श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 861–870
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 861–870
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अधि ० ३ सू ० ४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८२७ पदच्छेद - सः, अध्यक्षे, तदुपगमादिभ्यः । सूत्रार्थ - ( सः ) वह प्राण वृत्तिरहित होकर ( अध्यक्षे ) जीवात्मामें अवस्थित होता है, ( तदुपगमादिभ्यः ) क्योंकि जीवमें प्राणके उपगम, अनुगम और अवस्थान श्रुत हैं । * स्थितमेतत् - यस्य यतो नोत्पत्तिस्तस्य तस्मिन्वृत्तिप्रलयो न स्वरूपप्रलय इति । इदमिदानीं प्राणस्तेजसीत्यत्र चिन्त्यते - किं यथाश्रुति प्राणस्य तेजस्येव वृत्त्युपसंहार, किं वा देहेन्द्रियपञ्जराध्यक्षे जीवे इति । तत्र श्रुतेरनतिशङ्कयत्वात्प्राणस्य तेजस्येव संपत्तिः स्यात्, अश्रुतकल्पनाया अन्याय्यत्वादिति । एवं प्राप्ते प्रतिपाद्यते - सोऽध्यक्ष इति । स प्रकृतः प्राणोऽध्यक्षेऽविद्याकर्म पूर्वप्रज्ञोपाधिके विज्ञानात्मन्यवतिष्ठते । तत्प्रधाना प्राणवृत्तिर्भवतीत्यर्थः । कुतः? तदुपगमादिभ्यः । एवमेवे ममात्मानमन्तकाले सर्वे प्राणा अभिसमायन्ति यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवति ' इति हि श्रुत्यन्तरमध्यक्षोपगामिनः सर्वान्प्राणान-विशेषेण दर्शयति । विशेषेण च ' तमुक्रामन्तं प्राणोऽनुत्क्रामति ' ( बृह ० ४।४।२ ) इति पञ्चवृत्तेः प्राणस्याध्यक्षानुगामितां दर्शयति, तदनुवृत्तितां चेतरेषाम् ' प्राणमनूक्रामन्तं सर्वे प्राणा अनूक्रामन्ति ' ( बृह ० ४ । ४ । २ ) इति । ' सविज्ञानो भवति ' इति चाध्यक्ष स्यान्त विज्ञानवत्त्व-प्रदर्शनेन तस्मिन्नपीतकरण ग्रामस्य प्राणस्यावस्थानं गमयति । ननु ' प्राणस्तेजसि ' इति श्रूयते, कथं प्राणोऽध्यक्षे इत्यधिकावप क्रियते? नैष दोषः, अध्यक्ष प्रधानत्वादुत्क्रमणा-दिव्यवहारस्य, श्रुत्यन्तरगतस्यापि च विशेषस्यापेक्षणीयत्वात् ॥४ ॥
यह सिद्ध हुआ कि जिसकी जिससे उत्पत्ति नहीं होती उसका उसमें वृत्तिलय होता है स्वरूप लय नहीं । अब ' प्राणस्तेजसि ' ( प्राण तेजमें लोन होता है ) इस श्रुति वाक्यपर यह विचार किया जाता है कि क्या श्रुति अनुसार प्राणका तेजमें ही वृत्तिलय होता है अथवा देह, इन्द्रियरूप पञ्जरके अध्यक्ष जीवमें वृत्तिलय होना है? पूर्वपक्षी — उसमें श्रुतिके विषय में अतिशङ्का युक्त न होनेसे प्राणका तेजमें ही लय होना चाहिए, क्योंकि अश्रु तकी कल्पना अन्याय है । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर प्रतिपादन करते हैं - ' सोऽध्यक्षे ' वह प्रकृत प्राण अविद्या, कर्म और पूर्वप्रज्ञारूप उपाधिवाले विज्ञान-स्वरूप अध्यक्ष में अवस्थित होता है । वह अध्यक्ष प्रधान प्राणवृत्ति होती है, ऐसा अर्थ है । किससे? इससे कि उसके उपगमादि हैं । ' एवमेवे ममात्मानमन्तकाले ० ' ( इसीप्रकार अन्तकालमें जब वह ऊर्ध्वो-च्छ्वासी होता है तब सब वाक् आदि प्राण इस आत्माके अभिमुख जाते हैं ) यह दूसरी श्रुति अवि-शेषसे सब प्राणोंको अध्यक्षोपगामी दिखलाती है । बौर ' तमुक्रामन्तं ० ' ( उसके उत्क्रमण करनेपर उसके पीछे ही प्राण उत्क्रमण करता है ) यह श्रुति वाक्य विशेषरूपसे पाँच वृत्तिवाले प्राण में अध्यक्षकी अनुगामिता दिखलाता है । और ' प्राणमनुत्क्रामन्तं ० ' ( जीवके पीछे प्राणके उत्क्रमण करनेपर उसके पीछे सब वागदि प्राण उत्क्रमण करते हैं ) इसप्रकार अन्य प्राणोंमें उस प्राणकी अनुवृत्तिता दिख-लाता है । ' सविज्ञानो भवति ' ( तब यह विज्ञानवाला होता है ) इस प्रकार अध्यक्षमें अन्तविज्ञानवत्त्व प्रदर्शन से उसमें विलय करण समुदायवाले प्राणका अवस्थान बोधन करती है । परन्तु ' प्राणस्तेजसि ' ऐसी श्रुति है तब ' प्राण अध्यक्ष में लोन होता है ' यह अधिक ग्रहण क्यों किया जाता है? यह दोष नहीं है, क्योंकि उत्क्रमण आदि व्यवहार अध्यक्ष प्रधान है और अन्य श्रुतिगत विशेषकी भी अपेक्षा होनी चाहिए ॥४ ॥
सत्यानन्दी दीपिका * अब उक्त न्यायसे प्राणवृत्तिलयके विषय में विचार किया जाता है — ' प्राणस्तेजसि ' यह श्रुति प्राणका तेजमें और ' एवमेवेममात्मानमन्तकोले ' इत्यादि श्रुतियाँ उपगमन आदि हेतुओंसे जीव में लय कहती हैं । इन दोनों प्रकारकी श्रुतियोंके विद्यमान होनेपर संशय होता है । पूर्वपक्षी ' प्राणस्तेजसि ' आदिसे कहते हैं । सिद्धान्ती - इस प्रकृत प्राणकी वृत्ति जीवात्मा में ही लय होती है,
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II ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० २ कथं तर्हि ' प्राणस्तेजसि ' इति श्रुतिरित्यत आह-भूतेषु तच्छ्रुतेः ॥ ५ ॥
पदच्छेद – भूतेषु तच्छ्रतेः । C सूत्रार्थ - ( भूतेषु ) प्राण संयुक्त वह अध्यक्ष तेजके सहचारी देहके बीजभूत सूक्ष्म भूतों में अवस्थित होता है ( तच्छू ते: ) क्योंकि ' प्राणस्तेजसि ' ऐसी श्रुति है । 6 * स प्राणसंपृक्तोऽध्यक्षस्तेजः सहचरितेषु भूतेषु देहबीजंभूतेषु सूक्ष्मेष्ववतिष्ठत इत्यवगन्यव्यम् । ‘ प्राणस्तेजसि ' इति श्रुतेः । ननु चेयं श्रुतिः प्राणस्य तेजसि स्थिति दर्श-यति, न प्राणसंपृक्तस्याध्यक्षस्य -- नैब दोषः, सोऽध्यक्षे इत्यध्यक्षस्याप्यन्तराल उपसंख्या-तत्वात् । योऽपि हि स्रुघ्नान्मथुरां गत्वा मथुरायाः पाटलिपुत्रं व्रजति, सोऽपि स्रुघ्नात्पा-टलिपुत्र यातीति शक्यते वदितुम् । तस्थात् ' प्राणस्तेजसी ' ति प्राणसंपृक्तस्याध्यक्षस्यैवै-तत्तेजः सहचरितेषु भूतेष्ववस्थानम् ॥ ५ ॥
कथं तेजः सहचरितेषु भूतेष्वित्युच्यते? यावतैकमेव तेजः श्रूयते ' प्राणस्तेजसी ' ति । अत आह-तब ' प्राणस्तेजसि ' यह श्रुति कैसे है अर्थात् इसका क्या अर्थ है? इसपर कहते हैं-प्राण संयुक्त वह जीवात्मा तेज सहचरित देहके बीजभूत सूक्ष्मभूतों में अवस्थित होता है, ऐसा जानना चाहिए | क्योंकि ' प्राणस्तेजसि ' ( प्राण तेजमें लीन होता है ) ऐसी श्रुति है । परन्तु यह श्रुति प्राणकी तेजमें स्थिति दिखलाती है न कि प्राणसम्बद्ध जीवात्माकी? यह दोष नहीं है, कारण कि ' सोऽध्यक्षे ' इस प्रकार अध्यक्षका मी मध्य में कथन है । जो भी सुध्नये मथुरा जाकर मथुरासे पाटलिपुत्र जाता है वह भी सुध्नसे पाटलिपुत्र जाता है, ऐसा कहा जा सकता है । इसलिए ' प्राणस्तेजसि ' इससे प्राण सम्बद्ध जीवका भी तेज सहचरित भूतोंमें यह अवस्थान है || ५ || परन्तु तेज सहचारी भूतोंमें जीवकी अवस्थिति है यह कैसे कहा जाता है जब कि ' प्राणस्तेजसि ' इस प्रकार एक ही तेजकी श्रुति है? इसपर कहते हैं- - ~ सत्यानन्दो- दीपिका क्योंकि जीवप्रधान ही प्राण वृत्ति होती हैं । जबतक जीव शरीरमें. विद्यमान है तबतक प्राणकी श्वासोच्छ्वासरूप वृत्ति शरीर में रहती है अन्यथा नहीं । अब इसको उपगमन आदि श्रुतिद्वारा दिखलाया जाता है - ' एवमेवेममात्मानमन्तकाले ' यह श्रुति जीवात्मा के प्रयाणकालमें वाणी आदि सम्पूर्ण प्राणों का उसके प्रति उपगमन - अभिमुखत्व दिखलाती है । जैसे राजाकी यात्रा में साथ चलनेवाले सभो सेवक उसके प्रति अभिमुख हो जाते हैं और प्रस्थान करनेपर पीछे - पीछे चलते हैं । इसप्रकार ' तमुत्क्रामन्तं •, यह श्रुतिवाक्य प्राणको विशेषरूपसे जीवात्माका अनुगामी बतलाता है । और ' प्राणमनूत्क्रामन्तं ० यह श्रुतिवाक्य वागादि प्राणोंमें विशेषरूप से प्राणकी जीवात्मा के प्रति अनुगमन वृत्तिता दिखलाता है । इस प्रकार ' सविज्ञानो भवति ' यह श्रुतिकरणों सहित प्राणको जीवात्मामें अवस्थिति दिखलाती है । यद्यपि ' प्राणस्तेजसि ' यह श्रुति प्राणवृत्तिका तेजमें लय कहती है, तो मी प्राण आदिका उत्क्रमण आदि व्यवहार देह आदिके अध्यक्ष जीवात्मा के अधीन होता है । इस हेतुसे और ' तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूक्रामति ' इस अन्य श्रुतिमें विशेष कथन भी अपेक्षणीय होनेसे प्राणवृत्तिका जीवात्मा में ही लय होता है ॥ ४ ॥
* यद्यपि ‘ प्राणस्तेजसि ' इस श्रुति वाक्यसे प्राणवृत्तिका तेजमें लय प्रतीत होता है, तो भी सर्वं शाखाओंके विश्वारसे तेज शब्दसे उपलक्षित तेज सहचारी देहके हेतुभूत सूक्ष्म पांच भूतोंके स्वामी जीवका ग्रहण है, उसमें प्राणवृत्ति लय होती है । परन्तु ऐसा माननेपर उक्त श्र ुतिका क्या अर्थ
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अधि ० ३ सू ० ६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८२ ९ नैकस्मिन्दर्शयतो हि ॥ ६ ॥
पदच्छेदन एकस्मिन् दर्शयतः हि । सूत्रार्थ - ( एकस्मिन् ) जीवकी उत्क्रमण कालमें एक ही तेजमें अवस्थिति ( न ) नहीं है, किन्तु देहके पाँच भौतिक होनेसे उसकी पाँच भूतों में स्थिति है, ( हि ) क्योंकि ( दर्शयतः ) श्रुति और स्मृति इसी अर्थको दिखलाती हैं । * नैकस्मिन्नेव तेजसि शरीरान्तरप्रेप्सा वेलायां जीवोऽवतिष्ठते, कार्यस्य शरीरस्थाने-कात्मकत्वदर्शनात् । दर्शयतश्चैतमर्थ प्रश्नप्रतिवचने ' आपः पुरुषवचसः ' ( छा ० ५।३।३ ) इति । तद्व्याख्यातम् -'त्र्यात्मकत्वात्तु भूयस्त्वात् ' ( ब्रह्मसूत्र २।१।२ ) इत्यत्र । श्रुतिस्मृती चैतमर्थ दर्शयतः । श्रुतिः - पृथिवीमय आपोमयो वायुमय आकाशमयस्तेजोमयः ' इत्याद्या | स्मृतिरपि -' अण्व्यो मात्राऽविनाशिन्यो दशार्धानां तु याः स्मृताः । ताभिः सार्धमिदं सर्वं संभवत्यनुपूर्वशः ' इत्याद्या । ननु चोपसंहृतेषु वागादिषु करणेषु शरीरान्तरप्रेप्सावेलायां ' कार्य तदा पुरुषो भवति ' ( बृह ० ३।२।१३ ) इत्युपक्रम्य श्रुत्यन्तरं कर्माश्रयतां निरूपयति- ' तौह यदूचतुः कर्म हैव तदूचतुरथ ह यत्प्रशशंसतुः कर्म हैव तत्प्रशशंसतुः ' ( बृह ० ३।२।१३ ) इति । अत्रोच्यते - तत्र कर्मप्रयुक्तस्य ग्रहातिग्रहसंज्ञकस्येन्द्रिय विषयात्मकस्य बन्धनस्य प्रवृत्तिरिति कर्माश्रय-तोक्ता, इह पुनर्भूतोपादानाद्देहान्तरोत्पत्तिरिति भूताश्रयत्वमुक्तम् । प्रशंसाशब्दादपि तत्र प्राधान्यमात्रं कर्मणः प्रदर्शितम्, नत्वाश्रयान्तरं निवारितम्, तस्मादविरोधः ॥ ६ ॥
अन्य शरीर प्राप्त करनेकी इच्छा के समय जोव एक ही तेजमें अवस्थित नहीं होता, क्योंकि कार्यं शरीर अनेकात्मक देखने में आता है । ' आपः पुरुषवचसः ' ( आप- सोम घृतादि - ' पुरुष ' संज्ञाको कैसे प्राप्त होता है ) यह प्रश्न और उत्तर इस अर्थको दिखलाता है । इसका ' ध्यात्मकत्वात्तु ० ' इस सूत्रमें व्याख्यान किया गया है । श्रुति और स्मृति भी इस अर्थको दिखलाती हैं । ' पृथिवीमय ० ' ( पृथिवीमय, आपोमय, वायुमय, आकाशमय और तेजोमय ) इत्यादि श्रुति है । खोर ' अण्ण्यो ० ' ( मोक्ष पर्यन्त पाँच भूतोंके जो सूक्ष्म अविनाशी माग कहे गये हैं, उनके साथ यह सब क्रमसे उत्पन्न होते हैं ) इत्यादि स्मृति भी है । परन्तु शरीरान्तर प्राप्त करनेकी इच्छाके समय वाक् आदि इन्द्रियों का आत्मा में उपसंहार होनेपर ' क्वायं पुरुषो ० ' ( आर्तभाग- उस समय यह पुरुष कहाँ रहता है ) ऐसा आरम्भकर ' तो ह यदूचतुः ० ' ( तब याज्ञवल्क्य और आतंभाग दोनोंने उठकर एकान्तमें विचार किया । उन्होंने जो कुछ कहा वह कर्म ही कहा, तथा जिसकी प्रशंसा की वह कर्मकी प्रशंसा की ) इस प्रकार दूसरी श्रुति आत्माको कर्माश्रयता निरूपण करती है । इसपर कहते हैं - उसमें कमं प्रयुक्त ग्रह और अतिग्रह नामक इन्द्रिय और विषयात्मक बन्धनकी प्रवृत्ति होती है, अतः कर्म आश्रयरूपसे कहा गया है । और यहाँ तो भूतोपादानसे अन्य देहकी उत्पत्ति होती है, इसलिए भूताश्रयत्व कहा गया है । वहाँ प्रशंसाशब्द से भी प्राधान्यमात्र कर्मको दिखलाया गया है अन्य आश्रयका निवारण नहीं किया गया है, इससे कोई विरोध नहीं है ॥ ६ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका होगा? इसमें ' सो s पि ' आदिसे उदाहरण देते हैं । यह प्राण भी प्रथम अध्यक्षको प्राप्त होकर उसके द्वारा तेजको प्राप्त होता है, तो ऐसा उपपन्न होता है कि ' प्राण तेजमें लीन होता है ' इस प्रकार सूत्र और श्रुतिके बलसे प्राणवृत्तिका जीवात्मामें लय युक्त है ॥ ५ ॥
* ' वायं तदा पुरुषो भवति ' इस प्रश्नके उत्तर में ' तौ ह यदूचतुः ' यह श्रुति कर्माश्रयता कहती है और देहका उपादानरूपसे पाँच भूत आश्रय हैं । इस प्रकार दोनोंको भिन्न - भिन्नरूपसे आश्रयत्व प्राप्त
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८३० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० २ ( ४ आत्युपक्रमाधिकरणम् । सू ०७ ) समाना चामृत्युपक्रमादमृतत्वं चानुपोष्य ॥ ७ ॥
पदच्छेद - समाना, च, आसृत्युपमक्रमात् अमृतत्वम्, च, अनुपोष्य । सूत्रार्थ - ( आमृत्युपक्रमात् ) देवयान मार्गके उपक्रमसे पूर्व विद्वान् और अविद्वानकी ( समाना ) उत्क्रान्ति समान है, क्योंकि ' वाङ्मनसि ' यह अविशेष श्रुति है, और सगुण विद्यामें ( अमृतत्वं चानुपोष्य ) जो अमृतत्व है वह अपेक्षित है । * सेयमुत्क्रान्तिः किं विद्वदविदुषो ' समाना, किं वा विशेषवतीति विशयानानां विशेषवतीति तावत्प्राप्तम् । भूताश्रयविशिष्टा होषा । पुनर्भवाय च भूतान्याश्रीयन्ते । नच विदुषः पुनर्भवः संभवति । ' अमृतत्वं हि विद्वानश्नुते ' इति स्थितिः । तस्मादविदुष एवैषोत्क्रान्तिः । ननु विद्याप्रकरणे समाम्नानाद्विदुष एवैषा भवेत् न, स्वापादिवद्यथाप्राप्तानुकीर्तनात् । यथा हि यत्रतत्पुरुषः स्वपिति नाम ', ' अशिशिषति नाम ', ' पिपासति नाम ' ( छा ० ६/८/१, ३, ५ ) इति च सर्वप्राणिसाधारणा एव स्वापादयोऽनुकीर्त्यन्ते विद्याप्रकणेऽपि प्रतिपिपादयिषितवस्तुप्र तिपादनानुगुण्येन, नतु विदुषो विशेषवन्तो विधित्स्यन्ते । एवमियमप्युत्क्रान्तिर्महाजनगतै -वानुकीर्त्यते, यस्यां परस्यां देवतायां पुरुषस्य प्रयतस्तेजः संपद्यते स आत्मा तत्त्वमसीत्येत-त्प्रतिपादयितुम् । प्रतिषिद्धा चैषा विदुषः - ' न तस्य प्राणा उत्कामन्ति ' ( बृ ० ४।४।६ ) इति । क्या यह पूर्वोक्त उत्क्रान्ति विद्वान् और अविद्वान्की समान होती है अथवा क्या विशेष युक्त होती है? पूर्वपक्षी - ऐसा सन्देह करनेवालोंके मतमें विशेष युक्त होती है, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि यह उत्क्रान्ति भूताश्रय विशिष्ट है । और पुनर्जन्मके लिए भूतोंका आश्रय किया जाता है । और विद्वानका पुनर्जन्म संभव नहीं है । क्योंकि ' अमृतत्वं हि विद्वानश्नुते ' ( विद्वान् मोक्षको प्राप्त होता है ) ऐसी श्रुति है । इसलिए यह उत्क्रान्ति अविद्वान्को ही है । परन्तु विद्या के प्रकरण में इसका श्रवण होनेसे यह उत्क्रान्ति विद्वान्की ही होनी चाहिए? नहीं, कारण कि स्वाप आदिके समान यहाँ पर यथाप्राप्तका अनुकीर्तन है । जैसे कि ' यत्रैतत्पुरुषः ' ( जिस अवस्थामें यह पुरुष ' सोता है ' ऐसा कहा जाता है, जिस समय यह भोजन करना चाहता है, पीना चाहता है ) इस प्रकार विद्याके प्रकरणमें मी प्रतिपादन के अमोप्सित वस्तुके प्रतिपादनके अनुगुणसे सर्वप्राणी साधारण ही स्वाप आदि कहे जाते हैं न कि विद्वान् के लिए विशेषरूपसे विधान करना अभीष्ट है, इस प्रकार जो जिस परदेवतामें प्रयाण करनेवाले पुरुषका तेज सम्पन्न होता है ' वह आत्मा है वह तू है ' उसे प्रतिपादन करनेके लिए महाजन-जनसाधारणगत ही इस उत्कान्तिका अनुकीर्तन है । ' न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ' ( उसके प्राण सत्यानन्दी - दीपिका होनेसे दोनों श्रुतियोंमें कोई विरोध नहीं है ॥ ६ ॥
* इस प्रकार प्रयाण समय प्रथम बाह्येन्द्रियोंका मनमें वृत्तिलय होता है, पश्चात् बाह्येन्द्रिय-वृत्तिसहित मनोवृत्तिका प्राण में और प्राणवृत्तिका तेज सहचारी भूतोपाधि विशिष्ट जीवमें लय होता है । इसप्रकार उत्क्रान्तिकी व्यवस्था कही गई है । वह सब प्राणियोमें समान है । यह ' समाना च ' इत्यादि से कहते हैं । ' अस्य सोम्य पुरुषस्य प्रयतो वाङ्मनसि सम्पद्यते ' ( छा ० ६।८।६ ) ( हे श्वेतकेतु! प्रयाण करनेवाले इस पुरुषकी प्रथम वाणीकी वृत्ति मनमें लय होती है ) यह श्रुति विद्वान् और अविद्वान्का समानरूपसे उत्क्रमण प्रकार कहती है । और ' विद्ययाऽमृतमश्नुते ' यह श्रुति विद्वान् के उत्क्रमणका निषेध करती हैं । इस प्रकार दोनों श्रुतियोंका परस्पर विरोध होनेसे संशय होता है कि विद्वान् और व्यविद्वान्को उत्क्रान्ति समान होती है अथवा कुछ विषमता है? पूर्वपक्षी - सगुण ब्रह्मज्ञानवाले
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अधि ० ५ सू ० ८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दो- दीपिकासहित ८३१ तस्मादविदुष एवैषेति । * एवं प्राप्ते ब्रूमः M समाना चैोत्कान्तिर्वाङ्मनसीत्याद्या विद्वद-विदुषोरासृत्युपक्रमाद्भवितुमर्हति अविशेषश्रवणात् । अविद्वान्देहवीजभूतानि भूत-सूक्ष्माण्याश्रित्यकर्मप्रयुक्तो देहग्रहणमनुभवितुं संसरति, विद्वांस्तु ज्ञानप्रकाशितं मोक्ष-नाडीद्वारमाश्रयते । तदेतत् - आमृत्युपक्रमादित्युक्तम् । नन्वमृतत्वं हि विदुषा प्राप्तव्यम्, नच तद्देशान्तरायत्तम्, तत्र कुतो भूताश्रयत्वं मृत्युपक्रमो वेति? अत्रोच्यते - अनुपोष्य चेदम्, अदग्ध्वाऽत्यन्तमविद्यादीन्क्लेशात पर विद्यासामर्थ्यादापेक्षिकममृतत्वं प्रेप्सते, संभवति तत्र मृत्युपक्रमो भूताश्रयत्वं च । नहि निराश्रयाणां प्राणानां गतिरुपपद्यते । तस्माददोषः ॥ ७ ॥
( ५ संसारव्यपदेशाधिकरणम् । सू ० ८-११ ) तदाऽऽपीतेः संसारव्यपदेशात् ॥ ८ ॥
पदच्छेद - तद्, आपीतेः संसारव्यपदेशात् । सूत्रार्थ - ( तत् ) वह तेज आदि सूक्ष्मभूत ( आपीते 1 ) मोक्ष पर्यंन्त रहते हैं, ( संसार-व्यपदेशात् ) क्योंकि ' योनिमन्ये ' इत्यादिस संसारका व्यपदेश है । उत्क्रमण नहीं करते ) इस प्रकार यह उत्क्रान्ति विद्वानमें प्रतिषिद्ध है । इसलिए यह उत्क्रान्ति fant ही है | सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - ' वाङ्मनसि ' ( वाणी मनमें लोन होती है ) इत्यादि यह उत्क्रान्ति विद्वान् और अविद्वान् दोनोंकी मार्गके आरम्भ तक समान होनी चाहिए, क्योंकि उसका समानरूपसे श्रवण है । यविद्वान् देहके बीजरूप भूतसूक्ष्मोंका आश्रयकर कर्मसे प्रयुक्त हुआ देह ग्रहणकर अनुभव करनेके लिए संसार में आता है । विद्वान् तो सगुण ब्रह्मज्ञानसे आलोकित हुए मोक्षनाड़ीके द्वारका आश्रयण करता है । यह ' आसत्युपक्रमात् ' इस सूत्रावयवसे कहा गया है । परन्तु विद्वान्को तो अमृतत्व प्राप्त होना चाहिए वह अन्य देशके अधीन नहीं है, तो पुनः उस विद्वान् के लिए भूतोंका गाश्रय अथवा मार्गका उपक्रम कैसे? सि ० - इसपर कहते हैं - यह अमृतत्व आपेक्षिक है । उपासक अविद्या आदि क्लेशोंको अत्यन्त दग्ध न कर अपरविद्या सगुण ब्रह्मविद्याकी सामर्थ्य आपेक्षिक मार्गका उपक्रम और इसलिए दोष नहीं है विद्वानकी उत्क्रान्ति और ' न तस्य प्राणा * सिद्धान्ती अमृतत्व प्राप्त करना चाहता है । इसलिए उस अवस्थामें उस विद्वानके लिए भूतोंका आश्रय संभव है, क्योंकि निराश्रय प्राणोंकी गति उपपन्न नहीं होती, ॥ ७ ॥
सत्यानन्दी -दीपिका नहीं होती है किन्तु उसकी मुक्ति हो जाती है । क्योंकि ' विद्ययाऽमृतमश्नुतें ' उत्क्रामन्ति ' इत्यादि श्रुति प्रमाण है । अतः अविद्वान्की ही उत्क्रान्ति होती है । - ' वाङ्मनसि ' यह श्रुति विद्वान् और अविद्वान् दोनोंकी समानरूपसे उत्क्रान्ति कहती है । यह समान उत्क्रान्ति मार्गके उपक्रम तक है और उपक्रम अचिरादिसे होता है । भेद इतना है कि सगुण ब्रह्मोपासक उपासना से प्रकाशित मोक्ष नाड़ी - मूर्धन्य नाड़ीका आश्रयकर ब्रह्मलोकमें जाता है, अविद्वान् इस प्रकार नहीं जाता । और ' तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति ' इस श्रुतिसे विद्वान के लिए जो अमृतत्व कहा गया है, वह आपेक्षिक है, क्योंकि ' यं कामं कामयते सोऽस्य सङ्कल्प देव समुत्तिष्ठति ' वह उपासक जिस मोगकी कामना करता है वह उसके संकल्पमात्र से ही समुपस्थित हो जाता है ) यह श्रुति उसके लिए भोगका कथन करती है । ' आभूतसम्प्लवममृतत्वं प्रचक्षते ' ( भूतोंके प्रलयपर्यन्त ब्रह्मलोक आदिकी प्राप्तिको अमृतत्व कहते हैं ) इसलिए ब्रह्मलोक आदिकी प्राप्ति सापेक्षिक अमृतत्व है I | और ' अमृतत्वं हि विद्वानश्नुते ' ' विद्ययाऽमृतमश्नुते ' इत्यादि श्रुतियोंसे जो असृतत्वका प्रतिपादन है, वस्तुतः वह निर्गुणविद्या - ब्रह्मात्मैकत्व जाननेवाले विद्वानके लिए है । उसके लिए ही ' न तस्य प्राणा
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८३२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० २ * ' तेजः परस्यां देवतायाम् ' ( छा ० ६८६ ) इत्यत्र प्रकरणसामर्थ्यात्तद्यथाप्रकृतं तेजः साध्यक्षं सप्राणं सकरणग्रामं भूतान्तरसहितं प्रयतः पुंसः परस्यां देवतायां संपद्यत इत्येत-दुक्तं भवति । कीदृशी पुनरियं संपत्तिः स्यादिति चिन्त्यते । तत्रात्यन्तिक एव तावत्स्व-रूपप्रविलय इति प्राप्तम्, तत्प्रकृतित्वोपपत्तेः । सर्वस्य हि जनिमतो वस्तुजातस्य प्रकृतिः परा देवतेति प्रतिष्ठापितम् । तस्मादात्यन्तिकीयम विभागापत्तिरिति । एवं प्राप्ते ब्रमः- तत्तेज आदि भूतसूक्ष्मं श्रोत्रादिकरणाश्रयभूतमाऽऽपीतेरासंसारमोक्षात्सम्यग्ज्ञान-निमित्तादवतिष्ठते । ' योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः । स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथा-श्रुतम् ' ( कठ ० ५/७ ) इत्यादिसंसारव्यपदेशात् । अन्यथा हि सर्वः प्रायणसमय एवोपाधि-प्रत्यस्तमयादत्यन्तं ब्रह्म संपद्येत । तत्र विधिशास्त्रमनर्थकं स्याद्विद्याशास्त्रं च । मिथ्याज्ञान-निमित्तश्च बन्धो न सम्यग्ज्ञानादृते विस्रंसितुमर्हति । तसात्तत्प्रकृतित्वेऽपि सुषुप्तिप्रलय-वद्बीजभावावशेषैवैषा सत्संपत्तिरिति ॥ ८ ॥
सूक्ष्मं प्रमाणतश्च तथोपलब्धेः ॥ ९ ॥
पदच्छेद - सूक्ष्मम्, प्रमाणतः, च, तथा, उपलब्धेः । सूत्रार्थ - अन्य भूतों सहित वह तेज प्रमाणतः ) प्रमाणसे ( च ) और ( स्वरूपतः ) स्वरूपसे ( सूक्ष्मम् ) सूक्ष्म है, ( तथोपलब्धेः ) क्योंकि इसप्रकार ही उपलब्ध होता है । ' तेजः परस्यां देवतायाम् ' ( तेज परदेवतामे लीन होता है ) इस वाक्य में प्रकरणकी सामर्थ्यंसे उस प्रयाण करनेवाले पुरुषका जो प्रकृत तेज है वह अध्यक्ष सहित प्राणं सहित, करणग्राम सहित भूतान्तरसहित परदेवतामें लीन होता है ऐसा कहा जा चुका है । परन्तु यह संपत्ति किस प्रकार की होनी चाहिए? इसका विचार किया जाता है । पूर्वपक्षी — ऐसी शङ्का होनेपर आत्यन्तिक ही स्वरूप विलय है, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि वह परदेवता उस तेजकी प्रकृति हो सकता है । बोर सब उत्पन्न होनेवाले वस्तु समुदायकी परदेवता प्रकृति है, ऐसा प्रतिष्ठापित किया गया है । इसलिए यह अविभागापत्ति आत्यन्तकी है । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - वह तेज आदि सूक्ष्मभूत श्रोत्र आदि करणोंके आश्रयरूप सम्यग्ज्ञान निमित्तक संसार मोक्ष पर्यन्त अवस्थित होते हैं, क्योंकि ' योनिमन्ये ० ' ( कुछ अविद्यावान् मूढ जीव अपने कर्म और ज्ञानके अनुसार शरीर धारण करनेके लिए वीरूप बीजसे संयुक्त होकर योनिद्वारको प्राप्त होते हैं किसी योनिमें प्रविष्ट हो जाते हैं और कुछ अधम जीव मरकर स्थावरभावको प्राप्त होते हैं ) इत्यादि संसारका व्यपदेश है । अन्यथा— यदि स्वरूपतः भूतोंका लय माना जाय तो प्रयाणके समयमें ही उपाधिके अस्तमयसे सब ब्रह्मके साथ अत्यन्त सम्पन्न हो जायंगे । ऐसा होनेपर विधिशास्त्र और विद्याशास्त्र अनर्थक हो जायंगे । मिथ्याज्ञान ' निमित्तक बन्ध सम्यग्ज्ञानके विना विच्छिन्न नहीं हो सकता है । इसलिए परदेवता तेजकी प्रकृति होनेपर मी सुषुप्ति और प्रलयके समान बीजभाव अवशेष ही यह सत्संपत्ति है ॥ ८ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका उत्क्रामन्ति ' यह श्रुति देहसे प्राणोत्क्रान्तिका निषेध करती है । इसलिए विद्याके प्रकरण में ' वाङ्मनसि ' यह श्रुति कही गई है, वह उपासक और अनुपासक दोनोंके लिए समानरूपसे उत्क्रान्ति कहती है ॥७ ॥
* पूर्व अधिकरणमें विद्वान् और अविद्वान्की समानरूपसे उत्क्रान्ति कही गई है । अब उत्क्रान्तिके समय लिङ्गशरीर आश्रित उत्क्रान्त तेज आदि सूक्ष्म भूत परमात्मामें स्त्ररूपसे लय होते है अथवा बीजभावको लेकर लय होते हैं? यह संशय इसलिए होता है कि दोनों प्रकारका विलय अवगत होता है । जैसे सुषुप्ति और प्रलय में बीजमाव युक्त विलय होता है, वैसे उत्क्रान्तिके समय
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अधि ० ५ सू ० ९ - १०-११ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८३३ * तच्चेतरभूतसहितं तेजो जीवशास्माच्छरीरात्प्रवसंत आश्रयभूतं स्वरूपतः परिमाणतश्च सुक्ष्मं भवितुमर्हति । तथा हि-- नाडी निष्कमणश्रवणादिभ्योऽस्य सौक्ष्म्य-मुपलभ्यते । तत्र तनुत्वात्संवारोपपत्तिः, स्वच्छत्वाच्या प्रतीघातोपपत्तिः । अत एव च देहान्निर्गच्छत्पार्श्वस्थैनोपलभ्यते ॥९ ॥
नोपमर्दनातः ॥ १० ॥
पदच्छेदन, उपमर्देन, अतः । सूत्रार्थ --- ( अतः ) तेज - सूक्ष्म शरीर अतिसूक्ष्म होने के कारण ( उपमर्देन ) स्थूल शरीर के उपमर्दन से भी ( न ) उपर्मादित नहीं होता है । अत एव सूक्ष्मत्वान्नास्य स्थूलस्य शरीरस्योपमर्देन दाहादिनिमित्तेनेतरत्सूक्ष्मं शरीरमुपमृद्यते ॥१० ॥
अस्यैव चोपपत्तेरेष ऊष्मा ॥ ११ ॥
पदच्छेद -- अस्य, एव, च, उपपत्तेः, एष, ऊष्मा । सूत्रार्थ - ( अस्यैव ) इस सूक्ष्म शरीर की ही ( एष ऊष्मा ) यह ऊष्मा है, ( उपपत्तेः ) क्योंकि उसकी स्थूलशरीरके स्पर्श होनेसे उपपत्ति होती है । अस्यैव च सूक्ष्मस्य शरीरस्यैव ऊष्मा, यमेतस्मिञ्शरीरे संस्पर्शेनोष्माणं विजा-नन्ति । तथा हि- मृतावस्थायामवस्थितेऽपि देहे विद्यमानेष्वपि च रूपादिषु देहगुणेषु नोष्मोपलभ्यते, जोवदवस्थायामेव तूपलभ्यत इत्यत उपपद्यते - प्रसिद्धशरीरव्यतिरिक्त-व्यपाश्रय एवैष ऊष्मेति । तथा च श्रुतिः ' उष्ण एव जीविष्यशीतो मरिष्यन् ' इति ॥११ ॥
इस देहसे प्रयाण करनेवाले जीवके अन्य भूतों सहित आश्रयभूत वह तेज स्वरूपसे और परिमाणसे सूक्ष्म होने योग्य है, क्योंकि नाड़ो मार्ग निष्क्रमण प्रतिपादक श्रुति आदिसे इसकी सूक्ष्मता उपलब्ध होती है । ऐसा होनेपर सूक्ष्म होनेसे उसकी संचारोपपत्ति और स्वच्छ होनेसे प्रतिघातोपपत्ति होती है । अतएव देह निष्क्रमण करता हुआ वह मुमूर्षु पार्श्वस्थ लोगोंसे उपलब्ध नहीं होता ॥ ९ ॥
अतएव - उस तेज - लिङ्गात्मक देहके सूक्ष्म होनेसे ही इस स्थूल शरीरके दाह आदि निमित्त से उपमर्दन होने से अन्य सूक्ष्म शरीर उपमदित नहीं होता ॥ १० ॥
और इस सूक्ष्म शरीरकी ही यह ऊष्मा है । जिस ऊष्माको इस शरीरमें संस्पशंसे जानते हैं, क्योंकि मृतावस्या में देहके अवस्थित होनेपर और देहके रूप उपलब्ध नहीं होती जीवितावस्था में ही तो उपलब्ध होती है । है कि यही ऊष्मा प्रसिद्ध स्थूल शरीर से भिन्न शरीराश्रय है । यह शरीर उष्ण होता है और मृतक होते यह शीतल होता है सत्यानन्दी - दीपिका भी बीज आदि सूक्ष्मभूत तेज सहित परमात्मामें विलय होते है, सिद्धान्तमें शास्त्रबल से सावशेष लय होता है ॥ ८ ॥
* संसारके मोक्ष पर्यंत बीजभाव युक्त सूक्ष्म अन्य आदि गुण विद्यमान होनेपर भी ऊष्मा इस अन्वयव्यतिरेकसे यह उपपन्न होता उसीप्रकार ' उष्ण एव ० ' ( जीवित होते ) यह श्रुति है ॥११ ॥
हैं । पूर्वपक्ष में मृतकमात्रकी मुक्ति सिद्ध भूतोंके साथ सूक्ष्म तेजका परमात्मा में लय कहा गया है । अब एक और शङ्का उत्पन्न होती है कि लिङ्गात्मक तेजकी सूक्ष्म नाड़ीसे गति कैसे होती है और किसी मूर्त पदार्थसे उसका प्रतिघात क्यों नहीं होता, और देहसे उत्क्रमण करते समय वह दिखाई क्यों नहीं देता? इसपर भगवान् सूत्रकार ' सूक्ष्मम् ' इत्यादिसे कहते हैं | अतिसूक्ष्म होने के कारण
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८३४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० २ ( ६ प्रतिषेधाधिकरणम् । सू ० १२-१४ ) प्रतिषेधादिति चेन्न शारीरात् ॥ १२ ॥
पदच्छेद - प्रतिषेधात् इति चेत्, न, शारीरात् । सूत्रार्थ - ( प्रतिषेधात् ) ' न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ' इत्यादि श्रुति निर्गुण ब्रह्मवित् के शरीरसे उत्क्रमणका प्रतिषेध होनेसे उसकी उत्क्रान्तिका प्रतिषेध है,: ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है, ( शारीरात् ) क्योंकि यह उत्क्रमण निषेध जीवसे है शरीरसे नहीं । इससे प्राणादि युक्त जीव और ब्रह्मवित्की उत्क्रान्ति है । * ' अमृतत्वं चानुपोष्य ' इत्यतो विशेषणादात्यन्तिकेऽमृत्ये गत्युत्कान्त्योरभावोऽभ्यु-पगतः । तत्रापि केनचित्कारणेनोत्कान्तिमाशङ्कय प्रतिषेधति - ' अथाकामयमानो योऽकाम निष्काम आप्तकाम आत्मकामो भवति न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति ( बृह ० ४ ४ ६ ) इत्यतः परविद्या विषयात्प्रतिषेधान्न परब्रह्मविदो देहात्प्राणानामुत्क्रान्तिरस्तीति चेत्, नेत्युच्यते, यतः शारीदात्मन एष उत्क्रान्तिप्रतिषेधः प्राणानां न शरीरात् । कथमव-गम्यते? ' न तस्मात्प्राणा उत्क्रामन्ति ' इति शाखान्तरे पञ्चमीप्रयोगात् । संबन्धसामान्य-विषया हि षष्ठी शाखान्तरगतया पञ्चम्या संबन्धविशेषे व्यवस्थाप्यते । तस्मादिति च प्राधान्यादभ्युदयनिःश्रेयसाधिकृतो देही संबध्यते, न देहः । न तस्मादुच्चिक्रमिषो-जीवात्प्राणा अपक्रामन्ति, सहैव तेन भवन्तीत्यर्थः ॥१२ ॥
सप्राणस्य च प्रवसतो भवत्युत्कान्तिर्देहादित्येवं प्राप्ते प्रत्युच्यते-' अमृतत्वं चानुपोष्य ' ( अविद्या आदि क्लेश समुदायका अत्यन्त दाह किए विना अमृतत्व आपेक्षिक है ) इस विशेषणसे आत्यन्तिक अमृतत्त्वयें गति और उत्क्रान्तिका अभाव स्वीकार किया गया है । उसमें भी किसी कारणसे उत्क्रान्ति विषयक आशङ्काकर प्रतिषेध करते हैं - ' अथाकाम-यमानो ० ' ( अथ - सकामकी संसारोक्तिके अनन्तर जो कामना करनेवाला नहीं है, अकाम, निष्काम, आकाम और आत्मकाम होता है, उसके प्राणोंका उत्क्रमण नहीं होता, वह ब्रह्म ही होकर ब्रह्मको प्राप्त होता है ) अतः परविद्या विषयक प्रतिषेध होनेसे ब्रह्मज्ञानीकी देहसे प्राणोंकी उत्क्रान्ति नहीं है, ऐसा कहो, तो नहीं, ऐसा कहते हैं— क्योंकि प्राणोंकी यह उत्क्रान्तिका प्रतिषेध जीवात्मा से है शरीरसे नहीं । यह कैसे अवगत हो? इससे कि ' न तस्मात्प्राणा ο ', ' उससे प्राण उत्क्रमण नहीं करते ) इस प्रकार अन्य शाखामें पञ्चमीका प्रयोग है । सम्बन्ध सामान्य विषयक षष्ठी ही शाखान्तरगत पञ्चमीसे सम्बन्ध विशेष में व्यवस्थापित होती है । ' तस्मात् ' ( उससे ) उसके साथ प्राधान्यसे अभ्युदय और निःश्रेयसमें अधिकृत देही सम्बन्धित होता है, देह नहीं । उस उत्क्रमणकी इच्छा करनेवाले जीवसे प्राण चले नहीं जाते, किन्तु उस जीवके साथ ही होते हैं, ऐसा अर्थ है ॥ १२ ॥
प्रयाण करनेवाले पुरुष के प्राणकी वह उत्क्रान्ति देहसे होती है, निराकरण करते हैं-सत्यानन्दी -दीपिका उसका सूक्ष्म नाड़ीसे गमन होता है । उद्भूतरूप और उद्भूत स्पर्श न स्वच्छ होने से दर्शन और प्रतिघातके योग्य नहीं है ॥ ९ ॥
' अमृतस्वं चानुपोष्य ' इस अनुपोष्य पदसे यह सिद्ध होता है क्लेश ब्रह्मज्ञानसे निवृत्त नहीं हुए हैं, ऐसे सगुण उपासककी गति और ऐसा प्राप्त होनेपर उसका होने के कारण और अति-कि जिसके अविद्या आदि उत्क्रान्ति हैं और जिसके अविद्या आदि क्लेश तत्त्वज्ञानसे निवृत्त हो गए हैं उस ब्रह्मवित्की गति और उत्क्रान्ति नहीं हैं, क्योंकि ' न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ' यह श्रुति है, ऐसा सिद्धान्त कहा गया है । अब इसपर
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अधि ० ६ सू ० १३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ८३५ स्पष्टो ह्येकेषाम् ॥ १३ ॥
पदच्छेद- स्पष्टः, हि, एकेषाम् । सूत्रार्थ - ( एकेषाम् ) काण्व शाखावालोंके मतमें परब्रह्मवित् के प्राणोंके शरीरसे उत्क्रमणका प्रतिषेध ( स्पष्टः ) स्पष्ट उपलब्ध होता है ( हि ) क्योंकि ब्रह्मवेत्ता के प्राणोंका देहसे उत्क्रमण नहीं होता । * नैतदस्ति यदुक्तम्- परब्रह्मविदोऽपि देहाद स्त्युत्क्रान्तिरुत्कन्तिप्रतिषेधस्य देापादानत्वादिति यतो देहापादान एवोत्क्रान्तिप्रतिषेध एकेषां समाम्नातॄणां स्पष्ट उपलभ्यते । तथा हि - आर्तभागप्रश्ने ' यत्रायं पुरुषो म्रियत उदस्मात्प्राणाः क्रामन्त्याहो नेति ' ( बृह ० ३।२।११ ) इत्यत्र ' नेति होवाच याज्ञवल्क्यः ' ( बृह ० ३२ | ११ ) इत्यनुत्क्रान्तिपक्षं परिगृह्य न तर्ह्ययमनुत्क्रान्तेषु प्राणेषु म्रियत इत्यस्यामाशङ्कायाम् – ' अत्रैव समवनीयन्ते ' इति प्रवि-लयं प्राणानां प्रतिज्ञाय तत्सिद्धये ' स उच्छ्वयत्याध्मायत्याध्मातो मृतः शेते ' ( बृह ० ३ | २ | ११ ) सिद्धान्ती - जो यह कहा गया है कि ब्रह्मवेत्ताकी भी देहसे उत्क्रान्ति होती है, क्योंकि उत्क्रान्ति प्रतिषेधमें जीव अपादान है, यह युक्त नहीं है, क्योंकि कुछ शाखावालोंके मतमें देह अपादान - देह से ही उत्क्रान्तिका प्रतिषेध स्पष्टरूपये उपलब्ध होता है । जैसे कि ' यत्रायं पुरुषो म्रियत ० ' ( हे याज्ञवल्क्य! जिस समय यह ब्रह्मवित् पुरुषं मरता है उस समय इसके प्राणोंका उत्क्रमण होता है वा नहीं? ) इसमें इसप्रकार आर्तभाग के प्रश्न होनेपर ' नेति होवाच याज्ञवल्क्यः ' ( याज्ञवल्क्यने कहा कि प्राण उत्क्रमण नहीं करते ) इसप्रकार अनुत्क्रान्ति पक्षका परिग्रहकर तब क्या यह प्राणों के अनुत्क्रान्त होने पर मरता नहीं? इस आयङ्काके होनेपर ' अत्रैव समवनीयन्ते ' ( वे यहाँ ही लीन हो जाते हैं ) इस-प्रकार प्राणोंके प्रविलयकी प्रतिज्ञाकर उसकी सिद्धिके लिए ' स उच्छ्वयत्या ० ' ( वह फूल जता है अर्थात् बाह्य वायुको भीतर खींचता है और वायुसे पूर्ण हुआ ही मृत होकर निश्चेष्ट हो जाता है ) इस ' सः ’ सत्यानन्दी - दीपिका पूर्वपक्षी आक्षेपसंगतिसे ' प्रतिषेधादिति ' इत्यादि आक्षेप करते हैं । ' न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ' ( उस ब्रह्मवित् शरीरखे प्राण उत्क्रमण नहीं करते ) यह सिद्धान्तके अनुसार काण्व श्रुतिका अर्थं है । और ' न तस्मात्प्राणा उत्क्रामन्ति ' ( उस जीवसे प्राण उत्क्रमण नहीं करते ) यह पूर्वपक्ष के अनुसार माध्यन्दिन श्रुतिका अर्थ है । इसप्रकार श्रुतियोंमें षष्ठी और पश्चमीके श्रवणसे सन्देह होता है कि ब्रह्मवि उत्क्रान्ति होती है कि नहीं? सिद्धान्त में ' न तस्य ' इस श्रुति के अनुसार उत्क्रान्तिका प्रतिषेध देहसे है, और पूर्वपक्ष में ' न तस्मात् ' इस श्रुति के अनुसार उत्क्रान्तिका प्रतिषेध देही- जीवात्मा से है । इसलिए ' न तस्मात् ' यह माध्यन्दिन श्रुति ' न तस्य ' इस सामान्य सम्बन्ध प्रतिपादक काण्व श्रुतिकी अपादान सम्बन्ध विशेषमें व्यवस्थापना करती है अर्थात् ' उस ब्रह्मवित् के प्राण जीवात्मासे उत्क्रमण नहीं करते किन्तु देहसे करते हैं ' इसप्रकार दोनों श्रुतियोंसे यह सिद्ध होता कि जीवसे प्राण उत्क्रमण नहीं करते । इसलिए ब्रह्मवित्की भी देहसे उत्क्रान्ति होती है ॥ १२ ॥
* यद्यपि ' न तस्मात् ' इस श्रुतिवालों के मतमें प्रधानरूपसे जीवका अपादानरूपसे ग्रहण है, तो भी देह और देहीकी अभेद विवक्षासे ' तस्मात् ' कहा गया है । ' तस्मात् ' इस पञ्चम्यन्त सर्वनाम ' तत् ' शब्द से देहका परामशंकर देहापादानक उत्क्रान्तिका प्रतिषेध है । इसलिए माध्यन्दिन शाखा-' वालों को भी ' न तस्मात् ' इस ' तत् ' पदसे देहका ग्रहणकर उससे उत्क्रान्तिका प्रतिषेध करना चाहिए । ' न तस्य ' यहाँ काण्वशाखावालोंको अभेदोपचारकी अपेक्षा नहीं है । ' प्राप्तौ सत्यां निषेधः ( प्राप्ति होनेपर निषेध होता है ) इस न्यायसे भी देहसे उत्क्रान्ति प्राप्त है, अतः उससे ही प्रतिषेध युक्त हैं जीवसे नहीं । इसलिए ' ब्रह्मवित्के प्राणोंकी देहसे उत्क्रान्ति नहीं होती ' यह दोनों श्रुतियों का एक अर्थ है |
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८३६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० २ इति सशब्दपरामृष्टस्य प्रकृतस्योत्कान्त्यवधे रुच्छ्वयनादीनि समामनन्ति । देहस्य चैतानि स्युर्न देहिनः, तत्सामान्यात्, ' न तस्मात्प्राणा उत्क्रामन्त्यत्रैव समवनीयन्वे ' इत्यत्राप्यभेदोप-चारेण देहापादानस्यैवोत्क्रमणस्य प्रतिषेधः । यद्यपि प्राधान्यं देहिन इति व्याख्येयं येषां पञ्चमीपाठः । येषां तु षष्ठीपाठस्तेषां विद्वत्संबन्धिन्युत्क्रान्तिः प्रतिषिध्यत इति प्राप्तो-त्क्रान्तिप्रतिषेधार्थत्वादस्य वाक्यस्य देहापादानैव सा प्रतिषिद्धा भवति, देहादुत्कान्तिः प्राप्ता न देहिनः । * अपि च ' चक्षुष्टो वा मूर्ध्वो वाऽन्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यस्तमुत्क्रामन्तं प्राणो-ऽनूत्क्रामति प्राणमनूत्क्रामन्तं सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति ' ( बृह ० ४।४।२ ) इत्येवमविद्वद्विषये सप्रपञ्चमुत्क्रमणं संसारगमनं च दर्शयित्वा ' इति नु कामयमानः ' ( बृह ० ४/४/६ ) इत्युप-संहृत्या विद्वत्कथाम्, ' अथाकामयमानः ' ( बृह ० ४।४।६ ) इति व्यपदिश्य विद्वांसं यदि तद्विषये-ऽप्युत्क्रान्तिमेव प्रापयेदसमञ्जस एव व्यपदेशः स्यात् । तस्मादविद्वद्विषये प्राप्तयोर्गत्यु-त्क्रान्त्योर्विद्वद्विषये प्रतिषेध इत्येवमेव व्याख्येयम्, व्यपदेशार्थदत्त्वाय । नच ब्रह्मविदः सर्वगतब्रह्मात्मभूतस्य प्रक्षीणकामकर्मण उत्क्रान्तिर्गतिर्वोपपद्यते, निमित्ताभावात् । ' अत्र ' ब्रह्म समश्नुते ' इति चैवंजातीयकाः श्रुतयो गत्युत्क्रान्त्योरभावं सूचयन्ति ॥ १३ ॥
( वह ) शब्दसे परामृष्ट प्रकृत उत्क्रान्तिकी अवधिके उच्छ्वयन - फूलना आदि श्रुति कहती है । ये देहके होने चाहिए देहीके नहीं । तत्सामान्यात् विद्या प्रकरणरूप साधर्म्य होनेसे उक्त श्रुति साथ एकार्थक होने से ' तस्मात्प्राणा ० ' ( उससे प्राण उत्क्रमण नहीं करते किन्तु परमात्मामें ही पूर्ण-रूपसे विलीन हो जाते हैं ) यहाँ भी अभेदोपचारखे देह अपादानक ही उत्क्रमणका प्रतिषेध जिनको पञ्चमी विभक्ति पाठ है उनको यद्यपि देहीका प्राधान्य है तो भी यह व्याख्या करनी चाहिए जिनके मत में षष्ठी विभक्ति पाठ है उनके मत में विद्वत्सम्बन्धी उत्क्रान्तिका प्रतिषेध है । इसलिए ' तस्य ' इस वाक्यको प्राप्त उत्क्रान्तिका प्रतिषेधार्थक होनेसे वह देहापादानक प्रतिषिद्ध होती है, क्योंकि देह उत्क्रान्ति प्राप्त है देहीसे नहीं । और ' चक्षुष्टो वा मूर्ध्ना वा ० ' ( यह आत्मा नेत्रसे, मूर्द्धासे अथवा शरीरके किसी अन्य मागसे बाहर निकलता है । उसके उत्क्रमण करनेपर उसके साथ ही प्राण उत्क्रमण करता है, पीछे उत्क्रमण करते हुए उस प्राणके पीछे सब वागादि प्राण उत्क्रमण करते हैं ) इसप्रकार अविद्वान् विषयक विस्तार सहित उत्क्रमण और संसारगमन दिखलाकर ' इति तु कायम-मान ' ( इसप्रकार कामना करनेवाला संसारको प्राप्त होता है ) इसप्रकार अविद्वान्की कथाका उप-संहारकर ' अथाकामयमानः ' ( अब जो न कामना करनेवाला है ) इस रीति से विद्वान्का व्यपदेशकर यदि उसके विषय में भी उत्क्रान्ति ही प्राप्त कराए तो यह व्यपदेश असंगत अयुक्त ही होगा । इसलिए अविद्वानके विषय में प्राप्त हुई गति और उत्क्रान्तिका विद्वानके विषय में प्रतिषेध है, अतः व्यपदेशकी सार्थकता के लिए ऐसा आख्यान करना चाहिए । सवंगत ब्रह्मात्मभूत प्रक्षीण काम कर्मवाले ब्रह्मवित् की उत्क्रान्ति अथवा गति उपपन्न नहीं होती, क्योंकि उसके निमित्तका अभाव है । ' अत्र ब्रह्म समश्नुते ' ( यहाँपर ब्रह्म प्राप्त करता है ) इसप्रकार की श्रुतियां गति और उत्क्रान्तिका अभाव सूचित करती हैं | १३ | सत्यानन्दी - दीपिका * यदि अविद्वान्के समान विद्वान्की भी गति और उत्क्रान्ति मानी जाय तो ' अथाकामय-मान यो कामो निष्काम आप्तकाम आत्मकामो न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मसन्ब्रह्माप्येति ' ' यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्मसमश्नुते ' ( कठ ० २ | ३ | १४ ) ( जिस ज्ञानावस्था में इस विद्वान्की हृदयस्थित समस्त कामनाएँ निवृत्त हो जाती हैं तब वह विद्वान् पुरुष अमृत होता है यहीं ब्रह्म होता हुआ ब्रह्मको प्राप्त होता है ) इत्यादि श्रुतियोंसे प्रतिपादित गति बोर उत्क्रांति-का अभाव असंगत होगा । इसलिए अविद्वानुमें प्राप्त गति और उत्क्रान्तिका विद्वान्में अभाव है, क्योंकि