श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 771–780
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 771–780
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अधि ० ३३ सू ० ५८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७३७ ( छा ० ५।१२।२ ) इत्यादिना च व्यस्तोपासनमपवदति । * पुनश्च व्यस्तोपासनं व्यावर्त्य समस्तोपासनमेवानुवर्त्य ' स सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मस्वन्नमत्ति ' ( छा ० ५।१८।१ ) इति भूमाश्रयमेव फलं दर्शयति । यत्तु प्रत्येकं सुतेजःप्रभृतिषु फलभेदश्रवणं तदेवं सत्यङ्ग-फलानि प्रधान एवाभ्युपगतानीति द्रष्टव्यम् । तथोपास्स इत्यपि प्रत्यवयवमाख्यातश्रवणं पराभिप्रायानुवादार्थ न व्यस्तोपासनविधानार्थम् । तस्मात्समस्तोपासनपक्ष एव श्रेया-निति । केचित्वत्र समस्तोपासनपक्षं ज्यायांसं प्रतिष्ठाप्य ज्यायस्त्ववचनादेव किल व्यस्तो-पासनपक्षमपि सूत्रकारोऽनुमन्यत इति कल्पयन्ति । तदयुक्तम्, एकवाक्यतावगतौ सत्यां वाक्यभेदकल्पनस्यान्याय्यत्वात्, ' मूर्षा ते व्यपतिष्यत् ' ( छा ० ५।१२।२ ) इति चैव-मादिनिन्दावचनविरोधात्, स्पष्टे चोपसंहारस्थे समस्तोपासनावगमे तदभावस्य पूर्व-पक्षे वक्तुमशक्यत्वात्, सौत्रस्य च ज्यायस्त्ववचनस्य प्रमाणवत्त्वाभिप्रायेणाप्युपपद्य-मानत्वात् ॥५७ ॥
( ३३ शब्दादिभेदाधिकरणम् । सू ० ५८ ) नाना शब्दादिभेदात् ॥ ५८ ॥
पदच्छेद - नाना, शब्दादिभेदात् । सूत्रार्थ - ( नाना ) विद्या मिन - भिन्न है, ( शब्दादिभेदात् ) क्योंकि ' वेद ' ' उपासीत ' इत्यादि शब्दोंका भेद है । * पूर्वस्मिन्नधिकरणे सत्यामपि सुतेजःप्रभृतीनां फलभेदश्रुतौ समस्तोपासनं ज्याय अपवाद करती है । और फिरसे व्यस्तोपासनाकी व्यावृत्ति कर और समस्तोपासना की अनुवृत्तिकर ' स सर्वेषु ० ' ( वह समस्त लोकोंमें, समस्त प्राणियों में और समस्त आत्मालों में अन्न भक्षण करता है ) इसप्रकार भूमाके आश्रित ही फल दिखलाती है । और जो सुतेजा आदि प्रत्येक अङ्ग में फलभेदका श्रवण है, ऐसा होनेपर भी वह अङ्गोंका फल प्रधानमें ही स्वीकार किया है, ऐसा समझना चाहिए | और ' उपास्से ० ' यह भी प्रत्येक अवयवमें जो क्रियापदका श्रवण है, वह भी अन्य के अभि-प्रायका अनुवाद करनेके लिए है, व्यस्त उपासनाके विधानके लिए नहीं है । इसलिए समस्त उपासना पक्ष ही अधिक श्रेष्ठ है । वेदान्त एक देशी कुछ लोग तो इस अधिकरणमें समस्त उपासना ज्यायस्त्व पक्ष स्थापनकर ज्यायस्त्व वचनसे ही व्यस्त उपासना पक्ष भी सूत्रकारको अनुमत है, ऐसी कल्पना करते हैं । वह युक्त नहीं हैं, क्योंकि एकवाक्यताकी अवगति होनेपर वाक्यभेदकी कल्पना उचित नहीं है । कारण कि ' मूर्धा ते ० ' ( तुम्हारा मस्तक गिर जायगा ) इत्यादि निन्दा वचनका विरोध भी होता है । और उपसंहारमें समस्त उपासनाका अवगम स्पष्ट होनेपर पूर्वपक्ष में उसका अभाव नहीं कहा जा सकता और सूत्रमें ज्यायस्त्व वचन प्रमाणवत्त्वके अभिप्रायसे भी उपपद्यमान है ॥५७ ॥
पूर्वं अधिकरणमें सुतेजा आदिमें फलभेदकी श्रुतिके विद्यमान होनेपर भी समस्त उपासना सत्यानन्दी - दीपिका * भगवान् माष्यकार वेदान्त एक देशी मतको दूषित करनेके लिए उसका ' केचित् ' इत्यादिसे अनुवाद करते हैं । ' आत्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजा: ' इसप्रकारके वाक्य और प्रकरणसे व्यस्त उपासनाका समस्त उपासना में अन्तर्भाव है । जैसे प्रयाज आदि अङ्गोंका प्रधान दर्शपूर्णमासके फलमें ही उपसंहार है । यदि प्रयाज व्यादि अङ्गों का पृथक् फल माने तो वे दर्शपूर्णमास यागके अङ्ग न होकर पृथक् कर्म होंगे और दर्श आदिसे पृथक् वाक्य होंगे । इसप्रकार वाक्यभेद प्रसक्त होगा । परन्तु ऐसा नहीं माना गया है । ऐसा प्रकृतमें भी समझना चाहिए । सूत्रमें जो ' ज्यायस्त्व ' पद है वह व्यस्त उपासनाओंको अप्रामाणिक बोध करानेके लिए है । अतः यह सिद्ध हुआ कि समस्त उपासना ही करनी चाहिए ॥५७ ॥
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७३८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ इत्युक्तम् । अतः प्राप्ता बुद्धिरन्यान्यपि भिन्नश्रुतीन्युपासनानि समस्योपासिध्यन्त इति । अपि च नैव वेद्याभेदे विद्याभेदो विज्ञातुं शक्यते । वेद्यं हि रूपं विद्याया द्रव्यदैवतमिव यागस्य । वेद्यश्चैक एवेश्वरः श्रुतिनानात्वेऽप्यवगम्यते ' मनोमयः प्राणशरीरः ' ( छा ०३।१४।२ ) ' कं ब्रह्म खं ब्रह्म ' ( छा ० ४।१० / ५ ) ' सत्यकामः सत्यसंकल्पः ' ( छा ० ८ | ३ | ५ ) इत्येवमादिषु । तथा ' एक एव प्राणः ' ‘ प्राणो वाव संवर्ग: ' ( छा ० ४।३।३ ) ' प्राणो वाव ज्येष्ठश्न ' ( छा ० ५ | १ | १ ) ‘ प्राणो ह पिता प्राणो माता ' ( छा ० ७ | १५ | १ ) इत्येवमादिषु । वैद्यैकत्वाच्च विद्यैकत्वम् । श्रुति-नानात्वमप्यस्मिन्पक्षे गुणान्तरपरत्वान्नानर्थकम् । तस्मात्स्वपरशाखाविहितमेकवेद्यव्य-पाश्रयं गुणजातमुपसंहर्तव्यं विद्याकात्ययेति । * एवं प्राप्ते प्रतिपाद्यते- नानेति । वेद्या-भेदेऽप्येवं जातीयका विद्या भिन्ना भवितुमर्हति कुतः? शब्दादिभेदात् । भवति ही शब्द-भेदः -- ' वेद ' ' उपासीत ' ' स क्रतुं कुवीत ' ( छा ० ३।११।५ ) इत्येवमादिः । शब्दभेदश्च कर्म-भेदहेतुः समधिगतः पुरस्तात् ' शब्दान्तरे करभेदः कृतानुबन्धनात् ' ( जै ० सू ० ६।२।१ ) इति । आदिग्रहणाद्गुणादयोऽपि यथासंभवं भेदहेतवो योजयितव्याः । ननु वेदेत्यादिषु शब्द-श्रेष्ठ है, ऐसा कहा गया है । इससे भिन्न श्रुतिवाली अन्य उपासनाएँ भी ससस्वरूपसे उपासनाएं होंगी, ऐसी बुद्धि प्राप्त होती है । और वेद्यका अभेद होनेपर भी विद्याका भेद नहीं जाना जा सकता, क्योंकि जैसे द्रव्य और देवता यागके रूप हैं, वैसे ही वेद्यं विद्याका रूप है । ' मनोमयः प्राणशरोर ः ' ( वह ब्रह्म मनोमय और प्राणशरीर - लिङ्गात्मा शरीरवाला है ) ' कं ब्रह्म खं ब्रह्म ' ( सुख ब्रह्म है, व्याकाश ब्रह्म है ) ' सत्यकामः सत्यसंकल्पः ' ( ईश्वर सत्यकाम और सत्यसंकल्प हैं ) इत्यादिमें और इसीप्रकार ' एक एव प्राण: ' ( प्राण एक ही ) ' प्राणो वाव ० ' ( प्राण ही संवर्ग है ) ' प्राणो वाव ० ' ( प्राण ज्येष्ठ और श्रेष्ट है ) ' प्राणो ह ० ' ( प्राण पिता और प्राण माता है ) इत्यादि स्थलोंमें श्रुतिका भेद होनेपर भी वेद्य एक ही ईश्वर अवगत होता है । वेद्यके एक होनेसे विद्या मी एक ही श्रुत है । श्रुतिभेद भी इस पक्ष में अन्य गुणपरेक होनेसे अनर्थक नहीं है । इसलिए अपनी शाखा और अन्य शाखाओं में विहित एक वेद्यके आश्रित गुण समूहका विद्याकी पूर्णता के लिए उपसंहार करना चाहिए । सिद्धान्तो — ऐसा प्राप्त होनेपर प्रतिपादन किया जाता है - ' नाना ' वेद्यका अभेद होनेपर भी इसप्रकारकी विद्याका भेद होना युक्त है, किससे? शब्द आदिके भेदसे । ' वेद ' उपासीत ' स क्रतुं कुर्वीत ' ( वह संकल्प करे ) इत्यादि शब्दभेद है । और शब्दभेद कर्म - भेदका निमित्त है, इस प्रकार पूर्व-काण्डमें — ' शब्दान्तरे कर्मभेदः कृतानुबन्धत्वात् ' ( जै ० सू ० २।२1१ ) ( भिन्न भिन्न शब्द के होने पर कर्मका भी भेद होता है, क्योंकि भिन्नरूपसे उनका विषय माना जाता है अर्थात् धात्वर्थमें भेद होता है ) इस सूत्र में अधिगत होता है । आदि पदके ग्रहणसे गुण आदिको भी यथासंभव भेदके हेतुरूपसे योजना होनी चाहिए । परन्तु ' वेद ' इत्यादिमें शब्दभेद ही प्रतीत होता है? ' यजति ' ददाति ' इत्यादिके सत्यानन्दी - दीपिका * दहरविद्या आदि ब्रह्मविषयक समस्त उपासनाएं वेद्यके एक होनेपर एक हैं अथवा श्रुति भेदसे भिन्न हैं, तथा संवर्ग प्राण उपासना एक है अथवा भिन्न है? इसप्रकार संशय होनेपर दृष्टान्त संगति से ' पूर्वस्मिन् ' आदिसे पूर्वपक्ष करते हैं । पूर्वपक्ष में वेद्यके एक होनेसे विद्या भी एक है । यदि विद्याका भेद हो तो एक श्रुति विहित विद्याका अन्य श्रुतिमें कथन व्यर्थं होगा । परन्तु विद्याके एक होने से अन्य श्रुतिमें कथन अन्य गुणोंके प्रतिपादनके लिए होनेसे व्यर्थं नहीं होगा । इसलिए अपनी शाखा अथवा अन्य शाखामें एक वेद्यके आश्रित ' सत्यकामः सत्यसंकल्प ' आदि गुण समुदायका भी उपसंहार होना चाहिए । * जैसे ' एक नारीकाय ' अभिन्न होनेपर भी गुणभेद और भावनाभेदसे भिन्न भिन्नरूपसे
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अधि ० ३३ सू ० ५८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७३ ९ भेद एवावगम्यते, न यजतीत्यादिवदर्थभेदः सर्वेषामेवैषां मनोवृत्त्यर्थत्वाभेदात् अर्थान्त-रासंभवाच्च । तत्कथं शब्दभेदाद्विद्याभेद इति? नैष दोषः, मनोवृत्त्यर्थत्वाभेदेऽप्यनुब-न्धभेदाद्वे द्यभेदे सति विद्याभेदोपपत्तेः । एकस्यापीश्वरस्योपास्यस्य प्रतिप्रकरणं व्यावृत्ता गुणाः शिष्यन्ते । तथैकस्यापि प्राणस्य तत्र तत्रोपास्यस्याभेदेऽप्यन्यादृग्गुणोऽन्यत्रोपा सितव्योऽन्याहग्गुणश्चान्य त्रेत्येवमनुबन्धभेदाद्वेद्यभेदे सति विद्याभेदो विज्ञायते । * न चात्रैको विद्याविधिरितरे गुणविधय इति शक्यं वक्तुम्, विनिगमनायां हेत्वभावात्, अने-कत्वाच्च प्रतिप्रकरणं गुणानां प्राप्तविद्यानुवादेन विधानानुपपत्तेः । न चास्मिन्पक्षे समा-नाः सन्तः सत्यकामादयो गुणा असकृच्छ्रावयितव्याः । प्रतिप्रकरणं चेदंका मेनेदमुपासि-तव्यमिदंकामेन चेदमिति नैराकाङ्क्षयावगमान्नैकवाक्यतापत्तिः । न चात्र वैश्वानरवि-द्यायामिव समस्तचोदनापरास्ति यद्वलेन प्रतिप्रकरणवर्तीन्यवयवोपासनानि भूत्वैकवा-क्यतामियुः । वेद्यैकत्वनिमित्ते च विद्यैकत्वे सर्वत्र निरङ्कुशे प्रतिज्ञायमाने समस्तगुणो-पसंहारोऽशक्यः प्रतिज्ञायेत । तस्मात्सुष्टृच्यते- नाना शब्दादिभेदादिति । स्थिते चैत-स्मिन्नधिकरणे सर्ववेदान्तप्रत्ययमित्यादि द्रष्टव्यम् ॥ ५८ ॥
समान अर्थं भेद तो अवगत नहीं होता । क्योंकि ' वेद, उपासीत ' इन सभी शब्दों का मनोवृत्तिरूप एक ही अर्थ है और अन्य ( ज्ञान ) अर्थका असम्भव है, तो शब्दभेदसे विद्याभेद किस प्रकार होगा? यह दोष नहीं है, क्योंकि मनोवृत्तिरूप अर्थका अभेद होनेपर भी अनुबन्धके भेदसे वेद्यका भेद होने पर विद्याभेदकी उपपत्ति होती है । उपास्य ईश्वरके एक होनेपर भी उसके गुण प्रत्येक प्रकरण में व्यावृत्त ( भिन्न भिन्न ) कहे जाते हैं । उसीप्रकार एक ही प्राण तत् तत् स्थलमें उपास्यरूपसे अभिन्न होनेपर भी एक प्रकारके गुणोंसे युक्त एक स्थलमें उपासनीय है और अन्य प्रकारके गुणोंसे युक्त . अन्य स्थलमें उपासनीय है, इसप्रकार अनुबन्ध भेदसे वेद्यका भेद होनेपर विद्याका भेद ज्ञात होता है । और यहाँ एक विद्या विधि है और अन्य गुणविधियाँ हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इस-प्रकारकी व्यवस्थामें कोई हेतु नहीं है । प्रत्येक प्रकरणमें गुणोंके अनेक होनेसे प्राप्त विद्या के अनुवादसे गुणोंके विधानकी उपपत्ति नहीं है । इस पक्षमें समान होते हुए सत्यकाम आदि गुणोंका अनेक वार श्रवण नहीं होना चाहिए । प्रत्येक प्रकरण में इस फलकी कामनावालेसे इस उपास्यको उपासना करनी चाहिए और इस फलकी कामनावालेसे इसकी । इसप्रकार इन उपासनाओंमें नैराकांक्ष्य अवगत होनेसे एक वाक्यता नहीं हो सकती । जैसे वैश्वानरविद्या में अन्य समस्त उपासना विधि है, वैसे यहाँ प्रकृत शाण्डिल्य आदि उपासनाओं में अन्य समस्त उपासना विधि नहीं है, जिसके बलसे प्रत्येक प्रकरणवर्ती अवयव उपासनाएँ होकर एकवाक्यताको प्राप्त करें । वेद्यके एकत्व निमित्त से विद्याके एक होनेपर सर्वत्र सब विद्याओंमें यदि विना अंकुशके प्रतिज्ञा की जाय तो समस्त गुणोंका उपसंहार जो अशक्य है उसकी प्रतिज्ञा हो जायगी । इसलिए ' नानाशब्दादिभेदात् ' इसप्रकार सूत्रकार ने ठीक ही कहा है । इस अधिकरणके स्थित होनेपर ' सर्ववेदान्तप्रत्ययम् ' इत्यादि व्यधिकरण देखना चाहिए ॥ ५८ ॥ सत्यानन्दी - दीपिका
प्राप्त होती है, वैसे ' सत्यकामः सत्यसंकल्पः ' आदि गुणभेदसे और भावनाके अधीन उपासना होनेसे उपास्यके एक होनेपर भी उपासना भिन्न भिन्न है । * यह जो कहा गया है कि श्रुतिका भेद अन्य गुष्पोंके विधानके लिए है । इसका समाधान ' न चात्रैको ' इत्यादिसे कहते हैं । किश्व फलके भेदसे ' वेद, उपासीत ' इत्यादि विधिके भेदसे और सब गुणोंका ध्यान न हो सकने के कारण विद्या भिन्न भिन्न है । जैसे दहरका ध्यान करनेवालोंका सब लोकों में यथेष्ट गमन है और वैश्वानर उपासक सर्वत्र अन्न मक्षक होते हैं, इसप्रकार फलका भेद है ।
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७४० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ ( ३४ विकल्पाधिकरणम् । सू ० ५ ९ ) विकल्पोऽविशिष्टफलत्वात् ॥ ५ ९ ॥ पदच्छेद - विकल्पः, मविशिष्टफलत्वात् । सूत्रार्थ - ( विकल्पः ) सगुण विद्याओंका विकल्प ही युक्त है, ( अविशिष्टफलत्वात् ) क्योंकि वेद्य वस्तुका साक्षात्काररूप समान फल है । * स्थिते विद्याभेदे विचार्यते - किमासामिच्छया समुच्चयो विकल्पो वा स्यात्, अथवा विकल्प एव नियमेनेति? तत्र स्थितत्वात्तावद्विद्याभेदस्य न समुच्चयनियमे किंचित्कारणमस्ति । ननु भिन्नानामप्यग्निहोत्रदर्शपूर्णमासादीनां समुच्चयनियमो दृश्य-ते । नैष दोषः । नित्यताश्रुतिर्हि तत्र कारणं नैवं विद्यानां काचिन्नित्यताश्रुतिरस्ति । तस्मान्न समुच्चयनियमः । नापि विकल्पनियमः । विद्यान्तराधिकृतस्य विद्यान्तराप्रति-षेधात् । पारिशेष्याद्याथाकाम्य मापद्यते । नन्वविशिष्टफलत्वादासां विकल्पो न्याय्यः । तथाहि - ' मनोमयः प्राणशरीरः ' ( छा ० ३ | १४ | २ ) ' कं ब्रह्म खं ब्रह्म ' ( छा ० ४।१०।५ ) ' सत्यकामः सत्यसंकल्पः ’ ( छा ०८।१।५ ) इत्येवमाद्यास्तुल्यवदीश्वर प्राप्तिफला लक्ष्यन्ते । नैष दोषः, समान-फलेष्वपि स्वर्गादिसाधनेषु कर्मसु याथाकाम्यदर्शनात् । तस्माद्याथाकाम्यप्राप्तावुच्यते-विकल्प एवासां भवितुमर्हति, न समुच्चयः । कस्मात्? अविशिष्टफलत्वात् । अवशिष्टं ह्यासां इसप्रकार विद्याभेदके सिद्ध होनेपर यह विचार किया जाता है कि क्या इन विद्याओंका उपासककी इच्छासे समुच्चय है अथवा विकल्प है वा नियमसे विकल्प ही है । पूर्वपक्षी - उसमें विद्याभेदके सिद्ध होनेसे समुच्चयके नियममें कोई कारण नहीं है । परन्तु अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास आदि इन भिन्नोंका मी समुच्चयनियम देखा जाता है? यह दोष नहीं है, क्योंकि अग्निहोत्र आदि नित्यत्व श्रुति उनके समुच्चय नियममें कारण है, किन्तु विद्याओं में ऐसी कोई नित्यत्वश्रुति नहीं है, इसलिए उनमें समुच्चयका नियम नहीं है, और इसीप्रकार विकल्पका नियम भी नहीं है, क्योंकि एक विद्यामें अधिकृतका अन्य विद्या में प्रतिषेध नहीं है । परिशेषसे स्वेच्छा पक्ष प्राप्त होता है । परन्तु इन विद्याओं का समान फल होनेसे विकल्प उचित है । क्योंकि ' मनोमयः प्राणशरीरः ' ' कं ब्रह्म खं ब्रह्म ' ‘ सत्यकामः सत्यसंकल्पः ' इत्यादि श्रुति समानरूपसे ईश्वर प्राप्तिरूप फलवाली देखी जाती है । यह दोष नहीं है, क्योंकि समान फलवाले स्वर्ग आदिके साधनभूत कर्मोंमें भी यथाकाम्य देखने में आता है । सिद्धान्ती - इसलिए यथाकाम्य पक्षके प्राप्त होनेपर कहते हैं- इन उपासनाओं का विकल्प ही होना चाहिए, समुच्चय नहीं, किससे? इससे कि अविशिष्ट फल है । इन उपासनाओं का उपास्य विषयक साक्षात्कार करना ही समान ( एक फल ) है । एक ही उपासना से उपास्य ईश्वर आदि विषयक साक्षात्कार होनेपर सत्यानन्दी - दीपिका इसलिए शब्द आदि भेदसे विद्या नाना है । विद्यानानात्व अधिकरण पादके आरम्भमें ही संगत है, यहाँ तो प्रासङ्गिक है ॥ ५८ ॥
* इस अधिकरणमें विद्याओंके अनुष्ठानका प्रकार निरूपण किया जाता है । अहंग्रह, तटस्थ और अङ्गाश्रित भेदसे उपासनाएं तीन प्रकारकी हैं । उनमेंसे अहंग्रहोपासनाका यहाँ विचार किया जाता है । अहंग्रहोपासना ( उपास्यस्वरूपका स्वाभिन्नरूपसे चिन्तन ) में इच्छानुसार और विकल्प दोनोंका विद्या नानात्वके साथ साम्य होनेसे ' किम् ' इत्यादिसे संशय कहते हैं । पूर्वपक्ष में स्वेच्छासे अनुष्ठान है, ऐसा अनियम है और सिद्धान्त में विकल्पसे अनुष्ठान है, ऐसा नियम है । * जैसे पुरोडाशरूप एक फल होनेसे व्रीहि और यवका विकल्प है, वैसे ही इन विद्याओं में विकल्प युक्त है । ईश्वर के साक्षात्कार के अनन्तर फलभेद होनेपर भी इन अहं ग्रहोपासनाओंका
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अधि ० ३५ सू ० ६० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७४१ फलमुपास्यविषयसाक्षात्करणम् । एकेन चोपासनेन साक्षात्कृते उपास्ये विषय ईश्वरादौ द्वितीयमनर्थकम् । अपि चासंभव एव साक्षात्करणस्य समुच्चयपक्षे, चित्तविक्षेपहेतु-त्वात् । साक्षात्करणसाध्यं च विद्याफलं दर्शयन्ति श्रुतयः - ' यस्य स्यादद्धा न विचिकित्सा-स्ति ' ( छा ० ३।१४।४ ) इति, ' देवो भूत्वा देवानप्येति ' ( बृह ० ४।१।२ ) ' सदा तद्भावभावितः ' ( म ० गी ० ८।६ ) इत्येवमाद्याः । तस्मादविशिष्टफलानां विद्यानामन्यतमामादाय तत्परः स्याद्यावदुपास्यविषयसाक्षात्करणेन तत्फलं प्राप्तमिति ॥ ५ ९ ॥ ( ३५ काम्याधिकरणम् । सू ० ६० ) काम्यास्तु यथाकामं समुच्चीयेरन्न वा पूर्वहेत्वभावात् ॥ ६० ॥
पदच्छेद – काम्याः, तु, यथाकामम्, समुच्चीयेरन्, न, वा, पूर्वहेत्वभावात् । सूत्रार्थ - ( काम्यास्तु ) काम्यविद्याओंका तो ( यथाकामम् ) यथेच्छ ( समुच्चीयेरन्नवा ) समुच्चय करे अथवा न करे, ( पूर्वहेत्वाभावात् ) क्योंकि समान फलरूप विकल्पके प्रयोजक हेतुका अभाव है । * ‘ अविशिष्फलत्वात् ' इत्यस्य प्रत्युदाहरणम् । यासु पुनः काम्यासु विद्यासु स य एत-मेवं वायुं दिशां वत्सं वेद न पुत्ररोदं रोदिति ' ( छा ०३ | १५ | २ ) स यो नाम ब्रह्मेत्युपास्ते यावन्नाम्नो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति ' ( छा ० | १ | ५ ) इति चैवमाद्यासु क्रियावददृष्टेनात्मना -त्मीयं फलं साधयन्तीषु साक्षात्करणापेक्षा नास्ति । ता यथाकामं समुच्चीयेरन्नवा समु-च्वीयेरन्, पूर्वहेत्वभावात् । पूर्वस्याविशिष्टफलत्वादित्यस्य विकल्पहेतोरभावात् ॥ ६० ॥
अन्य उपासनाएँ प्रयोजन रहित हैं । समुच्चय पक्षमें तो साक्षात्कारका असंभव ही है, क्योंकि समुच्चय चित्त - विक्षेपका हेतु है | और ' यस्य स्यादद्धा ० ' ( मैं मरकर इसीको प्राप्त होऊँगा, ऐसा जिसका निश्चय है, इस विषय में कोई सन्देह नहीं है, उसे ईश्वरभावकी प्राप्ति होती है ) और ' देवो भूत्वा ० ' ( वह इस लोकमें देव होकर शरीर पातानन्वर देवोंको प्राप्त होता है ) इत्यादि श्रुतियाँ और ' सदा तद्भावभावितः ० ' ( सदा उसके भावसे भावित होकर उस उसको प्राप्त होता है ) इत्यादि स्मृतियाँ मी साक्षात्कार द्वारा साध्य विद्या फल दिखलाती हैं । इससे समान फलवाली उन विद्याओंमेंसे एकको लेकर तत्पर हो जब तक उपास्य विषयक साक्षात्कारसे उसका फल प्राप्त हो ॥ ५ ९ ॥ ' समान फल होनेसे ' इस पूर्वोक्त हेतुका यह प्रत्युदाहरण है । परन्तु ' स य एतमेव ० ' ( वह जो ' कोई पुत्रका दीर्घ जीवन चाहनेवाला इस प्रकार इस वायुको गोरूपसे कल्पित दिशाओंके वत्सरूपसे जानता है पुत्र निमित्तसे रोदन नहीं करता - पुत्र मरण जन्य रोदन नहीं करता ) ' स यो नाम ब्रह्म ० ' ( वह जो कोई ' नाम ब्रह्म है ' ऐसी उपासना करता है उसकी जहाँ तक नामको गति होती है वहाँ तक यथेच्छ गति हो जाती है ) इत्यादि जिन काम्य विद्याओं में क्रिया - कर्मके समान अदृष्टरूपसे अपना तत्-तत् फल सिद्ध करती हुई साक्षात्कारको अपेक्षा नहीं है I । वे यथेच्छ समुच्चित होनी चाहिए अथवा समुच्चित नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यहाँ पूर्वं हेतुका अभाव है । ' अविशिष्ट फल होनेसे ' इस पूर्व विकल्पके हेतुका अभाव है ॥ ६० ॥
सत्यानन्दी - दीपिका साक्षात्काररूप फल समान है । किश्व सब उपासनाओंका एक साथ होना असंभव है । अतः यहाँ विकल्प ही युक्त है ॥ ५ ९ ॥ * गत अधिकरणमें अहं ग्रहोपासनाका विचार किया गया है । अब इस व्यधिकरणमें तटस्थ-प्रतीकोपासना ' मनो ब्रह्मेत्युपासीत ' आदिके विषयमें विचार किया जाता है । पूर्व अधिकरणमें जैसे अहं ग्रहोपासनाएं विकल्पसे अनुष्ठेय कही गई हैं, वैसे ही प्रतीकोपासनाएँ भी विकल्पसे ही मनुष्ठेय
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७४२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ ( ३६ यथाश्रयभावाधिकरणम् । सू ० ६१-६६ ) अङ्गषु यथाश्रयभावः ॥ ६१ ॥
पदच्छेद - अङ्गेषु यथाश्रयमावः । सूत्रार्थ - ( अङ्गेषु ) कर्माङ्गोद्गीथ आदि आश्रित उपासनाओं में ( यथाश्रयभावः ) समुच्चयसे अनुष्ठानका नियम है, जैसे क्रतुओंमें आश्रित अङ्गों अनुष्ठानका नियम है । * कर्माङ्गेषूद्गीथादिषु ये आश्रिताः प्रत्यया वेदत्रयविहिताः किं ते समुचीयेर-किंवा यथाकामं स्युरिति संशये यथाश्रयभाव इत्याह । यथैवैषामाश्रयाः स्तोत्रादयः संभूय भवन्त्येवं प्रत्यया अपि आश्रयतन्त्रत्वात्प्रत्ययानाम् ॥ ६१ ॥
शिष्टश्व ॥ ६२ ॥
पदच्छेद - शिष्टेः, च । सूत्रार्थ - विधान होनेसे भी अङ्गके समान समुच्चय है । * यथा वाश्रयाः स्तोत्रादयस्त्रिषु शिष्यन्त एवमाश्रिता अपि प्रत्ययाः । नोपदेश-कृतोऽपि कश्चिद्विशेषोऽङ्गानां तदाश्रयाणां च प्रत्ययानामित्यर्थः ॥ ६२ ॥
समाहारात् ॥ ६३ ॥
सूत्रार्थ - अन्य वेदोक्त प्रणवका अन्यत्र समाहार होनेसे भी अङ्गाश्रित उपासनाओंका समुच्चय है । * होतृषदनाद्धैवापि दुरुद्गीत ( थ ) मनु समाहरति ' ( छा ० १/५/५ ) इति च प्रणवोद्गीथैकत्व-विज्ञानमाहात्म्यादुद्गाता स्वकर्मण्युत्पन्नं क्षतं हौत्रात्कर्मणः प्रतिसमादधातीति ब्रुवन्ये-कर्म अङ्गभूत उद्गीथ आदिके आश्रित तीनों वेदोंमें विहित जो उपासनाएँ हैं, क्या उसका समुच्चय होना चाहिए अथवा यथेच्छ अनुष्ठान होना चाहिए? ऐसा संशय होनेपर ' यथाश्रम मावः ' ऐसा कहते हैं । जैसे इन उपासनाओं के आश्रयभूत स्तोत्र आदि समुच्चयसे होते हैं, वैसे उपासनाएं भी समुच्चयसे होती हैं, क्योंकि उपासनाएँ आश्रयके अधीन हैं ॥ ६१ ॥
जैसे स्तोत्र आदि आश्रय तीनों वेदोंमें कहे जाते हैं, वैसे आश्रित उपासनाएँ भी कही जाती हैं । अङ्गों और उनके आश्रित उपासनाओं में उपदेशकृत कोई विशेष नहीं है, ऐसा अर्थ ॥ ६२ ॥
होतृषदनाद्वैवापि ० ' ( स्वर, व्यञ्जन आदिके प्रमादसे दुष्ट किये गये उद्गीथको भी उद्गाता सम्यक्कृत होताके शंसनसे निर्दोष करता है ) यह श्रुति वाक्य प्रणव और उद्गीथके एकत्व विज्ञानके माहात्म्यसे उद्गाता अपने कर्ममें उत्पन्न हुए दोषका होत्र कमंसे प्रतिसमाधान ( निर्दोष ) करता है, सत्यानन्दी - दीपिका होनी चाहिए, क्योंकि उनमें भी उपासनत्व समान है, इस प्रकार दृष्टान्त संगति से यह पूर्वपक्ष करते हैं । ‘ यथा कामाचारः ' ‘ पुत्रका समरण ' इत्यादि प्रत्येक प्रतीकोपासनाका भिन्न - भिन्न फल है, इसलिए यहाँ विकल्पका नियम नहीं है ॥ ६० ॥
* पूर्व अधिकरणमें जैसे प्रतीकोपासनाओंका स्वतन्त्र होनेसे यथेच्छ अनुष्ठान कहा गया है, वैसे यहाँ अङ्गाश्रित उपासनाओंका नहीं है, क्योंकि वे बङ्गोंके अधीन हैं । इस प्रकार प्रत्युदाहरण संगति से -- ' अङ्ग ेषु ' इत्यादिसे पूर्वपक्ष करते हैं ॥ ६१ ॥
# क्रतुकै अङ्ग और उनके बाश्रित उपासनाएँ तीनों वेदोंमें समान भावसे विहित हैं, अतः बङ्गोंके समान उपासनाओंका भी समुच्चयसे अनुष्ठान है । परन्तु गोदोहनके अनुष्ठानका नियम नहीं है, क्योंकि वह तो चमसके स्थानमें विहित है ॥ ६२ ॥
* समाहरणं - समताकरणं - दोषका संधान करना समाहार है । इस समाहार लिङ्गसे भी उपा-
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अधि ० ३६ सू ० ६४-६५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७४३ दान्तरोदितस्य प्रत्ययस्य वेदान्तरोदितपदार्थ संबन्ध सामान्यात्सर्ववेदोदितप्रत्ययोपसंहारं सूचयतीति लिङ्गदर्शनम् ॥ ६३ ॥
गुणसाधारण्यश्रुतेश्व ॥ ६४ ॥
पदच्छेद- गुणसाधारण्यश्रुतेः च । सूत्रार्थ - ' तेनेयं त्रयी विद्या वर्तते ' इत्यादि उद्गीथ उपासना में गुणभूत ओंकार तीनों वेदोंमें साधारणरूपसे सुना जाता है । * विद्यागुणं च विद्याश्रयं सन्तमोंकारं वेदत्रयसाधारणं श्रावयति - ' तेनेयं त्रयी विद्या वर्तते ओमित्याश्रावयत्योमिति शंसत्योमित्युद्गायति ' ( छा ० १ | १1 ९ ) इचि च । ततश्चा-श्रयसाधारण्यादाश्रितसाधारण्यमिति लिङ्गदर्शनमेव । अथवा गुणसाधारण्यश्रुतेश्चेति । यदीमे कर्मगुणा उद्गीथादयः सर्वे सर्वप्रयोगसाधारणा न स्युर्न स्यात्ततस्तदाश्रयाणां प्रत्ययानां सहभावः । ते तूद्गीथादयः सर्वाङ्गग्राहिणा प्रयोगवचनेन सर्वे सर्वप्रयोग-साधारणाः श्राव्यन्ते । ततश्चाश्रय सहभावात्प्रत्यय सहभाव इति ॥ ६४ ॥
नवा तत्सहभावाश्रुतेः ॥ ६५ ॥
पदच्छेद -- न, वा, तत्सह मावाश्रुतेः । सूत्रार्थ - ( न वा ) अङ्गाश्रित उपासनाओंका समुच्चय नहीं है, ( तत्सहभावाश्रुतेः ) क्योंकि ' ग्रहं गृहीत्वा ' इसप्रकार जैसे अङ्गों के सहभावकी श्रुति है, वैसे अङ्गाश्रित उपासनाओंके सहभावकी ति नहीं है । ऐसा कहता हुआ अन्य वेदमें कथित - उपासनाका अन्य वेदमें उक्त पदार्थके साथ समान सम्बन्ध होनेसे सर्वं वेदोक्त उपासनाका उपसंहार सूचित करता है, ऐसा लिङ्गदर्शन है ॥ ६३ ॥
' तेनेयं त्रयी ० ' ( उस अक्षरसे ही यह ऋग्वेद आदिरूप त्रयीविद्या प्रवृत्त होती है | ' ॐ ' ऐसा कहकर ही अध्वर्युं श्रवण करता है ' ॐ ' ऐसा कहकर ही होता शंसन करता है तथा ' ॐ ' ऐसा कहकर ही उद्गाता उद्गान करता है ) यह श्रुति विद्याके गुण - विद्या आश्रयभूत ' ॐ ' कारको तोनों वेदों में साधारण- समानरूपसे श्रवण कराती है । उससे आश्रय ' ॐ ' कारके साधारण होनेसे उसके आश्रित उपासनाएँ मी साधारण हैं, यह लिङ्गदर्शन ही है । अथवा ' गुणसाधारण्यश्रुतेः ' यदि उद्गीथ यदि ये सब कर्मगुण सब प्रयोगों में साधारण - समान न होते, तो उनके आश्रित उपासनाओंक सर्वत्र सहभाव न होता । परन्तु वे सब उद्गीथ आदि सर्वाङ्गग्राही प्रयोगवचनसे सब प्रयोगों में समानरूपसे श्रवण कराये जाते हैं । उससे आश्रयके सहभावसे आश्रित उपासनाओंका सहभाव है ॥ ६४ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका सनाओंका समुच्चय प्रतीत होता है । जैसे ' जो ऋग्वेदियोंका प्रणव है वह सामवेदियोंका उद्गीथ है ' ( छा ० १/५/५ ) इस प्रकार छान्दोग्यमें प्रणव और उद्गीथकी एक ध्यान विधि है । उसका ' होतृषद -नात् ' इत्यादि फलार्थवाद है । सामवेदस्थ उद्गीथ ध्यानका ऋग्वेदोक्त प्रणवके साथ सम्बन्ध देखा जाता है वही सर्व वेदविहित उपासनाओंके समुच्चय में लिङ्ग है । इस प्रकार दोनों वेदों में प्रणव और उद्गीथके ऐक्य ज्ञानसे सर्ववेदस्थ उपासनाओंका सर्वत्र समुच्चय होना चाहिए ॥ ६३ ॥
* उपास्य ओंकारके साधारण होनेसे उसके बाश्रित उपासनाओंका समुच्चयसे अनुष्ठान प्रतीत होता है । इसमें ' गुण ' इत्यादिसे अन्य हेतु कहते हैं । अन्वयमुखसे उक्त अर्थका ' अथवा ' इत्यादिसे व्यतिरेकमुखसे व्याख्यान करते हैं । इसप्रकार अन्वयव्यतिरेकसे आश्रयके समुच्चयसे आश्रित उपा-सनाओं का भी समुच्चय है ॥ ६४ ॥
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७४४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ३ * न वेति पक्षव्यावर्तनम् । न यथाश्रयभाव आश्रितानामुपासनानां भवितुमर्हति । कुतः? तत्सहभावाश्रुतेः । यथा हि त्रिवेद विहितानामङ्गानां स्तोत्रादीनां सहभावः श्रूयते-' ग्रहं वा गृहीत्वा चमसं वोन्नीय स्तोत्रमुपाकरोति स्तोत्रमनुशंसति प्रस्तोतः साम गाय होतरेतद्यज ' इत्यादिना । नैवमुपासनानां सहभावश्रुतिरस्ति । ननु प्रयोगवचन एषां सहभावं प्रापयेत् । नेतिः ब्रूमः, पुरुषार्थत्वादुपासनानाम् । प्रयोगवचनो हि क्रत्वर्थानामुद्गीथादीनां सह-भावं प्रापयेत् । उद्गीथाद्युपासनानि क्रत्वर्थाश्रयाण्यपि गोदोहनादिवत्पुरुषार्थानीत्यवो-चाम ' पृथग्ध्यप्रतिबन्ध फलम् ' ( ब्रह्मसूत्र ३ | ३ | ४२ ) इत्यत्र । अयमेव चोपदेशाश्रयो विशे-षोऽङ्गानां तदालम्बनानां चोपासनानां यदेकेषां ऋत्वर्थत्वमेकेषां पुरुषार्थत्वमिति । परं च लिङ्गद्वयमकारणसुपासन सहभावस्य श्रुतिन्यायाभावात् । नच प्रतिप्रयोगमाश्रयका-स्योपसंहारादाश्रितानामपि तथात्वं विज्ञातुं शक्यम् । अतत्प्रयुक्तत्वादुपासनानाम् । आश्रयतन्त्राण्यपि ह्युपासनानि काममाश्रयाभावे मा भूवन्न त्वाश्रय सहभावेन सहभाव-नियममर्हन्ति, तत्सहभावाश्रुतेरेव । तस्माद्यथाकाममेवोपासनान्यनुष्टीयेरन् ॥ ६५ ॥
' न वा ' ये शब्द पूर्वपक्षकी व्यावृत्ति करते हैं । आश्रित उपासनाओं का आश्रयमावके अनुसार समुच्चय नहीं हो सकता, किससे? उनके सहभावकी श्रुति न होनेसे । जैसे तीनों वेदोंमें विहित स्तोत्र आदि अङ्गका सहभाव ' ग्रहं गृहीत्वा ० ' ( ग्रह पात्रको ग्रहण कर अथवा चमस पात्रको सोमरससे भरकर वह स्तोत्रका आरम्भ करता है, स्तोत्रका अनुशंसन करता है, हे प्रस्तोता! तुम सामका गायन करो, हे होता! तुम इसका याग करो ) इत्यादि श्रुति कहती है, वैसे उपासनाओंके सहभावकी श्रुति नहीं है । परन्तु प्रयोग वचन - विधि ही इनका सहभाव प्राप्त कराएगा, नहीं, ऐसा हम कहते हैं-क्योंकि उपासनाएँ पुरुषार्थ हैं । प्रयोग विधि क्रत्वर्थं उद्गीथ आदिका सहभाव प्राप्त करावे, परन्तु क्रतु अर्थं आश्रय उद्गीथ आदि उपासनाएँ गोदोहन आदिके समान पुरुषार्थं हैं, ऐसा ' पृथग्ध्यप्रतिबन्धः फलम् ' इस सूत्र में हम कह चुके हैं । अङ्ग और उनके आश्रित उपासनाओंमें उपदेशके आश्रयपर यही विशेष है कि इनमें एक क्रत्वर्थ हैं और दूसरे पुरुषार्थं हैं । और दूसरे दो लिङ्ग उपासनाओंके सहभावमें कारण नहीं है, क्योंकि श्रुति और न्यायका अभाव है । और प्रत्येक प्रयोग में सम्पूर्ण आश्रयों-का उपसंहार होनेसे आश्रितों का भी वैसा ही उपसंहार हो ऐसा नहीं जाना जा सकता, क्योंकि उपासनाएँ उनसे प्रयुक्त नहीं हैं । आश्रयके अधीन होती हुई भी उपासनाएँ आश्रय के अभाव में मले ही न हों, परन्तु आश्रयोंके सहभाव होनेपर सहभावका नियम नहीं हो सकता, कारण कि उनके सहभाव की श्रुति नहीं है । इसलिए अपनी इच्छाके अनुसार ही उपासनाओंका अनुष्ठान करना चाहिए || ६५ || सत्यानन्दी - दीपिका # उपासनाओं का फल भिन्न भिन्न होने से उनके समुच्चय अनुष्ठान में कोई प्रमाण नहीं है, इस बातको सिद्धान्ती ' न वा ' इत्यादिसे कहते हैं । ' विमतोपास्तयः क्रतौ न समुच्चित्यानुष्ठेयाः, मिन्न फलत्वात् गोदोहनवत् ' ( उक्त उपासनाएँ क्रतुमें समुच्चयसे अनुष्ठेय नहीं है, क्योंकि मित्र फलवाली हैं, जैसे गोदोहन ) ' वीर्यं कामनावाला गोदोहनपात्रसे जलानयन करें यहाँ चमसके स्थानमें विशेष फलके लिए गोदोहनपात्रका ग्रहण किया जाता है । जैसे यहाँ गोदोहन पात्रका भिन्न फल है, अतः वह क्रतुमें ससुच्चयसे अनुष्ठेय नहीं है, वैसे उपासनाओं के विषय में भी समझना चाहिए । ' शिष्टेश्व ' ( ब्रह्मसूत्र ३ | ३ | ६२ ) इसमें उक्त अर्थका ' अयमेव ' इत्यादिसे निराकरण करते हैं । और ' समाहारात् ' ( ब्रह्मसूत्र ३।३।६३ ) ' गुणसाधारण्य श्रुतेश्च ' ( ब्रह्मसूत्र ३।३।६४ ) इन सूत्रोंमें उक्त दो लिङ्ग अन्य प्रमाणसे प्राप्त अर्थके द्योतक हैं । अर्थवादवाक्य में स्थित होनेके कारण स्वयं साधक नहीं हैं, इसप्रकार ' परञ्च ' इत्यादिसे कहते हैं । ' गुणसाधारण्यश्रुतेश्व ' इससूत्रकी दूसरी व्याख्या ' न च ' इत्यादिसे दूषित
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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७४५ दर्शनाच्च ॥ ६६ ॥
पदच्छेद - दर्शनात् च । सूत्रार्थ - ' एवं विद्ध वं ब्रह्मा ' इत्यादि श्रुति अङ्गाश्रित उपासनाओंका असहभाव दिखलाती है । * दर्शयति च श्रुतिरसहभावं प्रत्ययानाम् - ' एवंविद्ध वै ब्रह्मा यज्ञं यजमानं सर्वांश्चर्त्वि-जोऽमिरक्षति ' ( छा ० ४।१७।१० ) इति । सर्वप्रत्ययोपसंहारे हि सर्वे सर्वविद इति न विज्ञानवता ब्रह्मणा परिपाल्यत्वमितरेषां संकीर्त्यत । तस्माद्यथाकाममुपासनानां समु-च्चयो विकल्पो वेति ॥ ६६ ॥
इति श्रीमच्छङ्करभगवत्पूज्यपादकृतौ श्रीमच्छारीरकमीमांसामाध्ये तृतीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ३ ॥
तृतीयाध्याये चतुर्थः पादः [ अत्र निर्गुणविद्याया अन्तरङ्ग बहिरङ्गसाधनविचारः ] ( इस पादमें निर्गुणविद्याके अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग साधनोंका विचार है ) ( १ पुरुषार्थाधिकरणम् । सू ० १-१७ ) पुरुषार्थोऽतः शब्दादिति बादरायणः ॥ १ ॥
पदच्छेद - पुरुषार्थ:, अतः, शब्दात्, इति, बादरायणः । सूत्रार्थ - ( बादरायणः ) बादरायण आचार्यका मत है कि ( अतः ) इसी ओपनिषद् आत्म-ज्ञानसे ( पुरुषार्थः ) मोक्षरूप पुरुषार्थं सिद्ध होता है, ( शब्दात् ) क्योंकि ' तरति शोकमात्मवित् ' इस प्रकारकी श्रुति है । * अथेदानीमोपनिषदमात्मज्ञानं किमधिकारिद्वारेण कर्मण्येवानुप्रविशत्याहोस्वि-स्वतन्त्रमेव पुरुषार्थसाधनं भवतीति मीमांसमानः सिद्धान्तेनैव तावदुपक्रमते - पुरुषार्थो -' एवंविद्ध नै ब्रह्मा ० ' ( ऐसा जाननेवाला ब्रह्मा यज्ञ, यजमान और अन्य समस्त ऋत्विजोंकी मी सब ओरसे रक्षा करता है ) यह श्रुति उपासनाओंका असहभाव दिखलाती है । क्योंकि सब उपासनाओंका उपसंहार - समुच्चय होनेपर सब ( ऋत्विज आदि ) के सर्वज्ञ होनेके कारण विज्ञानवाले ब्रह्मासे अन्य परिपालय हैं, ऐसा न कहा जाता । इसलिए [ उपासकके लिए ] उपासनाओंका इच्छा-नुसार समुच्चय अथवा विकल्प है, यह सिद्ध होता है ॥६६ ॥
स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत शाङ्करभाष्य- माषानुवादके तृतीयाध्यायका तृतीय पाद समाप्त ॥ ३ ॥
इसके अनन्तर औपनिषद् आत्मज्ञान अधिकारी पुरुष द्वारा क्या कर्ममें ही अनुप्रवेश करता है अथवा स्वतन्त्र ही पुरुषार्थका साधन है? अब ऐसा विचार करते हुए सूत्रकार प्रथम सिद्धान्तसे ही सत्यानन्दी - दीपिका करते हैं । इसलिए पुरुषको अपने इच्छानुसार ही उपासनाओंका अनुष्ठान करना चाहिए ॥ ६५ ॥
* तीनों वेदोंके ज्ञाता ब्रह्मासे ऋत्विज आदिकी रक्षा होती है, इससे सब उपासनाओं का सह-भाव नहीं है । ऐसा ' दर्शनाच्च ' इत्यादिसे कहते हैं । ऋग्वेद आदि विहित बङ्गोंका लोप होनेपर व्या-हृति, होम, प्रायश्चित्त आदिको जानना ही ब्रह्माका ' एवं वित्त्व ' है ॥ ६६ ॥
स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत ' सत्यानन्दी - दीपिका ' के तृतीयाध्यायका तृतीय पाद समाप्त ॥३ ॥
* पूर्वपाद में पर और अपरविद्याके गुणों का उपसंहार कहकर स्वरूपका निश्चय किया गया है । अब इस पादमें कर्मानपेक्ष उन विद्याओं में पुरुषार्थ हेतुत्व निरूपण करनेके लिए उसके यज्ञादि बहि-
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७४६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ४ ऽ इति । अस्माद्वेदान्तविहितादात्मज्ञानात्स्वतन्त्रात्पुरुषार्थः सिद्धयतीति बादरायण आचार्यो मन्यते । कुत एतदवगम्यते? शब्दादित्याह । तथा हि - ' तरति शोकमात्मवित् ' ( छा ० ७।१।३ ), ' सयो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति ' ( मु ० ३ / २ / ९ ), ' ब्रह्मविदाप्नोति परम् ' ( तै ० २।१।१ ), ' आचार्यवान्पुरुषो वेद तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्ये ' ( छा ० ६।१४।२ ) इति, ‘ य आत्माऽपहतपाप्मा ' ( छा ० ८/७/१ ) इत्युपक्रम्य ' सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानाति ' ( छा ० ८1७1१ ) इति, ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' ( बृह ० ४ | ५ | ६ ) इत्युपक्रम्य ' एतावदरे खल्वमृतत्वम् ' ( बृह ४/५/१५ ) इत्येवंजातीयका श्रुतिः केवलाया विद्यायाः पुरुषार्थहेतुत्वं श्रावयति ॥ १ ॥
अथात्र प्रत्यवतिष्ठते-शेषत्वात्पुरुषार्थवादी यथाऽन्येष्विति जैमिनिः ॥ २ ॥
पदच्छेद - शेषत्वात् पुरुषार्थवाद:, यथा, अन्येषु इति, जैमिनिः । सूत्रार्थ - ( शेषत्वात् ) कर्तृरूपसे आत्मा कर्मका अङ्ग है, अतः उसका ज्ञान भी व्रीहि प्रोक्षण आदिके समान कर्मके अङ्गभूत आत्माद्वारा क्रतुका अङ्ग है । ( यथा ) जैसे ( अन्येषु ) अन्य द्रव्य संस्कार कर्मोंमें अपाप आदि फल श्रुति अर्थवाद है, वैसे ( पुरुषार्थवादः ) ज्ञानसे पुरुषार्थं श्रुति मी अर्थवाद है, ( जैमिनिः ) यह आचार्य जैमिनिका मत * कर्तृत्वेनात्मनः कर्मशेषत्वात्तद्विज्ञानमपि वीहिप्रोक्षणादिवद्विषयद्वारेण कर्म-' पुरुषार्थोऽतः ' इस प्रकारसे उपक्रम करते हैं । बादरायण आचार्य ऐसा मानते हैं कि इस वेदान्त विहित स्वतन्त्र आत्मज्ञानसे पुरुषार्थ सिद्ध होता है । यह कैसे अवगत हो? श्रुतिसे, ऐसा कहते हैं । जैसे कि ' तरति शोकमात्मवित् ' ( आत्मवेत्ता शोकका अतिक्रमण करता है ) ' स यो ह व ० ' ( जो कोई उस परब्रह्मको जान लेता है वह ब्रह्म ही हो जाता है ) ' ब्रह्मविदाप्नोति परम् ' ( ब्रह्मज्ञानी परब्रह्मको प्राप्त होता है ) ' आचार्यवान् ० ' ( आचार्यवान् पुरुष ही सत्को जानता है, उसके लिए मोक्ष होनेमें उतना ही विलम्ब है जब तक वह देह बंधन से मुक्त नहीं होता । उसके पश्चात् तो वह सत्सम्पन्न - ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ) ' य आत्मापहतपाप्मा ' ( जो आत्मा पप शून्य है ) ऐसा उपक्रम कर ' स सर्वांश्च ० ' ( जो उस आत्माको शास्त्र और गुरुके उपदेशानुसार अन्वेषणकर जान लेता है, वह सम्पूर्ण लोकों और समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लेता है ) ' आत्मा वा ० ' ( हे मैत्रेयी! आत्माका दर्शन करना चाहिए ) ऐसा आरम्भकर ' एतावदरे ० ' ( अरे मैत्रेयी! इतना ही अमृतत्त्वका उपदेश है ) इसप्रकारको श्रुतियाँ केवल विद्या ( आत्मज्ञान ) को पुरुषार्थहेतुत्व श्रवण कराती हैं ॥ १ ॥
अब उक्त सिद्धान्तपर पूर्वपक्षी शङ्का करते हैं-सत्यानन्दी - दीपिका रङ्ग और शम आदि अन्तरङ्ग साघनोंका निरूपण किया जाता है । इस प्रकार एक विद्याविषयत्वसंगतिसे यह चतुर्थपाद आरम्भ किया जाता है । गत पादके अन्तिम अधिकरणमें कर्मके अङ्गभूत विद्याका विचार किया गया है । अब उसके प्रसंगसे ब्रह्मज्ञान कर्मका अङ्ग है, ऐसी बाशङ्का कर उसका समाधान करते हैं । इसप्रकार प्रसंग संगति से इस अधिकरणको कहते हैं । पूर्वपक्षमें ज्ञान और कर्मका अङ्गाङ्गिभावसे समुच्चय है, सिद्धान्त में केवल ब्रह्मात्मैक्यज्ञानसे मोक्ष है । ' य आत्मापहतपाप्मा ' इसप्रकार प्रजापतिसे उपदिष्ट ब्रह्म-विद्या में सगुणविद्या के फलरूप समस्त लोक आदिकी प्राप्तिका कथन इसलिए किया गया है कि मोक्षानन्दन में इन सबसे प्राप्त होनेवाले आनन्दका अन्तर्भाव है । इसलिए किसी प्रकार की शङ्काका अवसर नहीं है ॥१ ॥