श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 901–910
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 901–910
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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८६७ चतुर्थाध्याये चतुर्थः पादः । [ अन्न पाइे ब्रह्मप्राप्ति - ब्रह्मलोकस्थितिनिरूपणम् ] ( इस पादमें ब्रह्मा और ब्रह्मलोकको स्थितिका निरूपण है ) ( १ संपद्याविर्भावाधिकरणम् । सू ० १ ३ ) संपद्याविर्भावः स्वेनशब्दात् ॥ १ ॥
पदच्छेद - संपद्य, आविर्भावः, स्वेनशब्दात् । सूत्रार्थ - ( संपद्य ) प्रकाशरूप आत्माका साक्षात्कारकर उस आत्मरूपमें ( आविर्भाव:) विद्वान् विभूत होता है, ( स्वेनशब्दात् ) क्योंकि ' स्वेन रूपेण ' इस श्रुतिमें ' स्व ' शब्द है । * एवमेवैष संप्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपे -णाभिनिष्पद्यत इति श्रूयते । तंत्र संशयः - किं देवलोकाद्युपभोगस्थानेष्विवागन्तुकेन केनचिद्विशेषेणाभिनिष्पद्यते, आहोस्विदात्ममात्रेणेति । किं तावत्प्राप्तम्? स्थानान्तरेष्वि-वागन्तुकेन केनचिपेणाभिनिष्पत्तिः स्यात्, मोक्षस्यापि फलत्वप्रसिद्धेः, अभिनिष्पद्यत इति चोत्पत्तिपर्यायत्वात् स्वरूपमात्रेण चेदभिनिष्पत्तिः पूर्वास्वप्यवस्थासु स्वरूपान-पायाद्विभाव्येत । तस्माद्विशेषेण केनचिदभिनिष्पद्यत इति । एवं प्राप्ते ब्रूमः -- केवलेनैवा-Pass विर्भवति, न धर्मान्तरेणेति । कुतः? स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत इति स्वशब्दात् । अन्यथा हि स्वशब्देने ते विशेषणमनवक्लप्तं स्यात् । नन्वात्मीयाभिप्रायः स्वशब्दो भवि ष्यति । न, तस्यावचनीयत्वात् । येनैव हि केनचिद्रूपेणाभिनिष्पद्यते तस्यैवात्मीयत्वोप ‘ एवमेवैष सम्प्रसादो ० ' ( इसीप्रकार यह जीव इस शरीर से समुत्थानकर - देहात्मभाव त्यागकर ज्योतिःस्वरूप परब्रह्मका साक्षात्कारकर स्व - आत्मरूपसे आविर्भूत होता है ) ऐसी श्रुति है । उसमें संशय होता है कि क्या देवलोक आदि उपभोग स्थानोंके समान किसी एक आगन्तुक स्वरूपविशेष से अभिनिष्पन्न होता है अथवा आत्ममात्र से? तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी -- अन्य स्थानोंके समान किसो एक व्यागन्तुकरूपसे अभिनिष्पन्न होना चाहिए, क्योंकि मोक्ष मी फलरूप से प्रसिद्ध है, ' अभि-निष्पद्यते ' ( अभिनिष्पन्न होता है ) यह उत्पत्तिका पर्यायवाची शब्द है । यदि स्वरूपमात्र से अभि निष्पत्ति हो तो पूर्व अवस्थाओं में भी स्वरूपके अविनाश होनेसे ज्ञात होना चाहिए । इसलिए किसी एक विशेषरूप से अभिनिष्पन्न होता है सिद्धान्ती —- ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - केवल आत्म-रूपसे ही आविर्भूत होता है, अन्य धर्मसे नहीं । किससे? इससे कि ' स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते ' ( अपने रूप से अभिनिष्पन्न होता है ) इसमें ' स्व ' शब्द है । अन्यथा विशेषणीभूत ' स्वेन ' स्वशब्द अनुपपन्न होगा । परन्तु आत्मीय अभिप्रायवाला ' स्व ' शब्द होगा? नहीं, क्योंकि यह स्वकीय कहने योग्य सत्यानन्दी -दीपिका प्रतीकों में भेद होने से उपासना में भेद उसके फलमें भेद स्वाभाविक है, अतः प्रतीकोपासक ब्रह्मलोक में नहीं जाते | परन्तु ब्रह्म तो सर्वत्र समान है, अतः उसकी उपासनाका फल भी समान है । इसलिए ब्रह्मोपासक ही ब्रह्मलोक में जाते हैं ॥ १६ ॥
स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत ' सत्यानन्दी - दीपिका ' के चतुर्थाध्यायका तृतीयपाद समाप्त ॥ ३ ॥
* गत पादमें सगुण ब्रह्मोपासकोंके लिए कार्यं ब्रह्मकी प्राप्ति कही गई । अब उनके लिए ब्रह्मलोक सम्बन्धी ऐश्वयं विशेषका विचार इस पादके उत्तरार्द्धसे किया जायगा । उससे पूर्व अभीष्ट परविद्यासे प्राप्य निर्विशेष ब्रह्मभावको कहते हैं - ' स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते ' इस निर्गुणविद्याके फलबोधक वाक्यमें स्वशब्दके सम्बन्धी आगन्तुकरूपवाची और स्वात्मरूपवाची होनेसे संशय होता है अर्थात् स्वशब्द आत्मीय और आत्माके लिए प्रयुक्त होता देखा जाता है, अतः किसका ग्रहण करना चाहिए? पूर्वपक्षी -
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८६८ ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० ४ पत्तेः स्वेनेति विशेषणमनर्थकं स्यात् । आत्मवचनतायां त्वर्थवत्केवलेनैवात्मरूपेणाभि-निष्पद्यते, नागन्तुकेनापररूपेणापीति ॥ १ ॥
कः पुनर्विशेष पूर्वास्ववस्थास्थिह व स्वरूपानपायसाम्ये सतीत्यत आह-मुक्तः प्रतिज्ञानात् ॥ २ ॥
पदच्छेद - मुक्तः, प्रतिज्ञानात् । सूत्रार्थ - ( मुक्त:) मुक्त पुरुष पूर्ण आनन्दरूपसे अवस्थित होता है, ( प्रतिज्ञानात् ) क्योंकि ' एतं त्वेव ते ' इत्यादि श्रुतिमें सम्पूर्ण अनर्थसे मुक्त आनन्दस्वरूप आत्माकी व्याख्येयरूपसे प्रतिज्ञा की गई है । योऽत्राभिनिष्पद्यत इत्युक्तः, स सर्वबन्धविनिर्मुक्तः शुद्धेनैवात्मनाऽवतिष्ठते । पूर्वत्र स्वन्धो भवत्यपि रोदितीव विनाशमेवापीतो भवतीति चावस्थात्रयकलुषितेनात्मनेत्ययं विशेषः । कथं पुनरवगम्यते मुक्तोऽयमिदानीं भवतीति? प्रतिज्ञानादित्याह । तथा हि - ' एतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि ' ( छा ० ८/५/३, ८1१०/४, ८1११1३ ) इत्यवस्थात्रय-दोषविहीनमात्मानं व्याख्येयत्वेन प्रतिज्ञाय, ' अशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः ' ( छा ० ८/१२/१ ) इति चोपन्यस्य, ' स्पेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमः पुरुषः ' ( छा ० ८।१२।३ ) नहीं है । जिस किसी रूपसे अभिनिष्पन्न होता है । उसीमें आत्मीयत्वकी उपपत्ति होने से ' स्वेन ' यह विशेषण अनर्थक होगा और आत्मवाची होनेपर तो सार्थक है, इसलिए केवल बात्मरूपसे ही आविर्भूत होता है किसी अन्य आगन्तुकरूपसे नहीं ॥ १ ॥
परन्तु स्वरूपका अविनाश समान होनेपर पूर्व अवस्थाओं और इस अवस्था में क्या विशेष है? इसपर कहते हैं -यहाँ ' अभिनिष्पद्यते ' शब्दसे जो कहा गया है, वह सम्पूर्ण बन्धसे विनिर्मुक्त होकर शुद्ध आत्म-रूपसे ही अवस्थित होता है । पूर्व अवस्थाओं में ' अन्धो भवति ' ( जाग्रदवस्था में वह अन्धा होता है ) ' अपि रोदितीव ० ' ( स्वप्नावस्था में आहत होनेसे अथवा प्रिय वस्तु के विनाशसे मानो रोता है ) ' विनाश-मेवापीतो भवति ० ' ( सुषुप्ति में विशेष ज्ञानके न होनेसे मानो विनाशको प्राप्त होता है ) इस प्रकार तीनों अवस्थाओं में कलुषित मात्मरूपसे अवस्थित होता है यह [ ज्ञानसे पूर्व तीन अवस्थाओं ओर इस अवस्थामें ] विशेष है । परन्तु अब यह मुक्त होता है ऐसा कैसे अवगत हो? प्रतिज्ञासे, ऐसा कहते हैं । क्योंकि ' एतं त्वेव ते ० ' ( मैं तुम्हारे प्रति इस आत्माका पुनः व्याख्यान करूँगा ) इस प्रकार तीनों अवस्थाओं के दोष से रहित आत्माकी व्याख्येयरूपसे प्रतिज्ञा कर ' अशरीरं वाव सन्तं ० ' ( उस शरीर-भूत आत्माको प्रिय और अप्रिय स्पर्श नहीं करते ) इस प्रकार उपक्रमकर ' स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते ० ' सत्यानन्दी - दीपिका ' मोक्षः, आगन्तुकः, फलत्वात् स्वर्गवत् ' ( मोक्ष आगन्तुक है, क्योंकि फल है जैसे स्वर्ग ) यदि स्वशब्दसे वात्मस्वरूपमात्रकी अमिनिष्पत्ति हो तो पूर्व अवस्थामोंमें अविनष्ट होनेसे उसका सवंदा ज्ञान होना चाहिए, इससे ज्ञान आदि साधन व्यर्थं होंगे, अतः मोक्ष एक आगन्तुक फलविशेष है । पूर्वपक्ष में मोक्ष स्वर्गके समान है, सिद्धांन्त में मोक्ष स्वगंसे विशेष है । सिद्धान्ती - आत्मसाक्षात्काररूप मोक्ष स्वर्ग आदि साध्यफलके समान उत्पन्न नहीं होता, किन्तु विद्यासे केवल अविद्याकी निवृत्तिमात्र है, आत्मा तो स्वयं नित्य सिद्ध है । जैसे प्रकाश अन्धकारकी निवृत्तिद्वारा वस्तुकी अभिव्यक्तिमें हेतु है । कि ' अभिनिष्पद्यते ' शब्दका अर्थ केवल उत्पत्ति नहीं है आविर्भाव भी है । जैसे सेवालसे आवृत्त जल उसके हटाए जानेपर स्पष्टरूपसे प्रतीत होता है, वैसे अविद्यासे आवृत्त आत्मस्वरूप विद्यासे अविद्या -की निवृत्ति होनेपर स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त अनुभूत होता है ॥ १ ॥
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अधि ० १ सू ० ३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८६ ९ इति चोपसंहरति । तथा ss ख्यायिकोपक्रमेऽपि ' य आत्माऽपहतपाप्मा ' ( छा ० ८।७।१ ) इत्यादि मुक्तात्मविषयमेव प्रतिज्ञानम् । फलत्वप्रसिद्धिरपि मोक्षस्य बन्धनिवृत्तिमात्रापेक्षा नापूर्वोपजननापेक्षा । यदप्यभिनिष्पद्यत इत्युत्पत्तिपर्यायत्वं तदपि पूर्वावस्थापेक्षम् -यथा रोगनिवृत्तावरोगोऽभिनिष्पद्यत इति तद्वत् । तस्माददोषः ॥ २ ॥
आत्मा प्रकरणात् ॥ ३ ॥
पदच्छेद - आत्मा, प्रकरणात् । सूत्रार्थ - ( आत्मा ) यहाँ आत्माका हो ज्योतिः शब्दसे प्रतिपादन है, ( प्रकरणात् ) क्योंकि ' य आत्मा ' इस प्रकार उसका प्रकरण है । * कथं पुनर्मुक्त इत्युच्यते? यावता ' परं ज्योतिरुपसंपद्य ' ( छा ० ८।१२।३ ) इति कार्यगोचरमेवैनं श्रावयति, ज्योति शब्दस्य भौतिके ज्योतिषि रूढत्वात् । न चानतिवृत्तो विकारविषयात्कश्चिन्मुक्तो भवितुमर्हति विकारस्यार्तत्वप्रसिद्धेरिति । नैष दोषः, यत आत्मैवात्र ज्योतिःशब्देनावेद्यते, प्रकरणात्, ' य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युः ' ( छा ० ८/७/१ ) इति हि. ते परस्मिन्नात्मनि नाकस्माद्भौतिकं ज्योतिः शक्यं ग्रहीतुम्, प्रकृत-हानाप्रकृतप्रक्रियाप्रसङ्गात् । ज्योति शब्दस्त्वात्मन्यपि दृश्यते - ' तदेवा ज्योतिषां ज्योतिः ’ ( बृह ० ४ । ४ । १६ ) इति । प्रपञ्चितं चैतत् ' ज्योतिर्दर्शनात् ' ( ब्रह्मसूत्र १।३।४० ) इत्यत्र ॥ ३ ॥
( अपनेरूप से अभिनिष्पन्न होता है वह उत्तम पुरुष है ) ऐसा उपसंहार करते हैं । इसीप्रकार आख्या-यिकाके उपक्रममें भी ' य आत्माऽपहतपाप्मा ' ( यह आत्मा पाप रहित है ) इत्यादि मुक्त आत्म-विषयक ही प्रतिज्ञान है । और मोक्षमें फलत्व सिद्धि मी बन्ध निवृत्तिमात्रकी अपेक्षासे है, अपूर्व उत्पत्ति की अपेक्षासे नहीं है । यद्यपि ' अभिनिष्पद्यते ' यह उत्पत्तिका पर्याय है, तो भी वह पूर्वावस्थाकी अपेक्षासे है । जैसे रोगकी निवृत्ति होनेपर अरोग अभिनिष्पन्न होता है, उसके समान यहाँ भी समझना चाहिए, इससे दोष नहीं है ॥ २ ॥
परन्तु ' परं ज्योतिरुपसंपद्य ' ० ( पर ज्योतिको प्राप्तकर स्वात्मरूपसे व्यवस्थित होता है ) यह श्रुति इसे कार्य विषयक श्रवण कराती है, तो मुक्त है, पुनः ऐसा क्यों कहा जाता है? क्योंकि ज्योतिः शब्द मौतिक ज्योतिमें रूढ है । कार्यविषयका अनतिक्रमणकर कोई मुक्त नहीं हो सकता । कारण कि विकार दुःखरूप प्रसिद्ध है । यह दोष नहीं है, क्योंकि यहाँ आत्मा हो ज्योतिः शब्दसे कहा जाता है, क्योंकि उसका प्रकरण है, ' य आत्मा ० ' ( यह आत्मा पाप रहित, जरा रहित और मृत्यु रहित है ) इस प्रकृत परमात्मामें अकस्मात् भौतिक ज्योतिका ग्रहण नहीं किया जा सकता, कारण कि ऐसा होने में प्रकृतहानि और अप्रकृतप्रक्रियाका प्रसङ्ग होगा । ज्योतिः शब्द तो ' तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिः ( उसको देवता लोग ज्योतिके मी ज्योतिरूपसे उपासना करते हैं ) इस प्रकार आत्मामें भी देखा जाता है । इसका ' ज्योतिर्दर्शनात् ' इस सूत्र में विस्तृत विचार किया गया है ॥ ३ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका * ' परं ज्योतिरुपसंपद्य ' इस श्रुतिपर विचार करनेसे ऐसा प्रतीत होता है कि स्वरूप अभि-निष्पत्तिसे अतिरिक्त ज्योतिको प्राप्त होता है । क्योंकि ' सूर्यो ज्योतिः ' ' अग्निज्योतिः ' इत्यादि मोतिक पदार्थोंमें ज्योतिःशब्द रूढ है सिद्धान्ती - यद्यपि ज्योति शब्द सूर्य आदि भौतिक ज्योतिमें रूढ है तथापि आत्माका प्रकरण है, ' य आत्माऽपहतपाप्मा ' और ' परं ज्योति ' इस प्रकार प्रकरण और वाक्यसे आत्मा में भी ज्योतिः शब्द प्रयुक्त होता है । यहाँपर ज्योतिः पद तो मुख्यरूप से ब्रह्ममें प्रयुक्त होता है केवल ज्योतिमें नहीं । यदि ज्योतिः शब्दसे सूर्य आदि भौतिक ज्योतिका ग्रहण करें, तो प्रकृत
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८७० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० ४ ( २ अविभागेन दृष्टत्वाधिकरणम् सू ० ४ ) अविभागेन दृष्टत्वात् ॥ ४ ॥
पदच्छेद -- अविभागेन, दृष्टत्वात् । सूत्रार्थ - ( अविभागेन ) मुक्त पुरुष परब्रह्मसे अविभक्त होकर अवस्थित होता है, ( दृष्टत्वात् ) क्योंकि ' ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति ' इत्यादि श्रुतियोंमें अभेद ही देखा जाता है । * परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते यः, स किं परस्मादात्मनः पृथ-गेव भवत्युताविभागेनैवावतिष्ठत इति वीक्षायाम् ' स तत्र पर्येति ' ( छा ०८।१२।३ ) इत्यधिकर-कर्तव्यनिर्देशात् ' ज्योतिरुपसंपद्य ' ( छा ० ८।१२।३ ) इति च कर्तृकर्मनिर्देशाद्भेदेनैवाव-स्थानमिति यस्य मतिस्तं व्युत्पादयत्यविभक्त एव परेणात्मना मुक्तोऽवतिष्ठते । कुतः? दृष्टत्वात् । तथा हि ' तत्त्वमसि ' ( छा ० ६।८।७ ) ' अहं ब्रह्मास्मि ' ( बृह ० १।४।१० ), ' यत्र नान्यत्पश्यति ' ( छा ० ७ | २४ | १ ) ' न तु तद्द्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यत्पश्येत् ' ( बृह ० ४ | ३ | ३३ ) इत्येवमादीनि वाक्यान्यविभागेनैव परमात्मानं दर्शयन्ति । यथादर्शनमेव च फलं युक्तम्, तत्क्रतुन्यायात् । ' यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति । एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ( ० ४ १५ ) इति चैवमादीनि मुक्तस्वरूपनिरूपणपराणि वाक्यान्यविभागमेव दर्शयन्ति । नदीसमुद्रादिनिदर्शनानि च । भेदनिर्देशस्त्वभेदेऽप्युपचर्यते । ' स भगवः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति स्त्रे महिम्नि ' ( छा ० ७ | २४ | १ ) इति ' आत्मरतिरात्मक्रीडः ' ( छा ० ७।२५।२ ) इति चैवमादिदर्शनात् ॥ ४ ॥
जो पर ज्योतिको प्राप्तकर आत्मरूप से अभिनिष्पन्न होता है । क्या वह परमात्मासे पृथक् ही होता है अथवा अविभागसे - अभेदसे हो अवस्थित होता है? इसप्रकार विचार होनेपर ' स तत्र पर्येति ' ( वह अपने आत्मामें स्थित हुबा सब ओर संचार करता है ) इसमें अधिकरण और अधिकर्तव्य - आधा-राधेयभावका निर्देश होने से और ' ज्योतिरुपसंपद्य ' ( ज्योतिको प्राप्तकर ) इसमें कर्ता और कर्मका निर्देश होने से मुक्त पुरुष परमात्मासे भिन्न होकर ही अवस्थित होता है, ऐसी जिसकी बुद्धि हो उसको कहते हैं— मुक्त पुरुष परमात्मासे अविभक्त ही व्यवस्थित होता है, किससे? इससे कि ऐसा देखा जाता है | जैसे कि ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' ' यत्र नान्यत्पश्यति ' ( जहाँ अन्य नहीं देखता ) ' न तु तद्वि-तीयमस्ति ' ( उस समय उससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं जिसे देखे ) इत्यादि वाक्य अविभागसे ही परमात्माको दिखलाते हैं । और दर्शनके अनुसार ही तत्क्रतुन्यायसे फल युक्त है । ' यथोदकं शुद्धे ०, ' ( जैसे शुद्ध जलमें डाला हुबा शुद्ध जल वैसा ही हो जाता है, वैसे ही हे गौतम! विज्ञानी मुनिका आत्मा भी हो जाता है ) इत्यादि मुक्ति स्वरूप निरूपण परक वाक्य और नदी, समुद्र आदि दृष्टान्त अविभाग ही दिखलाते हैं । भेद निर्देश तो ' स भगवः ० ' ( नारद - हे भगवन्! वह भूमा किसमें प्रति-ष्ठित है? सनत्कुमार — अपनी महिमामें ) और ' आत्मरतिरात्मक्रीड: ' ( इस प्रकार जाननेवाला आत्मरति और आत्मक्रीड है ) इत्यादि दर्शनसे अभेदमें भी उपचरित होता है ॥ ४ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका आत्माका परित्याग अप्रकृत भौतिक ज्योतिका ग्रहण प्रसक्त होगा । इसलिए ज्योति: स्वरूप आत्माका साक्षात्कारकर आत्मरूपसे अवस्थित होना ही मुक्त है ॥ ३ ॥
* यदि मुक्त पुरुष ब्रह्म से अविभक्त होकर ही अवस्थित है तो ' स तत्र पर्येति ' ' परं ज्योतिरुप-संप ' इत्यादि श्रुतियों में भेदका निर्देश क्यों किया गया है? अभेदमें भी भेदोपचार होता है, जैसे ' पुरुषस्य चैतन्यम् ' ' राहोः शिर ' इत्यादि स्थलोंमें है । अतः औपचारिक भेदनिर्देश वास्तविक अभेदका बाधक नहीं होता । वस्तुतः जीव तो अज्ञानावस्था में भी ब्रह्मस्वरूप है, किन्तु उपाधिसे भिन्न
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अधि ० ३ सू ० ५-६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ( ३ ब्राह्माधिकरणम् । सू ० ५-७ ) ब्राह्मण जैमिनिरुपन्यासादिभ्यः ॥ ५ ॥
पदच्छेद - ब्राह्मण, जैमिनिः, उपन्यासादिभ्यः । सूत्रार्थ - ( ब्राह्मण ) मुक्त पुरुष ब्राह्मधर्मं - सर्वज्ञत्व, सर्वेश्वरत्व स्वरूपसे ( जैमिनिः ) ऐसा आचार्य जैमिनिका मत है, ( उपन्यासादिभ्यः ) क्योंकि उपन्यास ही अवगत होता है । ८७१ व्यवस्थित होता है । आदि हेतुओंसे ऐसा * स्थितमेतत् - ' स्वेन रूपेण ' ( छा ० ८ | ३ | ४ ) इत्यत्रात्ममात्र रूपेणाभिनिष्पद्यते, नागन्तुकेनापररूपेणेति । अधुना तु तद्विशेषबुभुत्सायामभिधीयते - स्वमस्य रूपं ब्राह्मम पहतपाप्मत्वादिसत्यसंकल्पत्वावसानं तथा सर्वशत्वं सर्वेश्वरत्वं च तेन स्वरूपेणाभिनिष्प-द्यत इति जैमिनिराचार्यो मन्यतेः । कुतः? उपन्यासादिभ्यस्तथात्वावगमात् । तथा हि - ' य आत्माऽपहतपाप्मा ' ( छा ० ८/७/१ ) इत्यादिना ' सत्यकामः सत्यसंकल्प: ' ( छा ० ८ | ७ | १ ) इत्येव-मन्तेनोपन्यासेनैवमात्मकतामात्मनो बोधयति । तथा ' स तत्र पर्येति जक्षन्क्रीडन्रममाणः ' ( छा ० ८।१२।३ ) इत्यैश्वर्यरूपमावेदयति । ' तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ' ( छा ०७।२५।२ ) इति च । ' ‘ सर्वज्ञः सर्वेश्वरः ' इत्यादिव्यपदेशाश्चैवमुपपन्ना भविष्यन्तीति ॥ ५ ॥
चिवितन्मात्रेण तदात्मकत्वादित्यौडुलोमिः ॥ ६ ॥
पदच्छेद - चितितन्मात्रेण, तदात्मकत्वात्, इति, जोडुलोमि ॥ सूत्रार्थ - ( तदात्मकत्वात् ) जीवके चैतन्यरूप होनेसे ( चितितन्मात्रेण ) मुक्तपुरुष केवल चैतन्यरूपसे अवस्थित होता है, ( इति बोडुलोमिः ) ऐसा मोडुलोमि आचार्य मानते हैं । ' स्वेन रूपेण ' ( आत्मरूपसे अभिनिष्पन्न होता है ) इस श्रुतिमें केवल आत्मरूप से अभिनिष्पन्न होता है किसी अन्य आगन्तुकरूपसे नहीं, ऐसा सिद्ध हुआ । अब तो उसके विशेष जाननेकी इच्छा होनेपर कहते हैं कि इसका अपना ब्राह्मरूप अपहृतपाप्मत्व आदिसे लेकर सत्य सर्वज्ञत्व, सर्वेश्वरत्व है, उस स्वरूपसे अभिनिष्पन्न होता है, ऐसा जैमिनि आचार्य इससे कि उपन्यास यादि हेतुमसे वैसा ही अवगत होता है । क्योंकि ' य इत्यादिसे लेकर और ' सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः ' इत्यन्त उपन्याससे आत्माके ऐसे कराता है । इसी प्रकार ' स तत्र पर्येति ० ' ( वह संप्रसाद - जीव अपने आत्मरूपमें अवस्थामें कहीं भक्षण करता, हँसता, रमण करता हुआ विचरण करता है ) इस आवेदन ( सूचना ) करता है । ' तस्य सर्वेषु ० ' ( सब लोकों में उसकी यथेच्छ श्रुति भी है । ' सर्वज्ञः सर्वेश्वरः ' इत्यादि व्यपदेश भी इस प्रकार माननेपर उपपन्न सत्यानन्दी - दीपिका प्रतीत होता है । इससे यह सिद्ध हुआ कि मुक्त पुरुष ब्रह्म अत्यन्त अविभक्त ही * क्या वह मुक्त पुरुष सर्वज्ञत्व आदि धर्मं युक्त होकर अवस्थित होता संकल्पत्व पर्यन्त तथा मानते हैं । किससे? आत्माऽपहतपाप्मा ' ही स्वरूपत्वका बोध स्थित होता है, उस प्रकार ऐश्वयंरूपका गति होती है ) ऐसी होंगे ॥ ५ ॥
रहता है ॥ ४ ॥
है अथवा धर्म यादि रहित निर्विशेष चिन्मात्ररूपसे अवस्थित होता है, अथवा वस्तुतः चिन्मात्र होनेपर भी अन्य जीवके व्यवहारकी दृष्टिसे कल्पित सर्वज्ञत्व आदि धर्म हैं? इस प्रकार संशय होनेपर ' अधुना ' आदिसे कहते हैं । वह मुक्त पुरुष सर्वज्ञत्व व्यादि युक्त सविशेष ब्रह्मरूपसे अवस्थित होता है । इसमें उपन्यास आदि हेतु विद्यमान हैं । ' सोऽन्वेष्टव्यः ' ( उसका अन्वेषण करना चाहिए ) इत्यादि विधिके लिए ' य आत्माऽपहतपाप्मा ' यह उपन्यास है । आदि पदसे विधि और व्यपदेशका ग्रहण है । अज्ञात ज्ञापक वाक्यको विधि कहते हैं । ' स तत्र पर्येति ' यह विधि है, और ' सर्वज्ञः सर्वेश्वरः ' यह व्यपदेश है || ५ ||
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८७२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ ० ४ पा ० ४ * यद्यप्यपहतपाप्मत्वादयो भेदेनैव धर्मा निर्दिश्यन्ते, तथापि शब्दविकल्पजा एवैते । पाप्मादिनिवृत्तिमात्रं हि तत्र गम्यते । चैतन्यमेव त्वस्यात्मनः स्वरूपमिति तन्मात्रेण स्वरू-पेणाभिनिष्पत्तिर्युक्ता । तथा च श्रुतिः - ' एवं वा भरेऽयमात्मानन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव ' ( बृह ० ४।५।१३ ) इत्येवंजातोय काऽनुगृहीता भविष्यति । सत्यकामत्वादयस्तु यद्यपि वस्तुस्वरूपेणैव धर्मा उच्यन्ते सत्याः कामा अस्येति, तथाप्युपाधिसंबन्धाधीनत्वात्तेषां न चैतन्यवत्स्वरूपत्वसंभवः, अनेकाकारत्वप्रतिषेधात् । प्रतिषिद्धं हि ब्रह्मणोऽनेकाकार-त्वम् -'न स्थानतोऽपि परस्योभयलिङ्गम् ( ब्रह्मपूत्र ३।२।११ ) इत्यत्र । अतएव च जक्षणादिसं-कोर्तनमपि दुःखाभावमात्राभिप्रायं स्तुत्यर्थमात्मरतिरित्यादिवत् । नहि मुख्यान्येव रति-क्रीडामिथुनान्यात्मनि शक्यन्ते वर्णयितुं द्वितीयविषयत्वात्तेषाम् तस्मान्निरस्ताशेषप्रप-चेन प्रसन्नेनाव्यपदेश्येन. बोधात्मनाऽभिनिष्पद्यत इत्यौडुलोमिराचार्यो मन्यते ॥ ६ ॥
एवमप्युपन्यासात्पूर्वभावादविरोधं बादरायणः ॥ ७ ॥
पदच्छेद - एवम् अपि, उपन्यासात् पूर्वभावात्, अविरोधम्, बादरायणः । सूत्रार्थ - ( एवमपि ) ऐसा होनेपर भी ( उपन्यासात् ) पूर्वोक्त उपन्यास आदि हेतुओंसे ( पूर्वभावात् ) प्रथम ब्रह्मके सर्वज्ञत्व यादि व्यावहारिक होनेसे मुक्त आत्मा में ( अविरोध: ) विरोध नहीं है, ( बादरायणः ) ऐसा बादरायण आचार्यका मत है । एवमपि पारमार्थिक चैतन्यमात्र स्वरूपाभ्युपगमेऽपि व्यवहारापेक्षया पूर्वस्याप्युपन्या-सादिभ्योऽवगतस्य ब्राह्मस्यैश्वर्यरूपस्याप्रत्याख्यानादविरोधं बादरायण आचार्यो मन्यते । यद्यपि अपहतपाप्मत्व आदि धर्मं भेदसे ही निर्दिष्ट हैं, तो भी वे धर्मं शब्दविकल्पसे ही उत्पन्न होते हैं, क्योंकि उनमें केवल पाप आदिको निवृत्ति ज्ञात होती है । परन्तु चैतन्य ही इस आत्माका स्वरूप है, इसलिए केवल उसी स्वरूपसे अभिनिष्पत्ति युक्त है । इस प्रकार एवं वा अरे ० ' ( याज्ञवल्क्य - हे मैत्रेयी! उसी प्रकार यह आत्मा अन्तर - बाह्य भेदसे शून्य सम्पूर्ण प्रज्ञानघन ही है ) इस प्रकारकी श्रुति अनुगृहीत होगी । परन्तु सत्यकाम है इसका वह सत्यकाम है, इस व्युत्पत्ति से यद्यपि सत्यकामत्व यादि धर्मं वस्तुस्वरूपसे ही कहे जाते हैं, तो भी उपाधि सम्बन्धके अधीन होनेसे उनमें चैतन्यके समान स्वरूपत्व संभव नहीं है, क्योंकि आत्मामें अनेकाकारत्वका प्रतिषेध है । ' न स्थानतोऽपि परस्यो -मय लिङ्गम् ' इस सूत्र में ब्रह्ममें अनेकाकरत्वका प्रतिषेध किया गया है । अतएव मक्षण आदि संकीर्तन मी दुःख अभावमात्र के अभिप्रायसे है और वह आत्मरति आदिके समान स्तुत्यर्थक है । क्योंकि रति, क्रीडा, मिथुन आत्मामें मुख्यरूपसे वर्णन नहीं किए जा सकते, कारण कि वे द्वितीय - अन्य विषयक है । इसलिए समस्त प्रपञ्चसे रहित प्रसन्न मव्यपदेश्य बोधरूपसे अभिनिष्पन्न होता है, ऐसा ओडुलोमि आचार्य मानते हैं ॥ ६ ॥
ऐसा होनेपर मी - पारमार्थिक चैतन्यमात्रस्वरूप स्वीकार करनेपर भी व्यवहारको अपेक्षासे उपन्यास आदिसे पूर्व अवगत ब्राह्म ब्रह्म के ऐश्वयंरूपका प्रत्याख्यान न होनेके कारण अविरोध बादरायण आचार्य मानते हैं ॥ ७ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका * मुक्तपुरुष ईश्वरके सत्यकामत्व आदि धर्मविशिष्ट होकर अवस्थित होता है, इस प्रकार भेदाभेद अयुक्त है, इस बातको कहने के लिए ' चितितन्मात्रेण ' इत्यादिसे अन्य पूर्वपक्ष कहते हैं ॥ ६ ॥
* जैमिनि आचार्यने ब्रह्मके सत्यकामत्व आदि धर्मोको पारमार्थिक सत्य कहा है और खोडुलोमि आचार्यने इन धर्मोको औपाधिक कहकर अत्यन्त असत् कहा है, अतः ये दोनों पक्ष
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अधि ० ४ सू ० ८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८७३ ( ४ संकल्पाधिकरणम् । सू ० ८ - ९ ) संकल्पादेव तु तच्छ्रुतेः ॥ ८ ॥
पदच्छेद - संकल्पात् एव तु तच्छ्रुतेः । सूत्रार्थ - ( संकल्पादेव ) इस विद्वान् के केवल संकल्पसे ही पितर आदि उपस्थित होते हैं, ( तच्छ्रुतेः ) क्योंकि ' संकल्पा देवास्य ' ऐसी श्रुति है । हार्दविद्यायां श्रूयते - ' स यदि पितृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति ' ( छा ० ८।२।१ ) इत्यादि । तत्र संशयः - किं संकल्प एव केवलः पित्रादिसमुत्थाने हेतुरुत निमित्तान्तरसहित इति । तत्र सत्यपि संकल्पादेवेति श्रवणे लोकवन्निमित्तान्तरापेक्षता युक्ता । यथा लोकेऽस्मदादीनां संकल्पाद्गमनादिभ्यश्च हेतुभ्यः पित्रादिसंपत्तिर्भवत्येवं मुक्तस्यापि स्यात् । एवं दृष्टविपरीतं न कल्पितं भविष्यति । संकल्पादेवेति तु राज्ञ इव संकल्पितार्थसिद्धिकरी साधनान्तरसामग्री सुलभामपेक्ष्योच्यते । नच संकल्पमात्रस-मुत्थानाः पित्रादयो मनोरथाविजृम्भितवच्चञ्चलत्वात्पुष्कलं भोग समर्पयितुं पर्याप्ताः स्यु-रिति । एवं प्राप्ते ब्रूमः - संकल्पादेव तु केवलात्पित्रादिसमुत्थानमिति । कुतः? तच्छ्रुतेः । ‘ संकल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति ' ( छा ० ८ | २ | ) इत्यादिका हि श्रुतिर्निमित्तान्तरापेक्षायां पीड्येत । निमित्तान्तरमपि तु यदि संकल्पानुविधाय्येव स्याद्भवतु नतु प्रयत्नान्तरसंपाद्यं हाविद्या में ' स यदि पितृलोककामो ० ' ( वह यदि पितृलोककी कामनावाला होता है तो उसके संकल्पसे ही पितृगण वहाँ समुपस्थित होते हैं ) इत्यादि श्रुति है । उसमें संशय होता है कि क्या केवल संकल्प ही पितृ आदिके समुत्थानमें हेतु है अथवा अन्य निमित्तके साथ संकल्प हेतु है? पूर्वपक्षी - उस श्रुतिमें ' संकल्पसे ही ' इसप्रकार श्रवण होनेपर भी लोकके समान अन्य निमित्तकी अपेक्षा युक्त है । जैसे लोकमें अस्मद् आदिके संकल्पसे बोर गमन आदि हेतुओंसे पितृ आदिकी प्राप्ति होती है, वैसे मुक्तके लिए भी होनी चाहिए, ऐसा होनेसे दृष्टसे विपरीत कल्पित नहीं होगा । ' संकल्पसे ही ' यह तो राजाके समान संकल्पित अर्थकी सिद्धि करनेवाली अन्य साधन सामग्री की सुलभताकी अपेक्षासे कहा जाता है । और संकल्पमात्रसे समुत्थान होनेवाले पितर आदि मनोरथसे कल्पितके समान चन्चल होने से पुष्कलभोग समर्पण करनेमें समर्थ नहीं होंगे । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होने पर हम कहते हैं— केवल संकल्पसे ही पितृ आदिका समुत्थान होता है, किससे? इससे कि उसकी श्रुति है । ' संकल्पादेवास्य ० ' ( उस विद्वान् के संकल्पसे ही पितृगण समुपस्थित होते हैं ) इत्यादि श्रुति अन्य निमित्तकी अपेक्षा होनेपर बाधित हो जायगी । अन्य निमित्त भी यदि संकल्पके अनुविधायो ( अनुगामी ) हो तो भले हो, परन्तु अन्य प्रयत्न साध्य अन्य निमित्त हमें इष्ट नहीं है, क्योंकि अन्य निमित्तकी प्राप्ति के पूर्व संकल्पसे वन्ध्यत्व प्रसंग होगा । और श्रुति अवगम्य अर्थमें ' लोकके समान ' सत्यानन्दी - दीपिका अयुक्त हैं, क्योंकि ऐसा माननेपर अद्वैत श्रुति, सर्वज्ञत्व श्रुति और व्यवहारका बाध होता है । यद्यपि परमार्थ में चैतन्यमात्र स्वरूप है, तो भी व्यवहारदृष्टि से सत्यकामत्व, ऐश्वयं आदि सत्य मानने चाहिए, क्योंकि उपन्यास आदि हेतुओंसे सिद्ध होता है । इसलिए परमार्थदृष्टि से और व्यवहारदृष्टिसे दोनों पक्ष युक्त हैं अर्थात् परमार्थदृष्टिसे केवल चैतन्यमात्र स्वरूप है उससे भिन्न सब कल्पित - मिथ्या असत् है, यह मडुलोमि आचार्यका मत युक्त है और व्यवहारदृष्टिसे ब्रह्म के सत्यकामत्व आदि धर्म सत्य हैं, इस प्रकार जैमिनि आचार्यका मत मी युक्त है । इस प्रकार परमार्थदृष्टिसे और व्यवहारदृष्टिस्चे दोनोंमें कोई विरोध नहीं है ॥ ७ ॥
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III ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० ४ निमित्तान्तरमितीष्यते । प्राक्संपत्तेर्वन्ध्य संकल्पत्वप्रसङ्गात् । नच श्रत्यवगम्येऽर्थे लोकवदिति सामान्यतो दृष्टुं क्रमते । संकल्पबलादेव चैषां यावत्प्रयोजनं स्थैर्योपपत्तिः ।
प्राकृतसंकल्पविलक्षणत्वान्मुक्तसंकल्पस्य ।
अत एव चानन्याधिपतिः ॥ ९ ॥
पदच्छेद - अतः, एव, च, अनन्याधिपतिः । सूत्रार्थ - ( अत एव च ) और अवन्ध्य संकल्पसे ही विद्वान् ( अनन्याधिपतिः ) अनन्याधिपति होता है । अत एव चावन्ध्यसंकल्पत्वादनन्याधिपतिर्विद्वान्भवति – नास्यान्योऽधिपतिर्भ-वतीत्यर्थः । नहि प्राकृतोऽपि संकल्पयन्नन्यस्वामिकत्वमात्मनः सत्यां गतौ संकल्पयति । श्रुतिश्चैतद्दर्शयति ' अथ य इहात्मानमनुविद्य ब्रजन्त्येतांश्च सत्यान्कामांस्वेषां सर्वेषु लोकेषु काम-चारो भवति ' ( छा ० ८ | १ | ६ ) इति ॥९ ॥
( ५ अभावाधिकरणम् । सू ० १०-१४ ) अभावं बादरिराह ह्येवम् ॥ १० ॥
पदच्छेद - अभावम्, बादरि, आह, हि, एवम् । सूत्रार्थ - ( बादरिः ) बादरि आचार्य मानते हैं कि ( अभावम् ) विद्वान्के शरीरका वहाँ अभाव होता है, ( हि ) क्योंकि ( एवम् ) ' मनसैतान् ' ऐसा श्रुति कहती है । ' संकल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति ' ( छा ० ८।२।१ ) इत्यादिश्रुतेर्मनस्तावत्संकल्प साधनं सिद्धम् । शरीरेन्द्रियाणि पुनः प्राप्तैश्वर्यस्य विदुषः सन्तिः न वा सन्तीति समीक्ष्यते । तत्र बाद रिस्तावदाचार्यः शरीरस्येन्द्रियाणां चाभावं महीयमानस्य विदुषो मन्यते । कस्मात्? एवं ह्याहाम्नायः ' मनसैतान्कामान्पश्यन्रमते ' ( छा ० ८ | १२ | ५ ) ' य एते ब्रह्मलोके ( छा ० ८ | १३ | १ ) इति । यदि मनसा शरीरेन्द्रियैश्च विहरेन्मनसेति विशेषणं न स्यात् । तस्मादभावः शरीरेन्द्रियाणां मोक्षे ॥१० ॥
भावं जैमिनिर्विकल्पामननात् ॥ ११ ॥
यह सामान्यतोदृष्ट अनुमान प्रवृत्त नहीं होता । संकल्पबलसे ही इन विद्वानोंका यावत् प्रयोजन स्थिरताको उपपन्न होता है, कारणकि मुक्त पुरुषका संकल्प प्राकृत पुरुषोंके संकल्पसे विलक्षण है || ८ || और इसी से - अवन्ध्य संकल्पसे ही विद्वान् अनन्याधिपति होता है, इसका अन्य अधिपति-स्वामी नहीं होता, ऐसा अर्थ है । संकल्प करता हुआ प्राकृत पुरुष भी गति होनेपर अपने ऊपर अन्य स्वामी होनेका संकल्प नहीं करता । ' अथ य ० ' ( जो इस लोकमें आत्माको तथा सत्यकाम-नाओंको जानकर परलोकमें जाते हैं उनकी समस्त लोकों में यथेच्छ गति होती है ) यह श्रुति भी इसको दिखलाती है ॥ ९ ॥
‘ संकल्पदेवास्य ॰ ’ ( उसके संकल्पसे ही पितृगण समुपस्थित होते हैं ) इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है कि मन ही संकल्पका साधन है । प्राप्त ऐश्वयंवाले विद्वान्के शरीर और इन्द्रियाँ होती हैं. अथवा नहीं होती? इस विषयपर विचार किया जाता है । इस परिस्थिति में बादरि आचार्य तो ऐश्वयं आदि महिमाको प्राप्त हुए विद्वानके शरीर, इन्द्रियोंका अभाव मानते हैं । किससे? इससे कि ' मन-सैतान् ० ' ( यह आत्मा ब्रह्मलोक में मनसे ही भोगोंको देखता हुआ रमण करता है ) ' य एते ब्रह्मलोके ' ( ये जो ब्रह्मलोक में संकल्पलभ्य भोग हैं ) यह श्रुति ऐसा ही कहती है । यदि मन, शरीर और इन्द्रियोंसे विहार करेगा तो ' मनसा ' ( मनसे ) यह विशेषण नहीं होना चाहिए, इससे मोक्ष में शरीर और इन्द्रियोंका अभाव है ॥ १० ॥
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अधि ० ५ सू ० ११-१२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी -दीपिका सहित ८७५ पदच्छेद - भावम्, जैमिनिः, विकल्पामननात् । सूत्रार्थ- ( भावम् ) मनके समान शरीर और इन्द्रयोंका मोक्ष में भाव ( जैमिनिः ) जैभिनि आचार्य मानते हैं, ( विकल्पामननात् ) क्योंकि ' स एकंधा भवति ' इत्यादि श्रुति अनेकधाभावका विकल्प कहती है । जैमिनिस्त्वाचार्यो मनोवच्छरीरस्यापि सेन्द्रियस्य भावं मुक्तं प्रति मन्यते । यतः ' स एकधा भवति त्रिवा भवति ' ( छा ० ७।२६।२ ) इत्यादिनाऽनेकधाभावविकल्पमामनन्ति । न ह्यनेकविधता विना शरीरभेदेनाअसी स्यात् । यद्यपि निर्गुणायां भूमविद्यायामयमने-कधाभावविकल्पः पठ्यते, तथापि विद्यमानमेवेदं सगुणावस्थायामैश्वर्यं भूमविद्यास्तुतये संकीर्त्यत इत्यतः सगुणविद्याफलभावेनोपतिष्ठत इति ॥ ११ ॥
उच्यते-द्वादशाहवदुभयविधं बादरायणोऽतः ॥ १२ ॥
पदच्छेद - द्वादशाहवत्, उभयविधम्, बादरायणः, अतः । सूत्रार्थ - ( बादरायणः ) बादरायणका मत है कि ( अतः ) उभय लिङ्गक श्रुति देखने से ( उभयविधम् ) उभयविधत्व है । ( द्वादशाहवत् ) जैसे द्वादशाह उभयविध होता है । * बादरायणः पुनराचार्योऽत एवोभयलिङ्गश्रुतिदर्शनादुभयविधत्वं साधु मन्यते, यदा सशरीरतां संकल्पयति तदा सशरीरो भवति, यदा त्वशरीरतां तदाऽशरीर इति, सत्यसंकल्पत्वात्, संकल्पवैचित्र्याच्च । द्वादशाहवत् । यथा द्वादशहः सत्रमहीनश्च भवति । उभयलिङ्गश्रुतिदर्शनादेवमिदमपीति ॥ १२ ॥
जैमिनि वाचार्य तो मनके समान इन्द्रिय सहित शरीरका भी भाव मुक्त पुरुषके प्रति मानते हैं, क्योंकि ' स एकधा भवति ० ' ( वह एक प्रकारका होता है, तीन प्रकारका होता है ) इत्यादिसे श्रुति अनेक भावका विकल्प कहती है । शरीर भेदके विना अनेक विधता मुख्य संगत नहीं होगी । यद्यपि निर्गुण भूमविद्या में यह अनेकधा भाव विकल्प पढ़ा जाता है, तो भी सगुण अवस्थामें इस विद्यमान ऐश्वयंका भूमविद्याकी स्तुतिके लिए भूमविद्यामें संकीर्तन किया जाता है, इसलिए सगुण-विद्यकेि फलरूप से उपस्थित होता है ॥ ११ ॥
सिद्धान्ती - कहते हैं- -परन्तु बादरायण आचार्य इसीसे उम्य लिङ्गकी श्रुति देखनेसे उभयविधत्व उचित मानते हैं । जब उपासक सशरीरताका संकल्प करता है तब सशरीर होता है और जब अशरीरताका संकल्प करता है तब अशरीर होता है, क्योंकि वह सत्यसंकल्प है और संकल्प विचित्र है । द्वादशाहके समान । जैसे द्वादशाह सत्र और महीन होता है, कारण कि उभयलिङ्गक श्रुति देखने में आती है, अतः यह भी इसीप्रकार है ॥ १२ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका * सिद्धान्ती — उपासकका संकल्प सत्य और विलक्षण होता है, अतः संकल्प और असंकल्पके भेदसे सशरीरत्व और अशरीरत्व उपपन्न होते हैं । इसमें द्वादशाह नामक सत्रका उदाहरण देते हैं-' द्वाश हमृद्धिकामा उपेयुः ' ( समृद्धिकी कामनावाला द्वादशाह नामक सत्र करे ) ' य एवं विद्वांसः सनमुपयन्ति ' ( जो विद्वान् इसप्रकार सत्रको प्राप्त होते हैं ) ' त भासते ' इसप्रकार आसन और उप-यन विधि ज्ञापित बहुकर्तृक सत्र कहलाता है, और उस सत्रको ' द्वादशाहेन प्रजाकामं याजयेत् ' ( प्रजाकी कामनावाला द्वादशाह नामक याग करे ) यहाँ ' यज् ' धातुका विधिमें प्रयोग होनेसे नियत एक कर्ता प्रतीत होता है | अतः द्विरात्र के समान अहीनत्व प्राप्त है 1 । जैसे यहाँ उभय लिङ्गक श्रुतिसे दोनों
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८७६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० ४ तन्वभावे संध्यवदुपपत्तेः ॥ १३ ॥
पदच्छेद - तन्वभावे, सन्ध्यवद्, उपपत्तेः । सूत्रार्थ - ( तन्वभावे ) ब्रह्मलोक में इन्द्रिय युक्त शरीरका अभाव होनेपर भी ( सन्ध्यवद् ) वनके समान मानसिक विषय उपलब्धिमात्र होते हैं, ( उपपत्ते 1 * यदा तनोः सेन्द्रियस्य शरीरस्याभावस्तदा यथा वेद्यमानेष्वप्युपलब्धिमात्रा एव पित्रादिकामा भवन्त्येवं भावे जाग्रद्वत् ॥ १४ पदच्छेद - भावे, जाग्रद्वत् । सूत्रार्थ - ( मावे ) ब्रह्मलोक में इन्द्रिय सहित शरीरके पेतर आदि उपलब्ध होते हैं । * भावे पुनस्तनोर्यथा जागरिते विद्यमाना एव पपद्यते ॥ १४ ॥
) क्योंकि ऐसी उपपत्ति होती है संध्ये स्थाने शरीरेन्द्रियविषयेष्व मोक्षेऽपि स्युरेवं ह्येतदुपपद्यते ॥ ॥ सद्भावमें ( जाग्रद्वत् ) जाग्रत् के समान पित्रादिकामा भवन्त्येव मुक्तस्या-( ६ प्रदीपाधिकरणम् सू ० १५-१६ ) प्रदीप दावेशस्तथा हि दर्शयति ॥ १५ ॥
पदच्छेद – प्रदीपवत्, आवेश:, तथा, हि, दर्शयति । सूत्रार्थ - विद्वान् के द्वारा निर्मित अनेक शरीरोंमें विद्वान् ( प्रदीपवत् ) प्रदीपके समान आवेशः ) प्रविष्ट होता है, ( हि ) क्योंकि ( तथा ) उसी प्रकार ( दर्शयति ) ' स एकधा भवति ' इत्यादि त्रुतिदिखलाती है । * ' भावं जैमिनिर्विकल्पामननात् ' ( ब्रह्मसूत्र ४ | ४ | ११ ) इत्यत्र सशरीरत्वं मुक्तस्योक्तम् । त्रिविधाभावादिष्वनेकशरीरसर्गे किं निरात्मकानि शरीराणि दारुयन्त्राणीव सृज्यन्ते, किं जब तनुका - इन्द्रिय सहित शरीरका अभाव होता है, तब जैसे स्वप्नावस्था में शरीर, इन्द्रिय और विषय अविद्यमान होनेपर भी पितृ आदि पदार्थ उपलब्धिमात्र होते हैं, वैसे मोक्ष - ब्रह्मलोक में श्री उपलब्धिमात्र होंगे, इसप्रकार यह उपपन्न होता है ॥ १३ ॥
परन्तु शरीरके होनेपर जैसे जाग्रदवस्थामें विद्यमान ही पितर आदि पदार्थ होते हैं, वैसे मुक्त को भी उपपन्न होते हैं ॥ १४ ॥
' भावं जैमिनिर्विकल्पामननात् ' इस सूत्र में मुक्त पुरुषको सशरीर कहा गया है । वहाँ त्रिधा-आदिमें अनेक शरीरको सृष्टिमें दारुयन्त्र के समान क्या निरात्मक शरीर उत्पन्न किए जाते हैं सत्यानन्दी -दीपिका कार देखे जाते हैं, वैसे सगुण उपासकके लिए शरीर आदिके विषयमें समझना चाहिए ॥ १२ ॥
* शरीर, इन्द्रियके न होनेपर भी जैसे स्वप्नावस्थामें केवल मनसे पितर आदिका सूक्ष्म उप-रोग होता है, वैसे विद्वान्को ब्रह्मलोकमें मानसिक सूक्ष्म उपभोग प्राप्त होता है । ऐसा माननेपर मनसैतान्कामान्पश्यन्रमते ' यह श्रुति भी उपपन्न होती है । यदि सन्ध्ययब्दसे सुषुप्तिका ग्रहण करें. उक्त श्रुति बाधित होगी, क्योंकि सुषुप्ति में मनका अपने कारणमें लय होनेसे किसी प्रकारका मोग उपपन्न नहीं हो सकता । इसलिए सन्ध्य शब्दसे स्वप्नावस्थाका ग्रहण युक्त है ॥ १३ ॥
* यद्यपि ब्रह्मलोक में मुक्त पुरुषके लिए मनसे ही सूक्ष्म भोग उपलब्ध होते हैं, तो भी शरीर सद्भावमें मुक्त पुरुषको पुष्कल भोगकी सिद्ध होती है, अन्यथा नहीं ॥ १४ ॥
* परन्तु उभयलिङ्गः श्रुतिसे जो विद्वान्के अनेक शरीर माने गए हैं, वह व्यर्थ है, क्योंकि