श्रीगणेशाय नमः।

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 101–110

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 101–110

पृष्ठ 101

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८६ चरकसंहिता [ अ ० ६ mv MNN 92 में कह चुके हैं । इस गर्भ की अगरचना मे सूत्रकार ऋषियो के बहुत प्रकार के मतभेद हैं । उन सब को भी नुनो - कुमारशिरा भरद्वाज का दर्शन है कि गर्भाशय में गर्भ का प्रथम शिर बनता है, क्योंकि यही शिर सब इन्द्रियो का आश्रय स्थान है । बाह्लीक भिकू काकायन का मत यह है कि सबसे प्रथम हृदय बनता है, क्योंकि हृदय ही चेतना का स्थान है । भद्रकाप्य का कथन है कि सबसे प्रथम नाभि बनती है क्योकि आहार प्राप्ति का यहा मार्ग है । भद्रशौनक का मत है कि प्रथम पक्काशय, गुदा बनती है, क्योकि यही वायु का स्थान है । डिश का कथन है कि प्रथम हाथ पात्र बनते हैं, क्योंकि ये ही पुरुष के करण ( सावन ) हैं । वैदेह जनक ऋषि का मत है कि इन्द्रियों सबसे प्रथम बनती है, क्योंकि ये इन्द्रियों हो बुद्धि ( ज्ञान ) का आश्रय स्थान हैं । मारीचि कश्यप का कहना है कि परोक्ष हान के कारण कौन सा अंग प्रथम बनता है यह कुछ नही कहा जा सकता, यह अचिन्त्य विषय है । धन्वन्तरि का मत है कि सब अग एक साथ मे बनते है । यह बात ठीक भी है । ऐसा ही प्रमाणो से सिद्ध होता है । गर्भ के सब अगों का तथा कुछ अन्य वस्तुओं का मूल आश्रयस्थान हृदय है । इसलिये इस हृदय से पूर्व अन्य अग नहीं बन सकते । अतः हृदय आदि सब अगो का निर्माण एक साथ में ही होता है । सब पदार्थ परस्पर एक दूसरे के साथ सम्बन्धित हैं | इसलिये यह यथार्थ दर्शन ( धन्वन्तरि का मत ) हीं ठीक है ॥ १ ९ ॥ गर्भस्तु खलु मातुः पृष्ठाभिमुख ऊर्ध्वशिराः संकुच्याङ्गान्यास्ते जरायुवृतः कुक्षौ ॥ २० ॥

गर्भाशय में गर्भ माता की पीठ की ओर मुख किये हुए रहता है । गर्भ का शिर ऊपर ( गर्भाशय के शिखर में ) रहता है और अङ्ग सकुचित अवस्था में रहते हैं || २० || व्यपगत पिपासा बुभुक्षस्तु खलु गर्भः परतन्त्रवृत्तिः, मातरमाश्रित्य वर्तयत्युपस्नेहोपस्वेदाभ्या गर्भस्तु सदसद्भूताङ्गावयवः, तदनन्तर ह्यस्य लोमकूपायनैरुपस्नेहः कश्चिन्नाभिनाड्ययनैः । नाभ्या ह्यस्य नाडी प्र-सक्ता, सा नाभ्या चापरा, अपरा चास्य मातुः प्रसक्ता हृदये, मातृहृदयं ह्यस्य तामपरामभिसम्प्लवते सिराभिः स्यन्दमानाभिः g स तस्य रसो बलवर्णकरः सपद्यते, स च सर्वरसवानाहारः स्त्रिया ह्यापन्नगर्भायास्त्रिधा रसः प्रतिपद्यते स्वशरीरपुष्टये स्तन्याय गर्भवृद्धये च स तेनाहारेणो-पष्टव्ध परतन्त्रवृत्तिर्मातरमाश्रित्य वर्तयत्यन्तर्गत. || २१ ||

पृष्ठ 102

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अ ० ६ ] शारीरस्थानम् ६८७ गर्भ को भूख प्यास का अनुभव नही होता । वह तो माता के आश्रित रहता है, इसीलिये पराधीन रहता है । जब तक अर्गों का निर्माण नहीं होता, वह माना के आश्रय में ही उपस्नेहन, उपस्वेदन द्वारा जीता है इसके अनन्तर अग प्रत्यग बन जाने पर लोम कूप के मार्गों से तथा नाभि नाड़ी के मार्ग से उपस्नेहन लेता है । इस गर्भ की नाभि से नाड़ी लगी होती है और यह नाड़ी नाभि में तथा आरा में लगी होता है । अनरा माता के हृदय ( गमाशय के ऊर्ध्व शिखर ) मे लगी रहती है । माता का हृदय इम अग की बहती हुई सिराओं द्वारा गर्भ तक पहुचता है [ माता के विचार इन सिराओ द्वारा बच्चे मे आते है ] । माता का यह रस गर्भ में बल वर्ण को उत्पन्न करता है । वह सब प्रकार के रसो से उत्पन्न होता है । जो गर्भवती स्त्री भोजन करती है, उसके आहार रस के तीन भाग हा जाते हैं । ( १ ) गर्भिणी के शरीर की पुष्टि के लिये ( २ ) दूध के लिये और ( ३ ) गर्भ को बढाने के लिये । यह गर्म इस आहार के आश्रय से पराधीन होकर माता के ऊपर निर्भर रह कर गर्भाशय मे जीवन धारण करता है | २१ ॥ स चोपस्थितकाले जन्मनि प्रसूति - मारुत - योगात्परिवृत्त्याऽबाकू शिरा निष्क्रामत्यपत्यपथेन । एषा प्रकृतिः, विकृतिः पुनरतोऽन्यथा । परं स्वतः स्वतन्त्रवृत्तिर्भवति ॥ २ ॥

प्रसव काल के समीर आने पर वायु के बल से शिर घूम कर नीचे की ओर सन्तान निकलने के मार्ग में आ जाता है और योनिमार्ग से बाहर निकल जाता है । यह तो प्रकृति है, इससे विपरीत अवस्था का नाम विकृति है । बाहर आने पर गर्भ स्वतन्त्र रूप से जीवन धारण करता है ॥ २२ ॥

तस्याऽऽहारोपचारौ जातिसूत्रीयोपदिष्टावविकारकरौ चाभिवृद्धि करौ भवतः । ताभ्यामेव च ( सेविताभ्या ) विषमाभ्यां जातः सद्यो हन्येत तरुरिवाचिरण्यपरोपितो वातातपाभ्यामप्रतिष्ठितमूलः ॥ २३ ॥

स्वतन्त्र वृत्ति होने पर जातिसूत्रीय ( शारीरस्थान अ ० ८ ) अध्याय में कहे हुए आहार और उपचार इसकी वृद्धि करते हैं और किसी प्रकार का रोग या विकार उत्पन्न नही करते । उत्पन्न हुआ शिशु आहार और उपचार के विषम होने से शीघ्र ही ऐसे मर जाता है जैसे कि तत्काल लगा हुआ वृश्च बिना जड़ पकड़े हुए वायु और धूप से शीघ्र नष्ट हो जाता है ॥ २३ ॥

आप्तोपदेशादद्भुत रूपदर्शनात्समुत्थान लिङ्ग चिकित्सित- विशेषाञ्चादो-प्रकोपानुरूपा देवादि प्रकोप - निमित्ता विकाराः समुपलभ्यन्ते ॥ २४ ॥

पृष्ठ 103

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चरकसंहिता [ अ ० ६ ब्रह्म आदि से प्रणीत कुमारतन्त्रों के आसोपदेश से, अमानुषीय बल, रूप आदि आश्चर्यकारक बातों के देखने से, समुत्थान ( रोगोत्पत्ति ) के कारणों के विशेष होने से, लक्षणों के विशेष तथा चिकित्मा में भेद होने से और दोप प्रकोप से हुए रोगों के विपरीत वर्मवाले लक्षणो को देवने से ज्ञात होता है कि देव आदि के प्रकोप में भी अनेक रोग गर्भ को होते है ॥ २४ ॥

कालाकालमृत्योस्तु खलु भावाभावयोरिदमध्यवसितं नः-- यः कचिन्त्रियते स काल एव म्रियते, न हि कालच्छिद्रमम्तीत्येके । तच्चा सम्यकू, न ह्यच्छिद्रता सच्छिद्रता वा कालस्योपपद्यते, कालस्वलक्षण. स्वभावात् । काल और अकाल मृत्युओं के होने न होने के विषय में हमारा यह निश्चित सिद्धान्त है कि ' जो काई मरता है, वह काल में ही मरता है । कइयों का विचार है कि काल मे कोई छेद ( अवकाश ) नहीं है जो कि इस अवकाश को प्राप्त करके मरे । " यह मत ठीक नहीं । काल में सच्छिद्रता या अच्छिद्रता नहीं है. क्योंकि काल के अपने लक्षण मे सच्छिद्रता या अच्छिद्रना नहीं घटती । तथा ss हुरपरे – यो यदा म्रियते स तस्य नियतो मृत्युकालः । स सर्वभूतानां सत्यः समक्रियत्वादिति । दूसरे विचारकों का कथन है कि जो जब मरता है वह उसका निश्चित काल होता है यह कालमृत्यु है । यह सब प्राणियों के लिये ठीक है, क्योकि काल सब प्राणियों में समान क्रियावाला है । काल से सभी मरते हैं काल को किसी में राग या द्वेष नहीं है । एतदपि च अन्यथाऽर्थग्रहणं, न हि कश्चिन्न म्रियत इति समक्रियः । काल ' पुनरायुषः प्रमाणमधिकृत्योच्यते । यस्य चेष्टं यो यदा म्रियते तम्य स नियतो मृत्युकाल इति, तस्य सर्वभावा यथास्वं नियतकाला भवि-यन्ति । तच्च नोपपद्यते - प्रत्यक्षं कालाहारवचनकर्मणां फलमनिष्टं विपर्यये चेम् । प्रत्यक्षतःचोपलभ्यते खलु कालाकालव्यक्तिमतासु तास्व वस्थासु तं तमर्थमभिसमीक्ष्य । तद्यथा - कालोऽयमस्य तु व्याघेराहा-रस्योषधस्य प्रतिकर्मणो विसर्गस्य चाकालो बेति । लोकेऽप्येतद्भवति काले देवो वर्षत्यकाले देवो वर्षति, काले शीतमकाले शीतं, काले तपत्य काले तपति, काले पुष्पफलमकाले च पुष्पफलमिति । तस्मादुभयमस्ति काले मृत्युरकाले च । नैकान्तिकं । यदि ह्यकाळे मृत्युर्न स्यान्नियत - काल-प्रमाणमायुः सर्व स्यात् । एवं गते हिताहितज्ञानमकारणं स्यात्प्रत्यक्षानु-

पृष्ठ 104

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अ ० ६ ] शारीरस्थानम् ह मानोपदेशाश्चाप्रमाणानि स्युर्ये प्रमाणभूताः सर्वतन्त्रेषु यैरायुष्यानायु-व्याणि चोपलभ्यन्ते । वाग्वस्तुमात्रमेतद्वादमृषयो मन्यन्ते यदुच्यते-नाकालमृत्युरस्तीति ॥ २५ ॥

यह भी पक्ष ठीक नहीं है । बिना काल के कोई नहीं मरता, इसलिये काल समान क्रियावाला है । ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि यहा पर ' काल ' शब्द आयु के प्रमाण की अपेक्षा से कहा है । जो यह मानता है कि जो मनुष्य जब मरता है । वही उसका नियत मृत्युकाल है, उसके मत में मृत्यु से अतिरिक्त आहार, वचन आदि भी सब नियत कालवाले हो जायेंगे । परन्तु ये ऐसे नहीं होते, क्योंकि यह प्रत्यक्ष है कि अकाल में किये भोजन तथा अकाल में कहे हुए वचन का फल बुरा होता है और समय पर किये भोजन तथा समय पर कहे वचन का फल अच्छा होता है और यह भी हम देखते है कि प्रत्येक अवस्था में काल और अकाल का विचार करते हैं । जैसे — यह इस रोग का समय है, यह आहार का समय है, यह औषध का समय है, यह प्रतिकर्म का काल है, यह विसर्ग काल है । इसी प्रकार यह रोग का, भोजन का, औषध का, प्रतिकर्म का और विसर्ग का समय नहीं है । लोक में भी ऐसा होता है । समय पर मेघ बरसता है, अकाल में भी बादल बरसता है । काल में शात और अकाल से भी शीत होता है । काल में सूर्य तपता हे और अकाल मे भी सूर्य तपता है । काल में फूल फल होते हैं और अकाल में भी फूल फल होते हैं । इसालेये दोनों ही बाते है, काल में भी मृत्यु है और अकाल में भी मृत्यु है एक ही बात ठीक नहीं है । यदि अकाल में मृत्यु न हो तो सब पुरुषों की आयु का समय और मान नियत होना चाहिये । इस प्रकार होने से हित अहित का ज्ञान निष्फल हो जाता है । प्रत्यक्ष अनुमान, आसोपदेश जा कि सब तन्त्रों में प्रमाणभूत हैं वे सब तथा आयुष्यकारक और अनायुष्यकारक सब बातें व्यर्थ हो जायेगी । ' अकाल मृत्यु नहीं है ' इस कथन को ऋषि लोग केवल कहने भर के लिये ही मानते हैं, वास्तव में इसमें कुछ सार या सत्यता नही है ॥ २५ ॥

वर्षशतं खल्वायुषः प्रमाणमम्मिन् काले ॥ २६ ॥

तस्य निमित्तं प्रकृतिगुणात्म संपत्सात्म्योपसेवनं चेति ॥ २७ ॥

इस कलियुग में आयु का परिमाण सौ साल है । इसका कारण उत्तम प्रकृति, उत्तम गुण, उत्तम आत्मा और उत्तम सात्म्य का सेवन है । [ उत्तम प्रकृति जैसे — सम वात आदि प्रकृति का होना, उत्तम गुण जैसे —- सार - सहनन आदि का होना, उत्तम आत्मा के धर्म, दान, यज्ञ आदि ] ॥ २६-२७ ॥

पृष्ठ 105

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चरकसंहिता [ अ ० ७

तत्र श्लोकाः शरीरं यद्यथा तच्च वर्तते क्लिटमामयैः ।

यथा क्लेशं विनाशं च याति ये चास्य धातवः ॥ २८ ॥

वृद्धिहासौ यथा तेषां क्षीणानामौषधं च यत् ।

देहवृद्धिकरा भावा बलवृद्धिकराव ये ॥ २६ ॥

परिणामकरा भावा या च तेषां पृथक क्रिया ।

मलाख्याः संप्रसादाख्या धातत्रः प्रश्न एव च ॥ ३० ॥

raat free विधिवत्त्रकाशितः ।

तथ्यः शरीरविचचे शारीरे परमर्षिणा ॥ ३१ ॥

शरीर जिस प्रकार से रहता है, जिस प्रकार से क्लेश या विनाश को प्राप्त होता है, शरीर के धातु, इन धातुओं की वृद्धि और हास क्षीण धातुओं का औषध, देह की वृद्धि करनेवाले और बल को बढ़ाने वाले कारण, परिणाम-कारक भात्र, इनकी पृथक् पृथक् क्रिया, मक और प्रसाद रूप धातु, नव प्रश्न तथा इन प्रश्नों का समुचित निर्णय ' शरीर विचय ' नामक अध्याय में परमर्षि आत्रेय ने प्रकाशित किया है ॥ २८-३१ ॥ इत्यनिवेशकृते तन्त्रं चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने शरीरविचय-शारीरं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

सप्तमोऽध्यायः ।

अथातः शरीरसंख्याशारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

ra इसके आगे ' शरीरसंख्या ' नामक अध्याय का व्याख्यान करते हैं जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ शरीरसंख्यामवयवशः ( कृत्स्नं ) शरीरं प्रविभज्य सर्व शरीर-संख्यान प्रमाण- ज्ञान हेतोर्भगवन्तमात्रेयमग्निवेशः पप्रच्छ ॥ ३ ॥

अग्निवेश ने भगवान् आत्रेय से सम्पूर्ण शरीर की संख्या, परिमाण और नाम आदि ज्ञान करने के लिये अवयव रूप में शरीर का विभाग करके शरीर - संख्या नाम शारीर प्रकरण के सम्बन्ध में प्रश्न किया तमुवाच भगवानात्रेयः - शृण मत्तोऽग्निवेश! सर्वशरीरमभिचक्षा-णाद्यथाप्रश्नमेकमना यथावत् ॥ ४ ॥

पृष्ठ 106

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अ ० ७ ] शारीरस्थानम् ६१ निवेश को भगवान आत्रेय ने कहा – हे अग्निवेश | सम्पूर्ण शरीर के प्रकरण को उपदेश करते हुए मुझ से अपने प्रश्न के अनुसार एकाग्र चित्त होकर सुनो ॥ ४ ॥

शरीरे षट् त्वचः । तद्यथा - उदकधरा त्वग्बाह्या, द्वितीया लग सृग्वरा, तृतीया सिध्म - किलाम सभवाधिष्ठाना, चतुर्थी दद्रुकुष्टलभत्रा-विष्टाना, पञ्चम्यलजी विद्रधी - मभवाविष्ठाना, पष्ठी तु यस्यां छिन्नाया ताम्यत्यन्ध इव च ' तमः प्रविशति या चाप्यनिष्ठायारूषि जायन्ते पर्वसु कृष्णरक्तान स्थलमूलानि दुश्चिकित्स्यतमानि चत पटू त्वचः । एताः पडङ्गं शरीरमवतत्य तिष्ठन्ति ॥ ५ ॥

शरीर की छः त्वचाए शरीर में छ त्वचाये हैं । जैसे - ( १ ) बाह्य त्वच उदकधारा जिसमें जल रहता है । ( २ ) दूसरा त्वचा असृग्धारा जिसमे रुधिर रहता है । ( ३ ) तीसरी त्वचा जो सिम, किलास आदि रागों की उत्पत्ति का आश्रय स्थान है । ( ४ ) चौय तचा जा दद्रु ( दाद ) और कुष्ठ ( कोढ ) रोग का आश्रय । ( ५ ) पाचवीं त्वचा जो अलजी और विद्रधिरोग का आश्र-यभूमि है । ( ६ ) छठी त्वचा जिसके कटन पर पुरुष मूर्छिन होता है और अन्वे की भाति अन्वकार में घुसता है - उस कुछ नहीं दीखता और जिस त्वचा का आश्रय लेकर अवयव सन्धियों में काले, लाल, स्थूल मूल वाले ऐसे व्रण उत्पन्न होते हैं जिनकी चिकित्सा करना बहुत कठिन होता है । ये छः त्वचायें छ. अगों वाले शरीर कोढ़ के रहती है ' ॥ ५ ॥

तत्रायं शरीरस्यानविभागः । तद्यथा - द्वौ बाहू, द्वे सक्थिनी, शिरो ग्रीवं, अन्तराधिरिति षडङ्गमङ्गम् ॥ ६ ॥

शरीर के छः अग- शरीर के अगों का विभाग इस प्रकार से है जैसे दो बाहुए, दो टार्गे, शिर, ग्रीवा और बीच का मध्य भाग, ये छः अग हैं ॥ ६ ॥

त्रीणि षष्ट्यधिकानि शतान्यस्थनां सह दन्तोलूखलनखैः । तद्यथा - द्वात्रिंशद्दन्ताः, द्वात्रिंशद्दन्तोळखलानि, विशतिर्नखाः विशतिः १ सुश्रुत में सात त्वचायें और ३०० अस्थिया मानीं हैं । २ षष्ठानि इति च पाठः । ३ ' द्वात्रिंशद्दन्ता, द्वात्रिंशद्दन्तोलूखलानि, विशतिर्नखाः, षष्टिः पाणिपादाङ्गु-ल्यस्थीनि विंशतिः पाणिपादशलाका, चत्वारि पाणिपादशलाकाधिष्ठानानि, द्वे पाष्ण्योरस्थिनी, चत्वारः पादयोर्गुल्फाः, द्वौ मणिको हस्तयोः, चत्वार्यरन्योरस्थीनि, चत्वारि जङ्घयो, द्वे जानुकपालिके, द्वावूरुनलको, द्वौ बाहुनलको, द्वावंसौ, द्वे

पृष्ठ 107

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६२ चरकसंहिता [ अ ० ७ A पाणिपादशलाकाः, चत्वार्यधिष्टानान्यासा, चत्वारि पाणिपादपृष्टानि, षष्टिरकुल्यस्थीनि, द्वे पाष्यः, द्वे कूर्चाधः, चत्वारः पाण्योर्मणिकाः, चत्वारः पादयोर्गुल्फाः, चत्वार्यरन्योरस्थीनि चत्वारि जडधयोः, द्वे जानुनोः द्वे कूर्परयो, द्वे ऊर्वोः द्वे बाहोः, सांसयोद्वे, द्वावक्षकौ, द्वे तानी, द्वे श्रोणिफलके, एक भगास्थि, पुसां मेढास्थि एक, त्रिकसंश्रि-adi गुदास्थि, पृष्ठगतानि पञ्चत्रिशत् 9 पञ्चदशास्थीनि प्रीवायां, द्वे जत्रणी, एक इन्वस्थि, द्वे हनुमूलबन्धने, द्वे ललाटे, द्वे अक्ष्णो ', गण्ड. , योर्भे, नासिकाया त्री'ण घोणाख्यानि, द्वयोः पार्श्वयोश्चतुर्विशति पञ्ज-रास्थीनि च पार्श्वकानि,, तावन्ति चैषा स्थालिकान्यर्बुदाकाराणि तानि द्विसप्ततिः, द्वौ शङ्खौ चत्वारि शिर कपालानि, वक्षसि सप्तदश, इति त्रीणि षष्ट्यधिकादि शतान्यस्थ्नामिति ॥ ७ ॥

तीन सौ साठ हड्डिया दात, दन्त कोशों और नखों को मिला कर इस शरीर मे तीन सौ साठ अस्थिया हैं । जैसे —३२ दात, ३२ दातो के उलू-खल ( कोश ), २० नख, २० हाथ और पावों की शलाकाएं, ६० हाथ पाव की अगुलियों की अस्थिया, ४ हाथ और पावों की पीठ की हड्डिया, ४ इन शला-काओं के आश्रयस्थान | ६० अगुलियों की हड्डिया, २ पाणियों ( एडियों ) की, २ कूर्चाध । ४ पावों में गुल्फ, २ हाथों के मणिक, ४ प्रकोष्ठ की अस्थियों, ४ टागो की अस्थिया, २ जानुकपाल, २ कूर्पर, २ जाघों की अस्थिया, २ बाहु की अस्थिया, २ कन्धे की अस्थिया, २ असफलक, २ अक्षक, २ तालु की अस्थिया, २ श्रोणिफलक ( कूल्हे की हड्डिया ), १ भगास्थि, १ पुरुषों के लिंग की अस्थि, त्रिक ( कूल्हों ) के नीचे का आश्रय रूप गुदा के पास १ अस्थि, ३५ पीठ की अस्थिया, १५ अस्थिया गर्दन में, २ जत्रु ( हसली ) की हड्डी, १ ठोड़ी की अस्थि, ठोड़ी के मूल में बाघने वाली, २ अस्थि, ललाट की २ अस्थिया, २ आँख की, २ कपोलों ( गालों ) की, ३ अस्थि नासिका में है जिनका नाम ' घोण ' है, दोनों पासों की २४ अस्थिया, पञ्जर की और पसुलिया, उतने ही उनके असफलके, द्वावश्चकौ, एक जत्रु, द्वे तालुषके, द्वे आणिफलके, एक भगास्थि, पञ्चचत्वारिंशत्पृष्ठगतान्यस्थीनि, पञ्चदश ग्रीवाया, चतुर्दशोरसि, द्वयोः पार्श्वयोश्च -तुर्विंशतिः, पार्श्वयोस्तावन्ति चैव स्थालकानि, तावन्ति चैव स्थालकार्बुदानि, एक हन्वस्थि, द्वे हनुमूलबन्धने, एकास्थि नासिकागण्डकूटललाट, द्वौ शङ्खौ चत्वारि शिरःकपालानीति, एव त्रीणि षष्ठानि शतान्यस्थना सह दन्तनखेनेति ' च पाठ. 1

पृष्ठ 108

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अ ० ७ ] शारीरस्थानम् ६३ ANN अर्बुद अर्थात् शंख प्रदेश मे २, शिर कपाल ४, वक्ष में १७, इस प्रकार से ३६० अस्थिया पूरी होती हैं । २४-२४ अर्बुद के २४ स्थालक हैं ये सब मिलाकर ७२ हैं ॥ ७ ॥

पञ्चेन्द्रियाधिष्ठानानि । तद्यथा - त्वग्, जिह्वा, नासिका, अक्षिणी, कर्णौ च ॥ ८ ॥

इन्द्रियों के आश्रय पाच हैं । जैसे - त्वचा, जिह्वा, नासिका, दो आख और दो कान ॥ ८ ॥

पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि । तद्यथा - स्पर्शन, रसन, प्राणं, दर्शनं श्रोत्रमिति ॥ ६ ॥

ये पाच बुद्धि इन्द्रिया हैं I । जैसे - स्पर्श, रसन, प्राण दर्शन और श्रोत्र ॥ ॥ पञ्च कमन्द्रियाणि । तद्यथा - हस्तौ पादौ, पायुरुपस्थो, जिह्वा चेति ॥ १० ॥

पाच कर्मेन्द्रिया हैं । यथा— दो हाथ, दो पाव, पायु ( गुदा ), उपस्थ ( लिंग ) और जिह्वा ॥ १० ॥

हृदय चेतनाधिष्ठानमेकम् ॥ ११ ॥

हृदय एक है, वह चेतना का स्थान है ॥ ११ ॥

दश प्राणायतनानि । तद्यथा - मूर्वा कण्ठो हृदयं नाभिः गुद बस्ति-रोजः शुक्र शोणितं मासमिति । तेषु षट् पूर्वाणि मर्मसंख्यातानि || १२ || प्राण के आयतन स्थान दस है । यथा - मूर्द्धा ( सिर ), कण्ठ, हृदय,

नाभि, गुदा ( मलाशय ), बस्ति ( मूत्राशय ), ओज, शुक्र, रक्त और मास ।

इनमें प्रथम छ मर्म गिने जाते है ॥ १२ ॥

पञ्चदश कोष्ठाङ्गानि । तद्यथा - नाभिश्व, हृदयं च, क्लोम च, यकृच्च, सीहा च, वृक्कौ च, बस्तिश्च पुरीषाधारच, आमाशयश्च पक्वाशयश्च, उत्तरगुद् च, अधरगुद् च, क्षुद्रान्त्र च, स्थूलान्त्र च वपावहनं चेति ॥ १३ ॥

कोष्ठ के पन्द्रह अग है । जैसे - नाभि, हृदय, क्लोम, यकृत, प्लीहा, बुक्क ( वृक्क, गुर्दे ) बस्ति, पुरोषाधार ( मलाशय ), आमाशय, पक्काशय, उत्तर गुदा, अधरगुदा, क्षुद्रान्त्र, बृहदात्र और वपावहन ॥ १३ ॥

* दश प्राणायतनीय अध्याय में दो शख, तीन मर्म, कण्ठ, रक्त, शुक्र, ओज और गुदा ये दस गिने हैं । नाभि और मास के गिनने से ये भी मर्म प्राणायतन मानने चाहियें । यहा पर शंख नहीं गिना ।

पृष्ठ 109

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६४ चरकसंहिता [ अ ० ७ AA षट्पञ्चाशत् प्रत्यङ्गानि षट्स्वपूपनिबद्धानि यानि यान्यपरिम-ख्यातानि पूर्वसङ्गेषु परिसंख्यायमानेषु तानि तान्यन्यैः पर्यायेरिह प्रकाश्य व्याख्यातानि भवन्ति । नद्यथा - द्वे जङ्घाण्डिके, द्वे ऊरु पिके, द्वौ द्वौ वृषणौ, एक शेफ, हे उखे, द्वौ वक्षणौ " द्वौ कुकुन्दरी, एकं बन्तिशीर्ष, एकसुटर, द्वौ स्तनौ द्वौ भुजौ ', द्वे बाहु-fufuse, चिकमेक, द्वाष्टो द्वे सृकियों, द्वो दन्तवेष्टकी, एकं तालु, एक गला, द्वे उपजिह्निके, एका गोजिह्निका, हो गण्डौ, द्वे कर्णशष्कुलिके, वो कर्ण पुनकौ, द्वे अक्षिकूटे, चत्वारि अक्षिवनि, अक्षिकनीनिके द्वे वो, एकोऽवटुः, चत्वारि पाणिपादहृदयानि ॥ १४ ॥

प्रत्यग ५६ है । ये प्रत्यंग उपरोक्त छ. अगों मे सम्बद्ध है । आगे कहें जाने वाले ५६ प्रत्यग पूर्वोक्त हाथ आदि छः पूर्व गिने हुए अङ्गं से सम्बद्ध है, उन अस्स्य प्रत्यगों को अन्य अन्य पर्य्यायों में कहा जाता है जैसे- दो जंघा की पिण्डिकायें, दो टागों की पिण्डिकाये, दो नितम्ब ( कूल्हे ), दो वृषण, एक हिंग, कक्षा के पावों में दो कक्षाये, दो वक्षण ( काखे ), दो कुकुन्दर ( नितम्ब के ऊपर उन्नत भाग ), एक बस्ति का शीर्ष, एक उदर, दो स्तन, कण्ठ के पार्श्व मे स्थित दो कठिन भाग, दो बाहु - पिण्डिकाये, एक ठोडो, दो ओंठ, दा सृक्किणी ( ओठो के प्रान्त ), दो मसूड़े, एक तालु, एक गल्शुण्डी, दो उपजि-ह्निका, एक गोजिह्निका, दो गण्ड, दो कर्ण - शष्कुली, दो कर्णपुत्रक ( कान का लटकन ), दो अचिकूट, चार आख के पलक, दो आख की कनीनिका, दो भ्रुवे, एक अवटु ( घाटा ), पाव और हाथ के चार तलुवें, ये ५६ प्रत्यग है ॥ १४ ॥

नव महान्ति छिद्राणि - सप्त शिरसि, द्वे चाधः, एतावद् दृश्यं शक्य-मभिनिर्देष्टुम् ॥ १५ ॥

नौ महान् छिद्र हैं । जैसे - सात शिर में ( दो आख, दो कान, दो नाक और एक मुख ) और दो छिद्र अधोभाग में ( गुदा और उपस्थ के ) । ये त्वग्

आदि प्राय. सब आखों से दीखते हैं । इनको स्पष्ट बतलाया जा सकता है ॥ १५ ॥

अनिर्देश्यमतः परं तर्क्यमेव । तद्यथा - नव स्नायुशतानि सप्त सिराशतानि द्वे धमनीशते, चत्वारि पेशीशतानि सप्तोत्तरं मर्मशत, द्वे पुनः संधिशते, एकोनत्रिशत्सहस्राणि नव च शतानि षट्पञ्चाश-कानि सिराधमनीनामणुशः प्रविभज्यमानानां मुखाग्रपरिमाणं तावन्ति १. ' द्वौ श्लेष्मभुवौ ' इति च पाठः । २ ' एकोनत्रिंशत् ' इति च पाठः ।

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अ ० ७ ] शारीरस्थानम हह्यू चैव केश. श्मश्रु- लोमानीत्येतद्यथावद्यत्संख्यात त्वक्प्रभृति दृश्यं, अत. पर तर्क्यम् । एतदुभयमपि न विकल्प्यते प्रकृतिभावाच्छरीरस्य ॥ १६ ॥

इसके आगे जो देखी नहीं जा सकतीं, वा दिखलाई नही देती ये सब अनि देश्य हैं । अत उनको अनुमान द्वारा ही जाना जाता है । जैसे- ९ ०० स्नायु, ७०० सिराये, २०० धमनिया, ४०० पेशिया, १०७ मर्म, २०० सन्धिया, २६-१५६ सिरा - धमनियों के मुखो के अग्रभाग और इतने ही २६६५६ वेश, श्मश्रु और शरीर के बाल हैं । ये यहा ठीक २ प्रकार से गिना दिये गये । इनसे त्वचा आदि दृश्य है । इसमे आगे सब अनुमान गम्य हैं । यह दृश्य और तर्क्स दोनों प्रकार का मान शरीर के अविकृत होने से विकल्पित नहीं होता । शरीर के विकृत होने पर त्वचा आदि का मान भी विकृत हो जाता है ॥ १६ ॥

यन्त्वञ्जलिमख्येय तदुपदेक्ष्यामः, तत्पर प्रमाणमभिज्ञेय, त वृद्धि ह्रास - योगि, तर्क्यमेव । तद्यथा- -दशोदकस्याञ्जलयः शरीरे स्वेना-ञ्जलिप्रमाणेन यत्तत् प्रत्यवमानं पुरीषमनुवन्नात्यति योगेन तथा मूत्र रुधिरमन्यश्च शरीरधातून, यत्तत् सर्वशरारचरं वाह्यात्वग्विभति, यत्तु त्वगन्तरे व्रणगतं लसीकाशब्द लभते 9 यच्चोष्मणाऽनुबद्ध, लोमकू पेभ्यो निष्पतत्स्वेदशब्दमवाप्नोति, तदुदकं दशाञ्जलिप्रमाणम् । नवाज-लय: पूर्वस्या ss हार - परिणाम धातोर्य त रस इत्याचक्षते, अष्टौ शोणि-तस्य, सप्त पुरीषस्य, षट् श्लेष्मणः, पञ्च पित्तस्य चत्वारो मूत्रस्य, त्रये वसायाः, द्वौ मेदसः, एको मज्ज्ञ, मस्तिष्कस्यार्धाञ्जलिः, शुक्रस्य ताव-देव प्रमाणं तावदेव श्लेष्मण्वौजस इत्येतच्छरीरतत्वमुक्तम् ॥ १७ ॥

शरीर में जो वस्तु अञ्जलि से मापने योग्य है उसका वर्णन करते हैं । इस परिणाम की वृद्धि या ह्रास भी अनुमान द्वारा ही जाना जाता है । प्रत्येक मनुष्य की अपनी अञ्जलि की अपेक्षा से शरीर के अन्दर उदक की मात्रा दस अञ्जलिया है । यह जल अधिक होने पर पुरीष के साथ, मूत्र, रक्त और शरीर के अन्य धातुओं के साथ मिल कर बाहर आता है और जो जल त्वचा के अन्दर व्रण में पहुचाता है, उसे ' लसीका ' कहते है और जो जल शरीर की गरमी के साथ मिल कर लोम कूपों से निकलता है, उसे ' स्वेद ' कहते हैं । यह सब जल दस अजलि परिमाण है । आहार के प्रथम परिणाम धातु रस की नौ अजलिया हैं । रक्त की आठ अजलिया है । मल की सात, कफ की छः, पित्त की पाच, मूत्र की चार, वसा की तीन, मेद की दा मज्जा की एक, मस्तिष्क की आधी अंजलि, शुक्र की भी आधी अजल और