श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 801–810

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 801–810

पृष्ठ 801

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अधि ० ६ सू ० २६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७६७ ( ६ सर्वापेक्षाधिकरणम् । सू ० २६-२७ ) सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत् ॥ २६ ॥

पदच्छेद - सर्वापेक्षा, च, यज्ञादिश्रुतेः, अश्ववत् । सूत्रार्थ - विद्या अपनी उत्पत्ति में ( सर्वापेक्षा ) सभी आश्रम कर्मों की अपेक्षा करती है, ( यज्ञादिश्रुतेः ) क्योंकि ' विविदिषन्ति यज्ञेन ' इत्यादि श्रुतिसे यज्ञ आदिमें ज्ञानोत्पत्तिहेतुता प्रतिपादित है । ( अश्वदत् ) जैसे अश्व योग्यतावश रथमें जोता जाता है हलमें नहीं, वैसे ही कर्म भी योग्यतावश ज्ञानोत्पत्ति में अपेक्षित है मोक्षमें नहीं । * इदमिदानीं चिन्त्यते - किं विद्याया अत्यन्तमेवानपेक्षाऽऽश्रमकर्मणामुतास्ति काचिदपेक्षेति । तत्रात एवाग्नीन्धनादीन्याश्रमकर्माणि विद्यया स्वार्थसिद्धौ नापेक्ष्यन्ते । एवमत्यन्तमेवानपेक्षायां प्राप्तायामिदमुच्यते - सर्वापेक्षा चेति । अपेक्षते च विद्या सर्वाण्या-श्रमकर्माणि नात्यन्तमनपेक्षैव । ननु विरुद्धमिदं वचनमपेक्षते चाश्रमकर्माणि विद्या नापेक्षते चेति । नेति ब्रूमः - उत्पन्ना हि विद्या फलसिद्धिं प्रति न किंचिदन्यदपेक्षते, उत्पत्ति प्रति त्वपेक्षते । कुतः? यज्ञादिश्रुतेः । तथा हि श्रुतिः - ' तमेतं वेदानुवचनेन ब्रह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन ' ( बृह ० ४ । ४ । २२ ) इति यज्ञादीनां विद्यासाधनभावं दर्शयति । विविदिषासंयोगाच्चैषामुत्पत्तिसाधनभावोऽवसीयते । ' अथ यद्यज्ञ इत्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत् ' ( छा ० ८।५।१ ) इत्यत्र च विद्यासाधनभूतस्य ब्रह्मचर्यस्य यज्ञादिभिः संस्त-वाद्यादीनामपि हि साधनभावः सूच्यते । ' सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीमि ' ( कठ ० २।१५ ) इत्येवमाद्या अब यह विचार किया जाता है कि क्या विद्याको आश्रमविहित कर्मोकी बिल्कुल अपेक्षा नहीं है अथवा कुछ अपेक्षा है? उसमें अतएव अग्नीन्धन - यज्ञादि आश्रम कर्मोंकी विद्याको अपने फल-सिद्धिमें अपेक्षा नहीं है, इसप्रकार अत्यन्त अनपेक्षा प्राप्त होनेपर यह कहते हैं - ' सर्वापेक्षा च ' विद्या सर्व आश्रमकर्मोकी अपेक्षा करती है उसे अत्यन्त अनपेक्षा नहीं है । परन्तु यह तो विरुद्ध वचन है कि विद्या आश्रम कर्मोंकी अपेक्षा करती है और अपेक्षा नहीं करती? विरुद्ध नहीं है, ऐसा हम कहते हैं — क्योंकि उत्पन्न हुई विद्या फलसिद्धि के लिए किसी अन्यको अपेक्षा नहीं करती, किन्तु अपनी उत्पत्तिके लिए तो अपेक्षा करती है, किससे? इससे कि इसमें यज्ञादि श्रुति है । जैसे कि ' तमेतं वेदानुवचनेन ० ' ( उस आत्माको ब्राह्मण यज्ञ, दान और निष्काम ठपके द्वारा जाननेको इच्छा करें ) यह श्रुति यज्ञ आदिको विद्या के साधनरूपसे दिखलाती है और विविदिषाके सम्बन्धसे इन यज्ञादिमें विद्या-की उत्पत्ति के प्रति साधनत्व निश्चित किया जाता है । ' अथ यद्यज्ञ ० ' ( अब लोकमें जिसे ' यज्ञ ' परम पुरुषार्थंका साधन कहते हैं वह ब्रह्मचर्यं ही है ) इसमें विद्याके साधनभूत ब्रह्मचर्यकी यज्ञ आदि द्वारा स्तुति होनेसे यज्ञ आदि भी विद्याके लिए साधन हैं ऐसा सूचित होता है । ' सर्वे वेदा ० ' ( सब वेद जिस पदका वर्णन करते हैं, समस्त तपोंको जिसकी प्राप्ति के लिये कहते हैं, जिसकी इच्छासे [ मुमुक्षु-जन ] ब्रह्मचयंका पालन करते हैं । उस पदको मैं तुमसे संक्षेपसे कहता हूँ ) इत्यादि श्रुति आश्रम सत्यानन्दी - दीपिका ** यद्यपि विद्याको अपने फलके संपादनमें कर्मोकी अपेक्षा नहीं है, तो भी उसे अपनी उत्पत्ति में आश्रम कर्मोंको अपेक्षा है । जैसे- ' ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षयात्पापस्य कर्मणः । कषाये कर्मभिः पक्के ततो ज्ञानं प्रवर्तते ॥ ' ( पाप कर्मके क्षय होनेसे पुरुषोंको ज्ञान्न उत्पन्न होता है और कर्मोंसे पापके नष्ट होनेपर ज्ञान प्रवृत्त होता है ) इत्यादि स्मृति और ' अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते '

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७६८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ४ च श्रुतिराश्रमकर्मणां विद्यासाधनभावं सूचयति । स्मृतिरपि - ' कषायपक्तिः कर्माणि ज्ञानं तु परमा गतिः । कषाये कर्मभिः पक्वे ततो ज्ञानं प्रवर्तते ' इत्येवमाद्या । अश्ववदिति योग्यतानि-दर्शनम् । यथा व योग्यतावशेनाश्वो न लाङ्गलाकर्षणे युज्यते, रथचर्यायां तु युज्यते । एवमाश्रमकर्माणि विद्यया फलसिद्धौ नापेक्ष्यन्ते, उत्पत्तौ चापेक्ष्यन्त इति ॥२६ ॥

शमदमाद्युपेतः स्यात्तथापि तु तद्विधेस्तदङ्गतया तेषामवश्यानुष्ठेयत्वात् ॥ २७ ॥

पदच्छेद- शमदमाद्युपेतः स्यात्, तथापि, तु, तद्विधेः, तदङ्गतया, तेषाम् अवश्यानुष्ठेयत्वात् । सूत्रार्थ -- यद्यपि ' विविदिषन्ति ' इत्यादिमें वर्तमान कालका प्रयोग होनेसे विधि नहीं है, ( तथापि ) तो मी ब्रह्मविद्या के अभिलाषीको ( शमदमाद्युपेतः स्यात् ) राम दम आदिसे युक्त होना चाहिए, क्योंकि ( तदङ्गतया ) विद्याके अङ्गरूपसे ( तद्विधेः ) ' तस्मादेवंवित् ० ' इत्यादि श्रुतिसे ( तेषाम् ) राम आदिका विधान है और विहित होनेके कारण ( अवश्यानुष्ठेयत्वात् ) वे अवश्य अनुष्ठेय हैं । * यदि कश्चिन्मन्येत - यज्ञादीनां विद्यासाधनभावो न न्याय्यः, विध्यभावात् । ' यज्ञेन विविदिषन्ति ' इत्येवंजातीयका हि श्रुतिरनुवादस्वरूपा विद्याभिष्टवपरा, न यज्ञादि-विधिपरा -- इत्थं महाभागा विद्या यद्यज्ञादिभिरेतामवाप्तुमिच्छन्तीति । तथापि तु शमदमाद्युपेतः स्याद्विद्यार्थी, ' तस्मादेवंविच्छान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षु समाहितो भूत्वात्मन्ये-वास्मानं पश्यति ' ( बृह ० ४ । ४ । २१ ) इति विद्यासाधनत्वेन शमदमादीनां विधानाद्विहि-तानां चावश्यानुष्ठेयत्वात् । नन्वत्रापि शमाद्युपेतो भूत्वा पश्यतीति वर्तमानापदेश कर्मों में विद्या प्रति साधनभाव सूचित करती है । और ' कषायपक्तिः ० ' ( कर्म- राग द्वेष आदि पापकी निवृत्ति करनेवाले हैं, ज्ञान तो परम गति - मोक्षका साधन है । कर्मोंसे पापका नाश होनेपर तदनन्तर ज्ञान प्रवृत्त होता है ) इत्यादि स्मृति भी है । ' अश्वके समान ' यह योग्यता विषयक दृष्टान्त है 1 । जैसे योग्यतावश अश्व हल खींचने में नियुक्त नहीं किया जाता है, किन्तु रथ खींचने में तो नियुक्त किया जाता है, वैसे आश्रमक विद्यासे फलसिद्धि में अपेक्षित नहीं, किन्तु उसकी उत्पत्ति में तो अपेक्षित हैं || २६ || यदि कोई ऐसा माने कि यज्ञ आदिमें विद्याके प्रति साधनभाव उचित नहीं है, क्योंकि विधिका अभाव है । ' यज्ञेन विविदिषन्ति ' ( यज्ञद्वारा जाननेकी इच्छा करें ) इस प्रकारकी श्रुति अनुवादरूप है, अतः वह विद्याकी स्तुति परक है यज्ञादि विधि परक नहीं है । यह ऐसी महाभागा विद्या है कि मुमुक्षुलोग उसे यज्ञ आदिसे प्राप्त करना चाहते हैं । यद्यपि ऐसा है, तथापि ब्रह्मविद्यार्थीको राम दम आदिसे युक्त होना चाहिये, क्योंकि ' तस्मादेवंविच्छान्तो ० ' ( अतः इस प्रकार जाननेवाला शान्त, दान्त, उपरत, तितिक्षु और समाहित होकर आत्मामें कार्यकरणसंघातमें हो आत्माको देखता है ) इस प्रकार शम, दम आदिका विद्याके प्रति साधनरूपसे विधान है और विहित होने से शम, दम आदि अवश्य अनुष्ठेय हैं । परन्तु यहाँ पर भी ' शम आदि युक्त होकर अनुभव करता है ' ' पश्यति ' यह वर्तमानकालका प्रयोग उपलब्ध होता है विधि उपलब्ध नहीं होती । हम कहते हैं कि ऐसा नहीं, क्योंकि ' तस्मात् ० ' इस श्रुतिस्थ पदसे प्रकृत ( ब्रह्मविद्या ) की प्रशंसा ग्रहण किये जानेसे यह विधि सत्यानन्दी - दीपिका ( अविद्या - कसे मृत्यु - पापका अतिक्रमणकर ज्ञानसे अमृतत्व मोक्षको प्राप्त होता है ) इत्यादि श्रुति कमसे पापकी निवृत्ति होनेपर ज्ञानसे मोक्षका प्रतिपादन करती है । पूर्वपक्ष में विद्याके लिये कर्मोंके अनुष्ठानकी असिद्धि फल है और सिद्धान्तमें कर्मानुष्ठानकी सिद्धि फल है ॥ २६ ॥

# इस प्रकार विद्याकी उत्पत्ति में बहिरङ्ग कर्मों का वर्णन कर अब अन्तरङ्ग साघनोंका ' राम ' वादिसे प्रतिपादन करते हैं ।

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अधि ० ६ सू ० २७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७६ ९. उपलभ्यते न विधिः, नेति ब्रूमः तस्मादिति प्रकृतप्रशंसापरिग्रहाद्विधित्वप्रतीतेः । पश्ये-दिति च माध्यंदिना विस्पष्टमेव विधिमधीयते । तस्माद्यज्ञाद्यनपेक्षायामपि शमादीन्य-पेक्षितव्यानि । यज्ञादीन्यपि त्वपेक्षितव्यानीति यज्ञादिश्रुतेरेव । * ननूक्तं- यज्ञादिभिर्वि विदिषन्तीत्यत्र न विधिरुपलभ्यत इति - सत्यमुक्तम्, तथापि त्वपूर्वत्वात्संयोगस्य विधिः परिकल्प्यते । न ह्ययं यज्ञादीनां विविदषासंयोगः पूर्व प्राप्तो येनानूद्येत । ' तस्मात्पूषा प्रपिष्टभागोऽदन्तको हि ' इत्येवमादिषु चाश्रुतविधिकेष्वपि वाक्येष्वपूर्वत्वाद्विधि परिकल्प्य पौष्णं पेषणं विकृतौ प्रतीयेतेत्यादिविचारः प्रथमे तन्त्रे प्रवर्तितः । तथा चोक्तम् ' विधिर्वा धारणवत् ' ( ब्रह्मसूत्र ३।४।२० ) इति । स्मृतिष्वपि भगवद्गीताद्यास्वनभिसंधाय फलमनु-ष्ठितानि यज्ञादीनि मुमुक्षोर्ज्ञानसाधनानि भवन्तीति प्रपञ्चितम् । तस्माद्यज्ञादीनि शमद-मादीनि च यथाश्रमं सर्वाण्येवाश्रमकर्माणि विद्योत्पत्तावपेक्षितव्यानि । तत्राप्येवंविदिति विद्यासंयोगात्प्रत्यासन्नानि विद्यासाधनानि शमादीनि " विविदिषासंयोगात्तु बाह्यतराणि यज्ञादीनीति विवेक्तव्यम् ॥ २७ ॥

प्रतीत होती है I । और माध्यन्दिन शाखावाले तो ' पश्येत् ' इस प्रकार स्पष्टरूपयेही विधिका अध्ययन करते हैं | इससे यज्ञ आदिकी अपेक्षा न होनेपर भी राम आदिकी अपेक्षा होनी चाहिए । यज्ञ आदिकी घी तो अपेक्षा होनी चाहिए, क्योंकि यश आदि श्रुति है । परन्तु यह कहा गया है कि ' यज्ञादिसे जाननेकी इच्छा करते हैं ' इसमें विधि उपलब्ध नहीं होती । ठीक, कहा गया है, तथापि संयोग - सम्बन्धके अपूर्व होनेसे विधिक कल्पनाकी जाती है, क्योंकि यज्ञ आदिका विविदिषाके साथ यह सम्बन्ध पहले किसी अन्य प्रमाणसे प्राप्त नहीं है, जिससे उसका अनुवाद माना जाय । ' तस्मात्पूषा ० ' ( इससे पूषा देवताके उद्देश्यसे मली - भाँति पिष्ट भाग करना चाहिए, क्योंकि वह दान्तोंसे रहित है ) इत्यादि अश्रुत विधि वाक्यों में पूर्व होनेसे विधिको कल्पनाकर पूषा सम्बन्धी पेषण - पिष्ट भाग विकृति यागमें जानना चाहिए, [ कारण कि प्रकृतिमें उसका विधान नहीं है ] इत्यादि विचार पूर्वमीमांसा शास्त्रमें प्रवृत्त किया गया है । और उसी प्रकार ' विधिर्वा धारणवत् ' इस सूत्र में सूत्रकारने कहा है । भगवद्गीता आदि स्मृतियोंमें मी फलके अनुसंधानके विना अनुष्ठित यज्ञ आदि कर्म मुमुक्षुके लिए ज्ञानके साधन होते हैं, ऐसा विस्तारसे कहा गया है । इसलिए आश्रमके अनुसार यज्ञादि और राम, दम आदि सब आश्रमकर्म विद्याकी उत्पत्तिमें अपेक्षितव्य हैं । उसमें भी ' एवंत्रित् ' ( ऐसा जाननेवाला ) इस प्रकार विद्या के साथ सम्बन्ध होनेसे राम आदि विद्या के अन्तरङ्ग साधन हैं, और ' विविदिषा ' के सम्बन्धसे यज्ञ आदि कर्म और मी बहिरङ्ग साधन हैं, ऐसा भेद समझना चाहिए ॥ २७ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका * दर्शपूर्णमासके प्रकरण में ' पूषाप्रपिष्टभागः ' ऐसा सुना जाता है । परन्तु उसमें पूषा देवता अथवा पिष्टभाग नहीं सुना जाता है । उसका ' पौष्णं पेषणं विकृतौ प्रतीयेता चोदनात्प्रकृतौ ' ( पूषा सम्बन्धी पिष्टभाग विकृतियाग में जानना चाहिए, क्योंकि प्रकृति यागमें विधि नहीं है ) इस सूत्रमें विचार किया गया है । ' प्रकृतिवद्विकृतिः कर्तव्य ' ( प्रकृतियागके समान विकृतियाग करना चाहिए ) जैसे यहाँ प्रकरणके बल से प्रकृतियागमें विधिकी कल्पना की जाती है, वैसे विद्याके प्रकरणसे यज्ञ आदिमें भी विधिक कल्पनाकी जा सकती है । किञ्च ' स्वकर्मणा तमभ्यच्यं सिद्धिं विन्दति मानवः ' ( भगवद्गीता ० १८/४६ ) ( अपने अपने आश्रम कर्मोसे उस ईश्वरकी आराधनाकर मानव ज्ञान निष्ठा रूप सिद्धिको प्राप्त होता है ) इत्यादि स्मृति मी प्रमाण है । दृष्ट चित्तविक्षेपके निराकरणद्वारा राम आदि ज्ञानार्थक हैं, अतः उनकी अनुवृत्ति होती है, परन्तु कर्मों की नहीं, क्योंकि वे अदृष्टद्वारा ज्ञानके लिए हैं । इसलिए राम आदि अन्तरङ्ग साधन हैं और यज्ञ आदि कर्म बहिरङ्ग साधन हैं || २७ ||

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७७० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ४ ( ७ सर्वान्नानुमत्याधिकरणम् । सू ० २८-३१ ) सर्वान्नानुमतिश्च प्राणात्यये तद्दर्शनात् ॥ २८ ॥

पदच्छेद -- सर्वान्नानुमतिः 1 च प्राणात्यये तद्दर्शनात् । सूत्रार्थ - ( प्राणात्यये ) ' न ह वाऽस्य ' इत्यादिसे प्राण निर्गमन काल में ( सर्वान्नानुमतिः ) सर्वान्न क्षणी अनुज्ञा है, ( तद्दर्शनात् ) क्योंकि उसको ' मटचीहतेषु कुरुषु ' इत्यादि श्रुतिमें देखा जाता है । प्राणसंवादे श्रूयते छन्दोगानाम्- ' न ह वा एवंविदि किंचनानन्नं भवति ' ( छा ० ५।२।५ ) इति । तथा वाजसनेयिनाम्- ' न ह वा अस्थानन्नं जग्धं मवति नानन्नं प्रतिगृहीतम् ' ( बृह ६।१।१४ ) इति । सर्वमस्यादनीयमेव भवतीत्यर्थः । किमिदं सर्वान्नानुज्ञानं शमादिवद्विद्याङ्ग विधीयते, उत स्तुत्यर्थं संकीर्त्यत इति संशये - विधिरिति तावत्प्राप्तम् । तथा हि-प्रवृत्तिविशेषकर उपदेशो भवति, अतः प्राणविद्या संनिधानात्तदङ्गत्वेनेयं नियमनिवृत्ति-रुपदिश्यते । नन्वेवं सति भक्ष्याभक्ष्यविभागशास्त्रव्याघातः स्यात् - नैष दोष:, सामान्य-विशेषभावाद्वाधोपपत्तेः । यथा प्राणिहिंसाप्रतिषेधस्य पशुसंज्ञपनविधिना बाधः । यथा च ' न कांचन स्त्रियं परिहरेत्तद्व्रतम् ' ( छा ० २।१३।२ ) इत्यनेन वामदेव्यविद्याविषयेण सर्वस्त्र्यपरि-हारवचनेन तत्सामान्यविषयं गम्यागम्यविभागशास्त्रं बाध्यते । एवमनेनापि प्राणविद्या-विषयेण सर्वानभक्षणवचनेन भक्ष्याभक्ष्य विभागशास्त्रं बाध्येतेति । * एवं प्राप्ते ब्रूमः - नेदं छन्दोगों के प्राण संवादमें ' न ह वा एवंविदि ० ' ( यथोक्त प्राणके जाननेवालेको जो यह जानता है कि मैं सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित सारे अन्नोंका भोक्ता प्राण हूँ, कुछ भी अनन्न - अमक्ष्य नहीं है ) ऐसी श्रुति है । इसीप्रकार वाजसनेयियोंके प्राणसंवादमें ' न ह वाऽस्य ० ' ( जो इसप्रकार प्राण के अन्नको जानता है उसके द्वारा अभक्ष्य भक्षण नहीं होता और अभक्ष्यका प्रतिग्रह- संग्रह भी नहीं होता ) ऐसी श्रुति है । इसका सब अदनीय ( भक्षणीय ) होता ही है, ऐसा अर्थ है । क्या यह सर्वान्न भक्षणकी अनुज्ञा शम आदिके समान विद्याके अङ्गरूपसे विधानकी जाती है अथवा विद्याकी स्तुति के लिए इसका संकीर्तन किया जाता है । इसप्रकार संशय होनेपर पूर्वपक्षी - विधि है, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि विशेषप्रवृत्ति करनेवाला उपदेश होता है, अतः प्राणविद्याके संनिधानसे विद्या अङ्गरूपसे इस नियमनिवृत्तिका उपदेश किया जाता है । परन्तु ऐसा होनेपर भक्ष्य और अमक्ष्यका विभाग करने वाले शास्त्रका व्याघात होगा? यह दोष नहीं है, क्योंकि सामान्य और विशेष भावसे बाध उपपन्न होगा | जैसे यावत् प्राणिहिंसाप्रतिषेधक शास्त्रका पशुहिंसाबोधक विधि बाघ होता है, और जैसे ' न काञ्चन ० ' ( किसी स्त्रीका परित्याग नहीं करना चाहिए यह व्रत है ) इस वामदेव्यविद्या विषयक सर्वस्त्री अपरित्याग वचनसे उस सामान्य विषयक गम्य और अगम्य विभाग शास्त्रका बाघ होता है । इसप्रकार इस प्राणविद्या विषयक सर्वान्न भक्षण वचनसे मक्ष्य सत्यानन्दी -दीपिका * सिद्धान्ती - ' नेदम् ' इत्यादिसे सूत्रसे बाहर ही सिद्धान्त कहते हैं । यद्यपि ' यस्य पर्णमयी जुहूर्भवति ' यहाँ आगत्या विधिकी कल्पना की गई है, तो भी यहाँ प्रकरण में काल्पनिकी विघिकी मी कल्पना नहीं की जा सकती, क्योंकि ऐसा कोई विधायक शब्द नहीं है । विरोध होनेपर विशेष विधिसे सामान्य विधिका बाध होता है, परन्तु काल्पनिक विधिसे बाध नहीं होता । इसलिए ' एवंविदि ० ' इत्यादि प्राणविद्याकी प्रशंसाके लिए अर्थवाद है विधि नहीं । पूर्वपक्षमें भक्ष्याभक्ष्य नियमका त्यागकर सर्वान्न भक्षणको अनुज्ञा विद्याके अङ्गरूपसे विधि है, सिद्धान्त में सर्वान्न मक्षणकी अनुज्ञा प्राणविद्याकी स्तुति लिए है || २८ ॥

पृष्ठ 805

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अधि ० ७ सू ० २८-२९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७७१ सर्वान्नानुज्ञानं विधीयत इति । न हात्र विधायकः शब्द उपलभ्यते, ' न हवा एवंविदि किंच-नानन्नं भवति ' ( छा ० ५।२।१ ) इति वर्तमानापदेशात् । नचासत्यामपि विधिप्रतीतौ प्रवृत्तिवि-शेषकरत्व लोभेनैव विधिरभ्युपगन्तुं शक्यते । अपि च श्वादिमर्यादं प्राणस्यान्नमित्युक्त्वे-दमुच्यते ' नैवंविदः किंचिदनन्नं भवति ' इति । नच श्वादिमर्यादमन्नं मानुषेण देहेनोपभोक्तुं शक्यते । शक्यते तु प्राणस्यान्नमिदं सर्वमिति विचिन्तयितुम् । तस्मात्प्रागान्न विज्ञानप्र-शंसार्थोऽयमर्थवादो न सर्वान्नानुज्ञानविधिः । तद्दर्शयति ' सर्वान्नानुमतिश्च प्राणात्यये ' इति । एतदुक्तं भवति प्राणात्यय एव हि परस्यामापदि सर्वमन्नमदनीयत्वेनाभ्यनुज्ञायते, तद्दर्श-नात् । तथा हि - श्रुतिश्चाक्रायणस्यर्षेः कष्टायामवस्थायामभक्ष्यभक्षणे प्रवृत्ति दर्शयति-' मटचीहतेषु कुरुषु ' ( छा ० १1१०1१ ) इत्यस्मिन्ब्राह्मणे । चाक्रायणः किलर्षिरापद्गत इभ्येन सामिखादितान्कुल्माषांश्चखाद । अनुपानं तु तदीयमुच्छिष्टदोषात्प्रत्याचचक्षे । कारणं चात्रोवाच ' न वा भजीविष्यमिमानखादन् ( छा ० १ | १० | ४ ) इति, ' कामो म उदपानम् ( छा ० १ १०४ ) इति । पुनश्चोत्तरेद्युस्तानेव स्वपरोच्छिष्टान्पर्युषितान् कुल्माषान्भक्षयांबभूवेति । तदेतदुच्छिष्टच्छिष्ट पर्युषितभक्षणं दर्शयन्त्याः श्रुतेराशयातिशयो लक्ष्यते - प्राणात्ययप्र-सङ्गे प्राणसंधारणायाभक्ष्यमपि भक्षयितव्यमिति । स्वस्थावस्थायां तु तन्न कर्तव्यं विद्या-वतापीत्यनुपान प्रत्याख्यानाद्गम्यते । तस्मादर्थवादो ' न ह वा एवंविदि ' ( छा ० ५।२।१ ) इत्येवमादिः ॥ २८ ॥

अबाधाच्च ॥ २ ९ ॥ पदच्छेद - अबाधात् च । और अभक्ष्य विभाग शास्त्र बाधित होना चाहिए । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-यह सर्वान्न अनुज्ञाकी विधि नहीं को जाती, कारण कि यहाँ विधायक शब्द उपलब्ध नहीं होता, क्योंकि ' न ह वा ० ' ( प्राणोपासकके लिए कुछ मो अनन्न - अभक्ष्य नहीं है ) इसप्रकार वर्तमानका उपदेश है । और यहाँ विधिकी प्रतीति न होनेपर भी प्रवृत्ति विशेषकरत्वके लोभसे विधि स्वीकार नहीं की जा सकती । और श्वान आदि पर्यन्त प्राणका अन्न है ऐसा कहकर ' नैवंविदः ० ' ( ऐसा जाननेवाले प्राणोपासकका कुछ अमक्ष्य नहीं होता ) इसप्रकार कहा है । दवान आदि पर्यन्त अन्नका मनुष्य देहसे उपभोग नहीं किया जा सकता । परन्तु यह सब प्राणका अन्न है ऐसा चिन्तन - ध्यान किया जा सकता है । इसलिए प्राणान्नविज्ञानकी प्रशंसाके लिए यह अर्थवाद है किन्तु सर्वान्न मक्षणकी अनुज्ञा विधि नहीं है । उसे ' सर्वान्नानुमतिश्र प्राणात्यये ' इस सूत्र से दिखलाते हैं । तात्पर्यं यह है - प्राणनाथ होनेपर ही महती आपत्ति में सर्वान्न भक्षणीयरूपसे अनुज्ञा दी जाती है, क्योंकि उसका श्रुतिमें दर्शन है । जैसे कि ' मंटचीहतेषु कुरुषु ' ( शलमोंसे करुदेश के खेतस्थ अन्नों का नाश होनेपर ) इस ब्राह्मण में श्रुति चाक्रायण ऋषिकी कष्ट अवस्था में अभक्ष्य भक्षण में प्रवृत्ति दिखलाती है । इतिवृत्त ऐसा है कि आपद् ग्रस्त चाक्रायण ऋषिने हस्तिपालकके अधभुक्त उड़द खाये, अनन्तर जलपानका उच्छिष्ट दोषसे निषेध किया और उसमें कारण कहा – ' न वा अजीविष्यमिमानखादन् ' ( इन उड़दोंको खाये विना तो मैं जीवित नहीं रह सकता था ) और ( जलपान तो मुझे यथेच्छ मात्र में मिलता है ) और पुन: दूसरे दिन उसने अपने और वन्यके उच्छिष्ट तथा वासो उड़द खाये । इस उच्छिष्टोच्छिष्ट - परोच्छिर, स्वोच्छिष्ट और वासीका मक्षण दिखलाती हुई श्रुतिका ७ बाययातिशय लक्षित होता है कि प्राणनाशके प्रसंग होनेपर प्राण संधारणके लिए अभक्ष्य भी मक्षण के योग्य है । स्वस्थ अवस्थामें विद्वान्को भी ऐसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसा जलपानके प्रतिषेवसे अवगत होता है । इसलिए ' न ह वा एवंविदि ० ' इत्यादि अर्थवाद है ॥ २८ ॥

पृष्ठ 806

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III ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ४ सूत्रार्थ - मक्ष्य और अभक्ष्य विभाग शास्त्रका अबाध होनेसे भी ' न ह वा एवंविदि ' इत्यादि शास्त्र अर्थवादमात्र है । एवं च सत्याहारशुद्धी सत्वशुद्धिरित्येवमादि भक्ष्याभक्ष्यविभागशास्त्रमवाधितं भविष्यति ॥ २ ९ ॥ अपि च स्मर्यते ॥ ३० ॥

पदच्छेद - अपि च, स्मयं I सूत्रार्थ - ( अपि च ) और ' जीवितात्ययमापन्नो ' इत्यादि स्मृति भी आपत्ति कालमें विद्वान् और अविद्वान के लिए सर्वान्न मक्षणका प्रतिपादन करती है । अपि चापदि सर्वान्नभक्षणमपि स्मर्यते विदुषोऽविदुषश्चाविशेषेण - ' जीवितात्ययमा-पन्नो योऽन्नमत्ति यतस्ततः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ' इति । तथा ' मद्यं नित्यं ब्राह्मण: ', ' सुरापस्य ब्राह्मणस्योष्णा मासिंचेयुः ', ' सुरापाः कृमयो भवन्त्यमक्ष्यमक्षणात् ' इति च स्मर्यते वर्जनमन्नस्य ॥ ३० ॥

शब्दात कामकारे ॥ ३१ ॥

पदच्छेद - शब्दः, च, अतः, आकामकारे । सूत्रार्थ - ( अकामकारे ) स्वेच्छा प्राप्त प्रवृत्तिके निराकरण में ही ( शब्दः ) ' तस्माद्ब्राह्मणः ' इत्यादि श्रुति है, ( अतः ) अतएव प्राणविद् के लिए सर्वान्न मक्षणकी अनुज्ञा अर्थवादमात्र है । शब्दश्चानन्नस्य प्रतिषेधकः कामकारनिवृत्तिप्रयोजनः काठकानां संहितायां श्रूयते ' तस्माद्ब्राह्मणः सुरां न पिबेत् ' इति सोऽपि ' न ह वा एवंविदि ' ( छा ० ५/२/१ ) इत्यस्यार्थवाद -त्वादुपपन्नतरो भवति । तस्मादेवंज ( तीयका अर्थवादा न विधय इति ॥ ३१ ॥

( ८ आश्रमकर्माधिकरणम् । सू ० ३२-३५ ) विहितत्वाच्चाश्रमकर्मापि ॥ ३२ ॥

पदच्छेद - विहितत्वात्, च, आश्रमकर्म, अपि । सूत्रार्थ - तु शब्दार्थकच शब्द पूर्व = क्षकी निवृत्ति के लिए है, ( अपि ) आश्रममात्र निष्ठ ऐसा होनेपर - स्वस्थ अवस्थामें भक्ष्य और अमक्ष्यका भेद होनेपर ' अहारशुद्धौ सत्वशुद्धिः ' ' आहारके शुद्ध होनेपर सत्त्व अन्तःकरणकी शुद्धि होती है ' इत्यादि मक्ष्य, अमक्ष्य विभाग शास्त्र अबाधित होगा ॥ २ ९ ॥ और आपत्तिकालमें विद्वान् और अविद्वान् दोनोंके लिए समानरूपसे सर्वान्न मक्षणकी ' जीवितात्ययमापन्नो ० ' ( जीवन नाशको प्राप्त होनेवाला पुरुष जहाँ तहाँसे जो कुछ यन्न खाता है, वह अभक्ष्य भक्षण द्वारा उत्पन्न पापसे उस प्रकार लिप्त नहीं होता जैसे जलसे कमलपत्र लिप्त- गीला नहीं होता ) ऐसी स्मृति है । इसी प्रकार ' मद्यं नित्यं ब्राह्मण: ' ( ब्राह्मण नित्य सुराका त्याग करे ) और ' सुरापस्य ० ' ( सुरा पान करनेवाले ब्राह्मणके कण्ठ में अतितप्त सुरा डालनी चाहिए ) ' सुरापा ० ' ( अमक्ष्यका मक्षण करनेसे सुरा पान करनेवाले कृमि होते हैं ) इस प्रकार अमक्ष्य अन्नका स्मृतिमें प्रतिषेध किया गया है ॥ ३० ॥

यथेच्छ प्रवृत्तिकी निवृत्ति प्रयोजनवाली अमक्ष्य प्रतिषेधक ' तस्माद्ब्राह्मण: ' ( उससे ब्राह्मणको सुरापान नहीं करना चाहिए ) इत्यादि श्रुति काठकोंकी संहितामें सुनी जाती है । ' न ह वा एवंविदि ० ' ( इसमे अर्थवाद होनेसे उपपन्नतर होती है ) इसलिए इस प्रकारके श्रुति वाक्य अर्थवाद हैं, विधि नहीं ॥ ३१ ॥

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अधि ० ८ सू ० ३२-३३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७७३ · अमुमुक्षुको भी ( आश्रमकर्म ) नित्य कर्म करने चाहिए, ( विहितत्वात् ) क्योंकि ' यावज्जीवम् ' इत्यादि शास्त्रसे विहित हैं । * ' सर्वापेक्षा च ' ( ब्रह्मसूत्र ३।४।२६ ) इत्यत्राश्रमकर्मणां विद्यासाधनत्वमवधारि-तम्, इदानीं तु किममुमुक्षोरप्याश्रममात्रनिष्ठस्य विद्यामकामयमानस्य तान्यनुष्ठेयान्यु-ताहो नेति चिन्त्यते । तत्र ' तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति ' ( बृह ४।४।२२ ) इत्या-दिना आश्रमकर्मणां विद्यासाधनत्वेन विहितत्वाद्विद्यामनिच्छतः फलान्तरं कामयमानस्य नित्यान्यननुष्ठेयानि । अथ तस्याप्यनुष्ठेयानि न तषां विद्यासाधनत्वं नित्यानित्यसंयोग-विरोधादिति । अस्यां प्राप्तौ पठति - आश्रममात्रनिष्ठस्याप्यमुमुक्षोः कर्तव्यान्येव नित्यानि कर्माणि, ' यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहोति ' इत्यादिना विहितत्वात् । नहि वचनस्यातिभारो नाम कश्चिदस्ति ॥ ३२ ॥

अथ यदुक्तम्- नैवं सति विद्यासाधनत्वमेषां स्यादिति, अत उत्तरं पठति -सहकारित्वेन च ॥ ३३ ॥

पदच्छेद - सहकारित्वेन च । सूत्रार्थ - और विद्याको उत्पत्ति में सहकारिरूपसे यज्ञ आदि कर्म अनुष्टेव हैं, क्योंकि ' तमेतं ' वेदानुवचनेन ' इत्यादि श्रुतिसे विहित हैं । * विद्या सहकारीणि चैतानि स्युर्विहितत्वादेव ' तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदि षन्ति ' ( बृह ४।४।२२ ) इत्यादिना । तदुक्तम्- ' सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत् ' ( ब्रहसूत्र ३।४।२६ ) ' सर्वापेक्षा च ' इस सूत्र में आश्रमकमं विद्याके प्रति साधनरूपसे निश्चित किये गये हैं । अब आश्रममात्रनिष्ठ विद्याकी कामना न करनेवाले अमुमुक्षुको वे आश्रमकमं अनुष्ठेय हैं अथवा नहीं? यह विचार किया जाता है? पूर्वपक्षी - ऐसा सन्देह होनेपर ' तमेतं वेदानुवचनेन ० ' ( उस उपनिषद् गम्य पुरुषको ब्राह्मण वेदके नित्य स्वाध्यायसे जाननेकी इच्छा करें ) इत्यादि श्रुतिसे आश्रमकमं विद्या के साधनरूपसे विहित हैं, अतः विद्याको इच्छा न करनेवाले और अन्य फलकी कामना करनेवालेको नित्यकर्म अनुष्ठेय नहीं है । यदि उसके लिए मी नित्यकर्म अनुष्ठेव हों तो वे विद्याके साधन नहीं होंगे, क्योंकि नित्य और अनित्य के संयोगका विरोध है । सिद्धान्ती - इसके प्राप्त होनेपर कहते हैं —- आश्रम-मात्रनिष्ठ अमुमुक्षुको भी नित्यकर्म कर्तव्य हो हैं, क्योंकि ' यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहोति ' ( जीवन पर्यन्त नहोत्र होम करे ) इत्यादिसे विहित हैं, कारण कि वचनपर कोई अतिभार नहीं होता ॥ ३२ ॥

जो यह कहा गया है कि यदि आश्रम कर्म अमुमुक्षुको भी नित्यानुष्ठेय हैं, तो यज्ञ आदि विद्या साधन नहीं होंगे? इसका उत्तर कहते हैं-सिद्धान्ती - ये कर्म विद्याके सहकारी होने चाहिए, क्योंकि ' तमेतं वेदानुवचनेन ० ' इत्यादि श्रुति विहित हैं । यह ' सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत् ' इस सूत्र में कहा गया है । और ' आश्रमकर्म ' सत्यानन्दी - दीपिका सिद्धान्ती —– संयोगपृथकत्वन्याय से यह दोष नहीं है, क्योंकि ' खादिरो यूपो भवति ' ' खादिरं वीर्यकामस्य यूपं कुर्वीत ' इत्यादि स्थलोंमें वचनभेदसे नित्यत्व और काम्यत्व स्वीकृत हैं, वैसे ही प्रकरण में भी श्रुतिभेदसे दोनों प्रकारसे यज्ञादिका एक साथ सम्बन्ध अमीष्ट है, क्योंकि वचनको व्यवस्था करने में कुछ मार नहीं होता है । पूर्ववक्षमें यज्ञादि श्रुत्ति विद्याकी स्तुतिपरक है और सिद्धान्तमें उसका उमयथा अनुष्ठान है ॥ ३२ ॥

* ' दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत ' इस श्रुतिसे दर्शपूर्णमास याग विहित है, अतः उसे स्वर्गफल सिद्धिके लिए प्रयाज आदिकी अपेक्षा होती है । किन्तु ' मोक्षकामो विद्यामाप्नुयात् ' इस

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७७४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ४ इति । न चेदं विद्या सहकारित्ववचनमाश्रमकर्मणां प्रयाजादिवद्विद्याफलविषयं मन्तव्यम्, अविधिलक्षणत्वाद्विद्यायाः, असाध्यत्वाश्च विद्याफलस्य । विधिलक्षणं हि साधनं दर्शपूर्ण-मासादि स्वर्गफलसिषाधयिषया सहकारिसाधनान्तरमपेक्षते, नैवं विद्या । तथा चोक्तम्-' अत एव चाग्नीन्धनाद्यनपेक्षा ' ( ब्रह्मसूत्र ३ | ४ | २५ ) इति । तस्मादुत्पत्तिसाधनत्व एवैषां सहकारित्ववाचोयुक्तिः । न चात्र नित्यानित्यसंयोगविरोध आशङ्कयः, कर्मभेदेऽपि संयोगभेदात् । नित्यो ह्येकः संयोगो यावज्जीवादिवाक्यकल्पितो न तस्य विद्याफलत्वम् । अनित्यस्त्वपरः संयोगः ' तमेतं वेदानुवचनेन ' ( बृह ४।४।२२ ) इत्यादिवाक्यकल्पितस्तस्य विद्याफलत्वम् । यथैकस्यापि खादिरत्वस्य नित्येन संयोगेन कत्वर्थत्वमनित्येन संयोगेन पुरुषार्थत्वं तद्वत् ॥ ३३ ॥

सर्वथापित एवोभयलिङ्गात् ॥ ३४ ॥

पदच्छेद - सर्वथा, अपि ते • एव, उमयलिङ्गात् । सूत्रार्थ - ( ते एव ) यज्ञादि कर्म, ( सर्वथापि ) आश्रमत्यपक्ष में और विद्या सहकारित्व पक्ष में दोनों प्रकार से अनुष्ठेत्र हो हैं, ( उभयलिङ्गात् ) क्योंकि ' यज्ञेन विविदिषन्ति ' और ' अनाश्रितः कर्म-फलम् ' इत्यादि श्रुति और स्मृति दोनों लिङ्ग हैं । * सर्वथाप्याश्रमकर्मत्वपक्षे विद्यासहकारित्वपक्षे च त एवाग्निहोत्रादयो धर्मा अनु-ष्ठेयाः । त एवेत्यवधारयन्नाचार्यः किं निवर्तयति? कर्मभेदशङ्कामिति ब्रूमः । यथा कुण्डपा-यिनामयने ' मासमग्निहोत्रं जुह्वति ' इत्यत्र नित्यादग्निहोत्रात्कर्मान्तरमुपदिश्यते, नैवमिह कर्म-भेदोऽस्तीत्यर्थः । कुतः? उभयलिङ्गात् श्रुतिलिङ्गात्स्मृतिलिङ्गाच । श्रुतिलिङ्गं तावत्- ' तमेतं विद्या सहकारी हैं ' यह वचन प्रयाज आदिके समान विद्याफल विषयक है, ऐसा नहीं मानना चाहिए, क्योंकि विद्या विधिरूप नहीं है और विद्याका फल असाध्य है । जैसे विधिरूप दर्शपूर्णमास आदि साधन स्वरूप फलसिद्ध करनेको इच्छासे अन्य सहकारी सधानको अपेक्षा करता है; वैसे विद्या नहीं करती । उसीप्रकार ' अतएव चाग्नीन्धनाद्यनपेक्षा ' इस सूत्र में कहा गया है । इसलिए विद्याकी उत्पत्ति साधनत्वमें ही इन कर्मोंके सहकारीत्व वचनकी उपपत्ति होती है । और यहाँ नित्यानित्य संयोगके विरोधकी भी आशङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि कर्मके एक होनेपर भी संयोगभेद है । यावज्जी-वादि वाक्यसे कल्पित एक संयोग ( विधि ) नित्य है, उसका फल विद्या नहीं है । बौर ' तमेतं वेदानुवच-नेन ' इत्यादि वाक्यसे कल्पित दूसरा संयोग ( विधि ) अनित्य है उसका फल विद्या है । जैसे एक खादिर-में भी नित्यसंयोग से क्रत्वर्थत्व और अनित्यसंयोग से पुरुषार्थत्व है, वैसे ही यहां भी समझना चाहिए ॥ ३३ ॥

सर्वथा - नित्यत्व और काम्यत्व - आश्रम कर्मत्व पक्ष में और विद्यासहकारित्व पक्ष में वे अग्निहोत्र आदि कर्म अनुष्ठेय ही हैं । ' त एव - वे ही ' इसप्रकार अवधारण करते हुए आचार्य किसको निवृत्ति करते हैं? कर्मभेदको शङ्का निवृत्त करते हैं, ऐसा हम कहते हैं । जैसे कुण्डपायियोंके अथनमें ' मासमग्निहोत्रं ० ' ( वे एक मास पर्यन्त अग्निहोत्र होम करें ) इसमें नित्य अग्निहोत्रसे अन्य कर्मका सत्यानन्दी - दीपिका प्रकार विद्याको विधि नहीं है । और समान बलवाली ' यावज्जीव ' बौर ' तमेतं ' इन दोनों श्रुतियों से विनियोग पृथक्त्व - संयोग ( विधि ) भेद है, अतः विरोध नहीं है । * अपनी धर्मपत्नी के साथ सम्भोग पर्यन्त गर्भाधान आदि चौदहां, महायज्ञ पाँच, सोमस्थ सात, हविः संस्थ सात, पाक संस्थ सात, भोजन रहित संहिताका अध्ययन, प्रायण, कर्म, जप, शरीरसे उत्क्रमण, दैहिक भस्ममय, अस्थि संचय और श्राद्ध इसप्रकार अड़तालीस संस्कारको प्रसिद्धि है, वह भी शुद्धिरूप संस्कार द्वारा ज्ञानार्थक स्मृतिमें हैं । अतः कर्मो के अभेदका अवधारण उचित ही है ॥ ३४ ॥

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अधि ० ९ सू ० ३५-३६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७७५ वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति ' ( बृह ० ४।४।२२ ) इति सिद्धवदुत्पन्नरूपाण्येव यज्ञादीनि विविदिषायां विनियुङ्क्ते, नतु जुह्वतीत्यादिवदपूर्वमेषां रूपमुत्पादयतीति । स्मृतिलिङ्ग-मपि - ' अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ' ( गी ० ६ । १ ) इति । विज्ञातकर्तव्यता कमेव कर्म विद्योत्पत्यर्थं दर्शयति । ' यस्यैतेऽष्टाचत्वारिंशत्संस्काराः ' इत्याद्या च संस्कारत्व-प्रसिद्धिर्वैदिकेषु कर्मसु तत्संस्कृतस्य विद्योत्पत्तिमभिप्रेत्य स्मृतौ भवति । तस्मात्साध्विदम-भेदावधारणम् ॥ ३४ ॥

अनभिभवं च दर्शयति ॥ ३५ ॥

पदच्छेद - अनभिभवम्, च, दर्शयति । सूत्रार्थ - ( च ) और भी, ( अनभिभवम् ) ब्रह्मचयं आदि साधान सम्पन्न पुरुषका राग-द्वेष आदि क्लेशों से अभिभव नहीं होता, ( दर्शयति ) ' एष ह्यात्मा ' इत्यादि श्रुति दिखलाती है । • सहकारित्वस्यैवैतदुपद्वलकं लिङ्गदर्शनमनभिभवं च दर्शयति श्रुतिर्ब्रह्मचर्यादिसा धनसंन्नस्य रागादिभिः क्लेशैः ' एष ह्यात्मा न नश्यति यं ब्रह्मचर्येणानुविन्दते ' ( छा ० ८।५।३ ) इत्या-दिना । तस्माद्यज्ञादीन्याश्रमकर्माणि च भवन्ति विद्यासहकारीणि चेति निश्चितम् ॥ ३५ ॥

अन्तरा चापि तु तद्दृष्टः ॥ ३६ ॥

पदच्छेद – अन्तरा, च, अपि, तु तद्दृष्टेः । सूत्रार्थ - ( तु ) पूर्वपक्षकी व्यावृत्ति के लिए है, ( अन्तरा ) आश्रम रहित पुरुषोंका ( अपि ) मी ब्रह्मविद्या में अधिकार है, ( तद्दृष्टेः ) क्योंकि रैक्व आादिकी श्रुति उपलब्ध होती है । विधुरादीनां द्रव्यादिसंपद्रहितानां चान्यतमाश्रमप्रतिपत्तिहीनानामन्तरालवर्तिनां किं विद्यायामधिकारोऽस्ति किंवा नास्तीति संशये, नास्तीति तावत्प्राप्तम्, आश्रमकर्मणां विद्याहेतुत्वावधारणादाश्रमकर्मासंभवाच्चैतेषामिति । एवं प्राप्त इदमाह - अन्तरा चापि तु ' अनाश्रमित्वेन वर्तमानोऽपि विद्यायामधिक्रियते । कुतः? तद्द्दष्टेः । रैक्ववाचक्नवीप्रभृ उपदेश किया जाता है, वैसे यहां कर्मभेद नहीं है, ऐसा अर्थ है । किससे? उभयलिङ्ग से - श्रुति-लिङ्गसे और स्मृतिलिङ्गसे । ' तमेतं वेदानुवचनेन ० ' ( ब्राह्मण इस उपनिषद्गम्य पुरुषको वेदके नित्यं स्वाध्यायसे जानने की इच्छा करें ) यह श्रुतिलिङ्ग सिद्धवत्. उत्पन्नरूपवाले यज्ञ आदिका विवि-दिषा में विनयोग करता है और ' जुह्वति ' इत्यादिके समान इन यज्ञ मादिके अपूर्वरूपका उत्पादन नहीं करता । इसप्रकार ' अनाश्रितः कर्मफलं ० ' ( जो पुरुष कर्मके फलको न चाहता हुआ करने योग्य कर्म करता है ) यह स्मृतिलिङ्ग भी विज्ञात कर्तव्यतावाले कर्मको विद्याकी उत्पत्ति के लिए दिखलाता है । ' जिसके ये अड़तालीस संस्कार होते हैं ' इत्यादि वैदिक कर्मोंमें संस्कारत्व प्रसिद्धि उनसे संस्कृत पुरुषकी विद्याकी उत्पत्तिको अभिप्रेत कर स्मृतिमें है । इसलिए यह अभेदका अवधारण उचित है | ३४ | [ आश्रमक विद्या ] सहकारी हैं इसका ही समर्थक यह लिङ्गदर्शन है ' एष ह्यात्मा ० ' ( जिसे साधक ब्रह्मचयंसे प्राप्त होता है वह यह आत्मा नष्ट नहीं होता ) इत्यादिसे श्रुति ब्रह्मचर्यं आदि साधन सम्पन्न पुरुषका राग आदि क्लेशोंसे अनभिभव दिखलाती है । इससे यज्ञ आदि आश्रम कर्म हैं और विद्या सहकारी भी हैं, ऐसा निश्चित होता है ॥ ३५ ॥

विधुरादि, द्रव्य आदि संपत्से रहित किसी एक आश्रमकी प्रांतिसे हीन मध्यवर्ती पुरुषोंका क्या विद्या में अधिकार है अथवा नहीं है? ऐसा संशय होनेपर, पूर्वपक्षी - उनका विद्या में अधिकार नहीं है ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि आश्रमकमं विद्याके हेतुरूपसे निश्चित हैं और उन पुरुषोंमें आश्रम कर्मोका संभव भी नहीं है । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर यह कहते हैं- ' अन्तरा चापि तु ' अनाश्रमी

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७७६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ४ तीनामेवंभूतानामपि ब्रह्मवित्त्वश्रुत्युपलब्धेः ॥ ३६ ॥

अपि च स्मर्यते ॥ ३७ ॥

पदच्छेद - अपि, च, स्मर्यते I सूत्रार्थ - और अनाश्रमी संवर्त आदि मी महायोगिरूपसे इतिहास में स्मरण किये जाते हैं । संवर्तप्रभृतीनां च नग्नचर्यादियोगादनपेक्षिताश्रमकर्मणामपि महायोगित्वं स्मर्यते इतिहासे ॥ ३७ ॥

ननु लिङ्गमिदं श्रुतिस्मृतिदर्शनमुपन्यस्तं का नु खलु प्राप्तिरिति, साऽभिधीयते-विशेषानुग्रहश्च ॥ ३८ ॥

पदच्छेद - विशेषानुग्रहः " च । सूत्रार्थ - और रैक्व आदि अनाश्रमियोंका जप आदि ज्ञानके हेतुभूत कर्म विशेषोंसे विद्यामें अधिकार सुना जाता है । तेषामपि च विधुरादोनामविरुद्धैः पुरुषमात्र संबन्धिभिर्जपोपवासदेवताराधनादिभिर्ध-विशेषैरनुग्रहो विद्यायाः संभवति । तथा च स्मृतिः - जप्येनैव तु संसिध्ये ब्राह्मणो नात्र संशयः । कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ' ॥ इत्यसंभवदाश्रमकर्मणोऽपि जप्येऽधिकारं दर्शयति । जन्मान्तरानुष्ठितैरपि चाश्रमकर्मभिः संभवत्येव विद्याया अनुग्रहः । तथा च स्मृतिः-‘ अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ' ( गी ० ६ । ४५ ) इति जन्मान्तर संचितानपि संस्कार-विशेषाननुग्रहीतृन्विद्यायां दर्शयति । दृष्टार्था च विद्या प्रतिषेधाभावमात्रेणाप्यर्थिनमधि-E करोति श्रवणादिषु । तस्माद्विधुरादीनामप्यधिकारो न विरुध्यते ॥ ३८ ॥

अतस्त्वितरज्ज्यायो लिङ्गाच्च ॥ ३ ९ ॥ पदच्छेद- अतः, तु, इतरत् ज्यायः, लिङ्गात् च । सूत्रार्थ - ( अस्तु ) मनाश्रमित्वकी अपेक्षासे तो ( इतरत् ) आश्रमित्व ( ज्यायः ) श्रेष्ठ - शीघ्र विद्याका साधन है, ( लिङ्गाच्च ) क्योंकि ' तेनैतिब्रह्मवित् ' इसप्रकार श्रुति और स्मृतिरूप लिङ्ग हैं | रूपसे वर्तमान पुरुष मी विद्या में अधिकृत हैं । किससे? इससे कि उनकी श्रुति देखी जाती है - रैक्व, वाचक्नवी आदि इसप्रकार के प्राणियों में भी ब्रह्मवित्त्व श्रुति उपलब्ध होती है ॥ ३६ ॥

नग्नचर्या आदि योगसे आश्रम कर्मोंकी अपेक्षा नहीं रखनेवाले संवतं आादिका भी महायोगि-रूप से इतिहास में स्मरण किया जाता ॥ ३७ ॥

परन्तु यहाँ यह लिङ्गरूप श्रुति और स्मृति दर्शन उपन्यस्त किया है, उसकी प्राप्ति - विधिवाक्य कौन है? उसका अभिधान करते है — उन विधुर आदिका भी अनाश्रमियोंके अविरुद्ध पुरुषमात्र सम्बन्धी जप, उपवास, देवाराधन बादि धर्मविशेषोंसे विद्यामें अधिकार संभव है । इसोप्रकार ' जप्येनैव तु ० ' ( ब्राह्मण जपसे ही संसिद्ध हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं । वह अन्य कर्म करे अथवा न करे दयावान् ब्राह्मण कहा जाता है ) यह स्मृति जिसमें आश्रमकर्मका संभव नहीं है उनका भी जपमें अधिकार दिखलाती है । जन्मान्तर में अनुष्ठित आश्रम कर्मोंसे भी विद्या में अधिकार संभव ही है । इसीप्रकार ' अनेकजन्म ० ' ( अनेक जन्मके संस्कारके उपचयसे संसिद्ध होकर शुद्ध अन्तःकरणवाला होकर पुरुष सम्यग्दर्शनसे मोक्षको प्राप्त होता है ) यह स्मृतिवचन जन्मान्तरोंमें संचित और अनुग्रह करनेवाले संस्कार विशेषोंको भी विद्यामें दिखलाता है । दृष्ट फलवाली विद्या प्रतिषेध के अभावमात्र से भी विद्यार्थीको श्रवण आदिमें अधिकृत करती है । इसलिए विधुर आदिका भी विद्या में अधिकार विरुद्ध नहीं है ॥ ३८ ॥