श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 821–830
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 821–830
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अधि ० १६ सू ० ५१ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७८७ यम् । नच सकलायां बालचर्यायामङ्गीक्रियमाणायां ज्ञानाभ्यासः संभाव्यते । तस्मादा-न्तरो भावविशेषो बालस्याप्ररूढेन्द्रियत्वादिरिह बाल्यमा श्रीयते । तदाह- अनाविष्कुर्व-निति । ज्ञानाध्ययनधार्मिकत्वादिभिरात्मानमविख्यापयन्दम्भदर्पादिरहितो भवेत् । यथा बालोऽप्ररूढेन्द्रियतया न परेषामात्मानमाविष्कर्तुमीहते, तद्वत् । एवं ह्यस्य वाक्यस्य प्रधानोपकार्यर्थानुगम उपपद्यते । तथा चोक्तं स्मृतिकारैः - ' यं न सन्तं न चासन्तं नाश्रुतं न बहुश्रुतम् । न सुवृत्तं न दुर्वृत्तं वेद कश्चित्स ब्राह्मणः । गूढधर्माश्रितो विद्वानज्ञातचरितं चरेत् । अन्ध-वज्जडवच्चापि मूकवच्च महीं चरेत् ' ॥ अव्यक्तलिङ्गोऽव्यक्ताचारः ' इति चैवमादि || ५० || ( १६ ऐहिकाधिकरणम् । सू ० ५१ ) ऐहिकमप्यप्रस्तुत प्रतिबन्धे यदर्शनात् ॥ ५१ ॥
पदच्छेद - ऐहिकम् अपि 3 अप्रस्तुतप्रतिबन्धे " तद्दर्शनात् । सूत्रार्थ - ( अप्रस्तुत प्रतिबन्धे ) प्रस्तुत प्रतिबन्धके न होनेपर ( ऐहिकमपि ) इस जन्म में भी विद्याकी उत्पत्ति होती है, ( तद्दर्शनात् ) क्योंकि ' गर्भ एवैतच्छयानो वामदेव: ' इत्यादि श्रुतियोंमें उसे देखा जाता है | * ' सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत् ' ( ब्रह्मसूत्र ३।४।२६ ) इत्यत आरभ्योच्चावचं विद्या-साधनमवधारितम्, तत्फलं विद्या सिध्यन्ती किमिहैव जन्मनि सिध्यत्युत कदाचिदमुत्रा-पीति चिन्त्यते । किं तावत्प्राप्तम्? इहैवेति । किं कारणम्? श्रवणादिपूर्विका हि विद्या । नच कश्चिदत्र मे विद्या जायतामित्यभिसंधाय श्रवणादिषु प्रवर्वते । समान एव तु जन्मनि की संभावना नहीं होगी । इसलिए बालका आन्तर भावविशेष अप्ररूढ इन्द्रियत्व यादि बाल्य यहाँ आश्रयण किया जाता है । उसे कहते हैं - ' अनाविष्कुर्वन् ज्ञान, अध्ययन, धार्मिकत्व आदिसे अपनी ख्याति न करता हुआ दम्म, दर्प आदिसे रहित हो, जैसे बालक इन्द्रियोंके प्ररूढ न होनेसे अपनेको अन्योंके आगे प्रकट करनेकी चेटा नहीं करता, वैसे विद्वानके विषयमें समझना चाहिए । इसप्रकार [ बाल्येन तिष्ठासेत् ] इस वाक्यका प्रधानोपाकारी - ज्ञानाभ्यासोपकारी अर्थानुग " होता है । और इसीप्रकार ' यं न सन्तं ० ' ( जिसे कोई न सत्, न असत्, न अश्रुत, न बहुश्रुत, न सुवृत्त और न दुवृत्त जानता है वह ब्राह्मण है | गूढ धर्मका आश्रय करता हुआ विद्वान् दूसरोंसे अज्ञात चरित होकर विचरण करे | अन्धके समान, जड़के समान और मूकके समान पृथिवी पर विचरण करे ) ( अब्यक्त-लिङ्ग और अव्यक्त आचारवाला हो ) इत्यादि स्मृतिकारोंने कहा है ॥ ५० ॥
' सर्वापेक्षा च ' इस सूत्र से आरम्भकर नाना प्रकार के विद्यासाधनों का निश्चय किया गया है । उन साधनोंके फलरूपसे सिद्ध होती हुई विद्या इसी जन्म में सिद्ध होती है अथवा कदाचित् अन्य जन्ममें मी? इसपर विचार किया जाता है । तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - इसी जन्ममें विद्या सिद्ध होती है, क्योंकि विद्या श्रवण आदि पूर्विका है । मुझे अन्य जन्ममें विद्या उत्पन्न हो ऐसा संकल्पकर कोई भी श्रवण आदिमें प्रवृत्त नहीं होता । किन्तु इसी जन्म में विद्याजन्मका संकल्पकर इन साधनों में सत्यानन्दी -दीपिका # सिद्धान्ती - बालके यावत् बाह्य चरित ग्राह्य नहीं हैं, क्योंकि ' यस्त्व विज्ञानवान्भवत्य मनस्कः सदाऽशुचिः ' ( कठ ० १।३।७ ) ( किन्तु जो बुद्धि युक्त नहीं है, स्थिर चित्त नहीं है और सदा अपवित्र रहता है वह उस ब्रह्मलोकको प्राप्त नहीं होता ) इत्यादि शौच आदिका नियामक शास्त्र है ॥ ५० ॥
* ऐहिक और पारलौकिक साधनोंका फल दो प्रकारका होता है । जैसे कारीरियागका ऐहिक वृष्टि फल है और दर्शपूर्णमास आदि यागका अदृष्टद्वारा जन्मान्तरमें फल है । इस प्रकार विद्या मी
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७८८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ४ विद्याजन्माभिसंधायैतेषु प्रवर्तमानो दृश्यते । यज्ञादोन्यपि श्रवणादिद्वारेणैव विद्यां जन-यन्ति, प्रमाणजन्यत्वाद्विद्यायाः । तस्मादैहिकमेव विद्याजन्मेति । एवं प्राप्ते वदामः-ऐहिकं विद्याजन्म भवत्यसति अप्रस्तुतप्रतिबन्ध इति । एतदुक्तं भवति - यदा प्रक्रान्तस्य विद्यासाधनस्य कश्चित्प्रतिबन्धो न क्रियत उपस्थित विपाकेन कर्मान्तरेण, तदेव विद्यो -त्पद्यते यदा तु खलु तत्प्रतिबन्धः क्रियते तदामुत्रेति । उपस्थितविपाकत्वं च कर्मणो देशकालनिमित्तोपनिपाताद्भवति । यानि चैकस्य कर्मणो विपाचकानि देशकालनिमि-त्तानि तान्येवान्यस्यापीति न नियन्तुं शक्यते । यतो विरुद्धफलान्यपि कर्माणि भवन्ति । शास्त्रमप्यस्य कर्मण इदं फलं भवतीत्येतावति पर्यवसितम्, न देशकालनिमित्तविशेष-मपि संकीर्तयति । साधनवीर्यविशेषावतीन्द्रिया कस्यचिच्छक्तिराविर्भवति, तत्प्रतिबद्धा परस्य तिष्ठति न चाविशेषेण विद्यायामभिसंधिर्नोत्पद्यते, इहामुत्र वा मे विद्या जायतामित्यभिसंधेर्निरङ्कुशत्वात् । श्रवणादिद्वारेणापि विद्योत्पद्यमाना प्रतिबन्धक्ष-यापेक्षयैवोत्पद्यते । तथा च श्रुतिदुर्बोधत्वमात्मनो दर्शयति- ' श्रवणायापि बहु-भिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः । आश्चर्योऽस्य वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा-श्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्ट: ' ( कठ ० २ | ७ ) इति । गर्भस्थ एव व वामदेवः प्रतिपेदे ब्रह्मभावमिति वदन्ती जन्मान्तरसंचितात्साधना जन्मान्तरे विद्योत्पत्तिं दर्शयति । नहि प्रवृत्त होता हुआ देखा जाता है । यज्ञ आदि मो श्रवण आदि द्वारा ही विद्याको उत्पन्न करते हैं, क्योंकि विद्या प्रमाणजन्य है । इसलिए विद्याका जन्म इसी जन्म में ही होनेपर हम कहते हैं - प्रस्तुत प्रतिबन्धके न होनेपर इसी जन्म में विद्या यह है - जब प्रक्रान्त - पूर्ववर्णित विद्यासाधनका उपस्थित विपाकवाले अन्य किया जाता, तब इसी जन्म में विद्या उत्पन्न होती है और यदि उसका अन्य जन्म में उत्पन्न होती है । कर्ममें उपस्थित विपाकत्व देश, काल होता है । जो देश, काल और निमित्त एक कर्मके विपाचक हैं, वे अन्य नहीं किया जा सकता, क्योंकि विरुद्ध फलवाले भी कर्म होते हैं । शास्त्र है । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त उत्पन्न होती है । अभिप्राय कर्मसे कोई प्रतिबन्ध नहीं प्रतिबन्ध किया जाता है तो और निमित्तोंके प्राप्त होने से कर्मके भी हैं, ऐसा नियम जो इस कर्मका यह फल होता है, इतने मात्र में पर्यवसित होता है । देश, काल और निमित्त विशेषका संकीर्तन नहीं करता है | साधन सामर्थ्यविशेषसे किसीकी अतीन्द्रिय शक्ति आविर्भूत होती है और अन्यकी उससे प्रतिबद्ध होती हुई स्थित रहती है । और अविशेषरूपसे विद्या में अभिसन्धि उत्पन्न नहीं होती, ऐसा भी नहीं है, क्योंकि इस जन्ममें अथवा अन्य जन्ममें मुझे विद्या उत्पन्न हो, ऐसी अभिसन्धि निरङ्कय है | श्रवण मदि द्वारा भी उत्पन्न होनेवाली विद्या प्रतिबन्धक्षयकी अपेक्षास ही उत्पन्न होती है । और इसी प्रकार श्रुति आत्माका दुर्बोधत्व दिखलाती है - ' श्रवणायापि ० ' ( जो बहुतों को श्रवण के लिए भी प्राप्त होने योग्य नहीं है, जिसे बहुत श्रवण करते हुए भी नहीं समझते उस आत्मतत्त्वका निरूपण करनेवाला भी आश्चर्यरूप है, उसे प्राप्त करनेवाला मी निपुण पुरुष ही होता है तथा कुशल आचार्य द्वारा उपदेश किया हुआ ज्ञाता भी आश्चर्यरूप ही है ) और गर्भस्थित ही वामदेवने ब्रह्मभाव प्राप्त किया, ऐसा सत्यानन्दी - दीपिका इसी जन्म में उत्पन्न होती है अथवा जन्मान्तरमें? पूर्वपक्ष में कारीरियागफलके समान विद्या इसी जन्म में उत्पन्न होती है । यज्ञ आदि भी चित्तशुद्धि द्वारा विविदिषा उत्पन्नकर श्रवणादिसे विद्याको उत्पन्न करते हैं 1 । यदि इसी जन्म में विद्याकी उत्पत्ति न माने तो श्रवण आदि विद्याके हेतु सिद्ध नहीं होंगे । * प्रतिबन्धके सद्भावमें ‘ शृण्वन्तोऽपि बहुवो यं न विद्यु: ० ' ( कठ ० २, ७ ) ( बहुत से लोग सुनते हुए भी उस आत्मतत्त्वको यथार्थरूपसे नहीं जानते ) ' श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ' ( गीता २।२ ९ ) ( कोई - कोई सुनकर भी इस आत्मतत्त्वको नहीं जानता ) इत्यादि श्रुति और स्मृति प्रमाण हैं ॥ ५१ ॥
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अधि ० १७ सू ० ५२ ] भाषानुवाद सत्यानन्दी -दीपिकासहित ७८ ९ गर्भस्थस्यैवैहिकं किंचित्साधनं संभाव्यते । स्मृतावपि - ' अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ' ( गी ० ६।३७ ) इत्यजुनेन पृष्टो भगवान्वासुदेवः ' नहि कल्याणकृत्कश्चिदुर्गतिं तात गच्छति ' ( गी ० ६।४० ) इत्युक्त्वा पुनस्तस्य पुण्यलोकप्राप्तिं साधुकुले संभूतिं चाभि-धायानन्तरम् -'तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ' ( गी ० ६।४३ ) इत्यादिना ' अनेकजन्म-संसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ' ( गी ० ६ । ४५ ) इत्यन्तेनैतदेव दर्शयति । तस्मादैहिकमा-मुष्मिकं वा विद्याजन्म प्रतिबन्धक्षयापेक्षयेति स्थितम् ॥ ५१ ॥
( १७ मुक्तिफलाधिकरणम् । सू ०५२ ) एवं मुक्तिफलानियमस्तदवस्थावधृतेस्तदवस्थावधृतेः ॥ ५२ ॥
पदच्छेद - एवम्, मुक्तिफलानियमः, तदवस्थावधृतेः, तदवस्थावधृतेः । सूत्रार्थ - ( एवम् ) ब्रह्म साक्षात्कार के समान, ( मुक्तिफलानियमः ) मुक्तिफलमें भी विशेष नियम नहीं है, ( तदवस्थावधृतेः ) क्योंकि उस मुक्त्यवस्थाका सब वेदान्तोंमें एकरूप ही अवधारण किया गया है । ' तदवस्थावधृते: ' इस पदका दो वार उच्चारण बध्यायकी परिसमाप्तिका सूचक है । * यथा मुमुक्षोर्विद्यासाधनावलम्बिनः साधनवीर्यविशेषाद्विद्यालक्षणे फल ऐहिका-मुष्मिकफलत्वकृतो विशेषप्रतिनियमो दृष्टः । एवं मुक्तिलक्षणेऽप्युत्कर्षापकर्षकृतः कश्चि-द्विशेषप्रतिनियमः स्यादित्याशङ्कयाह - एवं मुक्तिफलानियम इति । न खलु मुक्तिफले कश्चिदेवंभूतो विशेषप्रतिनियम आशङ्कितव्यः । कुतः? तदवस्थावधृतेः । मुक्त्यवस्था हि सर्ववेदान्तेष्वेकरूपैवावधार्यते । ब्रह्मैव हि मुक्त्यवस्था, नच ब्रह्मणोऽनेकाकारयोगोऽस्ति, एक लिङ्गत्वावधारणात्, ' अस्थूलमनणु ' ( बृह ० ३।८1० ), ' स एष नेति नेत्यात्मा ' ( बृह ० ३।९ ।२६ ), ' यत्र नान्यत्पश्यति ' ( छा ० ७ | २४ | १ ) ' ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्तात् ' ( मुण्ड ० २।२1११ ), ' इदं सर्वं कहती हुई श्रुति जन्मान्तर संचित साधनसे भी जन्मान्तरमें विद्याकी उत्पत्ति दिखलाती है । गमं-स्थित में किसी ऐहिक साधनको संभावना नहीं की जाती । स्मृतिमें मी ' अप्राप्य योगसंसिद्धिं ० ' ( हे कृष्ण! योगफल - सम्यग्दर्शनको प्राप्त किए विना वह किस गतिको प्राप्त होता है ) इस प्रकार अर्जुन द्वारा पूछे गए भगवान् वासुदेव ' नहि कल्याणकृत् ० ' ( हे तात! कोई भी कल्याणकृत् कुत्सित गतिको प्राप्त नहीं होता ) ऐसा कहकर पुनः उसकी पुण्यलोक प्राप्ति और साधुकुलमें उत्पत्ति कहकर अनन्तर ‘ तन तं ० ' ( उस योगी कुल में पूर्वं देहमें स्थित बुद्धि संयोगको प्राप्त करता है ) इत्यादिसे लेकर ‘ अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो ० ' ( अनेक जन्मोंमें उपचित हुए संस्कारोंसे सम्यग्ज्ञानी होकर श्रेष्ठगतिको प्राप्त होता है ) यहाँ तक यही बात दिखलाते हैं । इसलिए इस जन्ममें अथवा अन्य जन्म में प्रतिबन्ध क्षयकी पेक्षा विद्याजन्म होता है, यह सिद्ध हुआ ॥ ५१ ॥
जैसे विद्या साधनका अवलम्बन करनेवाले मुमुक्षुका साधनके सामर्थ्यविशेषसे विद्यारूप फलमें ऐहिक फलत्व और जन्मान्तरीय फलत्व कृत विशेष प्रतिनियम देखा गया है, वैसे मुक्ति लक्षणमें भी उत्कर्षं और अपकर्षकृत कोई विशेष प्रतिनियम होना चाहिए, ऐसी आशङ्काकर कहते हैं-' एवं मुक्तिफकानियमः ' मुक्तिफलमें इसी प्रकारके किसी भी विशेष प्रतिनियमको आशङ्का नहीं करनी चाहिए, किससे? उसी अवस्थाका अवधारण होनेसे । मुक्ति अवस्था सब वेदान्तों में एक रूप ही निश्चित की जाती है । ब्रह्म ही मुक्ति अवस्था है, ब्रह्ममें अनेक आकारोंका सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि ' अस्थूलमनणु ० ' ( न स्थूल है और न अणु है ) ' स एष ० ' ( यह आत्मा ऐसा नहीं, ऐसा नहीं, इस प्रकार निर्दिष्ट है ) ' यत्र नान्यत्पश्यति ' ( जिसमें अन्य नहीं देखता है ) ' ब्रह्मैवेदममृतं ० ' ( यह अमृत ब्रह्म ही आगे हैं ) ‘ इदं सर्व ० ' ( यह सब जो कुछ भी है यह सब आत्मा ही है ) ' स वा एष ० ' ( वही यह
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७ ९ ० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ४ यदयमात्मा ' ( बृह ० २ | ४ | ६ ), ' स वा एष महानज आत्माऽजरोऽमरोऽमृतोऽभ्यो ब्रह्म ' ( बृह ० ४।४।२५ ), ‘ यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत् ' ( वृ ० ४/५/१५ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । * अपि च विद्यासाधनं स्ववीर्यविशेषात्स्वफल एव विद्यायां कंचिदतिशय मासञ्जयेन्न विद्याफले मुक्तौ । तद्धय साध्यं नित्यसिद्धस्वभावमेव विद्ययाधिगम्यत इत्यसकृदवादिष्म । न च तस्यामप्युत्कर्षनिकर्षात्मकोऽतिशय उपपद्यते, निकृष्टाया विद्यात्वाभावादुत्कृष्टैव हि विद्या भवति । तस्मात्तस्यां चिराचिरोत्पत्ति रूपोऽतिशयो भवन्भवेत् " नतु मुक्तौ कश्चि-दतिशय संभवोऽस्ति । विद्याभेदाभावादपि तत्फलभेदनियमाभावः कर्मफलवत् । नहि मुक्तिसाधनभूताया विद्यायाः कर्मणामिव भेदोऽस्तीति । सगुणासु तु विद्यासु -'मनोमयः प्राणशरीरः ( छा ० ३।१४ २ ) इत्याद्यासु गुणावापोद्वापवशाद्भेदोपपत्तौ सत्यामुपपद्यते यथास्वं फलभेदनियमः, कर्मफलवत् । तथा च लिङ्गदर्शनम् -'तं यथा यथोपासवे तदेव भवति ' इति 1 । नैवं निर्गुणायां विद्यायाम्, गुणाभावात् । तथा च स्मृतिः - ' नहि गतिरधि -कास्ति कस्यचित्सति हि गुणे प्रवदस्य तुल्यताम् ' इति । तदवस्थावधृतेस्तदवस्थावधृतेरिति पदाभ्यासोऽध्यायपरिसमाप्तिं द्योतयति ॥५२ ॥
इति श्रीमच्छङ्करभगवत्पादकृतौ शारीरकमीमांसाभाष्ये तृतीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥ ४ ॥
महान् बज आत्मा अजर, अमृत, अमर एवं अमय ब्रह्म है ) ' यत्र त्वस्य ० ' ( जहाँ उसका सब आत्मा ही हो गया वहाँ किससे किसे देखे ) इत्यादि श्रुतियोंसे उसका एक लिङ्गत्व ( रूप ) निश्चय होता है । और विद्याका साधन अपने सामथ्यं विशेष से अपने फल विद्यामें ही किसी एक अतिशयका आधान करेगा किन्तु विद्या फल मुक्तिमें नहीं, क्योंकि वह असाध्य है और नित्य सिद्ध स्वभाव विद्यासे अधिगत होता है, ऐसा हम अनेक वार कह चुके हैं । उस विद्यामें भी उत्कर्षात्मक और निकृष्टात्मक अतिशय उपपन्न नहीं होता, क्योंकि निकृष्टमें विद्यात्व नहीं है, किन्तु उत्कृष्ट ही विद्या होती है, इस-लिए उस विद्या में विलम्ब और अविलम्बरूप अतिशय होता हो तो भले हो, किन्तु मुक्तिमें कोई अति-शय संभव नहीं है । विद्याके भेदका अभाव होनेसे भी उसके फलभेद नियमका अभाव है, कर्म फलके समान | मुक्तिके साधनभूत विद्यामें कर्मो के समान भेद नहीं है । परन्तु ' मनोमयः प्राणशरीर ' इत्यादि सगुण विद्याओं में गुणोंके आवाप और उद्वापके वयसे भेदकी उपपत्ति होते पर उसके अनुसार कर्मफलके समान फलभेदका नियम उपपन्न होता है । उसीप्रकार ' तं यथा ० ' ( उसकी जिस प्रकार उपासना करता है वही होता है ) ऐसा लिङ्गदर्शन है । परन्तु इसप्रकार निर्गुण विद्यामें फलभेदका नियम नहीं है, क्योंकि उसमें गुणोंका अभाव है । और ' नहि गतिरधिका ० ' ( किसी निर्गुणवत्ता की अधिक गति नहीं है, क्योंकि गुणके होनेपर ही अतुल्यता कहते हैं ) इसप्रकार स्मृति भी है | ' तदवस्थावधृतेः ' इस पदका दो वार कथन अध्यायकी परिसमाप्तिका द्योतन करता है || ५२ || स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत शाङ्करभाष्य - भाषानुवाद के तृतीयाध्यायका चतुर्थ पाद समाप्त ॥४ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका # पूर्वपक्षी मुक्तिमें अतिशय विशेष मानकर उसे कर्म साध्य सिद्ध करना चाहते हैं । परन्तु २ सिद्धान्त में मुक्ति सभी उपनिषदोंमें एक रूप प्रतिपादित है, क्योंकि ब्रह्मरूप ही तो मुक्ति है । निरवयव एक ब्रह्ममें उत्कर्ष और अपकर्षका असम्भव है । केवल विद्यासे अविद्याकी निवृत्तिद्वारा ब्रह्मस्वरूप मोक्षकी अभिव्यक्तिमात्र होती है । यहाँ तो विद्याकी निवृत्ति भी ब्रह्मरूप है । अत: ब्रह्म-रूप मोक्षमें किसी प्रकारका अतिशय विशेष नहीं है । * जैसे वायु आदि प्रतिबन्ध होनेपर दीपोत्पत्ति में विलम्ब होता है, परन्तु उसके उत्पन्न होनेपर अन्धकार निवृत्तिरूप फलमें नहीं, वैसे तत्त्वज्ञान होनेपर अज्ञानकी निवृत्तिरूप फलमें विलम्ब नहीं
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अधि ० १ सू ० १ पदच्छेद ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित अथ चतुर्थोऽध्यायः । [ अन्नास्मिन् फलाध्याये प्रथमपादे जीवन्मुक्तिनिरूपणम् ( इस फल अध्यायके प्रथम पादमें जीवन मुक्तिका निरूपण ( १ आवृत्त्यधिकरणम् । सू ० १-२ ) आवृत्तिरसकृदुपदेशात् ॥ १ ॥
- आवृत्तिः, असकृत्, उपदेशात् । ७ ९ १ । ] है ) सूत्रार्थ - ( आवृत्ति:) प्रत्ययकी आवृत्ति करनी चाहिए, ( असकृदुपदेशात् ) क्योंकि ' श्रोतव्यो मन्तव्यः ' आदि श्रुतियोंमें इसप्रकारका वार - वार उपदेश है । * तृतीयेऽध्याये परापरासु विद्यासु साधनाश्रयो विचारः प्रायेणात्यगात् । अथेह चतुर्थे फलाश्रय आगमिष्यति । प्रसङ्गागतं चान्यदपि किंचिच्चिन्तयिष्यते । प्रथम तावत्कति-भिश्चिदधिकरणैः साधनाश्रयविचारशेषमेवानुसरामः । ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः ' ( बृह ० ४/५ | ६ ), ' तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ' ( बृह ० ४।४।२१ ), ' सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासित:: ' ( छा ० ८/७/१ ), इति चैवमादिश्रवणेषु संशयः - किं सकृत्प्रत्ययः कर्तव्यः, आहोस्विदावृत्त्येति । किं तावत्प्राप्तम्? सकृत्प्रत्ययः स्यात्प्रयाजादिवत् तावता शास्त्रस्य कृतार्थत्वात् । अश्रूयमाणायां ह्यावृत्तौ क्रियमाणायामशास्त्रार्थः कृतो भवेत् । नन्वसकृदु-पदेशा उदाहृताः - ' श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः ' इत्येवमादयः । एवमपि यावच्छन्द-तृतीय अध्यायमें पर और अपर विद्याओं में साधनाश्रय विचार प्रायः किया जा चुका है । अब इस चतुर्थ अध्यायमें फलाश्रय विचार आयेगा । और प्रसंगतः कुछ अन्य विषयक भी विचार किया जायेगा । प्रथम तो कुछ अधिकरणोंसे साघनाश्रय अवशिष्ट विचारका हम अनुसरण करते हैं! ' आत्मा वा भरे द्रष्टव्यः ० ' ( सरे मैत्रेयी | आत्माका दर्शन करना चाहिए, श्रवण करना चाहिए, मनन करना चाहिए पोर निदिध्यासन करना चाहिए ) ' तमेव धीरो ० ' ( बुद्धिमान् ब्राह्मण उपदेश और शास्त्रसे उस आत्माका परोक्षज्ञान प्राप्त कर प्रज्ञा ( साक्षात्कार ) के लिए राम दम आदि साधन करे ) ' सोऽन्वेष्टव्यः ० ' ( उसका अन्वेषण करना चाहिए, उसकी विशेष जिज्ञासा करनी चाहिए ) इत्यादि श्रवणोंमें संशय होता है कि क्या एक वार ही प्रत्यय करना चाहिए अथवा आवृत्ति से इन श्रवण आदि साधनोंका एक वार ही अनुष्ठान करना चाहिए अथवा साक्षात्कार पर्यन्त उनकी पुनः पुनः आवृत्ति करनी चाहिए? तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - प्रयाज आदिके समान एक ही वार प्रत्यय करना चाहिए, क्योंकि, इतनेमें ही शास्त्र कृतार्थं होता है, आवृत्तिके अश्रूयमाण होनेपर भी उसकी आवृत्ति किये जानेपर तो शास्त्रार्थसे विरुद्ध किया जायगा । परन्तु ' श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः ' इत्यादि असकृत् उपदेश उदाहृत हैं? ऐसा होनेपर भी जिसका शब्द है सत्यानन्दी - दीपिका होता । इसलिए विद्यामें अन्य प्रकारका कोई अतिशय नहीं है । जैसे गुणभेदसे कर्म और उपासनाके असमान होनेसे उनके अनुष्ठाताओंकी भी असमान गति होती है, वैसे निर्गुण विद्यामें नहीं होती, क्योंकि उसमें कोई गुण नहीं है । इसलिए ब्रह्मवेत्ताओं की ब्रह्म प्राप्तिरूप एक - सी गति होती है ॥ ५२ ॥
स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत ' सत्यानन्दी - दीपिका ' के तृतीयाध्यायका चतुर्थ पाद समाप्त ॥ ४ ॥
* तृतीय अध्यायमें पर विद्या - ब्रह्मात्मसाक्षात्कार साधनीभूत ब्रह्मविद्या और अपर सगुण-विद्या में साधन सम्बन्धी विचार प्रायः समाप्त किया गया है । अब हेतुहेतुमद्भाव संगति से इस चतुर्थं अध्याय में तत्फल सम्वन्धी विचार किया जाता है । और फलके प्रसङ्गसे उत्क्रान्ति एवं अचिरादि
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७ ९ २ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य. [ अ ० ४ पा ० १ मावर्तयेत्सकृच्छ्रवणं सकृन्मननं सकृन्निदिध्यासनं चेति, नातिरिक्तम् । सकृदुपदेशेषु तु वेदोपासीतेत्येवमादिष्वनावृत्तिरिति । एवं प्राप्ते ब्रूमः - प्रत्ययावृत्तिः कर्तव्या । कुतः? अस कृदुपदेशात्, ' श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः ' इत्येवंजातीयको ह्यसकृदुपदेशः प्रत्ययावृत्ति सूचयति । ननूक्तं यावच्छन्द मेवावर्तयेन्ना धिकमिति - न, दर्शनपर्यवसितत्वादेषाम् । दर्श पर्यवसानानि हि श्रवणादीन्यावर्त्यमानानि दृष्टार्थानि भवन्ति । यथाऽवघातादोनि तण्डुलादिनिष्पत्तिपर्यवसानानि हि तद्वत् । अपि चोपासनं निदिध्यासनं चेत्यन्तर्णीतावृ-तिगुणैव क्रियाभिधीयते । तथा हि - लोके गुरुमुपास्ते राजानमुपास्त इति च यस्तात्पर्येण गुर्वादीननुवर्तते स एवमुच्यते । तथा ध्यायति प्रोषितनाथा पतिमितिया निरन्तरस्मरणा पति प्रति सोत्कण्ठा, सैवमभिधीयते । विद्युपास्त्योश्च वेदान्तेष्वव्यतिरेकेण प्रयोगो दृश्यते । क्वचिद्विदिनोपक्रम्योपासिनोपसंहरति, यथा - ' यस्तद्वेव यत्स वेद स मयैतदुक्तः ' ( छा ० ४ | ३ | ४ ) इत्यत्र ' अनु म एतां भगवो देवतां शाधि यां देवतामुपास्ते ' ( छा ० ४।२।२ ) इति । क्वचिच्चोपा-सिनोपक्रम्य विदिनोपसंहरति, यथा - ' मनो ब्रह्मेत्युपासीत ' ( छा ० ३ | १८ | १ ) इत्यत्र ' माति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ' ( छा ० ३ | १८ | ३ ) इति । तस्मात्सकृदुपदेशे-ध्वप्यावृत्तिसिद्धिः । असकृदुपदेशस्त्वावृत्तेः सूचकः ॥ १ ॥
उसकी आवृत्ति करनी चाहिए - एक वार श्रवण, एह वार मनन और एक वार निदिध्यासन, इससे अधिक नहीं, ' वेद ' ' उपासीत ' इत्यादि सकृत् उपदेशों में आवृत्ति नहीं है । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - प्रत्यय की आवृत्ति करना चाहिए । किससे? इससे कि असकृत् उपदेश है । ' श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्य: ' इस प्रकारका अनेक वार उपदेश प्रत्यय आवृत्ति सूचित करता है । परन्तु ऐसा कहा गया है कि श्रुतिके अनुसार ही आवृत्ति करनी चाहिए, अधिक नहीं । ऐसा नहीं, क्योंकि ये दर्शन पर्यवसायी हैं । साक्षात्कार पर्यवसायी वार - वार आवृत्ति किये जानेवाले श्रवण आदि साधन दृष्ट फलवाले होते हैं । जैसे अवघात आदि तण्डुल आदि निष्पत्ति ( अभिव्यक्ति ) पर्यवसायी होते हैं, वैसे प्रकरण में भी समझना चाहिए । और उपासना और निदिध्यासन आवृत्ति गुण गर्मित क्रिया का ही अभिधान करते हैं । जैसे कि लोकमें ' गुरुमुपास्ते ० ' ( गुरुकी उपासना करता है, राजाकी उपा-सना करता है ) जो तत्परतासे गुरु आदिका अनुवर्तन करता है वह ऐसा हो कहा जाता है । वैसे ' ध्यायति ' ' जिसका पति परदेश गया है वह स्त्री पतिका ध्यान करती है ' जो निरन्तर स्मरण करती पति के प्रति सोत्कण्ठा है वह ऐसी कही जाती है । विद् और उप पूर्वक अस् धातुका उपनिषदों में ( समान अर्थसे ) प्रयोग देखा जाता है । कहीं ' विदि ' से आरम्भकर उपास्तिसे उपसंहार करते हैं । जैसे कि ' यस्तद्वेद ० ' ( जिसे रैक्व जानता है उसे जो जानता है वह मैंने जैसे कहा है वैसे ही रैक्व सदृश होता है ) इसमें विदिसे उपक्रम है और ' अनु मे एतां ० ' ( हे भगवन् रैक्व! आप मुझे उस देवताका उपदेश कीजिए जिसकी आप उपासना करते हैं ) इसप्रकार उपास्तिसे उपसंहार है । और कहीं उपास्तिसे उपक्रम कर विदिधे उपसंहार करते हैं- जैसे ' मनो ब्रह्मेत्युपासीत ' ( मन ब्रह्म है ऐसी उपासना करनी चाहिए ) इसमें उपास्तिसे उपक्रम है और ' माति च ० ' ( जो ऐसा जानता है वह कीर्ति यश और ब्रह्मतेजके कारण देदीप्यमान होता और तपता है ) इसप्रकार विदिसे उपसंहार है । इसमे एक वार उपदेशों में भी आवृत्ति सिद्ध होती है, वार वार उपदेश तो आवृत्तिका सूचक है ॥ १ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका मामका मी विचार किया जायगा । प्रथम साक्षात् श्रुतिमें कथित संन्यास आदि साधनों का विचार किया जा चुका है । अब ' अघश्लेष ' इस अधिकरणके पूर्वतक फलार्थापत्ति से गम्य आवृत्ति आदिका विचार है । ' अघाश्लेष ' अधिकरणसे लेकर पाद समाप्तितक जीवनमुक्तिका, द्वितीय पादमें उत्क्रान्तिका,
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अधि ० १ सू ० २ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७ ९ ३ लिङ्गाच्च ॥२ ॥
पदच्छेद – लिङ्गात्, च । सूत्रार्थ - और ' रश्मींस्त्वं पर्यावर्तयात् ' यह लिङ्ग प्रमाण मी बहुत - सी किरणोंका विधान करता हुआ प्रत्ययोंकी आवृत्ति दिखलाता है, इससे श्रवण आदि प्रत्ययोंकी भी आवृत्ति होनी चाहिए । * लिङ्गमपि प्रत्ययावृत्ति प्रत्याययति । तथा ह्युद्गीथविज्ञानं प्रस्तुत्य ' आदित्य उद्गीथः ' ( छा ० १/५/१ ) इत्येतदेकपुत्रतादोषेणापोद्य ' रश्मींस्त्वं पर्यावर्तयात् ' ( छा ० १/५/२ ) इति रश्मि-बहुत्वविज्ञानं बहुपुत्रतायै विदधत्सिद्धवत्प्रत्ययावृत्तिं दर्शयति । तस्मात्तत्सामान्यात्सर्वप्रत्यये-ष्वावृत्तिसिद्धिः । अत्राह - भवतु नाम साध्यफलेषु प्रत्ययेष्वावृत्तिः, तेष्वावृत्तिसाध्यस्याति-शयस्य संभवात् । यस्तु परब्रह्म विषयः प्रत्ययो नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावमेवात्मभूतं परं ब्रह्म-समर्पयति, तत्र किमर्थावृत्तिरिति? सकृच्छ्रुतौ च ब्रह्मात्मत्वप्रतीत्यनुपपत्तेरावृत्त्यभ्युपगम इति चेत् - न, आवृत्तावपि तदनुपपत्तेः । यदि हि ' तत्त्वमसि ' ( छा ० ६ | ८ | ७ ) इत्येवंजातीयकं वाक्यं सकृच्छ्रयमाणं ब्रह्मात्मत्वप्रतीतिं नोत्पादयेत्, ततस्तदेवावर्त्यमानमुत्पादयिष्यतीति का प्रत्याशा स्यात्? * अथोच्येत - न केवलं वाक्यं कंचिदर्थं साक्षात्कर्तुं शक्नोत्यतो युक्त्य-लिङ्ग भी प्रत्ययोंकी आवृत्तिका ज्ञान कराता है, क्योंकि ' आदित्य उद्गीथः ' इसप्रकार उद्गीथ विज्ञानको प्रस्तुत कर एवं एक पुत्रताके दोषसे उसका प्रतिषेध कर ' रश्मींस्त्वं पर्यावर्तयात् ' ( अतः हे पुत्र! तू सूर्यं रश्मियोंका आदित्यसे भेदरूपसे चिन्तन कर ) इसप्रकार बहुत पुत्रता प्राप्ति के लिए बहुत रश्मियोंके विज्ञानका विधान करता हुआ लिङ्ग सिद्धवत् प्रत्ययोंकी आवृत्ति दिखलाता है । प्रकृत उद्गीथ प्रत्ययके साथ सब प्रत्ययोंकी साक्षात्कार हेतुरूपसे अथवा ध्यानरूपसे समानता होनेके कारण अहंग्रहोपासना और श्रवण आदि सब प्रत्ययोंमें आवृत्तिकी सिद्धि होती है । पू ० – यहाँ कहते हैं कि साध्य फलवाले प्रत्ययों में आवृत्ति भले हो, क्योंकि उनमें आवृत्तिसे साध्य अतिशयका संभव है । परन्तु जो परब्रह्मविषयक प्रत्यय नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वभाव आत्मभूत परब्रह्मका बोध कराता है, उसमें आवृत्तिका क्या प्रयोजन? यदि कहो कि केवल एक वार श्रवण होनेपर ब्रह्मात्मत्व प्रतीतिकी अनुपपत्ति होनेसे आवृत्तिका स्वीकार है । तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि आवृत्ति होनेपर भी उसकी उपपत्ति नहीं होती । यदि ' तत्त्वमसि ' इस प्रकारका एक वार श्रूयमाण वाक्य ब्रह्मात्मत्व प्रतीतिको उत्पन्न नहीं कर सका तो वही आवृत्यमान हुआ प्रतीतिको उत्पन्न करेगा इसकी क्या आशा हो सकती है? यदि कहो कि केवल वाक्य किसी अर्थका साक्षात्कार करनेके लिए समर्थ नहीं है, अतः युक्तिकी अपेक्षा रखता हुआ वाक्य ब्रह्मात्मत्वका अनुभव कराएगा । तथापि — ऐसा माननेपर भी श्रवण सत्यानन्दी - दीपिका तृतीयपादमें अचिरादि गन्तव्य मार्गके निर्णयका और चतुर्थ पादमें ज्ञान और उपासना के फलके निर्णयका विचार है । पू ० – असकृत् उपदेश होनेपर भी उसका आवृत्तिमें तात्पर्य नहीं है । सिद्धान्तमें श्रवण आदिको दृष्टार्थं होनेसे ब्रह्म साक्षात्कारपर्यन्त आवृत्ति होनी चाहिए । ॥ १ ॥
* विषय साक्षात्कार फलवाले श्रवण आदि प्रत्ययोंकी आवृत्तिमें ' लिङ्गाच ' यह दूसरा हेतु कहते हैं | निर्गुण ब्रह्मके साक्षात्कार उत्पन्न करनेकी ' तत्त्वमसि ' आदि वाक्योंमें शक्ति है कि नहीं? प्रथम पक्ष तो एक वार श्रवण किये गये वाक्यसे साक्षात्कार सिद्ध होनेसे आवृत्ति निष्फल है । द्वितीय पक्ष - तो उसकी वार वार आवृत्ति भी निष्फल है । * ' मैं आत्मा हूँ और परमात्मासे भिन्न हूँ ' इस प्रकारका सामान्य ज्ञान तो प्रायः सभीको है, किन्तु उससे अविद्याकी निवृत्ति नहीं होती, उसकी निवृत्ति तो ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि
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७ ९ ४ ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० १ पेक्षं वाक्यमनुभावयिष्यति ब्रह्मात्मत्वमिति, तथाप्यावृत्त्यानर्थक्यमेव । साऽपि हि युक्तिः सकृत्प्रवृत्तैव स्वमर्थमनुभावयिष्यति । अथापि स्याद्युक्त्या वाक्येन च सामान्यविषयमेव विज्ञानं क्रियते, न विशेषविषयम् । यथास्ति मे हृदये शूलमित्यतो वाक्याद्गात्रकम्पादि-लिङ्गाच्च शूलसद्भावसामान्यमेव परः प्रतिपद्यते, न विशेषमनुभवति, यथा स एव शूली । विशेषानुभवश्चाविद्याया निवर्तकस्ततस्तदर्थावृत्तिरिति चेत् - न, असकृदपि तावन्मात्रे क्रिय-माणे विशेष विज्ञानोत्पत्त्यसंभवात् । न हि सकृत्प्रयुक्ताभ्यां शास्त्र युक्तिभ्यामनवगतो विशेषः शतकृत्वोऽपि प्रयुज्यमाना भ्यामवगन्तुं शक्यते । तस्माद्यदि शास्त्रयुक्तिभ्यां विशेषः प्रतिपाद्येत यदि वा सामान्यमेव, उभयथापि सकृत्प्रवृत्ते एव ते स्वकार्यं कुरुत इत्यावृत्त्यनुपयोगः । नच सकृत्प्रयुक्ते शास्त्रयुक्ती कस्यचिदप्यनुभवं नोत्पादयत इति शक्यते नियन्तुम्, विचित्रप्रज्ञत्वा-प्रतिपतॄणाम् । अपि चानेकांशोपेते लौकिके पदार्थे सामान्यविशेषवत्येकेनावधानेनैकमं शमवधारयत्यपरेणापरमिति स्यादप्यभ्यासोपयोगो यथा दीर्घप्रपाठकग्रहणादिषु, नतु निर्वि शेषे ब्रह्मणि सामान्यविशेषरहिते चैतन्यमात्रात्मके प्रमोत्पत्तावभ्यासापेक्षा युक्तेति । * अत्रो-च्यते भवेदावृत्त्यानर्थक्यं तं प्रति यस्तत्त्वमसीति सकृदुक्तमेव ब्रह्मात्मत्वमनुभवितुं शक्नु आदि प्रत्ययोंकी आवृत्ति निरर्थक ही है । क्योंकि वह युक्ति भी एक वार प्रवृत्त हुई अपने अर्थका बोघ करायेगी । और यदि ऐसी शंका करो कि युक्ति और वाक्यसे सामान्य विषयक ही ज्ञान किया जाता है विशेष विषयक नहीं । जैसे मेरे हृदयमें शूल है, इस वाक्यसे और गात्रकम्पन आदि लिंगसे शूलके अस्तित्वका सामान्य ज्ञान अन्यको होता है विशेष अनुभव नहीं होता, जैसा कि वही शूलवान् विशेष शूलका स्वयं अनुभव करता है । यदि कहो कि विशेष अनुभव अविद्याका निवर्तक है, अतः उसके लिए आवृत्ति है । तो ठीक नहीं है, क्योंकि कितने ही पुनः पुनः भी श्रवण आदि किये जायँ तो भी विशेष विज्ञानकी उत्पत्तिका संभव नहीं है । कारण कि एक वार प्रयुक्त शास्त्र और युक्तिसे बनवगत विशेष सौवार प्रयुक्त हुए शास्त्र और युक्तिसे भी विशेष अवगत नहीं किया जा सकता । इसलिए यदि कहो कि शास्त्र और युक्तिसे विशेष प्रतिपादन किया जाता है अथवा यदि कहो कि उनके योगसे सामान्यका प्रतिपादन किया जाता है, तो भी दोनों प्रकारसे एक वार प्रवृत्त होनेपर हो वे अपना कार्यं करते हैं, इसलिए वृत्तिका उपयोग नहीं है । एक वार प्रयुक्त हुए शास्त्र और युक्ति किसीके मी अनुभवको उत्पन्न नहीं करते, ऐसा नियमन नहीं किया जा सकता । क्योंकि अनुभवि -arrat बुद्धि विचित्र है । और इसीप्रकार अनेक अंशोंसे युक्त सामान्य और विशेषवाले लौकिक पदार्थ में एक अवधान ( एक वार मनकी एकाग्रता ) से एक अंशका और दूसरे अवधान से दूसरे अंशका निश्चय करनेवालोंमें आवृत्तिका उपयोग भले ही हो । जैसे दीर्घं प्रपाठकके ग्रहण आदिमें आवृत्तिका उपयोग होता है । परन्तु सामान्य विशेषसे रहित चैतन्यमात्ररूप निर्विशेष ब्रह्म में प्रमाकी उत्पत्तिके लिए आवृत्तिकी अपेक्षा युक्त नहीं है । सिद्धान्ती - इसपर कहते हैं- जो पुरुष ' तत्त्वमसि ' इसप्रकार एक वार ही उक्त ब्रह्मात्मत्व अनुभव करनेमें समर्थ हो उसके प्रति आवृत्ति भले निरर्थक हो । सत्यानन्दी -दीपिका. वेदान्त वाक्योंके श्रवण आदिके अभ्याससे उत्पन्न हुए ' मैं ब्रह्मात्मा हूँ ' इस विशेष ज्ञानसे होती है । इसलिए आवृत्ति सार्थक है । पू ० - ' न, ' असकृदपि ' आदिसे कहता है । * जैसे उद्दालकने श्वेतकेतुको ' तत्त्वमसि ' का नौ वार उपदेश किया है । जैसे षड्ज आदि स्वर भेदके साक्षात्कारके लिए श्रोत्र समर्थ हैं, तो भी उसके अभ्यासकी अपेक्षा है, वैसे ही ब्रह्म साक्षात्कार करनेकी वाक्यमें सामर्थ्य होनेपर भी अभ्यासकी अपेक्षा है । इस विषयमें अनुभव प्रमाण भी है । जैसे अध्ययन आदिमें एक वार श्रवणसे अल्पज्ञान होता है वार - वार वाक्यार्थका अभ्यास करनेपर विशेष ज्ञान
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अधि ० १ सू ० २ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ७ ९ ५ यात् । यस्तु न शक्नोति तं प्रत्युपयुज्यत एवावृत्तिः । तथा हि छान्दोग्ये ' तत्त्वमसि श्वेतकेतो ’ ( छा ० ६।८।७ ) इत्युपदिश्य ' भूय एव मा भगवान्विज्ञापयतु ' ( छा ० ६।८।७ ) इति पुनः पुनः परिचोद्यमानस्तत्तदाशङ्काकारणं निराकृत्य तत्त्वमसीत्येवासकृदुपदिशति । तथा च ' श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः ' ( वृ ० ४/५/६ ) इत्यादि दर्शितम् । ननूक्तं सकृच्छ्रतं चेत्तत्वमसि -वाक्यं स्वमर्थमनुभावयितुं न शक्नोति, तत आवर्त्यमानमपि नैव शक्ष्यतीति, नैष दोषः, नहि दृष्टेऽनुपपन्नं नाम | दृश्यन्ते हि सकृच्छ्रुताद्वाक्यान्मन्दप्रतीतं वाक्यार्थमावर्तयन्तस्तत्त-दाभासव्युदासेन सम्यक्प्रतिपद्यमानाः । अपि च ' तत्त्वमसि ' इत्येतद्वाक्यं त्वंपदार्थस्य तत्प-दार्थभावमाचष्टे । तत्पदेन च प्रकृतं सदब्रह्मेक्षित जगतो जन्मादिकारणमभिधीयते-' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ( तै २ | १ | १ ) ' विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' ( बृ ० ३।९ ।२८ ), ' अदृष्टं द्रष्टृ ' ( बृ ० ३ । ८।११ ), ‘ अविज्ञातं विज्ञातृ ' ( वृ ० ३।८।११ ), ' अजमजरममरम् ' ' अस्थूलमनण्वहस्वमदीर्घम् ' ( बृ ० ३ । ८।८ ) इत्यादिशास्त्रप्रसिद्धम् । * तत्राजादिशब्दैर्जन्मादयो भावविकारा निवर्तिताः । अस्थूला-दिशब्दैश्च स्थौल्यादयो द्रव्यधर्माः । विज्ञानादिशब्दैश्च चैतन्य प्रकाशात्मकत्वमुक्तम् । एष व्यावृत्त सर्व संसारधर्मकोऽनुभवात्मको ब्रह्मसंज्ञकस्तत्पदार्थो वेदान्ताभियुक्तानां प्रसिद्धः ' परन्तु जो इस प्रकार समर्थ न हो उसके प्रति आवृत्ति उपयुक्त ही है । जैसे कि छान्दोग्यमें ' तत्त्वमसि श्वेतकेतो ' इस प्रकार उपदेश कर ' भूय एव ० ' ( श्वेतकेतु - हे भगवन्! पुनः मुझे समझाइए ) इस प्रकार पुनः पुनः प्रेरित होते हुए तत् तत् आशङ्का कारणका निराकरण कर ' तत्त्वमसि ' इस प्रकार अनेक वार उपदेश करते हैं । और उसी प्रकार ' श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः ' इत्यादि दिखलाया गया है । परन्तु ऐसा कहा गया है कि यदि एक वार श्रुत ' तत्त्वमसि ' वाक्य अपने अर्थ अनुभव करानेमें समर्थ नहीं हैं तो आवर्त्यमान होनेपर भी समर्थ नहीं होगा? यह दोष नहीं है, क्योंकि दृष्ट- अनुभव में आनेपर कुछ भी अनुपपन्न नहीं है । एक वार श्रुत वाक्यसे मन्दप्रतीत- सामान्य ज्ञात वाक्यार्थकी आवृत्ति करनेवाले तत् - तत् आभासोंका निराकरणकर सम्यग्ज्ञांन करते हुए देखे जाते हैं । और ' तत्त्वमसि ' यह वाक्य ' त्वम् ' पदार्थका ' तत् ' पदार्थभाव कहता है, और ' तत् ' पदसे प्रकृत ईक्षितृ सद्ब्रह्म जगत्के जन्म आदिका कारण कहा जाता है, जो ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ' विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' ' अदृष्टं द्रष्टृ ' ' अविज्ञातं ० ' ( यह अक्षर ब्रह्म स्वयं दृष्टिका विषय नहीं है, किन्तु स्वयं द्रष्टा है, स्वयं अविज्ञात रहकर दूसरोंका विज्ञाता है ) ' अजमजरममरम् ० ' ( ब्रह्म अज, अजर और अमर है ) ' अस्थूलम ० ' ( वह न स्थूल है, न अणु है, न ह्रस्व है और न दीर्घ है ) इत्यादि शास्त्रसे प्रसिद्ध है । उस ब्रह्ममें अज आदि शब्दोंसे जन्म आदि भाव विकार निवृत्त किये गये हैं, अस्थूल आदि शब्दों से स्थौल्य आदि द्रव्यके धर्मं निवृत्त किये गये हैं । विज्ञान आदि शब्दोंसे ब्रह्म चैतन्य प्रकाशात्मक कहा गया है । समस्त संसारके धर्मोसे सत्यानन्दी - दीपिका होता है | और ' तत्त्वमसि ' इस वाक्यमें ' तत् ' पदसे ' तत् ' पद वाच्य ईक्षितृ सदब्रह्म जगत् के जन्म आदिका कारण कहा गया है, और ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इससे ' तत् ' पदका लक्ष्यार्थं कहा गया है । * अब ‘ त्वम् ' पदका अर्थ ' तथा ' इत्यादिसे कहते हैं - स्थूल देह अन्नमय कोशसे लेकर आनन्दमय कोश पन्त ' यह मैं नहीं हूँ ' इस प्रकार सबकी निवृत्तिकर ' शुद्ध ब्रह्मात्मा हूँ ' यह निश्चय ' त्वम् ' पदका लक्ष्यार्थ है । इसी अर्थको ' तत्त्वमसि ' आदि वेदान्त महावाक्य प्रतिपादन करते हैं । किन्तु जिनको ' तत् ' और ' त्वम् ' पदका वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थं अविद्याकृत संशय आदिसे प्रतिबद्ध हैं, उनके प्रति ' तत्त्वमसि ' आदि वाक्य अपने वाच्य और लक्ष्यार्थं आत्मैकत्वका बोध करानेमें समर्थ नहीं हैं । उनके प्रति शास्त्र और युक्तिका अभ्यास अपेक्षित है । इस प्रकार प्रथम ' तत् ' पदका लक्ष्यार्थं निश्चित होनेपर पश्चात् ' त्वम् ' पदका लक्ष्यार्थं निश्चित होता है । इस प्रकार क्रमिक ज्ञान आत्मज्ञानमें हेतु है ।
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७ ९ ६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० १ तथा त्वंपदार्थोऽपि प्रत्यगात्मा श्रोता देहादारभ्य प्रत्यगात्मतया संभाव्यमानश्चैतन्यपर्यन्त-त्वेनावधारितः । तत्र येषामेतौ पदार्थावज्ञानसंशयविपर्ययप्रतिबद्धौ तेषां ' तत्वमसी ' त्येतद्वाक्यं स्वार्थे प्रमां नोत्पादयितुं शक्नोति, पदार्थज्ञानपूर्वकत्वाद्वाक्यार्थस्येत्यतस्तान्प्रत्येष्टव्यः पदार्थविवेकप्रयोजनः शास्त्रयुक्त्यभ्यासः । यद्यपि च प्रतिपत्तव्य आत्मा निरंशस्तथाप्यध्या-रोपितं तस्मिन्बह्वशत्वं देहेन्द्रियमनोबुद्धिविषयवेदनादिलक्षणम् । तत्रैकेनावधानेन कर्म-शमपोहत्यापरेणा परमिति, युज्यते तत्र क्रमवती प्रतिपत्तिः । तत्तु पूर्वरूपमेवात्मप्रतिपत्तेः । * येषां पुनर्निपुणमतीनां नाज्ञानसंशय विपर्ययलक्षणः पदार्थविषयः प्रतिबन्धोऽस्ति, ते शक्नुवन्ति सकृदुक्तमेव तत्त्वमसिवाक्यार्थमनुभवितुमिति, तान्प्रत्यावृत्त्यानर्थक्य-मिष्टमेव । सकृदुत्पन्नैव ह्यात्मप्रतिपत्तिरविद्यां निवर्तयतीति, नात्र कश्चिदपि क्रमोऽभ्यु-पगम्यते । सत्यमेवं युज्येत यदि कस्यचिदेवं प्रतिपत्तिर्भवेत् । बलवती ह्यात्मनो दुःख-त्वादि प्रतिपत्तिः । अतो न दुःखित्वाद्यभावं कश्चित्प्रतिपद्यत इति चेत् - न, देहाद्यभिमान-वदुःखित्वाद्यभिमानस्य मिथ्याभिमानत्वोपपत्तेः । प्रत्यक्षं हि देहे छिद्यमाने दद्यमाने वाऽहं छिद्ये दह्ये इति च मिथ्याभिमानो दृष्टः । तथा बाह्यतरेष्वपि पुत्रमित्रादिषु संतप्यमानेष्वहमेव संतप्य इत्यध्यारोपो दृष्टः । तथा दुःखित्वाद्यभिमानोऽपि स्यात् । देहादिवदेव चैतन्याद्वहिरुप रहित ज्ञानात्मक ' तत् ' पद वाच्य यह ब्रह्म वेदान्तियोंमें प्रसिद्ध है । इसीप्रकार ' त्वम् ' पदार्थ भी प्रत्यगात्मा, श्रोता के देहसे आरम्भ कर प्रत्यगात्मरूपसे संभाव्यमान चैतन्यावधित्वसे निश्चित किया गया है । ऐसी अवस्थामें जिनके ये दोनों पदार्थ अज्ञान, संशय और विपर्ययसे प्रतिबद्ध होते हैं, उनके लिए ' तत्त्वमसि ' यह वाक्य स्वार्थमें प्रमा उत्पन्न करनेमें समर्थ नहीं हैं, क्योंकि वाक्यार्थज्ञान पदार्थज्ञानपूर्वक होता / है, अत: उनके प्रति पदार्थोंके विवेक प्रयोजनवाले शास्त्र और युक्तिका अभ्यास होना चाहिए । यद्यपि प्रतिपत्तिके योग्य आत्मा निरंश है, तो भी देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, विषय, वेदना आदिरूप बहुतसे अंश उसमें अध्यारोपित हैं, उनमें एक अवधान से एक अंशका और दूसरेसे दूसरे अंशका निषेधकर उसमें क्रमिक प्रतिपत्ति युक्त है । वह आवृत्ति आत्मप्रतिपत्तिका पूर्वरूप है अर्थात् आत्मज्ञानमें कारण है । परन्तु जिन निपुण मतिवालोंके अज्ञान, संशय और विपर्यय ' तत् ' ' त्वम् ' पदार्थ विषयक प्रतिबन्ध नहीं है वे एक वार ही उक्त ' तत्त्वमसि ' वाक्यार्थ ज्ञान करनेमें समर्थ होते हैं । उनके प्रति आवृत्तिकी अनर्थकता इष्ट ही है, क्योंकि एक वार उत्पन्न हुआ ज्ञान ही अविद्याकी निवृत्ति करता है, इससे इसमें कोई क्रम स्वीकार नहीं किया जाता । ठीक है, यदि किसीको इस प्रकार आत्मज्ञान हो तो आवृत्ति की निरर्थकता युक्त है । यदि कहो कि आत्मामें दुःखित्व आदिका ज्ञान बलवान् है, अतः कोई भी दुःखित्व आदि अभावको प्राप्त नहीं होता, तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि आत्मामें देह आदि अभिमानके समान दुःखित्व अभिमान में भी मिथ्याभिमानत्व उपपन्न होता है । देहका छेदन किये जानेपर अथवा दहन किये जानेपर मैं काटा जाता हूँ, मैं जलाया जाता हूँ, इस प्रकार प्रत्यक्ष मिथ्याभिमान देखा गया है । इसी प्रकार देहसे भिन्न बाह्य पुत्र, मित्र आदिके संतप्त होनेपर ' मैं ही संतप्य हूँ ' ऐसा अध्यारोप देखा जाता है । उसी प्रकार दुःखित्व आदि अभिमान होना चाहिए, क्योंकि देह आदिके समान ही दुःखित्व आदि चैतन्यरूपसे बाहर ( पृथक् ) उपलब्ध होते हुए सुषुप्ति आदिमें अनुवृत्त नहीं होते । " सत्यानन्द - दीपिका * मन्द और मध्यम अधिकारियोंके लिए अभ्यास सार्थक कहकर अब उत्तम अधिकारियोंके . लिए ' येषाम् ' इत्यादिसे कहते हैं । जैसे एक बार उत्पन्न हुआ रज्जुज्ञान सर्प आदि भ्रान्तिको निवृत्त करता है, वैसे उत्तम अधिकारियोंके लिए एक वार ' तत्त्वमसि ' आदि महावाक्योंसे उत्पन्न ज्ञान अविद्याको निवृत्त करता है ।