श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 811–820

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 811–820

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अधि ० १० सू ० ४० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी -दीपिका सहित ७७७ * अतस्त्वन्तरालवर्तित्वादितरदाश्रमवर्तित्वं ज्यायो विद्यासाधनम्, श्रुतिस्मृति-संदृष्टत्वात्, श्रुतिलिङ्गाच्च ' ते नैति ब्रह्मवित्पुण्यकृत्तैजसश्च ' ( बृह ० ४।४1 ९ ) इति, ' अनाश्रमी न तिष्ठेत दिनमेकमपि द्विजः । संवत्सरमनाश्रमी स्थित्वा कृच्छ्रमेकं चरेत् ' इति च स्मृतिलिङ्गात् ॥ ( १० तद्भूताधिकरणम् । सू ०४० ) तद्भ ूतस्य तु नातद्भावो जैमिनेरपि नियमातद्रूपाभावेभ्यः ॥ ४० ॥

पदछेद — तद्भूतस्य, तु, न, अतद्भावः, जैमिने, अपि, नियमात द्रूपाभावेभ्यः । सूत्रार्थ - ( तद्भूतस्य ) उत्तमाश्रमको प्राप्त हुए पुरुषकी ( अतद्भावः ) उत्तमाश्रमसे च्युति ( न ) नहीं हो सकती, ( जैमिनेरपि ) यह आचार्य जैमिनिको मी सम्मत है, ( नियमातद्र पाभावेभ्यः ) क्योंकि नियम, अप और अभाव ये कारण हैं । * सन्त्यूर्ध्वरेतस आश्रमा इति स्थापितम् । तांस्तु प्राप्तस्य कथंचित्ततः प्रच्युति-रस्ति नास्ति वेति संशयः । पूर्वकर्मस्वनुष्ठानचिकीर्षया वा रागादिवशेन वा प्रच्युतोऽपि स्याद्विशेषाभावादिति । एवं प्राप्त उच्यते- -तद्भतस्य तु प्रतिपन्नोर्ध्वरेतोभावस्य न कथंचिद-प्यतद्भावो न ततः प्रच्युतिः स्यात् । कुतः? नियमातदुपाभावेभ्यः । तथा हि- ' अत्यन्तमात्मान-माचार्यकुलेऽवसादयन् ' ( छा ० २।२३।१ ) इति ' भरण्यमियादिति पदं ततो न पुनरेयादित्युपनिषत् ' इति, ' आचार्येणाभ्यनुज्ञातश्चतुर्णामेकमाश्रमम् । आ विमोक्षाच्छरीरस्य सोऽनुतिष्ठेद्यथाविधि ' इति चैवं-परन्तु इससे अन्तरालवतित्व - अनाश्रमित्व से अन्याश्रमवर्तित्व ( आश्रमित्व ) श्रेष्ठ विद्याका साधन है, क्योंकि श्रुति और स्मृतिमें ऐसा देखा जाता है । कारण कि ' तेनैति ब्रह्मवित् ० ' ( पुण्यकृत् -शुद्ध सत्त्व तेजःस्वरूप ब्रह्मवेत्ता उस ज्ञानमागंसे जाता है - ब्रह्मको प्राप्त होता है ) ऐसा श्रुतिलिङ्ग है मोर ' अनाश्रमी न तिष्ठेत ० ' ( द्विज एक दिन मी अनाश्रमी न रहे, एक वर्ष तक अनाश्रमी रहकर एक कृच्छ्र करना चाहिए ) ऐसा स्मृतिलिङ्ग भी है ॥ ३ ९ ॥ ऊर्ध्वरेता आश्रम हैं, ऐसा पहले सिद्ध किया जा चुका है । परन्तु उन आश्रमोंको प्राप्त हुए पुरुषों की किसी कारण से उन आश्रमोंसे च्युति होती है कि नहीं? ऐसा संशय होता है । पूर्वपक्षी-पूर्व आश्रमविहित कर्मों के अनुष्ठान करने की इच्छा से अथवा राग आदिके वशसे वह ऊर्ध्वरेता प्रच्युत भी होगा, क्योंकि विशेषका अभाव है । सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं - तद्भूतका - ऊध्वरेत-भावको प्राप्त हुए पुरुषका किसी प्रकार भी अतद्भाव - उस आश्रम से प्रच्युति नहीं हो सकती । किससे? इससे कि उसके लिए नियम, अतद्रप और अभाव हैं । जैसे कि ' अत्यन्तमात्मानमा ० ' ( आचार्य -कुलमें रहनेवाला ब्रह्मचारी जो आचार्य कुलमें अपने शरीरको अत्यन्त क्षीण करता हुआ ) ' अरण्य-मियादिति ० ' ( अरण्य - पारिव्राज्य प्राप्त करे यह पद शास्त्र मार्ग है, उस पारिव्राज्यसे प्रच्युत न हो, यह उपनिषद् - रहस्य है ) ' आचार्येणाभ्यनुज्ञातः ० ' ( आचार्यसे अनुज्ञा प्राप्तकर शरीर विमोक्षपर्यन्त चारों आश्रमोंमें एकका वह यथाविधि अनुष्ठान करे ) इस प्रकारका नियम प्रच्युतिका अभाव दिखलाता है । सत्यानन्दी -दीपिका * ' तमेतं वेदानुवचनेन ० ' इत्यादि श्रुति और ' अनाश्चमी न तिष्ठेत ' इत्यादि स्मृति से अनाश्रमी -की अपेक्षा आश्रमीको श्रेष्ठ कहा गया है, क्योंकि पुण्यकी वृद्धि होनेसे शीघ्र विद्याकी प्राप्ति होती है । और ' अनाश्रमी न तिष्ठेत ' इत्यादि स्मृतिसे अनाश्रमीकी निन्दा भी की गई है ॥ ३ ९ ॥ * जैसे ' ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेत् ' इन आश्रमोंका आरोह इच्छा अधीन है, वैसे राग मादिसे अथवा पूर्वाश्रमके यज्ञ आदि कर्मोके अनुष्ठान करनेकी इच्छासे संन्यास से वानप्रस्थ आदि हो सकता है तब वानप्रस्थादि आश्रम में किये गये कर्म भी विद्याके हेतु हो सकते हैं, यह पूर्वपक्षका

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७७८ ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ४ जातीयको नियमः प्रच्युत्यभावं दर्शयति । यथा च ' ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेत् ' ( जा ० ४ ) ' ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत् ' ( जा ० ४ ) इति चैवमादीन्यारोहरूपाणि वचस्युपलभ्यन्ते, नैवं प्रत्यव-रोहरूपाणि । न चैवमाचाराः शिष्टा विद्यन्ते । यत्तु - पूर्वकर्मस्वनुष्ठानचिकीर्षया प्रत्यव-रोहणमिति, तदसत्, ' श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्टितात् ' ( गी ० ३ | ३ | ५ ) इति स्मरणात्, न्यायाच्च । यो हि यं प्रति विधीयते स तस्य धर्मो न तु यो येन स्वनुष्ठातुं शक्यते, चोद-नालक्षणत्वाद्धर्मस्य । न च रागादिवशात्प्रच्युतिः, नियमशास्त्रस्य बलीयस्त्वात् । जैमिनेर-पीत्यपिशब्देन जैमिनिबादरायणयोरत्र संप्रतिपत्ति शास्ति प्रतिपत्तिदा ॥ ४० ॥

( ११ अधिकाराधिकरणम् । सू ० ४१-४२ ) नचाधिकारिकमपि पतनानुमानात्तदयोगात् ॥ ४१ ॥

पदच्छेद - न, च, आधिकारिकम् अपि पतनानुमानात्, तदयोगात् । सूत्रार्थ - ( आधिकारिकमपि ) अधिकार शास्त्रसे प्राप्त आधिकारिक प्रायश्चित्त नैष्ठिक ब्रह्म-चारीके लिए ( न ) नहीं है, ( पतनानुमानात् ) क्योंकि ' आरूढो नैष्ठिकं धर्मम् ' इत्यादिसे पातित्य श्रुति अनुमापक स्मृति है, ( तदयोगात् ) क्योंकि उस प्रायश्चित्तका अयोग असम्भव है । * यदि नैष्ठिको ब्रह्मचारी प्रमादादवकोर्येत, किं तस्य ' ब्रह्मचार्यवकीणीं नैर्ऋतं गर्दम-माळभेत ' इत्येतत्प्रायश्चित्तं स्यादुत नेति? नेत्युच्यते, यदप्यधिकारलक्षणे निर्णीतं प्रायश्चि न्तम् ' अवकीर्णिपशुश्च तद्वदाधानस्याप्राप्तकालय्वात् ' ( जै ० सू ० ६।८।२१ ) इति, तदपि न नैष्ठिकत्य और जैसे ' ब्रह्मचर्यं समाप्य ० ' ( ब्रह्मचर्यं समाप्तकर गृहस्थाश्रमी हो ) ' ब्रह्मचर्यादेव ० ' ( ब्रह्मचर्यं से ही संन्यास ग्रहण करे ) इसप्रकार के आरोहरूप वचन उपलब्ध होते हैं, वैसे प्रत्यवरोहरूप नहीं । और ऐसा आचारण करनेवाले शिष्ट नहीं है । और जो पूर्व आश्रमकर्मों के अनुष्ठान करनेकी इच्छासे प्रत्यवरोहण कहा है, वह ठीक नहीं है, क्योंकि ' श्रेयान्स्वधर्मो ० ' ( भली - भांति अनुष्ठान किये गये पर-घमंसे विगुण भी स्वकीय धर्मं अत्युत्तम है ) यह स्मृति है और न्याय भी है । जो ही जिसके लिए विधान किया जाता है वह उसका धर्म है, जिससे जो स्वयं अनुष्ठान किया जा सकता है वह उसका धर्म नहीं है, क्योंकि धर्मं तो चोदनारूप - विधिरूप है । और राग आदि वश भी प्रच्युति नहीं होती, कारण कि नियमशास्त्र बलवान् है 1 । ' जैमिनेरपि ' ( जैमिनिकी भी ) इस ' अपि ' शब्दसे इस विषयमें प्रतिपत्ति दृढ करने के लिए जैमिनि और बादरायणकी सम्प्रतिपत्तिका उपदेश करते हैं ॥ ४० ॥

यदि नैष्ठिक ब्रह्मचारी प्रमादसे ब्रह्मचर्यं व्रतसे प्रच्युत हो तो उसका ' ब्रह्मचार्यवकीर्णी ० ' ( ब्रह्म-चसे भ्रष्ट हुए ब्रह्मचारीको नैर्ऋत गर्दभका आलभन करना चाहिए ) यह प्रायश्चित्त होगा अथवा नहीं? नहीं, ऐसा कहते हैं— अधिकारलक्षणमें ' अवकीर्णिपशुश्च ० ' ( जैसे उपनयनकालमें लौकिक अग्नि में होम किया जाता है, वैसे ही अवकीणिपशुका भी लौकिक अग्निमें होम करना चाहिए, क्योंकि आधान अप्राप्तकाल है ) ऐसा जो प्रायश्चित्तका निर्णय किया गया है, वह भी नैष्ठिक ब्रह्मचारीका सत्यानन्दी - दीपिका फल है । सिद्धान्तमें - ऊर्ध्वरेताओंकी प्रच्युतिमें प्रमाणके न होनेसे आश्रमित्वमें श्रेष्ठता सिद्ध है । केवल अपनी इच्छासे आश्रमोंका ग्रहण नहीं होता, किन्तु ' ब्रह्मचर्यं समाप्य ' इत्यादि नियामक शास्त्रद्वारा सविधि आश्रमोंका ग्रहण होता है, मत । उक्त हेतुओंसे ऊर्ध्वरेताओंकी अपने आश्रमसे च्युति नहीं होती ॥ ४० ॥

* स्त्रीप्रसंग करनेवाले नैष्ठिक ब्रह्मचारीको शास्त्रमें अवकीर्णी कहा गया है । इस व्यमि -चारको उपपातक कहने से और स्मृति में पातित्यका कथन होनेसे संशय होता है कि प्रच्युतका प्रायश्वित होता है कि नहीं? पूर्वपक्ष में प्रायश्चित्त नहीं होता, क्योंकि जैसे ' यज्ञोपवीतकालमें लौकिक अग्निमें होम

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अधि ० ११ सू ० ४२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७७ ९ भवितुमर्हति । किं कारणम्? ' आरूढो नैष्ठिकं धर्मं यस्तु प्रच्यवते पुनः । प्रायश्चित्तं न पश्यामि येन शुद्धयेत्स भात्महा ॥ ' इत्यप्रति समाधेयपतनस्मरणाच्छिन्नशिरस इव प्रतिक्रियानुपपत्तेः, उपकुर्वाणस्य तु तादृक्पतनस्मरणाभावादुपपद्यते तत्प्रायश्चित्तम् ॥ ४१ ॥

उपपूर्वमपि त्वेके भावमशनवत्तदुक्तम् ॥ ४२ ॥

पदच्छेद - उपपूर्वम्, अपि, तु, एके, भावम्, अशनवत्, तदुक्तम् । सूत्रार्थ - ( अपितु, एके ) कई आचार्य इसे ( उपपूर्वम् ) उप उपसर्गपूर्वक उपपातक मानते हैं, ( अशनवत् ) जैसे उपकुर्वाण ब्रह्मचारी यदि मद्य - माँस खाए तो उसका व्रतलोप और पुनः संस्कार होता है, वैसे प्रच्युत नैष्ठिक ब्रह्मचारीके लिए मी प्रायश्चितका ( भावम् ) विधान है । ( तदुक्तम् ) इसका विचार पूर्वमीमांसा के ' समा विप्रतिपत्तिः स्यात् ' इत्यादि सूत्रोंमें किया गया है । * अपि त्वेक आचार्या उपपातकमेवैतदिति मन्यन्ते, यन्नैष्टिकस्य गुरुदारादिभ्योऽ-न्यत्र ब्रह्मचर्य विशीर्येत, न तन्महापातकं भवति, गुरुतल्पादिषु महापात्तकेष्वपरिगण-नात् । तस्मादुपकुर्वाणवन्नैष्ठिकस्यापि प्रायश्चित्तस्य भावमिच्छन्ति, ब्रह्मचारित्वाविशेषा-दवकीर्णित्वाविशेषाच्च । अशनवत् । यथा ब्रह्मचारिणो मधुमांसाशने व्रतलोपः पुनः संस्का-रश्चैवमिति । ये हि प्रायश्चित्तस्याभावमिच्छन्ति तेषां न मूलमुपलभ्यते, ये तु भावमिच्छन्ति नहीं हो सकता । क्या कारण? ‘ आरूढो नैष्ठिकं ० ' ( नैष्ठिक धर्ममें आरूढ होकर जो पुनः उससे प्रच्युत होत है, वह मात्मघाती जिससे शुद्ध हो ऐसा प्रायश्चित्त नहीं देखता हूँ ) इसप्रकार स्मृति में अप्रतिकार्य पतन कहा गया है, अतः जैसे कटे हुए शिरका पुनः प्रतिसन्धान नहीं हो सकता, वैसे इस पतनका भी प्रतिकार नहीं हो सकता है । उपकुर्वाणके इस प्रकारकी पतनकी स्मृति न होनेसे उसका प्रायश्चित्त हो सकता है ॥ ४१ ॥

और दूसरे आचार्य ऐसा मानते हैं कि जो नैष्ठिक ब्रह्मचारीका गुरुपत्नी आदिसे अन्यत्र ब्रह्मचर्यं विशीर्ण हो तो वह उपपातक ही हैं महापातक नहीं है, क्योंकि उसकी गुरुतल्प आदि महा-पातकोंमें गणना नहीं है । इसलिए उपकुर्वाणके समान नैष्ठिकको मी प्रायश्चित्तके अस्तित्वकी इच्छा करते हैं, क्योंकि ब्रह्मचारित्व अविशेष है और अवकीर्णत्व अविशेष है अर्थात् दोनों समानरूपसे ब्रह्मचारी और अवकीर्णी हैं । अशनके समान । जैसे मधु - मद्य और मांसके भक्षणसे ब्रह्मचारीके व्रतलोप और पुनः संस्कार होते हैं, वैसे यहाँ पर भी समझना चाहिए । जो प्रायश्चित्तका अभाव सत्यानन्दी - दीपिका करना चाहिए, क्योंकि विवाहके समय जो विहित अग्निका आधान है वही अहवनीय अग्नि है, उपनयन कालमें उसका अभाव है, इससे लौकिक अग्निमें होमका विधान है, वैसे व्यभिचारी नैष्ठिक ब्रह्मचारी-को प्रायश्चित्त- पशु गदभंका अग्निमें होम करना चाहिए, क्योंकि उसको भी अविवाहित होनेसे आहवनीयाग्नि अप्राप्त है, ऐसा मीमांसाशास्त्र के छठे अध्याय में निर्णय किया गया है । यह जो प्रायश्चित्त लिखा गया है वह भी उपकुर्वाण ही के लिए है । परन्तु व्यभिचारी नैष्ठिक ब्रह्मचारीके लिए प्रायश्चित्त नहीं है ॥। ४१ ॥ ' सिद्धान्ती - ' उप ' पद पूर्वक पाठक उपपातक कहा जाता है । " ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः । महन्ति पातकान्याहु संसर्गश्वापि तैः सह ॥ " ( ब्रह्महत्या, सुरापान, सुवर्णकी चोरी, गुरुपत्नीसे सङ्गम और उनसे वर्षतक सङ्ग इनको महापातक कहते हैं ) यह स्मृति है, और स्मृतिकी मूलभूत श्रुति भी है- ' स्तेनो हिरण्यस्य सुरां पिबंश्च गुरोस्तल्पमावसन्ब्रह्महा चैते पतन्ति चत्वारः पञ्चमश्चाचर स्तैरिति ” ( छा ० ५ / १०१ ९ ) ( ब्राह्मणके सुवर्णका चोर, मद्य पीनेवाला, गुरुस्त्रीगामी,

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७८० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ४ तेषां ब्रह्मचार्यवकीर्णीत्येतदविशेषणश्रवणं मूलम् । तस्माद्भावो युक्ततरः । तदुक्तं प्रमाण-लक्षणे- ' समा विप्रविपत्तिः स्यात् ' ( जै ० सू ० १।३।८ ) ' शास्त्रस्था वा तन्निमित्तत्वात् ' ( जै ० सू ० १।३।९ ) इति । प्रायश्चित्ताभावस्मरणं त्वेवं सति यत्नगौरवोत्पादनार्थमिति व्याख्यातव्यम् । एवं भिक्षुवैखानसयोरपि ' वानप्रस्थो दीक्षाभेदे च्छू द्वादशरात्रं चरित्वा महाकक्षं वर्धयेत ', भिक्षुर्वान-प्रस्थवत्सोमवह्निवर्जं स्वशास्त्र संस्कारा ' इत्येवमादि प्रायश्चित्तस्मरणमनुस्मर्तव्यम् ॥ ४२ ॥

( १२ बहिरधिकरणम् सू ४३ ) बहिस्तूभयथापि स्मृतेराचाराच्च ॥ ४३ ॥

चाहते हैं उनके मतका मूल प्रमाण उपलब्ध नहीं होता । और जो प्रायश्चित्तका माव चाहते हैं उनके मत में ' ब्रह्मचारी अवकीर्णी ' यह अविशेष श्रुतिमूल है । इसलिए प्रायश्चित्तका अस्तित्व युक्ततर है | वह ' समा विप्रतिपत्तिः स्यात् ' ( यवमयश्चरुः ) यहाँपर कुछ लोग यव शब्दका दीर्घ शूक ' जो ' में प्रयोग करते हैं और कुछ ' त्रयंगु ' देशविशेषमें प्रयोग करते हैं, तो किसका चरु होना चाहिए । ऐसा सन्देह होनेपर वृद्ध प्रयोगके दोनों अर्थोंमें समान होनेसे विकल्पसे तुल्य प्रतिपत्ति होगी, ऐसा प्राप्त होने पर सिद्धान्त ' शास्त्रीय प्रतिपत्ति ही अधिक बलवती होती है, क्योंकि धर्मविज्ञान शास्त्रनिमित्तक है ' इसप्रकार प्रमाण लक्षण में कहा गया है । ऐसा होनेपर प्रायश्चित्ताभाव प्रतिपादिक स्मृति तो [ नैष्ठिक में ] यत्नगौरव उत्पादन करनेके लिए है, ऐसा व्याख्यान करना चाहिए । इसप्रकार ' वान-प्रस्थो दीक्षाभेदे ० ' ( वानप्रस्थव्रतका लोप होनेपर ' दिनत्रयमेकवार भोजनं दिनत्रयं रात्रिभोजनं दिन-त्रयमयाचितं दिनत्रयमुपवासकरणम् ' इसप्रकार बारह रात्रितक प्राजापत्यकर बहुत तृण और वृक्ष-वाले देशकी जलदान आदिसे वृद्धि करे ) ' मिक्षुर्वानप्रस्थवत् ० ' ( भिक्षु वानप्रस्थळे समान सोमलताको छोड़कर बहुत तृण और वृक्षवाले देशकी जलदान आदिसे वृद्धि करे और स्वशास्त्र विहित संस्कार-ध्यान प्राणायाम आदि भी करे ) इत्यादि प्रायश्चित्त स्मृतिका भिक्षु और वानप्रस्थमें भी अनुस्मरण करना चाहिए ॥ ४२ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका ब्रह्महत्यारा ये चारों पतित होते हैं और पाँचवां उनके साथ संसगं करनेवाला मी ) ये महापातक हैं । अत: उपकुर्वाण ( समावर्तन के अनन्तर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करनेवाले ) ब्रह्मचारीके समान नैष्ठिक ब्रह्मचारी के लिए मी प्रायश्चित होना चाहिए, क्योंकि प्रायश्चित श्रुतिमूलक है । जैसे ' यव-मयश्चरुः ' यहाँ यव शब्दका सन्देह होनेपर " यदान्या ओषधयोग्लायन्त्यथैते यवा मोदमानास्तिष्ठन्ति ' ( जब अन्य औषधियाँ सूखने लगती हैं तब ये यन मोदमान -हरे मारे रहते हैं ) इसप्रकार शास्त्रमूलक होनेसे दोघं शूक रूप अर्थ में यव शब्दका प्रयोग आदरणीय है, वैसे श्रतिमूलक प्रायश्चित्त भी आदर-णीय है । ' सर्वपापप्रसक्तोऽपि ध्यायन्निमिषमच्युतम् । भूयस्तपस्वी भवति पङ्क्तिपावन एव च ॥ ' ' उपपातकसंघेषु पातकेषु महत्सु च । प्रविश्य रजनीपादं ब्रह्मध्यानं समाचरेत् ॥ ' ( सर्व पापोंसे प्रसक्त होनेवाला भी अच्युत भगवानका निमिष मात्र ध्यान करता हुआ पुनः तपस्वी और पंक्तिपावन हो जाता है । उपपातकों के समुदाय में और महापातकों में रात्रि के चौथे प्रहरमें ब्रह्मका चिन्तन करे ) और “ मनोवाक्कायजान्दोषानज्ञानोत्थान्प्रमादजान् । सर्वान् दहति योगाग्निस्तूलराशिमिवाऽनलः । नित्य-मेव तु कुर्वीत प्राणायामांस्तु षोडशः । अपि भ्रूणहनं मासात्पुनन्त्यहरहः कृताः ॥ ' ( जैसे अन्नि तुलराशिको जलाकर मस्ममय कर देती है, वैसे अज्ञानसे, प्रमादसे, मन - वाणी और शरोरसे हुए सब दोषों को योगाग्नि जला देती है । नित्य सोलह प्राणायाम करने चाहिए, एकमास तक प्रतिदिन किये गये प्राणायाम भ्रूणहत्या करनेवालेको भी पावन करते हैं ) इत्यादि वाक्योंका ग्रहण करना चाहिए । इसप्रकार उत्तम आश्रम से प्रच्युत ऊर्ध्वं रेताओंके लिए भी प्रायश्चित्तका विधान है । अतः प्रायश्चित्तानन्तर उनका भी विद्यामें अधिकार है ॥ ४२ ॥

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अधि ० १३ सू ० ४४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी- दीपिकासहित ७८१ पदच्छेद - बहिः, तू, उभयथा, अपि, स्मृतेः, आचारात्, च । सूत्रार्थ - ( उभयथापि ) ऊर्ध्वरेताकी अपने आश्रम से प्रच्युति उपपातक हो चाहे महापातक दोनों प्रकारसे भी उसका शिष्टों द्वारा ( बहिस्तु ) बहिष्कार करना चाहिए, ( स्मृतेराचाराच्च ) क्योंकि ' प्रायश्चित्तं न पश्यामि ' इत्यादि निन्दास्मृति और शिष्टाचार हैं । * यद्यध्वं रेतासां स्वाश्रमेभ्यः प्रच्यवनं महापातकं यदि वोपपातक मुभयथापि शिप्रैस्ते बहिष्कर्तव्याः । ' आरूढो नैष्ठिकं धर्मं यस्तु प्रच्यवते पुनः । प्रायश्चित्तं न पश्यामि येन शुध्येत्स आत्मा ' इति, ' आरूढपतितं विप्रं मण्डलाच्च विनिःसृतम् । उद्वद्धं कृमिदष्टं च स्पृष्ट्वा चान्द्रायणं चरेत् ' इति चैवमादिनिन्दातिशयस्मृतिभ्यः, शिष्टाचाराच्च । नहि यज्ञाध्ययन-विवाहादीनि तैः सहा चरन्ति शिष्टाः ॥ ४३ ॥

( १३ स्वाम्यधिकरणम् । सू ० ४४-४६ ) स्वामिनः फलश्रुतेरित्यात्रेयः ॥ ४४ ॥

पदच्छेद - स्वामिनः फलश्रुतेः, इति, आत्रेयः । सूत्रार्थ - ( स्वामिन: ) यजमान ही साङ्ग प्रधान उपासनाओं का कर्ता है, ( इति आत्रेयः ) ऐसा आत्रेय आचार्यका मत है, ( फलश्रुतेः ) क्योंकि ' वर्षाति हास्मै ' इत्यादि फलश्रुति है । * अङ्गेषूपासनेषु संशयः - किं तानि यजमान कर्माण्याहोस्विदृत्विक्कर्माणीति । किं तावत्प्राप्तम्? यजमानकर्माणीति । कुतः? फलश्रुतेः फलं हि श्रूयते - ' वर्षति हास्मै वर्षयति ह य एतदेवं विद्वान्वृष्टौ पञ्चविधं सामोपास्ते ' ( छ ० २।३।२ ) इत्यादि । तच्च स्वामि-गाभि न्याय्यम् तस्य साझे प्रयोगेऽधिकृतत्वात्, अधिकृताधिकारत्वाच्चैवजातीयकस्य । यदि ऊर्ध्वरेताओंका अपने आश्रम से प्रच्युत होना महापातक हो अथवा यदि उपपातक हो दोनों प्रकारसे उनका शिष्टपुरुषों द्वारा बहिष्कार करना चाहिए, क्योंकि ' आरूढो नैष्ठिकं ० ' ( जो नैष्ठिक धर्म में आरूढ हो पुनः प्रच्युत होता है, वह आत्मघाती जिससे शुद्ध हो ऐसा प्रायश्चित्त नहीं देखता हूँ ) और ' आरूढपतितं ० ' ( आश्रम में आरूढ हुए पतित विप्रको और मण्डलसे बहिष्कृत को, फाँसीते स्वयं मरनेवाले ब्राह्मणको और कृमियोंसे दष्ट ब्राह्मणको स्पर्श कर चान्द्रायण व्रत करे ) इत्यादि अतिशय निन्दा करनेवाली स्मृतियाँ हैं और शिष्टाचार भी है । इसलिए शिष्ट पुरुष उनके साथ यज्ञ, अध्ययन, विवाह आदि व्यवहार नहीं करते हैं ॥ ४३ ॥

अङ्गोंसे सम्बद्ध उपासनाओं में संशय होता है कि क्या वे उपासनाएँ यजमानके कर्म हैं अथवा ऋत्वक्के कर्म हैं? तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षो – वे यजमानके कर्म हैं, क्योंकि ऐसी फलश्रुति है | ‘ वर्षति हास्मै ० ' ( जो इसे इसप्रकार जाननेवाला पुरुष वृष्टिमें पाँच प्रकार के सामकी उपासना करता है उसके लिए वर्षा होती है वह स्वयं भी मेघोंसे वर्षा करा लेता है ) इत्यादि फलश्रुति है । वह फल स्वामी - यजमान को प्राप्त हो यह उचित है, क्योंकि वह साङ्ग प्रयोग में अधिकृत है । इस प्रकारकी उपासनामें वह अधिकृत अधिकार है । और ' वर्ष व्यस्मै ० ' ( जो उपासना करता है उसके सत्यानन्दी - दीपिका * जिन नैष्ठिक आदि पुरुषोंने प्रायश्चित्त कर लिया है, उनके साथ किया श्रवण आदि ब्रह्मविद्या साधन है कि नहीं? ऐसा सन्देह होनेपर पूर्वपक्ष में उनके साथ किया गया श्रवण आदि विद्या का साधन होता है । सिद्धान्तमें उनकी प्रायश्चित्त आदि पारलौकिक शुद्धि होनेपर भी यहाँ शुद्धि नहीं होती, इससे उनके साथ किया श्रवण आदि विद्याका साधन नहीं होता ॥ ४३ ॥

* अङ्गाश्रित उपासनाओंमें यजमान और ऋत्विक दोनोंके कर्तृत्वका संभव होनेसे संशय

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७८२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ४ फलं च कर्तर्युपासनानां श्रूयते ' वर्षत्यस्मै य उपास्ते ' इत्यादि । नन्वृत्विजोऽपि फलं दृष्टम्-' आत्मने वा यजमानाय वा यं कामं कामयते तमागायति ' ( बृह १।३।२८ ) इति । न, तस्य वाचनि-कत्वात् । तस्मात्स्वामिन एव फलवत्सूपासनेषु कर्तृत्वमित्यात्रेय आचार्यो मन्यते ॥ ४४ ॥

आर्त्विज्यमित्यौडुलो मिस्तस्मै हि परिक्रीयते ॥ ४५ ॥

पदच्छेद - विज्यम्, इति, ओडुलोभिः, तस्मै, हि, परिक्रीयते । सूत्रार्थ - ( आत्विज्यम् ) इन उपासनाओंका कर्ता ऋत्विक् हैं, ( इति ओडुलोमि: ) ऐसा मोडुलोभि आचार्यका मत है, ( हि ) क्योंकि ( तस्मै ) उस साङ्ग कर्म के लिए ( परिक्रीयते ) दक्षिणा से ऋत्विक खरीदा जाता है । नैतदस्ति - स्वामिकर्माण्युपासनानीति, ऋत्विकर्माण्येतानि स्युरित्यौडुलोमिरा-चार्यो मन्यते । किं कारणम्? तस्मै हि साङ्गाय कर्मणे यजमानेनत्विक्परिक्रीयते, तत्प्र-योगान्तः पातीनि चोद्गीथाद्युपासनान्यधिकृताधिकारत्वात् । तस्माद्गोदोहनादिनिय -मवदेवत्विग्भिर्निर्वत्यैरन् । तथा च ' तं ह बको दाल्भ्यो विदाञ्चकार स ह नैमिशीयानामुद्गाता बभूव ' ( छा ० १।२।१३ ) इत्य द्गातृकर्तृकतां विज्ञानस्य दर्शयति । यत्तूक्तम् - कर्त्राश्रयं फलं श्रूयत इति - नैष दोषः परार्थत्वादृत्विजोऽन्यत्र वचनात्फलसंबन्धानुपपत्तेः ॥४५ ॥

श्रुतेश्व ॥ ४६ ॥

पदच्छेद - धुते च । सूत्रार्थ - क्योंकि ' यां वै काञ्चन ' इत्यादि श्रुति ऋत्विक् कर्तृक उपासनाका फल यजमानके लिए दिखलाती है । लिए मेघ यथेष्ट वृष्टि करता है ) इत्यादि फल उपासनाओंके कर्ता में सुना जाता है । परन्तु ' आत्मने वा यजमानाय ० ' ( अपने लिए अथवा यजमानके लिए जिस मनोरथकी वह उद्गाता कामना करता है उसे सामके उद्गानसे सिद्ध करता है ) इसप्रकार ऋत्विक्को भी फल प्राप्त हुआ देखा गया है । नहीं, क्योंकि वह वाचनीक है, इसलिए यजमान ही फलवाली उपासनाओंका कर्ता है, ऐसा आत्रेय आचार्य मानते हैं ॥ ४४ ॥

सिद्धान्ती — उपासनाएँ स्वामी कर्म हैं, ऐसा नहीं है, ये ऋत्विक्के कर्म होने चाहिए, ऐसा बडुलोम आचार्य मानते हैं, क्योंकि उस साङ्ग कर्मके लिए यजमान से ऋत्विक्का परिक्रयण किया जाता है । और उद्गीथ आदि उपासनाएँ उस प्रयोगके अन्तर्भूत हैं, क्योंकि अधिकृतका अधिकार है । इसलिए गोदोहन आदिके समान ही वे साङ्ग उपासनाएँ ऋत्विजोंसे ही संपादन होनी चाहिए । उसी प्रकार ' तं ह बको दाल्भ्यो ० ' ( अतः दाल्भ्यके पुत्र बकने उसे जाना - पूर्वोक्त प्रकार से प्राणदृष्टिसे उद्गीथकी उपासनाकी वह नैमिषारण्यमें यज्ञ करनेवालोंका उद्गाता हुआ ) यह श्रुति विज्ञानको उद्गाता कर्तृक दिखलाती है । जो यह कहा गया है कि कर्ता आश्रय फलश्रुति है, यह दोष नहीं है, क्योंकि ऋत्विक् यजमानके लिए है, अतः वचनसे अन्यत्र ऋत्विक्का फल सम्बन्ध अनुपपन्न है ॥ ४५ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका होता है । पूर्वपक्ष में इन उपासनाओंका कर्ता यजमान है, क्योंकि ' वर्षति हास्मै ' इत्यादि फलश्रुति है, कारण कि कर्तृत्व और मोक्तृत्व एकमें ही युक्त है । जैसे साङ्ग क्रतुमें अधिकृतका अधिकार होनेसे गोदोहनका फल क्रतुके अधिकारीको प्राप्त होता है, वैसे बङ्गाश्रित उपासनामों का फल भी यजमानको प्राप्त होता है, क्योंकि अधिकृत अधिकारी है । यद्यपि ऋत्विक् के लिए भी फलका श्रवण है, तो भी यजमान कर्तृक भोक्तृक फलका बाधक न होनेसे उपासनाओंका फल कर्ता यजमान को ही प्राप्त होता है ॥ ४४ ॥

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अधि ० १४ सू ० ४७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी -दीपिका सहित ७८३ ' यां वै कांचन यज्ञे ऋत्विज आशिषमाशासत इति यजमानायैव तामाशासत इति होवाच ' इति, ' तस्मादु हैवंविदुद्गाता ब्रूयात्कं ते काममागायानि ' ( छा ० १।१८ - ९ ) इति । तच्चविकर्तृ-कस्य विज्ञानस्य यजमानगामि फलं दर्शयति । तस्मादङ्गोपासनानामृत्विक्कर्मत्वसिद्धिः ॥४६ ॥

( १४ सहकार्यन्तरविध्यधिकरणम् । सू ० ४७४ ९ ) सहकार्यन्तरविधिः पक्षेण तृतीयं तद्वतो विध्यादिवत् ॥ ४७ ॥

पदच्छेद — सहकार्यन्वरविधिः, पक्षेण, तृतीयम्, तद्वतः विध्यादिवत् । सूत्रार्थ -- ( सहकायंन्तरविधिः ) ' बाल्यं च पाण्डित्यं ० ' इस श्रुति में विद्याके सहकारी मौनको अपूर्व होने से विधि समझना चाहिए, ( तृतीयम् ) और श्रवण आदि साधनोंमें तृतीय साधन निदिध्यासन मौनशब्दसे विहित है, ( तद्वतः ) परोक्ष ज्ञानयुक्त संन्यासियोंके लिए साक्षात्कार निमित्त यह विधि है, ( पक्षेण ) जिस पक्षमें भेद दर्शनकी प्राप्ति है उस पक्ष से साक्षात्कार की प्राप्ति न होनेसे यह विधि सार्थक है | ( विध्यादिवत् ) जैसे दर्शपूर्णमास प्रधान विधिमें अन्वाधान अङ्गोंकी विधि होती है, वैसे यहाँ मौनकी विधि है । * ' तस्माद्ब्राह्मणः पाण्डित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेद् बाल्यं च पाण्डित्यं च निर्विद्याथ मुनि-रमौनं च मौनं च निर्विद्याथ ब्राह्मण: ' ( बृह ० ३।५।१ ) इति बृहदारण्यके श्रूयते । तत्र संशयः-मौनं विधीयते न वेति । न विधीयत इति तावत्प्राप्तम्, बाल्येन तिष्ठासेदित्यत्रैव विधेरव-सितत्वात् । न ह्यथ मुनिरित्यत्र विधायिका विभक्तिरूपलभ्यते, तस्मादयमनुवादो युक्तः । कुतः प्राप्तिरिति चेत्- मुनिपण्डित शब्दयोर्ज्ञानार्थत्वात्पाण्डित्यं निर्विद्येत्येवं प्राप्तं मौनम् । ' यां वै कांचन ० ' ( ऋत्विक् यज्ञमें जिस किसी कामकी प्रार्थना करते हैं यजमानके लिए ही उसकी प्रार्थना करते हैं, ऐसा उसने कहा ) ' लस्मादु ० ' ( अतः इस प्रकार जाननेवाला उद्गाता यजमानसे इस प्रकार कहे कि मैं तेरे लिए किन इष्ट कामनाओंका आगान करूँ ) इस प्रकार श्रुतियाँ ऋत्विक् कर्तृक उपासनाका फल यजमानगामी दिखलाती हैं । इसलिए अजोपासनाओंमें ऋत्विक् कर्मत्व सिद्ध होता है ॥ ४६ ॥

' तस्माद्ब्राह्मण: ० ' ( अत: ब्राह्मण आत्मज्ञानका पूर्णदया संपादन कर आत्मज्ञानरूप बलसे स्थित रहने की इच्छा करे । फिर बाल्य और पाण्डित्यको पूर्णतया प्राप्तकर वह मुनि होता है । तथा मौन और मौनका पूर्णतया संपादनकर ब्राह्मण कृतकृत्य होता है ) ऐसी बृहदारण्यकमें श्रुति है । उसमें संशय होता है कि मौनका विधान किया जाता है अथवा नहीं? पूर्वपक्षी - मौनका विधान नहीं किया जाता, ऐसा प्राप्त होता है । क्योंकि ' बाल्येन तिष्ठासेत् ' यहाँपर ही विधि समाप्त हो जाती है । कारण कि ' अथ मुनि: ' इसमें विधायक विधि प्रतिपादक विभक्ति उपलब्ध नहीं होती, इससे यह अनुवाद युक्त है । ऐसा यदि कहो कि मौनकी कहाँसे प्राप्ति हुई, तो मुनि और पाण्डित्य शब्दोंके ज्ञानार्थंक होने से ' पाण्डित्यं निर्विद्य ' इससे मौन प्राप्त होता है । और ' अमौनं च मौनं च ० ' ( अमोन और मौनका पूर्णतया संपादनकर ब्राह्मण कृतकृत्य होता है ) यहाँ ब्राह्मणत्का विधान नहीं किया सत्यानन्दी -दीपिका * विधुर आदि मन्द अधिकायिोंके लिए ज्ञानका साधन जप, तप आदि और मध्यम अधि-कारियोंके लिए ज्ञानका साधन अङ्गोपासनाको कहकर अब प्रसङ्गवश उत्तम अधिकारियोंके लिए ज्ञानका साधन ‘ सहकार्यन्तरविधिः ' इत्यादिसे कहते हैं । पूर्वपक्षमें मुमुक्षुको मौन अनुष्ठेय नहीं है, सिद्धान्त में मौन अनुष्ठेय है ॥ ४७ ॥

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७८४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ४ अपि च- ' अमौनं च मौनं च निर्विद्याथ ब्राह्मण: ' इत्यत्र तावन्न ब्राह्मणत्वं विधोयते, प्रागेव प्राप्तत्वात् । तस्मात् ' अथ ब्राह्मणः इति प्रशंसावादस्तथैवाथ मुनिरित्यपि भवितुमर्हति समान निर्देशत्वादिति । एवं प्राप्ते ब्रूमः - सहकार्यन्तरविधिरिति । विद्यासहकारिणो मौन-स्य बाल्यपाण्डित्यवद्विधिरेवाश्रयितव्यः, अपूर्वत्वात् । ननु पाण्डित्यशब्देनैव मौनस्याव-गतत्वमुक्तम् । नैष दोषः, मुनिशब्दस्य ज्ञानातिशयार्थत्वात् मननान्मुनिरिति च व्युत्प-त्तिसंभवात्, ' मुनीनामप्यहं व्यासः ' ( गी ० १० ३७ ) इति च प्रयोगदर्शनात् । ननु मुनि शब्द उत्तमाश्रमवचनोऽपि श्रूयते - ' गार्हस्थ्यमाचार्यकुलं मौनं वानप्रस्थम् ' इत्यत्र, न, ' वाल्मी-किर्मुनिपुंगवः ' इत्यादिषु व्यभिचारदर्शनात् । इतराश्रमसंनिधानात्तु पारिशेष्यात्तत्रोत्त माश्रमोपादानं ज्ञानप्रधानत्वादुत्तमाश्रमस्य । तस्माद्वाल्यपाण्डित्यापेक्षया तृतीयमिदं मौनं ज्ञानातिशयरूपं विधीयते । यत्तु बाल्य एव विधेः पर्यवसानमिति, तथाप्यपूर्वत्वा-न्मुनित्वस्य विधेयत्वमाश्रीयते मुनिः स्यादिति । निर्वेदनीयत्व निर्देशादपि मौनस्य बाल्यपाण्डित्यवद्विधेयत्वाश्रयणम् । तद्वतो विद्यावतः संन्यासिनः, कथं विद्यावतः संन्या-सिन इत्यवगम्यते? तदधिकारात् ' आत्मानं विदित्वा पुत्राद्येशणाभ्यो व्युत्थायाथ मिक्षाचर्य चरन्ति ' इति । ननु सति विद्यावत्त्वे प्राप्नोत्येव तत्रातिशयः किं मौनविधिनेत्यत आह-पक्षेणेति । एतदुक्तं भवति यस्मिन्पक्षे भेददर्शनप्राबल्यान्न प्राप्नोति, तस्मिन्नैष विधि-रिति । विध्यादिवत् । यथा - ' दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत ' इत्येवंजातीयके विध्यादौ सहकारित्वेनाग्न्यन्वाधानादिकमङ्गजानं विधीयते । एवमविधिप्रधानेऽप्यस्मिन्विद्यावाक्ये मौनविधिरित्यर्थः ॥ ४७ ॥

जाता, क्योंकि वह [ विविदिषन्ति ब्राह्मणाः ] पूर्वसे प्राप्त है । इसलिए ' अथ ब्राह्मण: ' यह प्रशंसावाद ही है । इसीप्रकार ' अथ मुनिः ' यह भी प्रशंसावाद ही हो सकता है, क्योंकि दोनों में समानरूपसे निर्देश है । सिद्धान्ती --- ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - ' सहकार्यन्तरविधिः ' विद्या सहकारी मौनकी बाल्य और पाण्डित्य के समान विधि ही आश्रयण करनी चाहिए, क्योंकि वह अपूर्व है । परन्तु यह कहा गया है कि पाण्डित्यशब्दसे ही मौन अवगत है? यह दोष नहीं है, क्योंकि मुनि शब्द ज्ञानाति-श्यार्थक है और ' मननसे मुनि ' इस व्युत्पत्तिका संभव है, धौर ' मुनीनामप्यहं व्यासः ' ( मुनियोंमें भी मैं व्यास हूँ ) इस प्रकार प्रयोग देखने में आता है । परन्तु " गार्हस्थ्यमाचार्यकुलं ० ' ( गार्हस्थ्य, आचार्य कुल, मौन और वानप्रस्थ ) इस श्रुतिमें मुनिशब्द उत्तमाश्रमका वाचक भी है? नहीं, क्योंकि ' वाल्मीकि र्मुनिपुङ्गव ' इत्यादिमें व्यभिचार दिखाई देता है । परन्तु अन्य बाश्रमोंके सन्निधानसे और परिशेष इस वचनमें उत्तम आश्रमका ग्रहण है, कारण कि उत्तम आश्रम ज्ञान प्रधान है । इसलिए बाल्यमें ही विधिका पर्यवसान किया गया है, तो भी मुनित्वका अपूर्व होनेसे ' मुनिः स्यात् ' इस प्रकार विधेयत्व आश्रयण किया जाता है । मोनका निर्वेदनीयरूपसे निर्देश होने से भी बाल्य और पाण्डित्य के समान विधेयत्व आश्रयण है । ' तद्वतो ' विद्यावान् - संन्यासीका । विद्यावान् - संन्यासीका, ऐसा किससे अवगत होता है? इससे कि ' आत्मानं विदित्वा ० ' ( आत्माको जानकर पुत्र आदि एषणाका त्यागकर अनन्तरमिक्षाचर्यं करते हैं ) इस प्रकार संन्यासीका अधिकार है । परन्तु विद्यावत्त्व होनेपर उसमें अतिशय प्राप्त होता ही है, तो मौन विधिका क्या प्रयोजन? इसपर कहते हैं - ' पक्षेण ' अभिप्राय यह - जिस पक्षमें भेद दर्शनकी प्रधानतासे [ ज्ञानातिशय ] प्राप्त नहीं होता उस पक्ष में यह विधि है । विधि आदिके समान । जैसे ' दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत ' इस प्रकारकी विधि आदिमें सहकारि-रूपसे अग्निके अन्वाधान आदि अङ्ग समूहका विधान किया जाता है । इस प्रकार अविधि प्रधान इस विद्यावाक्यमें भी मौन विधि है, ऐसा अर्थ है ॥ ४७ ॥

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अधि ० १४ सू ० ४८-४९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७८५ • एवं बाल्यादिविशिष्टे कैवल्याश्रमे श्रुतिमति विद्यमाने कस्माच्छान्दोग्ये गृहिणोप-संहारः ‘ अभिसमावृत्य कुटुम्बे ' ( छा ० ८ | १५ || ) इत्यत्र? तेन ह्युपसंहरंस्तद्विषयमादरं दर्शयतीति । अत उत्तरं पठति--कृत्स्नमावात गृहिणोपसंहारः ॥ ४८ ॥

पदच्छेद- कृत्स्नभावात् तु गृहिणा, उपसंहारः । सूत्रार्थ - ( कृत्स्नभावात् ) गृहस्थाश्रम में विशेषरूपसे विद्यमान हैं, अतः यज्ञ आदि और आश्रमान्तर विहित शर्मा आदिका ( गृहिणा ) गृहस्थाश्रमसे ( उपसंहारः ) उपसंहार किया गया है, ( तु ) शब्द विशेषणार्थंक है । * तुशब्दो विशेषणार्थः । कृत्स्नभावोऽस्य विशेष्यते । बहुलायासानि हि बहुन्या-श्रमकर्माणि यज्ञादीनि तं प्रति कर्तव्यतयोपदिष्टानि, आश्रमान्तरकर्माणि च यथासंभव-महिंसेन्द्रियसंयमादीनि तस्य विद्यन्ते । तस्माद्गृहमेधिनोपसंहारो न विरुध्यते ॥४८ ॥

मौनवदितरेषामप्युपदेशात् ॥ ४ ९ ॥ पदच्छेद - मौनवत्, इतरेषाम्, अपि, उपदेशात् । सूत्रार्थ - ( मौनवत् ) जैसे मौन और गृहस्थाश्रम श्रुति सम्मत हैं, वैसे ( इतरेषामपि ) वानप्रस्थ और ब्रह्मचार्याश्रम मी श्रुति सम्मत हैं, ( उपदेशात् ) क्योंकि चारों आश्रमोंका श्रुतिमें उपदेश है । * यथा मौनं गार्हस्थ्यं चैतावाश्रमौ श्रुतिमन्तावेवमितरावपि वानप्रस्थगुरुकुला-वासौ । दर्शिता हि पुरस्ताच्छ्रुतिः- तप एव द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयः ' ( छा ० २।२३।१ ) इत्याद्या | तस्माच्चतुर्णामप्याश्रमाणामुपदेशाविशेषात्तुल्यवद्विकल्पसमुच्चया-भ्यां प्रतिपत्तिः । इतरेषामिति द्वयोराश्रमयोर्बहुवचनं वृत्तिभेदापेक्षयाऽनुष्ठातृभेदापेक्षया वेति द्रष्टव्यम् ॥ ४ ९ ॥ इस प्रकार बाल्य आदि विशिष्ट श्रुति प्रतिपादित कैवल्याश्रमके विद्यमान होनेपर छान्दोग्यो-पनिषद् में ' अभिसमावृत्य कुटुम्बे ' ( आचार्यकुलसे समावर्तनकर कुटुम्ब - गृहस्थाश्रममें स्थित हो पवित्र स्थानमें स्वाध्याय करता हुआ ) इस वाक्य में गृहीसे किस प्रकार उपसंहार किया जाता है? इससे उपसंहार करता हुआ श्रुतिवाक्य गृहस्थाश्रम विषयक आदर दिखलाता है । अतः उत्तर कहते हैं— सूत्रस्थ ' तु ' शब्द विशेषणार्थंक है । उससे गृहस्थाश्रमकी पूर्णता विशेषण विशिष्ट की जाती है, क्योंकि बहुत आयासवाले बहुतसे यज्ञ आदि आश्रमकर्म गृहस्थाश्रम के लिए कर्तव्यरूपसे उपदिष्ट हैं और अहिंसा, इन्द्रियसंयम आदि अन्य आश्रमके कर्म भी यथासंभव उसमें विद्यमान हैं, छतः गृहस्थाश्रमले उपसंहार विरुद्ध नहीं है ॥ ४८ ॥

जैसे मौन -संन्यासाश्रम और गृहस्थाश्रम ये दो आश्रम श्रुतिसम्मत हैं, वैसे वानप्रस्थ और गुरुकुलवास- ब्रह्मचर्याश्रम ये अन्य दो आश्रम भी श्रुतिसम्मत हैं, क्योंकि ' तप एव द्वितीयो ० ' ( तप हो द्वितीय धर्मस्कन्ध है और ब्रह्मचारी आचार्यं कुलवासी यह तृतीय धर्मस्कन्ध है ) इत्यादि श्रुति पूर्व में दिखलाई गई है । इसलिए चारों आश्रमोंका भी अविशेष उपदेश होनेसे उनकी समानरूपसे विकल्प और समुच्चयसे प्रतीति होती है । इतरेषाम् ( अन्योंका ) इसप्रकार दो आश्रमोंके लिए बहु-वचन वृत्तिभेदसे अथवा अनुष्ठाता के भेदसे है, ऐसा समझना चाहिए ॥ ४ ९ ॥ सत्यानन्दी - दीपिका * यहाँ संन्यासाश्रम अभावको लेकर गृहस्थाश्रमसे उपसंहार नहीं है, क्योंकि संन्यासाश्रम प्रतिपादक अनेक श्रुति, स्मृतिवाक्य हैं ॥ ४८ ॥

* सूत्रकारने प्रथम दो सूत्रोंसे संन्यास और गृहस्थ आश्रमोंका प्रतिपादन किया है, अत:

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७८६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ४ ( १५ अनाविष्काराधिकरणम् । सू ० ५० ) अनाविष्कुर्वन्नन्वयात् ॥ ५० ॥

पदच्छेद – अनाविष्कुर्वन्, अन्वयात् । सूत्रार्थ - ( अनाविष्कुर्वन् ) बालक के समान अपने ज्ञान आदिको लोगों में प्रकट न करता हुआ ' केवल शुद्ध भाव हो ' इतना ही ' अव्यक्तलिङ्गः ' इत्यादि श्रुतिसे विहित है । ( अन्वयात् ) क्योंकि तावन्मात्र ही ज्ञानके अभ्यासमें अनुगत है । * ' तस्माद्ब्राह्मणः पाण्डित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेत् ' ( बृह ० ३ | ५ | १ ) इति बाल्यमनु-ष्ठेयतया श्रूयते । तत्र बालस्य भावः कर्म वा बाल्यमिति तद्धिते सति बालभावस्य वयोविशेष-स्वेच्छया संपादयितुमशक्यत्वाद्यथोपपाद मूत्रपुरीषत्वादिबालचरितमन्तर्गता वा भाव-विशुद्धिरप्ररूढेन्द्रियत्वं दम्भदर्पादिरहितत्वं वा बाल्यं स्यादिति संशयः । किं तावत्प्राप्तम्? कामचारवादभक्षणता यथोपपादमूत्रपुरीषत्वं च प्रसिद्धतरं लोके बाल्यमिति तद्ग्रहणं युक्तम् । ननु पतितत्वादिदोषप्राप्तेर्न युक्तं कामचारताद्याश्रयणम्, न, विद्यावतः संन्यासिनो वचनसामर्थ्याद्दोष निवृत्तिः, पशुहिंसादिष्विवेति । एवं प्राप्तेऽभिधीयते -न, वचनस्य गत्यन्तुरसंभवात् । अविरुद्धे ह्यन्यस्मिन्वाल्यशब्दाभिलप्ये लभ्यमाने न विध्यन्तरव्याघात-कायुक्ता । प्रधानोपकाराय चाङ्गं विधीयते । ज्ञानाभ्यासश्च प्रधानमिह यतीनामनुष्ठे-' तस्माद्ब्राह्मणः ०, ( इसलिए ब्राह्मणको पाण्डित्य - आत्मज्ञानका पूर्णतया सम्पादनकर बाल्य-ज्ञानबलभावसे स्थित रहना चाहिए ) इसप्रकार बाल्यकी अनुष्ठानरूपसे श्रुति है । यहाँ बालका भाव अथवा बालका कर्म बाल्य है इसप्रकार तद्धित प्रत्यय होनेपर बालभाव - वयोविशेषका इच्छासे सम्पादन नहीं किया जा सकता, अतः यथासम्भव मूत्र, पुरीषत्वका त्याग आदि बालचरित बाल्य है अथवा अन्तर्गत मावविशुद्धि अथवा दम्म दर्प और इन्द्रिय प्ररूढ आदिसे रहित बाल्य होना चाहिए, ऐसा संशय होता है । तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - इच्छानुसार वदन, मक्षण, यथेच्छ मूत्र, पुरीषका त्याग, ऐसा बाल्य लोक में अतिप्रसिद्ध है, उसका ग्रहण युक्त है । परन्तु पतितत्व आदि दोषकी प्राप्ति होनेसे कामचारता आदिका आश्रयण युक्त नहीं है । ऐसा नहीं, क्योंकि विद्यावान् संन्यासीका वचनकी सामर्थ्य दोष निवृत्त हो जाता है, जैसे विधि प्राप्त पशुहिंसा आदिमें दोष नहीं होता है । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं - नहीं, क्योंकि [ बाल्येन तिष्ठासेत् ] इस वचनकी अन्य गति हो सकती है । बाल्य शब्द वाच्य अन्य अविरुद्ध अर्थके उपलब्ध होनेपर अन्य विधिके व्याघातकी कल्पना युक्त नहीं है । प्रधानके उपकारके लिए अङ्गका विधान किया जाता है । यहां ज्ञाना-भ्यास यतियोंके लिए प्रधान अनुष्ठेय है । परन्तु सम्पूर्ण बालचर्या अङ्गीकार किये जानेपर ज्ञानाभ्यास सत्यानन्दी -दीपिका इनसे अतिरिक्त अन्य दो आश्रमोंके न होनेका यदि किसीको भ्रम हो तो ' मौनवत् ' इत्यादिसे निवृत्त करते हैं । प्रत्येक आश्रमका भेद ( ब्रह्मसूत्र ३, ४, १८ ) इस सूत्र की ' सत्यानन्दी - दीपिका ' में द्रष्टव्य है । इसप्रकार चार आश्रमोंका विशेषरूपसे उपदेश होनेसे ' यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रत्रजेद् गृहाद्वा-वनाद्वा ' यह विकल्प और ' ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेद्गृहीभूत्वा वनी भवेत्, वनीभूत्वा प्रव्रजेत् ' यह समुच्चय समानरूपसे समझना चाहिए ॥ ४ ९ ॥ * पूर्वपक्ष में- ' बाल्येन तिष्ठासेत् ' इस विधि वाक्यमें बाल्यशब्द से लोक प्रसिद्ध यथेच्छ खान, पान आदि ग्राह्य है । इसलिए इसप्रकारका यथेच्छ बालभ्यवहार विद्वान् द्वारा विद्याके अङ्गरूपसे अनुष्ठेय है, सिद्धान्त में - बाल्यशब्दसे भावशुद्धि विद्वानके लिए अनुष्ठेय है ।