श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 911–920

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 911–920

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अधि ० ६ सू ० १५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८७७ वा सात्मकान्यस्मदादिशरीरवदिति भवति वीक्षा । तत्र चात्ममनसोर्भेदानुपपत्तेरेकेन शरीरेण योगादितराणि शरीराणि निरात्मकानीति । एवं प्राप्ते प्रतिपाद्यते - प्रदोषवदा-वेश इति । यथा प्रदीप एकोऽनेकप्रदीपभावमापद्यते, विकारशक्तियोगात् । एवमेकोऽपि सन्विद्वानैश्वर्ययोगादनेकभावमापद्य सर्वाणि शरीराण्याविशति । कुतः? तथा हि दर्श-यति शास्त्रमेकस्यानेकभावम् -'स एकधा भवति त्रिधा भवति पञ्चधा सप्तधा नवधा ' ( छा ० ७ । २६।२ ) इत्यादि । नैतद्दारुयन्त्रोपमाभ्युपगमेऽवकल्पते, नापि जीवान्तरावेशे । न च निरात्मकानां शरीराणां प्रवृत्तिः संभवति । यत्त्वात्ममनसोर्भेदानुपपत्तेरनेकशरीरयोगा-संभव इति, नैष दोषः, एकमनोनुवर्तीनि समनस्कान्येवापराणि शरीराणि सत्यसंक-ल्पत्वात्स्त्रक्ष्यति । सृष्टेषु च तेषूपाधिभेदादात्मनोऽपि भेदेनाधिष्ठातृत्वं योक्ष्यते । एषैव च योगशास्त्रेषु योगिनामनेकशरीरयोगप्रक्रिया ॥ १५ ॥

कथं पुनर्मुक्तस्यानेकशरीरावेशादिलक्षणमैश्वर्यमभ्युपगम्यते? यावता ' तल्केन कं अथवा क्या स्मद् आदि शरीरके समान सात्मक उत्पन्न किए जाते हैं? इसप्रकार विचार होता है । पूर्वपक्षी - उसमें आत्मा और मनके भेदकी अनुपपत्तिसे एक शरीरके साथ योग - सम्बन्ध है, अतः अन्य शरीर निरात्मक हैं । सिद्धान्ती -- ऐसा प्राप्त होनेपर प्रतिपादन करते हैं - ' प्रदीपवदावेश: ' । जैसे एक प्रदीप विकारशक्तिके योगसे अनेक प्रदीपभावको प्राप्त होता है, वैसे विद्वान् एक होता हुआ भी ऐश्वयं योगसे भाव प्राप्तकर सब शरीरोंमें प्रवेश करता है, क्योंकि उसी प्रकार ' स एकधा भवति ० ' ( वह एक रूप होता है, तीन रूप होता है, पञ्चधा, सप्तधा औरं नवघा होता है ) इत्यादि शास्त्र एकका अनेकभाव दिखलाता है । यह दारुयन्त्र उपमाके स्वीकार करनेमें संभव नहीं है और न अन्य जीवके प्रवेशमें भी । और निरात्मक शरीरोंकी प्रवृत्ति भी नहीं हो सकती । और जो यह कहा गया है कि वात्मा और मनके भेदकी अनुपपत्ति होनेसे अनेक शरीरोंके साथ योग - सम्बन्ध असंभव है । यह दोष नहीं है, क्योंकि वह सत्यसङ्कल्पसे एक मनके अनुवर्ती मन सहित अन्य शरीरोंकी सृष्टि करेगा । उनकी सृष्टि होनेपर उपाधि भेदसे आत्माका भी भेद होनेसे अधिष्ठातृत्व युक्त होगा । योगियोंकी योगशास्त्रोंमें अनेक शरीरके साथ सम्बन्धकी यही प्रक्रिया है ॥ १५ ॥

परन्तु मुक्त अनेक शरोरोंमें आवेश आदि रूप ऐश्वर्यं कैसे स्वीकार किया जाता है, जब कि ' तत्केन ० ' ( मुक्तावस्था में ज्ञानी किस करणसे किस विषयको जाने ) ' न तु तद्वितीयमस्ति ' ( उस सत्यानन्दी - दीपिका उन जड़ शरीरोंमें भोगका असंभव है । इस प्रकार आक्षेप संगति पूर्वपक्षी कहते हैं— मुक्त पुरुष के सत्यसंकल्पसे निर्मित शरीर दारुयन्त्र के समान जड़ हैं, क्योंकि आत्मा और मन एक एक हैं, उनका विभाग नहीं हो सकता । उन शरीरोंमें प्रवेशके लिए अन्य आत्माकी मी उरुपति नहीं हो सकती, क्योंकि कर्म - कर्तृभावका विरोध है । अतः संकल्पित अन्य घरोर जड़ हैं । सिद्धान्ती L - ' स एकधा ति ' इत्यादि श्रुति के बलसे विद्वानका अनेकधाभाव कहा गया है । इस विषय में योगशास्त्रको सम्मति है - ' निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात् ' ( योगसूत्र ४१४ ) ( योगियों के योग प्रभाव से उत्पादित शरीर अस्मितामात्र कारणसे - अहंकार पूर्वक संकल्पसे निर्मित मनोंसे युक्त होते हैं ) इसप्रकार योगियोंसे निर्मित अनेक शरीर और मनोंकी प्रवृत्तिमें भेद दिखाई देता है । इस भेदका कारण - ' प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम् ' ( योगसूत्र ४/५ ) ( अनेक मनोंकी प्रवृत्ति भेदमें अनादि एक मन ही प्रयोजक है ) इसलिए योगियोंके योग प्रभावसे नवनिर्मित देहों में अस्मितासे निर्मित्त चित्त होते हैं और अनादि एक चित्त उन सबका नियामक होता है । इससे यह सिद्ध हुआ कि सगुण उपासक सत्यसंकल्पसे अनेक सात्मक शरीरोंका निर्माण कर उनमें प्रविष्ट होता है ॥ १५ ॥

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८७८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ०४ पा ० ४ विजानीयात् ' ( बृह ० ४/५/१५ ), ' न तु तद्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यद्विजानीयात् ' ( बृह ० ४।३।३० ) ‘ सलिल एको द्रष्टाऽद्वैतो भवति ' ( ब्रह्मसूत्र ४ | ३ | ३२ ) इति चैवंजातीयका श्रुति-विशेषविज्ञानं वारयतीत्यत उत्तरं पठति-स्वाप्ययसंपच्योरन्यतरापेक्षमाविष्कृतं हि ॥ १६ ॥

पदच्छेद - स्वाप्ययसंपत्त्योः, अन्यतरापेक्षम्, आविष्कृतम्, हि । सूत्रार्थ - ( स्वाप्ययसम्पत्त्योः ) सुषुप्ति और मुक्ति में से ( अन्यतरापेक्षम् ) एककी अपेक्षासे विशेषज्ञानका अभाव स्वीकार किया गया है, ( हि ) क्योंकि ( आविष्कृतम् ) संगुण विद्या में शरीर आदिके स्वीकार करनेमें कोई विरोध नहीं है * स्वाप्ययः सुषुप्तम्, ' स्वमपीतो भवति तस्मादेनं स्वपितीत्याचक्षते ' ( छा ० ६।८।१ ) इति श्रुतेः । संपत्तिः कैवल्यम्, ' ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति ' ( बृह ० ४।४।६ ) इति श्रुतेः । तयोर-न्यतरामवस्थामपेक्ष्यैतद्विशेषसंज्ञाभाववचनम् । क्वचित्सुषुप्तावस्थामपेक्ष्योच्यते, कचि-त्कैवल्यावस्थाम् । कथमवगम्यते? यतस्तत्रैवैतदधिकारवशादाविष्कृतम् -'एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानु विनश्यति न प्रेत्य संज्ञाऽस्तीति ' ( बृह ० २ | ४ | १२ ), ' यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवा-भूत् ' ( बृह ० २।४।१४ ), ' यत्र सुप्तो न कंचन कामं कामयते न कंचन स्वप्नं पश्यति ' ( बृह ४ । ३।१ ९, माण्डू ० ५ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । सगुणविद्याविपाकस्थानं त्वेतत्स्वर्गादिवदवस्था-न्तरम् । यत्रैतदैश्वर्यमुपवर्ण्यते, तस्माददोषः ॥ १६ ॥

अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरा पदार्थ ही नहीं होता जिसे वह विशेषरूपसे जाने ) ' सलिल एको ' ( सलिल - सा शुद्ध एक द्रष्टा अद्वैत है ) इस प्रकारकी श्रुतियाँ विशेष विज्ञानका वारण करती हैं? इसके विषय में उत्तर कहते हैं-' स्वाप्ययः ' सुषुप्ति, क्योंकि ' स्वमपीतो भवति ' ० ( यह अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाता है, इसीसे इसे लोग ' स्वपिति ' ( सोता है ) ऐसा कहते हैं ) ऐसी श्रुति है । ' संपत्तिः - कैवल्य, क्योंकि ' ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति ' ( ब्रह्म ही होता हुआ ब्रह्मको प्राप्त होता है ) ऐसी श्रुति है । उन दोनों में से एक अवस्थाकी अपेक्षासे इस विशेषज्ञानके अभावका बोधक वचन है । श्रुति कहींपर सुषुप्ति अवस्थाकी अपेक्षासे [ विशेषज्ञानका अभाव ] कहती है और कहींपर कैवल्य अवस्थाकी अपेक्षासे । यह कैसे अवगत हो? क्योंकि ' एतेभ्यो भूतेभ्यः ० ' ( यह इन सत्य शब्द वाच्य भूतोंसे प्रकट होकर उन्होंके साथ नाशको प्राप्त हो जाता है देहेन्द्रियमावसे मुक्त होनेपर इसकी कोई विशेष संज्ञा नहीं रहती है ) ' यत्र-स्वस्य ० ' ( परन्तु जिस ज्ञानावस्था में इसके लिए सब आत्मा ही हो गया है ) ' यत्र सुप्तो ० ' ( जहाँ सोया हुआ यह किसी मोगकी कामना नहीं करता और न कोई स्वप्न ही देखता है ) इत्यादि श्रुतियोंसे उसमें ही उसके प्रकरण के बलसे स्पष्ट किया गया है । जिसमें इस ऐश्वयंका वर्णन किया जाता है वह सगुणविद्याका विप rs ( फल ) स्थान स्वर्ग आदिके समान अन्य अवस्था है, इससे दोष नहीं है ॥ १६ ॥।

सत्यानन्दी - दीपिका * ' न तु तद्वितीयमस्ति ' ( परन्तु वह द्वितीय नहीं है ) यहाँ सुषुप्तिको लेकर अन्यका निषेध है, और ' तत्केन कं पश्येत् ' यहाँ मुक्तिको लेकर विशेष विज्ञानका अभाव कहा गया है । इसलिए विशेष ज्ञानके अभावका वचन सुषुप्ति और कैवल्य मुक्ति दोनोंमें से किसी एककी अपेक्षासे कहा गया है । यहाँ मुनि याज्ञवल्क्यने आमासवादको लेकर मैत्रेयीको उपदेश किया है । इसका रहस्य यह है कि जैसे उदकपूर्ण घटमें चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब पड़ता है और जल सहित घटके नाश होनेपर प्रतिबिम्बका मी नाश हुआ प्रतीत होता है । वस्तुतः उनका नाथ उपाधिके नष्ट होनेपर बिम्बरूपसे अवस्थिति है । वैसे घट स्थानीय पांच भौतिक शरीर और जल स्थानीय अन्तःकरणमें चन्द्रमा स्थानीय ब्रह्मका

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अधि ० ७ सू ० १७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी- दीपिकासहित ८७ ९ ( ७ जगद्व्यापाराधिकरणम् । सू ० १७-२२ ) जगद्व्यापारवर्ज प्रकरणादसंनिहितत्वाच्च ॥ १७ ॥

पदच्छेद – जगद्व्यापारवम्, प्रकरणात्, असंनिहितत्वाच्च । पदच्छेद– ( जगद्व्यापारवजंम् ) जगत् की उत्पत्ति आदि व्यापारको छोड़कर अन्य अणिमा दि ऐश्वर्य विद्वान्को प्राप्त होता है, ( प्रकरणात् ) क्योंकि जगत् सृष्टिमें ईश्वर प्रकृत है ( असंनिहि-तवाच्च ) और अन्य असंनिहित हैं । * ये सगुणब्रह्मोपासनात्सहैव मनसेश्वर सायुज्यं व्रजन्ति, किं तेषां निरवग्रहमैश्वर्यं भवत्याहोस्वित्सावग्रहमिति संशयः । किं तावत्प्राप्तम्? निरङ्कुशमेवैषामैश्वर्य भवितुमर्हति ‘ आप्नोति स्वाराज्यम् ' ( तै ० १।६।२ ), सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहन्ति ' ( तै ० १ | ५ | ३ ), ' तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ' ( छा ० ७/२५/२, ८ | १ | ६ ) इत्यादिश्रुतिभ्य इति । एवं प्राप्ते पठति -जगद्व्यापार वर्जमिति । जगदुत्पत्त्यादिव्यापारं वर्जयित्वाऽन्यदणिमाद्यात्मकमैश्वर्य मुक्तानां भवितुमर्हति " जगद्व्यापारस्तु नित्यसिद्धस्यैवेश्वरस्य । कुतः १? तस्य तत्र प्रकृत-त्वादसंनिहितत्वाच्चेतरेषाम् । पर एव हीश्वरो जगद्व्यापारेऽधिकृतः, तमेव प्रकृत्योत्प-स्याद्युपदेशात् नित्यशब्द निबन्धनत्वाच्च । तदन्वेषणविजिज्ञासनपूर्वकं वितरेषामणि-माद्यैश्वर्यं श्रयते । तेनासंनिहितास्ते जगदव्यापारे । समनस्कत्वादेव चैतेषामनैकमत्ये जो सगुण ब्रह्मकी उपासना से मनके साथ ही ईश्वर सायुज्यको प्राप्त होते हैं, उनका ऐश्वयं क्या निरङ्कश है अथवा साङ्कय? इस प्रकार संशय होता है, तब क्या प्राप्त हुआ? पूर्वपक्षी - इनका ऐश्वर्य निरङ्कश ही होना चाहिए, क्योंकि ' आप्नोति स्वाराज्यम् ' ( वह स्वाराज्यको प्राप्त होता है ) ' सर्वेऽस्मै देवा ० ' ( समस्त देवगण उसे बलि ( उपहार ) समर्पण करते हैं ) ' तेषां सर्वेषु ० ' ( उनकी सम्पूर्णं लोकोंमें यथेच्छ गति होती है ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं-' जगद्व्यापारवर्जम् ' । जगत् की उत्पत्ति आदि व्यापारको छोड़कर मुक्त पुरुषको अन्य अणिमा बादि रूप ऐश्वर्यं प्राप्त हो सकता है । जगत् के उत्पत्ति आदि व्यापार तो नित्य सिद्ध ईश्वरका ही है, किससे? इससे कि वह सृष्टिमें प्रकृत है और अन्य जीव असंनिहित हैं । परमेश्वर ही जगत्को उत्पत्ति आदि व्यापार में अधिकृत है, कारण कि उसको प्रस्तुतकर उत्पत्ति आदिका उपदेश है और नित्यशब्द से सम्बन्धित है । उसका अन्वेषण विशेष जिज्ञासापूर्वक अन्योंका अणिमा मादि ऐश्वयं सुना जाता है । इससे वे जगत्‌को उत्पत्ति आदि व्यापार में असंनिहित - असम्बन्धित हैं । इनके मनस्वी होनेसे ही ऐकमत्यका संभव न होने से सत्यानन्दी - दीपिका आभास पड़ता है, वही लोकमें जीव नामसे कहा जाता है । जब तत्त्वज्ञानसे मिथ्याज्ञानकी निवृत्ति हो जाती है और भोगसे प्रारब्ध कर्म समाप्त हो जाता है, तब अन्तःकरण सहित शरीरके नाश होने के साथ - साथ आभासका भी नाश हो जाता है । वस्तुतः उसका नाश अपने बिम्बरूप चेतन से अवस्थिति है । इस प्रकार उपाधिके नाश होनेसे प्रतिबिम्बका नाश - सा होता है, इस अभिप्रायसे ' एतेभ्यो भूतेभ्यः ' यह श्रुति है | और ' यत्रत्वस्य ' इस प्रकारकी श्रुतियाँ कैवल्य विषयक हैं, और ' यत्र सुप्तो न कंचन कामं कामयते ' इत्यादि श्रुतियां सुषुप्ति विषयक हैं । इसलिए सगुणोपासकके लिए ऐश्वर्यं प्राप्तिका वचन दोष रहित है, क्योंकि उसका भिन्न विषय है अर्थात् फलोपभोगके लिए स्वर्ग आदिके समान एक अवस्था विशेष है ॥ १६ ॥

* ' संकल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्टन्ति ' ( इस उपासकके संकल्पसे ही पितर समुपस्थित होते हैं ) स एकधा भवति त्रिधा भवति ' इत्यादि प्रतिसे सिद्ध होता है कि ब्रह्मलोकमें गये हुए सगुणोपासकका ऐश्वर्यं निरङ्कुश होता है अर्थात् जैसे वह उपभोगके लिए अपने संकल्पसे ही इष्ट देह

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८८० महासूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० ४ कस्यचित्स्थित्यभिप्रायः कस्यचित्संहाराभिप्राय इत्येवं विरोधोऽपि कदाचित्स्यात् । अथ कस्यन्त्रित्संकल्पमन्वन्यस्य संकल्प इत्यविरोधः समर्थ्येत, ततः परमेश्वराकृततन्त्रत्वमे-वेतरेषामिति व्यवतिष्ठते ॥ १७ ॥

प्रत्यक्षोपदेशादिति चेन्नाधिकारिकमण्डलस्थोक्तेः ॥ १८ ॥

पदच्छेद – प्रत्यक्षोपदेशात्, इति चेत्, न, आधिकारिकमण्डलस्योक्तेः । सूत्रर्थ - ( प्रत्यक्षोपदेशात् ) ' याप्नोति स्वाराज्यम् ' इत्यादि प्रत्यक्ष श्रुतिसे विद्वान्का ऐश्वयं निरङ्कश प्रतिपादित है । ( इति चेन्न ) तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि ( आधिकारिकमण्डलस्थोक्तेः ) आदित्य मण्डल स्थित आधिकारिक परमेश्वर के अधीन स्वाराज्य प्राप्ति विषयक यह वचन है । * अथ यदुक्तम्- ' आप्नोति स्वाराज्यम् ' ( तै ० १।६।२ ) इत्यादिप्रत्यक्षोपदेशान्निरवग्र हमैश्वर्यं विदुषां न्याय्यमिति तत्परिहर्तव्यम् । अत्रोच्यते- नायं दोषः - आधिकारिकमण्ड-लस्थोक्तेः । आधिकारिको यः सवितृमण्डलादिषु विशेषायतनेष्ववस्थितः पर ईश्वरस्त-दायत्तैवेयं स्वाराज्यप्राप्तिरुच्यते । यत्कारणमनन्तरम् ' आप्नोति मनसस्पत्तिम् ' ( तै ० १।६।२ ) इत्याह । यो हि सर्वमनसां पतिः पूर्वसिद्ध ईश्वरस्तं प्राप्नोतीत्येतदुक्तं भवति । तदनुसारेणैव चानन्तरम् ' वाक्पतिश्चक्षुष्पतिः । श्रोत्रपतिर्विज्ञानपतिः ' ( तै ० १।६।२ ) च भवति इत्याह । एव-मन्यत्रापि यथासंभवं नित्यसिद्धेश्वराय त्तमेवेतरेषामैश्वर्यं योजयितव्यम् ॥ १८ ॥

किसीका जगत् की स्थिति में अभिप्राय और किसीका उसके संहारमें अभिप्राय होगा, इस प्रकार कदाचित् विरोध भी होगा । यदि किसी एकके संकल्पके अनुसार अन्यका संकल्प हो, इसप्रकार अविरोधका सम-थंन करे तो इससे भी परमेश्वरके अभिप्रायके अधीन ही अन्य जीव हैं, ऐसी व्यवस्था होती है ॥१७ ॥

यह जो कहा गया है कि ' आप्नोति स्वाराज्यम् ' ( वह स्वाराज्यको प्राप्त होता है ) इत्यादि प्रत्यक्ष श्रुतिसे उपासकोंका ऐश्वयं निरङ्कुश युक्त है, उसका परिहार करना चाहिए । इसपर कहते हैं-यह दोष नहीं है, क्योंकि आधिकारिक मण्डल स्थितोंके लिए यह उक्ति - वचन है | आदित्यमण्डल आदि विशेष स्थानोंमें अवस्थित जो आधिकारिक परमेश्वर है उसके अधीन ही यह स्वाराज्य प्राप्ति कही जाती है, क्योंकि अनन्तर ' आप्नोति मनसस्पतिम् ' ( वह मनके पति ब्रह्मको प्राप्त होता है ) ऐसा श्रुति कहती है । जो सब मनोंका पति पूर्व सिद्ध ईश्वर है उसको प्राप्त होता है, ऐसा कहा गया है । अनन्तर उसके अनुसार ही ' वाक्पतिश्चक्षुष्पति: ' ( तथा वाणीका पति, चक्षुका पति, श्रोत्रका पति और विज्ञानका पति हो जाता है ) इसप्रकार श्रुति कहती है । इसप्रकार अन्यत्र भी अन्य उपा-कोंका ऐश्वर्यं नित्य सिद्ध ईश्वरके अधीन ही है, ऐसी यथासम्भव योजना करनी चाहिए ॥ १८ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका आदिकी सृष्टिमें स्वतन्त्र हैं, वैसे आकाश आदि जगत् की उत्पत्ति आदि करनेमें भी स्वतन्त्र हैं । वे ईश्वर के समान स्वतन्त्र - निरङ्कय ऐश्वर्यवान् होते हैं । इससे पूर्वपक्षमें अनेक ईश्वर सिद्ध होते हैं । सिद्धान्ती - सगुणोपासकका ऐश्वयं अस्वतन्त्र है अर्थात् जगत्को उत्पत्ति आदि करनेमें वह असमर्थ है । जगत् की उत्पत्ति आदि तो वह कर सकता है जो जगत् की उत्पत्तिसे पूर्व ही सिद्ध हो और पूर्वापर पर्यालोचन करनेमें समर्थ, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् नित्यसिद्ध हो, वह तो ईश्वर ही हो सकता है । योगी लोग तो ईश्वरानुग्रहसे ब्रह्मलोक में जाकर ऐश्वर्यवान् होते हैं, और महाप्रलयमें उन सबका अन्त हो जाता है, जगत् की उत्पत्तिके पूर्व वे अविद्यान होनेके कारण उनसे जगत् की उत्पत्ति आदि असम्भव है | किश्च ' स ईक्षाञ्चक्रे ' ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ' इत्यादि श्रुतियाँ प्रलयके अनन्तर सृष्टिकी उत्पत्ति आदिमें ईश्वरको ही कारण कहती हैं, इसका विस्तृत वर्णन ( ब्रह्मसूत्र १।१।२ ) इस सूत्रमें किया गया है ॥ १७ ॥

* ' आप्नोति स्वाराज्यम् ' यह श्रुति वचन आदित्यमण्डल आदि विशेष स्थानोंमें स्थित

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अधि ० ७ सू ० १ ९ -२० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८८१ विकारावर्ति च तथा हि स्थितिमाह ॥ १ ९ ॥ पदच्छेद - विकारावर्ति, च, तथा, हि, स्थितिम् आह । सूत्रार्थ - ( विकारावर्ति च ) विकारमें न रहनेवाला मी ब्रह्मका स्वरूप है, ( हि ) क्योंकि ( तथा ) वैसे ( स्थितिम् ) परमेश्वरके दो रूपों की स्थिति, ( आह ) ' तावानस्य महिमा ' इत्यादि श्रुति कहती है । * विकारावर्त्यपि च नित्यमुक्तं पारमेश्वरं रूपं न केवलं विकारमात्र गोचरं सवितृ-मण्डाद्यधिष्ठानम् । तथा ह्यस्य द्विरूपां स्थितिमाहाम्नाय: - ' तावनस्य महिमा, ततो ज्यायांश्च पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ' ( छा ० ३ | १२ | ६ ) इत्येवमादिः । नच तन्निर्विकारं रूपमितरालम्बनाः प्राप्नुवन्तीति शक्यं वक्तुम्, अतत्क्रतुत्वात्तेषाम् । अतश्च यथैव द्विरूपे परमेश्वरे निर्गुणं रूपमनवाप्य सगुण एवावतिष्ठन्ते, एवं सगुणेऽपि निर-वग्रहमैश्वर्यमनवाप्य सावग्रह एवावतिष्ठन्त इति द्रष्टव्यम् ॥ १ ९ ॥ दर्शयतश्चैवं प्रत्यक्षानुमाने ॥ २० ॥

पदच्छेद - दर्शयता, च, एवम् प्रत्यक्षानुमाने । विकारमें न रहनेवाला मी परमेश्वरका नित्यरूप कहा गया है केवल विकारमात्र विषयक सवितृमण्डल आदि अधिष्ठानकरूप नहीं है, क्योंकि ' तावानस्य महिमा ० ' ( उतनी ही इस गायत्र्याख्य ब्रह्मकी महिमा है, तथा निर्विकार पुरुष इससे उत्कृष्ट है, तेज, जल और अन्न आदि सम्पूर्ण चराचर प्राणी इसका एक पाद हैं, और इसका पुरुष नामक त्रिपाद अमृत प्रकाशमय स्वात्मा में स्थित है ) इत्यादि श्रुति इसके दो रूपोंकी स्थिति कहती है । अन्य ( विकारवतिरूप ) का आलम्बन करनेवाले उपासक उसके निर्विकाररूपको प्राप्त होते है, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वे उस क्रतुवाले नहीं है । इसलिए जैसे दो रूपवाले परमेश्वरके होनेपर भी वे निर्गुणरूपको प्राप्त न कर सगुणरूप में ही अवस्थित होते हैं, वैसे सगुणमें मी निरङ्कुश ऐश्वयं प्राप्त किये विना उपासक साङ्कुश - अस्वतन्त्र ऐश्वयं में ही अवस्थित होते हैं, ऐसा समझना चाहिए ॥ १ ९ ॥ सत्यानन्दी - दीपिका परमेश्वर के अधीन ही स्वाराज्य प्राप्ति के विषय में है । यदि वह स्वाराज्य प्राप्तिमात्रसे निरङ्कश ऐश्वयं-वान होता तो उसके अनन्तर हो ' आप्नोति मनसस्पतिम् ' इत्यादि श्रुति वचन असंगत होगा । आदित्य आदिको जो अधिकारमें नियुक्त करता है वह यहाँ अाधिकारिक कहा गया है । इसलिए सगुण उपासकको अपने उपभोग में भले स्वाराज्य- स्वातन्त्र्य हो, परन्तु जगत् की उत्पत्ति आदिमें नहीं । इस प्रकार ' सर्वेषु लोकेषु कामचारो मवति ' इत्यादि स्थलोंमें भी यही समझना चाहिए कि उपासकका ऐश्वयं ईश्वरके धीन है स्वतन्त्र नहीं ॥ १८ ॥

* शङ्का — जैसे उपास्य सगुण ब्रह्मगत सत्यसङ्कल्पत्व यादि उपासक में आते हैं, वैसे उपास्य गत जगत्‌को उत्पत्ति आदि व्यापारकी सामथ्यं भी उसमें आनी चाहिए? समाधान - ' तावानस्य महिमा ' इस श्रुतिवचनसे ब्रह्मका विकारवर्तिरूप और ' ज्यायांश्च पूरुष: ' इस वचनसे ब्रह्मका निर्विकार-रूप प्रतिपादित है । और ' पादोऽस्य सर्वा भूतानि ' इस श्रुतिवचनसे ब्रह्मका विकारवर्तिरूप और ' त्रिपादस्यामृतं दिवि ' इस वचनसे ब्रह्मका निर्विकाररूप प्रतिपादित है । इसप्रकार जैसे ब्रह्मके दो रूप होनेपर भी निर्गुणरूप सगुण उपासकोंसे अप्राप्त है, क्योंकि उसको निर्विकार ब्रह्मका ज्ञान नहीं है, वैसे सगुण ब्रह्मगत जगत् की उत्पत्ति आदि व्यापारकी सामर्थ्य होनेपर भी उपासक उसे प्राप्त नहीं कर सकता । इसलिए उपासक केवल अणिमा आदि सातिशय ऐश्वर्यको ही प्राप्त कर सकता है ॥ १ ९ ॥

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III ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० ४ सूत्रार्थ - ( एवम् ) इसप्रकार ( प्रत्यक्षानुमाने च ) श्रुति और स्मृति भी ( दर्शयतः ) परमेश्वरका निर्विकाररूप दिखलाती हैं । दर्शयतश्च विकारावर्तित्वं परस्य ज्योतिषः श्रुतिस्मृती । ' न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रता-रकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ' ( कठ ० ५ १५, श्व ेता ० ६।१४, मुण्ड ० २।२।१० ) इति । ' न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ' ( गी ० १५ | ६ ) इति च । तदेवं विकारावर्तित्वं परस्य ज्योतिषः प्रसिद्धमित्यभिप्रायः ॥ २० ॥

भोगमात्र साम्यलिङ्गाच्च ॥ २१ ॥

पदच्छेद - भोगमात्र साम्यलिङ्गात्, च । सूत्रार्थ - और उपासकोंको ईश्वरके साथ भोगमात्र की साम्य श्रुति होनेसे भी उनका निरङ्कय ऐश्वयं नहीं है । इतश्च न निरङ्कुशं विकारालम्बनानामैश्वर्यं यस्माद्भोगमात्रमेवैषामनादिसिद्धेने-श्वरेण समानमिति श्रूयते - ' तमाहापो वै खलु मीयन्ते लोकोऽसौ ' इति ' स यथैतां देवतां सर्वाणि भूतान्यवन्त्येवं हैवंविदं सर्वाणि भूतान्यवन्ति ' तेनो एतस्यै देवतायै सायुज्यं सलोकतां जयति ' ( बृह ० १।५।२३ ) इत्यादिभेदव्यपदेशलिङ्गेभ्यः ॥ २१ ॥

नन्वेवं सति सातिशयत्वादन्तवत्त्वमैश्वर्यस्य स्यात्, ततश्चैषामावृत्तिः प्रसज्येते-त्यत उत्तरं भगवान्बादरायण आचार्यः पठति -अनावृत्तिः शब्दादनावृतिः शब्दात् ॥ २२ ॥

पदच्छेद - अनावृत्तिः, शब्दात्, अनावृत्ति, शब्दात् । सूत्रार्थं - ( अनावृत्तिः ) अचिरादि पर्व युक्त देवयान मार्गसे जो उपासक ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती, ( शब्दात् ) क्योंकि ' न च पुनरावर्तते ' इत्यादि श्रुति है | सूत्रकी आवृत्ति शास्त्र परिसमाप्तिद्योतक है । ' न तत्र सूर्यो भाति ० ' ( उस ज्योतिःस्वरूप परब्रह्ममें लोकावभासक सूयं प्रकाशित नहीं होता, न चन्द्र और न तारे प्रकाशित होते हैं और न विद्युत् ही चमकती हैं पुनः अस्मदादि गोचर यह भौतिक अग्नि तो कहीं प्रकाशित हो सकती है? ) और ' न तद्भासयते ० ' ( उस स्वयं प्रकाशमय परब्रह्म को न सूर्य, न चन्द्रमा और न अग्नि ही प्रकाशित कर सकते हैं ) इसप्रकार श्रुति और स्मृति भी ज्योतिःस्वरूप परब्रह्मका विकारावर्तित्व दिखलाती हैं । इसप्रकार पर ज्योतिमें विकारावर्तित्व प्रसिद्ध है, यह अभिप्राय है ॥ २० ॥

और इस वक्ष्यमाण हेतुसे भी विकारका आलम्बन - उपासना करनेवाले उपासकोंका ऐश्वयं निरङ्कुश नहीं है, क्योंकि इनका मोगमात्र ही अनादि सिद्ध ईश्वरके साथ समान है, ' तमाहापो ο ' ( उस उपासकसे हिरण्यगमं सान्त्वना पूर्वक कहते हैं, मुझसे ये अमृतमय जल भोगे जाते हैं, तुमसे यह अमृतमय लोक भोग्य हैं तुम इसका यथेच्छ भोग करो ) ऐसी श्रुति है, और ' स यथैतां ० ' ( जैसे इस हिरण्यगर्भ देवताकी सब प्राणी पूजा करते हैं, वैसे ही ऐसा जाननेवालेकी सब भूत पूजा करते हैं ) ' तेनो एतस्यै ० ' ( उस प्राणात्मप्रतिरूप व्रतके योगसे उपासक इसी प्राणदेवताका सायुज्य एकात्मता और समान लोकता - एक स्थानत्व प्राप्त करता है ) इत्यादि भेदव्यपदेश लिङ्गोंसे भी प्रतीत होता है । कि उपासकका उपास्य ईश्वरके साथ भोगसाम्य है ॥ २१ ॥

परन्तु ऐसा होनेपर - उपासकोंका ऐश्वयं साङ्कश होनेपर सातिशय होने से उनका ऐश्वर्यं विनाशी होगा इससे इनको आवृत्ति ( संसारागमन ) प्रसक्त होगी? इससे भगवान् बादरायण आचार्यं उत्तर कहते हैं-

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अधि ० ७ सू ० २२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८८३ * नाडीरश्मिसमन्वितेनार्चिरादिपर्वणा देवयानेन पथा ये ब्रह्मलोकं शास्त्रोक्त-विशेषणं गच्छन्ति ‘ यस्मिन्नरश्च ह नै ण्यश्चार्णवौ ब्रह्मलोके तृतीयस्यामितो दिवि, यस्मिन्नैरं मदीयं सरो यस्मिन्नश्वत्थः सोमसवनो यस्मिन्नपराजिता पूर्ब्रह्मणो यस्मिंश्च प्रभुविमितं हिरण्मयं वेश्म यश्चानेकधा मन्त्रार्थवादादिप्रदेशेषु प्रपञ्च्यते - ते तं प्राप्य न चन्द्रलोकादिव भुक्तभोगा आवर्तन्ते, कुतः? ‘ तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति ' ( छा ० ८।६।६, कठ ० ६।१६ ), ' तेषां न पुनरावृत्ति: ' ( बृह ० ६।२।१५ ), ‘ एतेन प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावर्त नावर्तन्ते ' ( छा ० ४।१५ / ५ ), ' ब्रह्मलोकमभिसंप-द्यते ' ( छा ० ८।१५।१ ), ‘ न च पुनरावर्तते ' ( छा ० ८/१५/१ ) इत्यादिशब्देभ्यः । अन्तवत्त्वेऽपि स्वैश्वर्यस्य यथाऽनावृत्तिस्तथा वर्णितम् ' कार्यात्यये तदध्यक्षेण सहातः परम् ( ब्रह्मसूत्र ४ | ३ | १० ) इत्यत्र । सम्यग्दर्शन विध्वस्ततमसां तु नित्यसिद्ध निर्वाणपरायणानां सिद्धेवानावृत्तिः, जो उपासक नाड़ीरश्मि समन्वित अधिरादिपवं युक्त देवयानमागंसे शास्त्रोक्त विशेषण विशिष्ट ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं - ' इस पृथिवी नामक लोकसे तृतीय द्युलोक में जो ब्रह्मलोक है, उस ब्रह्मलोक में अर और ण्य नामके दो समुद्र - समुद्र तुल्य तालाब हैं, वहीं अन्नमय मण्डसे पूर्ण मदका हर्षोत्पादक सर है, वहीं अमृतका स्रोत बहानेवाला अश्वत्थ वृक्ष है, वहाँपर ब्रह्माकी अपराजितापुरी है, वहीं ब्रह्माद्वारा निर्मित सुवर्णमय गृह है, जिसका अनेक प्रकारसे मन्त्र, अर्थवाद आदि प्रदेशों में विस्तार से वर्णन किया जाता है, वे उसे प्राप्तकर जैसे कमंठ लोग भुक्त मोग होकर चन्द्रलोकसे लौटते हैं, वैसे नहीं लौटते । किससे? इससे कि ' तयोर्ध्वमायन्न ० ' ( उस मूर्धन्य नाड़ीसे ऊध्वंको जानेवाला अमृतत्वको प्राप्त होता है ) ' तेषां न पुनरावृत्ति: ' ( उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती ) ' एतेन प्रतिपद्यमाना ० ' ( इस देवमागंसे जानेवाले इस मानव मण्डल में पुनः नहीं लौटते ) ब्रह्मन्तोकमभिसंपद्यते ' ( ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है ), ' न च पुनरावर्तते ' ( और पुनः नहीं लौटता ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं । ऐश्वयंके विनाशी होनेपर भी जैसे अनावृत्ति होती है, वैसे ही ' कार्यात्यये तदध्यक्षेण सहातः परम् ' इस सूत्र में वर्णित है । सम्यग्दर्शनसे विध्वस्त अज्ञानवाले नित्यसिद्ध निर्वाण परायण मुक्त पुरुषोंकी अनावृत्ति तो सिद्ध सत्यानन्दी - दीपिका # यहाँ ' बादरायण ' शब्द से बदरिकाश्रम में निवासका कथन होनेके कारण सदा सर्वज्ञ परम गुरु नारायण प्रसादका द्योतक होनेसे तत्प्रणीत शास्त्रमें निदुष्टत्व सूचित होता है । यद्यपि सगुण विद्याका फल सातिशय होनेसे विनाशी है, तो भी ब्रह्मलोक में ईश्वरके अचिन्त्य प्रसादसे ब्रह्मात्मकत्व ज्ञान हो जाता है जिससे वह पुनः संसारमें लौटकर नहीं आता । जो सगुण उपासना - दहरविद्या आदिसे रहित केवल ब्रह्मचयं, अश्वमेध आदि साधनोंद्वारा ब्रह्मलोक में जाते हैं, वे वहीं फल भोगकर मानव लोकमें लौट आते हैं, क्योंकि वे तत्त्वज्ञान से रहित होते हैं । जैसे चन्द्रलोक में गए हुए केवल कमंठ लोग फल भोगकर लौट खाते हैं । ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि वेदान्तवाक्योंसे जिसका आत्मैकत्व ज्ञानसे अज्ञान निवृत्त हो गया है उसका तो ' अत्रैव ब्रह्म समश्नुते ' यहाँ जीवितावस्थामें ही ब्रह्म प्राप्तिरूप मोक्ष सिद्ध है । सगुण उपासक भी उसी आत्मज्ञानको पाकर ब्रह्माके साथ मुक्त हो जाता है, अतः उनकी पुनः आवृत्ति नहीं होती, क्योंकि ' न च पुनरावर्तते ' ( वह पुनः संसारमें नहीं आता ) • इत्यादि श्रुतियाँ हैं | इस माँति सगुण उपासकोंकी क्रम मुक्ति होती है । इसप्रकार समन्वयके कथनसे ब्रह्मात्मैकत्वमें वेदान्त - उपनिषद् वाक्य प्रमाण हैं, ऐसा निश्चय किया गया है । वाक्यार्थं ज्ञानमें स्मृति, तर्क आदि सर्वप्रकारके विशेषका परिहार किया गया है और साधन सम्पत्ति भी दिखलाई गई है । इससे विवेक आदि साधन सम्पन्न और वेदान्तवाक्योंके श्रवण आदिको आवृत्तिसे समस्त प्रतिबन्धसे रहित

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८८४ ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० ४ तदाश्रयणेनैव हि सगुणशरणानामप्यनावृत्तिसिद्धिरिति । अनावृत्तिः शब्दादनावृत्तिः शब्दादिति सूत्राभ्यासः शास्त्रपरिसमाप्तिं द्योतयति ॥ २२ ॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमद्गोविन्द भगवत्पूज्यपादशिष्य श्रीमच्छङ्करभगवत्पूज्य-पादकृतौ शारीरकमीमांसाभाष्ये चतुर्थाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥ ४ ॥

समाप्तमिदं ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् ॥ ही है । सगुण रणवालोंकी भी उस ज्ञानके आश्रयसे ही अनावृत्ति सिद्ध होती है । ' अनावृत्ति शब्दसे, अनावृत्ति शब्दसे ' इसप्रकार सूत्रकी पुनरुक्ति शास्त्रकी परिसमाप्ति सूचित करती है ॥ २२ ॥

स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत शाङ्करभाष्य - भाषानुवादके चतुर्थाध्यायका चतुर्थ पाद समाप्त ॥ ४ ॥

सत्यानन्दी - दीपिका पुरुषकी समूल बन्धकी निवृत्ति होनेपर याविभूत निष्कल, अनन्त, स्वप्रकाश, चिदानन्दरूप से अवस्थिति होती है ॥२२ ॥

वेदान्तसूत्रभाष्यस्य शाङ्करस्य गरीयसः । अनुवादमविद्यान्धतमसद्वादशात्मनः ॥ १ ॥

तथा रत्नप्रभापञ्चपादिकान्यायनिर्णय मामतीप्रभृतिग्रन्थान् माष्याभिप्रायवेदकान् ॥ २ ॥

आश्रित्य तेषां तात्पर्यमाकलय्य समन्ततः । सुखावगतये तस्य विवृण्वम् राष्ट्रभाषया ॥ ३ ॥

विद्यार्थिहितमालक्ष्य सत्यानन्द्याख्यदीपिकाम् । व्यधाद्व्याख्याञ्च सरलां सत्यानन्दसरस्वती ॥ ४ ॥

सेयं ज्ञानप्रदेशस्य महिते पुटभेदने । सर्वशाखरहस्यज्ञैः संख्यावद्भिः समाकुले ॥ ५ ॥

करनेत्रवियच्चक्षुर्मिते वैक्रमवत्सरे । आश्विने मासि धवले दले सदा मीतिथौ ॥ ६ ॥

वासरे भूमिजातस्य गुरुदेवप्रसादतः । मतिमत्संमतिं प्राप्ता निर्विघ्नं पूर्णतामगात् ॥ ७ ॥

पदालिसुमनो जातगुम्फितेयं सुमालिका । प्रीतये शङ्करस्यास्तामर्पिता सच्चिदात्मनः ॥ ८ ॥

स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत ' सत्यानन्दी - दीपिका ' के चतुर्थाध्यायका चतुर्थं पाद समाप्त ॥ ४ ॥

। इति शम् ।

॥ समाप्तञ्चायं ग्रन्थः ॥

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बादरायणप्रणीतब्रह्मसूत्राणां वर्णानुक्रमः । सूत्रम् अंशो नानाव्यपदेशादन्यथा. अकरणत्वाच्च न दोषस्तथाहि अक्षरधियां त्यविरोधः सामा. अक्षरमम्बरान्तघृतेः अग्निहोत्रादि तु तत्कार्यायैव. अग्न्यादिगतिश्रुतेरिति चेन्न अङ्गावबद्धास्तु न शाखासु हि ङ्गित्वानुपपत्तेश्च अङ्गेषु यथाश्रयभावः अचलत्वं चापेक्ष्य अणवश्च अणुश्च अत एव च नित्यत्वम् अत एव च सर्वाण्यनु अत एव चाग्नीन्धनाद्यनपेक्षा अत एव च नन्याधिपति अत एव चोपमा सूर्यकादिवत् अत एव न देवता भूतं च अत एव प्राणः अतः प्रबोधोऽस्मात् अतश्चायनेऽपि दक्षिणे अतस्त्वितरज्ज्यायो लिङ्गाच्च अतिदेशाच्च तोऽनन्तेन तथा हि लिङ्गम् अतोऽन्यापि ह्येकेषामुमयोः अत्ता चराचरग्रहणात् अथातो ब्रह्मजिज्ञासा अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः अदृष्टानियमात् अधिकं तु भेदनिर्देशात् अघिकोपदेशात्तु बादरायण. अधिष्ठानानुपपत्तेश्व भ ० पा ० सं ० २ ३ ४३ २ ४ ११ ३ ३ ३३ ३ १० ४ १ १६ ३ १ ४ ३ ३ ५५ ४ २ ८ ३ ३ ६१ ४ १ २ ४ ७ २ ४ १३ १ ३ २ ९ ४ २ २ ३ ४ २५ ४ ४ ९ ३ २ १८ १ २ २७ १ २३ ३ २ ८ ४ २ २० ३४ ३ ९ ३ ३ ४६ ३ २ २६ ४ १ १७ १ २ ९ १ १ १ २ २१ ३ ५१ २ १ २२ ३ ४ ८ २ २ ३ ९ सूत्रम् अध्ययनमात्रवतः अनभिभवं च दर्शयति अनवस्थितेरसंभवाच्च नेउरः अनारब्धकार्ये एव तु पूर्वे. अनाविष्कुर्वन्नन्वयात् अनावृत्तिः शब्दादनावृत्तिः अनियमः सर्वासामविरोधः अनिष्टादिकारिणामपि च श्रुतम् अनुकृते तस्य च अनुज्ञापरिहारी देहसंबन्धा. अनुपपत्तेस्तु न शारीरः अनुबन्धादिभ्यः प्रज्ञान्तरपृ. अनुष्ठेयं बादरायणः साम्य. अनुस्मृतेर्बादरिः अनुस्मृतेश्च अनेन सर्वगतत्वमायाम. अन्तर उपपत्तेः अन्तरा चापि तु तद्द्दष्टेः अन्तरा भूतग्रामवत्स्वात्मनः अन्तरा विज्ञानमनसी क्रमेण अन्तर्याम्यधिदैवादिषु तद्धमंव्य. अन्तवत्त्वमसर्वज्ञता वा अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्. अन्त्यावस्थितेश्चोभयनित्यत्वा अन्यत्राभावाच्च न तृणादिवत् अन्यथात्वं शब्दादिति चेन्ना. अन्यथानुमितौ च ज्ञशक्तिवि. अन्यथा भेदानुपपत्तिरिति चे. अन्यभावव्यावृत्तेश्च अन्याधिष्ठितेषु पूर्ववदभिला. अन्यार्थ तू जैमिनिः प्रश्न. अन्यार्थरच परामर्शः

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बादरायणप्रणीतब्रह्मसूत्राणां वर्णानुक्रमः । सूत्रम् अन्वयादिति चेत्स्यादवधार. अपरिग्रहाच्चात्यन्त मनपेक्षा अपि च सप्त अपि च स्मयं " " " " " 1 " 19 अपि चैवमेके अपि च संराधने प्रत्यक्षानुमाना. अपीतौ तद्वत्प्रसङ्गादसमञ्जसम् अप्रतीकालम्बनान्नयतीति बा ० अबाधाच्च अमावं बादरिराह ह्येवम् अमिष्योपदेशाच्च अभिमानिव्यपदेशस्तु विशे. अभिव्यक्तेख्यिाश्मरथ्यः अभिसंध्यादिष्वपि चैवम् अभ्युपगमेऽप्यर्थाभावात् अम्बुवदग्रहणात्तु न तथात्वम् अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात् अचिरादिना तत्प्रथिते । अभंकोक स्त्वात्तद्व्यपदेशाच्च अल्पश्रुतेरिति चेत्तदुक्तम् व्यवस्थितिवशेष्यादिति चेन्ना. अवस्थितेरिति काशकृत्स्नः अविभागेन दृष्टत्वात् अविभागो वचनात् अविरोधश्चन्दनवत् अशुद्धमिति चेन्न शब्दात् अश्मादिवच्च तदनुपपत्तिः तत्वादिति चेनेष्टादिका. अति प्रतिज्ञोपरोधो योग. असदिति चेन्न प्रतिषेधमात्र. असदुद्व्यपदेशान्नेति चेन्न धर्मा. असंतश्चाव्यतिकर! असंभवस्तु सतोऽनुपपते । अस rafrat अस्ति तु अ ० पा ० सं ० ३ ३.१७ २ २ १७ ३ १ १५ १ ३ २३ २ rm ३ ४५ ३ ४ ३० ३ m ४ ३७ ३ २ १३ ३ २ २४ २ ४ ३ १५ ३ ४ २ ९ ४४ १० १ ४ २४ २ १ ५ १ २ २५ २ ३ ४२ २ २ २ १ ९ २ १४ ४ ३ १ १ २ ७ १ ३ २१ २ ३ २४ ४ २२ no४ ४ ४ ४ २ १६ ३ २३ ३ १ २५ १ २३ m १ ६ २ २ २१ २ १. २ २ १ १७ २ ३ ४ ९ २ ३ ९ ३ ४ १० २ सूत्रम् 3 अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति अस्यैव चोपपत्तेरेष ऊष्मा आ. आकाशस्तल्लिङ्गात् आकाशे चाविशेषात् आकाशोऽर्थान्तरत्वा दिव्यपदे. आचारदर्शनात् आतिवाहिकास्त लिङ्गात् आत्मकृतेः परिणामात् आत्मगृहीतिरितखदुत्तरात् आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि आत्मशब्दाच्च आत्मा प्रकरणात् आत्मेति तूपगच्छन्ति ग्राह. आदरादलोपः आदित्यादिमतयश्चाङ्ग उपपत्तेः आधानाय प्रयोजनाभावात् आनन्दमयोऽभ्यासात् आनन्दादयः प्रधानस्य अनर्थक्यमिति चेन्न तदपे. आनुमानिकमप्येकेषामिति आपः आप्रायणात्तत्रापि हि दृष्टम् आभास एव च आमनन्ति चैनमस्मिन् आविज्यमित्यो दुलोभिस्तस्मै हि आवृत्तिरसकृदुपदेशात् आसीनः संभवात् बहु च तन्मात्रम् इ. इतरपरामर्शात्स इति चेन्ना. इतरव्यपदेशाद्धिताकरणादि. इतरस्याप्येवमसंश्लेषः पाते. इतरेतरप्रत्ययत्वादिति चेन्नो. इतरेत्वर्थसामान्यात् इतरेषां चानुपलब्धेः इयदामननात् ई. ईक्षतिकर्मव्यपदेशात्सः