श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 851–860
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 851–860
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अधि ० ११ सू ० १५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ८१७ तत्र ‘ उभे उ हेंवैष एते तरति ' ( वृ ० ४।४।२२ ) इत्येवमादिश्रुतिष्वविशेषश्रवणादविशेषेणैव क्षय इति । एवं प्राप्ते प्रत्याह- अनारब्धकार्ये एव त्विति । अप्रवृत्तफले एव पूर्वे जन्मान्तर-संचिते, अस्मिन्नपि च जन्मनि प्राग्ज्ञानोत्पत्तेः संचिते, सुकृतदुष्कृते ज्ञानाधिगमात्क्षीयेते, नत्वारन्धकार्ये सामिभुक्तफले, याभ्यामेतद्ब्रह्मज्ञानायतनं जन्म निर्मितम् । कुत एतत्? ' तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्ये ' ( छा ० ६।१४।२ ) इति शरीरपातावधिकरणा-त्क्षेमप्राप्तेः । इतरथा हि ज्ञानादशेषकर्मक्षये सति स्थितिहेत्वभावाज्ज्ञानप्राप्त्यनन्तरमेव क्षेम-मञ्जुवीत । तत्र शरीरपातप्रतीक्षां नाचक्षीत । * ननु वस्तुबलेन वायमकर्त्रात्मावबोधः कर्माणि क्षपयन्कथं कानिचित्क्षपयेत्का निचिच्योपेक्षेत? नहि समानेऽग्निबीज संपर्क केषांचि -द्वीजशक्तिः क्षीयते, केषांचिन्न क्षीयत इति शक्यमङ्गीकर्तुमिति । उच्यते— न तावदनाश्रि-त्यारब्धकार्य कर्माशयं ज्ञानोत्पत्तिरुपपद्यते । आश्रितेच तस्मिन्कुलालचक्रवत्प्रवृत्तवेगस्या-न्तराले प्रतिबन्धासंभवाद्भवति वेगक्षयप्रतिपालनम् । अकर्त्रात्मबोधोऽपि हि मिथ्याज्ञानबा-( यह ब्रह्मवेत्ता इन दोनों - पुण्य और पाप कर्मोंका अतिक्रमण कर जाता है ) इत्यादि श्रुतियों में अवि-शेषरूपसे श्रवण होनेसे अविशेषरूपसे ही क्षय होता है । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर निराकरण कहते हैं - ' अनारब्धकार्ये एव तु ' पूर्व जन्ममें संचित और ज्ञानोत्पत्ति से पूर्व तक इस जन्ममें संचित अप्रवृत्त फलवाले सुकृत और दुष्कृत ज्ञानकी प्राप्तिसे क्षय होते हैं, किन्तु आरब्ध कार्य अर्धभुक्त फल वाले जिन पुण्य पापोंसे इस ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिका स्थान यह जन्म निर्मित हुआ है, वे क्षय नहीं होते । यह किससे? इससे कि ' तस्य तावदेव चिरं ० ' ( उस विद्वान् के मोक्षमें उतना ही विलम्ब है जब तक कि वह देह बन्धन से मुक्त नहीं होता । उसके अनन्तर तो वह सत्सम्पन्न हो जाता है ) इसप्रकार देहपात मोक्ष प्राप्तिकी अवधि किया गया है, अन्यथा - ज्ञानसे समस्त कर्मोंके क्षय होनेपर शरीर स्थिति का कारण न होनेसे ज्ञान प्राप्ति के अनन्तर ही विद्वानुको मोक्ष प्राप्त होगा, तो फिर शरीरपातकी प्रतीक्षा नहीं कहनी चाहिए | परन्तु ' आत्मा अकर्ता है ' यह बोध वस्तु सामर्थ्य से ही कर्मोंका क्षय करता हुआ कुछ कर्मोंको क्षय करे और कुछ कर्मोंकी उपेक्षा करे, यह कैसे होगा? अग्नि और बीजों का संपर्क समान होनेपर कुछकी बीजशक्ति क्षय होती है और कुछकी बीजशक्ति क्षय नहीं होती, ऐसा अङ्गीकार नहीं किया जा सकता? कहते हैं - आरब्ध कार्यवाले कर्माशयका आश्रय किए विना ज्ञानकी उत्पत्ति उपपन्न नहीं होती । उसके आश्रित होनेपर कुलालचक्रके समान प्रवृत्त वेग वालेकें मध्यमें प्रतिबन्धके सम्भव न होनेसे वेग क्षयकी प्रतीक्षा होती है । अकर्तृ आत्मबोध भी सत्यानन्दी - दीपिका ' क्षीयन्ते चास्य कर्माणि ० ' यह श्रुति ज्ञानी के अशेष कर्मोंका क्षय कहती है और ' तस्य तावदेव चिरं ० ' यह श्रुति मोक्ष के लिए शरीरपातकी प्रतीक्षा कहती है, इससे यह प्रतीत होता है कि कुछ अवशेष कर्म हैं जिनका ज्ञानसे भी नाथ नहीं होता । इस संदिग्ध विषयको ' अनारब्धकार्ये ' इत्यादि से स्पष्ट करते हैं | ‘ क्षीयन्ते चास्य कर्माणि ' यह उत्सर्ग श्रुति है, क्योंकि ' तस्य तावदेव चिरम् ' यह अपवाद श्रुति विद्यमान है | इससे ' क्षीयन्ते चास्य कर्माणि ' इस श्रुतिका प्रारब्ध कर्मोंको छोड़कर शेष कर्मोंके क्षयमें तात्पर्यं समझना चाहिए । ऐसा माननेसे दोनों श्रुतियोंका समन्वय होता है । * यद्यपि अद्वैतात्मज्ञान अनादि अविद्या और तत्कृत समस्त प्रपञ्चका विरोधी होनेसे तन्मध्य-वर्ती अशेष कर्मोंका भी विरोधी है, तो भी जैसे अनारब्ध कार्यवाले कर्मोंका शीघ्रता से विनाश करता है, वैसे आरब्ध कार्यवाले प्रारब्ध कर्मोंका नहीं । यदि दोनों प्रकारके कर्मोंका ज्ञानद्वारा समानरूपसे विनाश मानें तो हिरण्यगर्भ, याज्ञावल्क्यं, वसिष्ट, व्यास, शुकदेव, उद्दालक आदि जीवन मुक्त महा-पुरुषोंका जो श्रुति, स्मृति आदिमें गुरु शिष्य आदिरूपसे संवाद प्रसिद्ध है, वह काल्पनिक सिद्ध होगा ।
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८१८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० १ धनेन कर्माण्युच्छिनत्ति । वाधितमपि तु मिथ्याज्ञानं द्विचन्द्रज्ञानवत्संस्कारवशात्कंचि-त्कालमनुवर्तत एव । अपि च नैवात्र विवदितव्यम् - ब्रह्मविदा कंचित्कालं शरीरं ध्रियते न वा ध्रियत इति । कथं ह्येकस्य स्वहृदयप्रत्ययं ब्रह्मवेदनं देहधारणं चापरेण प्रतिक्षेप्तुं शक्येत? श्रुतिस्मृतिषु च स्थितप्रज्ञलक्षणनिर्देशेनैतदेव निरुच्यते । तस्मादनारब्धकार्य-योरेव सुकृतदुष्कृतयोर्विद्यासामर्थ्यात्क्षय इति निर्णयः ॥ १५ ॥
( १२ अग्निहोत्राद्यधिकरणम् । सू ० १६-१७ ) अग्निहोत्रादि तु तत्कार्यायैव तदर्शनात् ॥ १६ ॥
पदच्छेद - अग्निहोत्रादि, तु, तत्कार्याय, एव तद्दर्शनात् । सूत्रार्थ - ( अग्निहोत्रादि ) अग्निहोत्र आदि नित्य नैमित्तिक कर्म समुदाय तो ( तत्कार्यायैव ) तत्त्वज्ञान साध्य मोक्षरूप कार्यके लिए ही है, ( तद्दर्शनात् ) क्योंकि ' तमेतं वेदानुवचनेन ० ' इत्यादि श्रुतिमें कर्म आदिमें ज्ञान हेतुता देखी जाती है । ( तु ) शब्द शङ्का निवृत्त्यर्थं है । * पुण्यस्याप्यश्लेषविनाशयोरघन्यायो ऽतिदिष्टः, सोऽतिदेशः सवपुण्यविषय इत्या-शङ्कय प्रतिवक्ति- अग्निहोत्रादि त्विति । तुशब्द आशङ्कामपनुदति, यन्नित्यं कर्म वैदिकम-मिथ्याज्ञानके बाधसे कर्मोंका उच्छेद करता है । बाधित हुआ भी मिथ्याज्ञान दो चन्द्रज्ञानके समान संस्कारके बलसे कुछ समय तक अनुवर्तित होता ही है । और इस विषयमें विवाद नहीं करना चाहिए कि ब्रह्मज्ञानी कितने समय तक शरीर धारण करता है अथवा नहीं धारण करता है । एक ही पुरुषका स्वहृदय स्वसंवेद्य प्रत्यय - ब्रह्मज्ञान और देह धारण उसपर अन्य पुरुषद्वारा आक्षेप कैसे किया जा सकता है? अर्थात् नहीं किया जा सकता है । श्रुति और स्मृति में स्थितप्रज्ञ के लक्षणके उपदेशसे यही कहा जाता है । इसलिए अनारब्ध कार्यवाले सुकृत और दुष्कृतका ही विद्याकी सामर्थ्य से क्षय होता है, ऐसा निर्णय है ॥ १५ ॥
goat मी अश्लेष और विनाशमें पाप न्यायका अतिदेश किया गया है । क्या वह अतिदेश सर्व पुण्यविषयक है? ऐसी आशङ्का कर उसका निराकरण कहते हैं- ' अग्निहोत्रादि तु ' ' तु ' शब्द आशङ्काका परिहार करता है । जो वैदिक अग्निहोत्रादि नित्य कर्म हैं वे तत् तत् कार्य के लिए ही होते सत्यानन्दी - दीपिका इससे अद्वैत आत्मैकत्व ज्ञानका संप्रदाय भी उच्छिन्न हो जायगा । इत्यादि अनेक आपत्तियाँ प्रसक्त होंगी । इससे भगवद्गीताके दूसरे अध्यायमें विस्तार पूर्वक स्थितप्रज्ञ के लक्षणोंके उपदेशसे यह_ सिद्ध होता है कि ज्ञानीके प्रारब्ध कर्मके होनेपर ही उसकी जीवन्मुक्त अवस्था सिद्ध होती है और मुमुक्षु पुरुषोंको उनके उपदेशोंसे लाभ होता है । यदि यह मानें कि ब्रह्मज्ञानसे मिथ्याज्ञानकी निवृत्ति -होनेसे अशेष कर्म नष्ट हो जाते हैं, तो उसको ' आश्रिते ' आदिसे कहते हैं । किञ्च यह भी एक मत है कि आवरण और विक्षेप नामक अविद्याकी दो शक्तियाँ हैं । आवरणशक्ति तो विद्यासे निवृत्त हो जाती है किन्तु विक्षेपशक्ति नहीं । अतः विक्षेपशक्तिसे निर्मित ब्रह्मवेत्ताका शरीर भी विद्यमान रहता है । वह भोगके समाप्त होनेपर नष्ट हो जाती है, अनन्तर ज्ञानीका मोक्ष होता है, क्योंकि वस्तुकी सामर्थ्यं समान होनेपर भी कार्यलिङ्गसे यही सिद्ध होता है कि विद्याकी सामर्थ्य से अनारब्ध कार्यवाले सुकृत और दुष्कृतका ही क्षय होता है ॥ १५ ॥
* पुण्यका भी पापके समान अश्लेष और विनाश कहा गया । क्या वह सब पुण्य विषयक है अथवा नहीं? ऐसा सन्देह होता है । परन्तु पुण्यका अश्लेष और विनाश होनेसे ज्ञानीको वेदविहित अग्निहोत्र आदि नित्य कर्म भी नहीं करने चाहिएँ, क्योंकि उनका भी पुण्यके समान विद्यासे नाश होगा, इसलिए ' प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम् ' ( अङ्गों को पङ्क लगाकर उसे धोनेकी अपेक्षा
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अधि ० १२ सू ० १७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८१ ९ ग्निहोत्रादि, तत्तत्कार्यायैव भवति, ज्ञानस्य यत्कार्यं तदेवास्यापि कार्यमित्यर्थः । कुतः? ‘ तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन ' ( वृ ० ४।४।२२ ) इत्यादिदर्शनात् । ननु ज्ञान-कर्मणोर्विलक्षणकार्यत्वात्कार्यं कत्वानुपपत्तिः, नैष दोषः, ज्वरमरणकार्ययोरपि दधिविषयो-र्गुडमन्त्रसंयुक्तयोस्तृप्तिपुष्टिकार्यदर्शनात्, तद्वत्कर्मणोऽपि ज्ञानसंयुक्तस्य मोक्षकार्यो-पपत्तेः । नन्वनारभ्यो मोक्षः, कथमस्य कर्मकार्यत्वमुच्यते? नैष दोषः, आरादुपकारकत्वा-त्कर्मणः । ज्ञानस्यैव हि प्रापकं सत्कर्म प्रणाड्या मोक्षकारणमित्युपचर्यते । अतएव चाति-क्रान्तविषयमेतत्कायैकत्वाभिधानम् । नहि ब्रह्मविद आगाम्यग्निहोत्रादि संभवति, अनियोज्य ब्रह्मात्मत्वप्रतिपत्तेः शास्त्रस्याविषयत्वात् । सगुणासु तु विद्यासु कर्तृत्वानतिवृत्तेः संभवत्या-गाम्यप्यग्निहोत्रादि । तस्यापि निरभिसंधिनः कार्यान्तराभावाद्विद्यासंगत्युपपत्तिः ॥१६ ॥
किंविषयं पुनरिदमश्लेषविनाशवचनं, किंविषयं वाऽदो विनियोगवचनमेकेषां शाखि-नाम् —'तस्य पुत्रा दायमुपयन्ति सुहृदः साधुकृत्यां द्विषन्तः पापकृत्याम् ' इति? अत उत्तरं पठति-अतोऽन्यापि ह्येषामुभयोः ॥ १७ ॥
पदच्छेद - अतः, अन्या, अपि, हि, एकेषाम् उभयोः । सूत्रार्थ - ( एकेषाम् ) कुछ शाखावालोंके मतमें ( अतः ) अग्निहोत्र आदि नित्य कर्मसे ( अन्या ) स्वर्गादिकी साघनीभूत क्रिया अन्य है । ( उभयोरपि ) वह क्रिया जैमिनि और बादरायण दोनों को भी सम्मत है । * अतोऽग्निहोत्रादेर्नित्यात्कर्मणोऽन्यस्यापि ह्यस्ति साधुकृत्या, या फलमभिसंधाय हैं, जो ज्ञानका कार्य है वही इसका भी कार्य है, ऐसा अर्थ है । किससे? इससे कि ' तमेतं वेदानुवच-० ' ( ब्राह्मण उस आत्माको वेदाध्ययनसे, यज्ञसे, और दानसे जानने की इच्छा करें ) इत्यादि देखा जाता है । परन्तु ज्ञान और कर्म विलक्षण कार्यंवाले होने से उनमें कार्यैकत्व उपपत्ति नहीं होती । यह दोष नहीं है, क्योंकि ज्वर और मृत्यु कार्यवाले दधि और विषमें भी गुड़ और मन्त्र संयुक्त होनेपर तृप्ति और पुष्टिरूप कार्यं देखे जाते हैं, वैसे ज्ञान संयुक्त कर्मका भी मोक्ष कार्य हो सकता है । परन्तु मोक्ष तो अनारभ्य है, उसको कर्मका कार्यं कैसे कहा जाता है? यह दोष नहीं है, क्योंकि कर्म ज्ञानका आराद ( दूरसे ) उपकारक है । ज्ञानका ही प्रापक होता हुआ कर्म परम्परा - अन्तःकरण शुद्धिद्वारा मोक्षका कारण है, ऐसा उपचार किया जाता है । अतएव यह कार्यैकत्वका अभिधान अतिक्रान्त ( ज्ञानसे पूर्व ) कर्म विषयक है । कारण कि ब्रह्मवित् के लिए आगामी अग्निहोत्रादि संभव नहीं हैं । क्योंकि अनियोज्य ब्रह्मात्मत्व ज्ञान शास्त्रका विषय नहीं है । सगुणविद्याओंमें तो कर्तृत्वकी अनिवृत्ति होनेसे आगामी अग्निहोत्र आदि कर्म हो सकते हैं । फल अभिलाषा रहित उस कर्मको भी अन्य कार्यके न होनेसे विद्याकी संगति ( सम्बन्ध ) उपपन्न होती है ॥ १६ ॥
तो फिर यह अश्लेष और विनाश वचन किं विषयक हैं, और इस प्रकार इन शाखावालोंका ' तस्य पुत्रा ० ' ( उसके ' पुत्र दाय धन प्राप्त करते हैं, मित्र साधुकर्म और शत्रु पापकर्म प्राप्त करते हैं ) यह विनियोग वचन किसके लिए है? इसके लिए उत्तर कहते हैं-अत: - अग्निहोत्रादि नित्यकर्मसे अन्य भी साधुकृत्य है, जो फलके उद्देश्यसे किया जाता है । सत्यानन्दी - दीपिका उसका दूरसे अस्पर्श ही श्रेष्ठ है ) इसप्रकार पङ्कप्रक्षालन न्यायसे अग्निहोत्र आदि नित्य कर्म न करना श्रेष्ठ है । पूर्वपक्ष में प्रक्षालन न्यायसे ज्ञानके लिए नित्य कर्मोंका अनुष्ठान असिद्ध है और सिद्धान्तमें ज्ञानोत्पत्ति के लिए नित्यकर्म अनुष्ठेय हैं ॥ १६ ॥
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II ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० १ क्रियते, तस्या एष विनियोग उक्त एकेषां शाखिनाम्- ' सुहृदः साधुकृत्यामुपयन्ति ' इति । तस्या एव चेदमघवदश्लेषविनाशनिरूपणमितरस्याप्येवमश्लेष इति । तथाजातीयकस्य काम्यस्य कर्मणो विद्यां प्रत्यनुपकारकत्वे संप्रतिपत्तिरुभयोरपि जैमिनिबादरायणयोराचार्ययोः ॥ १७ ॥
( १३ विद्याज्ञानसाधनाधिकरणम् । सू ० १८ ) देव विद्यति हि ॥ १८॥:
पदच्छेद - यद् एव, विद्यया इति " हि । सूत्रार्थ - ( विद्यया ) विद्या संयुक्त ( यद् ) अग्निहोत्रादि नित्य कर्म और केवल अग्निहोत्रादि नित्य-कर्म दोनों इस जन्ममें ब्रह्मज्ञान के साधन हो सकते हैं, ( एव ही ) क्योंकि ' यदेव विद्यया ' ऐसी श्रुति है । * समधिगतमेतदनन्तराधिकरणे नित्यमग्निहोत्रादिकं कर्म मुमुक्षुणा मोक्षप्रयोजनो-देशेन कृतमुपात्तदुरितक्षयहेतुत्वद्वारेण सत्त्वशुद्विकारणतां प्रतिपद्यमानं मोक्षप्रयोजन ब्रह्मा-धिगमनिमित्तत्वेन ब्रह्मविद्यया सहैककार्य भवतीति । तत्राग्निहोत्रादि कर्माङ्गव्यपाश्रयविद्या-संयुक्तं केवलं चास्ति । ' य एवं विद्वान्यजति ', ' य एवं विद्वाञ्जुहोति ', ' य एवं विद्वाञ्छंसति ’, ‘ य एवं विद्वान्गायति ’, ‘ तस्मादेवंविदमेव ब्रह्माणं कुर्वीत नानेवंविदम् ' ( छा ० ४।१७।१० ), ' तेनोभौ कुरुतो यश्चै-तदेवं वेद यश्च न वेद ' ( छा ० १ | १ | १० ) इत्यादिवचनेभ्यो विद्यासंयुक्तमस्ति, केवलमप्यस्ति । तत्रेदं विचार्यते - किं विद्यासंयुक्तमेवाग्निहोत्रादिकं कर्म मुमुक्षोर्विद्याहेतुत्वेन तथा उसका कुछ शाखावालोंके मत में ' सुहृदः साधुकृत्यामुपयन्ति ' ( मित्र इसके साधुकृत्यको प्राप्त होते हैं ) इस प्रकार यह विनियोग कहा गया है । उसका ही पापके समान यह अश्लेष और विनाश है, ऐसा ' इतरस्याप्येवमश्लेष ' इस सूत्र में निरूपण है । इस प्रकारके काम्य कर्मके विद्याके प्रति अनुपकारकत्व होने में जैमिनि और बादरायण दोनों आचार्यों को भी सम्मति है ॥ १७ ॥
मुमुक्षु द्वारा मोक्षरूप प्रयोजनके उद्देश्यसे किये गये नित्य अग्निहोत्र आदि कर्म संचित पापक्षय हेतु द्वारा अन्तःकरण शुद्धिकी कारणताको प्राप्त होकर मोक्ष प्रयोजनवाले ब्रह्मज्ञानके निमित्तरूपसे ब्रह्मविद्याके साथ एक कार्यवाले होते हैं, ऐसा गत अधिकरणमें भली - भाँति अधिगत हुआ है । उसमें अग्निहोत्रादि कर्म अङ्गोंसे सम्बद्ध उपासना संयुक्त हैं और केवल - उपासना असंयुक्त भी हैं— ' य एवं विद्वान्यजति ' ( जो ऐसा जाननेवाला होकर याग करता है, जो ऐसा जाननेवाला होकर होम करता है, जो ऐसा जाननेवाला होकर शंसन करता है, जो ऐसा जाननेवाला होकर उद्गान करता है ) ‘ तस्मादेवं ० ' ( अतः इसप्रकार जाननेवालेको ही ब्रह्मा बनावे, ऐसा न जाननेवालेको नहीं ) ' तेनोमौ कुरुतो ० ' ( जो इस अक्षरको इसप्रकार जानता है और जो नहीं जानता वे दोनों ही उसके द्वारा कर्म करते हैं ) इत्यादि श्रुतिवचनोंसे अग्निहोत्र आदि कर्म विद्या संयुक्त हैं और केवल भी हैं । उसपर यह विचार किया जाता है कि क्या विद्या संयुक्त ही अग्निहोत्र आदि कर्म मुमुक्षुकी विद्याके हेतुरूपसे उसके साथ एककार्यत्वको प्राप्त होते हैं केवल नहीं अथवा अविशेषसे विद्या संयुक्त और सत्यानन्दी - दीपिका * यह अश्लेष और विनाश वचन काम्य कर्मों के विषयमें है । काण्वशाखावालोंका ' सुहृदः साधुकृत्यामुपयन्ति ' यह विनियोगवचन भी काम्यकर्म विषयक है, क्योंकि ज्योतिष्टोमादि काम्य कर्म विद्या उपकारक नहीं होते, अतः काम्य कर्म विषयक ही अश्लेष, विनाश और विनियोग ये दोनों वचन समझने चाहिए ॥ १७ ॥
* पूर्वपक्षमें विद्या संयुक्त अग्निहोत्र आदि नित्यकर्म विद्योत्पत्तिमें हेतु हैं, क्योंकि वे विद्याहीन कर्मोंसे विशिष्ट अवगत होते हैं । सिद्धान्तमें दोनों प्रकारके कर्म विद्योत्पत्ति हेतु हैं ॥ १८ ।
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अधि ० १३ सू ० १८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ८२१ सहैककार्यत्वं प्रतिपद्यते, न केवलमुत विद्यासंयुक्तं केवलं चाविशेषेणेति । कुतः संशयः? ' तमतमात्मानं यज्ञेन विविदिषन्ति ' इति यज्ञादीनामविशेषेणात्मवेदनाङ्गत्वेन श्रवणात् । विद्यासंयुक्तस्य चाग्निहोत्रादेर्विशिष्टत्वावगमात् । किं तावत्प्राप्तम्? विद्यासंयुक्तमेव कर्मा-ग्निहोत्राद्यात्मविद्याशेषत्वं प्रतिपद्यते, न विद्याहीनम्, विद्योपेतस्य विशिष्टत्वावगमाद्विद्या-विहीनात् ', ' यदहरेव जुहोति तदहः पुनर्मृत्युमपजयत्येवं विद्वान् ' इत्यादिश्रुतिभ्यः । ' बुद्धया युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ' ( गी ० २।३ ९ ), ' दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय ' ( गी ० २।४ ९ ) इत्यादिस्मृतिभ्यश्चेति । एवं प्राप्ते प्रतिपाद्यते यदेव विद्ययेति हि, सत्यमेतत्, विद्यासंयुक्तं कर्माग्निहोत्रादिकं विद्याविहीनात्कर्मणोऽग्निहोत्राद्विशिष्टम्, विद्वानिव ब्राह्मणो विद्याविही नादब्राह्मणात्, तथापि नात्यन्तमनपेक्षं विद्याविहीनं कर्माग्निहोत्रादिकम् । कस्मात्? ' तमेत-मात्मानं यज्ञेन विविदिषन्ति ' इत्यविशेषेणाग्निहोत्रा देर्विद्या हेतुत्वेन श्रुतत्वात् । ननु विद्या-संयुक्तस्याग्निहोत्रादेर्विद्या विहीनाद्विशिष्टत्वावगमाद्विद्याविहीनमग्निहोत्राद्यात्मविद्याहेतु -त्वेनानपेक्षमेवेति युक्तम्, नैतदेवम् । विद्यासहायस्याग्निहोत्रादेर्विद्यानिमित्तेन सामर्थ्याति-शयेन योगादात्मज्ञानं प्रति कश्चित्कारणत्वातिशयो भविष्यति, न तथा विद्याविहीनस्येति युक्तं कल्पयितुम्, नतु ' यज्ञेन विविदिषन्ति ' इत्यत्राविशेषेणात्मज्ञानाङ्गत्वेन श्रुतस्याग्निहोत्रा-देरनङ्गत्वं शक्यमभ्युपगन्तुम् । तथा हि श्रुतिः - ' यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्य-वत्तरं भवति ' ( छा ० १।१।१० ) इति विद्यासंयुक्तस्य कर्मणोऽग्निहोत्रादेवीर्यवत्तरत्वाभिधानेन स्वकार्य प्रति कंचिदतिशयं ब्रुवाणा विद्याविहीनस्य तस्यैव तत्प्रयोजनं प्रति वीर्यवत्त्वं केवल कर्म एक कार्यत्वको प्राप्त होते हैं । ऐसा संशय किससे होता है? इससे कि ' तमेतमात्मानं ० ' ( उस इस उपनिषद्गम्य आत्माको यज्ञसे जाननेकी इच्छा करें ) इसप्रकार यज्ञ आदिका अविशेष-रूपसे आत्मज्ञानके अङ्गरूपसे श्रवण है, अतः विद्या संयुक्त अग्निहोत्र आदि में विशिष्टत्व अवगत होता है । तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - विद्या संयुक्त ही अग्निहोत्र आदि कर्म आत्मविद्या शेषत्वको प्राप्त होते हैं उपासना होन कर्म नहीं । क्योंकि ' यदहरेव जुहोति ० ' ( जो ऐसा जाननेवाला जिस दिन होम करता है उसी दिन मृत्युको जीत लेता है ) इत्यादि श्रुतिसे और ' बुद्धया युक्तो ० ' ( हे पार्थ! जिस बुद्धिसे युक्त हुआ तूं कर्मोके बन्धनको भली - भाँति नाश करेगा ) ' दूरेण ह्यवरं ० ' ( इस समत्व-रूप बुद्धियोगसे सकाम कर्म अत्यन्त तुच्छ हैं ) इत्यादि स्मृतिसे विद्या युक्त कर्म विद्याहीन कर्म से विशिष्ट अवगत होते हैं । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर प्रतिपादन किया जाता है— ' यदेव विद्ययेति हि ' यह ठीक है । विद्या संयुक्त अग्निहोत्र आदि कर्म विद्याहीन अग्निहोत्रादि कर्मोंसे विशिष्ट हैं । जैसे विद्वान् ब्राह्मण विद्याहीन ब्राह्मणसे विशिष्ट है । तो भी विद्या विहीन अग्निहोत्र आदि कर्म अत्यन्त अनपेक्ष नहीं हैं, किससे? इससे कि ' तमेतमात्मानं यज्ञेन विविदिषन्ति ' इसप्रकार अविशेषसे अग्निहोत्रादि कर्म विद्याके हेतुरूपसे श्रुत हैं । पू ० – परन्तु विद्यासंयुक्त अग्निहोत्रादि कर्मों में विद्याविहोन अग्निहोत्र आदि कर्मोंसे विशिष्ट अवगम होनेसे विद्याविहीन अग्निहोत्रादि कर्म आत्मविद्या के हेतुरूपसे अनपेक्ष ही हैं, यह युक्त है । सि ० - यह ऐसा नहीं, क्योंकि विद्या सहायवाले अग्निहोत्र आदिमें विद्या निमित्तिक सामर्थ्यं अतिशय के योगसे आत्मज्ञानके प्रति कोई कारणरूपसे अतिशय होगा, विद्याविहीन अग्निहोत्र आदि में ऐसा अतिशय नहीं होगा, ऐसी कल्पना करना युक्त है । परन्तु ' यज्ञेन विविदि-षन्ति ' इसमें अविशेषसे आत्मज्ञानके अङ्गरूपसे श्रुत अग्निहोत्र आदिमें अनङ्गत्व स्वीकार नहीं किया जा सकता । क्योंकि ' यदेव विद्यया ० ' ( जो कर्म विद्यासे, श्रद्धासे और योग युक्त होकर करता है वह वीर्यवत्तर होता है ) यह श्रुति विद्या संयुक्त अग्निहोत्र आदि कर्म अधिक वीर्यमान् हैं, इस कथनसे अपने कार्य प्रति कुछ अतिशय कहती हुई विद्याविहीन उसी कर्मको उस प्रयोजनके प्रति वीर्यवत्
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II ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पर ० १ दर्शयति । कर्मणश्च वीर्यवत्त्वं तत्, यत्स्वप्रयोजन साधनप्रसहत्वम् । तस्माद्विद्यासंयुक्तं नित्यमग्निहोत्रादि विद्याविहीनं चोभयमपि मुमुक्षुणा मोक्षप्रयोजनोद्देशेनेह जन्मनि जन्मान्तरे च प्राग्ज्ञानोत्पत्तेः कृतं यत्, तद्यथासामर्थ्यं ब्रह्माधिगमप्रतिबन्धकारणोपात्त-दुरितक्षयहेतुत्वद्वारेण ब्रह्माधिगमकारणत्वं प्रतिपद्यमानं श्रवणमननश्रद्धा तात्पर्याद्यन्त-रङ्गकारणापेक्षं ब्रह्मविद्यया सहैककार्य भवतीति स्थितम् ॥ १८ ॥
( १४ इतरक्षपणाधिकरणम् । सू ० १ ९ ) भोगेन त्वितरे क्षपयित्वा संपद्यते ॥ १ ९ ॥ पदच्छेद -- भोगेन, तु, इतरे, क्षपयित्वा सम्पद्यते । सूत्रार्थ - ( इतरे तु ) आरब्ध पुण्यपापोंका तो ( भोगेन ) भोगसे ( क्षपयित्वा ) नाशकर ( सम्पद्यते ) ब्रह्मको प्राप्त होता है । * अनारब्धकार्ययोः पुण्यपापयोर्विद्यासामर्थ्यात्क्षय उक्तः, इतरे त्वारब्धकार्ये पुण्य-पापे उपभोगेन क्षपयित्वा ब्रह्म संपद्यते, ' तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्ये ' ( छन्दो ० ६।१४।२ ) इति ' ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति ' इति चैवमादिश्रुतिभ्यः । ननु सत्यपि सम्यग्दर्शने यथा प्राग्देहपाताद्भेददर्शनं द्विचन्द्रदर्शनन्यायेनानुवृत्तमेवं पश्चादप्यनुवर्तेत न, निमित्ता-भावात् । उपभोगशेषक्षपणं हि तत्रानुवृत्तिनिमित्तम्, नच तादृशमत्र किंचिदस्ति । नन्वपरः कर्माशयोऽभिनवमुपभोगमारप्स्यते, न तस्य दग्धबीजत्वात् । मिथ्याज्ञानावष्टम्भं हि दिखलाती है । वही कर्ममें वीर्यवत्त्व है जो अपने प्रयोजनके सिद्ध करनेमें क्षमता हो । इसलिए विद्या संयुक्त नित्य अग्निहोत्र आदि कर्म और विद्या रहित कर्म दोनों भी मुमुक्षुसे मोक्ष प्रयोजनके उद्देश्यसे इस जन्ममें अथवा जन्मान्तर में ज्ञानोत्पत्तिके पूर्व जो किये गये हैं वे अपनी सामर्थ्यके अनुसार ब्रह्म-ज्ञानके प्रतिबन्ध कारणरूप से प्राप्त पापक्षयके हेतुरूप द्वारसे ब्रह्मज्ञान के कारणत्वको प्राप्त होकर श्रवण, मनन, श्रद्धा, तात्पर्य आदि अन्तरङ्ग कारणोंकी अपेक्षा से ब्रह्मविद्याके साथ मोक्षरूप एक कार्य वाले होते हैं, यह सिद्ध होता है ॥ १८ ॥
. अनारब्ध कार्यवाले पुण्य और पापका विद्याकी सामथ्यसे क्षय कहा गया है । अन्य तो - आरब्ध कार्यवाले पुण्य - पापका उपभोगसे क्षपणकर ब्रह्मको प्राप्त होता है, क्योंकि ' तस्य तावदेव चिरं ० ' ( उसके लिए मोक्ष होनेमें उतना ही विलम्ब है जब तक कि वह देहबन्धनसे मुक्त नहीं होता । उसके अन-न्तर तो वह सत्सम्पन्न - ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ) ' ब्रह्मैव सन् ० ' ( ब्रह्म ही होकर ब्रह्मको प्राप्त होता है ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं । पू ० – परन्तु सम्यग्दर्शनके होनेपर भी जैसे देहपातके पूर्व भेददर्शन द्विचन्द्रदर्शन न्यायसे अनुवृत्त होता है, वैसे देहपातके पश्चात् भी भेददर्शन अनुवृत्त होना चाहिए? सि ० -- नहीं, क्योंकि उसके कारणका अभाव है । उपभोग शेषका क्षपण ही ब्रह्मज्ञानीके भेददर्शन की अनुवृत्तिमें कारण है | किन्तु देहपात होनेपर ऐसा कोई निमित्त नहीं है । परन्तु दूसरा कर्माशय नवीन उपभोगको आरम्भ करेगा? सि ० – नहीं, क्योंकि उसका बीज दग्ध हो गया है । मिथ्याज्ञानका अवलम्बन करनेवाला सत्यानन्दी - दीपिका * अनारब्ध कर्म. ब्रह्मविद्याकी सामथ्यसे क्षय होते हैं, यह पूर्व अधिकरणमें कहा गया है । अब इस अधिकरणमें यह विचार किया जाता है कि ब्रह्मवित्के प्रारब्धकर्म क्षय होते हैं कि नहीं? इसप्रकार संदेह कर ' भोगेन वितरे ' इत्यादिसे सिद्धान्त कहते हैं । मिथ्याज्ञान ही कर्मोंका बीज है । ' सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः ' ( यो ० सू ० २।१३ ) ( कर्मों के बीजभूत अविद्याके होनेपर ही उसके फल जन्म, आयु और मोग होते हैं ) इसलिए अनारब्ध कर्म ब्रह्मविद्याकी सामर्थ्यसे निवृत्त होते हैं और प्रारब्ध कर्म भोगसे क्षय होते हैं । " तस्य तावदेव चिरं ० ' इत्यादि श्रुतिवचनसे सिद्ध
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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८२३ कर्मान्तरं देहपात उपभोगान्तरमारभते तच्च मिथ्याज्ञानं सम्यग्ज्ञानेन दग्धमित्यतः साध्वेतदारब्ध कार्यक्षये विदुषः कैवल्यमवश्यं भवतीति ॥ १ ९ ॥ इति श्रीमच्छङ्करभगवत्पादकृतौ शारीरकमीमांसामाप्ये चतुर्थाध्यायस्य पदच्छेद – सूत्रार्थ - ( चतुर्थाध्याये द्वितीयः पादः । [ अत्र पादे उत्क्रान्तिगतिनिरूपणम् ] ( इस पादमें उत्क्रान्ति और गतिका निरूपण है ) ( १ वागधिकरणम् । सू ० १-२ ) वाङ्मनसि दर्शनाच्छन्दाच्च ॥१ ॥
वाक्, मनसि, दर्शनात्, शब्दात्, च । वाक् ) वाणीकी वृत्ति ( मनसि ) मनमें लीन होती है मनकी वृत्तिके विद्यमान होनेपर वाग्वृत्तिका लय देखा जाता है, ( च ) और वृत्तिमानके अभेदकी विवक्षासे यहाँ उपचारसे वाक् शब्दका प्रयोग किया
लय होती है ।
प्रथमः पादः ॥३ ॥
, ( दर्शनात् ) क्योंकि ( शब्दात् ) वृत्ति और गया है कि वाक् मनमें * अथापरासु विद्यासु फलप्राप्तये देवयानं पन्थानमवतारयिष्यन्प्रथमं तावद्यथा-शास्त्रमुत्क्रान्तिक्रममन्वाचष्टे । समाना हि विद्वदविदुषोरुत्क्रान्तिरिति वक्ष्यति । अस्ति प्रायणविषया श्रुतिः ' अस्य सोम्य पुरुषस्य प्रयतो वाङ्मनसि संपद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम् ' ( छा ० ६।८।६ ) इति । किमिह वाच एव वृत्तिमत्त्या मनसि संपत्तिरुच्यते, उत वाग्वृत्तेरिति विशयः । तत्र वागेव तावन्मनसि संपद्यत इति प्राप्तम् । तथा हि - श्रुतिर-कर्मान्तर देहपात होनेपर अन्य उपभोगको आरम्भ करता है । वह मिथ्याज्ञान सम्यग्ज्ञानसे दग्ध हो गया, अतः अन्य - आरब्ध कार्यका क्षय होनेपर विद्वानको अवश्य कैवल्य होता है, यह ठीक है ॥ १ ९ ॥ स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत शाङ्करभाष्य - भाषानुवादके चतुर्थाध्यायका प्रथम पाद समाप्त ॥ १ ॥
निर्गुण विद्याके फल कथनानन्तर सगुण विद्याओंमें फल प्राप्तिके लिए देवयान मार्गका अव-तरण करते हुए सूत्रकार प्रथम शास्त्रानुसार उत्क्रान्तिका क्रम कहते हैं । उपासक और अनुपासककी उत्क्रान्ति तुल्य ही है, ऐसा आगे कहेंगे । ' अस्य सोम्य पुरुषस्य ० ' ( हे सोम्य! इस त्रियमाण पुरुषकी वाक् मनमें लीन हो जाती है, तथा मन प्राणमें, प्राण तेजमें और तेज परदेवतामें लीन हो जाता है ) ऐसी प्राण विषयक श्रुति है । क्या यहाँ वृत्तिवाली वाणीकी ही मनमें सम्पत्ति ( लय ) कही जाती है अथवा वाणीकी वृत्तिकी । इसप्रकार संशय होता है । पूर्वपक्षी - उसमें वाणी ही मनमें लीन होती है, ऐसा प्राप्त होता है । क्योंकि ऐसा माननेपर श्रुति अनुगृहीत होती है, अन्यथा लक्षणा सत्यानन्दी - दीपिका होता है कि विद्वान्की देहपातके अनन्तर अवश्य कैवल्य मुक्ति होती है । पूर्वपक्ष में कैवल्य - विदेह मुक्ति असिद्ध हैं, सिद्धान्तमें विदेह - कैवल्यमुक्ति सिद्ध है । इस पादमें साधन अनुष्ठानका क्रम और निर्गुण ब्रह्मविद्याका फल कहा गया है ॥ १ ९ ॥ स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत ' सत्यानन्दी - दीपिका ' के चतुर्थाध्यायका प्रथम पाद समाप्त ॥१ ॥
* गत पादमें ब्रह्मविद्याके जीवनमुक्ति और विदेहमुक्तिरूपी फल कहे गये हैं । अब इस पादमें फलविचारके प्रकरण में सगुणविद्याका ब्रह्मलोक प्राप्तिरूप फल अचिरादि मार्ग द्वारा ही हो सकता है, वह उत्क्रान्तिके विना संभव नहीं है, इसलिए उसकी सिद्धिके लिए शास्त्रानुसार प्रथम
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८२४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० २ नुगृहीता भवति । इतरथा लक्षणा स्यात् । श्रुतिलक्षणाविशये च श्रुतिर्व्याय्या न लक्षणा । तस्माद्वाच एवायं मनसि प्रलय इति । * एवं प्राप्ते ब्रूमः - वाग्वृत्तिर्मनसि संपद्यत इति । कथं वाग्वृत्तिरिति व्याख्यायते? यावता वाङ्मनसीत्येवाचार्यः पठति । सत्यमेतत् पठिष्यति तु परस्तात् ' अत्रिमागो वचनात् ' ( ब्र ० सू ० ४।२।१६ ) इति । तस्मादत्र वृत्त्युपशममात्रं विवक्षित-मिति गम्यते । तत्त्वप्रलयविवक्षायां तु सर्वत्रैवाविभागसाम्यात्किं परत्रैव विशिष्यादविभाग इति । तस्मादत्र वृत्त्युपसंहारविवक्षा । वाग्वृत्तिः पूर्वमुपसंहियते मनोवृत्ताववस्थिताया-मित्यर्थः । कस्मात्? दर्शनात् । दृश्यते हि वाग्वृत्तेः पूर्वोपसंहारो मनोवृत्तौ विद्यमानायाम्, नतु वाच एव वृत्तिमत्त्या मनस्युपसंहारः केनचिदपि द्रष्टुं शक्यते । ननु श्रुतिसामर्थ्याद्वाच एवायं मनस्यप्ययो युक्त इत्युक्तम्- नेत्याह, अतत्प्रकृतित्वात् । यस्य हि यत उत्पत्तिस्तस्य तत्र प्रलयो न्याय्यो मृदीव शरावस्य । नच मनसो वागुत्पद्यत इति किंचन प्रमाणमस्ति । वृत्त्युद्भवाभिभवौ त्वप्रकृतिसमाश्रयावपि दृश्येते । पार्थिवेभ्यो हीन्धनेभ्यस्तैजसस्याग्नेर्वृत्ति रुद्भवत्यप्सु चोपशाम्यति । कथं तस्मिन्पक्षे शब्दो ' वाङ्मनसि संपद्यते इति? अत आह-होगी । श्रुति और लक्षणामें सन्देह होनेपर श्रुति ही न्याय है लक्षणा नहीं । इसलिए वाणीका ही मनमें प्रलय है | सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - वाणीकी वृत्ति मनमें लय होती है । परन्तु जब कि आचार्यं ‘ वाङ्मनसि ' ( वाणी मनमें ) ऐसा पढ़ते हैं तब ' वाणीकी वृत्ति ' यह व्याख्यान कैसे किया जाता है? यह ठीक है । परन्तु ' अविभागो वचनात् ' इसप्रकार आगे कहेंगे । इसलिए यहाँ वृत्ति उपशम मात्र विवक्षित है, ऐसा ज्ञात होता है । परन्तु तत्त्वोंके प्रलयकी विवक्षा होनेपर तो सर्वत्र ही अविभागके साम्य होनेसे ' परत्र ही ' आगे [ ' अविभागो वचनात् ' यहाँ ही ] ' अविभाग ' ऐसा विशेषण क्यों देते? इसलिए यहाँ वृत्ति उपसंहारकी विवक्षा है, मनकी वृत्तिकी अवस्थिति होनेके पूर्वं वाग्वृत्तिका उपसंहार होता है, ऐसा अर्थ है । किससे? इससे कि ऐसा दर्शन होता है । मनोवृत्ति के विद्यमान होनेपर पूर्वं वाग्वृत्तिका उपसंहार देखा जाता है । किन्तु वृत्तिवाली वाणीका ही मनमें उपसंहार तो किसीसे भी नहीं देखा जा सकता है । परन्तु यह जो कहा गया है कि श्रुतिको सामथ्र्यसे यह मनमें प्रलय युक्त है । नहीं, ऐसा कहते हैं, क्योंकि अतत्प्रकृति है - वह वाणीकी प्रकृति नहीं है, जिसकी जिससे उत्पत्ति होती है उसका उसमें प्रलय युक्त है, जैसे सिकोराका मृत्तिकामें । वाणी मनसे उत्पन्न होती है, इसमें कोई प्रमाण नहीं है । वृत्तिके उद्भव और अभिभव तो अप्रकृति-अनुपादन आश्रय भी देखे जाते हैं । जैसे पार्थिव इन्धनसे तैजस अग्निकी वृत्ति उत्पन्न होती है और जलमें उपशान्त होती है । तब इस पक्ष में ' वाङ्मनसि सम्पद्यते ' यह श्रुति किसप्रकार संगत होगी? सत्यानन्दी - दीपिका उत्क्रान्तिका विचार किया जाता है । अतः इस फलाध्यायके दूसरे पादमें उपासनाकी फलसिद्धिके लिए ' वाङ्मनसि ' यह विचार संगत है । यहाँ उत्क्रान्तिके विषय में ' वाणी मनमें लीन होती है ' ऐसा कहा गया है । क्या यहाँ वाणीका स्वरूपसे मनमें लय है कि वाणीको वृत्तिका? संशय होनेका कारण यह है कि ' उच्यतेऽनेन ' ( जिससे कहा जाय ) यह करणव्युत्पत्ति और ' उक्ति इति वाक् ' ( जो कही जाय ) यह भावव्युत्पत्ति दोनों विद्यमान हैं । पूर्वपक्ष में ' वाङ्मनसि ' और ' वाङ्मनसि सम्पद्यते ' इसप्रकार सूत्र और श्रुतिके आधारपर वाणीका स्वरूपसे ही मनमें लय होता है । इसप्रकार करण-मात्रका स्वरूपसे लय होनेपर यावत् म्रियमाणकी मुक्ति सिद्ध है, सिद्धान्तमें करणोंकी वृत्तिका लय होता है, अतः म्रियमाण मुक्त नहीं होता । * सिद्धान्ती - वाणीकी वृत्तिका ही मनमें लय होता है । यद्यपि सूत्रकारने ' वाङ्मनसि ' ऐसा कहा है, तो मी यहाँ वृत्तिका ग्रहण युक्त है, क्योंकि स्वयं सूत्रकार धर्मी प्रलयकी विवक्षा में ' अविभागो-
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अधि ० २ सू ० २-३ ] भाषानुवाद सत्यानन्दी- दीपिकासहित II शब्दाच्चेति । शब्दोऽप्यस्मिन्पक्षेऽवकल्पते, वृत्तिवृत्तिमतोरभेदोपचारादित्यर्थः ॥ १ ॥
अत एव च सर्वाण्यनु ॥ २ ॥
पदच्छेद - अतः, एव, च, सर्वाणि, अनु । सूत्रार्थ - ( अत एव ) उक्त दर्शन आदि हेतुओंसे ही वाणीके समान ( सर्वाण्यनु ) समस्त चक्षु आदि इन्द्रियोंकी वृत्ति ( च ) भी वृत्तिविशिष्ट मनमें लय होती है । ‘ तस्मादुपशान्ततेजाः । पुनर्भवमिन्द्रियैर्मनसि संपद्यमानै: ' ( प्रश्न ० ३।९ ) इत्यत्राविशेषेण सर्वेषामेवेन्द्रियाणां मनसि संपत्तिः श्रूयते । तत्राप्यत एव वाच इव चक्षुरादीनामपि सवृत्तिके मनस्यवस्थिते वृत्तिलोपदर्शनात्तत्त्वप्रलयासंभवाच्छब्दोपपत्तेश्च वृत्तिद्वारे -णैव सर्वाणीन्द्रियाणि मनोऽनुवर्तन्ते । सर्वेषां करणानां मनस्युपसंहाराविशेषे सति वाचः पृथग्ग्रहणं वाङ्मनसि संपद्यत इत्युदाहरणानुरोधेन ॥२ ॥
( २ मनोऽधिकरणम् । सू ० ३ ) तन्मनः प्राण उत्तरात् ॥ ३ ॥
पदच्छेद - तत्, मनः, प्राणे, उत्तरात् । सूत्रार्थ - ( तत् ) सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी वृत्तिके लयका आधारभूत ( मनः ) वह मन भी ( प्राणे ) वृत्तिद्वारा प्राण में लीन होता है, ( उत्तरात् ) क्योंकि ' मनः प्राणे ' इस उत्तरवाक्यसे अवगत होता है । * समधिगतमेतत्- ' वाङ्मनसि संपद्यते ' ( छा ० ६/८/६ ) इत्यत्र वृत्तिसंपत्ति विवक्षेति । अथ यदुत्तरवाक्यम् - - " ' मनः प्राणे ' ( छा ० ६ १८/६ ) इति, किमत्रापि वृत्तिसंपत्तिरेव विवक्ष्यत उत वृत्तिमत्संपत्तिरिति विचिकित्सायां वृत्तिमत्संपत्तिरेवात्रेति प्राप्तम्, श्रुत्यनुग्रहान्तं-त्प्रकृतिकत्वोपपत्तेश्च । तथा हि- ' अन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणः ( छा ० ६/५/४ ) इसपर कहते हैं - ' शब्दाच्च ' शब्द श्रुति भी इस पक्षमें संभव है, क्योंकि वृत्ति और वृत्तिमानुमें अभेदका उपचार है, ऐसा अर्थ है ॥ १ ॥
' तस्मादुपशान्ततेजाः ० ' ( अतः जिसका तेज ( शारीरक ऊष्मा ) शान्त हो जाता है वह मनमें लीन हुई इन्द्रियों सहित पुनर्जन्मको प्राप्त हो जाता है ) इसमें सब इन्द्रियोंका समानरूपसे मनमें लय सुना जाता है । उसमें भी इसीसे - वाणीके समान चक्षु आदिका भी सवृत्तिक मनके अवस्थित होनेपर वृत्तिलयका दर्शन होता है, अतः तत्त्व ( स्वरूप ) प्रलयका असंभव होनेसे और शब्दोपपत्ति होनेसे सब इन्द्रियाँ वृत्तिद्वारा ही मनका अनुवर्तन करती हैं । सब इन्द्रियोंका समानरूपसे मनमें उपसंहार होनेपर ' वाङ्मनसि सम्पद्यते ' इस प्रकार वाणीका पृथक् ग्रहण उदाहरण के अनुरोधसे है ॥ २ ॥
' वाङ्मनसि सम्पद्यते ' इस श्रुतिमें वृत्तिलयकी विवक्षा है यह निश्चित किया गया है । अब जो आगेका वाक्य है ' मनः प्राणे ' ( मन प्राणमें लय होता है ) क्या यहाँ भी वृत्तिलय ही विवक्षित है अथवा वृत्तिवान्का लय विवक्षित है । इस प्रकार संशय होनेपर पूर्वपक्षी - यहाँ वृत्तिवाले मनका ही लय है, ऐसा प्राप्त होता है । कारण कि श्रुतिके अनुग्रहसे प्राण मनकी प्रकृति उपपन्न होता है । जैसे सत्यानन्दी - दीपिका वचनात् ' यह सूत्र आगे कहेंगे । यदि स्वरूपसे वाणीका लय माने तो ' अविभागो वचनात् ' इस सूत्रकी पृथक् रचना व्यर्थ होगी और तत्त्वश और अज्ञमें कोई भेद नहीं रहेगा । इसलिए म्रियमाणकी वाणीकी वृत्ति ही मनमें लय होती है ॥ १ ॥
* कार्य अपने उपादानमें लय होता है अनुपादान में नहीं, इस न्यायसे मनका प्राणमें लय नहीं किन्तु उसकी वृत्तिका लय होना चाहिए, इससे ' मनः प्राणे ' इस श्रुति और न्यायका विरोध उपस्थित
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८३६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य | अ ० ४ पा ० २ इत्यन्नयोनि मन आमनन्त्यब्योनिं च प्राणम् । ' आपश्चान्नमसृजन्त ' इति श्रुतिः! अतश्च यन्मनः प्राणे प्रलीयतेऽन्नमेव तदप्सु प्रलीयतेऽन्नं हि मन आपश्च प्राणः प्रकृतिविकाराभेदादिति । * एवं प्राप्ते ब्रूमः - तदप्यागृहीतबाह्येन्द्रियवृत्ति मनो वृत्तिद्वारेणैव प्राणे प्रलीयते इत्यु-त्तराद्वाक्यादवगन्तव्यम् । तथा हि-- सुषुप्सोर्मुमूर्षोश्च प्राणवृत्तौ परिस्पन्दात्मिकायाम-वस्थितायां मनोवृत्तीनामुपशमो दृश्यते । नच मनसः स्वरूपाप्ययः प्राणे संभवति, अतत्प्रकृतित्वात् । ननु दर्शितं मनसः प्राणप्रकृतित्वम् - नैतत्सारम्, न हीदृशेन प्राणाडि -केन तत्प्रकृतित्वेन मनः प्राणे संपत्तुमर्हति । एवमपि हान्ने मनः संपद्येताप्सु चान्नमप्स्वेव च प्राणः । न ह्येतस्मिन्नपि पक्षे प्राणभावपरिणताभ्योऽद्भूयो मनो जायत इति किंचन प्रमाणमस्ति, तस्मान्न मनसः प्राणे स्वरूपाप्ययः । वृत्त्यप्ययेऽपि तु शब्दोऽवकल्पते, वृत्तिवृत्तिमतोरभेदोपचारादिति दर्शितम् ॥ ३ ॥
( ३ अध्यक्षाधिकरणम् । सू ० ४-६ ) सो s ध्यक्षे तदुपगमादिभ्यः ॥ ४ ॥
कि ' अन्नमयं हि सोम्य ० ' ( हे सोम्य! मन अन्नमय है और प्राण जलमय है ) इस प्रकार अन्न कारणक मन और जल कारणक प्राण है ऐसा श्रुति कहती है । और ' आपश्चान्नमसृजन्त ' ( जलने अन्न उत्पन्न किया ) ऐसी श्रुति है । इस कारण मनका जो प्राणमें विलय होता है वह अन्नका ही जलमें लय होता है, मन ही अन्न है और प्राण ही जल है, क्योंकि प्रकृति और विकारका अभेद है । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - तो भी बाह्य इन्द्रियोंकी वृत्तिको ग्रहण करनेवाला मन वृत्तिद्वारा ही प्राणमें लय होता है, ऐसा उत्तर वाक्य ( मनः प्राणे ) से जानना चाहिए, क्योंकि सुषुप्सु और मुमूर्षु पुरुषकी चलनात्मक प्राणवृत्तिके अवस्थित होनेपर मनकी वृत्तियोंका उपशम देखा जाता है । इसलिए मनका प्राणमें स्वरूप लय नहीं हो सकता, क्योंकि सतत्प्रकृति है - प्राण मनकी प्रकृति नहीं है । परन्तु ऐसा दिखलाया गया है कि प्राण मनकी प्रकृति है? उसमें कोई सार नहीं है, क्योंकि इस प्रकारकी परम्परा प्रणालीसे प्राण मनकी प्रकृति होनेसे मनका प्राणमें लय होना युक्त नहीं है । परन्तु ऐसी परम्परा प्रणाली होनेपर भी मन अन्न में लय हो, और अन्न जलमें और प्राण जलमें लय होना चाहिए । इस पक्ष में भी प्राणरूपसे परिणत जलसे मन उत्पन्न होता है, इसमें कोई प्रमाण नहीं हैं | इसलिए मनका प्राणमें स्वरूप लय नहीं है । वृत्तिका लय होनेपर भी तो [ मनः प्राणे ] यह श्रुति उपपन्न होती है, क्योंकि वृत्ति और वृत्तिमान्का अभेदोपचार है, ऐसा दिखलाया गया है || ३ || सत्यानन्दी - दीपिका होनेपर संशय होता है । पूर्वपक्षी - मनका स्वरूपसे ही प्राणमें लय होना चाहिए, क्योंकि ऐसा होनेसे श्रुति और न्याय दोनोंकी उपपत्ति होती है । जैसे कि अन्न मनकी प्रकृति है और जल अन्नकी प्रकृति है । प्राण जलका विकार है और मन अन्नका है । इस प्रकार प्रकृति और विकारका अभेद होनेसे मन अन्नात्मक है और प्राण जलात्मक है । जैसे जल अन्नात्मक मनकी परम्परा प्रकृति है, वैसे जलात्मक प्राण भी मनकी प्रकृति है । इसप्रकार श्रुति और न्यायका अविरोध होनेसे मनका प्राणमें लय युक्त है । सिद्धान्ती - ' आपोऽन्नमसृजन्त ' इससे जल और अन्नका केवक कार्य - कारणभाव सिद्ध होता है न कि उनके विकार प्राण और मनका भी । यदि इस कारणप्रणालीसे जल और अन्नके विकार प्राण और मनका भी प्रकृति - विकृतिभाव माना जाय तो जल और पृथिवीके विकार हिम और घटका भी प्रकृति - विकारभाव होने से अतिप्रसङ्ग होगा । जिस विकारका जो साक्षात् उपादान होता है वह उसमें लय होता है अन्य में नहीं, इसलिए इस न्यायसे श्रुत्यर्थंका बाधकर मन पदसे लक्षणा द्वारा मनकी वृत्तिका ग्रहण करना चाहिए ॥ ३ ॥