श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 831–840

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 831–840

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अधि ० २ सू ० ३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७ ९ ७ लभ्यमानत्वाद्दुःखित्वादीनाम्, सुषुप्तादिषु चाननुवृत्तेः । चैतन्यस्य तु सुषुप्तेऽप्यनु-वृत्तिमामनन्ति - ' यद्वै तन्न पश्यति पश्यन्वै तन्न पश्यति ' ( वृ ० ४।३।२३ ) तस्मात्सर्वदुःख-विनिर्मुक्तक चैतन्यात्मकोऽहमित्येष आत्मानुभवः । न चैवमात्मानमनुभवतः किंचिदन्य-त्कृत्यमवशिष्यते । तथा च श्रुतिः - ' किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽऽयमात्माऽयं लोकः ' ( बृ ० ४।४।२२ ) इत्यात्मविदः कर्तव्याभावं दर्शयति । स्मृतिरपि - ' यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः । आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ' ( गी ० ३ | १७ ) इति । यस्य तु नैषोऽनुभवो द्रागिव जायते तं प्रत्यनुभवार्थ एवावृत्त्यभ्युपगमः । तत्रापि न तत्त्वमसिवाक्यार्थात्प्रच्या-व्यावृत्तौ प्रवर्तयेत् । नहि वरघाताय कन्यामुद्राहयन्ति । नियुक्तस्य चास्मिन्नधिकृतोऽहं कर्ता मयेदं कर्तव्यमित्यवश्यं ब्रह्मप्रत्ययाद्विपरीतप्रत्यय उत्पद्यते । यस्तु स्वयमेव मन्द-मतिरप्रतिभानात्तं वाक्यार्थं जिहासेत्तस्यैतस्मिन्नेव वाक्यार्थे स्थिरीकार आवृत्त्यादिवा-चोयुक्त्याऽभ्युपेयते । तस्मात्परब्रह्मविषयेऽपि प्रत्यये तदुपायोपदेशेप्वावृत्तिसिद्धिः ॥ २ ॥

( २ आत्मत्वोपासनाधिकरणम् । सू ० ३ ) आत्मेति तूपगच्छन्ति ग्राहयन्ति च ॥ ३ ॥

पदच्छेद - आत्मा, इति, तु, उपगच्छन्ति, ग्राहयन्ति, च परन्तु ' यहाॅ ' ०. ' ( वह जो सुषुप्ति में नहीं देखता सो निश्चय देखता हुआ नहीं देखता ) इत्यादि श्रुतिसे चैतन्यकी अनुवृत्ति सुषुप्तिमें कहते हैं । इसलिए सब दुःखोंसे विनिर्मुक्त एक चैतन्य स्वरूप मैं हूँ यह आत्मानुभव है । और इस प्रकार आत्माका अनुभव करनेवालोंके लिए कुछ अन्य कृत्य अवशिष्ट नहीं होता 1 । जैसे कि ' किं प्रजया ० ' ( परमार्थदर्शी जिन हम लोगोंका यह आत्मा ही लोक है वे हम इस प्रजा - संततिसे क्या करेंगे ) यह श्रुति आत्मवेत्ताके लिए कर्तव्याभाव दिखलाती है । और ' यस्त्वात्मरति-रेव ० ' ( परन्तु जो मनुष्य आत्मामें ही रति- प्रीतिवाला हैं विषयमें नहीं, और आत्मामें ही तृप्त है अन्न रस आदिसे नहीं, आत्मा में ही सन्तुष्ट है बाह्यार्थं लाभसे नहीं उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है ) यह स्मृति भी है । परन्तु जिसको [ तत्त्वमसि आदि वाक्योंसे मैं ब्रह्म हूँ ] यह अनुभव शीघ्र नहीं होता, उसके प्रति अनुभव के लिए ही आवृत्तिका स्वीकार है । उसमें भी उसको ' तत्त्वमसि ' वाक्यार्थसे प्रच्युतकर आवृत्तिमें प्रवृत्त नहीं करना चाहिए, क्योंकि वर नाशके लिए कन्याका विवाह नहीं करते । इसमें अधिकृत हुआ मैं कर्ता हूँ, यह मेरा कर्तव्य है, इस प्रकार नियुक्त पुरुषको ब्रह्मज्ञानसे अवश्य विपरीत ज्ञान उत्पन्न होता है । किन्तु जो स्वयं ही मन्दमति वाक्यार्थके प्रतिभान न होनेसे उसके त्याग करनेकी इच्छा करता हो तो उसको इसी वाक्यार्थमें आवृत्ति आदि वचन [ श्रोतव्यः ] और युक्तिसे स्थिर करना स्वीकार है । इसलिए परब्रह्म विषयक ज्ञानमें भी उसके साधनभूत उपदेशोंमें आवृत्ति सिद्ध होती है ॥ २ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका * जिसको ' तत्त्वमसि ' आदि महावाक्योंसे ' मैं ब्रह्म हूँ ' ऐसा शीघ्र ज्ञान उत्पन्न नहीं होता उसके · लिए आवृत्ति स्वीकृत है । परन्तु जो ' तत्त्वमसि ' वाक्यार्थं ज्ञानमें संलग्न है उसको वहाँसे हटाकर ' श्रोतव्यो मन्तव्यः ' इस प्रकार आवृत्ति में प्रवृत्त नहीं करना चाहिए, क्योंकि ' श्रोतव्यः ' आदिकी आवृत्ति भी तो प्रधान ' तत्त्वमसि ' वाक्यार्थ ज्ञानके लिए है । यहाँपर ' तत्त्वमसि ' आदि वाक्यार्थं ज्ञान प्रधान है और ' श्रोतव्यः ' आदि उसके अङ्ग हैं । अङ्गोंका ग्रहण प्रधानकी सिद्धिके लिए होता है । इस प्रकार सगुण और निर्गुण ब्रह्मसाक्षात्कार फलके साधन भूत अहंग्रहोपासना और श्रवण आदिमें आवृत्ति सिद्ध होती है ॥ २ ॥

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७ ९ ८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० १ सूत्रार्थ - ( आत्मेति ) ' आत्मरूप से परमेश्वरका ग्रहण युक्त है ' ( तु ) क्योंकि ( उपगच्छन्ति ) जाबाल ' त्वं वा अहमस्मि ' इसप्रकार स्वीकार करते हैं ( च ) और ( ग्राहयन्ति ) एष त आत्मा सर्वान्तरः ' इत्यादि श्रुति आत्मरूप से ईश्वरका ग्रहण कराती हैं । * यः शास्त्रोक्तविशेषणः परमात्मा स किमहमिति ग्रहोतव्यः, किं वा मदन्य इत्येत-द्विचारयति । कथं पुनरात्मशब्दे प्रत्यगात्मविषये श्रूयमाणे संशय इति? उच्यते, - अय-मात्मशब्दो मुख्यः शक्यतेऽभ्युपगन्तुं सति जीवेश्वरयोरभेदसंभव इतरथा तु गौणोऽयम-भ्युपगन्तव्य इति मन्यते । किं तावत्प्राप्तम्? नाहमिति ग्राह्यः । न ह्यपहतपाप्मत्वादिगुणो विपरीत गुणत्वेन शक्यते ग्रहो तुंः विपरीत गुणो वाऽपहतपाप्मत्वादिगुणत्वेन । अपहतपाप्मा-दिगुणश्च परमेश्वरः, तद्विपरीत गुणस्तु शारीरः । ईश्वरस्य च संसार्यात्मत्वे ईश्वराभाव-प्रसङ्गः, ततः शास्त्रानर्थक्यम् । संसारिणोऽपीश्वरात्मत्वेऽधिकार्यभावाच्छास्त्रानर्थक्यमेव, प्रत्यक्षादिविरोधश्च । अन्यत्वेऽपि तादात्म्यदर्शनं शास्त्रात्कर्तव्यं प्रतिमादिष्विव विष्वादि-दर्शनमिति चेत्, काममेवं भवतु । नतु संसारिणो मुख्य आत्मेश्वर इत्येतन्नः प्रापयितव्यम् । एवं प्राप्ते ब्रूमः - आत्मेत्येव परमेश्वरः प्रतिपत्तव्यः । तथा हि - परमेश्वरप्रक्रियायां जाबाला आत्मत्वेनैवैतमुपगच्छन्ति - ' वं वा अहमस्मि भगवो देवतेऽहं वै त्वमसि भगवो देवते ' इति । तथाऽन्येऽपि ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्येवमादय आत्मत्वोपगमा द्रष्टव्याः । ग्राहयन्ति चात्मत्वे -नैवेश्वरं वेदान्तवाक्यानि – ' एष त आत्मा सर्वान्तर: ' ( वृ ० ३ | ४ | १ ), ' एष त आत्माऽ-जो शास्त्रोक्त विशेषण विशिष्ट परमात्मा है क्या वह ' मैं हूँ ' इसप्रकार ग्रहण करना चाहिए अथवा क्या वह ' मुझसे अन्य है ' ऐसा ग्रहण करना चाहिए, इसका विचार करते हैं । परन्तु प्रत्यगात्म-विषयक आत्मशब्द श्रूयमाण होनेपर पुनः संशय कैसे? कहते हैं - जीव और ईश्वरका अभेद संभव होनेपर यह आत्मशब्द मुख्यरूपसे स्वीकार किया जा सकता है, अन्यथा यह आत्मशब्द गौण स्वीकार करना चाहिए, ऐसा मानते हैं । तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - ' मैं ब्रह्म हूँ ' इसप्रकार ग्रहण नहीं करना चाहिए, क्योंकि ' अपहतपाप्मत्व ' आदि गुणवाला विपरीत गुणरूपसे ग्रहण नहीं किया जा सकता अथवा विपरीत गुण - पाप आदि विशिष्ट ' अपहतपाप्मत्व ' आदि गुणरूपसे ग्रहण नहीं किया जा सकता । ' अपहतपाप्मत्व ' आदि गुण विशिष्ट परमेश्वर है और उससे विपरीत गुण विशिष्ट जीवात्मा है । ईश्वर में संसार्यात्मत्व स्वीकार होनेपर ईश्वरका अभाव प्रसङ्ग होगा, उससे शास्त्र अनर्थक होगा । और संसारीमें भी ईश्वरात्मत्व स्वीकार होनेपर अधिकारीके न होनेसे शास्त्र अनर्थक ही होगा । और दोनोंके अभेद पक्षमें प्रत्यक्ष आदिका विरोध भी होता है । यदि ऐसा कहो कि दोनोंका भेद होनेपर भी प्रतिमा आदिमें विष्णु आदि दर्शन ( ध्यान ) के समान शास्त्र प्रामाण्यसे तादात्म्यदर्शन ( अभेद ध्यान ) करना चाहिए, तो भले ऐसा हो । परन्तु संसारी जीव मुख्यरूपसे परमात्मा ईश्वर है, ऐसा हमें प्राप्त नहीं कराना चाहिए । सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - यह आत्मा ही परमेश्वर समझना चाहिए, क्योंकि परमेश्वरके प्रकरणमें ' त्वं वा अहमस्मि ' ( हे भगवन् देवता! तू ही मैं हूँ, और हे भगवन् देवता! मैं ही तू है ) इसप्रकार जाबाल उसे आत्मरूप से स्वीकार करते हैं 1 । वैसे ही ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि अन्य भी आत्मत्व स्वीकार जानना चाहिए । ' एष त आत्मा ० ' ( यह तेरी आत्मा सत्यानन्दी - दीपिका * पूर्वं अधिकरणमें श्रवण आदि साधनोंकी आवृत्ति कही गयी है । अब इस अधिकरणमें ध्यानके समय आवृत्ति विषयक विचार किया जाता है । तत्त्वज्ञानके लिए ध्यानकी आवृत्ति के समय ' मैं ब्रह्म हूँ ' ऐसा ध्यान करना चाहिए, अथवा ' मेरा स्वामी ईश्वर है ' ऐसा ध्यान करना चाहिए? इसप्रकार ऐक्थ और भेदविषयक प्रमाणोंके होनेसे ' यः ' इत्यादिसे संशय कहते हैं । ' शब्दादेव प्रमितः '

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अधि ० २ सू ० ३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७ ९९ न्तर्याम्यमृतः ' ( बृ ० ३।७।३ ), ' तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि ' ( छा ० ६२८ | ७ ) इत्येवमादीनि | यदुक्तम् - प्रतीकदर्शनमिदं विष्णुप्रतिमान्यायेन भविष्यतीति, तदयुक्तम्, गौणत्वप्रसङ्गात्, वाक्यवैरूप्याच्च । यत्र हि प्रतीकदृष्टिरभिप्रेयते, सकृदेव तत्र वचनं भवति । यथा - ' मनो ब्रह्म ' छा ० ३।१८।१ ) ‘ आदित्यो ब्रह्म ' ( छा ० ३।१ ९ | १ ) इत्यादि, इह पुनस्त्वमहमस्म्यहं च त्वम-सीत्याह, अतः प्रतीकश्रुतिवैरूप्यादभेदप्रतिपत्तिः, भेददृण्यपवादाच्च । तथा हि - ‘ अथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद ' ( बृ ० १।४।१० ), ' मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ' ( त्रृ ४।४।१ ९, कठ ० ४।१० ), ' सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्व वेद ' ( बृ ० ४।५।७ ) इत्येवमाद्या भूयसी श्रुतिर्भेददर्शनमपवदति । यत्त्क्म् न विरुद्धगुणयोरन्योन्यात्मत्वसंभव इति, नायं दोषः, विरुद्धगुणताया मिथ्यात्वोपपत्तेः । यत्पुनरुक्तम् - ईश्वराभावप्रसङ्ग इति, तदसत्, शास्त्रप्रामाण्यादनभ्युपगमाच्च । नहीश्वरस्य संसार्यात्मत्वं प्रतिपाद्यत इत्यभ्युपग-सर्वान्तर है ) ' एष त आत्मा ० ' ( यह तेरा आत्मा अन्तर्यामी और अमृत है ). ' तत्सत्यं ० ' ( वह सत्य है वह आत्मा है, है श्वेतकेतु! वह तू है ) इत्यादि वेदान्तवाक्य ईश्वरको आत्मरूपसे ग्रहण कराते हैं । जो यह कहा गया है कि विष्णुप्रतिमान्यायसे यह प्रतीक दर्शन होगा, वह अयुक्त है, क्योंकि ऐसा माननेसे गौणत्व प्रसङ्ग और वाक्यविरूपत्व - विरुद्धत्व होता है । जहाँ प्रतीकदृष्टि अभिप्रेत होती है वहाँ एक ही वार वचन होता है । जैसे कि ' मनो ब्रह्म ' ( मन ब्रह्म है ) ' आदित्यो ब्रह्म ' ( आदित्य ब्रह्म है ) इत्यादि । परन्तु यहाँ तो ' तू मैं हूँ और मैं तू है ' ऐसा कहते हैं । अतः प्रतीक श्रुतिके विरुद्ध होनेसे अभेद प्रतिपत्ति है, क्योंकि • भेददृष्टिका अपवाद है । जैसे कि ' अथ योऽन्यां ० ' ( और जो अन्य देवताकी ' यह अन्य है और मैं अन्य हूँ ' इसप्रकार उपासना करता है वह नहीं जानता ) ' मृत्योः स ० ’ ( जो पुरुष इस अभिन्न तत्त्वमें नाना - भेद देखता है वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है ) ' सर्वं तं ० ' ( जो सबको आत्मासे भिन्न जानता है उसे सब परास्त कर देते हैं— कैवल्य सम्बन्ध से रहित कर देतें हैं ) इत्यादि बहुत - सी श्रुति भेद दर्शनका निषेध करती हैं । और यह कहा गया है कि विरुद्ध गुणवालों ( जीव और ईश्वर ) का अन्योन्यात्मत्व - ऐक्य संभव नहीं है । यह दोष नहीं है, क्योंकि विरुद्ध गुणता में मिथ्यात्व उपपन्न है । और जो यह कहा गया है कि ईश्वरका अभाव प्रसङ्ग होगा । वह ठीक नहीं है, क्योंकि शास्त्रप्रमाण है और उसे हम स्वीकार नहीं करते । ईश्वरमें संसारी आत्मत्वका प्रतिपादन किया सत्यानन्दी - दीपिका ( ब्र ० सू ० १।३।२३ ) इत्यादि सूत्र में और ' अयमात्मा ब्रह्म ' ( बृ ० २।५।१ ९ ) ( यह आत्मा ब्रह्म है ) इत्यादि श्रुतियोंसे अभेदका प्रतिपादन किया गया है । तो फिर संशय क्यों किया जाता है? ' द्वा सुपर्णा सयुजा ' इत्यादि भेदश्रुति और ' मैं कर्ता, भोक्ता, सुखी - दुःखी, पुण्यी- पापी हूँ और ईश्वरसे भिन्न हूँ ' इत्यादि प्रत्यक्ष भेदप्रतीति से संशय होता है । जीव और ईश्वरका अभेद होनेपर तो जीवमें परमात्म-शब्द मुख्यरूप से उपयुक्त हो सकता है । परन्तु ' द्वा सुपर्णा सयुजा ' इत्यादि भेद प्रतिपादक श्रुति ' अप्र-हतपाप्मा ' इत्यादि ईश्वर स्वरूप प्रतिपादक श्रुतियोंके विद्यमान होनेपर अभेद सम्भव नहीं है, इसलिए ' तत्त्वमसि ' इत्यादि अभेद प्रतिपादक श्रुतिवाक्य गौण हैं । यदि दोनोंका अभेद माना जाय तो ईश्वरको जीवभाव प्राप्त होनेपर ' यः सर्वज्ञः सर्ववित् ' इत्यादि ईश्वर प्रतिपादक शास्त्र निष्फल होगा, और जीवको ईश्वरभाव प्राप्त होनेपर अधिकारीके न होनेसे कर्म, उपासना और ज्ञान प्रतिपादक शास्त्र निष्फल होगा । इसलिए दोनोंका भेद मानना युक्त है । और अभेद प्रतिपादक ' तत्त्वमसि ' आदि श्रुतियोंसे ही अभेद ध्यान करना चाहिए । जैसे प्रतिमा आदिमें विष्णु आदिका अभेद बुद्धिसे ध्यान किया जाता है । अतः जीवको मुख्यरूपसे परमात्मा मानना युक्त नहीं है । सिद्धान्ती - ' आत्मेत्येव परमेश्वरः ' इत्यादिसे कहते हैं । पूर्वपक्ष में ' तत्त्वमसि ' आदि अभेद श्रुतियोंका अभेद अर्थं गौण है, सिद्धान्त में अभेद अर्थ मुख्य है ॥ ३ ॥

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८०० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० १ च्छामः, किं तर्हि? संसारिणः संसारित्वापोहेनेश्वरात्मत्वं प्रतिपिपादयिषितमिति । एवं च सत्यद्वैतेश्वरस्यापहतपाप्मत्वादिगुणता विपरीत गुणता त्वितरस्य मिथ्येति व्यवतिष्ठते । यद-प्युक्तम् - अधिकार्यभावः प्रत्यक्षादिविरोधश्चेति, तदप्यसत्, प्राक्प्रबोधात्संसारित्वाभ्युपग-मात्, तद्विषयत्वाच्च प्रत्यक्षादिव्यवहारस्य । ' यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत् ' ( बृ ० २।४।१४ ) इत्यादिना हि प्रबोधे प्रत्यक्षाद्यभावं दर्शयति । प्रत्यक्षाद्यभावे श्रुतेरप्यभावप्रसङ्ग इति चेत् - न, इष्टत्वात् । ' अत्र पिताऽपिता भवति ' ( वृ ० ४ | ३ | २२ ) इत्युपक्रम्य ' वेदा अवेदाः ' ( बृ ० ४।३।२२ ) इति वचनादिष्यत एवास्माभिः श्रुतेरप्यभावः प्रबोधे । कस्य पुनरयमप्रबोध इति चेत् - यस्त्वं पृच्छसि तस्य त इति वदामः । नन्वहमीश्वर एवोक्तः श्रुत्या, यद्येवं प्रति-बुद्धोऽसि, नास्ति कस्यचिदप्रबोधः । योऽपि दोषश्चोद्यते कैश्चित् अविद्यया किलात्मनः सद्वितीयत्वादद्वैतानुपपत्तिरिति, सोऽप्येतेन प्रत्युक्तः । तस्मादात्मेत्येवेश्वरे मनो दधीत ॥३ ॥

( ३ प्रतीकाधिकरणम् । सू ० ४ ) न प्रतीके न हि सः ॥ ४ ॥

पदच्छेद - न, प्रतीके, नहि, सः । सूत्रार्थ - ( प्रतीके ) प्रतीकों में ( न ) आत्मबुद्धि नहीं होनी चाहिए, क्योंकि ( सः ) उपासकको व्यस्त प्रतीकोंका आत्मरूप से आकलन नहीं करना चाहिए । * ' मनो ब्रह्मेत्युपासीतेत्यध्यात्ममथाधिदैवतमाकाशो ब्रह्मेति ' ( छा ० ३ | १८1१ ) तथा ' आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः ' ( छा ० ३ | १ ९ | १ ) ' स यो नाम ब्रह्मेत्युपास्ते ' ( छा ० ७ | १ | ५ ) इत्येवमादिषु जाता हैं, ऐसा हम स्वीकार नहीं करते, किन्तु संसारी जीवका संसारित्व निरासकर ईश्वरभाव प्रतिपादन करना अभीप्सित है । ऐसा होनेपर अद्वैत ईश्वरका अपहतपाप्मत्व आदि गुणत्व और अन्य जीवका विपरीत गुणत्व मिथ्या है, ऐसा व्यवस्थित होता है । जो यह भी कहा गया है कि अधिकारीका अभाव और प्रत्यक्ष आदिका विरोध है । वह भी अयुक्त है, क्योंकि तत्त्वज्ञानसे पूर्व जीवका संसारी आत्मत्व स्वीकार है और प्रत्यक्ष आदि व्यवहार तद्विषयक है । ' यत्र त्वस्य ० ' ( जहाँ इसका सब आत्मा ही हो गया वहाँ किससे किसे देखे ) इत्यादिसे श्रुति प्रबोध - तत्त्वज्ञान होनेपर प्रत्यक्ष आदिका अभाव दिखलाती है । यदि कहो कि प्रत्यक्ष आदिके अभाव होनेपर श्रुतिका मी अभाव प्रसङ्ग हो जायगा, तो नहीं, क्योंकि ऐसा हमें इष्ट है । ' अत्र पिताऽपिता भवति ' ( इस अवस्थामें पिता अपिता हो जाता है ) ऐसा आरम्भ-कर ' वेदा अवेदा: ' ( वेद अवेद हो जाते हैं ) इस वचनसे प्रबोधमें श्रुतिका अभाव हमें भी इष्ट है । यदि कहो कि यह अज्ञान किसका है, तो हम कहते हैं कि तुम पूछते हो वह उस तुम्हारा हो है । परन्तु ' मैं ईश्वर हूँ ' ऐसा श्रुतिने कहा है । यदि इसप्रकार प्रतिबुद्ध हुए हो तो किसीका अज्ञान नहीं है । और कुछ लोग जो दोष देते हैं कि अविद्यासे आत्मामें सद्वितीयत्व होनेसे अद्वैतकी अनुपपत्ति है, वह भी इससे प्रत्याख्यात हुआ । इससे आत्मा ही ईश्वर है, उस ईश्वरमें मन लगाना चाहिए ॥ ३ ॥

' मनो ब्रह्मेत्युपासीत ० ' ( मन ब्रह्म है ऐसी उपासना करनी चाहिए, यह अध्यात्मदृष्टि है आकाश ब्रह्म है ऐसी उपासना करनी चाहिए, यह अधिदैवत है ) इसीप्रकार ' आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः ० ' ( आदित्य ब्रह्म है ऐसा उपदेश है ) ' स यो नाम ० ' ( वह जो कि नाम ब्रह्म है ऐसी उपासना करता सत्यानन्दी - दीपिका जैसे पूर्वं अधिकरणमें ब्रह्ममें जीवका अभेद होनेसे अहंग्रह कहा गया है, वैसे ही प्रतीक भी ब्रह्म विचार होनेसे जीवसे अभिन्न ब्रह्म हैं, उससे अभिन्न होनेसे जीवसे अभिन्न हैं । उनमें भी अहंग्रह होना चाहिए । इसप्रकार दृष्टान्तसंगतिसे पूर्वपक्ष कहते हैं—- पूर्वपक्षमें प्रतीकोपासनाका अहं ग्रहोपासना

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अधि ० ४ सू ० ५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८०१ प्रतीकोपासनेषु संशयः - किं तेष्वप्यात्मग्रहः कर्तव्यो न वेति । किं तावत्प्राप्तम्? तेष्वप्या-स्मग्रह एव युक्तः कर्तुम् । कस्मात्? ब्रह्मणः श्रुतिश्वात्मत्वेन प्रसिद्धत्वात्प्रतीकानामपि ब्रह्मविकारत्वाद्ब्रह्मत्वे सत्यात्मत्वोपपत्तेरिति । एवं प्राप्ते ब्रूमः - न प्रतीकेष्वात्ममति बध्नीयात् । न हि स उपासकः प्रतीकानि व्यस्तान्यात्मत्वेनाकलयेत् । यत्पुनः - ब्रह्मविकार-त्वात्प्रतीकानां ब्रह्मत्वं ततश्चात्मत्वमिति - तदसत्, प्रतीकाभावप्रसङ्गात् । विकारस्वरूपो-पमर्देन हि नामादिजातस्य ब्रह्मत्वमेवाश्रितं भवति । स्वरूपोपमर्दे च नामादीनां कुतः प्रतीकत्वमात्मग्रहो वा? न च ब्रह्मण आत्मत्वाद्ब्रह्मदृयुपदेशे वात्मदृष्टिः कल्प्या, कर्तृत्वाद्यनिराकरणात् । कर्तृत्वादिसर्वसंसारधर्मनिराकरणे हि ब्रह्मण आत्मत्वोपदेशः । तदनिराकरणेन चोपासनविधानम् । अतश्चोपासकस्य प्रतीकः समत्वादात्मग्रहो नोपपद्यते । नहि रुचकस्वस्तिकयोरितरेतरात्मत्वमस्ति, सुवर्णात्मत्वेनेव तु ब्रह्मात्म-atra प्रतीकाभावप्रसङ्गमवोचाम । अतो न प्रतीकेष्वात्मदृष्टिः क्रियते || ४ || ( ४ ब्रह्मदृष्ट्यधिकरणम् । सू ० ५ ) ब्रह्मदृष्टिरुत्कर्षात् ॥ ५ ॥

पदच्छेद- ब्रह्मदृष्टि, उत्कर्षात् । है ) इत्यादि प्रतीकोपासनाओंमें संशय होता है कि क्या उनमें भी आत्मग्रह करना चाहिए अथवा नहीं? तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी— उनमें भी आत्मग्रह युक्त ही है, किससे? इससे कि ब्रह्म आत्मरूप से श्रुतियोंमें प्रसिद्ध है, प्रतीक भी ब्रह्मके विकार हैं, अतः उनमें ब्रह्मत्व होनेपर आत्मत्वकी उपपत्ति संभव है । सिद्धान्ती — ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं- प्रतीकोंमें आत्मबुद्धि नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उपासकको व्यस्त प्रतीकोंका आत्मरूपसे आकलन ( ग्रहण ) नहीं करना चाहिए, और जो कहा गया है कि ब्रह्मका विकार होनेसे प्रतीक ब्रह्म हैं उससे आत्मा हैं । वह युक्त नहीं हैं, क्योंकि ऐसा होने पर प्रतीकका अभाव प्रसङ्ग होगा । कारण कि विकार के स्वरूपका नाश होनेपर नाम आदि समुदाय ब्रह्म स्वरूप ही हो जाता है । नाम आदिके स्वरूपका नाश होनेपर उनमें प्रतीकत्व और आत्मग्रह कैसे हो सकता है? ब्रह्मके आत्मत्व होनेसे ब्रह्मदृष्टिं उपदेशोंमें आत्मदृष्टिकी कल्पना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि कर्तृत्व आदिका निराकरण नहीं किया गया है । कर्तृत्व आदि समस्त संसार धर्मोके निराकरण से ही ब्रह्म में आत्मत्व उपदेश है, और उसके अनिराकरणसे उपासनाका विधान है । अत: उपासककी प्रतीकों के साथ समानता होनेसे प्रतीकोंमें आत्मग्रह उपपन्न नहीं होता । रुचक और स्वस्तिकों में अन्योन्यात्मकत्व नहीं है । जैसे ये दोनों सुवर्णरूपसे एक हैं, वैसे प्रतीक और उपासक दोनों ब्रह्मरूपसे एक होनेपर प्रतीकका अभाव प्रसङ्ग आ जायगा, ऐसा हम कह चुके हैं । इसलिए प्रतीकों में आत्मदृष्टि नहीं की जाती है ॥४ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका से कोई विशेष नहीं है, इसलिए ' मनो ब्रह्म ' ( ब्रह्मरूप मन मैं हूँ ) ' आदित्यो ब्रह्म ' ( ब्रह्मरूप आदित्य मैं हूँ ) इसप्रकार प्रतीकोंमें आत्मरूप से अहंग्रह करना चाहिए । सिद्धान्ती - विकल्प कर पूर्वपक्षका निराकरण करते हैं— प्रतीकों में यह आत्मा है, ऐसे अनुभव के बलसे अहंग्रह होता है अथवा वस्तुतः. जीवसे प्रतीक अभिन्न हैं, अतः अहंग्रह होता है । प्रथमपक्ष युक्त नहीं है, इसको ' न हि सः ' आदिसे कहते हैं । दूसरा पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रतीक ब्रह्मका विकार होनेसे ब्रह्म है, इससे वह आत्मा है । ऐसा होने से प्रतीकका अभाव प्रसङ्ग होगा । नाम - रूप विकारका स्वरूपनाश होनेपर उसमें प्रतीकत्व और आत्मग्रह संभव नहीं हैं, अतः प्रतीकोंमें आत्मबुद्धि नहीं करनी चाहिए ॥ ४ ॥

पृष्ठ 836

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८०२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० १ सूत्रार्थ -- ( ब्रह्मदृष्टिः ) आदित्य आदि प्रतीकोंमें ब्रह्मदृष्टि करनी चाहिए, ( उत्कर्षात् ) क्योंकि ब्रह्मदृष्टि उत्कर्ष है । * तेष्वेवोदाहरणेष्वन्यः संशयः - किमादित्यादिदृष्ट्यो ब्रह्मण्यध्यसितव्याः, किं वा ब्रह्मदृष्टिरादित्यादिष्विति । कुतः संशयः? सामानाधिकरण्ये कारणानवधारणात् । अत्र हि ब्रह्मशब्दस्यादित्यादिशब्दः सामानाधिकरण्यमुपलभ्यते, आदित्यो ब्रह्म प्राणो ब्रह्म विद्यु द्ब्रह्मेत्यादि समानविभक्तिनिर्देशात् । न चात्राञ्जसं सामानाधिकरण्यमवकल्पते, अर्थान्तर-ववनत्वाद्ब्रह्मादित्यादिशब्दानाम् । नहि भवति गौरश्व इति सामानाधिकरण्यम् । ननु प्रकृतिविकारभावाद्ब्रह्मादित्यादीनां मृच्छरावादिवत्सामानाधिकरण्यं स्यात् - नेत्युच्यते, विकारप्रविलयो ह्येवं प्रकृतिसामानाधिकरण्यात्स्यात् । ततश्च प्रतीकाभावप्रसङ्गमवोचाम | परमात्मवाक्यं चेदं तदानीं स्यात्, ततश्चोपासनाधिकारो बाध्येत । परिमितविकारोपादानं च व्यर्थम् । तस्माद् ' ब्राह्मणोऽग्निर्वैश्वानरः ' इत्यादिवदन्यतरत्रान्यदृष्ट्यध्यासे सति क्व किंदृ-ष्टिरव्यस्यतामिति संशयः । तत्रानियमः, नियमकारिणः शास्त्रस्याभावादित्येवं प्राप्तम् । अथवा-उन्हीं उदाहरणों में अन्य संशय होता है कि क्या आदित्य आदि दृष्टिका ब्रह्ममें अध्यास होना चाहिए अथवा क्या ब्रह्मदृष्टिका आदित्य आदिमें अध्यास होना चाहिए? किससे संशय होता है? इससे कि सामानाधिकरण्यमें कारणका निश्चय नहीं होता । और यहीं पर ब्रह्म शब्दका आदित्य आदि शब्दों के साथ सामानाधिकरण्य उपलब्ध होता है, क्योंकि ' आदित्यो ब्रह्म ० ' ( आदित्य ब्रह्म है, प्राण ब्रह्म है, विद्युत् ब्रह्म है ) इत्यादि समान विभक्तिका निर्देश है और यहाँ मुख्य सामानाधिकरण्य नहीं हो सकता, कारण कि ब्रह्म और आदित्य शब्द भिन्न - भिन्न अर्थके वाचक हैं | ' गौरश्वः ' ' गो अश्व ’ इसप्रकार सामानाधिकरण्य नहीं होता । परन्तु मृत्तिका और शराव ( सिकोरा ) के समान ब्रह्म और आदित्य आदिका प्रकृति - विकारभाव होनेसे सामानाधिकरण्य होना चाहिए? नहीं, ऐसा कहते हैं— क्योंकि इसप्रकार प्रकृतिके साथ सामानाधिकरण्य होनेसे विकारका प्रविलय ही होगा, उससे प्रतीकका अभाव प्रसङ्ग आ जायेगा, ऐसा हम कह चुके हैं । और ऐसा माननेपर तो यह [ आदित्यो ब्रह्म ] परमात्मवाक्य होगा, उससे उपासना अधिकारका बाध हो जायगा । परिमित सीमित विकारका ग्रहण भी व्यर्थ है । इसलिए ' ब्राह्मणोऽग्निर्वैश्वानरः ' ( ब्राह्मण वैश्वानर अग्नि है ) इत्यादिके समान अन्योन्य अन्य दृष्टिका अध्यास होनेपर कहाँ किस दृष्टिका अध्यास होना चाहिए, ऐसा संशय होता है । पूर्वपक्षी - इस विषय में कोई नियम नहीं है, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि नियम करनेवाले शास्त्रका अमाव है । अथवा आदित्य दृष्टि ही ब्रह्ममें करनी चाहिए, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि इसप्रकार सत्यानन्दी - दीपिका * पूर्वं अधिकरणमें यह कहा गया कि आदित्य आदि प्रतीकोंको आत्मरूपसे ग्रहण नहीं करना चाहिए | अब इस अधिकरणमें आदित्य आदि प्रतीकोपासनाओं में कहाँ किस दृष्टिका अध्यास करना चाहिए, यह विचार किया जाता है । यहाँ संशयका कारण ' आदित्यो ब्रह्म ' यह आदित्य और ब्रह्म दोनों में समान विभक्तिरूप सामानाधिकरण्य है । और यह सामानाधिकरण्य मुख्य नहीं है, क्योंकि दोनोंका भिन्न - भिन्न अर्थ है । व्यापक चैतन्यरूप ब्रह्म शब्दका अर्थ है और आकाशस्थ प्रदीप्न तेजोमय मण्डल आदित्य शब्दका अर्थ है । किञ्च यदि ' आदित्यो ब्रह्म ' यह ब्रह्म वाचक मानें तो ' सर्वं ब्रह्म ' ऐसा कहना होगा । इसलिए यहाँ परिशेषसे अध्यास ही सामानाधिकरण्यका कारण सिद्ध होता है । अध्यासमें निश्चायक न होनेसे संशय होता है कि किसका किसमें अध्यास करना चाहिए । पूर्वपक्षी-' तत्रा नियमः ' आदिसे कहते हैं । पूर्वपक्षमें विकारदृष्टिसे ब्रह्मकी उपासना करनी चाहिए, इससे फलकी सिद्धि होती है, सिद्धान्त में ब्रह्मदृष्टिसे आदित्य आदिकी उपासना करनी चाहिए ।

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अधि ० ४ सू ० ५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ८०३ ऽऽदित्यादिदृष्ट्य एव ब्रह्मणि कर्तव्या इत्येवं प्राप्तम् । एवं ह्यादित्यादिदृष्टिभिर्ब्रह्मोपासितं भवति ब्रह्मोपासनं च फलवदिति शास्त्रमर्यादा । तस्मान्न ब्रह्मदृष्टिरादित्यादिष्विति । एवं प्राप्ते ब्रूमः - ब्रह्मदृष्टिरेवादित्यादिषु स्यादिति । कस्मात्? उत्कर्षात् । एवमुत्कर्षेणादित्यादयो दृष्टा भवन्ति उत्कृष्टदृष्टेस्तेष्वध्यासात् । तथा च लौकिको न्यायोऽनुगतो भवति उत्कृष्टदृष्टिर्हि निकृष्टेऽध्यसितव्येति लौकिको न्यायः । यथा राजदृष्टिः क्षत्तरि, स चानुसर्तव्यः, विपर्यये प्रत्यवायप्रसङ्गात् । नहि क्षत्तृदृष्टिपरिगृहीतो राजा निकर्ष नीयमानः श्रेयसे स्यात् । ननु शास्त्रप्रामाण्यादनाशङ्कनीयोऽत्र प्रत्यवायप्रसङ्गः, न च लौकिकेन न्यायेन शास्त्रीया दृष्टिर्नि यन्तुं युक्तेति । अत्रोच्यते - निर्धारिते शास्त्रार्थे एतदेवं स्यात्, संदिग्धे तु तस्मिंस्तन्निर्णयं प्रति लौकिकोऽपि न्याय आश्रीयमाणो न विरुध्यते । तेन चोत्कृष्टष्टयध्यासे शास्त्रार्थेऽव-धार्यमाणे निकृष्टदृष्ट्रिमध्यस्यन्प्रत्यवेयादिति लिप्यते । प्राथम्याच्चादित्यादिशब्दानां मुख्या-र्थत्वमविरोधाद्ग्रहीतव्यम् ॥ तैः स्वार्थवृत्तिभिरवरुद्धायां बुद्धौ पश्चादवतरतो ब्रह्मशब्दस्य मुख्यया वृत्त्या सामानाधिकरण्यासंभवाद्ब्रह्मदृष्टिविधानार्थतैवावतिष्ठते । इतिपरत्वादपि ब्रह्मशब्दस्यैष एवार्थो न्याय्यः । तथा हि - ' ब्रह्मेत्यादेशः ', ब्रह्मेत्युपासीत ', ब्रह्मेत्युपास्ते ' इति आदित्य आदि दृष्टिसे ब्रह्म उपासित होता है और ब्रह्मोपासना सप्रयोजन है, ऐसी शास्त्र मर्यादा है । इसलिए ब्रह्मदृष्टि आदित्य आदिमें नहीं है । सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - ब्रह्मदृष्टि ही आदित्य आदिमें होनी चाहिए, किससे? उत्कर्ष से । इस प्रकार उत्कर्षसे आदित्य आदि दृष्ट होते हैं, क्योंकि उत्कृष्ट दृष्टिका उनमें अध्यास है । ऐसे लौकिक न्याय अनुगत होता, उत्कृष्ट दृष्टिका ही निकृष्ट में अध्यास करना चाहिए, यह लौकिक न्याय है । जैसे सारथि में राजदृष्टि । इस लौकिक न्यायका ही यहाँ अनुसरण करना चाहिए । कारण कि विपर्यय होनेपर प्रत्यवायका प्रसङ्ग है । सारथि दृष्टिसे परिगृहीत होने से निकृष्टताको प्राप्त हुआ राजा श्रेयके लिए नहीं होता । परन्तु शास्त्रप्रामाण्यसे यहाँ प्रत्यवाय प्रसङ्गकी शङ्का नहीं होनी चाहिए और लौकिक न्यायसे शास्त्रीय दृष्टिका नियमन होना युक्त नहीं है? क्षि ० - इसपर कहते हैं - शास्त्रार्थ के निर्धारित होनेपर यह ऐसा हो सकता है । परन्तु उसके संदिग्ध होनेपर उसके निर्णयके प्रति आश्रीयमाण लौकिक न्याय भी विरुद्ध नहीं है । इससे उत्कृष्टदृष्टि अध्यासरूप शास्त्रार्थंका निश्चय होनेपर निकृष्टदृष्टिका अध्यास करता हुआ प्रत्यवायको प्राप्त होगा, यह युक्त है । और आदित्य आदि शब्दोंके प्रथम निर्दिष्ट होनेसे वे मुख्यार्थक हैं ऐसा अविरोधसे ग्रहण करना चाहिए | अपने अर्थ में वृत्तिवाले उन शब्दोंसे बुद्धिके अवरुद्ध होनेपर पश्चात् बुद्धिमें उतरते हुए ब्रह्मशब्दका मुख्यवृत्ति से सामानाधिकरण्य संभव न होनेसे ब्रह्मदृष्टि विधानार्थता अवस्थित होती है । और ' इति ' पर होने से भी ब्रह्मशब्दका यही अर्थ उचित है । जैसे कि ' ब्रह्मेत्यादेशः ' ( आदित्य ब्रह्म है, ऐसा उपदेश है ) ' ब्रह्मेत्युपासीत ' ( ब्रह्म है, ऐसी उपासना करनी चाहिए ) ' ब्रह्मेत्युपास्ते ' सत्यानन्दी- दीपिका ' आदित्य आदि दृष्टि से ब्रह्म उपास्य है अथवा ब्रह्मदृष्टिसे आदित्य आदि उपास्य हैं ' इस प्रकार जहाँ शास्त्रार्थमें सन्देह हो वहाँपर लौकिक न्यायका ग्रहण अयुक्त नहीं है । केवल लौकिक न्याय ही इस अर्थमें हेतु नहीं है, अपितु ' आदित्यो ब्रह्म ' इत्यादि श्रुति में आदित्य आदिका प्रथम प्रतिपादन भी उक्त निश्चयमें हेतु है । और यहाँ विरोध न होनेसे आदित्य आदिका मुख्यार्थं ग्रहण करना युक्त है । ब्रह्म-शब्दका मुख्यार्थं बुद्धिमें त्वरित नहीं आता, इसलिए ब्रह्मशब्दकी ब्रह्मदृष्टि में लक्षणा करनी होगी । इससे ' आदित्य आदि ब्रह्म दृष्टि से उपास्य हैं ' ऐसा वाक्यार्थ है । और ' आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः ' ब्रह्म-शब्दसे ' इति ' परे होने से भी ब्रह्मशब्दका ब्रह्मदृष्टि अर्थ युक्त है । * यहाँ द्वितीया विभक्तिका श्रवण, ' इति ' शब्दपर और उक्त लौकिक न्याय [ उत्कृष्ट और निकृष्ट के

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८०४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० १ च सर्वत्रेतिपरं ब्रह्मशब्दमुच्चारयति, शुद्धांस्त्वादित्यादिशब्दान् । ततश्च यथा शुक्तिकारजत मिति प्रत्येतीत्यत्र, शुक्तिवचन एव शुक्तिकाशब्दो रजतशब्दस्तु रजतप्रतीतिलक्षणार्थः । प्रत्येत्येव हि केवलं रजतमिति, नतु तत्र रजतमस्ति । एवमत्राप्यादित्यादीन्ब्रह्मेति प्रतीया-दिति गम्यते । वाक्यशेषोऽपि च द्वितीयानिर्देशेनादित्यादीनेवोपास्तिक्रियया व्याप्यमा-नान्दर्शयति - ' स य एतमेव विद्वानादित्यं ब्रह्मेत्युपास्ते ' ( छा ० ३।१ ९ ।५ ), ' यो वाचं ब्रह्मेत्युपास्ते ' ' ( छा ० ७।२।२ ), ‘ यः संकल्पं ब्रह्मेत्युपास्ते ' ( छा ० ७।४।३ ) इति च । यतूक्तम् - ब्रह्मोपासनमेवात्राद-रणीयं फलवत्त्वायेति - तदयुक्तम् उक्तेन न्यायेनादित्यादीनामेवोपास्यत्वावगमात् । फलं त्वतिथ्याद्युपासन इव आदित्याद्युपासनेऽपि ब्रह्मैव दास्यति, सर्वाध्यक्षत्वात् । वर्णितं चैतत्-‘ फलमत उपपत्तेः ’ ( ब्र ० सू ० ३।२।३८ ) इत्यत्र । ईदृशं चात्र ब्रह्मण उपास्यत्वं यत्प्रतीकेषु तद्दृष्टयध्यारोपणं प्रतिमादिष्विव विष्ण्वादीनाम् ॥५ ॥

( ५ आदित्यादिमत्यधिकरणम् । सू ० ६ ) आदित्यादिमतयश्चाङ्ग उपपत्तेः ॥ ६ ॥ ॥

पदच्छेद - आदित्यादिमतयः, च, अङ्गे, उपपत्तेः । सूत्रार्थ - ( अङ्गे ) उद्गीथ आदि कर्माङ्गों में ( आदित्यादिमतयः ) आदित्य आदि बुद्धि कहनी चाहिएँ, ( उपपत्तेश्च ) क्योंकि ऐसा होनेसे कर्म समृद्धिरूप फलकी उपपत्ति होती है । * ‘ य एवासौ तपति तमुद्गीथमुपासीत ' ( छा ० १1३1१ ), ' लोकेषु पञ्चविधं सामोपासीत ' ( छा ० २।२।१ ), ' वाचि सप्तविधं सामोपासीत ' ( छा ० २।८।१ ) ' इयमेव र्गग्निः साम ' ( छा ० १।६।१ ) ( ब्रह्म है, ऐसी उपासना करता है ) इस प्रकार सर्वत्र ' इति ' परक ब्रह्मशब्दका उच्चारण करते हैं और आदित्य आदि शुद्ध शब्दोंका उच्चारण करते हैं । उससे जैसे शुक्तिकाको यह रजत है, ऐसा जानता है । यहाँ शुक्तिका शब्द शुक्तिवाचक है और रजतशब्द तो रजत प्रतीति लक्षणार्थक है, क्योंकि ' रजत है ' यह केवल प्रतीति करता है, वहाँ तो रजत नहीं है । इस प्रकार उदाहरणों में भी आदित्य आदिको यह ब्रह्म है ऐसा जाने, ऐसा ज्ञात होता है और ' स य एतमेवं ० ' ( वह जो इस प्रकार जाननेवाला होकर आदित्यकी यह ब्रह्म है, ऐसी उपासना करता है ) ' स यो वाचं ० ' ( वह जो वाणी की ब्रह्मरूपसे उपासना करता है ) ' यः संकल्पं ० ' ( जो संकल्पकी ब्रह्म बुद्धिसे उपासना करता है ) इस प्रकार वाक्यशेष भी द्वितीया विभक्तिके निर्देशसे आदित्य आदिको उपासना क्रिया द्वारा व्याप्य-विषय किये हुए दिखलाता है । और जो यह कहा गया है कि फलवत्त्वके लिए यहाँ ब्रह्मोपासना ही आदरणीय है; वह अयुक्त है, क्योंकि उक्त न्यायसे आदित्य आदि ही उपास्य अवगत होते हैं । फल तो अतिथि आदिकी उपासना के समान आदित्य आदि उपासना में भी ब्रह्म ही देगा, क्योंकि वह सर्वाध्यक्ष है | और इसका ' फलगत उपपत्ते: ' इस सूत्रमें वर्णन किया गया है । यहाँ ब्रह्मका इसप्रकारका उपास्यत्व है जो प्रतिमा आदि विष्णु आदिके अध्यारोप समान प्रतीकोंमें ब्रह्मदृष्टिका अध्यारोप है ॥५ ॥

' य एवासौ ० ' ( जो कि यह आदित्य तपता है । उसके रूपमें उद्गीथकी उपासना करे अर्थात् आदित्य दृष्टिसे उद्गीथकी उपासना करनी चाहिए ) ' लोकेषु ० ' ( पृथिवी आदि लोकोंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करनी चाहिए अर्थात् लोक दृष्टि से पाँच प्रकार सामकी उपासना करनी चाहिए ) ' वाचि सप्तविधं ० ' ( वाणी दृष्टि से सात प्रकारके सामकी उपासना करनी चाहिए ) ' इयमेव ० ' ( यह सत्यानन्दी - दीपिका मध्यमें उत्कृष्ट दृष्टिसे निकृष्ट उपास्य है ] से यही सिद्ध होता है कि आदित्य आदि ब्रह्मदृष्टिसे उपास्य हैं । * आदित्यादि और उद्गीथ आदिमें कौन किस दृष्टिसे उपास्य है, इस अधिकरण में यह विचार

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अधि ० ५ सू ० ६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८०५ इत्येवमादिष्वङ्गावबद्धेपूपासनेषु संशयः - किमादित्यादिषूद्गीथादियो विधीयन्ते, किं वोद्गीथादिष्वेवादित्यादिदृष्ट्य इति । तत्रानियमः, नियमकारणाभावादिति प्राप्तम् । नात्र ब्रह्मण इव कस्यचिदुत्कर्षविशेषोऽवधार्यते । ब्रह्म हि समस्तजगत्कारणत्वादपहतपाप्मत्वा-दिगुणयोगाच्चादित्यादिभ्य उत्कृष्टमिति शक्यमवधारयितुम्, न त्वादित्योद्गीथादीनां विकार-त्वाविशेषात्किचिदुत्कर्षविशेषावधारणे कारणमस्ति । * अथवा नियमेनोद्गीथादिमतय आदित्यादिष्वध्यस्येरन् । कस्मात्? कर्मात्मकत्वादुद्गीथादीनां कर्मणश्च फलप्राप्तिप्रसिद्धेः । उद्गीथादिमतिभिरुपास्यमाना आदित्यादयः कर्मात्मकाः सन्तः फलहेतवो भविष्यन्ति । तथा च ' इयमवर्गग्निः साम ' ( छा ० १।६।१ ) इत्यत्र ' तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम ' ( छा ० १।६।१ ) इत्युक्शब्देन पृथिवीं निर्दिशति सामशब्देनाग्निम्ः तच्च पृथिव्यग्न्योर्ऋक्सामदृष्टिचिकीर्षा-यामवकल्पते; न ऋक्सामयोः पृथिव्यग्निदृष्टिचिकीर्षायाम् | क्षत्तरि हि राजदृष्टिकरणाद्राज शब्द उपचर्यते, न राजनि क्षत्तृशब्दः 1 । अपि च ' लोकेषु पञ्चविधं सामोपासीत ' ( छा ० २।२।१ ) इत्यधिकरणनिर्देशाल्लोकेषु सामाध्यसितव्यमिति प्रतीयते । ' एतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतम् ' ( छा ० पृथिवी ऋ है और अग्नि साम है ) इत्यादि अंगोंसे सम्बन्धित उपासनाओंमें संशय होता है कि क्या आदित्य आदि उद्गीथादि दृष्टिका विधान किया जाता है अथवा क्या उद्गीथ आदि दृष्टिका आदित्य आदिमें विधान किया जाता है? पूर्वपक्षी— उसमें नियमका कारण न होनेसें अनियम है, ऐसा प्राप्त होता है । यहाँ ब्रह्म के समान किसीका उत्कर्ष विशेष निश्चित नहीं किया जाता । ब्रह्म समस्त जगत्‌का कारण और अपहतपाप्मत्वादि गुणयोगसे आदित्य आदिसे उत्कृष्ट है, ऐसा अवधारण किया जा सकता है । परन्तु आदित्य और उद्गीथादिमें विकारत्व समान होनेसे उत्कर्ष विशेष अवधारणमें कोई कारण नहीं है । अथवा उद्गीथ आदि बुद्धिका नियमसे आदित्य आदिमें अध्यारोप होना चाहिए, किससे? इससे कि उद्गीथ आदि कर्मात्मक हैं और कर्मसे फलप्राप्ति प्रसिद्ध है । उद्गीथ आदि बुद्धिसे उपास्यमान आदित्य आदि कर्मात्मक होते हुए फलके हेतु होंगे । और इसीप्रकार ' इयमेव ० ' ( यह पृथिवी ही ऋक् है और अग्नि साम है ) इसमें ' तदेतदेतस्या ० ' ( वह यह अग्निसंज्ञक साम इस पृथिवी-रूप ऋक् में अध्यूढ - ऊपरिभावसे स्थित है ) इसप्रकार श्रुति ऋक् शब्दसे पृथिवीका और सामशब्दसे अग्निका निर्देश करती है । और वह निर्देश क्रमशः पृथिवी और अग्निमें ऋक् दृष्टि और सामदृष्टि करनेकी इच्छा होनेपर उपपन्न होता है, किन्तु ऋक् और साममें पृथिवीदृष्टि और अग्निदृष्टि करनेकी इच्छा होनेपर उपपन्न नहीं होता है । सारथिमें राजदृष्टि करनेसे सारथिमें राजशब्द गौणीवृत्तिसे उपचरित होता है, किन्तु राजामें सारथिशब्द उपचरित नहीं होता । और ' लोकेषु ० ' ( लोकोंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करनी चाहिए ) इसप्रकार अधिकरणके निर्देशसे लोकोंमें सामका अध्यास करना चाहिए, ऐसा प्रतीत होता है । ' एतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतम् ' ( यह गायत्रसंज्ञक साम प्राणों में प्रतिष्ठित सत्यानन्दी - दीपिका किया जाता है । यहाँ ' पृथिवी, अग्नि, अन्तरिक्ष, आदित्य और द्यु दृष्टिसे क्रमशः हिकार, प्रस्ताव, उद्गीथ, प्रतिहार और निधन ' ईस पाँच प्रकारके सामकी उपासना U करनी चाहिए एवं ' हिकार, प्रस्ताव, उद्गीथ, प्रतिहार, निधन, आदि और उपद्रव ' इस सात प्रकारके सामकी वाणी दृष्टिसे उपासना करनी चाहिए ' इत्यादि अंगोंसे सम्बन्धित उपासनाओं में किसकी किसमें दृष्टि करनी चाहिए, इसका नियामक न होने से संशय होता है । पूर्वपक्षी ' तत्रानियमः ' आदिसे कहते हैं । * यहाँ आदित्यादि सिद्धरूप हैं और उद्गीथ आदि कर्मका अङ्गरूप होनेसे फलवाले हैं, अतः उद्गीथ आदि आदित्य आदिसे उत्कृष्ट हैं, इसलिए उत्कृष्ट उद्गीथ आदि दृष्टिसे आदित्य आदि उपास्य हैं । और ' इयमेवर्गभिःसाम ' यहाँ भी पृथिवीमें ऋक्दृष्टि और अग्निमें सामदृष्टिका निर्देश है |

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८०६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० १ २।११।१ ) इति चैतदेवं दर्शयति । प्रथमनिर्दिष्ठेषु चादित्यादिषु चरमनिर्दिष्टं ब्रह्माध्यस्तम्-' आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः ' ( छा ० ३।१ ९ ।१ ) इत्यादिषु । प्रथमनिर्दिशश्च पृथिव्यादयश्चरमनिर्दिष्टश हिंकारादयः ' पृथिवो हिंकारः ' ( छा ० २।२1१ ) इत्यादिश्रुतिषु । अतोऽनङ्गेष्वादित्यादिष्वङ्गम-तिनिक्षेप इति । * एवं प्राप्ते ब्रूमः - आदित्यादिमतय एवाङ्गेषूद्गीथादिषु क्षिप्येरन् । कुतः? उपपत्तेः । उपपद्यते ह्येवम पूर्व संनिकर्षादादित्यादिमतिभिः संस्क्रियमाणेषूद्गीथादिषु कर्म-समृद्धिः । ' यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति ' ( छा ० १ | १ | १० ) इति च विद्यायाः कर्म समृद्धिहेतुत्वं दर्शयति । भवतु कर्मसमृद्धिफलेष्वेवं, स्वतन्त्रफलेषु तु कथम्, ' य एतदेवं विद्वाँल्लोकेषु पञ्चविधं सामोपास्ते ' ( छा ० २/२/३ ) इत्यादिषु? तेष्वप्यधिकृताधिका-रात्प्रकृता पूर्वसंनिकर्षेणैव फलकल्पना युक्ता, गोदोहनादिनियमवत् । फलात्मकत्वाच्चादि-त्यादीनामुद्गीथादिभ्यः कर्मात्मकेभ्य उत्कर्षोपपत्तिः । आदित्यादिप्राप्तिलक्षणं हि कर्मफलं शिष्यते श्रुतिषु । अपि च ' ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत ' ( छा ० १ | १ | १ ) ' खल्वे तस्यैवाक्षरस्योप-व्याख्यानं भवति ' ( छा ० १।१।१० ) इति चोद्गोथमेवोपस्य स्वेनोपकन्यादित्या दिमतीर्विदधाति । * यत्तूक्तम् उद्गीथादिमतिभिरुपास्यमाना आदित्यादयः कर्मभूयं भूत्वा फलं करिष्यन्तीति । है ) यह श्रुति भी ऐसा ही दिखलाती है और ' आदित्यो ब्रह्मेत्यादेश: ' ( आदित्य ब्रह्म है, ऐसा S उपदेश है ) इत्यादि प्रथम निर्दिष्ट आदित्य आदिमें अन्तिम निर्दिष्ट ब्रह्म अध्यस्त है और ' पृथिवी हिंकार: ' ( पृथिवी हिंकार है ) इत्यादि श्रुतियोंमें पृथिवी आदि प्रथम निर्दिष्ट हैं और हिकार आदि अन्तिम निर्दिष्ट हैं । इसलिए अनङ्ग आदित्यादिमें अङ्गमतिका निक्षेप है । सिद्धान्ती -- ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं --- आदित्य आदि बुद्धि ही उद्गीथ आदि अङ्गों में करनी चाहिए, किससे? इससे कि ऐसी उपपत्ति होती है । इसप्रकार अपूर्वं सन्निकर्षसे आदित्य आदि बुद्धि द्वारा संस्क्रियमाण उद्गीथ आदिमें कर्म समृद्धि उपपन्न होती है । ' यदेव विद्यया ० ' ( जो कर्म विद्या, श्रद्धा और योगते युक्त होकर करता है वह बलवत्तर होता है ) इसप्रकार श्रुति विद्याको कर्म समृद्धिका हेतु दिखलाती है । कर्म समृद्धि फलवाली उपासनाओंमें भले ऐसा ( अङ्गों में अनङ्ग बुद्धिका अध्यास ) हो, परन्तु ' य एतदेवं ० ' ( जो इसे इसप्रकार जाननेवाला पुरुष लोकोंमें पञ्चविध सामकी उपासना करता है उसके लिए ऊर्ध्व और अधोमुख लोक भोग्यरूपसे उपस्थित होते हैं ) इत्यादि स्वतन्त्र फलवाली उपासनाओंमें अङ्गों में अनङ्ग आदित्य आदिका अध्यास कैसे होगा? उन उपासनाओंमें भी अधिकृतका अधिकार होने से प्रकृत अपूर्व सन्निकर्षसे ही गोदोहन आदि नियमके समान फलकी कल्पना युक्त है । आदित्य आदि फलात्मक होनेसे कर्मात्मक उद्गीथ आदिसे उनमें उत्कर्षत्व उपपन्न होता है, क्योंकि आदित्य आदि प्राप्तिरूप कर्मफल श्रुतियोंमें उपदिष्ट है । और ' ओमित्येतदक्षरमु ० ' ( ॐ यह अक्षर उद्गीथ है इसकी उपासना करनी चाहिए ) ' खल्वेतस्यै ० ' ( निश्चय ही यह सब इस अक्षरका उपव्याख्यान है ) इस प्रकार श्रुति उद्गीथका उपास्यरूपसे उपक्रम कर आदित्य आदि बुद्धिका विधान करती है । जो यह कहा सत्यानन्दी - दीपिका क्योंकि निकृष्टमें ही उत्कृष्ट शब्द उपचरित होता है । जैसे सारथिमें राजशब्द और पूर्वाधिकरण में दर्शित न्याय से भी ऐसा ही होता है । सिद्धान्ती - अनङ्ग आदित्य आदि दृष्टिसे अङ्गरूप उद्गीथ आदि उपास्य हैं । जैसे प्रोक्षण आदिसे संस्कृत व्रीहि आदि कर्ममें अपूर्वको उत्पन्न करते हैं, वैसे आदित्य आदि बुद्धिसे संस्कृत उद्गीथ आदि कर्मोंमें अपूर्वके सम्बन्ध से कर्मसमृद्धिरूप फल उत्पन्न होता है, क्योंकि संस्कृत अङ्ग कर्मसमृद्धिरूप फलके अनुकूल प्रकृत कर्ममें अपूर्व - अदृष्ट उत्पन्न करते हैं । # अथवा नियमसे उद्गीथ आदि बुद्धि आदित्य आदिमें करनी चाहिए, अब इस दूसरे पक्षका