श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 841–850
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 841–850
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अधि ० ५ सू ० ६ ] भाषानुवाद सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८०७ तदयुक्तम्, स्वयमेवोपासनस्य कर्मत्वात्फलवत्त्वोपपत्तेः, आदित्यादिभावेनापि च दृश्यमाना-नामुद्गीथादीनां कर्मात्मकत्वानपायात् । ' तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम ' ( छा ० १।६।१ ) इति तु लाक्षणिक एव पृथिव्यग्ग्योर्ऋक्सामशब्दप्रयोगः । लक्षणा च यथासंभवं संनिकृष्टेन विप्र-कृष्टेन वा स्वार्थ संबन्धेन प्रवर्तते । तत्र यद्यप्युक्सामयोः पृथिव्यग्निपिचिकीर्षा, तथापि प्रसिद्धयोर्ऋक्सामयोर्भेदेनानुकीर्तनात्पृथिव्यन्योश्च संनिधानात्तयोरेवैष ऋक्सामशब्द-प्रयोग ऋक्सामसंबन्धादिति निश्चीयते । क्षन्त शब्दोऽपि हि कुतश्चित्कारणाद्राजानमुपसर्पन्न निवारयितुं पार्यते ' इयमेव ( छा ० १।६।१ ) इति च यथाक्षरन्यासमृच एव पृथिवीत्वमवधार-यति । पृथिव्या ऋक्त्वेऽवधार्यमाण इयमृगेवेत्यक्षरन्यासः स्यात् । ' य एवं विद्वान्साम गायति ' ( छा ० १/७/७ ) इति चाङ्गाश्रयमेव विज्ञानमुपसंहरति, न पृथिव्याद्याश्रयम् । तथा ' लोकेषु पञ्चविधं सामोपासीत ' ( छा ० २ | २ | १ ) इति यद्यपि सप्तमीनिर्दिष्टा लोकाः, तथापि सामन्येव तेऽध्यस्येरन्द्वितीयानिर्देशेन साम्न उपास्यत्वावगमात् । सामनि हि लोकेष्वध्यस्यमानेषु साम गया है कि उद्गीथ आदि बुद्धिसे उपास्यमान आदित्य आदि कर्मात्मकत्व प्राप्तकर फल करेंगे । वह अयुक्त है, क्योंकि उपासना कर्म होनेसे स्वयं फलवाली हो सकती है । उसी प्रकार आदित्य आदि भावसे दृश्यमान उद्गीथ आदिका कर्मात्मकत्व नष्ट नहीं होता । ' तदेतदेतस्या ० ' ( वह यह अग्निनामक साम पृथिवीरूप ऋक्के ऊपर स्थित है ) यह तो पृथिवी और अग्निमें ऋक् और साम शब्दों का प्रयोग लाक्षणिक है । लक्षणा यथासंभव संनिकृष्ट अथवा विप्रकृष्ट स्वार्थके साथ सम्बन्ध होनेसे प्रवृत्त होती है । उसमें यद्यपि ऋक् और साममें पृथिवीदृष्टि और अग्निदृष्टि करनेकी इच्छा है, तो भी प्रसिद्ध ऋक् और सामका भेदसे अनुकीर्तन होनेसे एवं पृथिवी और अग्निका संनिधान होनेसे ऋक् और साम शब्दोंका यह प्रयोग उनमें ही है, ऋक् और सामके सम्बन्धसे ऐसा निश्चय होता है । क्योंकि सारथि शब्द मी किसी कारणसे राजानुगामी होता हो तो उसका निवारण नहीं किया जा सकता | ' इयमेव ' ० ' ( यही ऋक् है ) यह श्रुति अक्षरोंके न्यासके अनुसार ऋक्में ही पृथिवीत्वका अवधारण करती है । यदि पृथिवीमें ही ऋक्त्व होता तो यह ऋक् ही है इस प्रकार अक्षरोंका न्यास होगा । ' य एवं विद्वान् ० ' ( जो इस प्रकार जानकर सामका गायन करता है ) यह श्रुति अङ्गाश्रय विज्ञानका ही उपसंहार करती है पृथिवी आदि आश्रय विज्ञानका नहीं । इसप्रकार ' लोकेषु पञ्चविधं ० ' ( लोकों में पञ्चविध सामकी उपासना करनी चाहिए ) इसमें यद्यपि सप्तमी विभक्तिसे लोक निर्दिष्ट हैं तो भी उनका साममें अध्यास होना चाहिए, क्योंकि द्वितीया विभक्तिके निर्देशसे साम ही उपास्य अवगत होता है । साममें लोकोंके ' सत्यानन्दी - दीपिका निराकरण ' यत्तक्तम् ' आदिसे किया जाता है । ' माणवक अग्नि है ' जैसे माणवकमें अग्निदृष्टि करनेसे माणवकत्व नष्ट नहीं होता, वैसे आदित्य आदि दृष्टि से दृश्यमान उद्गीथ आदिमें भी कर्मात्मकत्व नष्ट नहीं होता । पूर्वोक्त गौण प्रयोगकी अनुपपत्ति भी नहीं है, क्योंकि यह लाक्षणिक प्रयोग है । ' गंगायां घोषः ' यहाँ गङ्गाशब्द वाच्य प्रवाहका सन्निकृष्ट संयोग सम्बन्ध तीरके साथ हैं, इससे यह सन्निकृष्ट सम्बन्धरूप लक्षणा है । ' माणवक अग्नि है ' यहाँपर अग्नि स्थित, शुचित्व, तेजस्त्व आदि गुणवत्त्व परम्परा सम्बन्धसे माणवकमें देखा जाता है, यह विप्रकृष्ट सम्बन्धरूप लक्षणा है । वैसे यहाँ ऋक् और साममें पृथिवीदृष्टि और अग्निदृष्टि के पक्षमें मी ऋक् और सामपदसे अपने वाच्यार्थ में द्रष्टव्यता नामक परम्परासे पृथिवी और अग्नि अर्थ में लक्षणा युक्त है इसलिए ' इयमेवर्गग्निः साम: ' इसप्रकार पृथिवी और अग्निमें ऋक् और सामशब्दका प्रयोग गौण है, इसलिए यहाँ ऋक्की पृथवी दृष्टिसे और सामकी अग्नि-दृष्टि उपासना है । इसीप्रकार ' लोकेषु पञ्चविधं सामोपासीत ' यहाँ सप्तमीका तृतीयार्थं करना चाहिए ' लोकात्मनां पञ्चविधं सामोपासीत ' ' लोकदृष्टिसे पाँच प्रकारके सामकी उपासना करनी चाहिए । '
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८०८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० १ लोकात्मनोपासितं भवति, अन्यथा पुनर्लोकाः सामात्मनोपासिताः स्युः । एतेन ' एतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतम् ' ( छा ० २।११।१ ) इत्यादि व्याख्यातम् । यत्रापि तुल्यो द्वितीयानिर्देश: -' अथ खल्वमुमादित्यं सप्तविधं सामोपासीत ' ( छा ० २ ९ / १ ) इति, तत्रापि ' समस्तस्य खलु साम्न उपासनं साधु ' ( छा ० २1१1१ ) ' इति तु पञ्चविधस्य ' ( छा ० २।७।२ ) ' अथ सप्तविधस्य ' ( छा ० २।८।१ ) इति च साम्न एवोपास्यत्वोपक्रमात्तस्मिन्न वादित्याद्यध्यासः, एतस्मादेव च साम्न उपास्यत्वावगमात् ' पृथिवी हिंकारः ' ( छा ० २।२।१ ) इत्यादिनिर्देशविपर्ययेऽपि हिंकारादिष्वेव पृथिव्यादिदृष्टिः । तस्मादनङ्गाश्रया आदित्यादिम तयोऽङ्गेषूद्गीथादिषु क्षिप्येर न्निति सिद्धम् । ६ । ( ६ आसीनाधिकरणम् । सू ० ७-१० ) आसीनः संभवात् || ७ || पदच्छेद- आसीनः 1 संभवात् । सूत्रार्थ -- ( आसीनः ) बैठकर ही उपासना करनी चाहिए, ( संभवात् ) क्योंकि इसप्रकार उसका संभव हैं । * कर्माङ्गसंबद्धेषु तावदुपासनेषु कर्मतन्त्रत्वान्नासनादिचिन्ता, नापि सम्यग्दर्शने, वस्तुतन्त्रत्वाद्विज्ञानस्य । इतरेषु तूपासनेषु किमनियमेन तिष्ठन्नासीनः शयानो वा प्रवर्तेतोत. नियमेनासीन एवेति चिन्तयति । तत्र मानसत्वादुपासनस्यानियमः शरीर स्थितेरिति । एवं अध्यस्यमान होनेपर साम लोकरूपसे उपासित होता है, नहीं तो लोक सामरूपसे उपासित होंगे । इससे - लोकरूपसे सामकी उपासना होनेसे ' एतद्गायनं ० ' ( यह गायत्र साम प्राणोंमें प्रतिष्ठित है - गायत्र साम प्राणरूपसें उपासित है ) इत्यादिका भी व्याख्यान हुआ । और जहाँ भी ' अथ खल्वमुमादित्यं ०, ( अब उस आदित्यके रूपमें सप्तविध सामकी उपासना करनी चाहिए ) इसप्रकार द्वितीयाका निर्देश -तुल्य हो, वहाँ भी ' समस्तस्य ० ' ( समस्त सामकी उपासना श्रेष्ठ है ) ' इति तु पञ्चविधस्य. ' ( यहाँ पाँच प्रकारकी सामोपासनाका निरूपण है ) ' अथ सप्तविधस्य ० ' ( अब सात प्रकारके सामका ) इस प्रकार सामका ही उपास्यरूपसे उपक्रम होनेसे उसीमें आदित्यादिका अध्यास है । क्योंकि इसीसे साम उपास्य अवगत होता है, ' पृथिवी हिंकारः " इत्यादि निर्देशके विपर्यय होनेपर मी हिंकार आदिमें ही पृथिवी आदि दृष्टि है । इससे यह सिद्ध हुआ कि अनङ्गाश्रय आदित्यादि बुद्धि उद्गीथ आदि अङ्गों में करनी चाहिए ॥ ६ ॥
कर्माङ्गों के साथ सम्बद्ध उपासनाएँ कर्मके अधीन हैं, अतः उनमें आंसन आदिका विचार नहीं है । इसीप्रकार सम्यग्दर्शनमें भी यह विचार नहीं है, क्योंकि ' ज्ञान वस्तुके अधीन है । परन्तु अन्य उपासनाओंमें क्या अनियमसे खड़ा होकर, बैठकर अथवा सोता हुआ प्रवृत्त होता 6 बैठकर ही, ऐसा विचार करते हैं । परन्तु उसमें उपासना के मानसिक होने से शरीर सत्यानन्दी - दीपिका * यद्यपि हिकारके उद्देश्यसे पृथिवी दृष्टिका विधान है, इससे उद्देश्यका इसप्रकार प्रथम प्रयोग होना चाहिए, किन्तु यहाँ ' पृथिवी हिंकार ' ऐसा विपर्यय उक्त न्यायके बलसे. ' समस्त सासकी उपासना श्रेष्ठ है अथवा उत्कर्ष दृष्टिसे निकृष्ट है अथवा नियमसे स्थितिका अनियम ' हिंकारः पृथिवी ' निर्देश है, तो भी उपास्य है ' व्यत्यय ग्राह्य है | अतः पृथिवी आदि दृष्टि हिंकार आदिमें करनी चाहिए । इससे यह सिद्ध हुआ कि अङ्ग ( सिद्धरूप ) आदित्य आदि दृष्टि से अङ्गभूत उद्गीथ आदि उपास्य हैं ॥ ६ ॥
* पूर्वं अधिकरणमें आसन नियमको अपेक्षा रहित अङ्गाश्रित, उपासनाओंका अनुष्ठान प्रकार O कहा गया है । वैसे अङ्ग अनाश्रित उपासनाओंमें भी अनियम होना चाहिए । इसप्रकार दृष्टान्त संगति से ' तत्र ' आदि से पूर्वपक्ष है ॥ ७ ॥
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अधि ० ६ सू ० ८ - ९ -१० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८० ९ प्राप्ते ब्रवीति - आसीन एवोपासीतेति । कुतः? संभवात् । उपासनं नाम समानप्रयप्रवाह-करणम्, नच तद्गच्छतो धावतो वा संभवति, गलादीनां वित्तविक्षेपकात् । तिष्ठतोऽ-पि देहधारणे व्यापृतं मनो न सूक्ष्मवस्तुनिरीक्षणक्षमं भवति । शयानस्याप्यकस्मादेव निद्रया-भिभूयेत आसीनस्य त्वेवंजातीय को भूयान्दोषः सुपरिहार इति संभवति तस्योपासनम् ॥७ ॥
ध्यानाच्च || ८ || पदच्छेद - ध्यानात् च । सूत्रार्थ - और उपासना ध्यानरूप होनेसे बैठकर ही करनी चाहिए । * अपि च ध्यायत्यर्थ एषः, यत्समानप्रत्यय प्रवाहकरणम् । ध्यायतिश्च प्रशिथिलाङ्ग-चेष्टेषु प्रतिष्ठितदृष्टिष्वेकविषयाक्षिप्तचित्तेषूपचर्यमाणो दृश्यते ध्यायति बको ध्यायति
प्रोषितबन्धुरिति । आसीनश्चानायासो भवति । तस्मादप्यासीन कर्मापासनम् ॥८ ॥
अचलत्वं चापेक्ष्य ॥ ९ ॥
पदच्छेद- अचलत्वम्, च, अपेक्ष्य । सूत्रार्थ - ( अचलत्वं च ) और ' ध्यायतीव पृथिवी ' इत्यादिमें पृथिवी आदिकी अचलताकी ( अपेक्ष्य ) अपेक्षाकर ध्यान शब्द उपचरित होता है । १० अपि च ' ध्यायतीव पृथिवी ' ( छा ० ७१६ | १ ) इत्यत्र पृथिव्यादिष्वचलत्वमेवापेक्ष्य ध्यायतिवादो भवति, तच्च लिङ्गमुपासनस्यासीनकर्मत्वे ॥९ ॥
स्मरन्ति च ॥१० ॥
पदच्छेद - स्मरन्ति 9 च । सूत्रार्थ - और ' शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य ' इसप्रकार शिष्टपुरुष आसनका उपासना के लिए स्मृति में प्रतिपादन करते हैं । है 1 | सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं - बैठकर ही उपासना करनी चाहिए, किससे? इससे कि इसप्रकार संभव है । एक प्रकारकी वृत्तिका प्रवाह करना उपासना है । उसका चलते अर्थवा दौड़ते हुए पुरुष में संभव नहीं है, क्योंकि गति आदि चित्तके विक्षेप करनेवाले हैं । खड़े होनेवाले पुरुषका देहधारणमें व्यापृत हुआ मन सूक्ष्म वस्तुके निरीक्षण करनेमें समर्थ नहीं होता । शयन किये हुए का मन भी अकस्मात् ही निद्रासे अभिभूत हो जाता है । किन्तु बैठे हुए के इस प्रकारके बहुत - से दोषोंका सुपरिहार हो जाता है, इसलिए उसकी उपासना संभव है ॥ ७ ॥
जो एक समान वृत्तिका ही प्रवाह करना है वही ' ध्यायति ' ( ध्ये धातु ) का अर्थ है । और ' ध्यायति ' शब्द प्रशिथिल अङ्ग चेष्टावालों, प्रतिष्ठित दृष्टिवालों और एक विषयमें आक्षिप्त चित्त-वालोंमें उपचरित होता हुआ देखा जाता है । जैसे कि बगुला ध्यान करता है, परदेशमें गये हुए बन्धुका वह मित्र ध्यान करता है । बैठा हुआ पुरुष आयास रहित होता है । इससे भी उपासना बैठे हुए पुरुषका कर्म है ॥ ८ ॥
और ' ध्यायतीव पृथिवी ' ( पृथिवी मानो ध्यान करती है ) यहाँपर पृथिवी आदिमें अचलताकी अपेक्षाकर ' ध्यायति ' शब्दका प्रयोग होता है । वह उपासना बैठे हुए का कर्म है इसमें लिङ्ग है || ९ || सत्यानन्दी - दीपिका * तैलधाराके समान विजातीय प्रवाहसे रहित एकाकार चित्तकी अवस्थाको ध्यान कहा जाता P है । इसप्रकार बाह्य हस्त, पाद आदि अङ्गोंकी चेष्टासे रहित एक विषयमें ही स्थिर चित्तवालेमें ' ध्यायति ' शब्दका प्रयोग होता है । अता उपासना मानसिक कर्म होनेसे बैठ कर ही करनी चाहिए ॥ ८ ॥
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८१० ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० १ स्मरन्त्यपि च शिष्टा उपासनाङ्गत्वेनासनम् - ' शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः '
( गी ० ६।११ ) इत्यादिना । अत एव पद्मकादीनामासनविशेषाणामुपदेशो योगशास्त्रे ॥ १० ॥
( ७ एकाग्रताधिकरणम् सू ० ११ ) यत्रैकाग्रता तत्राविशेषात् ॥ ११ ॥
पदच्छेद - यत्र, एकाग्रता, तत्र, अविशेषात् । सूत्रार्थ - ( यत्र ) जिस देश और कालमें ( एकाग्रता ) मनकी एकाग्रता - स्थिरता हो ( तत्र ) उसी देश आदिमें उपासना करनी चाहिए, ( अविशेषात् ) क्योंकि श्रुतिमें देश विशेषका श्रवण नहीं है । * दिग्देशकालेषु संशयः - किमस्ति कश्चिन्नियमो नास्ति वेति । प्रायेण वैदिकेष्वा-रम्भेषु दिगादिनियमदर्शनात्स्यादिहापि कश्चिन्नियम इति यस्य मतिस्तं प्रत्याह दिग्देश-कालेष्वर्थ लक्षण एव नियमः । यत्रैवास्य दिशि देशे काले वा मनसः सौकर्येणैकाग्रता भवति तत्रैवोपासीत, प्राचीदिक्पूर्वाह्नप्राचीन प्रवणादिवद्विशेषाश्रवणात्, एकाग्रताया इष्टायाः सर्वत्राविशेषात् । ननु विशेषमपि केचिदामनन्ति - ' समे शुचौ शर्करावह्निवालुकाविवर्जिते शब्द-जलाश्रयादिभिः । मनोनुकूले नतु चक्षुपीडने गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत् ' ( श्वे ० २।१० ) इति यथेति । उच्यते - सत्यमस्त्येवंजातीयको नियमः । सति त्वेतस्मिंस्तद्गतेषु विशेषेष्वनियम इति सुह-द्भूत्वाऽऽचार्य आचष्टे । ' मनोनुकूले ' इति चैषा श्रुतिर्यत्रैकाग्रता तत्रैवेत्येतदेव दर्शयति ॥११ ॥
' शुचौ देशे ० ' ( पवित्र देशमें अपना स्थिर आसन स्थापित कर ) इत्यादि स्मृति वचनसे शिष्ट पुरुष उपासनाके अङ्गरूपसे आसनका प्रतिपादन करते हैं । अतएव पद्म आदि आसनविशेषोंका योगशास्त्रमें उपदेश है ॥ १० ॥
दिशा, देश और काल इनके विषयमें क्या कोई नियम है अथवा नहीं, ऐसा संशय होता है । वैदिक आरम्भों में प्रायः दिशा आदिका नियम देखा जाता है । अतः यहाँ भी कोई नियम हो, ऐसा जिसका विचार हो उसके प्रति कहते हैं - दिशा, देश और कालमें अर्थलक्षण - प्रयोजनात्मक ही नियम है । जिस दिशा, देश अथवा कालमें इस उपासकके मनकी सहजमें एकाग्रता हो वहींपर उपासना करनी चाहिए, क्योंकि पूर्वदिशा, पूर्वाह्न, पूर्वदिशामें निम्नस्थान आदिके समान यहाँ विशेषका श्रवण नहीं है । कारण कि इष्ट एकाग्रता सर्वत्र समान है । परन्तु ' समे शुचौ ० ' ( समतल, पवित्र, सूक्ष्म पाषाण, अग्नि और बालूसे रहित तथा शब्द, जल - पनघट और आश्रय- जनसाधारणके निवास आदिसे भी शून्य, मनके अनुकूल एवं नेत्रोंको पीड़ा पहुँचानेवाले मच्छक आदिसे वर्जित, गुहा - एकान्त आदि वायुवर्जित स्थानमें बैठकर मनको परमात्मामें नियुक्त करना चाहिए ) इसप्रकार कुछ लोग विशेष भी कहते हैं । जैसे यह देश विशेषका नियम है, वैसे काल विशेषका भी है । इसपर कहते हैं — ठीक, इस प्रकारका नियम है । परन्तु ऐसे नियमके होनेपर भी तद्गत विशेषोंमें नियम नहीं है । इसप्रकार सुहृद् होकर आचार्य कहते हैं । ' मनोऽनुकूले ' यह श्रुति जहां एकाग्रता हो वहाँपर ही यही दिखलाती है । ११ सत्यानन्दी - दीपिका * मनकी एकाग्रतामें दिशा आदि नियमका विचार किया जाता है । पूर्वपक्षी - नियम होना चाहिए, क्योंकि ' ब्रह्मयज्ञेन यक्ष्माणः प्राच्यां दिशि ' ( पूर्वदिशा में ब्रह्मयज्ञ करे ) ' प्राचीन प्रवणे बैश्वदेवेन यजेत ' ( पूर्वं दिशामें क्रमशः निम्न स्थलमें वैश्वदेव यज्ञ करे ) ' अथ यदपराह्न पिण्डपितृ-यज्ञेन चरन्ति ' ( ' अपराह्नमें पिण्डपितृयज्ञ करें ) इन श्रुतियोंमें जैसे क्रमशः ब्रह्मयज्ञ, वैश्वदेव और पिण्डपितृयज्ञमें पूर्व दिशा, निम्नदेश और अपराह्न कालका विशेषरूपसे नियम देखा जाता है, वैसे
इन उपासनाओंमें भी पूर्वदिशा, तीर्थं आदि देश, प्रदोष आदि कालका नियम होना चाहिए ।
सिद्धान्ती - ऐसा नियम नहीं है, क्योंकि यहाँ मनकी एकाग्रता ही प्रयोजन है ॥ ११ ॥
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अधि ० ८ सू ० १२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८११ ( ८ आ प्रायणाधिकरणम् सू ० १२ ) आ प्रायणात्तत्रापि हि दृष्टम् ॥ १२ ॥
पदच्छेद - आ, प्रायणात्, तत्र, अपि, हि, दृष्टम् । सूत्रार्थ - ( आप्रायणात् ) मरणपर्यन्त प्रत्यय - उपासनाकी आवृत्ति करनी चाहिए, ( हि ) क्योंकि ( तत्रापि ) मरणकालमें भी ' स यावत्क्रतु ' इत्यादि श्रुति में भी ( दृष्टम् ) ऐसा ही देखा गया है । आवृत्तिः सर्वोपासनेष्वादर्तव्येति स्थितमाद्येऽधिकरणे । तत्र यानि तावत्सम्यग्दर्श नान्युपासनानि तान्यवघातादिवत्कार्यपर्यवसानानीति ज्ञातमेवैषामावृत्तिपरिमाणम् । नहि सभ्यग्दर्शने कार्ये निष्पन्ने यत्नान्तरं किंचिच्छासितुं शक्यम्, अनियोज्य ब्रह्मात्मत्वप्रतिपत्तेः शास्त्रस्याविषयत्वात् । यानि पुनरभ्युदयफलानि तेष्वेषा चिन्ता- किं कियन्तंचित्कालं प्रत्यय-मायपरमेदुत यावज्जीवमावर्तयेदिति । किं तावत्प्राप्तम्? कियन्तंचित्कालं प्रत्ययमभ्य-स्योत्सृजेदावृत्तिविशिष्टस्योपासनाशब्दार्थस्य कृतत्वादिति । एवं प्राप्ते ब्रुमः- आ प्रायणा-देवावर्तयेत्प्रत्ययम्, अन्त्य प्रत्ययवशाददृष्टफलप्राप्तेः । कर्माण्यपि हि जन्मान्तरोपभोग्यं फल मारभमाणानि तदनुरूपं भावनाविज्ञानं प्रायणकाले आक्षिपन्ति, ' सविज्ञानो भवति सविज्ञान-मेवान्ववक्रामति ', ' यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति ', ' प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं नयति ' इति चैवमादिश्रुतिभ्यः, तृणजलूका निदर्शनाच्च । प्रत्ययास्त्वेते स्वरूपानुवृत्तिं मुक्त्वा सब उपासनाओंमें आवृत्ति आदरणीय है, ऐसा आद्य अधिकरण में निश्चय किया गया है । उनमें जो तत्त्वज्ञानके लिए उपासनाएँ हैं वे अवघात आदिके समान कार्य पर्यवसायी - कार्यं निष्पत्ति पर्यन्त हैं । उन उपासनाओंकी आवृत्तिका परिमाण ज्ञात है । सम्यग्दर्शनरूप कार्यके निष्पन्न होनेपर किसी अन्य यत्नका शासन- उपदेश नहीं किया जा सकता, क्योंकि अनियोज्य ब्रह्मात्मत्व प्रतिपत्ति शास्त्रका विषय नहीं है । परन्तु जो अभ्युदय फलवाली हैं उनमें यह विचार होता है कि कितने समय तक प्रत्ययका आवृत्तिकर उपराम होना चाहिए अथवा जीवन पर्यन्त आवृत्ति होनी चाहिए । तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - कुछ कालतक प्रत्ययकी आवृत्ति कर छोड़ देना चाहिए, क्योंकि आवृत्ति विशिष्ट उपासना शब्दका अर्थ गतार्थ हो जाता है । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं- -मरणपर्यन्त प्रत्ययोंकी आवृत्ति होनी चाहिए, क्योंकि अन्तिम प्रत्यय - वृत्तिके बलसे अदृष्ट फलकी प्राप्ति होती है । क्योंकि ' सविज्ञानो भवति ० ' ( भावनामय विज्ञानसे - फलके स्फुरणसे युक्त होता है वह विज्ञान सहित फलका ही अनुगमन करता है ) ' यच्चित्तस्तेनैष ० ' ( मरणकालमें जैसा चित्तवाला होता है उसी चित्त - संकल्पसे इन्द्रियोंके साथ मुख्य प्राणवृत्तिको प्राप्त होता है, वह प्राण तेज - उदानसे अनुगृहीत होकर जीवात्मा के साथ संकल्प किये हुएके अनुसार उस लोकको ले जाता है ) इत्यादि श्रुतियोंसे और तृणजलूकाके दृष्टान्तसे यह ज्ञात होता है कि अन्य जन्ममें उपभोगके योग्य फलको उत्पन्न करनेवाले कर्म उसके अनुरूप भावना विज्ञानका मरणकालमें आक्षेप करते हैं । और ये प्रत्यय तो स्वरूप अनुवृत्तिको छोड़कर मरणकालमें किस अन्य भाविभावना विज्ञानकी अपेक्षा करें? सत्यानन्दी - दीपिका * पूर्वपक्षी - जैसे कर्म अदृष्टद्वारा फल विज्ञानमें कारण होते हैं, वैसे, उपासनाएं भी अदृष्ट द्वारा अन्तिम फल विज्ञानमें कारण होंगी? इससे मरणपर्यन्त उनकी आवृत्तिका क्या प्रयोजन हैं? सिद्धान्ती — ये प्रत्यय अपने सजातीय प्रत्ययोंकी अनुवृत्तिको छोड़कर मरणकालमें किसी अन्य विजातीय भावि - भावना विज्ञानका आक्षेप नहीं करेंगे, क्योंकि सजातीय प्रत्ययोंकी धारावाहिक अनु-वृत्ति ही तो उपासना है । उन प्रत्ययोंकी स्वरूपतः अनुवृत्ति ही अन्तिम विज्ञान भावना है । कोई
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II ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० १ किमन्यत्प्रायणकालभावि भावनाविज्ञानमपेक्षेरन् । तस्माद्ये प्रतिपत्तव्यफलभावनात्मकाः प्रत्ययास्तेष्वा प्रायणादावृत्तिः । तथा च श्रुतिः - स यावत्क्रतुरयमस्माल्लोकात्प्रेति ' इति प्रायण - * कालेऽपि प्रत्ययानुवृत्ति दर्शयति । स्मृतिरपि - यं यं वाऽपि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावमावित: ' ( गी ० ८ ६ ) इति, ' प्रयाणकाले मनसाऽचलेन ' ( गी ० ८/१७ ) इति च । ' सोऽन्तवेलायामेतत्त्रयं प्रतिपद्येत ' इति च मरणवेलायामपि कर्तव्यशेषं श्रावयति । १२ ( ९ तदधिगमाधिकरणम् । सू ० १३ ): तदधिगम उत्तरपूर्वाघयोरश्लेषविनाशौ तद्व्यपदेशात् ॥ १३ ॥
पदच्छेद - तदधिगमे, उत्तरपूर्वाधयोः, अश्लेषविनाशी, तद्वयपदेशात् । सूत्रार्थ - ( तदधिगमे ) ब्रह्मज्ञान होनेपर ( उत्तरपूर्वाघयो: ) उत्तर और पूर्व पापोंका ( श्लेषविनाश ) अश्लेष और विनाश होता है, ( तद्व्यपदेशात् ) क्योंकि ' यथा पुष्करपलाश ' इत्यादि श्रुतिमें उसका व्यपदेश है । * गतस्तृतीयशेषः । अथेदानीं ब्रह्मविद्याफलं प्रति चिन्ता प्रतायते । ब्रह्माधिगमे सति तद्विपरीतफलं दुरितं क्षीयते, न क्षीयते वेति संशयः । किं तावत्प्राप्तम्? फलार्थत्वा-त्कर्मणः फलमदत्त्वा न संभाव्यते क्षयः । फलदायिनी ह्यस्य शक्तिः श्रुत्या समधिगता । यदि तदन्तरेणैव फलोपभोगमपवृज्येत, श्रुतिः कदर्शिता स्यात् । स्मरन्ति च ' नहि कर्म क्षीयते ' इसलिए प्राप्त करनेयोग्य फलके अनुरूप भावनात्मक जो प्रत्यय है उनकी मरण पर्यन्त आवृत्ति है । और इसप्रकार ‘ स यावत्क्रतु ० ', ( वह जैसे संकल्प विशेषवाला इस शरीररूपी लोकसे. प्रयाण करता है ). यह श्रुति प्रायणकाल में भी प्रत्ययकी अनुवृत्ति दिखलाती है । और ' यं यं वाऽपि ० ' ( हे कुन्ति-पुत्र अर्जुन! यह मनुष्य अन्तकाल में जिस - जिस भी भावको स्मरण करता हुआ शरीरका त्याग करता हैं, सदा उसी मावसे भावित होकर उस उसको ही प्राप्त होता है ) ' प्रयागकाले ० ' ( मरणकालमें अचल मनसे ) ऐसी स्मृति भी है, और ' सोऽन्त वेलायामेव ' ( वह उपासक अन्त समयमें ' अक्षितमसि, अच्यु-तमसि, प्राणसंशितमसि ' इन तीन मन्त्रोंको स्मरण करे ) इसप्रकार यह श्रुति मरणकालमें भी कर्तव्यशेषका स्मरण कराती है ॥ १२ ॥
तृतीय अध्यायका शेष भाग समाप्त हुआ । अब ब्रह्मविद्याके फलका विचार किया जाता है । ७ ब्रह्मज्ञान होनेपर उससे विपरीत ( बन्ध ) फलवाला पाप क्षय होता है अथवा क्षय नहीं होता, ऐसा संशय होता है । तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - कर्म फलार्थक होनेसे फल दिये विना उसका क्षय नहीं हो सकता, क्योंकि फल देनेवाली उसको शक्ति श्रुतिसे समधिगत होती है । यदि कर्म फलोप-भोगके विना ही क्षय हो, तो फलबोधक श्रुति बाधित हो जायगी । और ' न ' हि कर्म क्षीयते ' सत्यानन्दी - दीपिका अदृष्ट द्वारक अन्य अपेक्षित नहीं है, क्योंकि सभी भाव समान जातीय भावोंकी द्वाररूपसे अपेक्षा नहीं करते हैं । इसलिए उपासना प्रत्यय भी अन्य विजातीय प्रत्ययकी अपेक्षा नहीं करेगा । कर्म तो दृष्ट-प्रत्यक्ष द्वारा अन्तिम विज्ञानरूप फलमें कारण नहीं हो सकते, इसलिए अगत्या उनका द्वारीभूत अदृष्ट कल्पना करना पड़ता है । इसलिए उपासकको मरणपर्यन्त प्रत्ययोंकी आवृत्ति करनी चाहिए ॥ १२ ॥
* पूर्व अधिकरणमें जैसे उपासकको मरणपर्यंन्त उपासनाको आवृत्ति कर्तव्य कही गयी है, वैसे ब्रह्मवेत्ताओंके लिए नहीं है । इसप्रकार प्रत्युदाहरण संगतिसे शङ्का कर कर्मक्षयरूप जीवनमुक्तिको कहते हैं— ज्ञानके साधनोंमें अधिक यत्न करना चाहिए, इसलिए इस फलाध्यायमें अब तक उनका विचार किया गया है । अब फलाध्यायके उपयुक्त फल सम्बन्धी विचार किया जाता है - ' अवश्यमेव भोक्तव्यं
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अधि ० ९ सू ० १३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८१३ इति । नन्वेवं सति प्रायश्वित्तोपदेशोऽनर्थकः प्राप्नोति, नैष दोषः, प्रायश्चित्तानां नैमित्तिकत्वो-पपत्तेर्गृहदाहेष्ट्यादिवत् । अपि च प्रायश्चित्तानां दोषसंयोगेन विधानाद्भवेदपि दोषक्षपणा-र्थता, नत्वेवं ब्रह्मविद्यायां विधानमस्ति । नन्वनभ्युपगम्यमाने ब्रह्मविदः कर्मक्षये तत्फलस्या-वश्यंभोक्तव्यत्वादनिर्मोक्षः स्यात् । नेत्युच्यते । देशकालनिमित्तापेक्षो मोक्षः कर्मफलवद्भ-विष्यति । तस्मान्न ब्रह्माधिगमे दुरितनिवृत्तिरिति । एवं प्राप्ते ब्रूमः - तदधिगमे ब्रह्माधिगमे सत्युत्तरपूर्वयोरघयोरश्लेषविनाशौ भवतः, उत्तरस्याश्लेषः, पूर्वस्य विनाशः । कस्मात्? तद्-व्यपदेशात् । तथा हि - ब्रह्मविद्या प्रक्रियायां संभाव्यमान संबन्धस्यागामिनो दुरितस्यानभिसं-बन्धं विदुषो व्यपदिशति - ' यथा पुष्करपलाश आपो न लिप्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यते ' ( छा ० ४।१४।३ ) इति । तथा विनाशमपि पूर्वोपचितस्य दुरितस्य व्यपदिशति - ' तद्यथेषीका-तूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैवं हास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते ' ( छा ० ५। २४ । ३ ) इति । अयमपरः कर्मक्षय-व्यपदेशो भवति - ' भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे ( कर्म क्षय नहीं होता ) इस प्रकार स्मृतिकार भी कहते हैं । परन्तु ऐसा होनेपर प्रायश्चित्तका उपदेश अनर्थक हो जायगा? यह दोष नहीं है, क्योंकि प्रायश्चित्तोंको गृहदाहेष्टि आदि के समान नैमित्तिकत्व उपपन्न होता है । और दोष के संयोगसे प्रायश्चित्तोंका विधान होनेसे दोष नाश प्रयोजनवत्ता उनमें भले हो, परन्तु इसप्रकार ब्रह्मविद्या में विधान नहीं है । परन्तु ब्रह्मज्ञानीके कर्मका क्षय स्वीकार न करनेपर उसका फल अवश्य भोक्तव्य होनेसे मोक्ष नहीं होगा 1 नहीं, ऐसा कहते हैं- देश, काल और निमित्त की अपेक्षा करनेवाला मोक्ष कर्मफल के समान होगा । इससे तो ब्रह्मसाक्षात्कार होनेपर भी पापकी निवृत्ति नहीं होती है । ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - ' तदधिगमें ' ब्रह्मज्ञान होनेपर उत्तर और पूर्व पापका अश्लेष और विनाश होता है । उत्तर - देह धारणकर किये जानेवाले पापोंका अश्लेष और पूर्व पापोंका विनाश होता है, किससे? इससे कि उसका व्यपदेश है । जैसे कि ' यथा पुष्करपलाश ० ' ( जैसे कमलका पत्ता जलसे सम्बन्धित नहीं होता, वैसे ' एवं वित् ' ' मैं ब्रह्म हूँ ' ऐसा जाननेवाले विद्वान्को पापका सम्बन्ध नहीं होता ) यह श्रुति ब्रह्मविद्याके प्रकरणमें संभाव्यमान सम्बन्धवाले आगामी पापके सम्बन्ध का अभाव विद्वानके लिए कहती है । इसी प्रकार ' तद्यथेषीका ० ( जिस प्रकार सींकका अग्रभाग अग्निमें प्रक्षिप्त करनेसे तत्काल जल जाता है, इसी प्रकार इस विद्वान्के सत्र पाप दग्ध हो जाते हैं ) यह श्रुति सत्यानन्दी - दीपिका कृतं कर्म शुभाशुभम् ' ( पुण्य अथवा पापकर्म अवश्य ही भोक्तव्य है ) और ' क्षीयन्ते चास्य कर्माणि ' ( ब्रह्मवित् समस्त कर्म क्षोण हो जाते हैं ) इस प्रकार शास्त्र द्वारा विरोध उपस्थित होनेपर सन्देह होता है कि ब्रह्मज्ञान होनेपर कर्मका क्षय होता है कि नहीं? पूर्वपक्षी - कर्म फलवाला होता है । क्योंकि ' मा हिंस्यात्सर्वा भूतानि ' ' ब्राह्मणो न हन्तव्यः ' इत्यादि निषेध श्रुतिसे ज्ञात होता है कि पाप कर्ममें फल देनेकी शक्ति है । और ' नाभुक्तं क्षीयते कर्म ' यह स्मृति वाक्य भी है । अतः कर्म फलोप-भोगके विना ज्ञानसे नष्ट नहीं होता. अन्यथा फल श्रुति बाधित होगी । सि०- परन्तु ' ब्रह्महा द्वादशिक-वार्षिकं चरेत् ' इत्यादि प्रायश्वित्त विधायक शास्त्र निष्फल होगा? पू ० - जैसे आहिताग्निद्वारा गृहदाह निमित्तको लेकर आहिताग्नि पुरुष ' अग्नये क्षामवते पुरोडाशमष्टाकपालं निर्वपेत् ' ( क्षामवति अग्निके लिए अष्टकपालवाले पुरोडाशका होम करना चाहिए ) इस प्रकार क्षामवति इष्टिका विधान है, वैसे दोषके निमित्तमात्रसे प्रायश्चित्तका विधान है । सि ० - तो भी ' दोषवान् प्रायश्चित्तं कुर्यात् ' ( दोष युक्त व्यक्ति प्रायश्चित्त करे ) और ' तरति ब्रह्महत्यां योऽश्वमेधेन यजते ' ( जो अश्वमेध याग करता है वह ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है ) इस प्रकार प्रायश्चितसे पापनिवृत्तिके श्रवणसे प्रायश्चित्त कर्मको नैमित्तिक कहना असङ्गत है । पू ० -- ' अपि च ' आदिसे कहते हैं ।
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८१४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० १ परावरे ' ( मु ० २।२।८ ) इति । यदुक्तम् - अनुपभुक्तफलस्य कर्मणः क्षयकल्पनायां शास्त्रं कदर्थितं स्यादिति - नैष दोषः, नहि वयं कर्मणः फलदायिनी शक्तिमवजानीमहे, विद्यत एव सा सा तु विद्यादिना कारणान्तरेण प्रतिबध्यत इति वदामः । शक्तिसद्भावमात्रे च शास्त्रं व्याप्रियते, न प्रतिबन्धाप्रतिबन्धयोरपि । * ' नहि कर्म क्षीयते ' इत्येतदपि स्मरणमौ-त्सर्गिकं न भोगाइते कर्म क्षीयते तदर्थत्वादिति । इष्यत एव तु प्रायश्चित्तादिना तस्य क्षय: -' सर्वं पाप्मानं तरतेि ', ' तरति ब्रह्महत्यां योऽश्वमेधेन यजते ' ' य उ चैनमेव ' वेद ' इत्यादिश्रुतिस्मृ-तिभ्यः । यत्तूक्तम् - नैमित्तिकानि प्रायश्चित्तानि भविष्यन्तीति तदसत्, दोषसंयोगेन चोद्य-मानानामेषां दोषनिर्घातफलसंभवे फलान्तरकल्पनानुपपत्तेः । यत्पुनरेतदुक्तम् - न प्रायश्चि-त्वदोषक्षयोद्देशेन विद्याविधानमस्तीति, अत्र ब्रूमः - सगुणासु तावद्विद्यासु विद्यत एव विधा-नम् । तासु च वाक्यशेष ऐश्वर्य प्राप्तिः पापनिवृत्तिश्च विद्यावत उच्यते । तयोश्चाविवक्षाका-रणं नास्तीत्यतः पाद्मग्रहाणपूर्वकैश्वर्य प्राप्तिस्तासां फलमिति निश्चीयते । निर्गुणायां तु विद्यायां यद्यपि विधानं नास्ति, तथाप्यकर्त्रात्मत्वबोधात्कर्मप्रदाह सिद्धिः । अश्लेष इति पूर्वोपचित - पूर्व सचित पापका विनाश भी कहती है } । और ' भिद्यते हृदयग्रन्थि ० ' ( उस परावर ब्रह्मका साक्षात्कार होनेपर इस जीवकी हृदय ग्रन्थि टूट जाती है, सम्पूर्ण संशय नष्ट हो जाते हैं और इसके कर्म क्षीण हो जाते हैं ) यह दूसरा कर्मक्षयका व्यपदेश है । और यह जो कहा गया है कि अभुक्त फलवाले कर्मके क्षयको कल्पना होनेपर फल बोधक शास्त्र बाधित होगा । यह दोष नहीं है, क्योंकि हम कर्मकी फल देनेवाली शक्तिको अवहेलना नहीं करते, वह भले विद्यमान हो, परन्तु वह विद्या आदि अन्य कारणसे प्रतिबद्ध होती है, केवल हम ऐसा कहते हैं । कर्ममें फलदायक शक्तिके सद्भावमात्रमें शास्त्रका व्यापार है न कि शक्तिके प्रतिबन्ध और अप्रतिबन्धमें मी । ' न हि कर्म क्षीयते ० ' ( कर्म क्षय नहीं होता ) यह स्मृति भी औत्सर्गिक - सामान्य नियमरूप है, कर्म भोगके लिए है, अतः भोगके विना कर्म क्षय नहीं होता । क्योंकि ' सर्वं पादमानं तरति ' ( सम्पूर्ण पापोंको तैरता है ) ' तरति ब्रह्महत्यां ० ' ( जो अश्वमेध यज्ञ करता है और जो इसे इस प्रकार जानता है वह ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है ) इत्यादि श्रुति और स्मृतिसे प्रायश्चित्त आदि द्वारा दुरितका क्षय इष्ट ही है 1 । जो यह कहा गया है कि प्रायश्चित्त नैमित्तिक होंगे । वह ठीक नहीं है, क्योंकि दोष के सम्बन्धसे शास्त्र द्वारा विहित इन प्रायश्चित्तों का दोष नाशरूप फलके संभव होनेपर अन्य फलकी कल्पना अनुपपन्न है । और जो पुनः यह कहा गया है कि प्रायश्चित्त के समान दोषक्षयके उद्देश्य से विद्याका विधान नहीं है । उसपर हम कहते हैं-सगुण विद्याओंमें तो विधान विद्यमान ही है, क्योंकि उन सगुण विद्याओंके वाक्यशेषमें विद्यावान्की ऐश्वयंप्राप्ति और पापनिवृत्ति कही जाती है । और उन दोनोंकी अविवक्षाका कारण नहीं है, अत: पापक्षयपूर्वक ऐश्वर्यं प्राप्ति उनका फल है, ऐसा निश्चय किया जाता है । निर्गुणविद्या में तो यद्यपि सत्यानन्दी - दीपिका * ' न हि क्षीयते कर्म ' यह सामान्य शास्त्र ' सर्व पाप्मानं तरति ० ' ' क्षीयन्ते चास्य कर्माणि ० ' इत्यादि विशेष शास्त्र से बाधित हो जाता है । यद्यपि ऐश्वर्यप्राप्ति और पापनिवृत्तिका विधान सगुणविद्या के समान निर्गुणविद्या में दोष निवृत्तिका स्पष्ट विधान नहीं है, तो भी विद्यात्व दोनोंमें समान होने से निर्गुणविद्या में भी पापनिवृत्तिरूप फल मानना युक्त है, क्योंकि कर्तृत्व आदि अभिमान पाप आदि कर्मका कारण है । ब्रह्मज्ञानसे अविद्याकी निवृत्ति होनेपर तत्कृत कर्तृत्व आदिकी निवृत्तिसे तदाश्रित पापकर्मका क्षय भी हो जाता है । इसविषयमें ' ज्ञानिनः सर्वपापानि शीर्यन्ते नात्र संशयः I । क्रीडन्नपि न लिश्येत पापैर्नानाविधैरपि ॥ ' ( ज्ञान से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं, इस विषय में संशय नहीं है । ज्ञानी संसारमें क्रीडा करता हुआ भी नानाप्रकारके पापोंसे लिप्त नहीं होता है ) यह स्मृति प्रमाण भी है ।
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अधि ० १० सू ० १४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८१५ चागामिषु कर्मसु कर्तृत्वमेव न प्रतिपद्यते ब्रह्मविदिति दर्शयति । * अतिक्रान्तेषु तु यद्यपि मिथ्याज्ञानात्कर्तृत्वं प्रतिपेद इव, तथापि विद्यासामर्थ्यान्मिथ्याज्ञाननिवृत्ते स्तान्यपि प्रवि-लीयन्त इत्याह - विनाश इति । पूर्वसिद्धकर्तृत्वभोक्तृत्वविपरीतं हि त्रिष्वपि कालेष्वकर्तृ-त्वाभोक्तृत्वस्वरूपं ब्रह्माहमस्मि नेतः पूर्वमपि कर्ता भोक्ता वाऽहमासं नेदानीं नापि भविष्य-त्काल इति ब्रह्मविदवगच्छति । एवमेव च मोक्ष उपपद्यते । अन्यथा ह्यनादिकालप्रवृत्तानां कर्मणां क्षयाभावे मोक्षाभावः स्यात् । नच देशकालनिमित्तापेक्षो मोक्षः कर्मफलवद्भवितु मर्हति अनित्यत्वप्रसङ्गात् । परोक्षत्वानुपपत्तेश्च ज्ञानफलस्य । तस्माद्ब्रह्माधिगमे दुरितक्षय इति स्थितम् ॥१३ ॥
( १० इतरासंश्लेषाधिकरणम् । सू ० १४ ) इतरस्याप्येवम संश्लेषः पाते तु ॥ १४ ॥
पदच्छेद - इतरस्य, अपि, एवम्, असंश्लेषः, पाते, तु । सूत्रार्थ - ( इतरस्यापि ) ज्ञानवान् के पुण्यका भी ( एवम् ) पापके समान ( असंश्लेषः ) असंश्लेष और विनाश होता है, ( पाते तु ) इसप्रकार ब्रह्मज्ञानसे बन्धके हेतुभूत पुण्य और पापके असम्बन्ध और विनाश सिद्ध होनेसे ब्रह्मवेत्ताका शरीरपात होनेपर ही मोक्ष होता है । * पूर्वस्मिन्नधिकरणे बन्धहेतोर घस्य स्वाभाविकस्याश्लेषविनाशौ ज्ञाननिमित्तौ शास्त्र-व्यपदेशान्निरूपितौ । धर्मस्य पुनः शास्त्रीयत्वाच्छास्त्रीयेण ज्ञानेनाविरोध इत्याशङ्कय तन्नि-विधान नहीं है, तो मी अकर्ता आत्मत्व ( आत्मा अकर्ता है ) ज्ञानसे कर्म प्रदाह सिद्ध होता है । . ' अश्लेषः ' यह शब्द आगामी कर्मोंमें ब्रह्मवित् कर्तृत्वको ही प्राप्त नहीं होता, ऐसा दिखलाता है और अतिक्रान्त- अतीत कर्मोंमें यद्यपि मिथ्याज्ञानसे कर्तृत्वको मानो प्राप्त हुआ - सा है, तो भी ज्ञानकी सामथ्यसे मिथ्याज्ञानकी निवृत्ति होनेसे वे अतीत कर्म भी प्रविलीन हो जाते हैं, ऐसा सूत्रस्थ ' विनाश ' शब्दसे कहते हैं । पूर्वंसिद्ध कर्तृत्व, भोक्तृत्वसे विपरीत, तीनों कालमें भी अकर्तृत्व, अभोक्तृत्व स्वरूप ब्रह्म मैं हूँ, इससे पूर्व भी कर्ता वा भोक्ता मैं नहीं था, अब भी नहीं हूँ, इसी प्रकार भविष्यत् कालमें भी नहीं होऊँगा, इसप्रकार ब्रह्मवित् जानता है, और इसप्रकार मोक्ष उपपन्न होता है । अन्यथा - ब्रह्मज्ञानसे कर्मका क्षय न मानें तो अनादिकालसे प्रवृत्त हुए कर्मोंके क्षयका अभाव होनेसे मोक्षाभाव होगा । और कर्मफल के समान मोक्ष देश, काल निमित्तकी अपेक्षा करनेवाला नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसा माननेसे कर्म फलके समान मोक्ष में अनित्यत्व प्रसङ्ग आ जायगा । और ज्ञानके फलमें परोक्षत्व अनुपपन्न है । इससे यह सिद्ध हुआ कि ब्रह्मज्ञान होनेपर पापका क्षय होता है ॥ १३ ॥
पूर्व अधिकरण में स्वाभाविक बन्धके हेतुभूत पापका ज्ञाननिमित्तक असम्बन्ध और विनाश शास्त्र व्यपदेश से निरूपित किये गये हैं, और धर्म तो शास्त्रीय हैं । अतः उसका शास्त्रीय ज्ञानसे अवरोध है । ऐसी आशङ्का कर उसके निराकरण करनेके लिए पूर्वं अधिकरणके न्यायका अतिदेश सत्यानन्दी -दीपिका * कर्मोका दृष्ट फल न होनेसे श्रुतिप्रमाणसे अदृष्ट स्वर्ग आदि फल मानना पड़ता है । परन्तु यहाँ तो केवल ब्रह्मात्मत्व ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्तिमात्र होती है, ब्रह्म तो स्वयं सिद्ध है । अतः अपरोक्ष ज्ञानका मोक्षरूप अपरोक्ष फल जब सम्भव है तो अदृष्ट फलकी कल्पना अन्याय है । इसलिए ब्रह्मज्ञान होनेपर पूर्व सश्चित कर्मोंका नाश और आगामी कर्मोंका सम्बन्ध नहीं होता, यह श्रुति और स्मृति सिद्ध है ॥ १३ ॥
* तत्त्वज्ञानसे पापकी निवृत्ति कहकर अब पुण्यकी निवृत्ति में ' इतरस्याप्येवम् ' इत्यादिसे अति-देश करते हैं । जैसें याग आदि अदृष्टद्वारा पापका क्षय करते हैं, वैसे ब्रह्मविद्या नहीं करता, किन्तु
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८१६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० १ राकरणाय पूर्वाधिकणरन्यायातिदेशः क्रियते । इतरस्यापि पुण्यस्य कर्मण एवमघवद संश्लेषो विनाशश्च ज्ञानवतो भवतः । कुतः? तस्यापि स्वफलहेतुत्वेन ज्ञानफलप्रतिबन्धि-त्वप्रसङ्गात्, ' उभे उ हैवैष एते तरति ' ( वृ ० ४।४।२२ ) इत्यादिश्रुतिषु च दुष्कृतवत्सुकृतस्यापि प्रणाशव्यपदेशात् । अकर्त्रात्मत्वबोधनिमित्तस्य च कर्मक्षयस्य सुकृतदुष्कृतयोस्तुल्यत्वात्, ‘ क्षीयन्ते चास्य कर्माणि ' ( मु ० २।२।८ ) इति चाविशेषश्रुतेः । यत्रापि केवल एच पाप्मशब्दो दृश्यते, तत्रापि तेनैव पुण्यमव्याकलितमिति द्रष्टव्यम्, ज्ञानफलांपेक्षया निकृष्टफलत्वात् । अस्ति च श्रुतौ पुण्येऽपि पाप्मशब्दः ' नैतं सेतुमहोरात्रे तरत: ' ( छा ० ८ | ४ | १ ) इत्यत्र सह दुष्कृतेन सुकृतमप्यनुक्रम्य ' सर्वे पाप्मानोऽतो निवर्तन्ते ' इत्यविशेषेणैव प्रकृते पुण्ये पाप्मशब्द-प्रयोगात् । पाते त्विति तुशब्दोऽवधारणार्थः । एवं धर्माधर्मयोर्वन्धहेत्वोर्विद्यासामर्थ्याद-श्लेष विनाशसिद्धेरवश्यंभाविनी विदुषः शरीरपाते मुक्तिरित्यवधारयति ॥ १४ ॥
( ११ अनारब्धाधिकरणम् । सू ० १५ ) अनारब्धकार्ये एव तु पूर्वे तदवः ॥ १५ ॥
पदच्छेद - अनारब्धकार्ये, एव तु पूर्वे तदवधेः । सूत्रार्थ - ( अनारन्धकार्ये एवं ) अनारब्ध फलवाले ही ( पूर्वे ) पूर्व संचित पुण्य - पापका ही ज्ञान से क्षय होता है, ( तदवस्तु ) क्योंकि ' तस्य तावदेव चिरम् ' इत्यादि श्रुतिसे देहपातरूप अवधि श्रुत है । * पूर्वयोरधिकरणयोर्ज्ञाननिमित्तः सुकृतदुष्कृतयोर्विनाशोऽवधारितः । स किम-विशेषेणारब्धकार्ययोरनारब्धकार्ययोश्च भवत्युत विशेषेणानारब्धकार्ययोरेवेति विचार्यते । किया जाता है । ज्ञानवान् के अन्यका भी - पुण्य कर्मका भी इसप्रकार पापके समान असंश्लेष और विनाश होता है, किससे? इससे कि उसको भी अपने फलके हेतुरूपसे ज्ञानफल में प्रतिबन्धत्वं प्रसङ्ग होगा । ' उभे उ हैवैष ० ' ( यह ब्रह्मवेत्ता पुण्य और पापरूप इन दोनों कर्मोंको तर जाता है ) इत्यादि श्रुतियों में पापके समान पुण्यका भी प्रणाश व्यपदेश है । आत्मा अकर्ता है, इस बोध निमित्तिक कर्मक्षय सुकृत और दुष्कृत दोनोंमें समान है, कारण कि ' क्षीयन्ते चास्य कर्माणि ० ' ( इसके कर्म क्षीण होते है ) ऐसी अविशेष श्रुति है । जहाँ केवल ही पाप्म पाप शब्द दिखाई देता है वहाँ भी उसीसे पुण्यका भी ग्रहण होता है, ऐसा समझना चाहिए, क्योंकि ज्ञानफलकी अपेक्षासे पुण्य निकृष्ट फलवाला है । और श्रुतिमें पुण्य में भी पापशब्दका प्रयोग है, ' नैतं सेतुमहोरात्रे ० ' ( इस सेतुरूप आत्माका दिन-पुण्य और रात - पाप अतिक्रमण नहीं करते अर्थात् आत्माको परिच्छिन्न नहीं करते ) इसमें दुष्कृतके साथ सुकृतका मी उपक्रमकर ' सर्वे पाप्मानोऽतो निवर्तन्ते ' ( इस आत्मारूप सेतुसे सब पाप निवृत्त होते हैं ) इसप्रकार अविशेषसे ही प्रकृत पुण्यमें पाप शब्दका प्रयोग है । ' पाते तु ' ' तु ' शब्द अव-धारणार्थक है । इसप्रकार बन्धके हेतुभूत धर्म और अधर्मका विद्याकी सामर्थ्य से असंश्लेष और विनाश सिद्ध होनेसे विद्वान् शरीरपात होनेपर मुक्ति अवश्यंभावी है, ऐसा निश्चय करते हैं ॥ १४ ॥
गत दो अधिकरणों में ज्ञानसे सुकृत और दुष्कृतका विनाश निश्चित किया गया है । क्या वह आरब्ध कार्यवाले और अनारब्ध कार्यवाले दोनोंका अविशेषरूसे होता है अथवा अनारब्ध कार्य -वालोंका ही विशेषरूपसे होता है, इसपर विचार किया जाता है । पूर्वपक्षी— उसमें ' उभे उ हैचैष ० ' सत्यानन्दी - दीपिका दृष्टभोक्तृत्व आदिकी निवृत्ति करती है । इसलिए विद्याकी सामर्थ्य से ब्रह्मज्ञानीके जैसे पापका असंश्लेष और विनाश होता है, वैसे ही पूर्व संचित पुण्यका विनाश और आगामी पुण्यका असंश्लेष होता है | १४ | * पूर्वं अधिकरणोंमें ज्ञानसे अशेष कर्मोंका क्षय और असंश्लेष निश्चित किया गया है । परन्तु