहि नटः शिक्षितः सन्स्वस्कन्धमधिरोक्ष्यति । नहि भूतभौतिकधर्मेण सता चैतन्येन भूतभौतिकानि विषयी -क्रियेरन् । नहि रूपादिभिः स्वरूपं पररूपं वा विषयीक्रियते । विषय क्रियन्ते तु बाह्या-ध्यात्मिकानि भूतभौतिकानि चैतन्येन । अतश्च यथैवास्या भूतभौतिकविषयाया उपलब्धे-र्भावोऽभ्युपगम्यते, एवं व्यतिरेकोऽव्यस्यास्तेभ्योऽभ्युपगन्तव्यः । उपलब्धिस्वरूप एव मी उपलब्ध होते हैं । परन्तु चैतन्य, स्मृति आदि आत्मधर्म अन्योंसे उपलब्ध नहीं होते । इसप्रकार जीवितावस्था में देहके विद्यमान होनेपर इन धर्मोका अस्तित्व निश्चित किया जा सकता है । परन्तु देह न होनेपर इनका अभाव निश्चित नहीं किया जा सकता, क्योंकि कदाचित् देहके पतित होनेपर मी आत्मधर्म अन्य देहमें संचारसें अनुवृत्त हो सकते हैं । इसप्रकार केवल संशय से भी परपक्षका प्रतिषेध किया जाता है 1 । जिस चैतन्यकी भूतोंसे उत्पत्तिको इच्छा करते हो उस चैतन्यका स्वरूप क्या मानते हो ऐसा वादिसे पूछना चाहिए, क्योंकि लोकायतिक चार भूतोंसे अतिरिक्त किसी पदार्थको नहीं मानते । यदि कहो कि भूत और भौतिकोंका जो अनुभव है वही चैतन्य है, तो उन भूत और मौतिकों में चैतन्यका विषयत्व होनेसे चैतन्य उनका धर्म नहीं हो सकता, क्योंकि अपनेमें क्रियाका विरोध है । जैसे अग्नि उष्ण होती हुई अपनेको नहीं जलाती, नट शिक्षित होता हुआ भी अपने कंधों-पर नहीं चढ सकता, वैसे भूत और भौतिकों का धर्मं होते हुए चैतन्यसे भूत भौतिक विषय नहीं किये जा सकते । जैसे रूप आदिसे ( भूत - भौतिक धर्मसे ) अपना रूप अथवा अन्यका रूप विषय नहीं किया जाता । परन्तु बाह्य और आध्यात्मिक भूत - भौतिक पदार्थ चैतन्यसे विषय किये जाते हैं । इसलिए जैसे भूत- भौतिक विषयक इस उपलब्धिका अस्तित्व स्वीकार किया जाता है, वैसे ही उनसे इस उप-लब्धिका व्यतिरेक मी स्वीकार करना चाहिए । ' हमारे मत में तो आत्मा उपलब्धि स्वरूप ही हैं ' इस प्रकार आत्मा देहसे व्यतिरिक्त है । और एक रूप होनेसे उपलब्धि नित्य है, कारण कि ' मैंने यह सत्यानन्दी -दीपिका सुख आदिका ज्ञान, पर्वत आदिमें धूम आदिसे अग्नि आदिका ज्ञान आदि नहीं होगे, इसलिए ' ज्ञानादयः देहव्यतिरिक्ताश्रयाः देहसत्वेऽप्यसत्त्वात् व्यतिरेकेण देहरूपादिवत् ' ( ज्ञान आदि देह व्यतिरिक्त आश्रित हैं, क्योंकि देहके अस्तित्वमें भी उनका अभाव है, व्यतिरेकसे जैसे देहके रूपादि ) इस प्रकार प्रत्यक्ष से भिन्न अनुमान प्रमाणसे भी आत्मा देहसे पृथक् सिद्ध होता है । मरणकाल में चैतन्य आदि धर्मों के देहमें उपलब्ध न होनेसे उनका अभाव निश्चित नहीं किया जा सकता, क्योंकि तुम्हारे मत में अनुपलब्धि प्रमाण नहीं है और उनके धर्मी आत्माका देहान्तर प्राप्ति से भी अनुपलम्भ उपपन्न होता है । इसप्रकार संशयमात्र से भी परपक्षका प्रतिषेध किया जाता है । ' उपलब्धिवत् ' इस सूत्रस्थ पदका व्याख्यान करनेके लिए अब ' किमात्मकम् ' इत्यादि भूमिका रचते हैं । * क्या यह चैतन्यं भूतोंसे भिन्न तत्त्व है अथवा रूप आदिके समान भूतोंका धर्म है? प्रथम पक्ष तो युक्त नहीं है, क्योंकि तुमने चारों भूतोंसे अतिरिक्त पदार्थ स्वीकार नहीं किया है, इसलिए तुम्हारे सिद्धान्तकी हानि होगी । द्वितीय पक्षका ' यदनुभवनम् ' इत्यादिसे निराकरण करते हैं । अनुभव
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७३२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ च न आत्मेत्यात्मनो देहव्यतिरिक्तत्वम्, नित्यत्वं चोपलब्धेरैकरूप्यात्, अहमिदमद्राक्षमिति चावस्थान्तरयोगे ऽप्युपलब्धृत्वेन प्रत्यभिज्ञानात् स्मृत्याद्युपपत्तेश्च । यत्ततम् - शरीरे भावाच्छरीरधर्म उपलब्धिरिति, तद्वर्णितेन प्रकारेण प्रत्युक्तम् । अपि च सत्सु प्रदीपा-दिषूपकरणेषूपलब्धिर्भवत्यसत्सु न भवति । न चैतावता प्रदीपादिधर्म एवोपलब्धिर्भवति । एवं सति देह उपलब्धिर्भवत्यसति च न भवतीति न देहधर्मो भवितुमर्हति, उपकरणत्व-मात्रेणापि प्रदीपादि वद्दे होपयोगोपपत्तेः । न चात्यन्तं देहस्योपलब्धावुपयोगोऽपि दृश्यते, निश्चेष्टेऽप्यस्मिन्देहे स्वप्ने नानाविधोपलब्धिदर्शनात् । तस्मादनवद्यं देहव्यति-रिक्तस्यात्मनोऽस्तित्वम् ॥५४ ॥
( ३१ अङ्गावबद्धाधिकरणम् । सू ० ५५-५६ ) अङ्गावबद्धास्तु न शाखासु हि प्रतिवेदम् ॥ ५५ ॥
पदच्छेद - अङ्गावबद्धाः, तु, न, शाखासु, हि, प्रतिवेदम् । सूत्रार्थ - ( तु ) शब्द पूर्वपक्षकी व्यावृत्तिके लिए है, ( अङ्गावबद्धा:) मङ्गाश्रित उद्गीथ आदि उपासनाएं ( प्रतिवेदम् ) प्रत्येक वेद ( शाखासु ) अपनी - अपनी शाखा में व्यवस्थित ( न ) नहीं होनी चाहिए, किन्तु सर्वं शाखाओंमें अनुवृत्त होनी चाहिए, ( हि ) क्योंकि ' उद्गीथमुपासीत ' इस प्रकार उद्गीथ आदिकी अविशेष श्रुति है । * समाप्ता प्रासङ्गिकी कथा, संप्रति तु प्रकृतामेवानुवर्तामहे- ' ओमित्येतदक्षरमुद्गीथ-मुपासीत ' ( छा ० १।१।१ ) ' लोकेषु पञ्चविधं सामोपासीत ' ( छा ० २।२।१ ) ' उक्थमुक्थमिति वै प्रजा देखा ' इस प्रकार अन्य व्यवस्थाका सम्बन्ध होनेपर भी उपलब्धरूपसे प्रत्यभिज्ञान होता है और स्मृति आदिकी उपपत्ति होती है । जो यह कहा गया कि शरीरमें अस्तित्व होनेसे उपलब्धि शरीरका धर्म है, वह भी वर्णित प्रकारसे निराकृत हुआ । किञ्च प्रदीप आदि उपकरणोंके विद्यमान होनेपर उपलब्धि होती है उनके विद्यमान न होनेपर नहीं होती, इतनेमात्रसे उपलब्धि प्रदीपका धर्म नहीं हो जाती । इसप्रकार देहके होनेपर उपलब्धि होती है उनके न होनेपर नहीं होती, इससे देहका धर्म नहीं हो सकती, क्योंकि उपलब्धिके उपकरणमात्र से भी प्रदीप आदिके समान देहका उपयोग हो सकता है । किन्तु उपलब्धि में देहका अत्यन्त उपयोग नहीं देखा जाता, कारण कि इस देहके निश्चेष्ट होनेपर भी स्वप्न में अनेक प्रकारकी उपलब्धि देखने में आती है । इसलिए देहसे अतिरिक्त मा अस्तित्व दोष रहित है ॥ ५४ ॥
प्रासङ्गिक कथा समाप्त हुई । अब हम प्रकृत कथाकी अनुवृत्ति करते हैं- ' भोमित्येदक्षरम् ० ' ( ॐ इस अक्षर उद्गीथकी उपासना करनी चाहिए ) ' लोकेषु ० ' ( पृथिवी आदि लोकोंमें पाँच प्रकारके सत्यानन्दी - दीपिका तो चैतन्य है और भूत जड़ हैं, ऐसी स्थिति में चैतन्य जड़ भूतोंका धर्म नहीं हो सकता है । वेदान्त-सिद्धान्त में उपलब्धि ही आत्मा है । ' आत्मा, देहाद्भिन्नः ", उपलब्धिरूपत्वात् उपलब्धिवत् ' ( आत्मा देहसे भिन्न है उपलब्धिरूप होनेसे, उपलब्धिके समान ) इससे आत्मा मी उपलब्धिरूप होनेसे नित्य ही है । अब तक तो पूर्वपक्षके मठका अवलम्बन कर कहा गया है । परन्तु आगे अपना अभिमत ' न चास्यन्तं ' इत्यादिसे स्पष्ट करते हैं । ' मैं मनुष्य हूँ ' इत्यादि देह विषयक अभेद ज्ञान भ्रमात्मक है, अतः वह देहको आत्मा सिद्ध करनेमें समर्थ नहीं । इसलिए उपलब्धिस्वरूप आत्माका देहसे पृथक् अस्तित्व सिद्ध है ॥ ५४ ॥
* देहके विद्यमान होनेपर चैतन्य है, किन्तु देहके विद्यमान होनेपर जैसे चैतन्यका अभाव मी है, वैसे उद्गीथ आदिके सद्भावमें उपासना है, किन्तु उद्गीथ आदिके सद्भावमें उपासना के अभाव की
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अधि ० ३१ सू ० ५५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७३३ वदन्ति तदिदमेवोक्थम् ', ' इयमेव पृथिवी, ' ' अयं वाव लोक: ' ' एषोऽग्निश्चित: ' इत्येवमाद्या य उद्गीथादिकर्माङ्गावबद्धाः प्रत्ययाः प्रतिवेदं शाखाभेदेषु विहितास्ते तत्तच्छाखागतेष्वे-वोद्गीथादिषु भवेयुरथवा सर्वशाखागतेष्विति विशयः । प्रतिशाखं च स्वरादिभेदादु-द्गीथादिभेदानुपादायायमुपन्यासः । किं तावत्प्राप्तम्? स्वशाखागतेष्वेवोद्गीथादिषु विधीयेरन्निति । कुतः? संनिधानात्, ' उद्गीथमुपासीत ' ( छा ० १ | १ | ) इति हि सामान्य -विहितानां विशेषाकाङ्गायां संनिकृष्टेनैव स्वशाखागतेन विशेषेणाकाङ्क्षादिनिवृत्तेः । तदतिलङ्घनेन शाखान्तरविहितविशेषोपादाने कारणं नास्ति । तस्मात्प्रतिशाखं व्यव-स्थेति । एवं प्राप्ते ब्रवीति - अङ्गावबद्धास्त्विति । तुशब्दः पक्षं व्यावर्तयति । नैते प्रतिवेद स्वशाखास्वेव व्यवतिष्ठेरन्, अपि तु सर्वशाखा स्वनुवर्तेरन् । कुतः? उद्गीथादि-श्रुत्यविशेषात् । स्वशाखाव्यवस्थायां ह्युद्गीथमुपासीतेति सामान्यश्रुनिरविशेषप्रवृत्ता सती संनिधानवशेन विशेषे व्यवस्थाप्यमाना पोडिता स्यात् । न चैतन्न्याय्यम्, संनि-धानात्तु श्रुतिर्बलीयसी । नच सामान्याश्रयः प्रत्ययो नोपपद्यते । तस्मात्स्वरादिभेदे सत्यप्युद्गीथत्वाद्यविशेषात्सर्वशाखागतेष्वेवोद्गीथादिष्वेवं जातीयकाः प्रत्ययाः स्युः ५५ सामकी उपासना करनी चाहिए ) ' उक्थमुक्थमिति ० ' ( प्रजा उक्य उक्थ ऐसा कहती हैं, वह उक्थ यही वक्ष्यमाण है, जो उक्थ है, वह यही पृथिवी है ) ' अयं वाव लोकः ० ' ( यह लोक है, यह अग्निश्चित् है ) इत्यादि कर्माङ्गवे सम्बन्धित उद्गीथ आदि उपासनाएँ जो प्रत्येक वेदमें भिन्न - भिन्न शाखाओं में विहित हैं, क्या वे तत् तत् शाखागत उद्गीथ आदिमें होनी चाहिए अथवा सर्वंशाखागत उद्गीथ आदिमें होनी चाहिए? ऐसा संशय होता है । प्रत्येक शाखा में स्वर आदि भेदसे उद्गीथ आदि भेदों को लेकर यह उपन्यास है । तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - अपनी शाखागत उद्गीथ आदिमें ही विद्याओंका विधान करना चाहिए । किससे? इससे कि संनिधान है । ' उद्गीथमुपासीत ' ( उद्गीथकी उपासना करनी चाहिए ) इस प्रकार सामान्यसे विहित विद्याओंको विशेषकी आकांक्षा होनेपर संनिकृष्ट स्व शाखागत विशेषसे ही आकाङ्क्षा आदिकी निवृत्ति होती है, अतः उसका अतिक्रमणकर अन्य शाखामें विहित विशेषके उपादानमें कारण नहीं है, इसलिए प्रत्येक शाखामें व्यवस्था है । सिद्धान्ती - -ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं - ' अङ्गावबद्धास्तु ' | ' तु ' शब्द पूर्वपक्षकी व्यावृत्ति करता है । ये उपासनाएँ प्रत्येक वेदमें अपनी शाखामें ही व्यवस्थित नहीं होनी चाहिए, किन्तु सर्वं शाखाओं में अनुवृत्त होनो चाहिए, किससे? उद्गीथ आदि श्रुति अविशेष होने से, अपनी शाखा में व्यवस्था होनेपर ' उद्गीथमुपासीत ' यह सामान्य श्रुनि अविशेषरूपसे प्रवृत्त होती हुई संनिधिके बलसे विशेष में व्यवस्थापित होकर बाधित हो, यह युक्त नहीं है, क्योंकि श्रुति संनिधिसे बलवती है । और सामान्यके आश्रयसे विद्या उपपन्न नहीं होती ऐसा भी नहीं है । इससे स्वर आदिके भेद होनेपर मी उद्गोथत्व आदिके अविशेष होने से सब शाखागत उद्गीथ आदिमें इस प्रकारकी उपासनाएँ होनी चाहिए ॥ ५५ ॥
सत्यानन्दी -दीपिका आशङ्काकर ' अङ्गावबद्धा ' इत्यादिसे कहते हैं । इस प्रकार प्रासङ्गिक कथा समाप्तकर अब प्रकृत उद्गीथ जादि उपासनाओंकी ‘ ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत ' इत्यादिसे अनुवृत्ति करते हैं । ' लोकेषु पञ्चविधं सामोपासीत ’ यथा ‘ पृथिवी हिंकारोऽग्निः प्रस्तावोऽन्तरिक्षमुद्गीथं आदित्यः प्रतिहारो यौनिधनम् ' ( छा ० २२1१ ) ( हिकार पृथिवी है, प्रस्ताव अग्नि है, उद्गीथ अन्तरिक्ष है, प्रतिहार आदित्य है और विधन द्युलोक हैं, इस प्रकार हिकार आदि पाँच प्रकारके सामकी पृथिवी आदि दृष्टिसे उपासना करनी चाहिए ) उक्थ नामके शस्त्र अप्रगीत ऋक् पृथिवी दृष्टि करनी चाहिए, इष्टिकाचित् अग्निमें लोकदृष्टि करनी चाहिए, इस प्रकार कर्माङ्गके आश्रित उपासनाएँ हैं । ' उद्गीथमुपासीत ' इस प्रकार उद्गीथादि
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७३४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ मन्त्रादिवद्वाऽविरोधः ॥ ५६ ॥
पदच्छेद - मन्त्रादिवत्, वा, अविरोधः । सूत्रार्थ - ( अविरोधः ) एक शाखा में विहित उद्गीथ आदिकी अन्य शाखागत उद्गीथ आदिमें प्राप्ति होनेपर भी विरोध नहीं है, ( मन्त्रादिवत् ) जैसे एक शाखागत मन्त्र, कर्म और गुणोंका भी अन्य शाखा में उपसंग्रह देखा जाता है । * अथवा नैवात्र विरोधः शङ्कितव्यः - कथमन्यशाखागतेषूद्गीथादिष्वन्यशाखा-विहिताः प्रत्यया भवेयुरिति, मन्त्रादिवद विरोधोपपत्तेः । तथा हि - मन्त्राणां कर्मणां गुणानां च शाखान्तरोत्पन्नानामपि शाखान्तर उपसंग्रहो दृश्यते । येषामपि हि शाखिनां कुटरुरसी-त्यश्मादानमन्त्रो नास्नातस्तेषामप्यसौ विनियोगो दृश्यते— ' कुक्कुटोऽसीत्यश्मानमादत्ते कुटरुर-सीति वा ' इति । येषामपि समिदादयः प्रयाजा नाम्नातास्तेषामपि तेषु गुणविधिराम्नायते-अथवा यहाँ ऐसी विरोधकी शङ्का नहीं करनी चाहिए कि अन्य शाखा में विहित उद्गीथ आदि उपासनाएँ अन्य शाखागत उद्गीय आदिमें किस प्रकार होंगी? क्योंकि मन्त्र आदिके समान अवि-रोध उपपन्न होता है । जैसे कि एक शाखा में विहित मन्त्र, कर्म और गुणोंका अन्य शाखामें अपसंग्रह देखा जाता है । जिन शाखावालोंके ' कुटरुरसि ' ( काण्व संहिता ) ( तू कुक्कुट है ) इसप्रकार अरमादान ( पत्थरादान ) मन्त्र पठित नहीं है । उनके मी ' कुक्कुटोऽसि ' ( शु ० यजु ० माध्यन्दिन ) ( तू कुक्कुट है ) इस मन्त्रका अश्मादानमें विनियोग देखा जाता है अर्थात् इस मन्त्रको पढकर अश्मका ग्रहण करना चाहिए अथवा ' कुटरुरसि ' इस मन्त्रको पढकर अश्मका ग्रहण करना चाहिए । इसप्रकार जिन शाखावालोंके समिघ् आदि प्रयाज पठित नहीं है, उनकी शाखाओं में भी ' ऋतवो वै ० ' सत्यानन्दी - दीपिका साधारण श्रतिसे और विशेष संनिधिसे संशय होनेपर पूर्वपक्षी - ' स्वश । खागते ' इत्यादिसे कहते हैं, सिद्धान्ती - ' एवं प्राप्ते ब्रवीति ' से कहते हैं ॥ ५५ ॥
* पूर्व सूत्रमें - एक शाखा में विहित उद्गीथ आदि उपासनाओंका अन्य शाखागत अङ्गके साथ सम्बन्ध होने में जो विरोध प्रतीत हुआ था, उसे अङ्गीकारकर उनका सम्बन्ध कहा गया है । अब उनका विरोध ही नहीं है, क्योंकि एक शाखामें विहित अङ्गोंका अन्य शाखा में स्थित अङ्गों के साथ सम्बन्ध जैसे उपपन्न होता है, वैसे ही यह सम्बन्ध उपपन्न है । अब इसे ' अथवा ' इत्यादिसे कहते हैं । अविरोधमें क्रमशः मन्त्र, कर्म और गुणोंका ' तथा येषामपि ' इत्यादिसे उदाहरण देते हैं । मन्त्र - यद्यपि यजुर्वेदियों का ' कुक्कुटोऽसि ' ऐसा मन्त्र है ' कुटरुरसि ' ऐसा मन्त्र नहीं है, तो भी तण्डु-लपेषण के लिए अश्मादानमें ( पत्थर ग्रहण में ) दोनों मन्त्रोंका विकल्पसे विनियोग होनेके कारण कुटरुरसि ' यह मन्त्र भी प्राप्त होता है । शाखा भेदसे इन दोनों मन्त्रोंकी आनुपूर्वी भिन्न भिन्न होने-पर भी दोनोंके अर्थमें भेद नहीं है । भगवान् माष्यकारने सूत्रस्थ आदि अदसे कर्म और गुणका ग्रहण किया है । कर्मका उदाहरण - मैत्रायणी शाखावालोंके ' समिधो यजति तनूनपातं यजति, ईडो यजति, बर्हिर्यजति, स्वाहाकारं यजति ' इस प्रकार यागके अङ्गभूत समिघ् आदि पाँच प्रयाज नहीं पढे गये हैं । हेमन्त और शिशिर इन दोनों ऋतुओंको मिलाकर द्वादशमासमें पांच ऋतु हैं, इस-प्रकार प्रयाज भी पांच हैं, उनका समानदेश में गुणविधिसे होम करना चाहिए । इसप्रकार एक शाखा में विहित कर्मोंका अन्य शाखामें संग्रह देखनेमें आता है । गुणका उदाहरण - ' अग्नीषोमीयं पशु॒मालभेत ' इसप्रकार यजुर्वेदियों की श्रुतिमें सामान्यरूपसे अग्नीषोमीय पशु कहा गया है, ' अज ' ऐसा जाति विशेष नहीं । ' छागस्य वपाया मेदसोऽनुब्रूहि ' ' छागो वा मन्त्रवर्णात् ' ( जै ० सू ० ६।६ ) ( मन्त्र वर्णनसे अज लेना चाहिए ) इस मन्त्र के आधार पर यह जैमिनि सूत्र है । इसप्रकार प्रेषमन्त्र-
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अधि ० ३२ सू ० ५७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७३५ ' ऋतवो वै प्रयाजाः समानत्र होतव्याः ' इति । तथा येषामपि ' अजोऽग्नीषोमीयः ' इति जातिवि-शेषोपदेशो नास्ति तेषामपि तद्विषयो मन्त्रवर्ण उपलभ्यते - छागस्य वपाया मेदसोऽनुब्रूहि ' इति । तथा वेदान्तरोत्पन्नानामपि ' अग्नेर्वेर्होनं वेरध्वरम् ' इत्येवमादिमन्त्राणां वेदान्तरे परिग्रहो दृष्टः । तथा बहूवृचपठितस्य सूक्तस्य ' यो जात एव प्रथमो मनस्वान् ' ( ऋ ० सं ० २।६।७ ) इत्यस्य ' अध्वर्यवे सजनीयं शस्यम् ' इत्यत्र परिग्रहो दृष्टः । तस्माद्यथाऽऽश्रयाणां कर्माङ्गानां सर्वत्रानुवृत्तिरेवमाश्रितानामपि प्रत्ययानामित्यविरोधः ॥ ५६ ॥
( ३२ भूमज्यायस्त्वाधिकरणम् । सू ० ५७ ) भूम्नः क्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा हि दर्शयति ॥ ५७ ॥
पदच्छेद - भूम्नः क्रतुवत्, ज्यायस्त्वम्, तथा, हि, दर्शयति । सूत्रार्थ - ( भूम्नः ) ' प्राचीनशाल औपमन्यवः ' इत्यादिमें समस्तोपासनाका ही ( ज्यायस्त्रम् ) प्रधानरूपसे प्रतिपादन है । ( क्रतुवत् ) जैसे दर्शपूर्णमास यागमें एक ही साङ्गप्रघानका प्रयोग होता है । ( हि ) क्योंकि ' तस्य ह वा ' यह श्रुति भी व्यस्त उपासनाकी निन्दाकर ( तथा ) उसी प्रकार समस्त उपासना की प्रतिपत्ति ( दर्शयति ) दिखलाती है । * ' प्राचीनशाल औपमन्यवः ' ( छा ० ५ | १ | १ | १ ) इत्यस्यामाख्यायिकायां व्यस्तस्य समस्तस्य च वैश्वानरस्योपासनं श्रूयते । व्यस्तोपासनं तावत् - ' औपमन्यव कं त्वमात्मा-नमुपास्स, इति दिवमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै सुतेजा आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्ते ' ( ऋतु ही प्रयाज हैं, समानदेश - एकस्थान में ही उनका होम करना चाहिए ) इसप्रकार उनमें गुणविधि कही जाती है । और जिन शाखावालोंमें ' अजोऽग्नीषोमीयः ' ( अज अग्नीषोमीय है ) इस प्रकार जाति विशेषका उपदेश नहीं है, उन शाखावालोंमें मी ' छागस्य वपाया ० ' ( छाग- बकरा की वपाके मेदके होमार्थं अनुवाक्या कहो ) ऐसा तद्विषयक मन्त्रवर्णं उपलब्ध होता है । तथा अन्य वेदमें उत्पन्न हुए ' अग्नेर्वेर्होत्रं वेरध्वरम् ' ( देवताओंके होत्र और अध्वर कर्म अग्निसे सम्पन्न होते हैं ) इत्यादि मन्त्रोंका भी अन्य वेदमें परिग्रह देखा गया है । इसीप्रकार ' यो जात एव ० ' ( जो उत्पन्न हुआ ही-बालक ही गुणोंसे श्रेष्ठ और मनस्वी हुआ, हे जनो! वह इन्द्र है ) इस बह्वृचों - होताओंद्वारा पठित सूक्तका ' अध्वर्थवे सजनीयं शस्यम् ' ( अध्वर्युद्वारा किये गये प्रयोगमें सजनीय – ' स जनास इन्द्र ' [ हे जनो! वह इन्द्र है ] यह सूक्त कहना चाहिए ) इसमें परिग्रह देखा जाता है । इसलिए जैसे आश्रय कर्माङ्गोको सर्वत्र अनुवृति है, वैसे ही आश्रित उपासनाओंकी भी सर्वत्र अनुवृत्ति है, अतः इसमें कोई विरोध नहीं है ॥ ५६ ॥
' प्राचीनशाल औपमन्यव ' ( उपमन्युका पुत्र प्राचीनशाल ) इस आख्यायिकामें व्यस्त और समस्तरूपसे वैश्वऩरकी उपासना श्रुति है । ' औपमन्यव कं ० ' ( हे उपमन्युकुमार! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो? इसप्रकार राजा अश्वपतिके प्रश्न करनेपर हे पूज्य राजन्! मैं द्युलोककी उपासना सत्यानन्दी - दीपिका लिङ्गसे ' अज ' जाति विशेषका संग्रह होता है । मन्त्रोंका ' तथा ' इत्यादिसे दूसरा उदाहरण कहते हैं - . ' अग्नेर्वेर्होत्रं वेरध्वरम् ' इसप्रकार साम वेदस्थ मन्त्रोंका यजुर्वेदमें ग्रहण होता है । इसप्रकार जैसे एक शाखा में विहित मन्त्र आदिका अन्य शाखामें परिग्रह होता है, वैसे ही एक शाखा में विहित उद्गीथ आदि उपासनाओंका भी अन्य शाखा में ग्रहण होता है ॥ ५६ ॥
* इसमें अश्वपति कैकेय और प्राचीनशाल आदि मुनिगणोंका वैश्वानर विषयक विचार है । द्युलोक आदिमें से जो प्रत्येक अवयवकी वैश्वानररूपसे उपासना वह व्यस्तोपासना है, और उनके
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७३६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ ( छा ० ५।१२।१ ) इत्यादि, तथा समस्तोपासनमपि ' तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्माऽऽत्मा संदेहो बहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादौ ' ( छा ०५ / १८ / २ ) इत्यादि । तत्र संशयः - किमिहोभयथाप्युपासनं स्याद्व्यस्तस्य सम स्तस्य चोत समस्तस्यैवेति? किं तावत्प्राप्तम्? प्रत्यवयवं सुतेजः प्रभृतिषूपास्स इति क्रियापदश्रवणात्, ' तस्मात्तव सुतं प्रसुतमासुतं कुले दृश्यते ' ( छा ० ५ | १२1१ ) इत्यादिफल-भेदश्रवणाच्च व्यस्तान्यप्युपासनानि स्युरिति प्राप्तम् । ततोऽभिधीयते भूम्नः पदार्थोप चयात्मकस्य वैश्वानरोपासनस्य ज्यायस्त्वं प्राधान्यमस्मिन्वाक्ये विवक्षितं भवितुमर्हति न प्रत्येकमवयवोपासनानामपि । क्रतुवत् । यथा क्रतुषु दर्शपूर्णमासप्रभृतिषु साम-स्त्येन साङ्गप्रधान प्रयोग एवैको विवक्ष्यते, न व्यस्तानामपि प्रयोगः प्रयाजादीनाम् । नाप्येकदेशाङ्गयुक्तस्य प्रधानस्य तद्वत् । कुत एतद्भूमैव ज्यायानिति । तथा हि श्रुति-भूम्नो ज्यायस्त्वं दर्शयति; एकवाक्यतावगमात् । एक हीदं वाक्यं वैश्वानर विद्याविषयं पौर्वापर्यालोचनात्प्रतीयते । तथा हि- प्राचीनशालप्रभृतय उद्दालकावसानाः षऋ-षयो वैश्वानरविद्यायां परिनिष्ठामप्रतिपद्यमाना अश्वपति कैकेयं राजानमभ्याजग्मुरि त्युपक्रम्यैकैकस्यर्षेरुपास्यं धुप्रभृतीनामेकैकं श्रावयित्वा ' मूर्धा त्वेष आत्मन इति होवाच ' ( छा ० ५।१२।२ ) इत्यादिना मूर्धादिभावं तेषां विदधाति । ' मूर्धा ते व्यपतिष्यद्यन्मां नागमिष्यः ' करता हूं, ऐसा उसने उत्तर दिया । राजा- - -तुम जिस आत्माकी उपासना करते हो यह निश्चय ही ' सुतेजा ' नाम से प्रसिद्ध वैश्वानर आत्मा है ) इत्यादि व्यस्तोपासना है । इसीप्रकार ' तस्य ह वा ο ' ( उस वैश्वानर आत्माका मस्तक ही सुतेजा ( द्युलोक ) है, चक्षु विश्वरूप - सूर्य है, प्राण पृथग्वर्त्मा-वायु है, देहका मध्य भाग बहुल- आकाश है, बस्ति ही रथि जल है, पृथिवी ही दोनों पाद हैं ) इत्यादि समस्तोपासना भी है । यहाँ संशय होता है कि क्या वैश्वानर वाक्यमें व्यस्त और समस्त दोनों प्रकारकी उपासना होनी चाहिए अथवा समस्त ही, तो क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - सुतेजा व्यादि प्रत्येक अवयव में ' उपास्से ' इसप्रकार क्रियापदके श्रवणसे और ' तस्मात्तव ' ( इसीसे तुम्हारे कुलमें सुत ( खण्डित सोमद्रव्य ) प्रसुत और मसुत दिखाई देते हैं ) इत्यादि फल भेदके श्रवणसे व्यस्त उपासनाएँ होनी चाहिए, ऐसा प्राप्त होता है । सिद्धान्ती - इसपर कहते हैं- भूमाका - पदार्थोपचया-त्मक समस्त वैश्वानर उपासनाका ज्यायस्त्व - प्राधान्यसे इस वाक्यमें विवक्षित होना युक्त है, किन्तु प्रत्येक अवयवोपासनांका ज्यायस्त्व विवक्षित नहीं है । क्रतुके समान जैसे दर्शपूर्णमास आदि क्रतुममें समस्तरूपसे अङ्गोसहित प्रधानका एक ही प्रयोग विवक्षित है, व्यस्त प्रयाज आदिका प्रयोग विवक्षित नहीं है, और एकदेशरूप अङ्ग से युक्त प्रधानका भी प्रयोग विवक्षित नहीं है, वैसे ही प्रकृत में भी समझना चाहिए । परन्तु भूमा ही ज्यायान् है, यह किससे ज्ञात होता है? इससे कि श्रुति भूमाका ज्यायरत्व दिखलाती है, क्योंकि एकवाक्यता अवगत होती है । यह वैश्वानरविद्या विषयक वाक्य पौर्वापर्यं पर्यालोचनसे एक ही प्रतीत होता है । जैसे कि प्राचीनशाल आदि उद्दालक पर्यन्त छः ऋषिगण वैश्वानर विद्या में परिनिष्ठाको न प्राप्त होते हुए राजा अश्वपति कैकेयके पास आये, ऐसा उपक्रम कर उसने एक - एक ऋषिको द्यु आदिमेंसे एक - एक उपास्य सुनाकर ' मूर्धा त्वेष ० ' ( यह तो वैश्वानर आत्माका मूर्धा है ) इत्यादिसे श्रुति उन द्यु आदिका मूर्धा आदि रूपसे विधान करती है । और ' मूर्छा ते ० ' ( यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा मस्तक गिर जाता ) इत्यादिसे व्यस्तोपासनाका सत्यानन्दी -दीपिका अवयवकी उपासना समस्तोपासना है । यहाँ दोनों उपासनाओं में विधि और फलका श्रवण होने से और एकवाक्यताकी उपपत्ति होनेसे ' तत्र ' इत्यादिसे संशय कहते हैं । पूर्वपक्षमें फलभेद और ' उपास्से ' क्रियापदके श्रवणसे व्यस्तोपासनाएँ हैं ।