श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 781–790

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 781–790

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अधि ० १ सू ० २ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७४७ संबन्ध्येवेत्यतस्तस्मिन्नवगतप्रयोजने आत्मज्ञाने या फलश्रुतिः साऽर्थवाद इति जैमिनि-राचार्यो मन्यते, यथाऽन्येषु द्रव्यसंस्कारकर्मसु ' यस्य पर्णमयी जुहूर्भवति न स पाप श्लोक शृणोति । यदङ्क्ते चक्षुरेष भ्रातृव्यस्य वृङ्क्ते । यत्प्रयाजानुयाजा इज्यन्ते वर्मं वा एतद्यज्ञस्य क्रियते जर्म यजमानस्य भ्रातृव्याभिभूत्यै ' इत्येवंजातीयका फलश्रुतिरर्थवादः, तद्वत् । कथं पुनरस्या-नारभ्यांघीतस्यात्मज्ञानस्य प्रकरणादीनामन्यतमेनापि हेतुना विना क्रतुप्रवेश आशङ्कय-ते? कर्तृद्वारेण वाक्यात्तद्विज्ञानस्य ऋतुसंबन्ध इति चेत् न, वाक्याद्विनियोगानुपपत्तेः । अस्यभिचारिणा हि केन चिद्वारेणानारभ्याधीतानामपि वाक्यनिमित्तः क्रतुसंबन्धोऽव-कल्पते । कर्ता तु व्यभिचारि द्वारम्, लौकिकवैदिककर्मसाधारण्यात् । तस्मान्न तद्वा-रेणात्मज्ञानस्य कतुसंबन्धसिद्धिरिति न व्यतिरेकविज्ञानस्य वैदिकेभ्यः कर्मभ्योऽन्य-त्रानुपयोगात् । नहि देहव्यतिरिक्तात्मज्ञानं लौकिकेषु कर्मसूपयुज्यते, सर्वथा दृष्टार्थप्रवृ युपपत्तेः । वैदिकेषु तु देहपातोत्तरकालफलेषु देहव्यतिरिक्तात्मज्ञानमन्तरेण प्रवृत्तिर्नो-पपद्यत इत्युपयुज्यते व्यतिरेकविज्ञानम् । नन्वपहतपाप्मत्वादिविशेषणादसंसार्यात्म-कर्तृरूपसे आत्मा कर्मका अङ्ग है, अतः उसका ज्ञान मी व्रीहि प्रोक्षण आदिके समान विषय-आत्माद्वारा कर्म सम्बन्धी ही है, इससे उस कर्मका प्रयोजन अवगत होनेपर आत्मज्ञानमें जो फल श्रुति है वह अर्थवाद है, ऐसा जैमिनि बाचायं मानते हैं । जैसे अन्य द्रव्य संस्कार कर्मों में ' यस्य पर्ण-मयी ० ' ( जिसका पर्णमयी जुहू होता है वह पाप वचनका श्रवण नहीं करता वह जो अपने नेत्रोंमें अञ्जन लगाता है, उससे शत्रुके नेत्रोंका नाश करता है, जो प्रयाज और अनुयाज किये जाते हैं, वे यज्ञ कवच किये जाते हैं, शत्रुके अभिभव के लिए वे यजमानके कवच होते हैं ) इस प्रकारकी फल-श्रुति अर्थवाद है, वैसे ही आत्मज्ञानमें फल श्रुति अर्थवाद है । परन्तु यज्ञके प्रकरण में अनधीत आत्म-ज्ञानके प्रकरण आदिमें से किसी एक हेतुके विना भी क्रतु प्रवेशकी आशङ्का किस प्रकार की जाती है? यदि कहो कि कर्ताद्वारा वाक्यसे उसके विज्ञानका क्रतुके साथ सम्बन्ध है, तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि वाक्यसे विनियोग नहीं हो सकता । किसी एक अव्यभिचारी - नित्यसम्बद्ध क्रतुके द्वारसे अप्रकरणमें पठितों का भी वाक्य निमित्तक क्रतु सम्बन्ध हो सकता है । परन्तु कर्ता तो लौकिक और वैदिक कर्मोंमें साधारण होने से व्यभिचारी द्वार है, इसलिए उसके द्वारा आत्मज्ञानका क्रतुके साथ सम्बन्ध सिद्ध नहीं होता । यह ठीक नहीं है, क्योंकि देहसे अतिरिक्त आत्मा है इस ज्ञानका वैदिक कर्म से अन्यत्र उपयोग नहीं है । देहसे अतिरिक्त आत्मज्ञानका लौकिक कर्मोंमें उपयोग नहीं होता, क्योंकि सर्वथा देहसे व्यति-रिक्त आत्मज्ञान हो चाहे न हो तो भी प्रत्यक्ष प्रयोजनवाले कर्मों में प्रवृत्ति हो सकती है । परन्तु देह-पातके अनन्तर फलदेनेवाले वैदिक कर्मोंमें देह व्यतिरिक्त आत्मज्ञानके विना प्रवृत्ति उपपन्न नहीं होती । सत्यानन्दी - दीपिका * सूत्रमें अर्थवाद पदकी आवृत्ति करनी चाहिए अर्थात् ज्ञानसे पुरुषार्थंवाद अर्थवाद है । ' ब्रह्मविद्ब्रह्मव भवति ' इत्यादि मोक्ष प्रतिपादक श्रुतियाँ अर्थवादमात्र हैं । और कर्मरूप अङ्गीके फलका ज्ञान होनेचे अङ्गभूत आत्माका प्रयोजन भी ज्ञात है, अतः आत्माके आश्रय उसके संस्कारभूत ज्ञानमें फलश्रुति अर्थवाद है । जैसे ' पर्णमयी ' ( पलाश ) यह द्रव्य है, यजमानका अञ्जन संस्कार है और प्रयाज आदि कर्म हैं, इनमें क्रमशः फलश्रुति अर्थवाद है । जैसे प्रोक्षण आदिले संस्कृत व्रीहि आदि कर्मके अङ्ग हैं, वैसे उपनिषद् प्रतिपादित आत्मज्ञानसे संस्कृत कर्ता मैं पारलौकिक फलोपलभोगके योग्य हूँ, ऐसा विद्वान्, श्रद्धावान् क्रतुका अङ्ग है, अतः कर्ताद्वारा आत्मज्ञान भी कर्मका अङ्ग है । सिं ० ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' इत्यादि वाक्यमात्र से आत्मज्ञानका क्रतुके साथ सम्बन्ध अनुपपन्न है, क्योंकि ' यस्य पर्णमयी ' इस वाक्यके पर्णमयीत्वका जुहूद्वारा क्रतुके साथ जो सम्बन्ध कहा गया है, वह

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I ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ४ विषयमौपनिषदं दर्शनं न प्रवृत्त्यङ्गं स्यात्, न, प्रियादिसंसूचितस्य संसारिण एवात्मनो द्रष्टव्यत्वेनोपदेशात् । अपहतपाप्मत्वादि विशेषणं तु स्तुत्यर्थं भविष्यति । ननु तत्र तत्र प्रसाधितमेतदधिकमसंसारि ब्रह्म जगत्कारणं तदेव च संसारिण आत्मनः पारमार्थिक स्वरूपमुपनिषत्सूपदिश्यत इति । सत्यं प्रसाधितम्, तस्यैव तु स्थूणानिखननवत्फलद्वा-रेणाक्षेप समाधाने क्रियेते दायय ॥ २ ॥

आचारदर्शनात् ॥ ३ ॥

सूत्रार्थ - ' जनको ह वैदेहो ' इसप्रकार जनक आदि ब्रह्मज्ञानियोंका विद्याके साथ कर्मका आचरण देखा जाता है, अतः आत्मज्ञान कर्मका अङ्ग है । ' जनको ह वैदेहो बहुदक्षिणेन यज्ञेनेजे ' ( बृ ० ३ | १ | १ ), ' यक्ष्यमाणो वै भगवन्तोऽहमस्मि ' ( छा ० ५।११।५ ) इत्येवमादीनि ब्रह्मविदामप्यन्यपरेषु वाक्येषु कर्मसंबन्धदर्शनानि भव-न्ति । तथोद्दालकादीनामपि पुत्रानुशासनादिदर्शनाद्गोर्हस्थ्य संबन्धोऽवगम्यते । केव-लाचेज्ज्ञानात्पुरुषार्थसिद्धिः स्यात्किमर्थमनेकायाससमन्वितानि कर्माणि ते कुर्युः? ' अर्के - चेन्मधु विन्देत किमर्थं पर्वतं व्रजेत् ' इति न्यायात् ॥ ३ ॥

तच्छ्रुतेः ॥ ४ ॥

सूत्रार्थ - ' यदेव विद्यया करोति ' इत्यादि तृतीया श्रुतिसे विद्यामें कर्माङ्गत्व श्रवण होनेसे ज्ञान कर्माङ्ग प्रतीत होता है । ' यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति ' ( छा ० १1१1१० ) इति च इसलिए मरणानन्तर फल देनेवाले वैदिक कर्मोंमें देह व्यतिरिक्त आत्मा है, इस ज्ञानका उपयोग है । परन्तु ' अपहतपाप्मत्व ' आदि विशेषणोंसे असंसारी आत्मविषयक औपनिषद् ज्ञान वैदिक कर्ममें प्रवृत्तिका अङ्ग नहीं होगा । ऐसा नहीं, क्योंकि प्रिय आदिसे संसूचित संसारी आत्मा का ही द्रष्टव्यरूपसे उपदेश है । अपहतपाप्मत्व आदि विशेषण तो स्तुति के लिए होगा । परन्तु जीवसे भिन्न असंसारी ब्रह्म जगत्का कारण है और वही संसारी आत्माका पारमार्थिक स्वरूप है, ऐसा उपनिषदों में उपदेश किया जाता है यह तत् तत् स्थलमें भली - भाँति सिद्ध किया गया है । हाँ, ठोक मली - भाँति सिद्ध किया गया है । किन्तु स्थूणानिखनन के समान फलद्वारा उसकी ही दृढताके लिए आक्षेप और समाधान किये जाते हैं ॥ २ ॥

' जनको ह वैदेहो ० ' ( विदेह देश अधिपति राजा जनकने बड़ी दक्षिणावाले यज्ञद्वारा यजन किया ) ' यक्ष्यमाणो बै ० ' ( हे पूज्य ऋषि वृन्द! मैं मी यज्ञ करनेवाला हूँ ) इत्यादि विद्या विधि-परक वाक्योंमें भी ब्रह्मवेत्ताओं के कर्म सम्बन्ध दर्शन होते हैं । उसीप्रकार उद्दालक आदिका भी पुत्र उपदेश आदि दर्शनसे गार्हस्थ्य सम्बन्ध अवगत होता है । यदि केवल ज्ञानसे ही पुरुषार्थंकी सिद्धि हो तो वे विद्वान् अनेक प्रकारके आयास युक्त कर्म क्यों करें, क्योंकि ' अक्के चेन्मधु ० ' ( यदि समीपमें - घरके कोने अथवा आक्कके छोटे पोदेमें मधु मिले तो मधु अभिलाषी पर्वतमें क्यों जाय ) ऐसा न्याय है ॥३ ॥

' यदेव विद्यया ० ' ( जो कर्म विद्या, श्रद्धा और योगसे युक्त होकर किया जाता है वही कर्म सत्यानन्दी - दीपिका अव्यभिचारी है | परन्तु यहाँ तो कर्ता सब कर्मोंमें साधारण होनेसे व्यभिचारी है, इसलिए व्यभिचारी कर्ताद्वारा आत्मज्ञानमें क्रतु सम्बन्ध सिद्ध नहीं हो सकता । पूर्वपक्षी ' न, व्यतिरेकविज्ञानस्य ' इत्यादिसे कहते हैं । * वेदान्तमत में जो स्वरूपज्ञान है वह क्रत्वर्थ है अथवा पुरुषार्थं है, इसप्रकार विचारसे ही क्रत्वर्थव दृढ हो सकता है, अतः कर्ता आत्माद्वारा आत्मज्ञान क्रतुका अङ्ग है ॥ २ ॥

पृष्ठ 783

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अधि ० १ सू ० ५-६-७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७४ ९ कर्मशेषत्वश्रवणाद्विद्याया न केवलायाः पुरुषार्थहेतुत्वम् ॥ समन्वारम्भणात् ॥ ५ ॥

सूत्रार्थं - ' तं विद्याकर्मणी ' इत्यादिसे विद्या और कर्मका विद्या कर्मका अङ्ग है । ' तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते ' ( बृह ० ४।४।२ ) इति च कारित्वदर्शनान्न स्वातन्त्र्यं विद्यायाः ॥ ५ ॥

तद्वतो विधानात् ॥ ६ ॥

पदच्छेद - तद्वता, विधानात् । सूत्रार्थ - ( तद्वतः ) ' आचार्यकुलाद्वेदमधीत्य ' इत्यादि लिए ( विधानात् ) कर्मका विधान किया जाता है, इससे भी विद्या ४ ॥ समुच्चय देखा जाता है, इससे मी विद्याकर्मणोः फलारम्भे सह-श्रुति से समस्त वेदार्थं जाननेवालेके कर्मका अङ्ग है । ' आचार्यकुलाद्वेदमधीत्य यथाविधानं गुरोः कर्मातिशेषेणाभिसमानृत्य कुटुम्बे शुचौ देशे स्वाध्यायमधीयानः ' ( छा ० ८/१५/१ ) इति चैवंजातीयका श्रुतिः समस्तवेदार्थविज्ञानवतः कर्माधिकारं दर्शयति । तस्मादपि न विज्ञानस्य स्वातन्त्र्येण फलहेतुत्वम् । नन्वत्राधीत्ये-त्यध्ययनमात्रं वेदस्य श्रूयते, नार्थविज्ञानम् । नैष दोषः, दृष्टार्थत्वाद्वेदाध्ययनमर्थावबो-धपर्यन्तमिति स्थितम् ॥ ६ ॥

नियमाच्च ॥ ७ ॥

पदच्छेद - नियमात् च । सूत्रार्थ - और ' कुर्वन्नेवेह ' इत्यादि श्रुतिसे जीवन पर्यन्त कर्माचरणका नियम होनेसे भी ज्ञान कर्मका अङ्ग है । ' कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत समाः । एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ' ( ईशा ० २ ) इति, तथा ' एतद्वै जरामर्यं सत्रं यदग्निहोत्रं जरया वा ह्येवास्मान्मुच्यते मृत्युना वा ' इत्येवं जातीय कान्नियमादपि कर्मशेषत्वमेव विद्याया इति ॥ ७ ॥

वीर्यवत्तर होता है अर्थात् अविद्वान्से किये गये कर्मसे अधिक फलवाला होता है ) इसप्रकार कर्मके अङ्गरूपसे विद्याका श्रवण होनेसे केवल - कर्मरहित विद्या मोक्षका हेतु नहीं है ॥ ४ ॥

' तं विद्याकर्मणी ० ' ( मरणानन्तर परलोकमें जानेवालेके पीछे पीछे फलोत्पादनके लिए विद्या और कर्म जाते हैं ) इसप्रकार विद्या और कर्ममें फलके आरम्भ में सहकारित्व देखनेसे ज्ञात होता है कि विद्या स्वतन्त्र नहीं है ॥ ५ ॥

' आचार्यकुलाद्वेदमधीत्य ० ' ( नियमानुसार गुरुके कर्तव्य कर्मोंको समाप्त कर वेदका अध्ययन कर आचार्यकुलसे समावर्तनकर कुटम्बमें स्थित हो पवित्र स्थानमें स्वाध्याय करता हुआ ) इसप्रकारकी श्रुति समस्त वेदार्थ जाननेवालेका कर्ममें अधिकार दिखलाती है । इससे भी आत्मज्ञान स्वतन्त्ररूपसे फलका हेतु नहीं है । परन्तु यहाँ श्रुतिमें ' अधीत्य ' ( अध्ययनकर ) इसप्रकार वेदका अध्ययन मात्र सुना जाता है अर्थ विज्ञान नहीं । यह दोष नहीं है, वेदाध्ययनके दृष्टार्थं होनेसे वेदका अध्ययन अर्थ-ज्ञान पर्यन्त है, ऐसा सिद्ध है ॥ ६ ॥

' कुर्वन्नेवेह ० ' ( इस लोकमें कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीनेकी इच्छा करे । इसप्रकार मनु-व्यवका अभिमान रखनेवाले तेरे लिए इसके सिवा और कोई मार्ग नहीं है, जिससे तुझे अशुभ कर्मका लेप न हो ) इसीप्रकार ' एतद्वै ० ' ( जो अग्निहोत्र है वही जरा और मरणपर्यन्त सत्र है । इस अग्निहोत्रसे पुरुष जरा अथवा मृत्युसे मुक्त होता है ) इसप्रकार के नियमसे भी विद्या कर्मका अङ्ग है | ७ |

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७५० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ४ एवं प्राप्ते प्रतिविधत्ते-अधिकोपदेशात्तु बादरायणस्यैवं तद्दर्शनात् ॥ ८ ॥

पदच्छेद - अघिकोपदेशात्, तु, बादरायणस्य, एवम्, " तद्दर्शनात् । सूत्रार्थ - ( तु ) सूत्रस्थ तु शब्द पूर्वपक्ष की व्यावृत्ति करता है । यह जो कहा गया है कि तत्त्वज्ञान कर्मका अङ्ग है, वह युक्त नहीं है, ( अधिकोपदेशात् ) क्योंकि संसारी जीवसे अन्य चिन्मात्र भोक्तृत्व आदि रहित ब्रह्मका उपदेश है, इसलिए तत्त्वज्ञानकी फल श्रुति अर्थवाद नहीं है, ( एवम् ) इसप्रकार ( बादरायणस्य ) बादरायण आचार्यका मत है, ( तद्दर्शनात् ) कारण कि ' यः सर्वज्ञः सर्ववित् ' इत्यादि श्रुतिमें उस संसारी जीवात्मासे अन्य ईश्वर परमात्माका दर्शन होता है । तुशब्दात्पक्षो विपरिवर्तते । यदुक्तम्- ' शेषत्वात्पुरुषार्थवाद: ' ( ब्रह्मसूत्र ३।४।२ ) इति, तन्नोपपद्यते, कस्मात्? अधिकोपदेशात् । यदि संसार्येवात्मा शारीरः कर्ता भोक्ता च शरीर-मात्रव्यतिरेकेण वेदान्तेषूपदिष्टः स्यात्ततो वर्णितेन प्रकारेण फलश्रुतेरर्थवादत्वं स्यात् । अधिक स्तावच्छारीरादात्मनोऽसंसारीश्वरः कर्तृत्वादिसंसारिधर्मरहितोऽपहतपाप्मत्वा-दिविशेषणः परमात्मा वेद्यत्वेनोपदिश्यते वेदान्तेषु । नच तद्विज्ञानं कर्मणां प्रवर्तकं भवति, प्रत्युत कर्माण्युच्छिनत्तीति वक्ष्यति ' उपमर्दं च ' ( ब्रह्मसूत्र ३।४।१६ ) इत्यत्र । तस्मात् ' पुरु-षार्थोऽतः शब्दात् ' ( ब्रह्मसूत्र ३ | ४ | १ ) इति यन्मतं भगवतो बादरायणस्य तत्तथैव तिष्ठति, न शेषत्वप्रभृतिभिर्हेत्वाभासैश्चालयितुं शक्यते । तथा हि - तमधिकं शारीरादीश्वरमात्मानं दर्शयन्ति श्रुतयः - ' यः सर्वज्ञः सर्ववित् ' ( मुण्ड ० १1१1 ९ ) ' मीषाऽस्माद्वातः पवते ' ( तै ० २।८।१ ) ' महद्भयं वज्रमुद्यतम् ' ( कठ ० ६ । २ ) ' एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि ' ( बृह ० ३।८ / ९ ) ' तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत ' ( छा ० ६ । २।३ ) इत्येवमाद्याः । यत्तु प्रियादिसंसूचितस्य संसा-रिण एवात्मनो वेद्यतयाऽनुकर्षणम् -'आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवति । आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' इसप्रकार छ: सूत्रोंसे पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर उसका निराकरण करते हैं-' तु ' शब्द से पूर्वपक्षकी व्यावृत्ति होती है । ' शेषत्वात्पुरुषार्थवादः ' ऐसा जो कहा गया है, वह उपपन्न नहीं होता, क्योंकि अधिकका उपदेश है । यदि संसारी जीवात्मा ही शारीर कर्ता, मोक्ता शरीरमात्रसे अतिरिक्त वेदान्तों में उपदिष्ट होता तो वर्णित प्रकारसे फल श्रुति अर्थवाद होती । किन्तु शारीर जीवात्मासे अधिक - अतिरिक्त असंसारी, ईश्वर कर्तृत्व आदि जीवात्मा के धर्मोसे रहित अपहत-पाप्मत्व आदि विशेषणोंसे युक्त परमात्मा वेद्यरूपसे उपनिषदोंमें उपदिष्ट है । और उसका ज्ञान कर्मों का प्रवर्तक नहीं होता, प्रत्युत कर्मोंका उच्छेद करता है, ऐसा आगे ' उपमर्दं च ' इस सूत्र में कहेंगे । इससे ' पुरुषार्थोऽतःशब्दात् ' यह जो भगवान् बादरायणका मत है वह वैसे ही अवस्थित है, शेषत्व आदि हेत्वाभासों से वह विचलित नहीं किया जा सकता । क्योंकि ' यः सर्वज्ञ सर्ववित् ' ' मीषाऽस्मा द्वातः ० ' ( इसके मयसे वायु चलता है, इसीके मयसे सूर्य उदय होता है ) ' महद्भयम् ० ' ( वह ब्रह्म महान् भयरूप उठाए हुए वज्र के समान है ) ' एतस्य वा ० ' ( हे गार्गी! इस बक्षरके प्रशासन में सूर्य और चन्द्रमा अवधूत होकर स्थित हैं ) ' तदैक्षत ० ' ( उस सद्रूप ब्रह्मने ईक्षण किया ' मैं बहुत हो जाऊँ अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ । इसप्रकार ईक्षणकर उसने तेज उत्पन्न किया ) इत्यादि श्रुतियाँ उस ईश्वर परमात्माको जीवात्मासे भिन्न दिखलाती हैं । और ' आत्मनस्तु कामाय ' ( आत्मा - अपने ही प्रयो-सत्यानन्दी - दीपिका * पूर्वपक्षीने जो यह कहा है कि ब्रह्मज्ञान फल शून्य होनेसे कर्मका अङ्ग है, वह मी निराकृत हुआ समझना चाहिए, क्योंकि ब्रह्मज्ञान स्वतन्त्ररूपसे मोक्षका हेतु है । और ' आत्मनस्तु कामाय '

पृष्ठ 785

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अधि ० १ सू ० ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७५१ ( बृह ० २।४।५ ) ' यः प्राणेन प्राणिति स त आत्मा सर्वान्तरः ( बृह ० ३ | ४ | ) ( य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते ' ( छा ० ८।७।४ ) इत्युपक्रम्य ' एतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि ' ( छा ० ८1 ९ 1३ ) इति चैवमादि, तदपि ' अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेद: ' ( बृह ० २ | ४ | १० ) ' योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति ' ( बृह ० ३।५ | १ ) ( परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमः पुरुष: ' ( छा ० ८।१२।३ ) इत्येवमादिभिर्वाक्यशेषैः सत्यामेवाधिको पदिदिक्षायामत्यन्ताभेदा-भिप्रायमित्यविरोधः । पारमेश्वरमेव हि शारीरस्य पारमार्थिकं स्वरूपम्, उपाधिकृतं तु शारीरत्वम्, ' तत्त्वमसि ' ( छा ० ६।८।७ ) ' नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ ' ( बृह ० ३/८/११ ) इत्यादि -श्रुतिभ्यः । सर्वे चैतद्विस्तरेणास्माभिः पुरस्तात्तत्र तत्र वर्णितम् ॥ ८ ॥

तुल्यं तु दर्शनम् ॥ ९ ॥

पदच्छेद - तुल्यम्, तु, दर्शनम् । सूत्रार्थ - तत्वज्ञान कर्मका अङ्ग नहीं है, क्योंकि इसमें भी ' एतद्ध स्म वे ० ' इत्यादि श्रुतिसे ( तुल्यम् ) समान ही ( दर्शनम् ) आचारदर्शन है । ( तु ) शब्द कर्माङ्ग लिङ्गदर्शनका प्राबल्य सूचित करता है । * यत्तूतम् - आचारदर्शनात्कर्मशेषो विद्येति, अत्र ब्रूमः - तुल्यमाचारदर्शनम-कर्मशेषत्वेऽपि विद्यायाः । तथा हि श्रुतिर्भवति एतद्ध स्म वै तद्विद्वांस आहुर्ऋषयः कावषेयाः किमर्था वयमध्येष्यामहे किमर्था वयं यक्ष्यामहे । एतद्ध स्म वै तत्पूर्वे विद्वांसोऽग्निहोत्रं न जुहवाञ्चक्रिरे ', जनके लिए सब प्रिय होते हैं, हे मैत्रेयी । आत्माका दर्शन करना चाहिए ) ' यः प्राणेन ' ( मुख-नासिका संचारी प्राणसे जो चेष्टा करता है वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है ) ' य एषोऽक्षिण ( यह जो पुरुष नेत्रोंसे दिखाई देता है, यह आत्मा है ) इस प्रकार उपक्रम ' एतं त्वेव ' ( मैं तुम्हारे प्रति उस आत्माका पुनः व्याख्यान करूंगा ) इत्यादि श्रुतिमें प्रिय आदिसे संसूचित संसारी आत्माका ही वेद्य रूपसे जो अनुकर्षण है, वह भी ' अस्य महतो ' ( हे मैत्रेयी! यह जो ऋग्वेद है वह इस महद्भूतका निःश्वास है ) ' योऽशनायापिपासे ' ( याज्ञवल्क्य - जो बुभुक्षा, पिपासा, शोक, मोह, जरा और मृत्युसे परे है ) ' परं ज्योतिरुपसंपद्य ' ( इस शरीर से समुत्थानकर परं ज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है वह उत्तम पुरुष है ) इत्यादि वाक्यशेषोंसे अधिक उपदेशकी इच्छा होनेपर ही अत्यन्त अभेदके अभिप्रायसे है, अतः विरोध नहीं है, क्योंकि परमेश्वरका स्वरूप हो जीवात्माका पारमा-र्थिक स्वरूप है, शारीरत्व तो उपाधिकृत है, कारण कि ' तत्त्वमसि ' ' नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ ' ( उससे अन्य द्रष्टा नहीं है ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं । इन सबका तत् तत् स्थलमें विस्तारसे हम वर्णन कर चुके हैं ॥ ८ ॥

जो यह कहा गया है कि ' आचारदर्शनात् ' आचारदर्शनसे ज्ञान कर्मका अङ्ग है । इसपर हम कहते हैं - विद्या अकमंशेषत्व में भी आचारदर्शन समान है, क्योंकि ' एतद्ध स्म ० ' ( यह जानकर कवषके पुत्र ऋषियोंने कहा कि हम अध्ययन किस लिए करेंगे, हम किसलिए यज्ञ करेंगे, निःसन्देह इस वाक् और प्राणके परस्पर होमात्मक अग्निहोत्रको जाननेवाले प्राचीन उपासकोंने अग्निहोत्र होम सत्यानन्दी - दीपिका इत्यादि श्रुतिमें प्रिय आदि संसारी धर्मोसे लोक प्रसिद्ध कर्ता भोक्ता जीवात्माका जो अनुकर्षण है वह केवल अभेद प्रतिपादनके अभिप्रायसे है, कारण कि उसका ही ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' इत्यादि श्रतिसे उपदेश है ॥ ८ ॥

* जैसे जनक आदि ब्रह्मवेत्ताओंका कर्माचरण दर्शन है, वैसे याज्ञवल्क्य, शुकदेव आदि ब्रह्मज्ञानियोंका अकर्माचरण दर्शन है । इससे कमं दर्शनात्मक लिङ्ग लोकसंग्रहके लिए होनेसे अन्यथा

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७५२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ४ ' एतं वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणाः पुत्रैषणायाश्च वितैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ मिक्षा-चर्यं चरन्ति ' ( बृह ० ३।५।१ ) इत्येवंजातीयका । याज्ञवल्क्यादीनामपि ब्रह्मविदामकर्म-निष्ठत्वं दृश्यते - ' एतावदरे खल्वमृतत्वमिति होक्त्वा याज्ञवल्क्यः प्रवव्राज ' ( बृह ० ४/५/१५ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । अपि च ' यक्ष्यमाणो वै भगवन्तोऽहमस्मि ' ( छा ० ५।११।५ ) इत्येतल्लिङ्ग-दर्शनं वैश्वानर विद्याविषयम् । संभवति च सोपाधिकायां ब्रह्मविद्यायां कर्मसाहित्य-दर्शनम्! नत्वत्रापि कर्माङ्गत्वमस्ति प्रकरणाद्यभावात् ॥ ९ ॥

यत्पुनरुक्तम् —'तच्छ्रुते: ' ( ब्रह्मसूत्र ३।४।४ ) इति, अत्र ब्रूमः -असार्वत्रिकी ॥ १० ॥

सूत्रार्थ - ' यदेव विद्यया करोति ' यह श्रुति सर्वविद्या विषयक नहीं है, किन्तु केवल उद्गीथ-विद्या विषयक है । ' यदेव विद्यया करोति ' ( छा ० १ | १ | १० ) इत्येषा श्रुतिर्न सर्वविद्या विषया, प्रकृतविद्याभि-संबन्धात् । प्रकृता चोद्गीथविद्या- ' ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत ' ( छा ० १ । १ । १ ) इत्यत्र ॥ १० ॥

विभागः शतवत् ॥ ११ ॥

पदच्छेद - विभागः, शतवत् । सूत्रार्थ - ( विभागः ) ' तं विद्याकर्मणी ' इस श्रुतिमें प्रतिपादित विद्या अन्य पुरुषका और कर्म अन्य पुरुषका अनुगमन करते हैं, इसप्रकार विभाग है । ( शतवत् ) जैसे इन दो मनुष्यों को सौ मुद्रा दिये जायें, ऐसा कहनेपर पचास - पचास मुद्रा बाँट दिये जाते हैं । * यदप्युक्तम् —'तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते ' ( बृह ० ४ । ४ । २ ) इत्येतत्समन्वारम्भवच-नमस्वातन्त्र्ये विद्याया लिङ्गमिति, तत्प्रत्युच्यते । विभागोऽत्र द्रष्टव्यो विद्याऽन्यं पुरुषमन्वा-नहीं किया था ) ' एतं वै ० ' ( इस आत्माको में ही परब्रह्म परमात्मा हूँ, ऐसा जानकर ब्राह्मण पुत्र-षणा, वित्तैषणा और लोकंषणासे अलग हटकर मिक्षाचर्यासे विचरते हैं ) इसप्रकार की श्रुति है । ' एतावदरे ० ' ( अरी मैत्रेयी! निश्चय जान इतना ही अमृतत्व है, ऐसा कहकर याज्ञवल्क्यने संन्यास ग्रहण किया ) इत्यादि श्रुतियोंसे ब्रह्मज्ञानी याज्ञवल्क्य आदि मी अकर्मनिष्ठ देखे जाते हैं । और ‘ यक्ष्यमाणो ० ' ( हे पूज्य ऋषियो! मैं भी यज्ञ करनेवाला हूँ ) यह लिङ्गदर्शन वैश्वानर विद्याविषयक है । सोपाधिक- सगुणब्रह्म विद्या में तो कर्म साहित्यदर्शन संभव है । परन्तु यहाँ तो विद्यामें कर्माङ्गत्व नहीं है, क्योंकि प्रकरण आदिका अभाव है ॥ ९ ॥

' तच्छ्रुते ते: ' इस सूत्र में जो पूर्वपक्षीसे कहा गया है, उसपर हम कहते हैं-' यदेव विद्यया करोति ' ( पुरुष विद्यासे युक्त होकर जो कर्म करता है ) यह श्रुति सर्वविद्या-विषयक नहीं है, क्योंकि उसका प्रकृत विद्याके साथ सम्बन्ध है । ' ओमित्येदक्षर ० ' ( ॐ इस अक्षर उद्गीथकी उपासना करनी चाहिए ) यहाँ उद्गीथ विद्या प्रकृत है ॥ १० ॥

और ' तं विद्याकर्मणी ० ' ( विद्या और कर्म परलोकमें जानेवालेका अनुगमन करते हैं ) यह सहानुगमन वचन विद्याकी अस्वतन्त्रतामें लिङ्ग है, ऐसा जो कहा गया है, उसका निराकरण किया सत्यानन्दी - दीपिका सिद्ध है | हमको ' तुल्यं तु दर्शनम् ' इससे कहते हैं । जो कर्मठ है वह ब्रह्मवित् नहीं है, ऐसा माध्य-कार ' अपि च ' इत्यादिसे कहते हैं । वस्तुतः वैश्वानरविद्या भी कर्मका अङ्ग नहीं है, क्योंकि उसकी स्वतन्त्र फलश्रुति है, और उसमें कर्माङ्गत्व प्रतिपादक प्रकरण आदि नहीं है ॥ ९ ॥

* ' तं विद्याकर्मणी ' श्रुति प्रतिपादित यह सहानुगमन वचन मुमुक्षुको भी विषय करता है, ऐसा

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अधि ० १ सू ० १२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७५३. रभते, कर्मान्यमिति । शतवत् । यथा शतमाभ्यां दीयतामित्युक्ते विभज्य दीयते पञ्चा-शदेकस्मै पञ्चाशदपरस्मै, तद्वत् । न चेदं समन्वारम्भवचनं मुमुक्षुविषयम्, ' इति नु कामयमानः ' ( बृह ० ४ | ४ | ६ ) इति ' संसारिविषयत्वोपसंहारात्, अथा कामयमानः ' ( बृह ० ४ | ४ | ६ ) इति च मुमुक्षोः पृथगुपक्रमात् । तत्र संसारिविषये विद्या विहिता प्रतिषिद्धा च परि-गृह्यते, विशेषाभावात् । कर्मापि विहितं प्रतिषिद्धं च यथाप्राप्तानुवादित्वात् । एवं सत्य-विभागेनापीदं समन्वारम्भ वचनमवकल्पते ॥ ११ ॥

यच्चैतत् - ' तद्वतो विधानात् ' ( ब्रह्मसूत्र ३।४१६ ) इति, अंत उत्तरं पठति-अध्ययनमात्रवतः ॥ १२ ॥

सूत्रार्थ - ' आचार्यकुलाद्वेदमधीत्य ' इस वाक्यमें केवल वेद अध्ययन करनेवालेके लिए विधान किया जाता है, औपनिषद् आत्मज्ञानवालेके लिए नहीं । ' आचार्यकुलाद्वेदमधीत्य ' ( छा ० ८११५ ११ ) इत्यत्राध्ययनमात्रस्य श्रवणादध्ययनमात्र-वत एव कर्मविधिरित्यध्यवस्यामः । नन्वेवं सत्यविद्यत्वादनधिकारः कर्मसु प्रसज्येत, नैष दोषः, न वयमध्ययनप्रभवं कर्मावबोधनमधिकारकारणं वारयामः, किं तर्हि? औप-निषदमात्मज्ञानं स्वातन्त्र्येणैव प्रयोजनवत्प्रतीयमानं न कर्माधिकारकारणतां प्रतिपद्यते इत्येतावत्प्रतिपादयामः । यथा च न क्रत्वन्तरज्ञानं क्रत्वन्तराधिकारेणापेक्ष्यत एवमेतदपि द्रष्टव्यमिति ॥ १२ ॥

यदप्युक्तम् — ' नियमाच्च ' ( ब्रह्मसूत्र ३ | ४ | ७ ) इति, अत्राभिधीयते -जाता है | विद्या अन्य पुरुषका अनुगमन करती है और कर्म अन्य पुरुषका, इसप्रकार यहाँ विभाग समझना चाहिए | शतके समान । जैसे इन दोनों को सौ मुद्रा दीजिए, ऐसा कहने पर विभाग कर पचास मुद्रा एकको और पचास मुद्रा अन्यको दिये जाते हैं, वैसे ही प्रकृत में समझना चाहिए । और यह सहानुगमन वचन मुमुक्षुविषयक नहीं है, क्योंकि ' इति नु कामयमानः ' ( इसप्रकार कामना करने वाला पुरुष ऐसा करता है अर्थात् संसारमें कर्म करनेको आता है ) इसप्रकार संसारिविषयत्वका उपसंहार है, और ' अथाकामयमान: ' ( अब जो कामना न करनेवाला पुरुष है, वह ब्रह्मको प्राप्त होता है ) इसप्रकार मुमुक्षुका पृथक् उपक्रम है । उस संसारिविषयक वाक्यमें उद्गीथ आदि विषयक विहित विद्या और नग्नस्त्रीदर्शनरूप प्रतिषिद्ध विद्याका ग्रहण किया जाता है, क्योंकि विद्याविशेषका अभाव है । उसीप्रकार कर्म भी विहित और प्रतिषिद्ध हैं, क्योंकि वह वाक्य यथाप्राठका अनुवादक है । ऐसा होनेपर यह सहानुगमन वचन अविभागसे भी उपपन्न हो सकता है ॥ ११ ॥

और ' तद्वतो विधानात् ' इस सूत्रसे पूर्वपक्षीने जो कहा है, उसका उत्तर कहते हैं-' आचार्यकुलाद् ० ' ( आचार्यं कुलसे वेदका अध्ययन करके ) इस श्रुतिमें अध्ययनमात्रका श्रवण होनेसे केवल वेद अध्ययन करनेवालेके लिए ही कर्म विधि है, ऐसा हम निश्चय करते हैं । परन्तु ऐसा होनेपर विद्याहीन ( वेदार्थ ज्ञान शून्य ) होने से उसका कर्मों में अनधिकार प्रसक्त होगा? यह दोष नहीं है, हम वेदाध्ययनसे उत्पन्न होनेवाले कर्मोंमें अधिकार के कारणभूत कर्मावबोधका वारण नहीं करते, किन्तु औपनिषद् आत्मज्ञान स्वतन्त्ररूप से प्रयोजनवाला प्रतीत होता हुआ कर्मोंमें अधिकारकारणत्वको प्राप्त नहीं होता, इतनामात्र हम प्रतिपादन करते हैं । जैसे एक क्रतुका ज्ञान अन्य क्रतुके अधिकारके द्वारा अपेक्षित नहीं है, ऐसे यह भी समझना चाहिए ॥ १२ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका मानकर विद्या मुमुक्षुको अमृतरूपसे और कर्म अन्यको परलोक फलोपभोगार्थ अनुगमन करते हैं । इस प्रकार सूत्रकारने विभाग किया है । वस्तुतः यह सहानुगमन वचन मुमुक्षु विषयक नहीं है, इसको ' नच ' इत्यादिसे कहते हैं ॥ ११ ॥

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७५४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ४ नाविशेषात् ॥ १३ ॥

पदच्छेदन, अविशेषात् । सूत्रार्थ - ( न ) ' कुवन्नेवेह कर्माणि ' इत्यादि श्रुति तत्त्वज्ञानी विषयक नहीं है, ( अविशेषात् ) क्योंकि ' विद्वान् ' विशेषका अभाव है । ' कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् ' ( ईशा ० २ ) इत्येवमादिषु नियमश्रवणेषु न विदुष इति विशेषोऽस्ति, अविशेषेण नियमविधानात् ॥१३ ॥

स्तुतयेऽनुमतिर्वा ॥ १४ ॥

पदच्छेद — स्तुतये, अनुमतिः, वा । सूत्रार्थ - ( वा ) अथवा ( अनुमतिः ) तत्त्वज्ञानीके लिए जो अनुमति - कर्मानुज्ञा है, ( स्तुतये ) वह केवल स्तुति के लिए है । * ' कुर्वन्नेवेह कर्माणि ' ( ईशा ० २ ) इत्यत्रापरो विशेष आख्यायते । यद्यप्यत्र प्रकरण-सामर्थ्याद्विद्वानेव कुर्वन्निति संबध्येत, तथापि विद्यास्तुतये कर्मानुज्ञानमेतद्रष्टव्यम् । ' न कर्म लिप्यते नरे ' ( ईशा ० २ ) इति हि वक्ष्यति । एतदुक्तं भवति - यावज्जीवं कर्म कुर्वत्यपि विदुषि पुरुषे न कर्म लेपाय भवति, विद्यासामर्थ्यादिति तदेवं विद्या स्तूयते || १४ || कामकारेण चैके ॥ १५ ॥

पदच्छेद – कामकारेण च, एके । सूत्रार्थ - ( च ) और ( एके ) ' एतद्ध स्म वे ० ' इत्यादि श्रुतिसे ज्ञात होता है कि कुछ विद्वानोंने भी ( कामकारेण ) स्वेच्छा से कर्मके साधनभूत प्रजा आदिका त्याग किया है । * अपि चैके विद्वांसः प्रत्यक्षीकृतविद्याफलाः सन्तस्तदवष्टम्भात्फलान्तर साधनेषु प्रजादिषु प्रयोजनाभावं परामृशन्ति । कामकारेणेति श्रुतिर्भवति वाजसनेयिनाम् ' एतद्ध स्म वै तत्पूर्वे विद्वांसः प्रजां न कामयन्ते किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्माऽयं लोकः ' ( बृह ० ४।४।२२ ) और ' नियमाच्च ' इस सूत्र से जो पूर्वपक्षीसे कहा गया है, उसपर कहा जाता है । ' कुर्वन्नेवेह ० ' ( इस लोकमें अग्निहोत्र आदि कर्म करता हुआ सौ वर्ष जीनेकी इच्छा करे ) इत्यादि नियमों के श्रवण विद्वानके लिए है ऐसा विशेष नहीं है, क्योंकि अविशेष रूपसे नियमका विधान है ॥१३ ॥

' कुवन्नेवेह कर्माणि ० ' इस श्रुतिमें अन्य विशेष कहा जाता है । यद्यपि यहां प्रकरण की सामध्यंसे विद्वान् ही ' करता हुआ ' इस प्रकार सम्बन्धित किया जाय, तो भी यह कर्मानुज्ञा विद्यास्तुतिके लिए समझनी चाहिए, क्योंकि आगे ' न कर्म लिप्यते नरे ' ऐसा ही श्रुति कहेगी । तात्पर्य यह है - जीवन पर्यन्त कर्म करते हुए भी तत्त्ववित् पुरुषमें विद्याकी सामथ्यंसे कर्म लेप ( फलबन्धन ) के लिए नहीं होता । इससे इस प्रकार विद्याकी स्तुति की जाती है ॥ १४ ॥

और विद्या फलका साक्षात्कार करनेवाले कुछ एक विद्वान् लोग विद्याका अवलम्बनकर अन्य फलके साधन प्रजा आदिमें प्रयोजनाभावका परामर्श करते हैं अर्थात् प्रयोजनाभाव देखते हैं, क्योंकि ' एतद्ध स्म वै ० ' ( पूर्ववर्ती विद्वान् सन्तान तथा कर्म आदिकी इच्छा नहीं करते थे, वे सोचते कि हम इस प्रजासे क्या करेंगे अर्थात् इनसे क्या प्रयोजन है, जिन हमको यह आत्मलोक अभीष्ट है ) सत्यानन्दी - दीपिका * ' कुवन्नेवेह कर्माणि ' यह नियम श्रुति केवल अविद्वान् के लिए है, ऐसा कहा गया है । अब इस श्रुतिको विद्वद् विषयक मानकर उसका ' स्तुतये ' इस सूत्र से परिहार करते हैं ॥ १४ ॥

* स्वेच्छा से अग्निहोत्र आदि कर्मके साधनभूत प्रजा आदिके त्याग रूप लिङ्गसे भी विद्या स्वतन्त्र फलवाली होनेसे कर्माङ्ग नहीं है, ऐसा ' कामकारेण चैके ' इस सूत्र से कहते हैं । आत्मविद्याका अनुभव सिद्ध अनावृत्त आत्मस्वरूप मोक्ष फल है । यह कर्मफलके समान कालान्तरभावी, सातिशय और

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अधि ० १ सू ० १६-१७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ७५५ इति । अनुभवारूढमेव च विद्याफलं न क्रियाफलवत्कालान्तरभावीत्यसकृदवोचाम । अतोऽपि न विद्यायाः कर्मशेषत्वं नापि तद्विषयायाः फलश्रुतेरयथार्थत्वं शक्यमाश्रयितुम् ॥ उपमर्दं च ॥ १६ ॥

पदच्छेद - – उपमर्दम्, च । सूत्रार्थ - और ' यत्र वा अस्य ' इत्यादिसे ज्ञात होता है कि तत्त्वज्ञान कर्मानुष्ठान के हेतु भूत अविद्याकृत क्रिया, कारक, फल विभागका उपमर्दन करता है । अपि च कर्माधिकार हेतोः क्रियाकारक फललक्षणस्य समस्तस्य प्रपञ्चस्याविद्या-तस्य विद्यासामर्थ्यात्स्वरूपोपमर्दमामनन्ति - ' यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्तत्केन कं जिघ्रेत् ' ( बृह ० - ।४।१४ ) इत्यादिना । वेदान्तोदितात्मज्ञानपूर्विकां तु कर्माधिकारसिद्धिं प्रत्याशासानस्य कर्माधिकारोच्छित्तिरेव प्रसज्येत । तस्मादपि स्वातन्त्र्यं विद्यायाः ॥ १६ ॥

ऊर्ध्वरेतःसु च शब्दे हि ॥ १७ ॥

पदच्छेद - ऊर्ध्वरेतःसु, च, शब्दे, हि । सूत्रार्थ - ( च ) और ( ऊध्वरेत: सु ) संन्यासाश्रम में ही ब्रह्मविद्याका श्रवण है, इससे मो विद्या कर्माङ्ग नहीं है, ( हि ) क्योंकि ( शब्दे ) ' त्रयो धर्मस्कन्धाः ' इत्यादि श्रुतिमें संन्यासाश्रम प्रतिपादित है | * ऊर्ध्वरेतःसु चाश्रमेषु विद्या श्रूयते । न च तत्र कर्माङ्गत्वं विद्याया उपपद्यते, कर्मा-भावात् । न ह्यग्निहोत्रादीनि वैदिकानि कर्माणि तेषां सन्ति । स्यादेतत् - ऊर्ध्वरेतस आश्रमा न श्रूयन्ते वेद इति तदपि नास्ति । तेऽपि हि वैदिकेषु शब्देष्ववगम्यन्ते- ' त्रयो धर्मंस्कन्धाः ' ( छा ० २।२३।१ ), ‘ ये चेमेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युपासते ' ( छा ० ५/१०११ ), ( तपःश्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये ' ( मुण्ड ० १ २ ।११ ), ' एतमेव प्रवाजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति ' ( बृह ० ४।४।२२ ), ' ब्रह्मचर्यादेव ऐसी अपनी इच्छा से त्याग करनेकी वाजसनेयी शाखावालोंकी श्रुति है । विद्या फल तो अनुभव सिद्ध ही है, कर्मफलके समान कालान्तर - जन्मान्तर भावी नहीं है, ऐसा हम अनेक वार कह चुके हैं । इससे भी विद्या कर्मशेष नहीं है और विद्या - विषयक फल श्रुति अयथार्थ है, ऐसा भी आश्रयण नहीं किया जा सकता ॥ १५ ॥

और कर्माधिकार के हेतु क्रिया, कारक और फलरूप अविद्याकृत समस्त प्रपञ्चकी विद्याकी सामर्थ्य से स्वरूप निवृत्ति ' यत्र त्वस्य ० ' ( जिस विद्यावस्थामें इस ब्रह्मवेत्ताके लिए सब आत्मा हो हो गया उस अवस्था में किस करणसे किस विषयको देखे और किस करण से किस विषयको सूंघे ) इत्यादि श्रुतिसे कहते हैं 1 । वेदान्तसे उत्पन्न मात्मज्ञानसे जो पूर्व है ऐसे कर्माधिकार सिद्धिकी प्रत्याशा रखनेवालेको तो कर्माधिकारका उच्छेद हो प्रसक्त होगा । इससे भी विद्या स्वतन्त्र है ॥ १६ ॥

और अध्वरेतः संन्यासाश्रमों में विद्याका श्रवण है । वहाँ विद्यामें कर्माङ्गध्व उपपन्न नहीं होता, क्योंकि उक्त आश्रमों में कर्मका अभाव है - अग्निहोत्र आदि वैदिक कर्म उन बाश्रमों में नहीं है । ऐसा हो । परन्तु अतः आश्रम वेदमें नहीं सुने जाते, यह भी नहीं है, क्योंकि वे भी ' त्रयो धर्मस्कन्धाः ’ सत्यानन्दी - दीपिका अनित्य नहीं है । और ' तरति शोकमात्मवित् ' इत्यादि विद्याफल श्रुति भी अर्थवाद नहीं है, किन्तु यथार्थ है ॥ १५ ॥

विद्याकी स्वतन्त्रतामें ' ऊर्ध्वरेतःसु ' इत्यादिसे अन्य हेतु कहते हैं । ' कर्मतत्वज्ञाने नाङ्गाङ्गिभूते मिन्नाधिकारिस्थितत्वात् राजसूय बृहस्पतिसववत् ' ( कर्म और तत्त्वज्ञान अङ्गाङ्गिभूत नहीं हैं, क्योंकि भिन्न - भिन्न अधिकारी स्थित हैं, जैसे राजसूय और बृहस्पतिसव ) इसलिए कर्म विधि रहित संन्यासा-श्रममें ही विद्याका श्रवण होनेसे ब्रह्मज्ञान कर्मका अङ्ग नहीं है । अब संन्यासाश्रम के अभावकी याङ्काको

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७५६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ४ प्रव्रजेत् ' ( जा ० ४ ) इत्येवमादिषु । प्रतिपन्नाप्रतिपन्न गार्हस्थ्यानामपाकृतानपाकृतत्रियाणां चोर्ध्वरेतस्त्वं श्रुतिस्मृतिप्रसिद्धम् । तस्मादपि स्वातन्त्र्यं विद्यायाः ॥ १७ ॥

( २ परामर्शाधिकरणम् । सू ० १८-२० ) परामर्श जैमिनिरचोदना चापवदति हि ॥ १८ ॥

पदच्छेद - परामर्शम्, जैमिनि:, अचोदना, च अपवदति, हि । सूत्रार्थ - ' ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति ' इत्यादि शास्त्र ( परामर्शम् ) अन्ध परम्परान्याय से प्राप्त संन्यासाश्रमका अनुवादक है, ( जैमिनि: ) ऐसा आचार्य जैमिनिका मत है, ( हि ) क्योंकि ( अचोदना ) इस वाक्य में विधायक लिङ्ग आदि नही है, ( च ) और ( अपवदति ) ' वीरहा ' इत्यादि शास्त्र भी संन्यासाश्रमका प्रतिषेध करता है । * ' त्रयो धर्मस्कन्धाः ' ( छा ० २।२४ | १ ) इत्यादयो ये शब्दा ऊर्ध्वरेतसामाश्रमाणां सद्भावायोदाहृताःन ते तत्प्रतिपादनाय प्रभवन्ति । यतः परामर्शमेषु शब्देष्वाश्रमान्तराणां जैमिनिराचार्यो मन्यते, न विधिम् । कुतः? न हात्र लिङ्गादीनामन्यतमश्चोद्ना शब्दोऽस्ति । अर्थान्तरपरत्वं चैषु प्रत्येकमुपलभ्यते । त्रयो धर्मस्कन्धा इत्यत्र तावद्यज्ञोऽध्ययनं दान-मिति प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्य कुलवासी तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुले-ऽवसादय सर्व एते पुण्यलोका भवन्तीति परामर्शपूर्वकमाश्रमाणामनात्यन्तिकफलत्वं ( धर्मके तीन स्कन्ध - प्रविभाग हैं ) ' ये चेमे ० ' ( वे जो कि ज्ञान युक्त वानप्रस्थ और संन्यासी अरण्यमें श्रद्धा और तप इनकी उपासना करते हैं ) ' तप श्रद्धे ० ' ( जो विद्वान् लोग अरण्यमें तपः और श्रद्धाका सेवन करते हैं ) ' एतमेव ० ' ( इसी आत्मलोकको चाहते हुए संन्यासी सब कर्मोंका संन्यास करते हैं ) ' ब्रह्मचर्या देव ० ' ( ब्रह्मचर्यं से हो संन्यास ग्रहण करे ) इत्यादि वैदिक शब्दोंमें अवगत होते हैं । प्राप्त गार्हस्थ्य अप्राप्त गार्हस्थ्य, अपाकृत तीन ऋण और अनपाकृत तीन ऋण वालोंका अर्ध्वरेतस्त्व श्रुति

और स्मृतिमें प्रसिद्ध है । इससे भी विद्या स्वतन्त्र है! ॥ १७ ॥

' त्रयो धर्मस्कधाः ' धर्मके तीन स्कन्ध- प्रविभाग हैं ) इत्यादि श्रुतियाँ जो संन्यासाश्रर्मो के सद्भाव के लिए उदाहृत हैं, वे उनके प्रतिपादन करनेमें समर्थ नहीं है, क्योंकि जैमिनि आचार्थ इन सत्यानन्दी - दीपिका ' त्रयो धर्म स्कन्धाः ' इत्यादिसे निवृत्त करते हैं । ' तीन कर्म प्रधान आश्रम हैं और चौथा ब्रह्मसंस्थ-संन्यासाश्रम है ' ' ब्रह्मचर्येण ऋषिभ्यो यज्ञेन देवेभ्यः प्रजया पितृभ्य एष वा अनृण ' ( ब्रह्मचयं युक्त वेदाध्ययनसे ऋषिऋण, यज्ञ आदिसे देवऋण और प्रजा द्वारा पितृऋणसे मुक्त होकर यह ऋण रहित होता है ) ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थाश्रम इनके लिए श्रौत और स्मार्तं कर्मोका विधान है और केवल ब्रह्म प्राप्ति के लिए गृहीत संन्यास के लिए कर्मका विधान नहीं है । परन्तु ' ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत् । अनापकृत्य मोक्षं तु सेवमानो व्रजत्यधः ॥ ' ( तोनों ऋणों का अपा-करणकर मनको मोक्षमें प्रविष्ट करे । ऋणोंका अपाकरण किये विना मोक्षका सेवन करनेवाला अधोगतिको प्राप्त होता है ) इस प्रकरकी मनुस्मृति है । इसका अभिप्राय यह है — कि गृहस्थाश्रम में रहकर तीनों ऋणोंसे मुक्त हो संन्यास ग्रहण करे? ' यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत् गृहाद्वा-वनाद्वा ' ' यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रत्रजेत् ' ( जाबा ० ३।४ ) इत्यादि श्रुति है | श्रुति और स्मृतिमें विरोध हो तो स्वतन्त्र प्रमाणभूत श्रति बलवती होती है 1 । और ' द्वितीयमाश्रममिच्छेत्तम । वसेद् ' ( द्वितीय आश्रम-की इच्छा करे और उसमें रहे ) यह स्मृति है । इस प्रकार श्रुतिमें और स्मृति में संन्यासाश्रम प्रसिद्ध है । इसलिए ब्रह्मविद्यां संन्यासाश्रम निष्ठ होनेसे स्वतन्त्र है ॥ १७ ॥

* पूर्वं अधिकरणमें ' त्रयो धर्मस्कन्धाः ' इत्यादि श्रुति जो यति आश्रम के सद्भावमें प्रमाणरूपसे कही गई है, उसका असंभव है, इसप्रकार आक्षेप संगतिसे ' परामर्श जैमिनिः ' इत्यादिसे पूर्वपक्ष