श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 871–880

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 871–880

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अधि ० १ सू ० १४-१५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८३७ स्मर्यते च ॥ १४ ॥

पदच्छेद - स्मर्यंते, च । सूत्रार्थ - और ' देवा अपि मार्गे मुह्यन्ति ' यह स्मृति मी ब्रह्मज्ञानीकी गति और उत्क्रान्तिका अभाव कहती है । * स्मर्यतेऽपि च महाभारते गत्युत्क्रान्त्योरभावः - ' सर्वभूतात्मभूतस्य सम्यग्भूतानि पश्यतः । देवा अपि मार्गे मुह्यन्त्यपदस्य पदैषिणः ' इति । ननु गतिरपि ब्रह्मविदः सब्रह्मा-त्मभूतस्य स्मर्यते - ' शुक किल वैयास किर्मुमुक्षुरादित्यमण्डलमभिप्रतस्थे पित्रा चानुगम्याहूतो भो इति प्रतिशुश्राव ' इति । न, सशरीरस्यैवायं योगबलेन विशिष्टदेशप्राप्तिपूर्वकः शरीरोत्सर्ग इति द्रष्टव्यम्, सर्वभूतदृश्यत्वाद्युपन्यालात् । न शरीरं गच्छन्तं सर्वभूतानि द्रष्टुं शक्नुयुः । तथा च तत्रैवोपसंहृतम् -'शुक्रस्तु मारुताच्छीघ्रां गतिं कृत्वाऽन्तरिचगः । दर्शयित्वा प्रमावं स्वं सर्वभूतगतोऽमवत् ' इति । तस्मादभावः परब्रह्मविदो गत्युत्क्रान्त्योः । गतिश्रुतीनां तु विषयमुपरिष्टाद्व्याख्यास्यामः ॥ १४ ॥

( ७ वागादिलयाधिकरणम् । सू ० १५ ) तानि परे तथा ह्याह ॥ १५ ॥

पदच्छेद - तानि परे, तथा हि आह । और महाभारत में ' सर्वभूतात्मभूतस्य ० ' ( सब भूतोंका जो आत्मरूप है और जिसको भूतों का सम्यक् अर्थात् आत्ममावसे ज्ञान है उसके लिए प्राप्य स्थान नहीं है ऐसे प्राप्य पदरहित ब्रह्मवेत्ताके पदकी इच्छा करनेवाले देवगण भी उसके मार्ग में मोह प्राप्त करते हैं अर्थात् उसके मार्गका अभाव होनेसे उसे देव नहीं जानते ) इसप्रकार गति और उत्क्रान्तिके अभावकी यह स्मृति मी है । परन्तु ' शुकः किल ० ' ( महर्षि वेदव्यास के पुत्र मुमुक्षु शुकदेवने आदित्य की ओर प्रस्थान किया उसके पीछे जाकर पिताने बुलाया तब उन्होंने ' मो ' ऐसा उत्तर दिया और उसने सुना ) इसप्रकार सवंगत ब्रह्मात्मभूत ब्रह्मवेत्ता की गतिकी भी स्मृति है । नहीं, योगबल से - अपरविद्याबलसे शरीरसहितका ही विशिष्ट देश प्राप्ति पूर्वक यह शरीरका त्याग है, ऐसा समझना चाहिए । क्योंकि सब प्राणियोंसे दृश्यत्व आदिको उपन्यास है । अथरीर जाते हुएको सब प्राणी देख नहीं सकते । और ' शुकस्तु ० ' ( शुकदेव तो अन्तरिक्ष में जाकर पवनसे भी त्वरितगति करं और अपना प्रभाव दिखलाकर सर्वभूत गत हुए ) इसप्रकार वहाँपर ही उपसंहृत किया है । इससे परब्रह्मवेत्ताकी गति और उत्क्रान्तिका अभाव है । गति श्रुतियों का विषय हम आगे व्याख्यान करेंगे ॥ १४ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका गति और उत्क्रान्तिका हेतु मिथ्याज्ञान ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञानसे निवृत्त हो जाता है, तब सर्वगत ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मवित्की गति और उत्क्रान्तिका असम्भव है ॥१३ ॥

* नोव्क्रामन्ति मुनेः प्राणा व्यापी सर्वगतो हि सः । तेन व्याप्तमिदं सर्वं कुत उत्क्रम्य यास्यति ॥ ' ( ब्रह्मवित् पुरुष के प्राण उत्क्रमण नहीं करते, क्योंकि वह सवंगत व्यापी है । उस ब्रह्मवित्से यह सम्पूर्ण चराचर जगत् व्याप्त है, तो वह कहाँसे उत्क्रमण कर कहाँ जायगा ) इत्यादि स्मृति से भी विद्वानुकी गति और उत्कान्तिका अभाव स्पष्टरूपसे सिद्ध होता है । परन्तु तयोर्ध्वमावन्नमृतत्वमेति ' ( उस सुषुम्ना नाड़ीसे ऊध्वं जाकर अमृतत्वको प्राप्त होता है ) ' स एवैतान्ब्रह्म गमयति ' ( वह उनको ब्रह्मा के पास पहुँचाता है ) इत्यादि गति विषयक श्रुतियोंका विचार इस अध्यायके तृतीय पादमें करेंगे ॥ १४ ॥

पृष्ठ 872

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८३८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० सूत्रार्थ - ( तानि ) वे प्राणात्मक इन्द्रियां और भूत ( परे ) परमात्मा में ही लय होते हैं, ( हि ) क्योंकि ( तथा बाह ) वैसे ही ' एवमेवास्य ' इत्यादि श्रुति कहती है । * तानि पुन: प्राणशब्दोदितानीन्द्रियाणि भूतानि च परब्रह्मविदस्तस्मिन्नेव परस्मिन्नात्मनि प्रलीयन्ते, कस्मात्? तथा ह्याह श्रुतिः - ' एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडश कलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति ' ( प्रश्न ० ६५ ) इति । ननु ' गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठाः ' ( मु ० ३।२।७ ) इति विद्वद्विषयैवापरा श्रुतिः परस्मादात्मनोऽन्यत्रापि कलानां प्रलयमाह स्म, न, स ( खलु व्यवहारापेक्षा, पार्थिवाद्याः कलाः पृथिव्यादीरेव स्वप्रकृती-रपियन्तीति, इतरा तु विद्वत्प्रतिपत्त्यपेक्षा, कृत्स्नं कलाजातं परब्रह्मविदो ब्रह्मैव संपद्यत इति । तस्माददोषः ॥ १५ ॥

( ८ अविभागाधिकरणम् । सू ० १६ ) अविभागो वचनात् ॥ १६ ॥

पदच्छेद - अविभागः, वचनात् । पर ब्रह्मवेत्ता की प्राण शब्दले कथित वे इन्द्रियाँ और भूत उस परमात्मामें ही विलीन होते हैं | क्योंकि ' एवमेवास्य ० ' ( जिस प्रकार नदियाँ समुद्रमें पहुँचकर विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार इस सवं द्रष्टा की ये सोलह कलाएँ जिनका अधिष्ठान पुरुष ही है उस पुरुषको प्राप्त होकर लीन हो जाती हैं ) ऐसी श्रुति है । परन्तु ' गताः कलाः ० ' ( मोक्षकालमें देहारम्भक प्राण आदि पन्द्रह कलाएँ अपने - अपने आश्रयों में स्थित हो जाती हैं ) इसप्रकार विद्वद्विषयक अन्य श्रुतिने परमात्मासे अन्यत्र मी कलाओंका प्रलय कहा है । नहीं, क्योंकि पार्थिव आदि कलाएँ अपनी प्रकृति पृथिवी आदिमें ही विलीन होती हैं वह श्रुति व्यवहारकी अपेक्षासे है । परब्रह्मवेत्ताका सम्पूर्ण कलासमूह ब्रह्ममें ही विलीन होता है इसप्रकार दूसरी श्रुति तो विद्वत् प्रतिपत्तिकी अपेक्षासे है । इसलिए दोष नहीं है | १५ । सत्यानन्दी -दीपिका * गत सूत्रमें परब्रह्मवेत्ताको गति बौर उत्क्रान्तिका प्रतिषेध होने से उसके प्राण आदि कलामों का भी यहीं पर विलय कहा गया है । इससे संशय होता है कि क्या यह प्राण व्यादि इन्द्रियोंका लय अपने - अपने उपादान पृथिवी आदिमें होगा कि परमात्मामें? क्योंकि विलय और प्रतिष्ठा प्रतिपादक दो विरोधी श्रुतियोंकी उपलब्धि होती है । ऐसी परिस्थिति में विकारका अपने - अपने उपादानकारणमें ही लय होता है । इस न्यायसे अनुगृहीत ' गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठाः ' इत्यादि श्रुति से पूर्वपक्ष में प्राण आदि अपने अपने उपादानमें लय होते हैं । इस पूर्वपक्षको आागेके लिए छोड़कर प्रथम ' तानि ’ इत्यादिसे सिद्धान्त कहते हैं । ' स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्रां खं वायुज्र्ज्योतिरापः पृथिवोन्द्रियं मनोऽन्न-मन्नाद्वीर्यं तपो मन्त्राः कर्म लोका लोकेषु नाम च ॥ ' प्रश्न ० ६।४ ) ( उस अन्तर्यामी पुरुषने प्राण ( हिरण्यगर्भ ) को उत्पन्न किया । उस प्राणसे श्रद्धा, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी, इन्द्रिय-पाँच ज्ञानेन्द्रिय और पांच कर्मेन्द्रिय, मन, व्रीहि, यव आदि अन्न, अन्नसे वीयं -सामध्यं, तप, कर्म के साधन - भूत ऋक्, यजु आदि मन्त्र, अग्निहोत्र आदि कर्म, कर्मोंके फलरूप लोक, उन लोकोंमें रहने वालोंके यज्ञदत्त आदि नाम, उनकी रचना की ) इसप्रकार षोडश कलाएँ हैं । ' गताः कला: ' इस श्रुति मन और प्राणको एक कर पन्द्रह कलाएं कही गई हैं । वस्तुतः विद्वान्को दृष्टिसे कलाओं का परमात्मामें विलय होनेपर मी लोकदृष्टिसे प्रतिष्ठा में - प्रकृतिरूप पृथिवी आदिमें लय कथनका विरोध नहीं है । इससे कलाओंका अपनी - अपनी प्रकृतिमें उसके अनन्तर उन उपादानोंके साथ पुरुषमें लय होती हैं, यह दोनों श्रुतियोंका तात्पर्य है । इसलिए ' गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठाः ' यह श्रुति व्यवहार-दृष्टिकी अपेक्षासे है और ' एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः ' यह श्रुति परमार्थदृष्टिकी अपेक्षा से है । इस प्रकार दोनों श्रुतियोंका विषय भिन्न - भिन्न होने से कोई विरोध नहीं है ॥ १५ ॥

पृष्ठ 873

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अधि ० ९ सू ० १६-१७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८३ ९ सूत्रार्थ - ( अविभाग ० ) विद्वान्की कलाओं का ब्रह्मके साथ अत्यन्त अविभाग ही है । इसमें ( वचनात् ) क्योंकि ' भिद्येते तासां नामरूपे ' इत्यादि श्रुति वचन है । * स पुनर्विदुषः कलाप्रलयः किमितरेषामिव सावशेषो भवत्याहोस्विन्निरवशेष इति? तत्र प्रलयसामान्याच्छक्त्यवशेषताप्रसक्तौ ब्रवीति - अविभागापत्तिरेवेति । कुतः? वचनात् । तथा हि - कलाप्रलयमुक्त्वा वक्ति - ' भिद्येते तासां नामरूपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते एषोऽकलोऽमृतो भवति ' ( प्र ० ६ ५ ) इति । अविद्यानिमित्तानां च कलानां न विद्यानिमित्ते

प्रलये सावशेषत्वोपपत्तिः । तस्मादविभाग एवेति ॥ १६ ॥

( ९ तदोकोऽधिकरणम् । सू ० १७ ) तदोकोऽग्रज्वलनं तत्प्रकाशितद्वारो विद्यासामर्थ्यात्तच्छेष गत्यनुस्मृतियोगाच्च हार्दानुगृहीतः शताधिकया ॥ १७ ॥

पदच्छेद -- तदोकोग्रज्वलनम्, तत्प्रकाशितद्वारः, विद्यासामर्थ्यात् तच्छेषगत्यनुस्मृतियोगात् । च, हार्दानुगृहीतः शताधिकया । सूत्रार्थ - ( तदोकोग्रज्वलनम् ) इस शरीरसे उत्क्रमण करनेवाले विद्वान्के आयतनरूप हृदयके मागमें प्रकाश हो जाता है । ( तत्प्रकाशितद्वार । ) उस प्रकाशसे प्रकाशित द्वारवाला वह विद्वान् ( विद्यासामर्थ्यात् ) सगुण ब्रह्मविद्याकी सामथ्यं से ( तच्छेष गस्य नु स्मृतियोगाच्च ) विद्याके अङ्गभूत ब्रह्म-लोक गमन विषयक स्मरण करता हुआ ( हार्दानुगृहीत ) हृदयस्थ परमेश्वरसे अनुगृहीत होता हुआ ( शताधिकया ) एक सौ एकवीं मूर्धन्य नाड़ीसे निष्क्रमण करता है । * समाप्ता प्रासङ्गिकी पर विद्यागता चिन्ता । संप्रति त्वपरविद्याविषयामेव चिन्ता-क्या विद्वान्का वह कला प्रलय अन्योंके - अविद्वानोंके कला प्रलयके समान सावशेष होता है अथवा निरवशेष? ऐसा संशय होनेपर प्रलयके सादृश्यसे शक्ति अवशेष होती है ऐसा प्रसक्त होने पर, सिद्धान्ती - कहते हैं -अविभागसे ही प्राप्त होता है । किससे? इससे कि ऐसा श्रुतिवचन है । जैसे कि कलाप्रलय कहकर ' मिद्येते तासां नामरूपे ० ' ( उन कलाओंका नाम - रूप नष्ट हो जाता है और अनष्टतत्त्वको ब्रह्मवेत्ता ' पुरुष ' ऐसा कहते हैं वह कालाहीन छोर अमृत हो जाता है ) ऐसा कहती है, अविद्या निमित्तक कलाओंका विद्यानिमित्तक प्रलय होनेपर उनकी सावशेषत्व उपपत्ति नहीं होती है इसलिए अविभाग ही है ॥ १६ ॥

प्रसङ्ग प्राप्त परविद्यागत विचार समाप्त हुआ । अब तो सूत्रकार अपरविद्या विषयक विचारकी सत्यानन्दी - दीपिका * उक्त लयको स्पष्ट करनेके लिए ' अविभागो वचनात् ' इस सूत्र की रचना है । सावशेष और निरवशेष इस भेदी प्रलय दो प्रकारका होता है । कारणको छोड़कर केवल कार्यं लय वह सावशेष लय कहा जाता है जैसे सुषुप्ति आदि अवस्थामें होता है । कारण सहित कार्यका लय वह निरवशेष लय कहा जाता है । जैसे रज्जु ज्ञानसे मिथ्याज्ञानको निवृत्ति होनेपर मिध्यास आदिकी निवृत्ति होती है । यहाँ दोनों विकल्पोंके होनेपर संशय होता है । पूर्वपक्षी - प्रलयके सादृश्य होनेसे विद्वान्‌का कला-प्रलय मी अविद्वान् कलाप्रलयके समान सावशेष होता है । इसलिए पूर्वपक्षमें विद्वान्की मुक्ति असिद्ध है, सिद्धान्तमें निरवशेष कलाप्रलय होनेपर विद्वान्की मुक्ति सिद्ध है । सिद्धान्ती - ' ब्रवीति ' आदिसे कहते हैं ॥ १६ ॥

* इस अधिकरणमें सगुण उपासक और अनुपासककी उत्कान्ति आदि विषयक विचार किया जाता है । नाड़ी प्रवेशके नियमको कहनेके लिए सूत्रभागकी व्याख्याद्वारा ' तस्य ' इत्यादिसे अघि-

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८४० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० २ मनुवर्तयति । समाना चासृत्युपकमाद्विद्वदविदुषोरुत्कान्तिरित्युक्तम्, तमिदानीं सृत्युप-क्रमं दर्शयति, तस्योपसंहृतवागादि कलापस्यो च्चिक्रमिषतो विज्ञानत्मनः, ओक आयतनं हृदयम् । ' स एतास्तेजोमात्रा समभ्याददानो हृदयमेवान्ववक्रामति ' इति श्रुतेः । तद्ग्रप्रज्वलनपू-विका चक्षुरादिस्थानापादाना चोत्कान्तिः श्रूयते- ' तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते तेन प्रद्योते-नैष भामा निष्क्रामति चक्षुष्टो वा मूर्ध्नो वान्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यः ' ( बृह ० ४।४।२ ) इति । सा किम-नियमेनैव विद्वदविदुषोर्भवति, अथास्ति कश्चिद्विदुषो विशेषनियम इति विचिकित्सायां श्रुत्यविशेषादनियमप्राप्ताचाचष्टे समानेऽपि हि विद्वदविदुषोदयाप्रप्रद्योतने तत्प्रकाशि तद्वायत्वे च मूर्धस्थानादेव विद्वान्निष्क्रामति स्थानान्तरेभ्यस्त्वितरे । * कुतः? विद्यासाम-र्थ्यात् । यदि विद्वान पीतवद्यतः कुतश्चिद्द हदेशादुरकामेन्नैवोत्कृष्टुं लोकं लभेत । तत्रानर्थि-कैच विद्या स्यात् । तच्छेवगत्यनुस्मृतियोगाच्च । विद्याशेषभूता च मूर्धन्यनाडो संबद्धा गति-रनुशोलयितव्या विद्याविशेषेषु विहिता, तामभ्यस्यंस्तयैव प्रतिष्ठत इति युक्तम् । तस्माद्ध-दयालयेन ब्रह्मणा खूणसितेनानुगृहीतस्तद्भावं समापन्नो विद्वान्मूर्धन्ययैव शताधिकया अनुवृत्त करते हैं । यह कहा जा चुका है कि अचिरादि मार्गके उपक्रम तक उपासक और अनुपासक की उत्क्रान्ति समान होता है । अब मार्ग उपक्रमको दिखलाते हैं । उपसंहृत वागादि समूहवाले उत्क्रमण करनेकी इच्छावाले उस जीवात्माका ओक - आयतन हृदय है, क्योंकि ' स एतास्तेजो मात्राः ० ' ( वह जीवात्मा इस तेजके अवयव चक्षु आदि इन्द्रियोंका उपसंहार करता हुआ हृदयमें प्राप्त होता है ) ऐसी श्रुति है । उस हृदयके अग्र मागका प्रज्वलन - प्रकाश होता है, उस हृदयाग्रभाग प्रज्वलन पूर्विका चक्षु आदि स्थानोंसे उसकी उत्क्रान्ति होती है, कारण कि ' तस्य हैतस्य ० ' ( उस इस हृदयका अग्रभाग प्रकाशित होता है, उसी प्रकाशखे यह आत्मा नेत्रसे, मूर्द्धासे अथवा शरीरके किसी अन्य भागसे बाहर निकलता है ) ऐसी श्रुति है । क्या वह उत्क्रान्ति अनियमसे विद्वान् और अविद्वानुकी होती है अथवा विद्वान् के लिए कोई विशेष नियम है, ऐसा संशय होनेपर श्रुति अविशेष अनियम प्राप्त होनेपर सि ० - कहते हैं - विद्वान् और अविद्वान्के हृदय नाड़ीमुखका प्रद्योतन और उससे प्रकाशित हुआ द्वार - समान होनेपर मो विद्वान् मूर्धस्थानसे ही निष्क्रमण करता है और अन्य अनुपासक अन्य स्थानोंसे निष्क्रमण करते हैं । किससे? विद्याको सामथ्र्यमे । यदि विद्वान् भी अन्य के समान जिस किसी देहभाग से उत्क्रमण करे तो उत्कृष्ट लोक प्राप्त न करेगा, तो ऐसी परिस्थितिमें विद्या अनर्थक ही होगी, क्योंकि सगुणविद्याको शेषभूत गतिको अनुस्मृतिका सम्बन्ध है । विद्याकी शेषभूत और मूर्धन्य नाड़ीसे सम्बद्ध विद्यादिशेषों में विहित गतिका अनुशीलन - ध्यान करना चाहिए । उस गतिका चिन्तन करता हुआ उसीसे प्रस्थान करता है, यह युक्त है । इससे हृदयस्थान स्थित और सम्यक् रूपसे उपासित ब्रह्मसे अनुगृहीत हुआ उसके मावको प्राप्त हुआ विद्वान् सौ से अतिरिक्त सौ से भिन्न एक सौ एकड़ों मूर्धन्य नाड़ीसे निष्क्रमण करता है, अन्य अनुपासक अन्य नाड़ियोंसे निष्क्रमण करते सत्यानन्दी - दीपिका करणका विषय कहते हैं । ' चक्षुष्टो वा मूनों वा ' ( नेत्रसे अथवा मूर्धासे ) इस प्रकारकी अनियमित वि और ' तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति ' ( उस मूर्धन्य नाड़ी द्वारा निष्क्रमणकर अमृतत्वको प्राप्त होता है ) इस विशेष श्रुति होनेसे संशय होता कि उपासक और अनुपासककी उत्कान्ति समान होती है अथवा विद्वानके लिए कोई विशेष नियम है । पूर्वपक्ष में- उपासककी भी अनुपासक के समान अनियमसे उत्क्रान्ति होती है । सिद्धान्त में --- विद्वान्को उपासनाको सामथ्यंचे एक सौ एकवों मूर्धन्य नाड़ीसे उत्क्रान्ति होती है । * यद्यपि हृदयसे अनन्त नाड़ियाँ निकलती हैं, तो भी उनमें एक सौ एक मुख्य हैं, उनमें भो

पृष्ठ 875

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अधि ० १० सू ० १८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ८४१ शतादतिरिक्तयैकशततम्या नाड्या निष्क्रामतीतराभिरितरे । तथा हि- हार्दविद्यां प्रकृत्य समामनन्ति – ' शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानममिनिःसृतैका । तयोर्ध्वमायन्नमृतत्व-मेति विवङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ' ( छा ० ८ | ६ | ६ ) इति ॥ १७ ॥

( १० रश्म्यधिकरणम् । सू ० १८-१९ ) रम्यनुसारी ॥ १८ ॥

सूत्रार्थ - सुषुम्ना नाड़ीद्वारा देहसे उत्क्रमण किया हुआ उपासक नाड़ीसे सम्बद्ध सूर्य किरणोंका अनुसारी होता हुआ ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है । * अस्ति हार्दविद्या- ' अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म ' ( छा ० ८1१1१ ) इत्युपक्रम्य विहिता । तत्प्रक्रियायाम् ' अथ या एता हृदयस्य नाड्यः ' ( छा ० ८1६ । १ ) इत्यु-पक्रम्य सप्रपञ्चं नाडीरश्मि संबन्धमुक्त्वोक्तम् — ' अथ यत्रैतदस्माच्छरीरादुत्क्रामत्यथैतैरेव रश्मिभिरूर्ध्वमाक्रमते ' ( छा ० ८/६/५ ) इति । पुनश्वोक्तम् - ' तयोर्ध्व मायन्नमृतत्वमेति ' ( छा ० ८/८/६ ) इति । तस्माच्छताधिकया नाड्या निष्क्रामन् रश्म्यनुसारी निष्क्रामतीति गम्यते । तत्कि -मविशेषेणैवाहनि रात्रौ वा म्रियमाणस्य रश्म्यनुसारित्वमाहोस्विदन्येवेति संशये सत्यविशेषश्रवणादविशेषेणैव तावद्रश्म्यनुसारीति प्रतिज्ञायते ॥१८ ॥

हैं, क्योंकि हार्दविद्याको प्रस्तुत कर ' शतं चैका ० ' ( हृदयकी एक सौ एक मुख्य नाड़ियाँ हैं । उनमें एक मूर्धाकी ओर निकल गई है, उसके द्वारा ऊपरकी ओर जानेवाला जीव अमृतत्वको प्राप्त होता है, शेष नाड़ियां नाना गतिको देनेवाली केवल उत्क्रमणका कारण होती हैं ) ऐसा कहते हैं ॥ १७ ॥

' अथ यदिदमस्मिन् ० ' ( अब इस ब्रह्मपुरके भीतर जो यह सूक्ष्म कमलाकार स्थान है ) इसप्रकार उपक्रमकर हार्दविद्या विहित है । उसके प्रकरणमें ' अथ या एता ० ' ( अब ब्रह्मोपासनाके स्थान कमला-कार हृदयकी जो ये वक्ष्यमाण नाड़ियाँ हैं ) इस प्रकार आरम्भकर सविस्तार नाड़ी और रश्मि-सम्बन्धको कहकर ‘ अथ यत्रैतद ० ' ( पुनः जिस समय यह उपासक इस शरीरसे उत्क्रमण करता है उस समय इन किरणोंसे ही ऊष्वंको जाता है ) ऐसा कहा गया है । और पुनः ' तयोर्ध्वमाय ० ' ( उसके द्वारा ऊपर की ओर जानेवाला जीव अमृतत्वको प्राप्त होता है ) इस प्रकार कहा गया है । इसलिए एक सौ एकवीं नाड़ीसे निष्क्रमण करता हुआ रश्मिके अनुसारी निष्क्रमण करता है, ऐसा ज्ञात होता है । तो क्या अविशेषसे ही दिन अथवा रात्रिमें वह त्रियमाण रश्मि अनुसारी होता है अथवा दिनमें ही? ऐसा संशय होनेपर अविशेष श्रुतिसे अविशेषसे ही रश्मिका अनुसारी होता है, ऐसी प्रतिज्ञा की जाती है ॥ १८ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका एक सुषुम्ना नाड़ी मुख्य है, वह हृदयसे निकलकर दक्षिण नेत्र, तालु, कण्ठाध, स्तन, नासिका, मध्य-भीतिसे ब्रह्मरन्ध्रको पहुँचकर सूर्य किरणोंसे एकरूप होकर व्यादित्यमण्डलमें प्रविष्ट होती है । इस प्रकार ब्रह्मनाड़ीका ध्यान करनेवाला उपासक अन्तकालमें उसीसे उत्क्रमण करता है ॥ १७ ॥

# ब्रह्मनाड़ी से निष्क्रान्त पुरुषका रश्मिके अनुसार ऊर्ध्वं गमन रात्रिमें भी समान है । उस निर्णय के लिए ' रम्यनुसारी ' इस सूत्र की रचना है । म्रियमाणके मरनेका समय निश्चित नहीं है, और रात में सूर्यके न होनेसे रश्मियोंका अभाव भी स्वाभाविक है, तब ऐसी परिस्थितिमें संशय होता है कि क्या उत्कान्त उपासक दिन अथवा रातमें अविशेषरूपसे रश्मिका अनुसारी होता है अथवा केवल दिन में? पूर्वपक्ष में- रात्रिमें मृत्तक उपासकको रश्मिकी प्राप्ति के लिए सूर्योदयकी प्रतीक्षा आवश्यक है । अतः दिनमें उत्क्रान्त उपासक ही रश्मि अनुसारी होता है । सिद्धान्तमें-- ' तयोर्ध्वमायन्नमृतत्व मे ति

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८४२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० निशि नेति चेन्न संबन्धस्य यावद्द इभावित्वादर्शयति च ॥ १ ९ ॥ पदच्छेद - निशि, न, इति चेत्, न, सम्बन्धस्य, यावद्देहमावित्वात्, दर्शयति, च । सूत्रार्थ - दिन में नाड़ी रश्मि सम्बन्ध होनेसे दिनमें ही उत्क्रान्त उपासक रश्मि अनुसारी होता है, ( निशि ) रात्रिमें नाड़ी रश्मि सम्बन्ध न होनेसे उत्क्रान्त उपासक ( न ) रश्मि अनुसारी नहीं होता ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो यह युक्त नहीं है । ( सम्बन्धस्य यावद्देह भावित्वात् ) क्योंकि नाड़ी रश्मि सम्बन्ध यावद्देहभावी है, ( दर्शयति ) ' अमुष्मादादित्यात् ' यह श्रुति दिखलाती है । * अस्त्यहनि नाडीरश्मिसंबन्ध इत्यहनि मृतस्य स्याद्रश्म्यनुसारित्वम्, रात्रौ तु प्रेतस्य न स्यात्, नाडीरश्मिसंबन्धविच्छेदादिति चेन्न, नाडीरश्मिसंबन्थस्य यावद्देह-भावित्वात् । यावद्देहभावी हि शिराकिरणसंपर्कः । दर्शयति चैतमर्थं श्रुतिः - ' अमुष्मा-दादित्यात्प्रतायन्ते ता आसु नाडीषु सृप्ता आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्ते ते मुष्मिन्नादित्ये सृप्ताः ( छा ० ८६२ ) इति । निदाघसमये च निशास्वपि किरणानुवृत्तिरुपलभ्यते, प्रतापादिकार्यदर्श नात् । स्तोकानुवृत्तेस्तु दुर्लक्ष्यत्वमृत्वन्तररजनीषु, शैशिरेष्विव दुर्दिनेषु । ' अहरेवैतद्रात्रौ दधाति ' इति चैतदेव दर्शयति । यदि च रात्रौ प्रेतो विनैव रश्म्यनुसारेणोर्ध्वमाक्रमेत रम्यनुसारानर्थक्यं भवेत्, न ह्येतद्विशिष्याभिधीयते - यो दिवा प्रति स रश्मीनपेक्ष्योर्ध्व-माकमते, यस्तु रात्रौ सोऽनपेक्ष्यैवेति । अथ तु विद्वानपि रात्रिप्रायणावराधमात्रेण नोर्ध्व-माक्रमेत पाक्षिकफला विद्येत्यप्रवृत्तिरेव तस्यां स्यात्, मृत्युकालानियमात् । अथापि रात्रावुपरतोऽहरागममुदीक्षेत । अहरागमेऽप्यस्य कदाचिदरश्मिसंबन्धार्ह शरीरं स्यात्, दिनमें नाड़ी और रश्मिका सम्बन्ध है, अतः दिनमें मृत विद्वान् रश्मि अनुसारी हो सकता है, किन्तु रात्रि में मृतक रश्मि अनुसारी नहीं हो सकता, क्योंकि रात्रिमें नाड़ी और रश्मिका सम्बन्ध विच्छिन्न होता है । सि ० - ऐसा यदि कहो तो ठीक नहीं है, कारण कि नाड़ो और रश्मि सम्बन्ध यावाद हावी है, जब तक देह विद्यमान है तब तक नाड़ी और रश्मिका सम्बन्ध है । इस अर्थको ' अमुष्मादादित्यात्प्रता यन्ते ० ' ( वे रश्मियाँ निरन्तर उस मादित्य मण्डलसे फैलती हैं और इन नाड़ियों में प्रवेश करती हैं और इन नाड़ियोंसे फैलती हैं वे उस आदित्यमण्डल में प्रवेश करती हैं ) यह श्रुति दिखलाती है । ग्रीष्मकालमें रात्रियों में भी किरणों की अनुवृत्ति उपलब्ध होती है, क्योंकि ताप आदि कार्य देखने में आता है । शिशिर ऋतुके दुर्दिनोंके - मेघाच्छन्न दिनोंके समान अन्य ऋतुयोंकी रात्रियोंमें किरणोंकी अल्प अनुवृत्ति होने से वे दुर्लक्ष्य हैं । ' अहरेवैतद्रात्रौ दधाति ' ( सूर्य ही यह ताप रात्रि में धारण करता है ) यह श्रुतिमी यही दिखलाती है । यदि रात्रिमें मृतक रश्मि अनुसारके विना ही ऊर्ध्वं आक्रमण -गमन करे तो रश्मिका अनुसार अनर्थक होगा । श्रुति इस प्रकार यह विशेषकर अभिघान नहीं करती कि जो दिनमें मरता है वह रश्मिकी अपेक्षा कर ऊध्वं आक्रमण करता है जो रात्रिमें मरता है वह रश्मिकी अपेक्षा न कर ही ऊर्ध्वं आक्रमण करता है । यदि विद्वान् मी रात्रि प्रायणके अपराधमात्र से ऊर्ध्वगमन - प्रक्रमण नहीं करे तो विद्या पाक्षिक फलवाली होगी, इससे उसमें प्रवृत्ति न होगी, क्यों, मृत्युसमयका अनियम है । यदि रात्रिमें मृतक दिन आगमनकी प्रतीक्षा करे तो दिनके आगमन होनेपर भी कदाचित् इसका शरीर अग्नि आदिके सम्पर्कसे रश्मिसम्बन्धके अयोग्य होगा, ' स यावत्क्षि-येन्मनः ० ' ( वह जितने समय में मनकी प्रेरणा करता है उतने ही समय में आदित्य में पहुँचता है ) सत्यानन्दी - दीपिका इस प्रकारकी अविशेष श्रृतिके होनेसे दिन अथवा रात्रि किसी समय भी उत्क्रान्त उपासक रश्मि अनु-सारी होता है ॥ १८ ॥

* विद्याका फल पाक्षिक - केवल दिनमें मृत उपासक रश्मि अनुसारी होता है । ऐसा नहीं है, किन्तु

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अधि ० ११ सू ० २० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित III पावकादिसंपर्कात् ' स यावत्क्षिप्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छति ' ( छा ० ८/६/५ ) इति च श्रुतिर-नुदीक्षां दर्शयति । तस्मात्तदविशेषेणैवेदं रात्रिंदिवं रश्म्यनुसारित्वम् ॥ १ ९ ॥ ( ११ दक्षिणायनाधिकरणम् । सू ० २०-२१ ) अतश्चायनेऽपि दक्षिणे ॥ २० ॥

पदच्छेद - अतः, च, आयने, अपि, दक्षिणे । सूत्रार्थ - ( अतश्च ) और प्रतीक्षाकी उपपत्ति न होने से ( दक्षिणे - आयनेऽपि ) दक्षिणायनमें भी मृत उपासकको विद्याका फल प्राप्त होता है । * अत एव चोदीक्षानुपपत्तेः, अपाक्षिकफलत्वाच्च विद्यायाः, अनियतकालत्वाच्च मृत्योर्दक्षिणायनेऽपि म्रियमाणो विद्वान्प्राप्नोत्येव विद्याफलम् । उत्तरायणमरणप्राशस्त्य-प्रसिद्धेर्भीष्मस्य च प्रतीक्षादर्शनात्, ' आपूर्यमाणपक्षाद्यान्षडुदङ्ङेति मासांस्तान् ' ( छा ०४।१५ / ५ ) इति च श्रुते ', अपेक्षितव्यमुत्तरायणमितीमामाशङ्कामनेन सूत्रेणापनुदति । प्राशस्त्यप्रसि-द्धिरविद्वद्विषया । भीष्मस्य प्रतिपालनमाच्चारप्रतिपालनार्थं पितृप्रसादलब्ध स्वच्छन्द-मृत्युताख्यापनार्थं च । श्रुतेस्त्वर्थं वक्ष्यति - ' आतिवाहिका स्तल्किङ्गात् ' ( ब्रह्मसूत्र ४ | ३ | ४ ) इति ॥ ननु च - ' यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः । प्रयाता यान्ति त कालं वक्ष्यामि भरतर्षम ' ( गी ० ८।२३ ) इति कालप्राधान्येनोपक्रम्याऽहरादिकालविशेषः स्मृतावनावृत्तये नियमितः, कथं रात्रौ दक्षिणायने वा प्रयातोऽनावृत्तिं यायादिति? अत्रोच्यते-इस प्रकार यह श्रुति अप्रतीक्षा दिखलाती है । इसलिए अविशेषसे ही यह रात्रि और दिन में रश्मिका अनुसरण होता है ॥ १ ९ ॥ अत एव प्रतिक्षाकी अनुपपत्ति विद्यफलके अपाक्षिक और मृत्युके अनियमित काल होनेसे दक्षिणायनमें भी म्रियमाण विद्वान् विद्याफलको प्राप्त होता ही है । उत्तरायणमें मरणकी प्रशस्ता प्रसिद्ध होनेसे और भीष्मको प्रतीक्षा दर्शनसे और ' आपूर्यमाणपक्षा ० ' ( शुक्ल पक्षाभिमानी देवता से उत्तरायणके छः मासोंको प्राप्त होता है ) इस श्रुतिसे मी उत्तरायण अपेक्षितव्य है, इस शङ्काको इस सूत्रसे दूर करते हैं । प्राशस्त्यप्रसिद्धि अविद्वद्विषयक है । मोष्मकी उत्तरायण प्रतीक्षा तो आचारके प्रतिपालन के लिए और पिता शान्तनुके प्रसादसे प्राप्त स्वेच्छा से मृत्यु दिखलाने के लिए है । श्रुतिका अथं तो, ' भातिवाहिकास्त लिङ्गात् ' इस सूत्रमें कहेंगे ॥ २० ॥

परन्तु ' यन्त्र काले ० ' ( हे अर्जुन! जिस कालमें शरीर त्यागकर गये हुए योगीजन अनावृत्ति गति और आवृत्ति गतिको मी प्राप्त होते हैं, उस काल - मार्गको कहूंगा ) इसप्रकार कालको प्रधानता से उपक्रमकर अह ( दिन ) आदि कालविशेष अपुनरावृत्ति के लिए स्मृतिमें नियमित किया है, तो रात में अथवा दक्षिणायनमें प्रायण करनेवाला अनावृत्तिको किसप्रकार प्राप्त होगा? इसपर कहते हैं-सत्यानन्दी - दीपिका दिन अथवा रातमें मृत उपासक मी विद्याकी सामर्थ्यंसे रश्मि अनुसारी होकर ऊर्ध्वं गमन करता है ॥ १ ९ ॥ * विद्वानुका दक्षिणायनमें मरण इस अधिकरणका विषय है । अब इसपर विचार किया जाता है - दक्षिणायनमें म्रियमाण विद्वान् विद्याफल प्राप्त करता है कि नहीं? यह सन्देह इसलिए होता है कि विद्याका फल नित्यके समान श्रुत है और उत्तरायण मरण दक्षिणायन मरणसे प्रशस्त कहा गया है । इसप्रकार सन्देह होनेपर पूर्वोक्त हेतुओंका ' अतश्च ' इस सूत्र से अतिदेश करते हैं । यदि विद्वान् केवल उत्तरायणमरणये विद्याका फल प्राप्त करता है और दक्षिणायन मरणसे नहीं, तो विद्याका फल पाक्षिक हुआ, इससे विद्यामें प्रवृत्ति नहीं होगी, इसलिए विद्याका फल नित्यके समान पूर्व अधिकरणमें कहा गया है । यदि अज्ञानियोंका देववश उत्तरायण मरण हो तो वह

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८४४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ०४ पा ० २ योगिनः प्रति च स्मर्यते स्मार्ते चैते ॥ २१ ॥

पदच्छेद - योगिनः, प्रति, च, स्मयंते, स्मार्ते, च, एते । सूत्रार्थ - ( योगिनः प्रति ) योगीके प्रति अह आदि कालका विनियोग अनावृत्तिके लिए ( स्मर्यते ) स्मरण किया जाता है । ( स्मार्ते चैते ) और यह दोनों गति सांख्य और योग में भी प्रति-पादित है । * योगिनः प्रति चायमहरादिकालविनियोगोऽनावृत्तये स्मर्यते । स्मार्ते चैते योग-सांख्ये, न श्रौते I । अतो विषयभेदात्प्रमाणविशेषाच्च नास्य स्मार्तस्य कालविनियोगस्य श्रोतेषु विज्ञानेष्ववतारः । ननु ' अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ' । ' धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ' ( गी ० ८।२४-२५ ) इति च श्रौतावेतौ देवयानपितृयाणौ प्रत्यभिज्ञायेते स्मृतावपीति । उच्यते - ' तं कालं वक्ष्यामि ' ( गी ० ८।२३ ) इति स्मृतौ काल-प्रतिज्ञानाद्विरोधमाशङ्कय अयं परिहार उक्तः । यदा पुनः स्मृतावप्यग्न्याद्या देवता एवातिवाहिक्यो गृह्यन्ते, तदा न कश्चिद्विरोध इति ॥ २१ ॥

इति श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ शारीरकमीमांसा माष्ये चतुर्थाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ २ ॥

योगी प्रति यह यह आदि कालका विनियोग अनावृत्तिके लिए है, ऐसी स्मृति है । और यह दोनों योग और सांख्य स्मृतिवचन हैं न कि श्रुतिवचन । इसलिए विषय भेदसे और प्रमाण-विशेषसे इस स्मार्तकाल विनियोगका श्रौत उपासनाओं में अवतरण नहीं है । परन्तु ' अग्निर्ज्योतिरह ० ' ( अग्नि, ज्योतिः, अहः, शुक्लपक्ष, षड्मास, उत्तरायण, धूम, रात्रि, कृष्णपक्ष और षड्मास, दक्षिणायन ) इसप्रकार ये श्रौत देवयान और पितृयान स्मृतिमें भी प्रत्यभिज्ञात होते हैं । कहते हैं. ' तं कालं वक्ष्यामि ' ( उस काल - मागंको कहूँगा ) इसप्रकार स्मृतिमें कालके प्रतिज्ञान होनेसे विरोधकी आयङ्काकर परिहार कहा गया है । परन्तु जब स्मृतिमें भी अग्नि आदि देवताओंका आतिवाहिकरूपसे ही ग्रहण किया जाय तो कोई विरोध नहीं है ॥ २१ ॥

स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत शाङ्करभाष्य - भाषानुवाद के चतुर्थाध्यायका द्वितीय पाद समाप्त ॥ २ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका दक्षिणायन मरणसे प्रशस्त है । ' आपूयर्माणपक्षा ० ' यह जो श्रुति कही गई है वह काल विशेषका ज्ञान कराने के लिए नहीं है । किन्तु ' आतिवाहिका ' देवताओंका प्रतिपादन करती है । इसलिए दक्षिणायन में मृत विद्वान् मी विद्याकी सामथ्यसे विद्याके फल ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है ॥ २० ॥

* स्मृतिके बाधारपर कालकी प्रधानताको लेकर ' ननु ' इत्यादिसे शङ्का की गई है । अब स्मृति में काल वाचक ' अहं ' आदि शब्द अग्नि आदि व्यातिवाहिक देवता वाचक हैं, इस अर्थको ' योगिनः प्रति ' इस सूत्र से कहते हैं । यहाँपर श्रीत और स्मात भेदसे विचार किया जाता है— दहर आदि श्रोत उपासकोंको फल प्राप्तिके लिए कालकी प्रतीक्षा नहीं है 1 । स्मातं योगियोंके लिए तो कालकी अपेक्षा स्मृतिमें कही गई है, क्योंकि स्मात योगी दहर बादि श्रोत उपासक नहीं होते, किन्तु अनाश्रितः कर्मफलं कार्य कर्म करोति यः । स संन्यासी च योगी च न निराग्निर्न चाक्रियः ॥ ( गी ० ६।१ ) ( हे अर्जुन! जो पुरुष कर्मफलको न चाहता हुआ कर्तव्य कर्म करता है वह संन्यासी और योगी है और केवल अग्निहोत्र आदि कर्मका त्याग करनेवाला संन्यासी और योगी नहीं है ) इसप्रकार भगवद् आराधनके लिए अनुष्ठित कर्म योग है । धारणापूर्वक जो अकर्तृत्वानुभव है, उसे ' इन्द्रियाणी-न्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ' ( गीता ० ५१ ९ ) ( चक्षु आदि इन्द्रियाँ अपने अपने रूप आदि विषयोंमें वतं रही हैं इसप्रकार समझा हुआ निःसन्देह ऐसा माने कि मैं कुछ मो नहीं करता हूँ ) इत्यादिसे सांख्य कहते हैं । इसप्रकार योग और सांख्य दोनों स्मृति प्रतिपादित हैं श्रुति प्रतिपादित

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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ८४५ चतुर्थेऽध्याये तृतीयः पादः । [ अत्र पादे सगुणविद्यावतो मृतस्योत्तरमार्गाभिधानम् ] ( इस पादमें सगुण विद्यावाले मृतोपासक के लिए उत्तर मार्गका अभिधान है ) ( १ अर्चिराद्यधिकरणम् । सू ० १ ) अर्चिरादिना तत्प्रथितेः ॥ १ ॥

पदच्छेद - अचिरादिना तत्प्रथितेः । सूत्रार्थ - ( अचिरादिना ) ब्रह्मलोक प्राप्तिके अभिलाषी सब उपासक अर्चिरादि मागंसे ही जाते हैं, ( तथिः ) क्योंकि सब विद्वानोंमें यह मार्ग प्रसिद्ध है । * आसृत्युपक्रमात्समानोत्कान्तिरित्युक्तम्, सृतिस्तु श्रुत्यन्तरेष्वनेकधा श्रूयते । नाडीरश्मि संबन्धेनैका ' अथैतैरेव रश्मिभिरूर्ध्वमाक्रमते ' ( छा ० ८।६।५ ) ' इति । अर्चिरादिकैका ' तेऽर्चिषमभिसंवन्त्यर्चिषोऽह: ' ( बृह ० ६ । २ । १५ ) इति । स एतं देनयानं पन्थानमासाद्याग्निलोकमा -गच्छति ' ( कौषी ० १।३ ) इत्यन्या । ' यदा नै पुरुषोऽस्माल्लोकात्प्रेति स वायुमागच्छति ' ( बृह ० ५।१०।१ ) इत्यपरा । ' सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति ' ( सुण्ड ० १।२१११ ) इति चापरा । तत्र संशयः-किं परस्परं भिन्ना एताः सृतय किं वैकैवानेकविशेषणेति? तत्र प्राप्तं तावत्- -भिन्ना एताः सृतय इति भिन्नप्रकरणत्वात्, भिन्नोपासनशेषत्वाच्च । अपि च ' अथैतैरेव रश्मिभिः ' ( छ । ८।६।५ ) इत्यवधारणमचिराद्यपेक्षायामुपरुध्येत । त्वरावचनं च पीडयेत ' स यावत्क्षिप्ये-यह कहा जा चुका है कि मार्गके उपक्रम तक उत्क्रान्ति समान है । परन्तु मागं तो अन्य श्रुतियोंमें अनेक प्रकारसे सुना जाता है । ' अथैतैरेव ० ' ( मरणानन्तर इन रश्मियोंसे ही ऊर्ध्वको चढ़ता है ) इसप्रकार नाड़ी बोर रश्मि सम्बन्धसे एक मार्ग है । ' तेऽर्चिषमभि ० ' ( ये ज्योति के अभिमानी देवताको प्राप्त होते हैं, ज्योति अभिमानी देवतासे अह अभिमानी देवताको प्राप्त होते हैं ) इसप्रकार यह दूसरा अचिरादिमांगं है । ' स एतं देवयानं ० ' ( वह इस देवयान मार्गको प्राप्तकर अग्निलोकको प्राप्त होता है ) यह अन्य मार्ग है । ' यदा बै ० ' ( जिस समय यह उपासक पुरुष इस लोकसे प्रायण कर जाता है उस समय वह वायुको प्राप्त होता है ) यह दूसरा मार्ग है । ' सूर्यद्वारेण ० ' ( वे पाप रहित होकर सूर्यद्वारा- उत्तरायण मार्ग से वहां जाते हैं ) यह और अन्य मार्ग है । उसमें संशय होता है कि क्या ये परस्पर भिन्न - भिन्न मार्ग हैं अथवा क्या अनेक विशेषण विशिष्ट एक ही मार्ग है? पूर्वपक्षी -इस संशय में ऐसा प्राप्त होता है कि ये मार्ग तो मिन्न - भिन्न हैं, क्योंकि भिन्न प्रकरण हैं और भिन्न उपासनाके अङ्ग हैं । और ' अथैतैरेव रश्मिभिः ' ( अनन्तर इन रश्मियोंसे ही ) इस अवधारणका अचिरादिकी अपेक्षा होनेपर बाघ होगा । और ' स यावत्क्षिप्येन्मनः ० ' ( वह जितने समयमें मनको सत्यानन्दी - दीपिका नहीं हैं | इस तरह श्रुति और स्मृतिका विषय भिन्न - भिन्न होने से कोई विरोध नहीं है । यदि यहाँ काल शब्द आतिवाहिक देवताके लिए माने तो श्रुति और स्मृति दोनोंमें कोई विरोध नहीं है । अग्नि आदि नामवाले देवता हैं जो सगुण उपासकोंको ऊध्वं लोकों में ले जाते हैं । इससे यह सिद्ध हुआ कि दक्षिणायनमें भी मृत सगुण उपासक विद्याको सामथ्यं से फल - ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है ॥ २१ ॥

स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत ' सत्यानन्दी - दीपिका ' के चतुर्थाध्यायका द्वितीयपाद समाप्त ॥ २ ॥

* उत्क्रान्तिका निरूपण कर अब उससे साध्य जोर गन्तव्यमार्गका निरूपण करनेके लिए इस पादका आरम्भ किया जाता है । उसमें भी पहले गत अधिकरण में जिस किसी समय मृत उपा-सककी फल प्राप्ति कही गई है, उसके समान जिस किसी मागंसे गति भी होनी चाहिए । इसप्रकार

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८४६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० ३ न्मनस्तावदादित्यं गच्छति ' ( छा ० ८ | ६ | ५ ) इति । तस्मादन्योन्यभिन्ना एवैते पन्थान इति । एवं प्राप्तेऽभिदध्महे - अर्चिरादिनेति । सर्वो ब्रह्मप्रेप्सुरर्चिरादिनैवाध्वना रहतीति प्रतिजानी-महे । कुतः? प्रथितेः । प्रथितो ह्येष मार्गः सर्वेषां विदुषाम् । तथा हि - पञ्चाग्निविद्या-प्रकरणे ' ये चामी अरण्ये श्रद्धां सत्यमुपासते ' ( बृह ० ६।२।१५ ) इति विद्यान्तरशीलिनामप्यर्थि-रादिका सृतिः श्राव्यते । स्यादेतत् - यासु विद्यासु न काचिद्गतिरुच्यते तास्वियमर्चिरादि-कोपतिष्ठताम्, यासु त्वन्या श्राव्यते तासु किमित्यर्चिराद्याश्रयणमिति? अत्रोच्यते- भवेदे -तदेवम् - यद्यत्यन्तभिन्ना एवैताः सृतयः स्युः । एकैव त्वेषा सृतिरनेकविशेषणा ब्रह्मलोक-प्रपदनी कचित्केचिद्विशेषणेनोपलक्षितेति वदामः, सर्वत्रैकदेशप्रत्यभिज्ञानादितरेतरवि-शेषणविशेष्यभवोपपत्तेः । प्रकरणभेदेऽपि हि विद्यैकत्वे भवतीत रेत विशेषणोपसंहारवद्ग-तिविशेषणानामप्युपसंहारः । विद्याभेदेऽपि तु गत्येक देशप्रत्यभिज्ञानाद् गन्तव्याभेदाच्चगत्य-भेद एव । तथा हि- ' ते तेषु ब्रह्मलोकेषु पराः परावतो वसन्ति ' ( बृह ० ६ । २ । १५ ), ' तस्मिन्वसन्ति शाश्वतीः समाः ’ ( बृह ० ५।१०।१ ), ' सा या ब्रह्मणो जितिर्या व्युष्टिस्तां त्रिति जयति तां व्युष्टि व्यश्नुते ' ( कौषी ० १।४ ) ' तद्य एवैतं ब्रह्मलोकं ब्रह्मचर्येणानुविन्दति ' ( छा ० ८ | ४ | ३ ) इति च तत्र तत्र तदेवैकं फलं ब्रह्मलोकप्राप्तिलक्षणं प्रदर्श्यते । यत्त्वेतैरेवेत्यवधारणमर्चिराद्याश्रयणे न स्यादिति - नैष प्रेरित करता है उतने ही समय में आदित्यको प्राप्त हो जाता है ) यह त्वरावचन बाधित होगा । इसलिए ये मागं परस्पर भिन्न हैं । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं --- ' अविरादिना ' | ऐसी हम प्रतिज्ञा करते हैं कि ब्रह्मलोक प्राप्त करनेकी इच्छ वाले सब उपासक अचिरादि मार्गसे ही जाते हैं । किससे? इससे कि उसकी प्रसिद्धि है । यह मार्ग सब विद्वानोंमें प्रसिद्ध ही है । जैसे कि पञ्चाग्नि विद्याके प्रकरण में ' ये चामी अरण्ये ० ' ( तथा जो संन्यासी अथवा वानत्रस्य वनमें श्रद्धायुक्त होकर सत्य-हिरण्यगर्भकी उपासना करते हैं ) इसप्रकार अन्य विद्याका परिशीलन करनेवालों के लिए भी अचिरादि मार्ग सुनाया जाता है । ऐसा हो, परन्तु जिन विद्याओं में कोई गति ( मार्ग ) नहीं कही जाती है उनमें तो यह अचिरादि गति स्थापित हो, जिनमें अन्य गति सुनाई जाती है उनमें अचिरादि गतिका आश्रयण क्यों होना चाहिए? इसपर कहते हैं - यदि ये मार्ग अत्यन्त भिन्न हों तो ऐसा ही हो । परन्तु यह तो ब्रह्मलोक प्राप्त करानेवाला अनेक विशेषणोंसे युक्त एक ही मार्ग है और वह कहीं पर किसी एक विशेषणसे उपलक्षित होता है, ऐसा हम कहते हैं, क्योंकि सर्वत्र एक देशका प्रत्यभिज्ञान होनेसे अन्योन्य विशेषण - विशेष्यभाव उपपन्न होता है । प्रकरणके भेद होनेपर भी विद्याके एक होनेपर अन्योन्य विशेषण के उपसंहारके समान मागं विशेषणोंका भी उपसंहार होता है । विद्याके भिन्न होनेपर भी तो गति के एकदेशका प्रत्यभिज्ञान होनेसे और गन्तव्यका अभेद होनेसे गतिका अभेद ही है । क्योंकि ' ते तेषु ब्रह्मलोकेषु ० ' ( वे उस ब्रह्मलोकों में दीर्घायु हिरण्यगर्भके अनन्त संवत्सर पर्यन्त रहते हैं ) ' तस्मिन्वसन्ति ० ' ( उसमें ब्रह्मा के अनेक कल्पोंतक निवास करते हैं ) ' सा या ब्रह्मणो ० ' ( वह जो हिरण्यगर्भका सर्वलोक जय है और जो व्याप्ति है उस जय और व्याप्तिको प्राप्त करता है ) ' तद्य एवैतं ० ' ( वहाँ ऐसा होनेके कारण जो इस ब्रह्मलोकको ब्रह्मचयंसे शास्त्र और आचार्यके उपदेश अनुसार प्राप्त होया है ) इसप्रकार उस श्रुतिमें वही ब्रह्मलोक प्राप्तिरूप एक फल दिखाया जाता है । सत्यानन्दी - दीपिका दृष्टान्त संगति से पूर्वपक्ष होनेपर इस अधिकरणका आरम्भ किया जाता है । इस अधिकरण में विचार का विषय मागं है । * ' अथैतैरेव रश्मिभिः ' अवधारणात्मक यह ' एव ' शब्द रातमें स्पष्टरूपसे किरणोंकी प्रतीति