श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 791–800
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 791–800
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अधि ० २ सू ० १८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ७५७. संकीर्त्यात्यन्तिकफलतया ब्रह्मसंस्थता स्तूयते - ' ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति ' ( छा ० २।२३।१ ) इति । ननु परामर्शेऽप्याश्रमा गम्यन्त एव । सत्यं गम्यन्ते, स्मृत्याचाराभ्यां तु तेषां प्रसिद्धिर्न प्रत्यक्षश्रुतेः । अतश्च प्रत्यक्षश्रुतिविरोधे सत्यनादरणीयास्ते भविष्यन्ति, अनधि-कृतविषया वा । ननु गार्हस्थ्यमपि सहैवोर्ध्वरेतोभिः परामृष्टं यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथम इति । सत्यमेवम्, तथापि तु गृहस्थं प्रत्येवाग्निहोत्रादीनां कर्मणां विधानाच्छुति-प्रसिद्धमेव हि तदस्तित्वम् । तस्मात्स्तुत्यर्थ एवायं परामर्शो न चोदनार्थः । अपि चाप-वदति हि प्रत्यक्षा श्रुतिराश्रमान्तरम् - ' वीरहा वा एष देवानां योऽग्निमुद्वासयते ', ' आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सी ' ( तै ० १ | ११ | १ ), ' नापुत्रस्य लोकोऽस्तीति तत्सर्वे पशवो विदुः ' इत्येवमाद्या । तथा ' ये चेमेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युपासते ' ( छा ० ५।१०।१ ) ' तपःश्रद्धे ये श्रुतियों में अन्य आश्रमों का परामर्श मानते हैं, विधि नहीं, किससे? इससे कि लिङ्ग आदिमेंसे एक भी विधिशब्द यहाँ नहीं है । और इनमें प्रत्येक अन्य अर्थपरक उपलब्ध होता है । ' त्रयो धर्मस्कन्धाः ' यहाँ तो ' यज्ञोऽध्ययनं दानमिति ' ( यज्ञ, वेदाध्ययन और दान यह प्रथम धर्मस्कन्ध है, तप द्वितीय धर्म स्कन्ध और आचार्यकुलमें वास करनेवाला, जीवनपर्यन्त नियमपूर्वक आचार्यकुलमें देहको क्षीण करनेवाला नैष्ठिक ब्रह्मचारी, यह तृतीय धर्मं स्कन्ध है, ये सब तीनों आश्रमी यथोक्त धर्मं पुण्यलोक वाले होते हैं ) इसप्रकार आश्रमोंका परामर्शपूर्वक व्यभिचरित फल कहकर ' ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति ' ( ब्रह्ममें सम्यक् प्रकारसे स्थित चतुर्थाश्रमी संन्यासी अमृतत्वको प्राप्त होता है ) इसप्रकार अव्यभि -चरित फलत्वसे ब्रह्मसंस्थताकी स्तुतिकी जाती है । परन्तु परामर्श में भी आश्रम अवगत होते ही हैं । ठीक, अवगत होते हैं, परन्तु उनकी स्मृति और आचारसे तो प्रसिद्धि है, प्रत्यक्ष श्रुति से प्रसिद्धि नहीं है, अतः प्रत्यक्ष श्रुतिके विरोध होनपर वे अनादरणीय होंगे अथवा अनधिकारी विषयक होंगे अर्थात् अग्नि-होत्र आदि कर्मोंमें अनाधिकारी लूले लंगड़े होंगे । परन्तु ' यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमः ' इसप्रकार गार्हस्थ्यका भी संन्यासियों के साथ परामर्श किय गया है । ऐसा ठीक है, तो मी गृहस्थाश्रम के प्रति तो अग्निहोत्र आदि कर्मोंका विधान होने से उसका अस्तित्व श्रुति प्रसिद्ध ही है । इसलिए यह परामर्श स्तुत्य-थंक ही है विध्यर्थक नहीं है । और ' वीरहा वा एष ० ' ( जो अग्निका उद्वासन ( बुझाना ) करता है वह देवोंका वीरहा - पुत्रघाती होता है ) ' आचार्याय ० ' ( आचार्यको अभीष्ट धन लाकर [ उसकी आज्ञासे स्त्री परिग्रह कर ] सन्तान परम्पराका उच्छेद न करे ) ' नापुत्रस्य ० ' ( अपुत्रवालेको लोकप्राप्त नहीं होता, ऐसा सब पशु भी जानते हैं ) इत्यादि प्रत्यक्ष श्रुति आश्रमान्तरका प्रतिषेध करती है । इसी सत्यानन्दी - दीपिका करते हैं । ऊर्ध्वरेतः शब्दसे यहाँ संन्यासाश्रम समझना चाहिए । माध्यमें ' आश्रमान्तराणां ' यह बहुवचन अवान्तर भेदके अभिप्रायसे है, इसलिए काण्वायन स्मृतिसे अर्थत: अनुवृत्ति करते हैं— गायत्र, ब्राह्म, प्रजापत्य और बृहन् भेदसे ब्रह्मचारी चार प्रकारके हैं । उपनयनानन्तर तीनरात्रि तक लवणका मक्षण न कर गायत्रीका अध्ययन करनेवाला गायत्र, वेदाध्ययन तक ब्रह्मचर्यव्रती ब्राह्म, ऋतुकालमें स्वस्त्री अनुगामी परस्त्रीविमुख रहनेवाला अथवा संवत्सरपर्यंन्त वेदव्रती वटुक प्राजापत्य और मरणपर्यंन्त गुरुकुलवासी नैष्ठिक ब्रह्मचारी बृहन् कहा जाता है! वार्तांक, यायावर, शालीन . और घोरसंन्यासिक भेदसे गृहस्थ भी चार प्रकारका है । कृषि, गोरक्षा आदि वैश्यवृत्तिसे निर्वाहो तथा नित्य यादि क्रियापरक वार्त्ताकवृत्ति, जो सदा आयाचितवृत्ति हो याजन, अध्यापन और प्रतिग्रहसे • विमुख वह यायावर, षट्कर्मोंमें रत याजनादि वृत्ति सञ्चयी शालीन और उद्धृत पवित्र जलसे कर्म-करता प्रतिदिनं उच्छवृत्ति हिंसादिरहित ग्रामवासी घोरसंन्यासिक कहा जाता है । वैखानस, मोदुम्बर, बालखिल्य ओर फेनप भेदसे वानप्रस्थ चार प्रकारका है । ग्रामके बाहर विना जोते औषधियोंसे अग्नि-
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७५८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ४ ह्युपवसन्त्यरण्ये ' ( मुण्ड ० १ | २ | ११ ) इति च देवयानोपदेशो नाश्रमान्तरोपदेशः । संदिग्धं चाश्रमान्तराभिधानम् - ' तप एव द्वितीयः ' ( छा ० २२ | ३ | १ ) इत्येवमादिषु । तथा ' एतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति ' ( बृह ० ४।४।२२ ) इति लोकसंस्तवोऽयं न पारिव्राज्य विधिः । ननु ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेदिति विस्पष्टमिदं प्रत्यक्षं पारिव्राज्यविधानं जाबालानाम् । सत्य-मेवमेतत्, अनपेक्ष्य त्वेतां श्रुतिमयं विचार इति द्रष्टव्यम् ॥ १८ ॥
अनुष्ठेयं बादरायणः साम्यश्रुतेः ॥ १ ९ ॥ पदच्छेद - अनुष्ठेयम्, बादरायणः, साम्यश्रुतेः । सूत्रार्थ - ( बादरायणः ) बादरायणका मत है कि ( अनुष्ठेयम् ) संन्यासाश्रम अनुष्ठेय है, ( साम्यश्रुतेः ) क्योंकि ' त्रयो धर्मस्कन्धाः ' इसप्रकार गृहस्थाश्रम के साथ संन्यासाश्रमकी भी समान परामशं श्रुति है । * अनुष्ठेयमाश्रमान्तरं बादरायण आचार्यो मन्यते, वेदे श्रवणात् । अग्निहोत्रादीनां चावश्यानुष्ठेयत्वात्तद्विरोधादनधिकृतानुष्ठेयमाश्रमान्तरमिति हीमां मर्ति निराकरोति, गार्हस्थ्यवदेवाश्रमान्तरमव्यनिच्छता प्रतिपत्तव्यमिति मन्यमानः । कुतः? साम्यश्रुतेः । समा हिं गार्हस्थ्येनाश्रमान्तरस्य परामर्शश्रुतिर्दृश्यते - ' त्रयो धर्मस्कन्धाः ' ( छा ० २।२३।१ ) इत्याद्या । यथेह श्रुत्यन्तरविहितमेव गार्हस्थ्यं परामृष्टमेवमाश्रमान्तरमपीति प्रतिपत्त-व्यम् । यथा च शास्त्रान्तरप्राप्तयोरेव निवीतप्राचीनावीतयोः परामर्श उपवीत विधिपरे प्रकार ' ये चेमेऽरण्ये ० ' ( जो ये अरण्यमें श्रद्धा और तपकी उपासना करते हैं ) ' तपः श्रद्धं ० ' ( जो तप और श्रद्धाका अरण्यमें रहकर सेवन करते हैं, ) यह देवयान मार्गका उपदेश है, आश्रमान्तरका उपदेश नहीं है 1 । और ' तप एव द्वितीय: ' ( तप ही द्वितीय धर्म है ) इत्यादि श्रुतियोंमें अन्य कामों का कथन संदिग्ध है । उसीप्रकार ' एतमेव ० ' ( उसी आत्मलोक के अभिलाषी परिव्राजक सब कर्मोका त्याग करते हैं ) यह आत्मलोककी स्तुति है पारिव्राज्य विधि नहीं है । परन्तु ' ब्रह्मचर्यादेव ' ( ब्रह्मचयं से ही संन्यास ग्रहण करे ) इसप्रकार जाबालोंमें यह स्पष्टरूपसे प्रत्यक्ष परिव्राज्यका विधान है । यह ठीक है । परन्तु इस श्रुतिकी अपेक्षा किये विना यह विचार है, ऐसा समझना चाहिए ॥ १८ ॥
सिद्धान्ती -- बादरायण आचार्यका मत है अन्य आश्रम अनुष्ठेय है, क्योंकि उसका वेदमें श्रवण है । अग्निहोत्र आदिके अवश्य अनुष्ठेय होनेसे उसके विरोधसे अन्य आश्रमकी इच्छा न करनेवालों को भी स्वीकार करना चाहिए, ऐसा माननेवाले आचार्य बादरायण निराकरण करते हैं । किससे? इससे किसाम्यश्रुति है । गार्हस्थ्य के साथ अन्य आश्रयकी भी ' त्रयो धर्मस्कन्धाः ' इत्यादि. समान परामर्शं श्रुति देखी जाती है । जैसे यहाँ अन्य श्रुति विहित ही गाहस्थ्यंका परामर्श किया गया है, वैसे ही अन्य श्रुतिमें विहित अन्य आश्रमका भी परामर्श किया गया है, ऐसा समझना चाहिए | जैसे अन्य शास्त्रसे ही प्राप्त निवीत और प्राचीनावीतका उपवीतविधि परक वाक्योंमें परा-सत्यानन्दी- दीपिका होत्र करनेवाला वैखानस, प्रातः उठकर जिस दिशाको देखे उसी दिशाके जोदुम्बर, बेर, निवार और सामासे कार्यं चलानेवाला औदम्बर, आठ मासतक उपार्जनकर चातुर्मासमें भोजन करे, कार्तिक पूर्णिमा संगृहीत पुष्प फलादिका त्यागी जटा वल्कलधारी बालखिल्य और गिरे फल पत्र आदि खाकर क्वचिद्वास-कर और कर्मपरायण वह फेनप कहा जाता है । कुटीचक, बहुदक, हंस और परमहंस भेदसे पर व्राजक चार प्रकारके हैं । उनमें स्वपुत्र के घरमें भिक्षा करते त्रिदण्डधारी वह कुटीचक, झोली, कमण्डलु, पवित्र, पादुका, आसन, शिखा, यज्ञोपवीत, कौपीन, कषायवस्त्रधारी, तीर्थोंमें भ्रमण करनेवाले, भिक्षावृत्तिसे रहकर आत्माभिलाषी त्रिदण्डी बहूदक है, शिक्षा त्यागकर यज्ञोपवीतधारी हाथ में झोली कमण्डलु ", ग्राम में एक रातवासी कृच्छ्र चान्द्रायण बादि व्रती एक दण्डधारी हंस
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अघि ० २ सू ० २० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ७५ ९ वाक्ये । तस्मात्तुल्यमनुष्ठेयत्वं गार्हस्थ्येनाश्रमान्तरस्य । तथा ' एतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति ' ( बृह ०४।४।२२ ) इत्यस्य वेदानुवचनादिभिः समभिव्याहारः । ' ये चेमेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युपासते ' ( छा ० ५।१०।१ ) इत्यस्य च पञ्चाग्निविद्यया । यत्तूक्तम् – ' तप एव द्वितीयः ' ( छा ० २।२३।१ ) इत्यादिष्वाश्रमान्तराभिधानं संदिग्धमिति, नैष दोषः, निश्चयकारणस-द्भावात् । ' त्रयो धर्मस्कन्धाः ' ( छा ० २।२३।१ ) इति हि धर्मस्कन्धत्रित्वं प्रतिज्ञातम् । नच यज्ञादयो भूयांसो धर्मा उत्पत्तिभिन्नाः सन्तोऽन्यत्राश्रमसंबन्धात्त्रित्वेऽन्तर्भावयितुं शक्यन्ते । तत्र यज्ञादिलिङ्गो गृहाश्रम एको धर्मस्कन्धो निर्दिष्टो ब्रह्मचारीति च स्पष्ट आश्रमनिर्देशस्तप इत्यपि कोऽन्यस्तपः प्रधानादाश्रमाद्धर्म स्कन्धोऽभ्युपगम्येत? ' ये चेमे s-रण्ये ' ( छा ० ५1१०1१ ) इति चारण्यलिङ्गाच्छ्रद्वातपोभ्यामाश्रमगृहीतिः । तस्मात्परामर्शे-ऽप्यनुष्ठेयमाश्रमान्तरम् ॥ १ ९ ॥ विधिर्वा धारणवत् ॥ २० ॥
पदच्छेद - विधिः, वा, धारणवत् । सूत्रार्थ - ( वा ) अथवा ( विधि: ) अन्य आश्रमकी विधि माननी चाहिए, ( धारणवत् ) जैसे ' अधस्तात् समिधम् ' इत्यादि श्रुतिमें समिध् धारणकी विधि है । मशं होता है । इसलिए अन्य आश्रमका गार्हस्थ्यके साथ अनुष्ठेयत्व समान है । उसीप्रकार ' एतमेव ० ' ( इस आत्मलोककी इच्छा करनेवाले संन्यासी सब कुछ त्यागकर चले जाते हैं ) इसका वेदके अनु-वचन आदिके साथ सहोच्चारण है । ' ये चेमेऽरण्ये ० ' ( ये जो कि वनमें श्रद्धा और तप इनकी उपा-सना करते हैं ) इसका पञ्चाग्निविद्या के साथ सहोच्चारण है । और यह जो कहा गया है कि ' तप एव द्वितीयः ' इत्यादिमें अन्य आश्रमका विधान संदिग्ध है । यह दोष नहीं है, क्योंकि निश्चय कारणका सद्भाव है । ' त्रयो धर्मस्कन्धाः ' इसप्रकार धर्मं स्कन्ध तीन हैं, ऐसी प्रतिज्ञा की गई है । बहुत - से यज्ञ आदि धर्मं उत्पत्तिविधि [ यजेत इत्यादि ] से भिन्न होते हुए आश्रम सम्बन्धसे अन्यत्र त्रिवमें अन्तर्भाव नहीं किये जा सकते । उनमें यज्ञादि - लिङ्गक गृहस्थाश्रम यह एक धर्मं स्कन्ध निर्दिष्ट है | ' ब्रह्मचारी ' इसप्रकार स्पष्ट आश्रमका निर्देश है, ' तपः ' यह भी तप प्रधान आश्रमसे कौन - सा दूसरा धर्मस्कन्ध स्वीकार किया जाता है । ' ये चेमेऽरण्ये ' इसमें अरण्यलिङ्गसे श्रद्धा और तपसे आश्रमका ज्ञान होता है । इसलिए परामर्शमें भी अन्य आश्रम अनुष्ठेय है ॥ १ ९ ॥ सत्यानन्दी - दीपिका एक दण्डधारी मुण्डित यज्ञोपवीत रहित सर्व कर्मत्यागी आत्मनिष्ठ परमहंस कहा जाता है । परन्तु ऊपर वर्णित पूर्वपक्ष संन्यासका अभाव होनेसे ज्ञानमें स्वतन्त्र मोक्षरूपफल की असिद्धि है और सिद्धान्तमें संन्यासाश्रम के सिद्ध होनेपर ज्ञानमें फलकी सिद्धि है ॥ १८ ॥
* जैसे अन्य श्रुतिमें विहित गार्हस्थ्यका ' त्रयो धर्म स्कन्धाः ' यहाँ परामरां ( अनुवाद ) किया गया है, वैसे ही यहाँ अन्य श्रं तिसे विहित अन्य आश्रमोंका भी परामर्श है । अनुवाद अन्यत्र विहित-का होता है । जैसे ' निवोतं मनुष्याणां प्राचीनावीतं पितॄणामुपवीतं देवानाम् ' ( निवीत मनुष्योंका, प्राचीनावीत पितरोंका और उपवीत देवोंका होता है ) इत्यादि वाक्यमें दैवकर्म में उपवीतका विधान है और उसकी स्तुति के लिए इन दोका अनुवाद है, क्योंकि मनुष्य सम्बन्धी क्रियामें निवीत- अर्ध देहका वस्त्रसे बन्धन प्राप्त है और पितृ - सम्बन्धी क्रियामें प्राचीनावीत मो अन्य विधिसे प्राप्त है । इस प्रकार ' यो धर्म स्कन्धाः ' यह वाक्य भले ' यज्ञोऽध्ययनं दानमिति ' इसप्रकार अन्य अर्थ परक हो, परन्तु इस वाक्यमें परामर्शसे अन्य आश्रमोंकी प्रतीतिका वारण नहीं किया जा सकता है । ' एतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति ' इत्यादि साक्षात् श्रुति पारिव्राज्य आश्रमका विधान करती है । वेदानुवचन आदि विधेयोंके साथ सहोच्चारण होनेसे पारिव्राज्य में भी विधेयता है । ' ये चेमे ० ' इत्यादि श्रुतिसे वानप्रस्थका विधान है, क्योंकि पञ्चाग्निविद्यारूप विधेयके साथ कथन होनेसे वानप्रस्थ मी विधेय है ।
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७६० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ४ * विधिर्वाऽयमाश्रमान्तरस्य, न परामर्शमात्रम् । ननु विधित्वाभ्युपगम एकवा-क्यताप्रतीतिरुपरुध्येत, प्रतीयते चात्रैकवाक्यता - पुण्यलोकफलास्त्रयो धर्मस्कन्धा ब्रह्म-संस्थता त्वमृतत्वफलेति । सत्यमेतत् सतीमपि त्वेकवाक्यताप्रतीतिं परित्यज्य विधि-रेवाभ्युपगन्तव्यः, अपूर्वत्वात् विध्यन्तरस्यादर्शनात् विस्पष्टाच्चाश्रमान्तरप्रत्ययाद्गुण-वादकल्पनयैकवाक्यत्वयोजनानुपपत्तेः । धारणवत् । यथा - अधस्तात्समिधं धारयन्ननुद्भवेदु-परि हि देवेभ्यो धारयति ' इत्यत्र सत्यामप्यधोधारणेनैकवाक्यताप्रतीतौ विधीयत एवोपरि-धारणम्, अपूर्वत्वात् । तथा चोक्तं शेषलक्षणे - ' विधिस्तु धारणेऽपूर्वत्वात् ' इति, तद्वदिहाप्या-श्रमपरामर्शश्रुतिर्विधिरेवेति कल्प्यते ॥ यदापि परामर्श एवायमाश्रमान्तराणाम्, तदापि ब्रह्मसंस्थता तावत्संस्तवसामर्थ्यादवश्यं विधेयाऽभ्युपगन्तव्या । सा च किं चतुर्ष्वन-मेषु यस्य कस्यचिदाहोस्वित्परिव्राजकस्यैवेति विवेक्तव्यम् । यदि च ब्रह्मचर्यान्तेष्वाश्र-अथवा यह अन्य आश्रमकी विधि है केवल अनुवाद नहीं है । परन्तु विधित्व स्वीकार करनेपर एकवाक्यता की प्रतीतिका बाध होगा और यहाँ तीन धर्मस्कन्ध पुण्यलोक फलवाले हैं और ब्रह्म-संस्थता अमृतत्व फलवाली है, इसप्रकार यहाँ एकवाक्यता प्रतीत होती है । यह ठीक है । सिद्धान्ती -. परन्तु यहाँ एकवाक्यता की प्रतीति होनेपर भी उसका परित्यागकर अपूर्व होनेसे विधि ही स्वीकार करनी चाहिए, क्योंकि इनकी अन्य विधि नहीं देखी जाती । कारण कि अन्य आश्रमोंका स्पष्ट ज्ञान होनेसे गुणवाद कल्पनासे एकवाक्यताकी योजना नहीं हो सकती । धारणके समान | जैसे ' अधस्तात्स-मिधम् ' ( सुवामें रखी हुई हविष्यके नीचे समिधाको धारणकर अनुद्रवण करे - आहवनीयाग्निके समीप जाय, क्योंकि उन देवताओंके लिए हविपूणं जुहूके ऊपर समिधाका धारण करता है ) इसमें नीचे धारणके साथ एकवाक्यता प्रतीत होनेपर भी अपूर्व होनेसे ऊपर धारणका विधान किया जाता है अर्थात् ऊपर धारणकी विधि मानी जाती है । जैसे कि ' विभिस्तु धारणेऽपूर्वत्वात् ' ( दैविक हविष्य में जुहूत्रवाके ऊपर समिधाका धारण अपूर्व. होनेसे विधि है ) इसप्रकार शेषलक्षणमे कहा गया है । वैसे ही यहाँ मी आश्रमकी परामशं श्रुति विधि ही है ऐसी कल्पना की जाती है । यद्यपि यह अन्य आश्रमोंका परामशं ही है, तो भी ब्रह्मसंस्थता स्तुतिकी सामथ्यसे विधेयरूपसे स्वीकार करनी चाहिए | और वह स्तुति क्या चार आश्रमोंमें चाहे जिस किसी आश्रमकी है अथवा परिव्राजककी ही है? इसका विवेचन करना चाहिए । यदि ब्रह्मचारी पर्यन्त अनुवाद किए जानेवाले आश्रमोंमें परिव्राजक सत्यानन्द - दीपिका इसलिए श्रुति की अन्यथा अनुपपत्ति होनेसे स्कन्धशब्दको आश्रमपरक मानना चाहिए । और ' स्वर्गकामो यजेत ' ' दद्यात् ' ' अध्येतव्यम् ' इत्यादि उत्पत्ति विधिसे भिन्न बहुत - से यज्ञ आदि धर्म हैं, उनका आश्रम सम्बन्धके विना ' त्रयो धर्म स्कन्धा: ' इसमें तीन संख्या में अन्तर्भाव नहीं हो सकता । इसलिए इनमें यज्ञादि लिङ्गवाला गृहस्थाश्रम एक धर्मस्कन्ध है | ' ब्रह्मचारीति द्वितीयः ' ' तपः ' इससे तप प्रधान तृतीय वानप्रस्थ आश्रमका ग्रहण है । इसप्रकार ' ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति ' यहाँ परिशेषसे ' ब्रह्मसंस्थ ' से संन्यासका ही ग्रहण होता है । पूर्वपक्षीने अन्य आश्रमके प्रतिषेधमें जो ' वीरहा वा एष ' यह श्रुति प्रमाण दिया है, वह भी गृहस्थाश्रम युक्त पुरुषके लिए है अर्थात् जो गृहस्थ अज्ञान अथवा प्रमाद आदिसे यज्ञीय अग्निको बुझा देता है वह देवोंका पुत्रघाती होता है, यह अभिप्राय है । इस श्रुति से अविरोध और परामर्श होने से ( संन्यासाश्रम ) का अनुष्ठान करना चाहिए ॥ १ ९ ॥ * ' त्रयो धर्मस्कन्धाः ' यह श्रुति अन्य आश्रमोंकी अनुवादक कही गई है विधि नहीं है । अब इसे अन्य आश्रमों में विधि कहते हैं अनुवादक नहीं है, क्योंकि इसमें लाघव है । पूर्वपक्षी - यदि ' यो धर्मस्कन्धाः ' इसको अन्याश्रमोंका विधि माने तो ' त्रयो ० ' और ' ब्रह्मसंस्थो ० ' इन दोनों की एक वाक्यताका बाध होगा, अतः इसको चारों आश्रमोंकी विधि मानना अयुक्त है । सिद्धान्ती - अन्य
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अधि ० २ सू ० २० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७६१ मेषु परामृश्यमानेषु परिवाजकोऽपि परामृष्टस्ततश्चतुर्णामप्याश्रमाणां परामृष्टत्वाविशेषा-दनाश्रमित्वानुपपत्तेश्च यः कश्चिच्चतुर्व्वाश्रमेषु ब्रह्मसंस्थो भविष्यति । अथ न परामृष्टस्ततः परिशिष्यमाणः परिव्रांडेव ब्रह्मसंस्थ इति सेत्स्यति । तत्र तपःशब्देन वैखानसग्राहिणा परा-मृष्टः परिव्राडपीति केचित् । तदयुक्तम्, नहि सत्यां गतौ वानप्रस्थविशेषणेन परिव्राजको ग्रहणमर्हति यथाऽत्र ब्रह्मचारिगृहमेधिनावसाधारणेनैव स्वेन स्वेन विशेषणेन विशेषि-तावेवं भिक्षुवैखानसावपीति युक्तम् । तपश्चासाधारणो धर्मो वानप्रस्थानाम्, कायक्लेश-प्रधानत्वात्, तपःशब्दस्य तत्र रूढः । भिक्षोस्तु धर्म इन्द्रियसंयमादिलक्षणो नैव तपःशब्दे-नाभिलप्यते । चतुष्वेन च प्रसिद्धा आश्रम स्त्रित्वेन परामृश्यन्त इत्यन्याय्यम् । अपि च भेद-व्यपदेशोऽत्र भवति - ' त्रय एते पुण्यलोकमाज एकोऽमृतत्वमाक् ' इति । पृथक्त्वे चैष भेदव्यपदे-शोवकल्पते । न ह्येवं भवति देवदत्तयज्ञदत्तौ मन्दप्रज्ञवान्यतरस्त्वनयोर्महाप्रज्ञ इति । भवति त्वेवं देवदत्तयज्ञदत्तो मन्दप्रज्ञौ, विष्णुमित्रस्तु महाप्रज्ञ इति । तस्मात्पूर्वे त्रय आश्रमिणः पुण्यलोकभाजः, परिशिष्यमाणः परिव्राडेवामृतत्वभाक् । कथं पुनर्ब्रह्मसंस्थशब्दो योगात्प्रवर्तमानः सर्वत्र संभवन्परिव्राजक एवावतिष्ठेत? रूढ्यभ्युपगमे चाश्रममात्राद-मृतत्वप्राप्तेर्ज्ञानानर्थक्यप्रसङ्ग इति । अत्रोच्यते - ब्रह्मसंस्थ इति हि ब्रह्मणि परिसमाप्तिर-नन्यव्यापारतारूपं तन्निष्ठत्वमभिधीयते । तच्च त्रयाणामाश्रमाणां न संभवति, स्वाश्रमविहि-मी परामृष्ट हो तो चारों आश्रमोंका भी समानरूपसे परामर्श हो जानेसे ओर अनाश्रमित्व [ अनाश्रमी न तिष्ठेत् ] की अनुपपत्ति होनेसे चारों आश्रमोंमें जो कोई ब्रह्मसंस्थ होगा । और यदि परिव्राजकका परामर्श न हो तो अवशिष्ट प्ररिव्राजक ही ब्रह्मसंस्य है, ऐसा सिद्ध होगा । उनमें वैखानसग्राही तपः शब्द से परिव्राजकका मो परामर्श होता है, ऐसा कुछ लोग कहते हैं । वह युक्त नहीं है, क्योंकि गतिके होनेपर वानप्रस्थ के विशेषणसे ( तपः शब्दसे ) परिव्राजकका ग्रहण नहीं हो सकता । जैसे यहाँ ब्रह्मचारी और गृहस्थो अपने - अपने आसाधारण विशेषणसे विशेषित होते हैं, वैसे भिक्षु और वानप्रस्थ मो विशेषित हों, यह युक्त है । तपः वानप्रस्थोंका असाधारण धर्म है, क्योंकि उनमें कायक्लेश प्रधान हैं । तपः शब्द कायक्लेश आदिमें रूढ है । परन्तु परिव्राजकका इन्द्रिय संयम आदि रूप घमं तपः शब्दसे नहीं कहा जाता । और चाररूपसे प्रसिद्ध आश्रमोंका तीनरूपसे अनुवाद अयुक्त है । और ' यन्त्र एते ० ' ( जहाँ ये तीन पुण्यलोकके भागी हैं और एक अमृतत्वका भागी है ) इस प्रकार यहाँ भेदका व्यपदेश भी है और ( वानप्रस्थ और परिव्राजक ) पृथक् होनेपर यह भेद व्यपदेश भी उपपन्न होता है । देवदत्त और यज्ञदत्त मन्दबुद्धि हैं किन्तु इन दोनोंमें से एक महाप्राज्ञ है, ऐसा कभी नहीं होता । परन्तु ऐसा तो होता है कि देवदत्त और यज्ञदत्त मन्दबुद्धि हैं पर विष्णुमित्र महाप्राज्ञ है । इसलिए पूर्वके तीन आश्रमी पुण्यलोकके मागी होते हैं और परिशिष्यमाण परिव्राजक ही अमृतत्वका मागी होता है । पू ० - किन्तु योगसे प्रवृत्त होता हुआ ब्रह्मसंस्थ शब्द सब आश्रमों में सम्भव होता हुआ फिर परिव्राजकमें ही क्यों अवस्थित हो? और रूढ़िके स्वीकार होनेपर केवल आश्रममात्रसे अमृतत्वकी प्राप्ति होनेसे ज्ञानमें अनर्थक प्रसङ्ग होगा? सि ० - इसपर कहते हैं- ' ब्रह्मसंस्थः ' इस शब्दसे ब्रह्ममें परि-सत्यानन्दी- दीपिका arrant किसी अन्य विधिसे पूर्व सिद्धि न होनेसे उनका अनुवाद भी सम्भव नहीं है । ' ब्रह्मसंस्थो ० ' इस वाक्यको स्तुति परक माननेसे लक्षणा दोष है, इसलिए एकवाक्यता प्रतीतिका त्यागकर अन्य आश्रमोंकी प्रथम किसी अन्य विधिसे सिद्धि न होनेके कारण उनकी विधि मानना युक्त है । जैसे ' धारणवत् ' यजमानकी मृत्यु होनेपर आहिताग्निमें अग्निहोत्र होमकर उस अग्निसे उसका दाह संस्कार किया जाता है, अतः उसे प्रेताग्निहोत्र कहते हैं । उसमें जुहूमें हविको मरकर हवन के लिए जब बाहवनीय अग्निके पास ले जाय, तब उस हविको ' अधस्तात्समिधम्, इससे विहित अधोधारणका
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III ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ४ तकर्माननुष्ठाने प्रत्यवायश्रवणात् परिव्राजकस्य तु सर्वकर्मसंन्यासात्प्रत्यवायो न संभव-त्यननुष्ठाननिमित्तः । शमदमादिस्तु तदीयो धर्मो ब्रह्मसंस्थताया उपोद्वलको न विरोधी । ब्रह्मनिष्ठत्वमेव हि तस्य शमदमाद्युपबृंहितं स्वाश्रमविहितं कर्म, यज्ञादीनि चेतरेषां तद्-व्यतिक्रमे च तस्य प्रत्यवायः । तथा च ' न्यास इति ब्रह्मा ब्रह्मा हि परः परो हि ब्रह्मा । तानि वा एतान्यवराणि तपांसि न्यास एवात्यरेचयत् ' ( नारा ० ), ' वेदान्तविज्ञान सुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगा-द्यतयः शुद्धसत्वाः ' ( मुण्ड ० ३।२।६, नारा ० १२/३, कैवल्य ० ३ ) इत्यद्याः श्रुतयः । स्मृतयश्च-‘ तत्बुद्ध्यस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ' ( गी ० ५।१७ ) इत्याद्या ब्रह्मसंस्थस्य कर्माभावं दर्श यन्ति । तस्मात्परिव्राजकस्याश्रममात्रादमृतत्वप्रातेर्ज्ञानानर्थक्यप्रसङ्ग इत्येषोऽपि दोषो नावतरति । तदेवं परामर्शेऽपी तरेषामाश्रमाणां पारिव्राज्यं तावद्द्ब्रह्मसंस्थतालक्षणं लभ्ये-तैव । अनपेक्ष्यैव जाबालश्रुतिमाश्रमान्तर विधायिनीमयमाचार्येण विचारः प्रवर्तितः । विद्यत एव त्वाश्रमान्तरविधिश्रुतिः प्रत्यक्षा- ' ब्रह्मचर्यं परिसमाप्य गृही भवेद्गृही भूत्वा वनी भवेद्वनी भूत्वा प्रव्रजेत् । यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद्गृहाद्वा वनाद्वा ' ( जाबा ० ४ ) इति । न चेयं श्रुतिरनधिकृतविषया शक्या वक्तुम्, अविशेषश्रवणात् । पृथग्विधानाच्चानधिकृत्तानाम् ' अथ पुनरेव व्रती वाव्रती वा स्नातकी वाऽस्नातको वोत्सन्नाग्निरनग्निको वा ' ( जाबा ० ४ ) इत्यादिना । समाप्ति - अनन्य व्यापारतारूप ब्रह्मनिष्ठत्व कहा है । वह तीनों आश्रमोंमें नहीं हो सकता, क्योंकि अपने आश्रम विहित कर्मानुष्ठान न होनेपर प्रत्यवायका श्रवण है । परन्तु परिव्राजकमें सब कर्मोंका संन्यास होनेसे कर्माननुष्ठान निमित्तक प्रत्यवाय पापका संभव नहीं है । शम, दम आदि तो उस परि-व्राजकका धर्म है वह ब्रह्मसंस्थताका पोषक है विरोधी नहीं है, क्योंकि शम, दम आदिसे सुदृढ ब्रह्म-निष्ठत्व ही उसका स्वाश्रम - विहित कर्म है और यज्ञ आदि अन्य आश्रमोंके कर्म हैं । स्वाश्रम विहित कर्मके उल्लङ्घन होनेपर उसको प्रत्यवाय होता है, क्योंकि ' न्यास इति ० ' ( यह संन्यास ब्रह्मा है, क्योंकि ब्रह्मा ही श्रुति स्मृतिमें श्रेष्ठ है, इसलिए ब्रह्मा- संन्यास ही श्रेष्ठ है, ये जो तप हैं वे अल्प हैं, संन्यास ही इन सबसे अधिक श्रेष्ठ है ) ' वेदान्तविज्ञान ० ' ( जिन्होंने वेदान्त जनित विज्ञानसे ज्ञेय अर्थका अच्छी तरह निश्चय कर लिया है वे संन्यासयोग से यत्न करनेवाले समस्त शुद्ध चित्त पुरुष ब्रह्मलोक में देह त्याग करते समय परम अमर मावको प्राप्त हो सब ओरसे मुक्त हो जाते हैं ) इत्यादि श्रुतियां और ' तबुद्धयः ० ' ( तद्रूप ' मैं ब्रह्म हूँ ' बुद्धिवाले, तद्रूप मनवाले, तत् निष्ठावाले और तत् परायण पुरुष परम गतिको प्राप्त होते हैं ) इत्यादि स्मृतियाँ ब्रह्मसंस्थ में कर्मका अभाव दिखलाती हैं । इससे परिव्राजकको शाश्रममात्र से मोक्षकी प्राप्ति होनेसे ज्ञान में अनर्थ प्रसङ्ग है यह दोष भी अवतरित नहीं होता, अपितु इस प्रकार अन्य अश्रमोंका परामर्श होनेपर ब्रह्मसंस्थतारूप पारिव्राज्य प्राप्त ही होना चाहिए । अन्य आश्रमका विधान करनेवाली जाबाल श्रुतिकी अपेक्षा किये विना ही आचार्य जैमिनिने यह विचार प्रवृत्त किया है । ' ब्रह्मचर्यं परिसमाप्य ० ' ( ब्रह्मचर्यं भली - भाँति समाप्त कर गृहस्थाश्रमी हो, गृहस्थ होकर वानप्रस्थ हो, वानप्रस्थ होकर परिव्राजक हो, अथवा इसके विपरीत ब्रह्मचयंसे, गृहस्थसे सत्यानन्दी - दीपिका स्तावक मानकर ' ऊपरि हि ' इस वाक्यकी एकवाक्यता हो सकती है, तो भी दैवहोम में जुहू दण्डके ऊपर समिधाके धारणमें ही अपूर्व होनेसे विधि है । इसप्रकार जैमिनि आचार्यने वाक्यभेद तृतीया-ध्यायमें कहा है । इसप्रकार यहाँ भी चारों आश्रमोंकी विधि है । अब तीन आश्रमोंका अनुवादकर पारिव्राज्य विधिमें ' यदापि ' इत्यादिसे अन्य पक्ष कहा जाता है । * क्या यह ' व्रह्मसंस्थः ' शब्द यौगिक है कि रूढि? इसको ' कथम् ' आदिसे कहते हैं । यद्यपि ' ब्रह्मसंस्थः ' शब्द संन्यासाश्रममें रूढ़ नहीं है, तो भी यौगिक अर्थसे उसी अर्थ की उपस्थिति करता है, क्योंकि अन्य आश्रमोंमें यौगिक अर्थका संभव नहीं है ॥ २० ॥
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अधि ० ३ सू ० २१ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७६३ ब्रह्मज्ञानपरिपाकाङ्गत्वाच्च पारिव्राज्यस्य नानधिकृतविषयत्वम् । तच्च दर्शयति- ' अथ परि-ब्राड्विवर्णवासा मुण्डोऽपरिग्रहः शुचिरद्रोही भैक्षाणो ब्रह्मभूयाय भवति ' ( जाबा ० ५ ) इति । तस्मा-त्सिद्धा ऊर्ध्वरेतसामाश्रमाः । सिद्धं चोर्ध्वरेतःसु विधानाद्विद्यायाः स्वातन्त्र्यमिति ॥ २० ॥
( ३ स्तुतिमात्राधिकरणम् । स् ० २१-२२ ) स्तुतिमात्रमुपादानादिति चेन्नापूर्वत्वात् ॥ २१ ॥
पदच्छेद - स्तुतिमात्रम्, उपादानात्, इति चेत्, न, अपूर्वत्वात् । सूत्रार्थ - उद्गीथ आदि उपासनाओंमें श्रूयमाण ' स एष रसानां ' इत्यादि श्रुतियाँ ( स्तुति-मात्रम् ) केवल स्तुतिमात्र हैं, ( उपादानात् ) क्योंकि उद्गीथ आदि कर्माङ्गोंका ग्रहण है, ( इति-चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है, ( अपूर्वत्वात् ) क्योंकि वे अपूर्व हैं, अतः उनका विधान है । * ‘ स एष रसानां रसतमः परम परार्ध्वोऽष्टमो यदुद्गीथः ' ( छा ० १ | १ | ३ ) ' इयमेवर्गग्निः साम ' ( छा ० १।६।१ ) ' अयं वाव लोक एषोऽग्निश्चितः । तदिदमेवोक्थमियमेव पृथिवी ' इत्येवंजा-तीयकाः श्रुतयः किमुद्गीथादे स्तुत्यर्था आहोस्विदुपासनाविध्यर्था इत्यस्मिन्संशये -स्तुत्यर्था इति युक्तम्, उद्गीथादीनि कर्माङ्गान्युपादाय श्रवणात् । यथा - ' इयमेव जुहूरा-दिव्य कूर्मः स्वर्गो लोक आहवनीयः ' इत्याद्या जुह्वादिस्तुत्यर्थास्तद्वदिति चेत्, नेत्याह, नहि स्तुतिमात्रमासां श्रुतीनां प्रयोजनं युक्तम्, अपूर्वत्वात् । विध्यर्थतायां पूर्वोऽर्थो विहितो भवति, स्तुत्यर्थतायां त्वानर्थक्यमेव स्यात् । विधायकस्य हि शब्दस्य वाक्यशेषभावं प्रतिपद्यमाना स्तुतिरुपयुज्यत इत्युक्तम्- ' विधिना त्वेकवाक्यत्वात्स्तुत्यर्थेन विधीनां स्युः ' इत्यत्र । प्रदेशान्तरविहितानां तूद्गीथादीनामियं प्रदेशान्तरपठिता स्तुतिर्वाक्यशेषभा अथवा वानप्रस्थसे ही परिव्राजक हो ) इस प्रकार अन्य - सन्यास आश्रमकी प्रत्यक्ष विधि श्रुति विद्यमान है । यह श्रुति अनधिकृत विषयक नहीं कही जा सकती, क्योंकि यह अविशेष श्रुटि है । ' अथ पुनरेव व्रती ० ' ( व्रतो अथवा अव्रती, स्नातक अथवा अस्नातक, उत्सन्नाग्नि - नष्ट हुई अग्निवाला विधुर वा अग्निरहित पुरुष संन्यास ग्रहण करे ) इत्यादिसे कर्मने अनधिकारियोंका पृथक् विधान है । और पारिव्राज्य ब्रह्म-ज्ञान परिपाक द्वारा ब्रह्म साक्षात्कारका अङ्ग होने से अनधिकृत विषयक नहीं है । उसे ' अथ परिव्राड् ' ( वर्णं रहित वस्त्रवाला, मुण्डी, परिग्रह रहित, पवित्र, द्रोह रहित, भिक्षा करनेवाला परिव्राजक ब्रह्म-साक्षात्कार के लिए समर्थं होता है ) यह श्रुति दिखलाती है । इसलिए ऊर्ध्वरेताओंके आश्रम सिद्ध हैं और विद्याका ऊर्ध्वरेताओंके लिए विधान होनेसे विद्यामें स्वातन्त्र्य सिद्ध है ॥ २० ॥
' स एष रसानां ० ' ( यह जो उद्गोथ संज्ञक ओंकार है वह सम्पूर्ण भूतादि रसोंमें रसतम, उत्कृष्ट, परमात्माका प्रतीक होनेसे परम परमात्मा के समान उपास्य होनेसे परमात्मा के स्थानके योग्य यह उद्गीथ पृथिवी आदि रसोंमें आठवाँ है ) ' इयमे वर्गग्निः ० ' ( यह पृथिवी ही ऋक् है और साम अग्नि है अर्थात् ऋमें पृथिवी दृष्टि और साममें अग्निदृष्टि करनी चाहिए ) ' अयं वाव लोकः ० ' ( यही लोक निश्चित यह अग्निचित है ) ' तदिदमेवोक्थ ० ' ( वह उक्थ यही है जो यह पृथिवी है ) इस प्रकारकी श्रुतियाँ क्या उद्गीथ आदिकी स्तुति के लिए हैं अथवा उपासनाविधिके लिए हैं? ऐसा संशय होने पर स्तुति के लिए हैं, यह युक्त है, क्योंकि उद्गीथ आदि कर्माङ्गोंको लेकर इनका श्रवण है । जैसे ' इयमेव ० ' ( यह पृथिवी जुहू है, आदित्य चयनस्थ कूर्म पुरोडाय है और स्वर्गलोक आहवनीय अग्नि है ) इत्यादि श्रुति जुहू आदिकी स्तुतिके लिए हैं, वैसे प्रकृत में भी । ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है, ऐसा [ सूत्रकार ] कहते हैं । इन श्रुतियोंका केवल स्तुतिमात्र प्रयोजन मानना युक्त नहीं है, क्योंकि सत्यानन्दी - दीपिका * पृथिवी, जल, ओषधि, पुरुष, वाक्, काक् और साम इन सात रसोंका आठवाँ उद्गीथका अवयव ओंकार परम रसतम है, क्योंकि वह परमात्माकी प्रतीक है । और पर ब्रह्म के अर्ध - स्थानको
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७६४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ४ घमप्रतिपद्यमानाऽनर्थिकैव स्यात् । इयमेव जुहूरित्यादि तु विधिसंनिधावेवाम्नातमिति वैषम्यम् । तस्माद्विध्यर्था एवैवंजातीयकाः श्रुतयः ॥ २१ ॥
भावशब्दाच्च ॥ २२ ॥
पदच्छेद - भावशब्दात्, च । सूत्रार्थ - और ' उद्गीथमुपासीत ' इत्यादि विधि वाक्योंके होनेसे ' स एष ' इत्यादि श्रुतिवाक्य विधि परक ही हैं । ' उदगीथमुपासीत ' ( छा ० १ | १ | १ ), ' सामोपासीत ' ( छा ० २।२1१ ) ' अहमुक्थमस्मीति विद्यात् ' इत्यादयश्च विधिशब्दाः श्रूयन्ते । ते च स्तुतिमात्रप्रयोजनतायां व्याहन्येरन् । तथा च न्यायविदां स्मरणम् -'कुयात्क्रियेत कर्तव्यं भवेत्स्यादिति पञ्चमम् । एतत्स्यात्सर्ववेदेषु नियतं विधिलक्षणम् ' इति, लिङाद्यर्थो विधिरिति मन्यमानास्त एवं स्मरन्ति । प्रतिप्रकरणं च फलानि श्राव्यन्ते - ' आपयिता ह वै कामानां भवति ' ( छा ० १।११७ ), ' एष ह्येव कामागान-स्येष्टे ' ( छा ० १।७।९ ), ' कल्पन्ते हास्मै लोका ऊर्ध्वाश्चावृत्ताश्च ' ( छा ० २ | २ | ३ ) इत्यादीनि | तस्मादप्युपासनविधानार्था उद्गीथादिश्रुतयः ॥ २२ ॥
( ४ पारिप्लवाधिकरणम् । सू ० २३-२४ ) पारिप्लवार्था इति चेन्न विशेषितत्वात् ॥ २३ ॥
पदच्छेद – पारिप्लावार्था:, इति चेत्, न, विशेषितत्वात् । सूत्रार्थ - ( पारिप्लवार्थाः ) ' अथ ह याज्ञवल्क्स्य द्वे मायें ' इत्यादि आख्यायिकाएँ पारिप्लव वे अपूर्व है । इन श्रुतियोंको विध्यर्थंक होनेपर अपूर्व अर्थका विधान होता है । इनको स्तुत्यर्थंक माननेपर तो अनर्थक ही होंगी, क्योंकि विध्यथंक शब्दके वाक्यशेषत्वको प्राप्त होनेवाली स्तुति उप-युक्त होती है, ऐसा ' विधिना त्वेकवाक्यत्वात् ० ' ( विधियोंके स्वावकरूपसे विधिवाक्योंके साथ एक वाक्यता होनेसे अर्थवाद वाक्योंकी सार्थकता होती है ) इस सूत्र में कहा गया है । परन्तु अन्य स्थलमें विहित उद्गीथ आदिकी अन्य प्रदेशमें पठित यह स्तुति वाक्यशेषत्वको नं प्राप्त होती हुई अनर्थक ही होगी । ' इयमेव जुहू: ० ' ( यह पृथिवी ही जुहू है ) इत्यादि तो विधिकी सन्निधिमें कहा गया है, यह वैलक्षण्य है । इसलिए इस प्रकारकी श्रुतियाँ विधिके लिए ही हैं ॥ २१ ॥
' उद्गीथमुपासीत ' ( उद्गीथकी उपासना करनी चाहिए ) ' सामोपासीत ' ( सामकी उपासना करनी चाहिए ) ' अहमुक्थमस्मीति विद्यात् ' ( मैं उक्थ हूँ, ऐसा ध्यान करे ) इत्यादि स्पष्टरूपसे विधि तियाँ सुनी जाती हैं, वे केवल स्तुति प्रयोजनवाली माननेपर बाधित होंगी । और ' कुर्यात् क्रियेत् ० ' ( कुर्यात् करे, क्रियेत - किया जाय, कर्तव्यम् - करना चाहिए, भवेत् - हो और पाँचवा स्यात् -हो, सब वेदोंमें यह निश्चित विधि लक्षण है ) इसप्रकार यह न्यायवेत्ताओंकी स्मृति है । लिङ् आदिका अर्थं विधि है ऐसा मानते हुए वे इसप्रकार स्मरण करते हैं, और प्रत्येक प्रकरणमें ' आपयिता ह बै ० ' ( जो विद्वान् आप्तिगुणविशिष्ट इस उद्गीथ अक्षरकी उपासना करता है, वह यजमानको सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करानेवाला होता है ) ' एष ह्येव ० ' ( क्योंकि यह उद्गाता कामना सम्बन्धी आगानके उद्गानसे उन कामनाओंको सम्पन्न करनेमें समर्थ होता है ) ' कल्पन्ते हास्मै ० ' ( उस उपासकके सत्यानन्दी - दीपिका पाता है, अत: ओंकार पराध्यं है अर्थात् परब्रह्मके समान उपास्य है । इन उद्धृत श्रुतियोंमें ओंकारके उपादान और अपूर्वार्थता होनेसे ' किम् ' इत्यादिसे संशय कहते हैं । इसपर ' न हि ' इत्यादिसे सिद्धान्त कहते हैं । पूर्वपक्षमें इनको स्तावक होनेसे अनुष्ठानका अभाव है, सिद्धान्तमें इनमें विधायक होने से अनुष्ठान है ॥ २१ ॥
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अधि ० ४ सू ० २३–२४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७६५ नामक कर्म अङ्ग हैं, ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है, ( विशेषित्वात् ) क्योंकि ' पारि-प्लवमाचक्षीत ' इसप्रकार श्रुतिमें विशेषित की गई हैं । * ‘ अथ ह याज्ञवल्क्यस्य द्वे मार्ये बभूवतुमैत्रेयी च कात्यायनी च ' ( बृह ० ४।५।१ ), ' प्रतर्दनो ह वै दैवोदासिरिन्द्रस्य प्रियं भ्रामोपजगाम ' ( कौषी ० ३ | १ ) ' जानश्रुतिर्ह पौत्रायणः श्रद्धा-देयो बहुदायी बहुपाक्य आस ' ( छा ० ४।१।१ ) इत्येवमादिषु वेदान्तपठितेष्वाख्यानेषु संशयः-किमिमानि पारिप्लवप्रयोगार्थान्या होस्वित्संनिहित विद्याप्रतिपत्त्यर्थानीति । पारिप्लवार्था इमा आख्यानश्रुतयः, आख्यानसामान्यात्, आख्यानप्रयोगस्य च पारिप्लवे चोदितत्वात् । ततश्च विद्याप्रधानत्वं वेदान्तानां न स्यात्, मन्त्रवत्प्रयोगशेषत्वादिति चेत् । तन्न, कस्मात्? विशेषितत्वात् । ' पारिप्लवमाचक्षीत ' इति हि प्रकृत्य ' मनुर्वैवस्वतो राजा ' इत्येवमादीनि कानि -चिदेवाख्यानानि तत्र विशेष्यन्ते । आख्यानसामान्याच्चेत्सर्वगृहीतिः स्यादनर्थकमेवेदं विशेषणं भवेत् । तस्मान्न पारिप्लवार्था एता आख्यानश्रुतयः ॥ २३ ॥
तथा चैकवाक्यतोपबन्धात् ॥ २४ ॥
पदच्छेद — तथा, च एकवाक्यतोपबन्धात् । प्रति ऊर्ध्व और अधोमुख लोक भोग्यरूपसे उपस्थित होते हैं ) इत्यादि फलोंका श्रवण कराया जाता है । उससे भी उद्गीथ आदि श्रुतियाँ उपासनाका विधान करने के लिए हैं ॥ २२ ॥
' अथ ह ० ' ( यह प्रसिद्ध है कि याज्ञवल्क्यको मैत्रेयी और कात्यायनी ये दो मार्याएँ थीं ) ' प्रतर्दनो ह ० ' ( दिवोदासका पुत्र प्रतर्दन इन्द्रके प्रिय स्थान स्वर्ग में गया ) ' जानश्रुतिः हि पौत्रायण: ० ' ( जन-श्रुतिकी सन्तान - परम्परा में उत्पन्न एवं उसके पुत्रका पौत्र श्रद्धापूर्वक देनेवाला एवं बहुत दान करनेवाला था और उसके यहाँ भोजनाथियोंके लिए बहुत - सा अन्न पकाया जाता था ) इत्यादि वेदान्त पठित आख्यानोंमें संशय होता है कि क्या ये आख्यान पारिप्लवके प्रयोगके लिए हैं अथवा सन्निहित विद्याकी प्रतिपत्ति के लिए हैं? ये आख्यानश्रुतियाँ पारिप्लवार्थक हैं, क्योंकि इनमें आख्यानत्व समान है । और आख्यानका प्रयोग पारिप्लवमें विहित है । उससे वेदान्तवाक्योंमें मन्त्रों ( देवस्य त्वा सवितुः ) के समान प्रयोगका शेष होनेसे विद्या प्रधानत्व नहीं है । सिद्धान्ती - ऐसा यदि कहो तो यह युक्त नहीं है, किससे? इससे कि विशेषित होनेसे । कारण कि ' पारिप्लवमाचक्षीत ० ' ( पारिप्लव कहे ) ऐसा उपक्रम कर ' मनुर्वैवस्वतो राजा ' ( विवस्वान्का पुत्र राजा मनु ) इत्यादि कितने ही वाख्यान श्रुति विशेषित किये जाते हैं । यदि आख्यानत्व समान धर्मसे सब वाख्यानोंका ज्ञान हो तो [ पारि-प्लवमाचक्षीत ] यह विशेषण निष्फल ही होगा । इसलिए ये आख्यानश्रुतियाँ पारिप्लवार्थक नहीं हैं ॥२३ ॥
सत्यानन्दी- दीपिका * अश्वमेध यागमें पुत्र बादि परिवार सहित राजाको रात में सम्मुख बैठाकर अध्वर्युं ' पारि-प्लवमाचक्षीत ' ( पारिप्लव- अनेक प्रकारके वैदिक उपाख्यान कहे ) इस प्रकार पारिप्लव नामक प्रयोगका विधान किया गया है । उसीप्रकार वेदान्तों में उक्त कथाएँ भी इन आख्यानोंके समान हैं और विद्या-का संविधान भी है, अतः ' किम् ' इत्यादिसे संशय होनेपर पूर्वपक्षी - ' पारिप्लवार्था: ' आदिसे कहते हैं । सिद्धान्ती – कथाएँ गुरु और शिष्य के समाचार प्रदर्शनसे बुद्धिमें सरलतासे बोधद्वारा संनिहित विद्याके अङ्ग हैं, अतः पारिप्लवार्थक नहीं हैं, क्योंकि सामथ्यंरूप लिङ्ग विद्यमान है, इससे विद्याका ही प्राधान्य है । अध्वर्युं प्रथम दिन में ' मनुर्वैवस्वतो राजा ' दूसरे दिन ' यमो बैवस्वत. ' तीसरे दिन ' वरुण आदित्यः ' इत्यादि आख्यायिका कहे । इसप्रकार वाक्यशेषमें विशेष आख्यायिकाओं कथन है । यद्यपि ' सर्वाण्याख्यानानि पारिप्लवे ' इस सर्वशब्दसे समस्त आख्यानोंका ग्रहण हो सकता है, तो मी ' पारि-प्लवमाचक्षीत ' इस विशेष के ग्रहणसे यह सिद्ध होता है कि आख्यान श्रतियाँ पारिप्लवार्थक नहीं हैं, किन्तु विद्याकी स्तुति के लिए हैं ॥ २३ ॥
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ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ५ पा ० ४ सूत्रार्थ - ( च ) और ( तथा ) वैसे ही ये आख्यायिकाएँ विद्याके लिए हैं, ( एकवाक्य-बन्धात् ) क्योंकि सन्निहित तत् तत् विद्या के साथ एकवाक्यताका उपबन्ध - उपपत्ति है । असति च पारिप्लवार्थत्वे आख्यानानां संनिहितविद्याप्रतिपादनोपयोगितैव न्याय्या, वाक्यतोपबन्धात् । तथा हि - तत्र तत्र संनिहिताभिर्विद्याभिरेकवाक्यता दृश्यते, चिनोपयोगात्प्रतिपत्तिसौकर्योपयोगाच्च । मैत्रेयीब्राह्मणे तावत् - - ' ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' ह ० ४ | ५ | ६ ) इत्याद्यया विद्ययैकवाक्यता दृश्यते । प्रातर्दनेऽपि ' प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा ' त्याद्यया । जानश्रुतिरित्यत्रापि ' वायुर्वाव संवर्ग: ' ( छा ० ४।३।१ ) इत्याद्यया । यथा ' स मनो वपामुदखिदत् ' इत्येवमादीनां कर्मश्रुतिगतानामाख्यानानां संनिहितविधिस्तुत्य-, तद्वत् । तस्मान्न पारिवार्थत्वम् ॥ २४ ॥
( ५ अग्नीन्धनाद्यधिकरणम् | सू ० २५ ) अत एव चाग्नीन्धनाद्यनपेक्षा ॥ २५ ॥
पदच्छेद - अतः, एव, च, अग्नीन्धनाद्यनपेक्षा । सूत्रार्थ - ( अतएव ) अतएव विद्या पुरुषार्थंका हेतु होनेसे ( अग्नीन्धनादि ) अग्नीन्धनं दे आश्रम कर्मोकी ( अनपेक्षा ) अपेक्षा नहीं करती । * ' पुरुषार्थोऽतः शब्दात् ' ( ब्रह्मसूत्र ३ | ४ | १ ) इत्येतद्व्यवहितमपि संभवादत इति मृश्यते । अत एव च विद्यायाः पुरुषार्थहेतुत्वादग्नीन्धनादीन्याश्रमकर्माणि विद्यया सिद्धौ नापेक्षितव्या नीत्याद्यस्यैवाधिकरणस्य फलमुपसंहरत्यधिकविवक्षया ॥ २५ ॥
आख्यानोंके पारिप्लवार्थक न होनेपर उनकी सन्निहित विद्या प्रतिपादनकी उपयोगिता हीं त है, क्योंकि एक वाक्यताका उपबन्ध - उपपत्ति है । कारण कि उसी प्रकार तत् चत् प्रदेशमें संनि-विद्याओंके साथ तत् तत् आख्यानोंकी, प्रीति उत्पन्न करनेके उपयोग से और ज्ञान सौकर्यके उप-से एकवाक्यता देखी जाती है । मैत्रेयीब्राह्मण में वो ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्य, ( हे मैत्रेयी! आत्माका दर्शन करना चाहिए ) इत्यादि विद्या के साथ आख्यानोंको एकवाक्यता देखी जाती है । { र्दन ब्राह्मण में भी ' प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा ' ( मैं प्रज्ञात्मा प्राण हूँ ) इत्यादि विद्या के साथ एकवाक्यता जाती है । और ' जानश्रुतिः ' यहाँ भी ' वायुर्वाव संवर्ग: ' ( वायु ही संवर्ग है ) इत्यादि विद्याके प एकवाक्यता देखनेमें आती है । जैसे ' स आत्म तो ० ' ( उस प्रजापतिने होम के लिए वपा हृदय के तरके मागका उद्धरण किया ) इत्यादि कमंश्रुति में स्थित आख्यान संनिहित विधिको स्तुति के लिए
वैसे ही प्रकरणमें समझना चाहिए । इससे ये व्याख्यान पारिप्लवार्थक नहीं हैं ॥ २४ ॥
' पुरुषार्थोऽतः शब्दात् ' ( इस औपनिषद् आत्मज्ञानसे पुरुषार्थ - मोक्ष होता है ) यद्यपि यह पार्थं अधिकरण व्यवहित- दूरस्थ है, तो भी सम्भव होनेसे सूत्रस्थ ' अतः ' शब्दसे उसका परामशं पा जाता है । अतएव - विद्याको मोक्षका हेतु होनेसे ही अग्नि, इन्धन आदि आश्रम कर्म विद्या अपने फलसिद्धि में अपेक्षितव्य नहीं हैं । इसप्रकार आद्य अधिकरण के फलका अधिक कहने की छासे उपसंहार करते हैं ॥ २५ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका * विद्या स्वतन्त्ररूप प्रमेयका तीन बधिकरणोंसे दृढीकरणकर आद्य अधिकरणका ' अतएवं ' दिसे फल कहते हैं । ब्रह्मविद्या मोक्षरूप अपने फलके संपादन में सहकारिरूपसे कर्मोकी अपेक्षा ती है कि नहीं? इसप्रकार संशय होनेपर ' तेनैति ब्रह्मवित्पुण्यकृत्तैजसः ' ( शुद्धान्तःकरणवाला रवि होकर आत्मज्ञानसे मोक्षको प्राप्त होता है ) इत्यादि श्र तिसे ज्ञान और कर्मके समुच्चयसे मोक्ष-प्ति वर्णित है, अतः ' पुरुषार्थोऽतः शब्दात् ' इत्यादिसे सिद्धान्त कहते हैं ॥ २५ ॥