श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 91–100
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 91–100
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७६ चरकसंहिता [ अ ० ५ ^^^ मिलने से प्राप्त द्वेष आदि का निग्रह करना, सोने, बैठने, चलने, देखने, आहार, विहार, अंग, प्रत्यग आदि की चेष्टाओं में ' मैं कौन हूँ ' किस लिये तप करता हॅू । ऐसा स्मरण करके प्रवृत्त होना, सत्कार, स्तुति आदि मे प्रसन्न न होना, निन्दा और अपमान में क्रोषित न होकर उनको सहना, भूख, प्यास, मेहनत, थकान, शीत, गरमी, वर्षा, वायु, सुख, दु: ख आदि को सहन करने की शक्ति का होना, शोक, दीनता, मान, उद्वेग, मद, लोभ, राग, ईर्षा, भय और क्रोध मे चलायमान न होना, उनसे अवीर न होना, अलकार आदि वस्तुओं को अनिष्टकारी विघ्न जानना | लोक और पुरुष दोनों में सृष्टि की आदि मे ही समानता को देखना, कार्य का समय न बीत जाये इसमें भय मानना, योगक्रिया मे कभी उदासीन न रहना, प्रत्युत सदा तत्पर रहना, आलस्य न करना, अपवर्ग के लिये सत्त्व और उत्साह रखना, धी ( बुद्धि ), धृति ( धैर्य ) और स्मृति का बल बढाते रहना, बाह्य विषयों से इन्द्रियों को रोकना, चिन्ता आदि विषयों से चित्त को रोकना, सुख दुख आदि विषयों से आत्मा को रोकना, बार बार धातुभेद मे शरीरावयवों, रस, मल, स्नायु आदि अवयवों का ठीक २ ज्ञान करना, ( जिससे वैराग्य हो ), आत्मा से अतिरिक्त उत्पन्न होने वाले सब पदार्थ दुखों के कारण और अनित्य है यह ज्ञान करना, सब प्रकार की प्रवृत्ति को पाप जानना, सब प्रकार के त्यागों में सुख मानना, यह मार्ग अपवर्ग के लिये है । इस मार्ग से विपरीत चलने पर पुरुष बन्धन मे बघ जाता है । ये अभ्युदय के साधन अर्थात् मोक्ष के उपाय कह दिये गये हैं । १० ।
भवन्ति चात्र - एतैरविमलं सत्त्वं शुद्ध पार्थैर्विशुध्यति ।
मृज्यमान इवाऽऽदर्शस्तैल- चैल- कचादिभिः ॥ ११ ॥
ग्रहाम्बुद- रजो धूम - नीहारैरसमावृतम् ।
यथार्कमण्डलं भाति भाति सत्त्वं यथाऽमलम् ॥ १२ ॥
ज्वलत्यात्मनि संरुद्धं तत्सत्त्व संवृतायने ।
शुद्धः स्थिर प्रसन्नाचिर्दीपो दीपाशये यथा ॥ १३ ॥
जिस प्रकार तैल, वस्त्र और हाथ आदि से साफ करने पर दर्पण चमक उठता है, उसी प्रकार इन शुद्धि के उपायों से मलिन सत्त्व ( चित्त ) भी शुद्ध हो जाता है । जिस प्रकार कि राहु, बादल, धूल, धुवा या बर्फ से रहित सूर्य-विम्ब चमकता है, उसी प्रकार शुद्ध सत्त्व भी प्रकाशित होता है । जिस प्रकार सव ( चित्त ) को पाच इन्द्रियों हो ढापती हैं, उसी प्रकार सूर्य को भी राहु आदि पाच वस्तुएँ आवृत करती हैं । जिस प्रकार सुरक्षित घर में दीपक की
G धूमेना ss व्रियते वह्निः यथाऽऽदशों मलेन च ।
यथोवेना ss वृतो गर्भ तथा तेनेदमावृतम् ॥
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अ ० ५ ] शारीरस्थानम् GO ज्योति शुद्ध, स्थिर और प्रसन्न होकर जलती है, उसी प्रकार इन्द्रियों से असक्क आत्मा में नियमित सत्त्व शुद्ध स्थिर होकर प्रकाशित होता है ॥११- १३ ॥
शुद्धसत्त्वस्य या शुद्धा सत्या बुद्धिः प्रवर्त्तते ।
यया भिनत्यतिबल महामोहमयं तमः ॥ १४ ॥
सर्वभावस्वभावज्ञो यया भवति निस्पृहः ।
योग यया साधयते सांख्यः सपद्यते यया ॥ १५ ॥
यया नोपत्यहङ्कारं नोपास्ते कारण यया ।
यया नालम्बते किंचित्सर्वं संन्यस्यते यया ॥ १६ ॥
याति ब्रह्म यया नित्यमजरः शान्तमक्षरम् ' ।
विद्या सिद्धिर्मतिर्मेधा प्रज्ञा ज्ञान च सा मता ॥ १७ ॥
शुद्धसत्व से जो निर्मल सत्य बुद्धि उत्पन्न होती है, जिस बुद्धि के द्वारा अति बलवान् महा मोहयुक्त अन्धकार का नाश करता है, जिसके द्वारा सब पदार्थों के स्वभाव को जानता है, जिसके द्वारा वह निःस्पृह बनता है, जिसके द्वारा विषयों से हटे मन को आत्मा में लगाकर ' योग ' करता है और जिस बुद्धि क द्वारा वह तत्त्वज्ञानी बनता है । जिसके द्वारा वह अहकार के वश नहीं होता, जिसके द्वारा सुख दुःख के कारणों का सेवन नहीं करता, जिसके द्वारा कहीं भी आश्रय - स्थान नहीं बनाता, जिसके कारण सब कुछ त्याग करता है, जिसके द्वारा नित्य, अजर, शान्त, अव्यय ब्रह्म - मोक्ष को प्राप्त करता है, उसी बुद्धि को विद्या, सिद्धि, मति, मेघा अर्थात् प्रज्ञा और ज्ञान नाम से कहते हैं ॥ १४-१७ ॥
लोके विततमात्मान लोकं चाऽऽत्मनि पश्यतः ।
परावरदृशः शान्तिर्ज्ञानमूला न नश्यति ॥ १८ ॥
लोक में अपने आत्मा को, तथा अपने आत्मा में लोक को देखनेवाले, तथा परमात्मा और अवर प्रकृति ( प्रवान प्रकृति ) आदि को देखनेवाले पुरुष में ज्ञान के द्वारा उत्पन्न हुई शान्ति कभी नष्ट नही होता ॥ १८ ॥
पश्यतः सर्वभावान् हि सर्वावस्थासु सर्वदा ।
ब्रह्मभूतस्य संयोगो न शुद्धस्योपपद्यते ॥ १६ ॥
सब अवस्थाओं में, सब भावों पदार्थों को देखते हुए इनमें राग और द्वेष न करने से समबुद्धि रहने के कारण ब्रह्म रूप हुए शुद्ध सत्त्व के साथ [ धर्म और अधर्म का ] सयोग नहीं होता ॥१६ ॥
१. शान्तमव्ययम् इति च पाठ । २ ' सर्व भूतानि ' इति च पाठः ।
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७८ चरकसंहिता [ अ ० ६
नाऽऽत्मनः कारणाभावाल्लिङ्गमप्युपलभ्यते ।
स सर्वकारणत्यागान्मुक्त इत्यभिधीयते ॥ २० ॥
मुक्त पुरुष के इन्द्रिय आदि करण न होने से मुक्त पुरुष नहीं मिलता । इस मुक्तात्मा पुरुष के साथ मन, इन्द्रिय आदि नहीं होता, इसीलिये उसको ' मुक्त ' कहते हैं ॥ २० ।
विपापं विरजः शान्तं परमक्षरमव्ययम् ।
अमृत ब्रह्म निर्वाणं पर्यायैः शान्तिरुच्यते ॥ २१ ॥
एतत्तत्सौम्य । विज्ञान यज्ज्ञात्वा मुक्तसंशयाः ।
मुनय. प्रशमं जग्मुर्वीत- मोह- रजः - स्पृहाः ॥ २२ ॥
का कोई लक्षण करणों का योग विपाप ( पापरहित ), विरज ( रजोगुण से रहित ), शान्त, पर, अक्षर, अव्यय, अमृत, ब्रह्म, निर्वाण, शान्ति इत्यादि पर्य्यायों से मोक्ष को कहते हैं । हे सौम्य! जिस विज्ञान को जान कर सशय, मोह, रज और स्पृहा से रहित होकर मुनि लोगों ने शान्ति प्राप्त की है वह यही विज्ञान है ॥ २२ ॥
तत्र श्लोकौ - सप्रयोजनमुद्दिष्टं लोकस्य पुरुषस्य च ।
सामान्यं मूलमुत्पत्तौ निवृत्ती मार्ग एव च ॥ २३ ॥
शुद्धसन्वसमाधानं सत्या बुद्धिश्व नेष्ठिकी ।
विचये पुरुषस्योक्ता निष्ठा च परमर्षिणा ॥ २४ ॥
लोक और पुरुष की समानता, इस समानता का प्रयोजन, उत्पत्ति का कारण, निवृत्ति का मार्ग, शुद्ध सत्त्व का रूप, मोक्षसाधक सत्यबुद्धि और मोक्ष का रूप, यह सब परमॠषि आत्रेय ने इस ' पुरुष विचय ' अध्याय में कह दिया है || २३-२४ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने पुरुष-विचयशारीर नाम पञ्चमोऽध्याय ॥ ५ ॥
षष्ठोऽध्यायः ।
अथातः शरीरविचय शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे ' शरीर - विचय ' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
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अ ० ६ ] शारीरस्थानम् ७६ शरीरविचयः शरीरोपकारार्थमिष्यते भिषग्विद्याया ज्ञात्वा हि शरीरसत्व शरीरोपकार करेषु भावेषु ज्ञानमुत्पद्यते । तस्माच्छरीरवि-चच प्रशसन्ति कुशलाः ॥ ३ ॥
शरीर का विचय अर्थात् ग्चनाविज्ञान ( प्रविभाग रूप से शान ) शरीर के उपकार के लिये आवश्यक है । शरीर का यथार्थं तत्त्व जान कर हा शरीर के लिये उपयोगी पदार्थों में ज्ञान उत्पन्न होता है । इसलिये बुद्धिमान् शरीर के रचनाविज्ञान को श्रेष्ठ बतलाते हैं ॥ ३ ॥
तत्र शरीरं नाम चेतनाधिष्ठानभूतं पञ्चभूतविकार समुदायात्मकं समयोगवाहि । यदा ह्यस्मिन् शरीरे धातवो वैषम्यमापद्यन्ते तदा क्लेश विनाश वा प्राप्नोति । वैषम्यगमनं हि पुनर्धातूना वृद्धि हास-गमनमकार्त्स्न्येन प्रकृत्या च ॥ ४ ॥
इसमे शरीर शब्द से अभिप्राय आत्मा ( चेतना ) के आश्रय स्थान, पच महाभूतों के विकारों का समुदाय तथा वातुओं के उचित प्रमाण में ( समयोग में ) मेल को धारण करने वाला शरीर है 1 । जिस समय इस शरीर के भीतर रस, रक्त आदि वातु विषम हो जाते हैं, उस समय शरीर में क्लेश होता है, अथवा शरीर विनष्ट हो जाता है । धातुओं मे सम्पूर्ण रूप में अथवा एकाश में वृद्धि और ह्रास होना ' धातुओं का विषम होना ' कहाता है ॥ ४ ॥
यौगपद्येन तु विरोधिनां धातूनां वृद्धिहासो भवतः । यद्धि यस्य धातोर्वृद्धिकरं तत्ततो विपरीतगुणस्य धातोः प्रत्यवायकरं संपद्यते ॥५ ॥।
उपयुक्त भैषज्य से परस्पर विरोधी धातुओं की वृद्धि और हास एक साथ होता है । जो औषध जिस धातु की वृद्धि करने वाली है वह औषध उस घातु से विपरीत गुणवाली धातु मे ह्रास करती है । [ जैसे -- दूध, कफ और शुक्र आदि की वृद्धि करता है साथ ही अपने से विरोधि गुणवाले पित्त और रक्त का ह्रास भी करता है । वहीं २ सजातीय होकर गुण विपरीत होने से धातु का ह्रास करता है जैसे—- गोमूत्र द्रव होकर भी कटु उष्ण है वैसे कफ-नाशक भी है ] ॥ ५ ॥
तदेवं तस्माद्वेषजं सम्यगवचार्यमाणं युगपन्न्यूनातिरिक्तानां धातूना साम्यकरं भवति । अधिकमपकर्षति " न्यूनमाप्याययति ॥ ६ ॥
इसलिये भली प्रकार से प्रयोग की हुई औषध एक समय में ही न्यून तथा बढी हुई धातुओं को समान करती है और बढ़ी हुई धातु को कम करती है और कम हुए धातु को बढ़ाती है ॥ ६ ॥
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८० चरकसंहिता [ अ ० ६ ww ww wwwwww V VL एतावदेव हि भैषज्यप्रयोगे फलमिष्ट स्वस्थवृत्तानुष्ठाने च यावद्धा-तूनां साम्यं स्यात् । स्वस्था ह्यपि धातूना साम्यानुग्रहार्थमेव कुशला रसगुणानाहारविकाराश्च पर्यायेणेच्छन्त्युपयोक्तुं सात्म्यसमाज्ञाताने क प्रकारभूयिष्ठांश्चोपयुञ्जानास्तद्विपरीतकर समाज्ञातया चेष्टया सममिच्छ-न्ति कर्तुम् ॥ ७ ॥
औषध प्रयोग तथा स्वस्थ वृत्त के पालने का यही फल है कि धातुओं की समानता रहे । बुद्धिमान् पुरुष स्वस्थ अवस्था में भी धातुओं में समता रखने के लिये मधुरादिरस, गुरु आदि गुणों को तथा यवागू आदि आहार के विकारों का क्रम से उपयोग करते हैं । अर्थात् मधुर रस खाने से उत्पन्न हुए कफ की वृद्धि को शान्त करने के लिये कटु रस आदि का उपयोग करते हैं । गुरु आदि गुण के पदार्थो के सेवन के पीछे लघु गुण वाले पदार्थों का उपयोग, यवागू ( लप्सी ), आदि खा कर इसके पाक के लिये पेया आदि का उपयोग करते हैं, यह क्रम है । सात्म्य ( अनुकूल ) रूप से जाने गये अनेक प्रकार के वा बहुत से पदार्थों का उपयोग करते हुए उससे विपरीत गुण करनेवाली चेष्टा से पुनः समान करने की इच्छा करते है । [ जमे - मधुर प्रकार के आहार को खाने से मधुर के समान कफ की वृद्धि होने से कफ का क्षय करनेवाली विपरीत व्यायाम
क्रिया करते हैं । इससे समानता आ जाती है ] ॥ ७ ॥
देश - कालात्म - गुण - विपरीतानां हि कर्मणामाहारविकाराणा च क्रियोपयोगःसम्यक् सर्वातियोगसधारणमुदीर्णाना च गतिमता साहसाना ' च वर्जन स्वस्थवृत्तमेतावद्धातूना साम्यानुग्रहार्थमुपदिश्यते ॥ ८ ॥
संक्षेप में स्वस्थवृत्त —— देश विपरीत कर्म ( मरु देश में सोना ), काल विप-रीत कर्म ( वसन्त में व्यायाम ), आत्म विपरीत कर्मों ( स्थूल शरीर मे व्यायाम, जागरण आदि ) तथा आहार - विकारों की क्रियाओं का ठीक प्रकार से उपयोग, काल, बुद्धि और इन्द्रियों के अर्थो के मिथ्यायाग ( अतियोग, मिथ्यायोग तथा अयोग ) का परित्याग, गतिशील मल ( पाखाना ), आदि के उपस्थित बेगों को न रोकना, साहसिक कर्मों का परिस्याग करना यह स्वस्थवृत्त है । यह स्वस्थ-वृत्त धातुओं की समानता के लिये हो उपदेश किया जाता है ॥ ८ ॥
धातवः पुनः शारीराः समानगुणैः समानगुणभूयिष्ठैर्वाऽप्याहारवि-हारैरभ्यस्यमानैवृद्धिं प्राप्नुवन्ति, ह्रास तु विपरीत गुणैर्विपरीतगुणभू-यिष्ठैर्वाऽप्यभ्यस्यमानैः ॥ ६ ॥
धातु अपने समान गुणों से तथा अपने अधिक समान गुणवाले आहार विहार के निरन्तर सेवन करने से बढ़ते हैं और अपने विपरीत गुणों से तथा
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अ ० ६ ] ६ शारीरस्थानम् ८१ अपने अधिक विपरीत गुणवाले आहार - विहार के निरन्तर सेवन से शरीर के धातु घटते हैं ॥ ६ ॥
तत्रेमे शरीरधातुगुणाः संख्यासामर्थ्यकराः । तद्यथा - गुरु लघु - शी-तोष्ण - स्निग्ध- रूक्ष- मन्द- तीक्ष्ण स्थिर - सर - मृदु- कठिन- विशद - पिच्छिल-ऋक्ष्ण - खर - सूक्ष्म - स्थूल - सान्द्र - द्रवाः । तेषु ये गुरवस्ते गुरुभिराहारगुणैरभ्य-स्यमानैराप्याय्यन्ते लघवश्च हसन्ति, लघवस्तु लघुभिराप्याय्यन्ते गुर-वच सन्ति । एवमेव सर्वधातुगुणानां सामान्ययोगाद् वृद्धिर्विपर्ययाद् ह्रासः । एतस्मान्मासमाप्याय्यते मांसेन भूयम्तरमन्येभ्यः शरीरधातुभ्य., तथा लोहितं लोहितेन, मेदो मेदसा, वसा वसया, अस्थि तरुणास्थ्ना, मज्जा मज्ञा, शुक्रं शुक्रेण, गर्भस्त्वामगर्भेण ॥। १० ॥ शरीर धातुओं के गुण, सख्या ( गणना ), तथा सामर्थ्य करने वाले हैं । जैसे — गुरु, लघु, शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, मन्द, तीक्ष्ण, स्थिर, सर, मृदु, कठिन, विशद पिच्छिल, इलक्ष्ण, खर, स्थूल, सान्द्र और द्रव । इनमें जो गुण गुरु हैं वे गुरु आहार के गुणो के निरन्तर सेवन करने से बढ़ते हैं और लघु गुणों को घटाते हैं । जो लघु गुण हैं वे लघु आहार के गुणों से निरन्तर बढ़ते है और गुरु गुणों को घटाते हैं । इसी प्रकार सब धातुओं के गुण अपने समान गुणों के योग से बढ़ते हैं और अपने विपरीत गुणों से कम होते है । इसलिये शरीरस्थ मास धातु मास से अन्य सब शरीर धातुओं की अपेक्षा अधिक बढ़ता है । इसी प्रकार रक्त, रक्त से अधिक बढ़ता है । मेद मेद से, वसा वसा से, अस्थिया तरुणास्थियों से, मज्जा मज्जा से, शुक्र शुक्र से, गर्भ आमगर्भ से अधिक बढता है ॥ १० ॥
यत्र त्वेवंलक्षणेन सामान्येन सामान्यवतामाहारविकाराणामसा निध्यं स्यात्, सनिहितानां वाऽप्ययुक्तत्वान्नोपयोगो घृणित्वादन्यस्माद्वा कारणात्, स च धातुरभिवर्धयितव्यः स्यात् । तस्य ये समानगुणाः स्युराहारविकारा असेव्याश्च तत्र समानगुणभूयिष्ठानामन्यप्रकृतीनाम-प्याहारविकाराणामुपयोगः स्यात् । तद्यथा - शुक्रक्षये क्षीरसर्पिषोरुपयोगो मधुर - स्निग्ध- समाख्यातानां चापरेषामेव द्रव्याणा, मूत्रक्षये पुनरिक्षुरस - वारुणी मण्ड - द्रव - मधुराम्ल-लवणोपक्लेदिनां पुरीषक्षये कुल्माष- माष कुष्कुण्डाज मध्य - यव शाक-धान्याम्लानां वातक्षये कटुक- तिक्तकषाय- रूक्ष- लघु - शीतानां पित्तक्ष-येऽम्ल लवण - कटुक - क्षारोष्ण तीक्ष्णानां श्लेष्मक्षये स्निग्ध - गुरु - मधुर-
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८२ चरकसंहिता [ अ ० ६ ^ सान्द्र - पिच्छिलाना द्रव्याणाम् । कर्मापि च यद्यद्यस्य धातोर्वृद्धिकरं तन्त-दासेव्यम् । एवमन्येषामपि शरीरधातूना सामान्यविपर्ययाभ्या वृद्धिहासौ यथाकालं काय । इति सर्वधातूनामेकैशोऽतिदेशतश्च वृद्धिराणि व्याख्यातानि भवन्ति । ११ ॥ समान गुणवाले विजातीय पदाथो मे वृद्ध - जहा पर कि इस प्रकार के लक्षणों वाले समान गुण के आदान विकारों का प्राप्त होना सम्भव न हो, अथवा प्राप्त होने पर भी घृणा आदि के कारण अथवा धर्म आदि के कारण उपयोग करने में बाधा पड़ती हो वहा पर विजातीय समान गुण के आहार विकारों का उपयोग करना चाहिये । जिससे कि इच्छित धातु [ जिसके लिये समान गुण वाले आहार विकार घृणा अथवा धर्म के कारण असेश्य हैं उस धातु? की वृद्धि हो । जैसे— शुक्र का क्षय होने पर दूध और घी का उपयोग, तथा मधुर और स्निग्ध विजातीय दूसरे पदार्थों का उपयोग करना । मूत्र का क्षय होने पर गन्ने का रस, वारुणी, मण्ड तथा कुल्माष, उड़द, कुष्कुण्ड ( साप की छतरी ), बकरी का मध्य भाग, जौ, शाक, धान्य और अम्ल आदि वस्तुओ का उपयोग करना चाहिये । वात का क्षय होने पर कटु, तिक्त, कषाय, रूक्ष, लघु, शीत वस्तुओं का उपयोग करना चाहिये । पित्त का क्षय होने पर अम्ल, लवण, कटु. क्षार उष्ण, तीक्ष्ण वस्तुओं का और कफ का क्षय होने पर स्निग्ध, गुरु, मधुर, सान्द्र और पिच्छिल द्रव्यों का उपयोग करना चाहिये । द्रव्यो की भाति धातु की वृद्धि करनेवाले समान गुण के अचिन्त्य प्रभाव रूपी कर्म का भी उपयोग करना चाहिये | इसी प्रकार से अन्य शरीर धातुओं को भी सामान्य और विपर्य्यय द्वारा समयानुसार बढाना अथवा घटाना चाहिये । इस प्रकार से सब धातुओं के पृथक् पृथक् तथा समग्र रूप में वृद्धि तथा ह्रास के कारणों की व्याख्या कर दी गई है ॥ ११ ॥
कार्त्स्न्येन शरीरवृद्धिकरास्त्विमे भाग भवन्ति । तद्यथा - काल-योगः, स्वभावसंसिद्धिः, आहारसौष्ठवमविघातश्चेति । कलवृद्धिकरा-स्त्विमे भावा भवन्ति । तद्यथा - बलवत्पुरुषे देशे जन्म, बलवत्पुरुषे काले च । सुखश्च कालयोगो, वीज क्षेत्र- गुण संपश्चाऽऽहारसंपथ, शरीरसं-पञ्च, सात्म्यसपञ्च, सत्त्वसंपञ्च, स्वभावसंसिद्धिश्च यौवन च, कर्म च, सहर्षश्चेति ॥ १२ ॥
निम्न बातें सम्पूर्ण रूप में सारे शरीर की वृद्धि करते है । जैसे - वृद्धिका -रक यौवनादि का समय, स्वभाव, अर्थात् अदृष्ट के कारण वृद्धि, उत्तम आहार और अविघात ( अतिव्यवाय या मनोविघात आदि का न होना ),
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अ ० ६ ] शारीरस्थानम ८३ ये वस्तुऐ सम्पूर्ण शरीर में वृद्धि करती है । निम्न बाते शरीर में बल की वृद्धि करती हैं । जैसे – बलवान् पुरुषों वाले देश में उत्पन्न होना, बलवान् माता पिता में, बलवान् काठ हेमन्त या शिशिर में उत्पन्न होना । साधारण समय का योग, बीज, शुक्र, क्षेत्र, आर्त्तव और गर्भाशय के उत्तम गुण, उत्तम गुणयुक्त आहार, उत्तम शरीर, उत्तम सात्म्य, उत्तम सत्व, स्वभाव से सिद्धि अर्थात् स्वभावत. शरीर की अदृष्टवच उत्तम बढती वा बल को उत्पन्न करने वाले कर्म का सेवन, यौवनावस्था और व्यायाम आदि कर्म इनसे बल उत्पन्न होता है ॥ १२ ॥
आहारपरिणामकरास्त्विमे भावा भवन्ति । तद्यथा - ऊष्मा वायु. क्लेद स्नेहः कालः समयोगश्चेति । तत्र तु खल्वेषामूष्मादीनामाहारप-रिणामकराणां भावानामिमे कर्मविशेषा भवन्ति । तद्यथा – ऊष्मा पचति, वायुरपकर्षति, क्लेदः शैथिल्यमापादयति, स्नेहो मार्दव जनयति, कालः पर्याप्तिमभिनिर्वर्त्तयति, समयोगस्त्वेषा परिणामधातुसाम्यकरः संपद्यते ॥ १३ निम्न बाते स्नेह, पाक काल उत्पन्न करता है खित कार्य करते दूर स्थित भोजन करता है | स्नेह ॥ आहार को पचाने वाली हैं । जैसे- उष्णिमा, वायु, क्लेद, और प्रकृति आदि आठ बातो का समयोग आहार सम्पत् को । आहार को भली प्रकार पचाने में उष्णिमा आदि निम्नलि-हैं । जैसे- उष्णिमा भोजन को पचाती है । वायु उष्णिमा से को उष्णिमा के पास लाता है । क्लेद शिथिलता को उत्पन्न
कोमलता को पैदा करता है । समय तृप्ति को पैदा करता है ।
समयोग इनमें परिणाम तथा धातुओं की समता को उत्पन्न करता है ॥ १३ ॥
परिणामतस्त्वाहारस्य गुणा शरीरगुणभावमापद्यन्ते यथास्वमवि-रुद्धाः विरुद्धा विहन्युर्विहताच विरोधिभिः शरीरम् ॥ १४ ॥
आहार के परिपाक होने पर भोजन के गुण अपने समान शरीर के गुणों में बदल जाते हैं । जैसे - आहार का कठिन भाग मास, अस्थि आदि शरीर के कठिन भाग का पोषण करता है और द्रव भाग रक्त आदि रूप में बदल जाता है । शरीर गुणो के विरोधी आहार - गुण विरुद्ध गुणों को नष्ट करते हैं । इस प्रकार से नष्ट हुए गुण शरीर को नष्ट कर देते हैं । [ जैसे- दूब और मछली आदि विरुद्ध आहार के कारण नष्ट हुए गुण शरीर को नष्ट कर देते है ] ॥ १४ ॥
शरीरधातवः पुनर्द्विविधाः संग्रहेण - मलभूताः प्रसादभूताश्च । तत्र मलभूतास्ते ये शरीरस्य आबाधकराः स्युः । तद्यथा - शरीरच्छिद्रे -धूपदेहाः पृथग्जन्मानो बहिर्मुखाः परिपक्काश्च धातवः प्रकुपिताश्च बात-
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८४ चरकसंहिता [ अ ० ६ पित्तश्लेष्माणो ये चान्येऽपि केचिच्छरीरे तिष्ठन्तो भावाः शरीरस्योपधा-तायोपपद्यन्ते सर्वांस्तान्मले संप्रचक्ष्महे, इतरांस्तु प्रसादे, गुर्वादिश्च द्रवान्तान् गुणभेदेन, रसादींश्च शुक्रान्तान् द्रव्यभेदेन ॥ १५ ॥
संक्षेप से शरीर के धातु दो प्रकार के हैं । जैसे - मलरूप और प्रसाद रूप । इनमें जो शरीर में पीड़ा उत्पन्न करते हैं वे मदरूप हैं । जैसे— जन्म से पृथक् या शरीर से बाहर निकलने वाले या शरीर के छिद्रों में लगे ( जैसे -- नाक का मल आदि ), पाक होकर पूय बने धातु ( रक्त आदि ), कुपित वात, पित्त, कफ ( बढे या घटे वातादि ), इनके अतरिक्त ओर मोजा वस्तुए शरीर मे रह कर शरीर की नाशकारक होती हैं, उन सबको ' मल ' शब्द से कहते हैं । इनसे भिन्न वस्तुओ को ' प्रसाद ' कहते हैं । गुरु से लेकर द्वय तक कहें गुणों को और रस से लेकर शुक्र तक कहें द्रव्यों को भो प्रसाद धातु कहते हैं ॥ १५ ॥
तेषां सर्वेषामेव वात - पित्त - श्लेष्माणो दुष्टा दूषयितारो भवन्ति दोषस्वभावात्, वावादीनां पुनर्धात्वन्तरे कालान्तरे प्रदुष्टाना विविधा -शितपीतीयेऽध्याये विज्ञानान्युक्तानि । एतावत्येव दुष्टदोषगतिर्यावत्सं स्पर्शहीनाच्छरीरधातूनाम् । प्रकृतिभूतानां खलु वातादीना फलमारोग्यं, तस्मादेषा प्रकृतिभावे प्रयतितव्यं बुद्धिमद्भिः ॥ १६ ॥
अपने कारणों से कुपित हुए वात, पित्त, कफ इन सबों को दूषित कर देते हैं । क्योंकि दोष का स्वभाव ( प्रकृति ) ही दूषित करने का है । वात आदि और रस आदि धातुओं के दूषित होने के लक्षण ' विविधाशित पीतीय ' अध्याय में कह दिये हैं । दुष्ट हुए वात आदि की केश, श्मश्रु आदि में गति नहीं है, क्योंकि इनमे त्वचा का स्पर्श नहीं है । जहा जहा पर स्पर्शेन्द्रिय का सम्बन्ध है वहा वहा पर दूषित वात आदि की गति होती है । प्रकृति मे रहते हुए वात आदि शरीर धातुओ का फल ' आरोग्य ' है । इसलिये बुद्धिमानों को इनको प्रकृति मे रखने का प्रयत्न करना चाहिये ॥१६ ॥
भवति चात्र - सर्वदा सर्वथा सर्व शरीरं वेद यो भिषक ।
आयुर्वेद स कार्त्स्न्येन वेद लोकसुखप्रदम् ॥ १७ ॥ इति ॥
जो वैद्य सम्पूर्ण शरीर को भली प्रकार सब समयों में सब प्रकारों से जानता है, वह लोक को सुख देने वाले आयुर्वेद को भी सम्पूर्ण रूप में जानता है ॥ १७ ॥
तमेवमुक्तवन्त भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच - श्रुतमेतद्यदुक्तं भगवता शरीराधिकारे वचः, किनु खलु गर्भस्याङ्गं पूर्वमभिनिर्वर्तते कुक्षौ, कुतोमुखः कथं वा चान्तर्गतस्तिष्ठति, किमाहारश्च वर्तयति
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अ ० ६ ] शारीरस्थानम् ८५ कथभूतश्च निष्क्रामति, कैश्चायमाहारोपचारैर्जातः सद्यो हन्यते, जातस्तु कैरव्याविरभिवर्धते, कि चास्य देवादिप्रकोपनिमित्ता बिकाराः सभवन्ति, आहोस्थिन्न, किचास्य कालाकालमृत्योर्भावाभावयोर्भगवानव्यवस्यति, किंचास्य परमायुः कानि चास्य परमायुषो निमित्तानीति ॥ १८ ॥
गर्भ के सम्बन्ध में प्रश्न - इस प्रकार से उपदेश करते हुए भगवान् आत्रेय को अग्निवेश ने कहा- हे भगवन् ' आपने शरीर के अधिकरण में जो कुछ कहा वह सुन लिया । ( १ ) अब बतलाइये कि गर्भाशय मे गर्भ का प्रथम कौन सा अंग बनता है १ ( २ ) गर्भ का मुख किधर रहता है और ( ३ ) गभा-शय के भीतर गर्भ किस स्थिति में रहता है? ( ४ ) किस आहार से जीता है और ( ५ ) किस प्रकार से बाहर आता है? ( ६ ) किन २ प्रकार के आहार उपचारों से उत्पन्न हुआ यह शात्र मर जाता १ ( ७ ) उत्पन्न होकर नीराग अवस्था में किन से बढ़ता है? ( ८ ) क्या इस गर्भ को देवता आदि के प्रकोप के कारण होनेवाले विकार होते हैं या नहीं? ( ६ ) क्या इस गर्भ में भी काल
मृत्यु और अकाल - मृत्यु के होने और न होने का भगवान् निश्चय करता है ।
( १० ) इस गर्भ की परम अ'यु क्या है और ( ११ ) परमायु के क्या कारण हैं ॥१८ ॥
तमेवमुक्तवन्तमग्निवेशं भगवान् पुनर्वसुरात्रेय उवाच - पूर्वमुक्तमे-तद् गर्भावक्रान्तौ यथाऽयमभिनिवर्तते कुक्षौ यच्चास्य यदा संतिष्ठतेऽ-जातम् । विप्रतिपत्तिवादात्त्वत्र बहुविधा सूत्रकारिणामृषीणां सन्ति सर्वेषां, तानपि निबोधोच्यमानान् — शिरः पूर्वमभिनिर्वर्तते कुक्षाविति कुमारशिरा भरद्वाजः पश्यति, सर्वेन्द्रियाणां तदधिष्ठानमिति कृत्वा । हृदयमिति काड्डायनो बाह्रीकभिपक, चेतनाविष्ठानत्वात् । नाभिरिति भद्रकाप्यः, आहारागम इति कृत्वा । पक्काशयगुदमिति भद्रशौनक, मारुताधिष्ठानत्वात् । हस्तपादमिति बडिशः, तत्करणत्वात्पुरुषस्य । इन्द्रियाणीति जनको वैदेह, तान्यस्य बुद्धयधिष्ठानानीति कृत्वा । परो-क्षत्वादचिन्त्यमा॑त॒ मारीचि कश्यपः सर्वाङ्ग निर्वृत्तिर्युगपदिति धन्व-न्तरि तदुपपन्नं सिद्धत्वात् सर्वाङ्गानां तस्य हृदयं मूलमधिष्ठानं च केषांचिद्भावानां, न च तस्मात्पूर्वाभिनिर्वृत्तिरेषा, तस्माद्धृदयप्रभृतीनां
सर्वाङ्गाना तुल्यकालाभिनिर्वृतिः । सर्वभावा ह्यन्योन्यप्रतिबद्धाः ।
तस्माद्यथाभूतं दर्शन साधु ॥ १६ ॥
इस प्रकार से कहते हुए अनिवेश को भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने कहा-जिस प्रकार से गर्भ गर्भाशय में बढ़ता है यह बात पीछे ' गर्भावक्रान्ति ' अध्याय