श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 881–890

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 881–890

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अधि ० २ सू ० २ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८४७ दोषः, रश्मिप्राप्तिपरत्वादस्य न होक एवं शब्दो रश्मींश्च प्रापयितुमर्हत्यचिरादींश्च व्यावर्तयितुम् । तस्माद्रश्मिसंबन्ध एवायमवधार्यंत इति द्रष्टव्यम् 1 त्वरावचनं त्वर्चिरा-द्यपेक्षायामपि गन्तव्यान्तरापेक्षया क्षैप्रयार्थत्वान्नोपरुध्यते- - यथा निमिषमात्रेणात्रागम्यत इति । अपि च ' अथैतयोः पथोनं कतरेणचन ' ( छा ० ५/१०१८ ) इति मार्गद्वयभ्रष्टानां कष्टं तृतीयं स्थानमाचक्षाणा पितृयाणव्यतिरिक्तमेकमेव देवयानमर्चिरादिपर्वाणं पन्थानं प्रथयति । भूयांस्यर्चिरादिसृतौ मार्गपर्वाण्यल्पीयांसि त्वन्यत्र । भूयसां चानुगुण्येना-ल्पीयसां नयनं न्याय्यमिति, अतोऽप्यर्चिरादिना तत्प्रथितेरित्युक्तम् ॥ १ ॥

( २ वाय्यधिकरणम् । सू ० २ ) वायुमन्दादविशेषविशेषाभ्याम् ॥ २ ॥

पदच्छेद - वायुम्, अब्दात्, अविशेषविशेषाभ्याम् । सूत्रार्थ - ( अब्दात् ) संवत्सर के अनन्तर आदित्यके पूर्वं ( वायुम् ) वायुलोकको प्राप्त होते हैं, ( विशेषविशेषाभ्याम् ) क्योंकि ' स वायुलोकम् ' सामान्य और ' यदा वै पुरुषो ० ' विशेष श्रुति है । * केन पुनः संनिवेशविशेषेण गतिविशेषणानामितरेतर विशेषणविशेष्यभाव इति? तदेतत्सुहृद्भूत्वा ss वार्यो ग्रथयति । स एतं देवयानं पन्थानमापद्याभिलोकमागच्छति स वायु-लोकं स इन्द्रलोकं स प्रजापतिलोकं स ब्रह्मलोकम् ' ( कौ ० १।३ ) इति कौषीतकिनां देवयानः पन्थाः पठ्यते । तत्रार्चिरग्निलोकशब्दौ तावदेकार्थों ज्वलनवचनत्वादिति नात्र संनिवेश-जो यह कहा गया है कि अचिरादिके आश्रयण करनेपर ' एतैरेव ' ( इन रश्मियोंसे ही ) यह अवधारण न होगा | यह दोष नहीं है, क्योंकि यह रश्मि प्राप्ति परक है । कारण कि एक ही ' एव ' शब्द रश्मि प्राप्ति के लिए और अचिरादिकी व्यावृत्तिके लिए हो यह युक्त नहीं है । इससे यह रश्मि सम्बन्ध ही अवधारित होता है, ऐसा जानना चाहिए | त्वरावचन तो अचिरादिकी अपेक्षा में भी अन्य गन्तव्यको अपेक्षासे शीघ्रता अर्थके लिए होनेसे बाधित रहीं होता । ' जैसे निमिषमात्र में यहां आ जाता है ' और ' अथैतयोः पथोर्न ० ' ( जब उपासना और इष्ट आदि कर्म इन दोनोंमें एकका भी सेवन नहीं करता तब अर्चिरादि मार्ग और धूम मार्ग दोनोंमेंसे किसी भी मार्गसे नहीं जाता ) इन दो मार्गों से भ्रष्ट हुए लिए कष्टप्रद तृतीय स्थान कहती हुई श्रुति पितृयाणसे पृथक् अचिरादि पर्ववाले एक ही देवयान मार्गको प्रसिद्ध करती है । अचिरादि गति में बहुतसे मार्ग पर्व हैं और अन्यत्र थोड़े से पर्व हैं । बहुतों के अनुरूपसे ही अल्पों का ग्रहण न्याय है । इससे भी ' अर्चिरादिना तत्प्रथितेः ' ऐसा कहा गया है ॥१ ॥

पुन: किस संनिवेश ( सम्बन्ध ) विशेष से गति विशेषणोंका अन्योन्य ( एक दूसरेका ) विशेषण विशेष्यभाव है? आचार्यं सुहृद होकर इसका प्रतिपादन करते हैं । ' स एतं देवयानं ० ' ( वह इस देवयान मार्गको प्राप्तकर अग्निलोकको जाता है, अनन्तर वह वायुलोकमें, वह वरुणलोकमें, वह इन्द्रलोकमें, वह प्रजापतिलोकमें, वह ब्रह्मलोकमें जाता है ) इस प्रकार कौषीतकी शाखावालोंकी उपनिषद् में देवयान मार्ग पठित है । उसमें अचि और अग्निलोक शब्द तो एकार्थक हैं, क्योंकि वे अग्निवाचक सत्यानन्दी दीपिका न होनेपर रात में मृतोपासकका किरणों के साथ असम्बन्धकी शङ्का से निवृत्तिके लिए है । किसी मी समय मृतोपासकका किरणोंके साथ सम्बन्ध अवश्यंभावी है, इसको ' एव ' शब्द सूचित करता है ॥१ ॥

* अचिरादि एक ही मार्ग है, इस आधारपर विशेषण - विशेष्यभावक्रम ' स एतं देवयानं ० ' इस प्रकार पूर्व - पूर्व उत्तर - उत्तरका विशेषण और उत्तर - उत्तर विशेष्य समझना चाहिए । इस प्रकार अधिकरणका तात्पर्य कहकर अब ' स एतं देवयानं ० ' इत्यादिसे विषय कहते हैं । इसमें अग्निके अनन्तर

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III ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० ३ क्रमः क्वचिदन्वेष्यः । वायुस्त्वचिरादौ वर्त्मनि न श्रुतः कतमस्मिन् स्थाने निवेशयितव्य इति । उच्यते- ' तेऽर्चिषमेवामिसंमवन्त्यषिोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद्यान् षडुदङ्ङेति मासांस्तान् मासेभ्यः संवत्सरं संवत्सरादादित्यम् ' ( छा ० ५।१०।१,२ ) इत्यत्र संवत्सरात्पराञ्च-मादित्यादर्वाञ्चं वायुमभिसंभवन्ति । कस्मात्? अविशेषविशेषाभ्याम् । तथा हि - ' स वायुलोकम् ' ( कौ ० ११३ ) इत्यत्राविशेषोपदिष्टस्य वायोः श्रुत्यन्तरेण विशेषोपदेशो दृश्यते ' यदा वै पुरुषोऽस्माल्लोकात्प्रेति स वायुमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा रथचक्रस्य रवं तेन स ऊर्ध्वमाक्रमते स आदित्यमागच्छति ' ( बृह ० ५ १०1१ ) इति । एतस्मादादित्याद्वायोः पूर्वत्व-दर्शनाद्विशेषादन्दादित्ययोरन्तराले वायुर्निवेशयितव्यः । * कस्मात्पुनरग्नेः परत्वदर्श-नाद्विशेषादर्चिषोऽनन्तरं वायुर्न निवेश्यते? नैषोऽस्ति विशेष इति वदामः । ननूदाहृता श्रुतिः - ' स एतं देवयानं पन्थानमापद्याग्निलोकमागच्छति स वायुलोकं स वरुणलोकम् ' ( कौषी ० १।३ ) इति, उच्यते - केवलोऽत्र पाठः पौर्वापर्येणावस्थितो नात्र क्रमवचनः कश्चिच्छन्दोऽस्ति । पदार्थोपदर्शनमात्रं ह्यत्र क्रियते एतमेतं चागच्छतीति । इतरत्र पुनर्वायुप्रत्तेन रथचक्र-हैं, इसलिए इसमें कहीं पर संनिवेश क्रम अन्वेषणीय नहीं है । परन्तु वायु अचिरादि मार्गमें श्रुत नहीं है इससे उसका किसी स्थानमें निवेश होना चाहिए? कहते हैं- ' तेऽर्चिषम ० ' ( वे प्रायण के अनन्तर अचि-अचि अभिमानी देवताको प्राप्त होते हैं, अर्चिसे अह - दिनको, अह - दिनसे शुक्लपक्षको शुक्लपक्षसे जिन छः मासोंमें सूर्यं उत्तर जाता है उन छः मासोंको, मासोंसे संवत्सरको, संवत्सरसे आदित्यको प्राप्त होते हैं ) इसमें संवत्सर के अनन्तर और आदित्य से पूर्वं वायुको प्राप्त होते हैं, किससे? इससे कि सामान्य और विशेष श्रुति है । जैसे कि ' स वायुलोकम् ' ( वह वायुलोकको प्राप्त होता है ) इस श्रुतिमें अविशेष रूप से उपदिष्ट. वायुका ' यदा बै ० ' ( जिस समय यह उपासक इस शरीररूपी लोकसे प्रायण कर जाता है उस समय वह वायुको प्राप्त होता है । वहीं वह वायु उसके लिए छिद्र युक्त हो जाता है - मागं दे देता है, जैसा कि रथ के पहिएका छिद्र होता है । उसके द्वारा वह ऊर्ध्वं होकर चढ़ता है । वह सूर्यलोक में पहुँच जाता है ) इस प्रकार इस अन्य श्रुतिद्वारा विशेषरूपसे उपदेश देखा जाता है, इस आदित्य से वायुका पूर्व दर्शन है इस विशेष से संवत्सर और आदित्यके बीचमें वायुका निवेश करना चाहिए । परन्तु अग्निके अनन्तर वायुका दर्शन है, इस विशेषसे अर्चिके अनन्तर वायुका निवेश क्यों नहीं किया जाता है? यह विशेष नहीं है, ऐसा हम कहते हैं । परन्तु ' स एतं देवयानम् ' ० ( इस देवयान मार्गको प्राप्त कर वह अग्निलोकको प्राप्त होता है, वह वायुलोकको, वह वरुणलोकको प्राप्त होता है ) यह श्रुति उदाहृत है? कहते हैं- इसमें पौर्वापयंसे केवल पाठ ही अवस्थित है किन्तु यहाँ क्रमवाची कोई शब्द नहीं है । ' वह इस इस स्थानको जाता है ' इसप्रकार यहां पर केवल पदार्थका उपदर्शन मात्र किया जाता है । सत्यानन्दी - दीपिका पठित वायु विषय है । क्या इस वायुका पाठ अचिरूप अग्नि के अनन्तर है अथवा संवत्सर के? यह संशय इसलिए होता है कि ' अग्निलोकमागच्छति स वायुलोकम् ' इस पाठक्रमसे तो अग्निके अनन्तर वायुका पाठ है और ' यदा वै पुरुषो ० ' इस विशेष श्रुतिमें आदित्य के पहले पाठ है, और ' तेऽर्चिषम् ० ' इस श्रुतिमें संवत्सरका आदित्यसे पूर्व पाठ है और वायुका पाठ ही नहीं है । तब वायुका कहाँ निवेश होना चाहिए? सिद्धान्ती - पाठक्रम श्रुतिसे दुर्बल है, अतः ' यदा व पुरुषो ' इस विशेष श्रुति वायुका संवत्सर और आदित्य के बीचमें निवेश होना चाहिए । * पाठक्रमके आधारपर पूर्वपक्षी कहते हैं - ' स एतं देवयानम् ' इस कौषीतकी श्रुति अग्न के अनन्तर वायुका पाठ है । तो ' तेऽर्चिषम् ' इस छान्दोग्य श्रुतिमें मो अचिके अनन्तर वायुका संनि-वेश होना चाहिए? सिद्धान्ती - ' स एतं देवयानं ' यह अग्निके पश्चात् वायुका पाठ विशेष नहीं है

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अधिक ३ सू ० ३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८४ ९ मात्रेण च्छिद्रेणोर्ध्वमाक्रम्यादित्यमागच्छतीत्यवगम्यते क्रमः । तस्मात्सूक्तम् - अविशेष-विशेषाभ्यामिति । वाजसनेयिनस्तु ' मासेभ्यो देवलोकं देवलोकादादित्यम् ' ( बृह ० ६ । २ । ५ ) इति समामनन्ति । तत्रादित्यानन्तर्याय देवलोकाद्वायुमभिसंभवेयुः | ' वायुमब्दात् ' इति तु छन्दोगश्रुत्यपेक्षयोक्तम् । छान्दोग्यवाजसनेयकयोस्त्वेकत्र देवलोको न विद्यते, परत्र संवत्सरः । तत्र श्रुतिद्वयप्रत्ययादुभावप्युभयत्र ग्रथयितव्यौ । तत्रापि माससंबन्धात्संवत्सरः पूर्व पश्चिमो देवलोक इति विवेक्तव्यम् ॥२ ॥

( ३ तडिदधिकरणम् । सू ० तडितोऽधि वरुणः संबन्धात् पदच्छेद - तडितः, अघि, वरुणः, सम्बन्धात् । सूत्रार्थ - ( वडितः ) विद्युत् लोकसे ( अधि ) ऊपर ( क्योंकि वरुणका विद्युत् के साथ सम्बन्ध है । * ‘ आदित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतम् ' ( छा ० ४।१५ ३ ) || ३ || वरुणः ) वरुण लोक है, ( संबन्धात् ) / ५ ) इत्यस्या विद्युत उपरिष्टात्स वरुणलोकमित्ययं वरुणः संबध्यते । अस्ति हि संबन्धो विद्युद्वरुणयोः । ' यदा हि विशाला अन्य श्रुति में वायुके दिए हुए रथचक्र जैसे छिद्रसे ऊर्ध्वं जाकर आदित्यको पहुँचता है, ऐसा क्रम... ra गत होता है । इसलिए ' अविशेष और विशेषसे ' यह ठीक कहा गया है । वाजसनेयी तो ' मासेभ्यो ० ' ( मासों से देवलोक और देवलोकसे आदित्यको जाता है ) ऐसा कहते हैं । उसमें आदित्य के मनन्तयं के लिए देवलोक से वायुको प्राप्त होने चाहिए । ' वायुमब्दात् ० ' ( संवत्सर से वायुको प्राप्त होता है ) यह सूत्रपाठ छान्दोग्य श्रुतिकी अपेक्षासे कहा गया है । छान्दोग्य और वाजसनेयकमें तो एकमें देवलोक नहीं है और अन्य में संवत्सर नहीं है । उसमें दोनों श्रुतियोंके प्रत्यय होनेसे दोनोंका दोनों स्थलोंमें संनिवेश होना चाहिए । उसमें भी मासके साथ सम्बन्ध होने से संवत्सरका पूर्व और देवलोकका

पश्चात् संनिवेश है । ऐसा विवेक करना चाहिए ॥ २ ॥

' आदित्याच्चन्द्रमसं ० ' ( आदित्य से चन्द्रमाको और चन्द्रमासे विद्युतको प्राप्त होता है ) इस प्रकार इस विद्युत्से ऊपर वह वरुणलोकको जाता है, ऐसा इस वरुणका सम्बन्ध है । विद्युत् और वरुणका सम्बन्ध है | जब तीव्र गर्जना निर्घोष करती हुई विशाल विद्युत् मेघोंके उदरमें नृत्य करती है सत्यानन्दी - दीपिका केवल क्रमशः पाठमात्र है, क्योंकि इस श्रुतिमें क्रम वाची कोई शब्द नहीं है । और ' तेन स ऊर्ध्व-माक्रम ' ( वायुके दिए हुए रथचक्र के समान छिद्रसे वे उपासक ऊर्ध्वं जाकर आदित्यको प्राप्त होते हैं ) इस काण्व श्रुतिमें विशेषशब्द द्वारा क्रमका निश्चय होनेसे पाठक्रम बाधित है । और ' मासेभ्यो देवलोकम् ' इस बृहदारण्यक श्रुतिमें मासोंके अनन्तर देवलोकका पाठ युक्त नहीं है, क्योंकि मास और देवलोकका कोई सम्बन्ध नहीं है । इसलिए छान्दोग्य श्रुति के अनुसार मासोंके अनन्तर मासोंके अवयवी संवत्सरका पाठ युक्त है । इससे ' संवत्सरखे देवलोक, देवलोकसे वायुलोक और वायुलोकसे आदित्यलोक ' इसप्रकार दोनों श्रुतियोंमें क्रम निष्पन्न होता है । इसलिए देवलोक और आदित्य के मध्य में वायुका निवेश युक्त है । ' वायुमब्दाद् ' यह सूत्र छान्दोग्य श्रुतिकी अपेक्षा से है । बृहदारण्यक श्रुति अनुसार तो ' देवलोकाद्वायुम् ' ऐसा सूत्र होना चाहिए । किन्तु दोनों श्रुतियोंमें वायुका स्थान देवलोक और आदित्य के बीच में है ॥ २ ॥

* ' स वायुलोकं स वरुणलोकम् ' इस कौषीतकी श्रुतिस्थ पाठक्रमसे वायुलोक के वनन्तर वरुणलोकका संनिवेश होना चाहिए । पूर्वपक्षी - वरुणका किसी विशेष श्रुतिद्वारा निर्धारित स्था. न होनेसे उसका पाठ अदृष्टार्थक है । सिद्धान्ती - ' स वायुलोकं स वरुणलोकम् ' इत्यादि श्रुतिसे पाठन

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८५० ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० ३ विद्युतस्तवस्तनितनिर्घोषा जीमूतोदरेषु प्रनृत्यन्त्यथापः प्रपतन्ति । विद्योतते स्तनयति वर्षिष्यति वा ' ( छा ० ७।११।१ ) इति च ब्राह्मणम् । अपां चाधिपतिर्वरुण इति श्रुतिस्मृतिप्रसिद्धिः । वरुणादधीन्द्रप्रजापती, स्थानान्तराभावात्पाठसामर्थ्याच्च । आगन्तुकत्वादपि वरुणा-दीनामन्त एव निवेशः, वैशेषिकस्थानाभावाद्विद्युच्चान्त्याऽचिरादौ वर्त्मनि ॥३ ॥

( ४ आतिवाहिकाधिकरणम् । सू ० ४-६ ) आतिवाहिकास्त ल्लिङ्गात् ॥ ४ ॥

पदच्छेद -- अतिवाहिका, तल्लिङ्गात् । सूत्रार्थ - ( अतिवाहिका: ) वे अचिरादि ब्रह्मलोक में ले जानेके लिए आतिवाहिक हैं । ( तल्लिङ्गात् ) क्योंकि ' अमानवः स एतान्ब्रह्म गमयति ' इसप्रकार उसका लिङ्ग है । * तेष्वेवार्चिरादिषु संशयः - किमेतानि मार्गचिन्हान्युत भोगभूमयोऽथवा नेतारो गन्तृणामिति? तत्र मार्गलक्षणभूता अर्चिरादय इति तावत्प्राप्तम्, तत्स्वरूपत्वादुपदेशस्य | यथा हि लोके कश्चिद्ग्रामं नगरं वा प्रतिष्ठा समानोऽनुशिष्यते - गच्छेत स्त्वममुं गिरिं ततो न्यग्रोधं ततो नदीं ततो ग्रामं ततो नगरं वा प्राप्स्यसीत्येवमिहाप्यर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाण-पक्षमित्याद्याह । अथवा- भोगभूमय इति प्राप्तम् । तथा हि - लोकशब्देनाग्न्यादीननुबध्नाति ' अग्निलोकमागच्छति ' ( कौषी ० १।३ ) इत्यादि । लोकशब्दश्व प्राणिनां भोगायतनेषु भाष्यते-' मनुष्यलोकः पितृलोको देवलोक: ' ( बृह ० १/५/१६ ) इति च । तथा च ब्राह्मणम् --- ' अहोरात्रेषु तब जल गिरता है — ' विद्योतते स्तनयति ' ( विद्युत् चमकती है, मेघ गर्जता है वृष्टि होगी ऐसा लोग कहते हैं ) यह ब्राह्मण - श्रुति है | श्रुति और स्मृति में यह प्रसिद्ध है कि जलका अधिपति वरुण हैं । वरुणलोक के ऊपर इन्द्र और प्रजापति लोक हैं, क्योंकि उनके लिए अन्य स्थान नहीं है और पाठकी सामथ्यं है । वरुण आदिका आगन्तुक होनेसे भी अन्तमें ही निवेश है । कारण कि विशेष स्थानके न होनेसे अचिरादि मार्गमें विद्युत् अन्तिम स्थान है ॥ ३ ॥

इन अर्चिरादिमें संशय होता है कि क्या ये मार्गचिह्न हैं वा मोगस्थान हैं अथवा ब्रह्मलोकको जानेवालोंके नेता - ले जानेवाले हैं? पूर्वपक्षी - ऐसा संशय होनेपर ये अचिरादि मार्गके चिह्नरूप हैं, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि उस मार्ग के स्वरूपको कहनेवाला उपदेश है । जैसे लोकमें ग्राम अथवा नगरको प्रस्थानकी इच्छा करनेवाले किसीको यह उपदेश किया जाता है कि तुम वहांसे उस पर्वतकी ओर जाओ, वहाँसे उस वटवृक्षकी ओर, वहाँसे नदीको, उससे आगे ग्राम अथवा नगरको प्राप्त हो जाओगे, वैसे यहाँ भी अर्चिसे अहको, अहमे आपूर्यमाणपक्षको प्राप्त होता है, इत्यादि श्रुति कहती है । अथवा ये अचिरादि भोगस्थान हैं, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि ' अग्निलोकमा ० ' ( अग्नि-लोकको आ जाता है ) इत्यादि श्रुति लोकशब्द के साथ अग्नि आदिका सम्बन्ध करती है । ' मनुष्यलोकः ० ' ( मनुष्यलोक, पितृलोक, देवलोक ) इसप्रकार लोकशब्द प्राणियोंके भोगस्थानोंमें कहा जाता है । और इसीप्रकार ' अहोरात्रेषु ' ( उन अह और रात्रिलोकोंमें वे कर्मी और उपासक भोगका अनुभव सत्यानन्दी - दीपिका क्रम तो है, किन्तु उसका किसी विशेष श्रुतिसे स्थान निश्चित नहीं है, इसलिए आगन्तुक वरुण, इन्द्र और प्रजापति लोकोंका विद्युत् के अनन्तर ही अर्चिरादि मार्गमें स्थान युक्त है । इससे आदित्य से चन्द्र-लोक, चन्द्रसे विद्युत्, विद्युत्से वरुण, वरुणसे इन्द्रलोक, इन्द्र लोकसे प्रजापतिलोकको जाता है ॥३ ॥

* उपासक उत्क्रान्तिके अनन्तर • रश्मिद्वारा अर्चिको प्राप्त होता है, अर्चिसे अह, शुक्लपक्ष, षड्मास, उत्तरायण, संवत्सर, देवलोक, वायुलोक, आदित्यलोक, चन्द्रलोक, विद्युत्लोक, वरुणलोक, इन्द्रलोक, प्रजापतिलोक इस क्रमसे ब्रह्मलोकको जाता है । इसप्रकार अर्चिरादि क्रमका निरूपण किया

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अधि ० ४ सू ० ५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ८५१ ते लोकेषु सज्जन्ते ' इत्यादि । तस्मान्नातिवाहिका अर्चिरादयः । अचेतनत्वादप्येतेषामा तिवाद्दि-कत्वानुपपत्तिः । चेतना हि लोके राजनियुक्ताः पुरुषा दुर्गेषु मार्गेष्वतिवाह्यानतिवाह-यन्तीति । एवं प्राप्ते ब्रूमः - आतिवाहिका एवैते भवितुमर्हन्ति । कुतः? तल्लिङ्गात् । तथा हि ' चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषोऽमानवः स एतान्ब्रह्म गमयति ' ( छा ० ४। १५/५ ) इति सिद्धम-यितृत्वं दर्शयति । तद्वचनं तद्विषयमेवोपक्षीणमिति चेत् न, प्राप्तमानवत्वनिवृत्तिपरत्वा-द्विशेषणस्य । यद्यर्चिरादिषु पुरुषा गमयितारः प्राप्तास्ते च मानवास्ततो युक्तं तन्निवृत्यर्थं पुरुषविशेषणममानव इति ॥ ४ ॥

ननु तल्लिङ्गमात्रमगमकम्, न्यायाभावात् । नैष दोष: -उभयव्यामोहात्तत्सिद्धेः ॥ ५ ॥

पदच्छेद - उभयव्यामोहात्, तत्सिद्धेः । सूत्रार्थ - ( उमयव्यामोहात् ) मार्ग और गन्ता जड़ और अस्वतन्त्र होनेसे उपासककी ऊर्ध्वं -गति नहीं हो सकती, इसलिए ' स्वयं प्रयत्न शून्य अन्य चेतनसे ले जाया जाता है ' इस न्वायसे अनुगृहीत लिङ्गसे ( तत्सिद्धे: ) नेतृत्वको सिद्धि होती है । * ये तावदर्चिरादिमार्गगास्ते देहवियोगात्संपिण्डितकरणग्रामा इत्यस्वतन्त्रा अर्चि-रादीनामप्यचेतनत्वादस्वातन्त्र्यमित्यतोऽचिराद्यभिमानिनश्चेतना देवताविशेषा अतिया -त्रायां नियुक्ता इति गम्यते । लोकेऽपि हि मत्तमूर्छितादयः संपिण्डित करणाः परप्रयुक्त-करते हैं ) इत्यादि ब्राह्मणवचन है । इसलिए अर्चिरादि अतिवाहिक नहीं हैं, अचेतन होनेसे भी ये आतिवाहिक नहीं हो सकते, क्योंकि लोकमें राजासे नियुक्त चेतन ही दुर्ग मार्गों में जानेवालों को ले जाते हैं । सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं- ये अचिरादि आतिवाहिक ही हो सकते हैं, किससे? इससे कि उनका लिङ्ग है । जैसे कि ' चन्द्रमसो विद्युतं ' ( वे उपासक चन्द्रलोकसे विद्युत्को प्राप्त होते हैं, वहां से वह अमानव पुरुष इन्हें सत्यलोकस्थ ब्रह्माको प्राप्त करा देता है ) यह श्रुति सिद्ध - सा गमयितृत्व दिखलाती है । यदि कहो कि वह वचन उसके विषयमें ही उपक्षीण होता है तो ऐसा नहीं, क्योंकि ' अमानव ' यह विशेषण प्राप्त हुए मानवत्वकी निवृत्तिके लिए है । अचिरादिमें जो ले जानेवाले पुरुष प्राप्त हैं यदि वे मानव हों तो उनकी निवृत्तिके लिए ' अमानव ' यह पुरुष.. विशेषण युक्त है ॥ ४ ॥

परन्तु वह लिङ्गमात्र उक्तार्थका बोधक नहीं है, क्योंकि न्याय नहीं है? यह दोष नहीं है-जो अचिरादि मार्ग जानेवाले हैं वे देहके वियोगसे एकीभूत करण समुदायवाले अस्वतन्त्र होते हैं और अचिरादि भी अचेतन होनेसे अस्वतन्त्र हैं, इसलिए अर्चिरादि अभिमानी चेतन देवता विशेष अतियात्रा में नियुक्त हैं, ऐसा ज्ञात होता है । लोकमें भी एकीभूत इन्द्रिय समुदायवाले मत्त सत्यानन्दी - दीपिका गया है । अब उनके स्वरूपका निरूपण किया जाता है | चिह्न निर्देश के साम्य, लोकशब्द और नेतृत्व लिङ्गसे संशय होता है । पूर्वपक्षी - ये अचिरादि वृक्ष, नदी आदिके समान मार्गके चिह्न अथवा भोगके स्थान हैं, क्योंकि दोनों प्रकार उपपन्न हो सकते हैं । अचिरादि जड़ हैं । अतः आतिवाहिक नहीं हो सकते । सिद्धान्ती - अचिरादि अभिमानी देवताविशेष आतिवाहिक हैं ॥ ४ ॥

* यदि अधिरादि अनेता और अचेतन हैं, और ब्रह्मलोक जानेवाले भी देहके न होनेसे इन्द्रिय व्यापार रहित हैं, तो मार्ग और गन्ता दोनोंके अज्ञानसे ऊर्ध्वगति नहीं होगी । इसलिए ' स्वयं प्रयत्न-शून्यश्चेतनान्तरेण नेयः ' ' स्वयं प्रयत्न शून्य पुरुष अन्य चेतनसे ले जाया जाना युक्त है ' इस लौकिक न्यायके अनुग्रह से अचिरादिमें नेतृत्व सिद्ध होता है ।

पृष्ठ 886

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८५३ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० ३ वर्मानो भवन्ति । अनवस्थितत्वादप्यर्चिरादीनां न मार्गलक्षणत्वोपपत्तिः, नहि रात्रौ प्रेतस्याहः स्वरूपाभिसंभव उपपद्यते । नच प्रतिपालनमस्तीत्युक्तं पुरस्तात् । ध्रुवत्वात्तु देवतात्मनां नायं दोषो भवति । अर्चिरादिशब्दता चैषामर्चिराद्यभिमानादुपपद्यते । ' अर्चि-षोऽहः ' ( छा ० ४।१५।५,५।१०।१ ) इत्यादिनिर्देशस्त्वातिवाहिकत्वेऽपि न विरुध्यते - अर्चिषा हेतुनाऽहरभिसंभवति । अह्ना हेतुना आपूर्यमाणपक्षमिति । तथा च लोके प्रसिद्वेष्व-प्यातिवाहिकेष्वेवं जातीयक उपदेशो दृश्यते । गच्छ त्वमितो बलवर्माणं ततो जयसिंहं ततः कृष्णगुप्तमिति । * अपि चोपक्रमे ' तेऽर्चिरभिसंभवन्ति ' ( बृह ० ६।२।१५ ) इति संबन्ध-मात्रमुक्तम्, न संबन्धविशेषः कश्चित् । उपसंहारे तु ' स एतान्ब्रह्म गययति ' ( छा ० ४।१५।६ ) इति संबन्धविशेषोऽतिवाह्यातिवाहकत्वलक्षण उक्तः । तेन स एवोपक्रमेऽपीति निर्धा र्यंते । संपिण्डितकरणत्वादेव च गन्तॄणां न तत्रोपभोगसंभवः । लोकशब्दस्त्वनुपभुञ्जा-नेष्वपि गन्तृषु गमयितुं शक्यते, अन्येषां तल्लोकवासिनां भोगभूमित्वात् । अतोऽग्नि-स्वामिकं लोकं प्राप्तोऽग्निनाऽतिवाह्यते, वायुस्वामिकं प्राप्तो वायुनेति योजयितव्यम् || ५ | कथं पुनरातिवाहिकत्वपक्षे वरुणादिषु तत्संभवः? विद्युतो ह्यधि वरुणादय उपक्षिप्ताः, विद्युतस्त्वनन्तरम | ब्रह्म प्राप्ते र मानवस्यैव पुरुषस्य गमयितृत्वं श्रुतमिति । अत उत्तरं पठति-वैद्युतेनैव ततस्तच्छ्रुतेः ॥ ६ ॥

और मूच्छित आदि अन्यसे प्रयुक्त हुए मार्गगामी होते हैं । अनवस्थित होने से भी अर्चिरादिमें मार्ग ह्नित्व उपपन्न नहीं होता, क्योंकि रात्रिके मृतक में दिन स्वरूपका संभव उपपन्न नहीं होता, उसी प्रकार रात्रिके मृतक दिनकी प्रतीक्षा नहीं होती, यह पहले कहा जा चुका है । देवताओंके ध्रुव होने से यह दोष नहीं होता । अर्चिरादिके अभिमानसे इन देवताओं में अचिरादि शब्द उपपन्न होता है । ' अर्चिषो s हः ' ( असेि अहको प्राप्त होता है ) इत्यादि निर्देश तो अचिरादिके अतिवाहिक होनेपर मी विरुद्ध नहीं होता । अचिरूप हेतु द्वारा अहको प्राप्त होते हैं, यह हेतुसे शुक्लपक्षको प्राप्त होते हैं । इसीप्रकार लोकमें प्रसिद्ध आतिवाहिकों में भी ' तू यहाँसे बलवर्माके पास जा, वहाँसे जयसिंहके पास, वहाँसे कृष्णगुप्तके पास जा ' इस प्रकारका उपदेश देखा जाता है । बौर ' तेऽचिरभिसंभवन्ति ' ( वे ज्योतिके अभिमानी देवताको प्राप्त होते हैं ) इस उपक्रममें भी सम्बन्धमात्र कहा गया है कोई सम्बन्ध विशेष नहीं कहा गया है । और ' स एतान्ब्रह्म गमयति ' इस उपसंहार में तो अतिवाह्य और अतिवाहकत्वरूप सम्बन्ध विशेष कहा गया है । इससे उपक्रममें भी वही सम्बन्ध विशेष निर्धारित किया जाता है । एकीभूत हुए इन्द्रिय समग्रवाले होनेसे जानेवाले उपासकोंका वहाँ उपभोग संभव नहीं है । लोकशब्द तो उपभोग न करनेवाले गमन करने वालोंमें जाना जा सकता है, क्योंकि अन्य उस लोकवासियोंकी वह मोगभूमि है, इसलिए अग्निस्वामीवाले लोक में प्राप्त हुएको अग्नि ले जाता है । उसी प्रकार वायुस्वामी लोकमें प्राप्त हुएको वायु ले जाता है । ऐसी योजना करनी चाहिए || ५ || परन्तु अतिवाहकत्व पक्षमें वरुण आदिमें आतिवाहिकत्व कैसे संभव होगा? क्योंकि विद्युत् लोकके ऊपर ही वरुण आदि कहे गये हैं और विद्युत् के अनन्तर ब्रह्मलोक प्राप्ति पर्यन्त अमानव पुरुष ही गमयिता सुना गया है? इसपर उत्तर कहते हैं-सत्यानन्दी -दीपिका * ' स एतान्ब्रह्म गमयति ' इस वाक्यशेष से यह सिद्ध होता है कि अर्चिरादि आतिवाहिक चेतन देवता हैं, मार्ग के चिह्न नहीं हैं, वे उपासकको ऊर्ध्वं ले जाते हैं, वे अपने - अपने लोक में प्राप्त हुए उपासकको अपने - अपने लोकसे आगे - आगे के लोकमें पहुँचाते हैं ॥ ५ ॥

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अधि ० ५ सू ० ६-७-८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८५३ पदच्छेद - वैद्युतेन, एव, ततः, तच्छू तेः । सूत्रार्थ - ( वैद्युतेनंव ) विद्युत् लोकमे स्थित हुए अमानव पुरुषसे ही ( ततः ) विद्युत् प्राप्तिसे ऊपर नीयमान उपासक कार्यं ब्रह्मको प्राप्त करते हैं, ( तच्छ्रुतेः ) क्योंकि उसके विषय में ' अमानवः स एत्थ ब्रह्मलोकं गमयति ' यह श्रुति है । ततो विद्युदभिसंभवनादूर्ध्वं विद्युदनन्तरवर्तिनैवामानवेन पुरुषेण वरुणलोका दिष्वतिवाह्यमाना ब्रह्मलोकं गच्छन्तीत्यवगन्तव्यम् । तान्वैद्युतात्पुरुषोऽमानवः स एत्य ब्रह्मलोकं गमयति ' इति तस्यैव गमयितृत्वश्रुतेः । वरुणादयस्तु तस्यैवाप्रतिबन्धकरणेन साहाय्यानुष्ठानेन वा केनचिदनुग्राहका इत्यवगन्यव्यम् । तस्मात्साधूक्तम् - आतिवाहिका देवतात्मानोऽर्चिरादय इति ॥ ६ ॥

( ५ कार्याधिकरणम् । सू ० ७-१४ ) कार्य बादरिरस्य गत्युपपत्तेः ॥ ७ ॥

पदच्छेद- कार्यम्, बादरि, अस्य गत्युपपत्तेः । सूत्रार्थं - ( कार्यम् ) कार्यं ब्रह्मका ही ' स एतान्ब्रह्म गमयति ' इस है, क्योंकि ( अस्य ) कार्यं ब्रह्ममें ( गत्युपपत्तेः ) गति उपपन्न होती है, ( आचार्य मानते हैं । श्रुतिमें गन्तव्यरूपसे ग्रहण बादरि: ) ऐसा बादरि ' स एतान्ब्रह्म गमयति ' ( छा ० ४।१५ / ५ ) इत्यत्र विचिकित्स्यते - किं कार्यमपरं ब्रह्म गमयत्या होस्वित्परमेवाविकृतं मुख्यं ब्रह्मेति । कुतः संशयः? ब्रह्मशब्दप्रयोगाद् गतिश्रुतेश्च । तंत्र कार्यमेव सगुणमपरं ब्रह्म नान्गमयत्यमानवः पुरुष इति बादरिराचार्यो मन्यते । कुतः? अस्य गत्युपपत्तेः - अस्य हि कार्यब्रह्मणो गन्तव्यत्वमुपपद्यते, प्रदेशवत्त्वात् । नतु परस्मिन्त्र-ह्मणि गन्तृत्वं गन्तव्यत्वं गतिर्वाऽवकल्पते । सर्वगतत्वात्प्रत्यगात्मत्वाच्च गन्तॄणाम् ॥७ ॥

विशेषितत्वाश्च ॥ ८ ॥

पदच्छेद - – विशेषितत्वात्, च । सूत्रार्थ - और ' ब्रह्मलोकान्नगमयति ' अन्य श्रुतिमें विशेषित होने से कार्यं ब्रह्मविषयक ही गति अवगत होती है । वहाँसे विद्युत्लोकमें प्राप्त होनेके पश्चात् विद्युत् के अनन्तरवर्ती अमानव पुरुष से ही वरुणलोक आदि अतिवाह्यमान ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं, ऐसा समझना चाहिए, क्योंकि ' तान्वैद्युतात्पुरुषो ० ' ( विद्युत्लोक में पहुँचे हुए उन उपासक लोगोंको वह अमानव पुरुष आकर विद्युत् लोकसे ब्रह्मलोकमें ले जाता है ) यह उस अमानव पुरुषकी गमयितृत्व श्रुति है । वरुण आदि करण अथवा किसी सहायता के अनुष्ठानसे अनुग्राहक होते हैं, ऐसा समझना ठीक कहा गया है कि अचिरादि आतिवाहिक देवतात्मा हैं ॥ ६ ॥

' स ' एनान्ब्रह्म गमयति ' ( वह अमानव पुरुष इन उपासकों को ब्रह्मके सन्देह होता है कि क्या कार्यं अपर ब्रह्म के पास पहुँचता है अथवा विकृत • जाता है? संशय किससे होता है? इससे कि ब्रह्म शब्दका प्रयोग और गति अमानव पुरुष इन उपासकों को कार्यं सगुण अपरब्रह्मके प्रति ही ले जाता है, . मानते हैं । किससे? इससे कि उसमें गति उपपन्न होती है । इस कार्य ब्रह्ममें तो उसके अप्रतिबन्ध-चाहिए । इसलिए यह पास पहुँचता है ) यहां मुख्य परब्रह्म के पास ले श्रुति है । संशय होनेपर ऐसा बादरि आचार्य गन्तव्यत्व उपपन्न होता है, क्योंकि परिच्छिन्न है । परन्तु परब्रह्म में गन्तृत्व, गन्तव्य अथवा गति नहीं हो सकती, करण कि वह सवंगत है और गन्ताओंका प्रत्यक् आत्मा है ॥ ७ ॥

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८५४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० ३ * ' ब्रह्मलोकान्गमयति ते तेषु ब्रह्मलोकेषु पराः परावतो वसन्ति ' ( बृह ० ६ | २ | १५ ) इति च श्रुत्यन्तरे विशेषितत्वात्कार्यब्रह्मविषयैव गतिरिति गम्यते । नहि बहुवचनेन विशेषणं परस्मिन्ब्रह्मण्यवकल्पते । कार्ये व्यवस्थाभेदोपपत्तेः संभवति बहुवचनम् । लोकश्रुतिरपि विकारगोचरायामेव संनिवेशविशिष्टायां भोगभूमावासी - गौणी त्वन्यत्र ' ब्रह्मैव लोक एष सम्राट् ' इत्यादिषु । अधिरणाधिकर्तव्यनिर्देशोऽपि परस्मिन्ब्रह्मण्यनाञ्जसः स्यात् । तस्मात्कार्यविषयमेवेदं नयनम् ॥ ८ ॥

ननु कार्यविषयेऽपि ब्रह्मशब्दो नोपपद्यते, समन्वये हि समस्तस्य जगतो जन्मादि-कारणं ब्रह्मेति स्थापितमिति । अत्रोच्यते-सामीप्यात्तु तद्वयपदेशः ॥। ९ ॥ पदच्छेद- सामीप्यात्, तु, तद्वयपदेशः । सूत्रार्थ - ( सामीप्यात् ) कार्यब्रह्म कारणब्रह्मकी संनिधिमें है, अतः ( तद्वयपदेशः ) कार्य-ब्रह्ममें भी कारण ब्रह्मका शब्द प्रयोग होता है । ( तु ) शब्द शङ्का निवृत्यर्थ है । * तुशब्द आशङ्काव्यावृत्त्यर्थः । परब्रह्मसामीप्यादपरस्य ब्रह्मणस्तस्मिन्नपि ब्रह्म-शब्दप्रयोगो न विरुध्यते । परमेव हि ब्रह्म विशुद्धोपाधिसंबन्धं कचित्कैश्विद्विकारधर्मैर्म-नोमयत्वादिभिरुपासनायोपदिश्यमानमपरमिति स्थितिः ॥ ९ ॥

ननु कार्यप्राप्तावना वृत्तिश्रवणं न घटते । नहि परस्माद्ब्रह्मणोऽन्यत्र क्वचिन्नित्यतां संभावयन्ति । दर्शयति च देवयानेन पथा प्रस्थितानामनावृत्तिम् ' एतेन प्रतिपद्यमाना इमं ' ब्रह्मलोकान् ' ( एक अमानव पुरुष आकर इन्हें ब्रह्मलोकों में ले जाता है वे उन ब्रह्मलोकों में हिरण्यगर्भकी परमायु तक अनन्त संवत्सरों तक निवास करते हैं ) इसप्रकार अन्य श्रुतिमें विशेषित होनेसे कार्यं ब्रह्मविषयक ही गति है, ऐसा ज्ञात होता है । क्योंकि परब्रह्म में बहुवचन से विशेषण उपपन्न नहीं होता । कार्यं ब्रह्ममें तो अवस्थाभेदकी उपपत्ति होनेसे बहुवचन संभव है । लोकश्रुति मी ( लोकोंका श्रवण मी ) विकार विषयक संनिवेश ( सम्बन्ध ) विशिष्ट मोगभूमि में ही मुख्य है और अन्यत्र ' ब्रह्मैव लोक एष सम्राट् ' ( हे सम्राट्! यह ब्रह्म ही लोक है ) इत्यादिमें तो गौणी है । अधिकरण और अधिकतंव्य निर्देश भी परब्रह्ममें मुख्य नहीं होगा । इसलिए यह उपासकका नयन कार्यब्रह्मविषयक ही है ॥ ८ ॥

परन्तु कार्यब्रह्मविषयक भी ब्रह्मशब्द उपपन्न नहीं होता, क्योंकि समन्वय अधिकरणमें समस्त जगत् के जन्म आदिका कारण ब्रह्म ही है - ऐसा प्रतिपादित किया गया है? इसपर कहते हैं-' तु ' शब्द शङ्काकी व्यावृत्तिके लिए है । अपरब्रह्मको परब्रह्म के समीप होनेसे उसमें भी ब्रह्म शब्दका प्रयोग विरुद्ध नहीं है, क्योंकि विशुद्ध उपाधि विशिष्ट परब्रह्म ही कहींपर किन्हीं मनोमयाव आदि विकार धर्मोसे उपासनाके लिए उपदिष्ट हुआ अपरब्रह्म होता है, ऐसी स्थिति है ॥ ९ ॥

परन्तु उपासकको कार्यब्रह्मकी प्राप्ति होनेपर अनावृत्ति श्रुति नहीं घटती, क्योंकि परब्रह्मक्षे सत्यानन्दी - दीपिका & कार्यं ब्रह्म गन्तव्य है, अब इसमें ' विशेषितत्वाच्च ' यह दूसरा हेतु कहते हैं । ' ब्रह्मलोकेषु ' इस श्रुतिमें बहुवचन, लोकशब्द और बाधारार्थंक सप्तमी विभक्ति इन हेतुबोंसे कार्यं ब्रह्म ही गन्तव्य सिद्ध होता है, क्योंकि उपाधिसे कार्यब्रह्ममें बहुवचन आदि उपपन्न होते हैं ॥ ८ ॥

* यद्यपि ब्रह्म शब्द कार्यब्रह्म में मुख्य - वृत्ति से अनुपपन्न है, तो भी उसमें उपासना के लिए गौणी वृत्तिसे ब्रह्मशब्दका प्रयोग हो सकता है, क्योंकि परब्रह्म ही विशुद्ध उपाधि विशिष्ट होकर कार्यं ब्रह्म है || ९ ||

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अधि ० ५ सू ० १०-११-१२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८५५ मानवमावर्तं नावर्तन्ते ' ( छा ० ४/१५/५ ) इति, तेषामिह न पुनरावृत्तिरस्ति ' तयोर्ध्वमायन्नमृ-तत्वमेति ' ( छा ० ८ | ६ | ६, क ० ६।१६ ) इति चेत् । अत्र ब्रूमः -कार्यात्यये तदध्यक्षेण सहातः परमभिधानात् ॥ १० ॥

पदच्छेद - कार्यात्यये, तदध्यक्षेण, सह, अतः, परम् अभिधानात् । सूत्रार्थ - ( कार्यात्यये ) कार्यं ब्रह्मलोकका विनाश होनेपर उस लोक में उत्पन्न आत्मसाक्षा-दकारवाले तत्त्वज्ञानी ( तदध्यक्षेण सह ) उस लोकके अध्यक्ष - हिरण्यगर्भके साथ ( अतः ) कार्यब्रह्मसे ( परम् ) परब्रह्मको प्राप्त होते हैं, ( अभिधानात् ) क्योंकि ऐसा श्रुतिमें अभिधान है । * कार्यब्रह्मलोक प्रलय प्रत्युपस्थाने सति तत्रैवोत्पन्नसम्यग्दर्शनाः सन्तस्तदध्यक्षेण हिरण्यगर्भेण सहातः परं परिशुद्धं विष्णोः परमं पदं प्रतिपद्यन्त इति । इत्थं क्रममुक्तिर-नावृत्त्यादि त्यभिधानेभ्योऽभ्युपगन्तव्या । न ह्यञ्जसैव गतिपूर्विका षरप्राप्तिः संभ-वतीत्युपपादितम् || १० ॥ स्मृतेश्व ॥११ ॥

पदच्छेद - स्मृतेः च । सूत्रार्थ - और ' ब्रह्मणा सह ' इस स्मृतिसे भी कार्यं ब्रह्म विषयक गति सुनी जाती है । स्मृतिरप्येतमर्थमनुजानाति -- ' ब्रह्मणा सह ते सर्वे संप्राप्ते प्रतिसंवरे । परस्यान्ते कृता-त्मानः प्रविशन्ति परं पदम् ' इति । तस्मात्कार्यब्रह्मविषया गतिः श्रूयत इति सिद्धान्तः ॥ १ ९ ॥ कं पुनः पूर्वपक्षमाशङ्कयायं सिद्धान्तः प्रतिष्ठापितः? ' कार्य बादरिः ' ( ब्रह्मसूत्र ४।३।७ ) इत्यादिनेति । इदानीं सूत्रैरेवोपदर्श्यते-परं जैमिनिर्मुख्यत्वात् ॥ १२ ॥

पदच्छेद – परम, जैमिनिः, मुख्यत्वात् । मन्यत्र कहीं भी नित्यताकी संभावना नहीं है । ' एतेन प्रतिपद्यमाना ० ' ( इस देवपथ से जानेवाले इस मानव आवर्त में नहीं लौटते ) यह श्रुति देवयान मार्गसे प्रस्थान किये हुएके लिए अनावृत्ति दिख-लाती है । उनकी इस संसार में पुनरावृत्ति नहीं होती, क्योंकि ' तयोर्ध्वमावनमृतत्वमेति ' ऐसी श्रुति है । ऐसा यदि कहो तो इसपर हम कहते हैं-कार्यं ब्रह्मलोकका प्रलय उपस्थित होनेपर वहाँपर जिनको सम्यग्दर्शन उत्पन्न हुजा है ऐसे उत्पन्न हुए सम्यग्दर्शनवाले तत्त्वदर्शीलोग उस लोकके अध्यक्ष - हिरण्यगमंके साथ इससे पर परिशुद्ध विष्णु के परमपदको प्राप्त होते हैं । इसप्रकार क्रम मुक्ति अनावृत्ति आदि श्रुति अभिधानों - वचनों से स्वीकार करनी चाहिए, क्योंकि परब्रह्मकी प्राप्ति गति पूर्वक मुख्य नहीं हो सकती, ऐसा हमने ' उपपत्ति ' पदसे उपपादन किया है ॥ १० ॥

' ब्रह्मणा सह ० ' ( महाप्रलय प्राप्त होनेपर पर हिरण्यगमं ( समष्टि लिङ्ग शरीररूप विकार ) का अन्त होनेपर ब्रह्मलोकवासी वे सब तत्त्वदर्शी ब्रह्मा के साथ परब्रह्मको प्रविष्ट प्राप्त होते हैं ) यह स्मृति मी इस अर्थका अनुमोदन करती है । इसलिए कार्यं ब्रह्मविषयक गति श्रुति है, ऐसा सिद्धान्त है ॥ ११ ॥

परन्तु पुन: किस पूर्वपक्षकी शङ्क । कर ' कार्य बादरिः ' इत्यादिसे यह सिद्धान्त प्रतिष्ठापित किया गया है? अब वह सूत्रोंसे ही दिखलाया जाता है-सत्यानन्दी - दीपिका * उत्क्रान्तिके अनन्तर अर्चिरादि गति पूर्वक परब्रह्मकी प्राप्ति नहीं हो सकती । अतः छान्दोग्य आदिमें अनावृत्ति आदिका कथन क्रममुक्तिको लेकर है, इसलिए कोई विरोध नहीं है ॥ १० ॥

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८५६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० ३ सूत्रार्थ - ( जैमिनि: ) जैमिनि आचार्यका मत है कि ( परम् ) गतिका विषय परब्रह्म है, ( मुख्यत्वात् ) क्योंकि परब्रह्म ही ब्रह्मशब्दका मुख्य आलम्बन है । जैमिनिस्त्वाचार्य: ' स एनान्ब्रह्म गमयति ' ( छा ० ४।४५ १५ ) इत्यत्र परमेव ब्रह्म प्रापय-तीति मन्यते । कुतः? मुख्यत्वात् । परं हि ब्रह्म ब्रह्मशब्दस्य मुख्यमालम्बनं गौणमपरम्, मुख्यगौणयोश्च मुख्ये संप्रत्ययो भवति ॥ १२ ॥

दर्शनाच्च ॥१३ ॥

पदच्छेद - दर्शनात् च । सूत्रार्थ - और ' तयोर्ध्वमायन्नमृवमेति ' इत्यादि श्रुति भी गतिपूर्वक अमृतत्व दिखलाती है । ‘ तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति ' ( छा ० ८ | ६ | ६, क ० ६ । १५ ) इति च गतिपूर्वकममृतत्वं दर्श-यति । अमृतत्वं च परस्मिन्ब्रह्मण्युपपद्यते न कार्ये, विनाशित्वात्कार्यस्य । ' भथ यन्त्रान्यत्प-श्यति तदल्पं तन्मर्त्यम् ' ( छा ० ७/२/४ ( १ ) इति प्रवचनात् परविषयैव चैषा गतिः कठवल्लीषु-पठ्यते । नहि तत्र विद्यान्तरप्रक्रमोऽस्ति, ' अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मात् ' ( कठ ० २।१५ ) इति परस्यैव ब्रह्मणः प्रक्रान्तत्वात् ॥ १३ ॥

न च कार्ये प्रविपचयभिसंधिः ॥ १४ ॥

पदच्छेद - न, च, कार्ये, प्रतिपत्त्यभिसन्धिः । सूत्रार्थ - ( प्रतिपत्त्यभिसन्धि: ) ' प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये ' यह गृह प्राप्तिरूप सङ्कल्प ( च ) मी ( न कार्ये ) कार्यं ब्रह्मविषयक नहीं है, क्योंकि ' ते यदन्तरा ' इससे कार्य ब्रह्मसे मित्र परब्रह्म ही प्रकृत है । यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि वाक्य और श्रुति प्रमाणसे दुर्बल प्रकरण बाधित है, अतः गृहप्राप्तिरूप सङ्कल्प कार्यब्रह्म विषयक है, इसलिए कार्यं ब्रह्म ही गन्तव्य है । * अपि च ' प्रजापतेः समां वेश्म प्रपद्ये ' ( छा ० ८ | १४ | १ ) इति नायं कार्यविषयः प्रतिपत्त्यभिसंधिः, ' नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म ' ( छा ० ८ १४ 1१ ) इति कार्यविल-जैमिनि आचार्यं तो ' स एनान्ब्रह्म गमयति ' यहाँ परब्रह्मको ही प्राप्त कराता है, ऐसा मानते हैं । किससे? इससे कि वह मुख्य है । परब्रह्म ही ब्रह्मशब्दका मुख्य बालम्बन है और अपर गौण है । मुख्य और गौण में मुख्य में संप्रत्यय होता है ॥ १२ ॥

' तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति ' ( हृदय देशसे निकली हुई उस मुख्य सुषुम्ना नाड़ीसे ऊध्वं जाकर अमृतभावको प्राप्त होता है ) यह श्रुति गतिपूर्वक अमृतत्व दिखलाती है, और अमृतत्त्व परब्रह्ममें उपपन्न होता है कार्यं ब्रह्ममें नहीं, क्योंकि कायं ब्रह्म विनाशी है । ' अथ यन्त्रान्यत् ० ' ( अब जिस विद्यावस्थामें अन्यको देखता है वहु अल्प है वह मर्त्य है ) इस प्रवचन से परविषयक ही यह गति कठवल्लीमें पठित है । उसमें अन्य अपर विद्याका प्रक्रम- प्रकरण नहीं है, क्योंकि ' अन्यत्र धर्माद ० ' ( धर्मसे भिन्न और अधर्मं से भिन्न है ) इस प्रकार परब्रह्मका ही उपक्रम किया गया है ॥ १३ ॥

और ' प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये ' ( मैं प्रजापतिके सभागृहमें जाऊं ) यह प्राप्तिका सङ्कल्प कार्यब्रह्मविषयक नहीं है । क्योंकि ' नामरूपयोर्निर्वहिता ० ' ( वह खाकाश नाम से प्रसिद्ध आत्मा अपने में स्थित जगद्बीजभूत नाम और रूपको अभिव्यक्त करनेवाला है, वे जिसके अन्तर हैं वह ब्रह्म है ) इस सत्यानन्दी - दीपिका * ' प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये ' इससे वेश्म प्राप्तिका संकल्प परब्रह्म विषयक कहा गया है, वह ठीक नहीं है, क्योंकि प्रजापति, सभा और वेश्म इन तीन शब्दात्मक श्रुतियोंसे और उनके संघातात्मक वाक्यसे प्रकरण बाधित है । कारण कि वे सवंगत ब्रह्ममें संगत नहीं होते । श्रुति और