श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 891–900
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 891–900
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अधि ० ५ सू ० १४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८५७ क्षणस्य परस्यैव ब्रह्मणः प्रकृतत्वात्, ' यशोऽहं भवामि ब्राह्मणानाम् ' ( छा ० ८ | १४ | १ ) इति च सर्वात्मत्वेनोपक्रमणात्, ' न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः ' ( श्वेता ० ४ । १ ९ ) इति च परस्यैव ब्रह्मणो यशोना मत्वप्रसिद्धेः । सा चेयं वेश्मप्रतिपत्तिर्गतिपूर्विका हार्दविद्यायामु-दिता - ' तदपराजिता पूर्ब्रह्मण प्रभुविमितं हिरण्मयम् ' ( छा ० ८/५/३ ) इत्यत्र । पदेरपि च गत्य-र्थत्वान्मार्गापेक्षाऽवसीयते । तस्मात्परब्रह्मविषया गतिश्रुनय इति पक्षान्तरम् । तावेतौ द्वौ पक्षावाचार्येण सूत्रितौ गत्युपपत्त्यादिभिरेको मुख्यत्वादिभिरपरः । तत्र गत्युपपच्या-दयः प्रभवन्ति मुख्यत्वादीनाभासयितुं नतु मुख्यत्वादयो गत्युपपत्यादीनित्याद्य एव सिद्धान्तो व्याख्यातो द्वितीयस्तु पूर्वपक्षः । न ह्यसत्यपि संभवे मुख्यस्यैवार्थस्य ग्रहणमिति कश्चिदाज्ञापयिता विद्यते । परविद्याप्रकरणेऽपि च तत्स्तुत्यर्थं विद्यान्तराश्रयगत्यनुकीर्त नमुपपद्यते - ' विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ' ( छा ० ८/६/६ ) इतिवत् । ' प्रजापतेः समां बेइम प्रपद्ये ' ( छा ० ८ १४। १ ) इति तु पूर्ववाक्य विच्छेदेन कार्येऽपि प्रतिपत्त्याभिसंधिर्न विरुध्यते । सगुणेऽपि च ब्रह्मणि ' सर्वात्मत्व संकीर्तनं ' सर्वकर्मा सर्वकामः ' इत्यादिवदवकल्पते । तस्मा-दपरविपया एव गतिश्रुतयः । केचित्पुनः- पूर्वाणि पूर्वपक्ष सूत्राणि भवन्त्युत्तराणि सिद्धान्त-सूत्राणीत्येतां व्यवस्थामनुरुध्यमानाः परविषया एव गतिश्रुतीः प्रतिष्ठापयन्ति, तदनुपप-न्नम्, गन्तव्यत्वानुपपत्ते ब्रह्मणः - ' यत्सर्वगतं सर्वान्तरं सर्वात्मकं च परं ब्रह्म ', आकाशवत्सर्वग तश्च नित्यः ', ' यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म ' ( बृह ० ३ | ४ | १ ), ' य आत्मा सर्वान्तरः ' ( बृह ० ३।४।१ ), आत्मै-प्रकार कार्यब्रह्म से विलक्षण परब्रह्म ही प्रकृत है । ' यशोऽहं ० ' ( मैं ब्राह्मणोंका यश - आत्मा होता हूँ ) ऐसा सर्वात्मरूपसे उपक्रम है. कारण कि ' न तस्य प्रतिमाऽस्ति ० ' ( जिस ईश्वरका नाम महद्यश- सर्वत्र पूर्ण है ऐसे उस ब्रह्मकी कोई उपमा भी नहीं है ) इस प्रकार परब्रह्म ही यश नामसे प्रसिद्ध है । और यह वेश्म प्राप्ति गति पूर्वक है, वह ' तदपराजिता ० ' ( वहां अपराजित नामवाली ब्रह्मा की पुरी है, प्रभु-हिरण्यगर्भसे विशेषरूप से निर्मित और सुवर्णमय है ) यहाँ हार्दविद्यामें कही गई है । पद् धातु भी गत्यर्थक होनेसे उसे मागंकी अपेक्षा निश्चित होती है । इसलिए गति वोधक श्रुतियाँ परब्रह्म विषयक हैं, ऐसा पक्षान्तर है । वे ये दोनों पक्ष आचार्यने सूत्रसे दिखलाए हैं । एक गतिकी उपपत्ति आदिसे और दूसरा मुख्यत्व आदिसे । उनमें गतिकी उपपत्ति आदि मुख्यत्व आदिका आभासरूपसे प्रतिपादन करनेमें समर्थ हैं, परन्तु मुख्यत्व आदि गतिकी उपपत्ति आदिका आभासरूपसे प्रतिपादन करनेमें समर्थ नहीं है । इसलिए माद्य ही सिद्धान्त कहा गया है और द्वितीय पूर्वपक्ष | क्योंकि संभव न होनेपर भी मुख्य अर्थका ही ग्रहण हो, ऐसा कोई आज्ञा करनेवाला प्रमाण विद्यमान नहीं है । परविद्याके प्रकरण में मी अपरविद्या आश्रय गतिका अनुकीर्तन परविद्याकी स्तुतिके लिए ' विश्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ' ( भिन्न - भिन्न गतिवाली नाड़ियाँ केवल उत्क्रान्तिके लिए हैं ) इसके समान उपपन्न होता है । ' प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये ' इसमें तो पूर्ववाक्यसे विच्छेदकर कार्यब्रह्म में भी प्राप्तिका सङ्कल्प विरुद्ध नहीं है । सगुणब्रह्म में भी सर्वात्मत्व संकीर्तन ' सर्वकर्मा सर्वकामः ' इत्यादिके समान हो सकता है । इसलिए गति बोधक श्रुतियाँ अपरब्रह्म विषयक ही हैं । पुनः कोई लोग पूर्वसूत्र पूर्वपक्षसूत्र हैं और उत्तरसूत्र सिद्धान्तसूत्र हैं, ऐसी व्यवस्थाको जानते हुए गतिबोधक श्रुति परब्रह्म विषयक ही प्रतिष्ठापित करते हैं । परन्तु वह अयुक्त है, क्योंकि ब्रह्ममें गन्तव्यत्वको उपपत्ति नहीं होती । ' यत्सर्वगतं. ' ( जो सर्वगत, सर्वान्तर, सर्वात्मक और परब्रह्म है ) ' आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः ' ( आत्मा आकाशके समान सवंगत और नित्य है ) ' यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म ' ( जो साक्षात् अपरोक्ष सत्यानन्दी - दीपिका वाक्यकी अपेक्षा प्रकरण दुर्बल है । इसलिए गति बोधक श्रुतियाँ कार्यं ब्रह्म विषयक ही हैं । इस प्रकार स्व सिद्धान्त कहकर अब अन्य मतका ' केचित् ' इत्यादिसे निराकरण करते हैं ।
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ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० ३ वेदं सर्वम् ' ( छा ० ७।२५ / २ ), ' ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् ' ( मु ० २।२।११ ) इत्यादिश्रुतिनिर्धारित-विशेषम्, तस्य गन्तव्यता न कदाचिदप्युपपद्यते । नहि गतमेव गम्यते । अन्यो ह्यन्यद्ग-च्छतीति प्रसिद्धं लोके । ननु लोके गतस्यापि गन्तव्यता देशान्तरविशिष्टस्य दृष्टा । यथा पृथिवीस्थ एव पृथिवीं देशान्तरद्वारेण गच्छतीति । यथाऽनन्यत्वेऽपि बालस्य कालान्तर-विशिष्टं वार्धकं स्वात्मभूतमेव गन्तव्यं दृष्टम्, तद्वद्ब्रह्मणोऽपि सर्वशक्त्युपेतत्वात्कथं-चिद्गन्तव्यता स्यादिति - न, प्रतिषिद्धसर्वविशेषत्वाद्ब्रह्मणः । ' निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निर-वद्यं निरञ्जनम् ' ( श्वेता ० ६।१ ९ ) ' अस्थूलमनण्वहस्व मदीर्घम् ' ( बृह ० ३1८1८ ), ' स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः ' ( मु ० २।१।२ ), ' स वा एष महानज आत्माऽजरोऽमरोऽमृतोऽमयो ब्रह्म ' ( बृह ० ४।४।२५ ), ' स एष नेति नेत्यात्मा ' ( बृह ० ३।९ ।२६ ) इत्यादिश्रुतिस्मृतिन्यायेभ्यो न देशकालादिविशेषयोगः पर-मात्मनि कल्पयितुं शक्यते । येन भूप्रदेशवयोवस्थान्यायेनास्य गन्तव्यता स्यात् । भूवय-सोस्तु प्रदेशावस्थादिविशेष योगादुपपद्यते देशकालविशिष्टा गन्तव्यता । जगदुत्पत्तिस्थि-तिप्रलयहेतुत्वश्रुतेरनेकशक्तित्वं ब्रह्मण इति चेत् - न, विशेषनिराकरणश्रुतीनामनन्यार्थ -त्वात् । उत्पत्त्यादिश्रुतीनामपि समानमनन्यार्थत्वमिति चेत् - न, तासामेकत्वप्रतिपादन-परत्वात् । मृदादिदृष्टान्तैर्हि सतो ब्रह्मण एकस्य सत्यत्वं विकारस्य चानृतत्वं प्रतिपाद-यच्छास्त्रं नोत्पत्त्यादिपरं भवितुमर्हति । कस्मात्पुनरुत्पत्त्यादिश्रुतीनां विशेष निराकरण-ब्रह्म है ) ' य आत्मा ' ( जो बात्मा सबके अन्तर है ) ' आत्मैवेदं सर्वम् ' ' ब्रह्मैवेदं ० ' ( यह सम्पूर्ण जगत् सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म ही है ) इत्यादि श्रुतियोंसे सर्वगत, सर्वान्तर, सर्वात्मक परब्रह्म जो विशेषरूपसे निर्धारित किया गया है, उसमें गन्तव्यता कदाचिद् मी उपपन्न नहीं होती, क्योंकि प्राप्त ही प्राप्य नहीं होता । लोकमें यह प्रसिद्ध है कि अन्य ही अन्यके प्रति जाता है । परन्तु लोकमें प्राप्तकी मी देशान्तर विशिष्ट -रूपसे गन्तव्यता देखी जाती है । जैसे पृथिवीपर स्थित हुआ ही अन्य देशद्वारा पृथिवीके प्रति जाता है । जिस प्रकार बालक के अनन्य होनेपर भी अन्यकालसे विशिष्ट स्वात्मभूत ही वार्धक्य गन्तव्यरूपसे देखा जाता है | वैसे ही सम्पूर्ण शक्तियोंसे युक्त होनेके कारण ब्रह्ममें भी किसी प्रकार गन्तव्यता हो सकती है? नहीं, क्योंकि सर्वविशेषोंका ब्रह्ममें प्रतिषेध है, ' निष्कलं ० ' ( ब्रह्म अवयवरहित, निष्क्रिय, शान्त, अनिंद्य, निर्लेप है ) ' अस्थूलम ० ' ( वह न स्थूल, न अणु, न ह्रस्व और न दीर्घं है ) ' स बाह्याभ्यन्तरो -ह्यजः ० ' ( वह बाह्य और मीतर विद्यमान है, अज है ) ' स वा एष ० ' ( वह यह आत्मा महानू, अज, अजर, अमर, अमृत, अमय ब्रह्म है ) ' स एष ० ' ( जिसका मधुकाण्ड में ' यह नहीं, यह नहीं ' ऐसा कहकर निरूपण किया गया है वह यह आत्मा है ) इत्यादि श्रुति, स्मृति और अनुकूल तर्कोंसे देश, काल आदि विशेष योगकी परमात्मामें कल्पना नहीं की जा सकती, जिससे कि भू - प्रदेश, वय अवस्था न्यायसे इस ब्रह्ममें गन्तव्यता हो, पृथिवी और वयमें तो प्रदेश और अवस्था आदि विशेषके योगसे देश काल विशिष्ट गन्तव्यता उपपन्न होती है । यदि कहो कि जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय कारणत्व बोधक श्रुतिसे ब्रह्म में अनेक शक्तित्व है? तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि विशेष निराकरणक श्रुतियाँ अनन्यार्थक हैं । यदि कहो तो उत्पति आदि श्रुतियोंमें भी अनन्यार्थत्व समान है, तो ऐसा नहीं है, क्योंकि वे एकत्व प्रतिपादन परक हैं । मृत्तिका आदि दृष्टान्तोंसे सत् अद्वितीय ब्रह्ममें सत्यत्वका और विकार में नृतत्वका प्रतिपादन करता हुबा शास्त्र उत्पत्ति आदि परक नहीं हो सकता । परन्तु यह कैसे जाना जाय कि उत्पत्ति आदि प्रतिपादक श्रुतियाँ विशेष निराकरण करनेवाली श्रुतियोंके सत्यानन्दी - दीपिका * निर्विशेष श्र ुतियाँ निराकांक्ष होनेसे स्वार्थमें फलवाली हैं, अतः अङ्गी हैं और विशेष श्रुतियाँ अफलवाली हैं, अत: निषेध्य विशेषके समर्पण आदि द्वारा अङ्गभूत हैं, क्योंकि ' फलवत्सन्निधावफलं
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अधि ० ५ सू ० १४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी पिकासहित ८५ ९ श्रुतिशेषत्वं न पुनरितरशेषत्वमितरासामिति? उच्यते- विशेषनिराकरणश्रुतीनां निरा-काङ्क्षार्थत्वात् । न ह्यात्मन एकत्वनित्यत्वशुद्धत्वाद्यवगतौ सत्यां भूयः काचिदाकाङ्गोपजा-यते, पुरुषार्थसमाप्तिबुद्धयुपपत्तेः, ' तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ' ( ईशा ० ७ ), ‘ अमयं वै जनक प्राप्तोऽसि ' ( बृह ० ४।२।४ ), ' विद्वान्न विभेति कुतश्चन । एतं ह वाव न तपति, किमहं साधु नाकरवं, किमहं पाप अकरवम् ' ( तैत्ति ० २।९ ।१ ), इत्यादिश्रुतिभ्यः, तथैव च विदुषां तुष्ट्यनु-भवादिदर्शनात् । विकारानृताभिसंध्यपवादाच्च ' मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ' इति । अतो न विशेषनिराकरण तीनामन्य शेषत्वमवगन्तुं शक्यम् । नैवमुत्पत्त्यादिश्रुतीनां निराकाङ्क्षार्थप्रतिपादन सामर्थ्य मस्ति । प्रत्यक्षं तु तासामन्यार्थत्वं समनुगम्यते । तथा हि-' तमुत्पतितं सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यति ' ( छा ० ६।८।३ ) इत्युपन्यस्योदर्के सत एवै-कस्य जगन्मूलस्य विज्ञेयत्वं दर्शयति । ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते । येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । तद्विजिज्ञासस्व । तद्ब्रह्मेति ' ( तै ० ३ | १ | १ ) इति च । एवमुत्पत्त्यादि-श्रुतीनामैकात्म्यावगमपरत्वान्नानेकशक्तियोगो ब्रह्मणः । अतश्चगन्तव्यत्वानुपपत्तिः । ' न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति ' ( वृह ० ४ । ४ । ६ ) इति च परस्मिन् ब्रह्मणि गतिं निवार-अङ्गभूत हैं और विशेष प्रतिषेधक श्रुतियाँ उत्पत्ति आदि प्रतिपादक श्रुतियोंके अङ्ग नहीं हैं? कहते हैं-विशेष निराकरणक श्रुतियाँ निराङ्काक्षार्थक हैं, क्योंकि आत्मका एकत्व, नित्यत्व, शुद्धत्व आदि ज्ञान होनेपर पुनः कोई भी आकांक्षा उत्पन्न नहीं होती । कारण कि ' तन को मोह: ० ' ( उस समय एकत्व-दर्शी उस विद्वान् में क्या मोह और शोक हो सकते हैं? अर्थात् नहीं हो सकते ) ' अमयं वै. ' ( हे जनक! निश्चय तू अभयको प्राप्त हो गया है ) ' विद्वान्न ० ' ( उस ब्रह्मके आनन्दको जाननेवाला विद्वान् किसीसे भी मयमीत नहीं होता उस विद्वान्को मैंने शुभ कर्म क्यों नहीं किया, पाप कर्म क्यों किया इसप्रकारको चिन्ता सन्तप्न नहीं करती ) इत्यादि श्रुतिसे पुरुषार्थ पुरुषको अभीष्ट वस्तुकी समाप्ति विषयक बुद्धि उपपन्न होती है । उसी प्रकार तत्त्ववेत्ताविद्वानोंमें सन्तुष्टि अनुभव आदि देखने में आते हैं । और विकार एवं अनृत में अभिसन्धि - आग्रहका अपवाद भी है, क्योंकि ' मृत्योः स ० ' ( जो अद्वितीय ब्रह्ममें नाना - सा देखता है वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है ) ऐसी श्रुति है । इसलिए विशेष निरा-करण करनेवाली श्रुतियोंमें अन्य शेषत्व नहीं जाना जा सकता । इसीप्रकार उत्पत्ति आदि प्रतिपादक श्रुतियों में निराङ्काक्ष अर्थ प्रतिपादन करनेकी सामथ्यं नहीं है, क्योंकि उनका तो अन्यार्थत्व प्रत्यक्ष समनुगत है । जैसे कि ‘ तत्रैतच्छुङ्गम् ० ' ( हे सोम्य! उस जलसे ही तू इस शरीररूप अङ्कुर- कायँको उत्पन्न हुआ समझ क्योंकि यह निर्मूल कारण रहित नहीं हो सकता ) इसप्रकार उपक्रमकर उपसंहार - अन्त में जगत् के मूलभूत एक ही सत्को विज्ञेयरूपसे दिखलाती है । और ' यतो वा ० ' ( जिससे निश्चय ही ये सब भूत उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिसके आश्रयसे ये जीवित रहते हैं और अन्त में विनाशोन्मुख होकर जिसमें लीन होते हैं, उसे विशेषरूपसे जानने की इच्छाकर वहीं ब्रह्म है ) यह श्रुति है । इसप्रकार उत्पत्ति आदि प्रतिपादक श्रुतियाँ एकात्म्य अवगम परक होनेसे ब्रह्ममें अनेक शक्तिका योग नहीं हो सकता । इसलिए ब्रह्ममें गन्तव्यत्वकी अनुपपत्ति है । ' न तस्य प्राणा ० ' ( उस ब्रह्मवेत्ता के प्राण इस शरीरखे उत्क्रमण नहीं करते, ब्रह्म ही होकर ब्रह्मको प्राप्त होता है ) इसप्रकार श्रुति परब्रह्म में गतिका निवारण करती | उसका ' स्पष्टो ह्येषाम् ' इस सूत्र में व्याख्यान किया जा चुका है । गतिकी कल्पना सत्यानन्दी - दीपिका तदङ्गम् ' ( फलवान्को सन्निधिमें अफलवान् उसका अङ्ग है ) यह न्याय है । इससे निर्विशेष श्रुतियाँ सविशेष श्रुतियोंके अङ्ग नहीं हो सकतीं । इसप्रकार न्यायसे सविशेष श्रुतियोंमें बङ्गत्व कहकर बाब श्रतिषे मी ' प्रत्यक्षं तु ' आदिसे कहते हैं ।
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८६० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य 1 अ ० ४ पा ० ३ यति । तद्व्याख्यातम् -'स्पष्टो ह्येकेषाम् ' ( ब्रह्मसूत्र ४।२।१३ ) इत्यत्र । गतिकल्पनायां च गन्ता जीवो गन्तव्यस्य ब्रह्मणोऽवयवो विकारो वाऽन्यो वा ततः स्यात् । अत्यन्ततादात्म्ये गमना-नुपपत्तेः । यद्येवं ततः किं स्यात् उच्यते? यद्येकदेशस्ते नैकदेशिनो नित्यप्राप्तत्वान्न पुनर्ब्र-ह्मगमनमुपपद्यते, एकदेशैकदेशित्वकल्पनाच ब्रह्मण्यनुपपन्ना निरवयवत्वप्रसिद्धेः विकार-पक्षेऽप्येतत्तुल्यम्, विकारेणापि विकारिणो नित्यप्राप्तत्वात् । नहि घटो मृदात्मतां परित्यज्या-वतिष्ठते, परित्यागे वाऽभावप्राप्तेः । विकारावयवपक्षयोश्च तद्वतः स्थिरत्वाद्ब्रह्मणः संसा-रगमनमप्यनवक्लृप्तम् । अथान्य एव जीवो ब्रह्मणः । सोऽणुर्व्यापी मध्यमपरिमाणो वा भवितुमर्हति । व्यापित्वे गमनानुपपत्तिः, मध्यमपरिमाणत्वे चानित्यत्वप्रसङ्गः । अणुत्वे कृत्स्नशरीरवेदनानुपपत्तिः । प्रतिषिद्धे चाणुत्वमध्यम परिमाणत्वे विस्तरेण पुरस्तात् । पर-स्माच्चान्यत्वे जीवस्य'तत्त्वमसि ' ( छा ० ६ ॥ ७ ) इत्यादिशास्त्रबाधप्रसङ्गः । विकारावयवपक्ष-योरपि समानोऽयं दोषः । विकारावयवयोस्तद्वतोऽनन्यत्वाददोष इति चेत् - न, मुख्यैक-त्वानुपपत्तेः । सर्वेष्वेतेषु पक्षेध्वनिर्मोक्षप्रसङ्गः । संसार्यात्मत्वानिवृत्तेः । निवृत्तौ वा स्वरूप-नाशप्रसङ्गः, ब्रह्मात्मत्वानभ्युपगमाच्च । यत्तु कैश्चिज्जल्प्यते - मित्यानि नैमित्तिकानि कर्मा-होनेपर वह गन्ता जीव गन्तव्य ब्रह्मका अवयव वा विकार अथवा उससे अन्य होना चाहिए? क्योंकि अत्यन्त तादात्म्यमें गमन अनुपपन्न है । यदि ऐसा हो तो उससे क्या होगा? कहते हैं- यदि जीव ब्रह्मका एक देश- माग- अवयव हो तो उस एक देशी ब्रह्मके नित्य प्राप्त होनेसे पुनः ब्रह्मगमन उपपन्न नहीं होता । एक देश और एकदेशित्व कल्पना ब्रह्ममें अनुपपन्न है, क्योंकि वह निरवयवरूपसे प्रसिद्ध है । विकारपक्षमें भी यह अनुपपत्ति समान है, कारण कि विकारसे विकारी नित्य प्राप्त है । घट मृदात्मताका परित्याग कर अवस्थित नहीं होता, क्योंकि परित्याग करनेपर उसका अभाव प्राप्त होगा । विकारपक्ष और अवयवपक्ष में विकारी और अवयवी ब्रह्मके स्थिर होनेसे संसारगमन भी अनिश्चित हैं । यदि जोव ब्रह्मसे अन्य है तो यह अणु, व्यापी अथवा मध्यमपरिमाण वाला हो सकता है । व्यापी - व्यापक होनेपर तो गमनकी अनुपपत्ति है । मध्यपरिमाणवाला होनेपर अनित्यत्व प्रसङ्ग है । अणुत्व होनेपर समस्त शरीरगत वेदना नहीं हो सकती । अणुत्व और मध्यम परिमाणत्वका तो विस्तारसे पूर्व प्रतिषेध किया गया है । जीवका परमात्मा से अन्य होनेपर ' तत्वमसि ' इत्यादि एकत्व बोधक शास्त्रका बाघ प्रसङ्ग होगा । यह दोष तो विकार और अवयव पक्ष में भी समान है । यदि कहो कि विकार और अवयव तो विकारी और अवयवीसे अनन्य हैं, अतः उक्त दोष नहीं है, तो ऐसा नहीं है, क्योंकि मुख्य एकवकी अनुपपत्ति होती है, और इन सब पक्षोंमें अनिर्मोक्ष प्रसङ्ग है, कारण कि संसार्यात्मत्वकी निवृत्ति नहीं होगी, अथवा निवृत्ति होनेपर उसके स्वरूपका नाश प्रसंग होगा, क्योंकि उसमें ब्रह्मात्मत्वका स्वीकार नहीं किया गया है । कुछ लोग तो यह कहते हैं - नित्य और नैमित्तिक सत्यानन्दी - दीपिका # यदि गन्ता जीवकी गतिकी कल्पना की जाय तो यह प्रश्न उठता है कि गन्ता जीवका गन्तव्य ब्रह्मके साथ क्या सम्बम्ध है? क्या वह गन्तव्य ब्रह्मका अवयव है वा विकार हैं अथवा अन्य है? प्रथम दो विकल्प भेद और अभेदसे हैं खौर तृतीय अत्यन्त भेदमें है । अत्यन्त अभेदमें तो गमन नहीं हो सकता । अतः ' उच्यते ' आदिसे सब विकल्पोंका समाधान किया गया है । * अब अन्य मतका ' यत्तु ' इत्यादिसे उपन्यास कर खण्डन करते हैं । संसारका निमित्त कर्म हैं उनके अभाव से संसारका अभावरूप मोक्ष स्वतः सिद्ध है । इसलिए ब्रह्मज्ञानके विना मी संसारके अभाव होने से मोक्ष होता है । जैसे रोगके निमित्तका अभाव होनेसे रोग निवृत्त हो जाता
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अधि ० ५ सू ० १४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८६१ ण्यनुष्ठीयन्ते प्रत्यवायानुत्पत्तये, काम्यानि प्रतिषिद्धानि च परिहियन्ते स्वर्गनरकानवाप्तये, सांप्रतदेहोपभोग्यानि च कर्माण्युपभोगेनैव क्षिप्यन्त इत्यतो वर्तमानदेहपातादूर्ध्वं देहा-न्तरप्रतिसंधानकारणाभावात्स्वरूपावस्थानलक्षणं कैवल्यं विनापि ब्रह्मात्मतयैवंवृत्तस्य सेत्स्यतीति - तदसत्, प्रमाणाभावात् । न ह्येतच्छास्त्रेण केनचित्प्रतिपादितं मोक्षार्थीत्थं समाचरेदिति । स्वमनीषया त्वेतत्तर्कितं यस्मात्कर्मनिमित्तः संसारस्तस्मान्निमित्ता-भावान्न भविष्यतीति । न चैतत्तर्कयितुमपि शक्यते, निमित्ताभावस्य दुर्ज्ञानत्वात् । बहूनि हि कर्माणि जात्यन्तरसंचितानीष्टानिष्टविपाकान्येकैकस्य जन्तोः संभाव्यन्ते । तेषां विरुद्धफलानां युगपदुपभोगासंभवात्का निचिल्लब्धावसराणीदं जन्म निर्मिमते, कानिचित्तु देशकालनिमित्तप्रतीक्षाण्यासत इत्यतस्तेषामवशिष्टानां सांप्रतेनोपभोगेन क्षपणासंभवान्न यथावर्णितचरितस्थापि वर्तमानदेहपाते देहान्तरनिमित्ताभावः शक्यते निश्चेतुम् । कर्म-शेष सद्भावसिद्धिश्च तद्य इह रमणीयचरणाः ', ' ततः शेषेण ' इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः । स्यादे-तत्- नित्यनैमित्तिकानि तेषां क्षेपकाणि भविष्यन्तीति, तन्न, विरोधाभावात् । सति हि विरोधे क्षेप्यक्षेपकभावो भवति । नच जन्मान्तरसंचितानां सुकृतानां नित्यनैमित्तिकैरस्ति विरोधः । शुद्धिरूपत्वाविशेषात् । दुरितानि त्वशुद्धिरूपत्वात्सति विरोधे भवतु क्षपणं नतु कर्मोंका अनुष्ठान प्रत्यवायकी अनुत्पत्तिके लिए किया जाता है । काम्य और प्रतिषिद्ध कर्मोंका स्वगं और नरककी प्रतिके लिए परिहार किया जाता है । वर्तमान देहके उपयोग योग्य कर्म उपभोगसे ही क्षय हो जाते हैं, अतः वर्तमान देहपातके अनन्तर अन्य देहके प्रतिसंधान कारणका अभाव होने से स्वरूपावस्थानरूप कैवल्य ब्रह्मात्मता के विना भी एवंवृत्त पुरुषको सिद्ध होगा । वह ठीक नहीं है, क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं है । -मोक्षार्थी इसप्रकार आचारण करे यह किसी भी शास्त्र से प्रति-पादित नहीं है । यह अपनी बुद्धिसे हो तर्क किया गया है, क्योंकि कर्म निमित्तक संसार है, बतः निमित्तके अभाव से संसार नहीं होगा । परन्तु यह तर्क भी नहीं किया जा सकता, कारण कि निमित्त का अभाव दुर्ज्ञेय है । एक एक प्राणीके अन्य अन्य जन्ममें संचित इष्ट, अनिष्ट फलवाले अनेक कर्म संभावित हैं । अत्यन्त विरुद्ध फलवाले उन कर्मोंका युगपत् उपभोग संभव न होने से उनमें से फल देनेका अवसर प्राप्त किए हुए कुछ कर्म इस जन्मका निर्माण करते हैं और देश, काल और निमित्त की प्रतीक्षा करनेवाले कुछ कर्म रहते हैं । इसलिए उन अवशिष्ट कर्मोंका संप्राप्त उपभोगखे क्षपण असंभव होनेसे यथावणित चरितवालेका भी वर्तमानदेहके पात होनेपर अन्य देहके निमित्तका अभाव निश्चित नहीं किया जा सकता है । ' तद्य इह ० ' ( इसलिए जो यहाँ रमणीय चरणवाले हैं ) ‘ ततः शेषेण ' ( पीछे शेषसे ) इत्यादि श्रुति और स्मृतिसे कर्मशेषके सद्भावकी सिद्धि होती है । परन्तु यह शङ्का हो सकती है - नित्य और नैमित्तिककर्म उन अवशिष्ट कर्मोके क्षेपक ( नाशक ) होंगे, वह युक्त नहीं है, क्योंकि उनमें विरोधका अभाव है । विरोध होनेपर ही नाश्य - नाशक भाव होता है | जन्मान्तरमें सचित सुकृत कर्मोका वर्तमान नित्य नैमित्तिक के साथ विरोध नहीं है, कारण कि दोनों में शुद्धरूपत्व समान है । दुरितों का अशुद्धिरूप होनेसे विरोध होनेपर विनाय मले हो, सत्यानन्दी - दीपिका है और पुनः नहीं होता । परन्तु यह कथन असङ्गत है, क्योंकि प्रमाणके विना केवल तर्क से किसी सिद्धान्तकी सिद्धि नहीं हो सकती है 1 । कर्म तर्क अगम्य हैं, अतएव ' गहना कर्मणो गतिः ' ( गीता ० ४।१७ ) इत्यादि स्मृति और ' तद्य इह ' इत्याति श्रुतिसे अवशिष्ट कर्मोंका अस्तित्व सिद्ध होता है । * अनारब्ध फलवाले पुण्य - पाप भले हों, परन्तु उनका नित्य नैमित्तिक कर्मों के अनुष्ठानसे नाश होनेपर जन्मान्तर न होगा, इस आशय से ' स्यादेतत् ० ' इत्यादिसे शङ्का करते हैं । परन्तु यहाँ
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८६२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अं ० ४ पा ० ३ तावता देहान्तर निमित्ताभावसिद्धिः सुकृतनिमित्तत्वोपपत्तेः, दुरितस्याप्यशेषक्षपणा-नवगमात् । नच नित्यनैमित्तिकानुष्ठानात्प्रत्यवायानुत्पत्तिमात्रम्, न पुनः फलान्तरोत्पत्ति-रिति प्रमाणमस्ति, फलान्तरस्याप्यनुनिष्पादिनः संभवात् । स्मरति ह्यापस्तम्बः - ' तद्य-था फलार्थे निमिते छायागन्धावनूत्पद्येते एवं धर्मं चर्यमाणमर्था अनुत्पद्यन्ते ' इति । न चासति सम्यग्दर्शने सर्वात्मना काम्यप्रतिषिद्धवर्जनं जन्मप्रायणान्तराले केनचित्प्रतिज्ञातुं शक्यम् । सुनिपुणानामपि सूक्ष्मापराधदर्शना । संशयितव्यं तु भवति, तथापि निमित्ताभावस्य दुर्ज्ञानत्वमेव । न चानभ्युपगम्यमाने ज्ञानगम्ये ब्रह्मात्मत्वे कर्तृत्वभोक्तृत्वस्वभावस्या त्मन कैवल्यमाकाङ्क्षितुं शक्यम् । अग्न्यौष्ण्यवत्स्वभावस्यापरिहारार्यत्वात् । स्यादे-तत् । कर्तृत्वभोक्तृत्व कार्यमनर्थो न तच्छक्तिस्तेन शक्यत्यवस्थानेऽपि कार्यपरिहारा दुपपन्नो मोक्ष इति तच्च न, शक्तिसद्भावे कार्यप्रसवस्य दुर्निवारत्वात् । अथापि स्यान्न केवला शक्तिः कार्यमारभतेऽनपेक्ष्यान्यानि निमित्तानि, अत एकाकिनी सा स्थितापि नापराध्यतीति - तच्च न, निमित्तानामपि शक्तिलक्षणेन संबन्धेन नित्यसंबद्धत्वात् । तस्मात्कर्तृत्वभोक्तृत्वस्वभावे सत्यात्मन्यसत्यां विद्यागस्यायां ब्रह्मात्मतायां न परन्तु इतनेसे देहान्तर निमित्तके अभावकी सिद्धि नहीं होती, क्योंकि सुकृतोंमें निमित्तत्व उपपन्न है और दुरितका मी अशेष विनाश अवगत नहीं होता । इसीप्रकार नित्य नैमित्तिक अनुष्ठान से प्रत्यवाय की अनुत्पत्तिमात्र होती है और अन्य फलकी उत्पत्ति नहीं होती, ऐसा होने में कोई प्रमाण नहीं है । क्योंकि अन्य फलका भी उसके साथ निष्पन्न होना सम्भव है | ' तद्यथात्रे ० ' ( जैसे फलके लिए निमिट आम्रवृक्षके पीछे छाया और गन्ध उत्पन्न होते हैं, वैसे धर्मं अनुष्ठान के पीछे अर्थ उत्पन्न होते हैं ) यह आपस्तम्ब स्मृति है । सम्यग्दर्शनके न होने तक जन्म - मरण के मध्य में सर्वात्मना काम्य और प्रतिषिद्ध के त्यागकी किसीसे भी प्रतिज्ञा नहीं की जा सकती, क्योंकि कर्मकुशल पुरुषोंमें भी सूक्ष्म अपराध देखनेमें खाता है । संशयका विषय तो हो सकता है, तो मी निमित्तका अभाव दुर्विज्ञेय ही है | ज्ञानगम्य ब्रह्मात्मत्व स्वीकार न करनेपर तो कर्तृत्व मोक्तृत्व स्वभाववाले आत्माके कैवल्यकी बाकाङ्क्षा नहीं की जा सकती, कारण कि अग्नि - औष्ण्यके समान स्वभाव अपरिहार्य है । ऐसा हो, परन्तु कर्तृत्व, भोक्तृत्वरूप कार्य अनर्थक है उसकी शक्ति नहीं, इससे शक्तिके अवस्थित होनेपर भी कार्यके परिहारसे मोक्ष उपपन्न होता है? वह युक्त नहीं है, क्योंकि शक्तिके सद्भावमें कार्यका जन्म दुर्निवार है । और भी शङ्का होती है कि केवल शक्ति अन्य देश, काल आदि निमित्तों की अपेक्षा न कर कार्यका आरम्भ नहीं करती, इससे वह एकाकी स्थित होती हुई भी अपराध नहीं करती? वह मी ठीक नहीं, क्योंकि निमित्त भी शक्तिरूप सम्बन्धसे नित्य सम्बद्ध हैं । इसलिए कर्तृत्व मोक्तृश्व स्वभाव के विद्यमान होने पर और आत्मा में विद्यागम्य ब्रह्मात्मत्व न होनेपर तो किसी प्रकार भी मोक्ष की आज्ञा नहीं है । और ' नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ' ( ज्ञानके विना मोक्षके लिए अन्य साधन सत्यानन्दी - दीपिका यह प्रश्न उठता है कि कर्तृत्व आदि आत्माका स्वभाव है अथवा उसमें आरोपित है? प्रथमपक्ष में— क्या वह स्वभावकार्य है अथवा शक्ति? कार्यपक्ष में-- उस कार्यकी निवृत्ति में मोक्ष है अथवा उसकी स्थिति में? प्रथमपक्ष - अग्नि - औष्ण्यके समान स्वभाव निवृत्त नहीं किया जा सकता । द्वितीय स्थितिमें तो वदतोव्याघात है, क्योंकि जब कार्यं विद्यमान है तो मोक्ष कैसे हो सकता है । अब स्वभाव शक्ति है, इस पक्ष की ' स्यादेतत् ' इत्यादिसे शङ्का करते हैं । * यदि कर्तृत्व आदि आत्मामें आरोपित है, यह द्वितीय पक्ष कहो तो वह तत्वज्ञान से ही निवृत्त हो जाता है, इस विषय में ' नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ' ' ज्ञानादेव ' तु कैवल्यम् ' इत्यादि श्रुति
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अधि ०५ सू ० १४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ८६३ कथंचन मोक्षं प्रत्याशास्ति । श्रुतिश्च - ' नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ' ( श्वेता ० ३।८ ) इति ज्ञाना-दन्यं मोक्षमार्ग वारयति । परस्मादनन्यत्वेऽपि जीवस्य सर्वव्यवहारलोपप्रसङ्गः । प्रत्याक्षा-दिप्रमाणाप्रवृत्तेरिति चेत् - न, प्रोकप्रबोधात्स्वप्नव्यवहारवत्तदुपपत्तेः शास्त्रं च ' यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति ' ( बृह ० २ | ४ | १४, ४/५/१५ ) इत्यादिनाऽप्रबुद्धविषये प्रत्य क्षादिव्यवहार मुक्त्वा पुनः प्रबुद्धविषये ' यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत् ' ( बृह ० २।४।-१४, ४/५/१५ ) इत्यादिना तदभावं दर्शयति । तदेवं परब्रह्मविदो गन्तव्यादिविज्ञालस्य बाधितत्वान्न कथंचन गतिरुपपादयितुं शक्या । किंविषयाः पुनर्गतिश्रुतय इति? उच्यते-सगुण विद्याविषया भविष्यन्ति । तथा हि- कचित्पञ्चाग्निविद्यां प्रकृत्य गतिरुच्यते, क्वचि-त्पर्यङ्कविद्यां क्वचिद्वैश्वानर विद्याम् । यत्रापि ब्रह्म प्रकृत्य गतिरुच्यते- ' यथा प्राणो ब्रह्मकं ब्रह्म खं ब्रह्म ' ( छा ० ४।१०१५ ) इति, ' अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म ' ( छा ० ७।१।१ ) इति च, तत्रापि वामनीत्वादिभिः सत्यकामादिभिश्च गुणैः सगुणस्यैवोपास्यत्वात्संभवति गतिः । न कचित्परब्रह्मविषया गतिः श्राव्यते, यथा गतिप्रतिषेधः श्रावितः - ' न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ' ( बृह ० ४।४।६ ) इति । ब्रह्मविदाप्नोति परम् ' ( तै ० २1१1१ ) इत्यादिषु तु सत्यप्या-नोतेर्गत्यर्थत्वे वर्णितेन न्यायेन देशान्तरप्राप्त्यसंभवात्स्वरूपप्रतिपत्तिरेवेयम विद्याध्यारो-पितनामरूपप्रविलयापेक्षयाऽभिधीयते - ' ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति ( बृह ० ४।४।७ ) इत्यादिवदिति द्रष्टव्यम् । अपि च परविषया गतिर्व्याख्यायमाना प्ररोचनाय वा स्यादनुचिन्तनाय वा? तत्र नहीं है ) यह श्रुति ज्ञानसे अन्य मोक्षमामंका वारण करती है । जीवका परमात्मासे अनन्य होनेपर भी सब व्यवहारका लोप प्रसङ्ग होगा, क्योंकि इस पक्षमें प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों की प्रवृत्ति नहीं है, ऐसा यदि कहो तो नहीं, क्योंकि तत्त्वज्ञानके पूर्व स्वप्नव्यवहारके समान उसकी उपपत्ति होती है । ' तत्र हि ० ' ( जहाँ द्वैत -सा होता है वहाँ अन्य - अभ्यको देखता है ) इत्यादिसे शास्त्र अप्रबुद्ध विषय में प्रत्यक्ष आदि व्यवहार कहकर पुन: प्रबुद्धविषयमें ' यत्र स्वस्थ. ० ' ( जिस समय इस विद्वान् के लिए सब आत्मा ही हो गया तब किससे किसे देखे ) इत्यादि शास्त्रसे उसका अभाव दिखलाते हैं । इसलिए परब्रह्मज्ञानीके गन्तव्य आदि विज्ञानका बाघ होनेसे किसीप्रकार मो गतिका उपपादन नहीं किया जा सकता । तब गति प्रतिपादक श्रुतियाँ किसको विषय करती हैं? कहते हैं - सगुण विद्या विषयक होंगी । जैसे कि कहीं पञ्चाग्नि विद्याको प्रस्तुतकर गति कही जाती है, तो कहींपर पर्यङ्कविद्या और कहीं पर वैश्वानर-विद्याका उपक्रम कर कही जाती है । और जहाँ ब्रह्मको प्रस्तुतकर गति कही जाती है, जैसे ' प्राणो ब्रह्म ० ' ( प्राण ब्रह्म है, सुख ब्रह्म आकाश ब्रह्म है । ) और ' अथ यदिदम ० ' ( अब इस शरीर रूपी ब्रह्मपुरके भीतर जो यह सूक्ष्म कमलाकार गृह है ) यह श्रुति है | वहाँपर भी वामनीत्व आदि और सत्यकामत्व आदि गुणोंसे सगुण ब्रह्मके ही उपास्य होनेसे गति सम्भव है । जैसे ' न तस्य To ० ' ' ( उस ब्रह्मवित् के शरीर से प्राण उत्क्रमण नहीं करते ) इसप्रकार गतिका प्रतिषेध सुनाया गया है, वैसे कहींपर परब्रह्म विषयक गति नहीं सुनाई जाती । ' ब्रह्मविदाप्नोति परम् ' इत्यादि श्रुतिमें ' अप् ' घातु गत्यर्थक होनेपर भी वर्णित न्याय ( ब्रह्म सवंगत सर्वान्तर और सर्वात्मा है ) से देशान्तर प्राप्तिका असंभव होनेसे अविद्या अध्यारोपित नाम, रूपके विलयकी अपेक्षा ' ब्रह्म सन्ब्रह्माप्येति ' इत्यादिके समान यह स्वरूप-प्राप्ति ही अभिहित है, ऐसा समझना चाहिए । और परब्रह्म विषयक व्याख्यान की हुई गति प्ररोचनके लिए अथवा मनुचिन्तनके लिए होगी? उसमें ब्रह्मतत्ववित् पुरुषमें तो गतिकी उक्ति से सत्यानन्दी - दीपिका प्रमाण हैं । इसप्रकार प्रासङ्गिकका परिहारकर अब प्रकृत परमतत्त्वका ' तदेवम् ' इत्यादिसे उपसंहार करते हैं । इसलिए सवंगत सर्वान्तरात्मा ब्रह्म गन्तव्य न होनेसे परब्रह्मवित्की गति नहीं हो सकती ।
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८६४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० ३ प्ररोचनं तावद्ब्रह्माविदो न गत्युक्त्या क्रियते, स्वसंवेद्येनैवाव्यवहितेन विद्यासमर्पितेन स्वास्थ्येन तत्सिद्धेः । नच नित्यसिद्ध निःश्रेयसनिवेदनस्या साध्यफलस्य विज्ञानस्य गत्यनु-चिन्तने काचिदपेक्षोपपद्यते । तस्मादपरब्रह्मविषया गतिः । तत्र परापरब्रह्म विवेकानवधार-न परस्मिन्ब्रह्मणि वर्तमाना गतिश्रुतयः परस्मिन्नध्यारोप्यन्ते । किं द्वे ब्रह्मणी - परमपरं चेति? बाढं द्वे - ' एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोंकारः ' ( प्र ० ५१२ ) इत्यादिदर्शनात् । किं पुनः ब्रह्म किमपरमिति? उच्यते - यत्राविद्याकृतनामरूपादिविशेषप्रतिषेधादस्थूला-दिशब्दैर्ब्रह्मोपदिश्यते, तत्परम् । तदेव यत्र नामरूपादिविशेषेण केनचिद्विशिष्टमुपासना-योपदिश्यते – ' मनोमयः प्राणशरीरो मारूप: ' ( छा ० ३ | १४ | २ ) इत्यादिशब्दैस्तदपरम् । नन्वे-वमद्वितीयश्रुतिरुपरुध्येत, ' नः अविद्याकृतनामरूपोपाधिकतया परिहृतत्वात् । तस्य चापर-ब्रह्मोपासनस्य संनिधौ श्रूयमाणम् स यदि पितृलोककामो मवति ' ( छा ० ८।२1१ ) इत्यादि जगदैश्वर्य लक्षणं संसारगोचरमेव फलं भवति ' अनिवर्तितत्वादविद्यायाः । तस्य च देश-विशेषावबद्धत्वात्तत्प्रार्थं गमनमविरुद्धम् । सर्वगतत्वेऽपि चात्मन आकाशस्येव घटादि-गमने, बुद्धाद्युपाधिगमने गमनप्रसिद्धिरित्यवादिष्म ' तद्गुणसारत्वात् ' ( ब्रह्मसूत्र २।३।२ ९ ) इत्यत्र । तस्मात् ' कार्यं बादरिः ' ( ब्रह्मसूत्र ४।३।७ ) इत्येष एव स्थितः पक्षः । ' परं जैमिनिः ' ( ब्रह्मसूत्र ४ | ३ | १२ ) इति तु पक्षान्तरप्रतिभानमात्र प्रदर्शनं प्रज्ञाविकासनोयेति द्रष्टव्तम् ॥१४ ॥
प्ररोचन नहीं किया जाता, क्योंकि वह तो स्व संवेद्य विद्यासे समर्पित अव्यवहित स्वास्थ्यसे सिद्ध है | और नित्य सिद्ध निश्रेयस निवेदन विशिष्ट असाध्यफलवाले विज्ञानकी गति अनुचिन्तनमें कोई अपेक्षा उपपन्न नहीं होती । इससे अपरब्रह्मविषयक गति है । उसमें पर और अपर ब्रह्मके विवेकका निश्चय न होनेसे अपरब्रह्ममें वर्तमान गतिबोधक श्रुतियाँ परब्रह्म में अध्यारोपित की जाती हैं । क्या पर और अपर दो ब्रह्म हैं? हाँ, ठीक, दो ब्रह्म हैं । क्योंकि ' एतद्वै सत्यकाम ० ' ( पिप्पलादने कहा – हे सत्यकाम! यह जो ओंकार है वही निश्चय पर और अपर ब्रह्म है ) इत्यादि देखने में बाता है । तो परब्रह्म क्या है और अपर ब्रह्मवश है? कहते हैं - जहाँ अविद्याकृत नाम - रूप आदि विशेषके प्रतिषेधसे अस्थूल आदि शब्दोंसे ब्रह्म उपदिष्ट है वह परब्रह्म है, और वही जब नाम - रूप आदि किसी विशेषणसे विशिष्ट होता हुआ उपासना के लिए ' मनोमयः प्राणशरीरो मारूपः ० ' ( ब्रह्म मनोमय, प्राणशरीर मारूप है ) इत्यादि शब्दों से उपदिष्ट होता है वह अपर ब्रह्म है । परन्तु ऐसा होनेपर अद्वैत प्रतिपादक श्रुति बाधित होगी? नहीं, क्योंकि अविद्याकृत नाम रूप उपाधि युक्त होनेके कारण वह परिहृत है । और अपर-ब्रह्मकी उपासनाका उसके समीपमें ' स यदि ० ' ( यदि वह पितृलोककी कामनावाला होता है ) इत्यादि जगत् ऐश्वयंरूप संसार विषयक ही श्रूयमाण फल होता है, क्योंकि उसकी अभी तक अविद्या निवृत्त नहीं हुई है । और वह देशविशेषमें अवबद्ध है, इसलिए उस देशकी प्राप्तिके लिए गमन विरुद्ध नहीं है । आत्मा के सर्वव्यापक होनेपर भी जैसे घट आदिके गमनसे आकाशका गमन होता है, वैसे ही बुद्धि आदि उपाधिके गमन होनेपर आत्मामें गमन प्रसिद्ध है, ऐसा ' तद्गुणसारत्वात् ' इस सूत्रमें हमने कहा है । इसलिए ' कार्य बादरि । ' ( बादरि आचार्य के मतमें कार्यब्रह्म ही गम्य है ) यही सिद्धान्त पक्ष है । ' परं जैमिनि: ' ( जैमिनि आचार्यके मतमें परब्रह्म ही गम्य है ) इसप्रकार अन्यपक्षका प्रतिमा-नमात्र प्रदर्शन तो केवल बुद्धिकी विशदताके लिए है, ऐसा समझना चाहिए ॥ १४ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका * माया उपाधि रहित शुद्ध ब्रह्म पर है और माया उपाधि युक्त वही ब्रह्म अपर है । ' अस्थूल-मन्वणु ' इत्यादि श्रुतियाँ अविद्याकृत नाम - रूप विशेषका प्रतिषेध करती हुई परब्रह्मका प्रतिपादन करती हैं | ‘ यः सर्वज्ञः सर्ववित् ’ ‘ सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः ' इत्यादि श्रुतियाँ सोपाधिक अपर ब्रह्मका प्रतिपादन
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अधि ० ६ सू ० १५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ८६५ ( ६ अप्रतीकालम्बनाधिकरणम् । सू ० १५-१६ ) अप्रतीकालम्बनान्नयतीति बादरायण उभयथाऽदोषात्तत्क्रतुश्च ॥ १५ ॥
पदच्छेद - अप्रतीकालम्बनान्, नयति, इति, बादरायणः, उमयथा, अदोषात्, तत्क्रतुः च । सूत्रार्थ - ( अप्रतीकालम्बनान् ) अमानव पुरुष अप्रतीकोपासकों को ( नयति ) ब्रह्मलोक में ले जाता है, ( बादरायणः ) ऐसा आचार्य बादरायणका मत है । ( उभयथाऽदोषात् ) क्योंकि कुछ उपासकों को ले जाता है और कुछको नहीं ले जाता, ऐसा होनेपर भी दोष नहीं है, कारण कि ( तक्र-तुश्च ) ब्रह्मक्रतु ब्रह्मलोक में ले जाया जाता है । * स्थितमेतत्कार्यविषया गतिर्न परविषयेति । इदमिदानीं संदिह्यते - किं सर्वान्वि कारालम्बनानविशेषेणैवामानवः पुरुषः प्रापयति ब्रह्मलोकमुत कांश्विदेवेति । किं तावत्प्रा-तम्? सर्वेषामेवैषां विदुषामन्यत्र परस्माद्ब्रह्मणो गतिः स्यात् । तथा हि ' अनियमः सर्वाः साम् ० ' ( ब्रह्मसूत्र ३।३।३१ ) इत्यत्राविशेषेणैवैषा विद्यान्तरेष्ववतारितेति । एवं प्राप्ते प्रत्याह-अप्रतीकालम्बनानिति । प्रतीकालम्बनान्वर्जयित्वा सर्वानन्यान्विकारालम्बनान्नयति ब्रह्म-लोकमिति बादरायण आचार्यों मन्यते । न ह्येवमुभयथाभावाभ्युपगमे कश्चिद्दोषोऽस्ति, अनियमन्यायस्य प्रतीकव्यतिरिक्तेष्वप्युपासनेषूपपत्तेः । तत्क्रतुश्चास्योभयथाभावस्य समर्थको हेतुर्द्रष्टव्यः । यो हि ब्रह्मक्रतुः स ब्राह्ममैश्वर्यमासीदेदिति श्लिष्यते, ' तं यथा यथोपासते तदेव भवति ' इति श्रुतेः नतु प्रतीकेषु ब्रह्मऋतुत्वमस्ति प्रतीक प्रधानत्वादुपा-सनस्य । नन्वब्रह्मक्रतुरपि ब्रह्मगच्छतीति श्रूयते यथा पञ्चाग्निविद्यायाम् -'स एनान्ब्रह्म कार्यब्रह्मविषयक गति है और परब्रह्म विषयक गति नहीं है, यह सिद्ध हो चुका । अब यह सन्देह होता है कि क्या विकारका आलम्बन करनेवाले सब उपासकों को अमानव पुरुष समानरूपस्चे ब्रह्मलोक प्राप्त कराता है अथवा किन्हींको ही? तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - इन सभी उपासकों की परब्रह्मसे अन्यत्र - कार्यब्रह्ममें गति होनी चाहिए, क्योंकि ' अनियमः सर्वासाम् ' इस सूत्र में समानरूपसे ही इस गतिका अन्य उपासनाओं में भी अवतरण किया गया है । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर निराकरण करते हैं - ' अप्रतीकालम्बनान् ' प्रतीकका आलम्बन करनेवालोंको छोड़कर अन्य विकारालम्बी सभी उपासकोंको अमानव पुरुष ब्रह्मलोक में ले जाता है, ऐसा बादरायण आचार्य मानते हैं । इस प्रकार उभयथाभाव ( प्रतीकालम्बियों को नहीं ले जाता और विकारालम्बियोंको ले जाता है ) स्वीकार करने पर भी कोई दोष नहीं है, क्योंकि अनियम न्याय प्रतीकसे व्यतिरिक्त उपासनाबों में उपपन्न होता है । ‘ तत्क्रतुश्च ' ( कार्यब्रह्मकी उपासना करनेवाला ) इसे उमयथाभावका समर्थक हेतु समझना चाहिए । जो ब्रह्मक्रतु है वह ब्रह्मके ऐश्वर्यको प्राप्त होता है यह घटता है, क्योंकि ' तं यथा ० ' ( जो उसकी जिस-जिस प्रकार से उपासना करता है वही होता है ) ऐसी श्रुति है I । प्रतीकों में ब्रह्मक्रतुत्व नहीं है, कारण कि उपासना प्रतीक प्रधान होती है । परन्तु ' स एनान्ब्रह्म गमयति ' ( वह अमानव करती हैं । परन्तु ' एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म ' औपाधिक अपरब्रह्मके स्वीकार करनेपर दृष्टि परिहृत है ॥१४ ॥
* ' स. एनान्ब्रह्म गमयति ' यह अब्रह्मक्रतु भी ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है, ऐसी श्रुति है । जैसे कि पुरुष इन उपासकोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचाता है ) इस प्रकार सत्यानन्दी - दीपिका ' नेह नानास्ति किञ्चन ' इत्यादि अद्वैत प्रतिपादक श्रुतियोंका भी बाध नहीं हो सकता है, क्योंकि वह कल्पित होनेसे ज्ञान-सामान्य श्रुति है । ' जो जिसकी उपासना करता है वही होता है ' इस तत्क्रतुन्यायसे संशय होता है कि यावत् विकार उपासकोंको ब्रह्मलोक प्राप्त होता है अथवा किन्हीं उपासकोंको? ऐसा संशय होनेपर ' सर्वेषामे ० ' आादिसे पूर्वपक्ष दिखलाकर सिद्धान्ती - ' मनो
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८६६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० ३ गमयति ' ( छा ० ४।१५।४ ) इति भवतु, यत्रैवमाहत्यवाद उपलभ्यते, तदभावे त्वौत्सर्गिकेण तत्क्रतुन्यायेन ब्रह्मऋतूनामेव तत्प्राप्तिर्नेतरेषामिति गम्यते ॥ १५ ॥
विशेषं च दर्शयति ॥ १६ ॥
पदच्छेद - विशेषम्, च, दर्शयति । सूत्रार्थ - ( च ) और ( विशेषम् ) नाम आदि प्रतीकोपासनाओं में पूर्व - पूर्व से उत्तरोत्तर उपा-सनाओंमें और अधिक फल ( दर्शयति ) श्रुति दिखलाती है, अतः प्रतीकोपासक ब्रह्मलोकमें नहीं जाते । * नामादिषु प्रतीकोपासनेषु पूर्वस्मात्पूर्वस्मात्फलविशेषमुत्तरस्मिन्नुत्तरस्मिन्नु-पासने दर्शयति- ' यावन्नाम्नो गतं तत्रास्य यथाकामचारो मवति ' ( छा ० ७।१।५ ) ' वाग्वाव नाम्नो भूयसी ' ( छा ० ७ | २ | १ ) ' यावद्वाचो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति ' ( छा ० ७।२।२ ), मनो वाव वाचो भूय. ' ( छा ० ७।३।१ ) इत्यादिना । स चायं फलविशेषः प्रतीकतन्त्रत्वादुपासनानामु-पपद्यते, ब्रह्मतन्त्रे तु ब्रह्मणोऽविशिष्टत्वात्कथं फलविशेषः स्यान्? तस्मान्न प्रतीकालम्ब-नानामितरैस्तुल्य फलत्वमिति ॥१६ ॥
इति श्रीमच्छङ्करभगवत्पादकृतौ शारीरकमीमांसाभाष्ये चतुर्थाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥३ ॥
पञ्चाग्नि विद्यामें है । परन्तु जहाँपर इसप्रकार साक्षादपवादक- साक्षात् उपलब्ध हो वहाँपर मले ऐसा हो, किन्तु उसके अभाव में तो औत्सर्गिक तत्क्रतुन्याय से ब्रह्मक्रतुओंको ही ब्रह्मलोक प्राप्ति है अन्योंको नहीं, ऐसा ज्ञात होता है ॥ १५ ॥
नाम आदि प्रतीकोपासनाओंमें पूर्व पूर्वकी अपेक्षा उत्तरोत्तर उपासनाओं में ' यावन्नाम्नो गतं ० ' ( वह जो कि नामकी ' यह ब्रह्म है ' ऐसी उपासना करता है उसकी जहाँ तक नामकी गति होती है । वहाँ तक यथेच्छ गति हो जाती है ) ' वाग्वाव नाम्नो भूयसी ' ( वाक् ही नामसे बढ़कर है ) ' यद्वा-चो गतं ० ' ( वह जो वाणीकी ' यह ब्रह्म है ' ऐसी उपासना करता है उसकी जहाँ तक वाणीकी गति होती है वहाँ तक स्वेच्छ गति हो जाती है ) ' मनो वाव वाचो भूयः ' ( मन ही वाणीसे उत्कृष्ट है ) इत्यादिसे श्रुति फलविशेष दिखलाती है । यह फलविशेष प्रतीक के अधीन होनेसे उपासनाओं में उपपन्न होता है । उपासनाथोंको ब्रह्म अधीन होनेपर तो फलविशेष कैसे होगा, क्योंकि ब्रह्म अविशष्ट है । इससे प्रतीकालम्बियोंको अन्योंके समान फल नहीं है ॥ १६ ॥
स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत शाङ्करभाष्य - भाषानुवादके चतुर्थाध्यायका तृतीय पाद समाप्त ॥३ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका ब्रह्मेत्युपासीत ' ( मन ब्रह्म है ऐसी उपासना करनी चाहिए ) यह प्रतीक आलम्बन है । इस प्रकार प्रतीकका आलम्बन करनेवालोंको छोड़कर सब विकार आलम्बी उपासकोंको ब्रह्मलोक प्राप्त होता है । प्रतीको-पासक अचिरादि मागंसे विद्युत् लोक तक जाते हैं, ब्रह्मलोक तक नहीं, क्योंकि वे ब्रह्मोपासक नहीं है । प्रतीकोपासनाओं में नाम बादि प्रतीक प्रधान होता है और ब्रह्म गौण । किन्तु ब्रह्मोपासनाओंमें ब्रह्म प्रधान होता है । ' तं यथा ० ' यह तत्क्रतुन्याय श्रुतिमूलक है । यद्यपि पञ्चाग्निविद्यामें उपासक ब्रह्म-क्रतु नहीं है, तो भी वहां स्पष्टरूपसे उन पञ्चाग्निविद्या उपासकोंके लिए ब्रह्मलोक प्राप्ति कही गई है, अतः यहाँ तत्क्रतुन्यायका बाघ है । इससे सिद्ध हुआ है कि अप्रतीक ब्रह्मोपासकोंके लिए ही ब्रह्मलोक प्राप्ति है ॥ १५ ॥
* इस वक्ष्यमाण हेतु से भी प्रतीकोपासक ब्रह्मलोकमें नहीं जाते ' विशेषं च दर्शयति ' इस सूत्रसे कहते हैं । ' नाम ब्रह्मत्युपासीत ' ( नाम ब्रह्म है, ऐसी उपासना करे ) इस प्रकार ब्रह्मदृष्टिसे नाम आदि की उपासना प्रतीकोपासना कही जाती है । प्रतीकके तारतम्यसे फलतारतम्य की श्रुति है । नाम आदि