श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 111–120
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 111–120
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९ ६ चरकसंहिता [ अ ० ७ w कफ और ओज की भी आधी २ अजलि है । इस प्रकार से शरीर के तत्त्व कह दिये ॥ १७ ॥
तत्र यद्विशेषतः स्थूलं स्थिरं मूर्तिमद् गुरु - खर कठिनमङ्गं नखास्थि-दन्तवेष्ट - मांस चर्म चर्च - केश उमश्र लोम कण्डरादि तत्पार्थिवं गन्धो घ्राणं च यद् - द्रव सर भन्द स्निग्ध - मृदु - पिच्छिलं रस- रुधिर - वसा - कफ-पित्त - मूत्र स्वेदादि तदाप्य रसो रमनं च । यत्पित्तमूष्मा यो या च भाः शरीरे, तत्सर्व माग्नेय रूप दर्शन च यदुच्छ्वास - प्रश्वासोन्मेष निमेषा-कुञ्चन - प्रसारण- गमन - प्रेरण - धारणादि तद्वायवीयं स्पर्श: स्पर्शनं च यद्वि-विक्तमुच्यते महान्ति चाणूनि स्रोतासि, तदान्तरीक्षं शब्दः श्रोत्रं च । यत्प्रयोक्तृ तत्प्रधान बुद्धिर्मनश्चेति शरीवयवसंख्या यथास्थूलभेदेनाव-यवानां निर्दिष्टा ॥ १८ ॥
शरीर मे जो अग विशेषत स्थूल, स्थिर, कठिन, गुरु, खर, कठोर हैं, नख, अस्थि, दन्तवेष्ट मात, चर्म, वर्चस्, केश, श्मश्रु, लोम, कण्डरा आदि यह तथा गन्ध और नासिका यह सब पार्थिव अग्र हैं । जो भाग द्रव, सर, मन्द, स्निग्ध, मृदु, पिच्छिल, रख, रुधिर, वसा, कफ, पित्त, मूत्र, म्वेद आदि तथा रस और जिह्वा यह सब जलोय अथ हैं । जो पित्त, गरमी, शरीर में जा कान्ति रूप और आख है वह आग्न के अथ हैं । जो उच्छ्वास प्रश्वास, उन्मेष निमेष, आकुञ्चन, प्रसारण, गमन, प्रेरण, धारण आदि कर्म तथा स्पर्श और त्वचा हैं, यह सब वायु के अश है । शरीर में जा छेद महान् या सूक्ष्म है, ये सत्र प्रकार के स्रोतस्; शब्द और कान हैं यह आकाश के अथ हैं । जो इनका प्रयोग करता है, वह प्रधान बुद्धि और मन हैं यह शरीर के अवयवों की सख्या स्थूल दृष्टि भेद मे अवयवों की सख्या कह दी गई है ॥ १८ ॥
शरीरावयवास्तु परमाणुभेदेनापरिसख्येया भवन्त्यतिवहुत्वाद-तिसौक्ष्म्यादतीन्द्रियत्वाच्च । तेषा सयागविभागे परमाणनां कारण वायु. कर्म स्वभावश्च ॥ १६ ॥
शरीर के अवयव परमाणु भेद से असख्य हैं । क्योंकि बहुत अधिक हैं, वे अति सूक्ष्म होने से वा अतीन्द्रिय होने से असख्य हैं । शरीर के इन परमा-णुओं के संयोग और विभाग में कारण वायु, कर्म और स्वभाव है ॥ १६ ॥
तदेतच्छरीर सख्यातमनेकावयवं दृष्टमेकत्वेन सङ्गः, पृथक्त्वेनाप-वर्ग: । तत्र प्रधानमसक्क सर्वसन्ताननिवृत्तौ निवर्तत इति ॥ २० ॥
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अ ०८ 1 ७ शारीरस्थानम् इस संख्यात शरीर को जो वास्तव में अनेक अवयवों से युक्त है मोहवश एक रूप में देख कर सग- बुद्धि ( आसक्ति ) उत्पन्न होती है । एक रूप में शरीर को देख कर इसके उपकार में प्रवृत्ति नहीं होती है जिससे मनुष्य राग-द्वेष मे फस जाता है । शरीर को पृथक २ अग २ रूप में समझने से ममता नहीं होती, इसी लिये पवृत्ति के शान्त होने पर धर्माधर्म के न होने से अपवर्ग होता है । प्रधान आत्मा, राग द्वेष से रहित है । वह सब प्रकार के उपकारक ओर अपकारक भावों से निवृत्त होकर ससार से भी निवृत्त - मुक्त हो जाता है ॥ २० ॥
तत्र श्लोकौ - शरीरसख्यां यो वेद सर्वावयवशो भिषक् ।
तदज्ञाननिमित्तेन स मोहेन न युज्यते ॥ २१ ॥
अमूढो मोहमूलैश्च न दोषैरभिभूयते ।
निर्दोषो निस्पृहः शान्तः प्रशाम्यत्यपुनर्भवः ॥ २२ ॥
जो भिषक् ( वैद्य ) शरीर के सम्पूर्ण अवयवो की संख्या जानता है, वह वैद्य मिथ्याज्ञान के कारण मोह में नहीं फॅसता । ज्ञानी पुरुष मोह ( राग द्वेष 1 ) ) के कारण दोषों से कभी भी पराजित नहीं होता । इसलिये दोषरहित, free होकर सब क्रियाओ के शान्त होने से शान्त हो जाता है फिर इसका पुनर्जन्म नहीं होता ॥ २१-२२ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने शरीरसंख्या-शारीर नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
अष्टमोऽध्यायः ।
अथातो जातिसूत्रीयं शारीर व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्मा SSE भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे ' जाति - सूत्रीय ' नामक शरीर का व्याख्यान करेंगे । जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ स्त्रीपुंसयोरव्यापन्न - शुक्र शोणित - गर्भाशययो श्रेयसीं प्रजामिच्छ-तोस्तदर्थाभिनिर्वृत्तिकर कर्मोपदेक्ष्यामः ॥ ३ ॥
जिसके शुक्र में दूषण न हो ऐसा पुरुष और जिसके आतंत्र और गभाशय मे दोष न हो ऐसी स्त्री जो श्रेष्ठ सतान की कामना करनेवाले हों उन स्त्री - पुरुषो के लिये गुणवती प्रजा के उत्पादक कर्मों का उपदेश करते हैं: - - ॥ ३ ॥
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चरकसंहिता [ अ ० = v v अथाप्येतौ स्त्रीपुंसौ स्नेहस्वेदाभ्यामुपपाद्य वमनविरेचनाभ्यां संशोध्य क्रमेण प्रकृतिमापादयेत् संशुद्धौ चास्थापनानुवासनाभ्यामुप-चरेत्, उपचरेच्च मधुरौषधसस्कृताभ्या घृतक्षीराभ्यां पुरुषं, स्त्रिय तु तैलमाषाभ्याम् ' ॥ ४ ॥
उक्त गुणोंवाले पुरुष और स्त्री को वैद्य स्नेहन और स्वेदन कर्म कराके पीछे से वमन विरेचन द्वारा शुद्ध करे । पीछे पेना आदि देकर क्रमश प्रकृति में लाये । इस प्रकार शुद्ध होने पर आस्थापन और अनुवासन कर्म करावे । मधुर औषधियों से संस्कृत या जोवनीय गण की औषधियों से घृत, दूध से पुरुष का, तथा तैल और माप ( उड़द की दाल ) से स्त्री को पुष्ट करे । [ पुरुष को सौम्य औषधियों से संस्कृत अन्न दे, क्योंकि पुरुष की प्रकृति सौम्य है, इसलिये शुक्र की वृद्धि होगी । स्त्री की प्रकृति उष्ण है, इसलिये उसको उष्ण पदार्थो से ' संस्कृत अन्न दे ] ॥ ४ ॥
रजस्वला के कर्त्तव्य-ततः पुष्पात्प्रभृति त्रिरात्रमासीत ब्रह्मचारिण्यधः शायिनी पाणि-भ्यामन्नमजर्जरपात्रे भुञ्जाना न च काचिन्मृजामापद्येत, ततश्चतुर्थेऽ-हन्येनामुत्पाद्य सशिरस्क म्नापयित्वा शुक्लानि वासांस्याच्छादयेत्पुरुष च ततः शुक्लवाससौ स्रग्विणौ सुमनसावन्योन्यमभिकामौ सवसेता-मिति ब्रूयात् ॥ ५ ॥
पुष्प दर्शन ( रजोदर्शन ) होने पर तीन रात तक स्त्री ( रजोधर्म के दिनों मैं ) ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करे! जमीन पर सोये, न फूटे हुए बर्त्तनो में हाथों से भोजन करे, [ चम्मच आदि से भोजन न करे ] किसी भी प्रकार का शरीर पर भूषण या सजावट, स्नान - लेपन आदि नहीं करे । चौथे दिन ऋतु समाप्त होने पर भली प्रकार स्नान करे, शिर को भी साफ करे, श्वेत वन्त्र पहिने | पुरुष भी स्नान करके श्वेत वस्त्र ही पहिने | इसके अनन्तर स्त्री और पुरुष दोनों श्वेत वस्त्रों को पहिने हुए, मालाओं को धारण किये हुए, प्रसन्न मन, परस्पर की कामना करते हुए मथुन करे, वैद्य ऐसा उपदेश दे ॥ ५ ॥
स्नान के उपरान्त कर्त्तव्य-स्नानात्प्रभृति युग्मेष्वहःसु संवसेतां पुत्रकामौ, अयुग्मेषु दुहितृ-कामौ ॥ ६ ॥
१. ' तैलमासाभ्याम् ' इति कचित् पाठः । २ ' अजर्जरात् पात्राद् ' इति च पाठः ।
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अ ०८ शारीरस्थानम् स्नान करने के उपरान्त पुत्र की कामना से युग्म ( दूसरे, चौथ, छठे आदि ) दिनो मे और कन्या की कामना से अयुग्म ( पहले, तीसरे, पाचवे सातवें आदि ) दिनों में मैथुन करे ॥ ६ ॥
Thara काल में स्त्री की उचित स्थिति -न च न्युब्जां पार्श्वगता वा संसेवेत । न्युब्जाया वातो बलवान् स योनि पीडयति, पार्श्वगताया दक्षिणे पाइर्वे श्लेष्मा संच्युतोऽपिद-धाति गर्भाशयं ', वामे पित्तं पार्श्वे । तस्याः पीडितं विदहति रक्त शुक्रम् । तस्मादुत्ताना सती बीजं गृह्णीयात् । तस्था हि यथास्थानमवतिष्ठन्ते दोषाः । पर्याप्ते चैनां शीतोदकेन परिषिचेत् । नीचे मुख की हुई, औधी या पार्श्व में लेटी स्त्री के साथ सम्भोग नहीं करे क्योंकि अधोमुख स्थिति में वायु बलवान् होता है, यह वायु योनि का पीड़न करता है । दक्षिण पार्श्व मे लेटने से श्लेष्मा ( कफ ) स्रवित होकर गर्भाशय को ढाप लेता है । वाम पार्श्व में लेटने से पित्त कुपित होकर रक्त और शुक्र को दूषित कर देता तथा उष्ण कर देता है । इसलिये स्त्री उतान पीठ के बल चित्त लेटकर बीज का योनि से ग्रहण करे । इस स्थिति में दोष वात आदि अपनी स्वाभाविक स्थिति में रहते हैं । मैथुन की समाप्ति पर स्त्री को शीतल जल से स्नान करावे । तात्या क्षुधा पिपासिता भीता विमनाः शोकार्ता क्रुद्धाऽन्य च पुमासमिच्छन्ती मैथुने चातिकामा वा नारी न गर्भं धत्तं । विगुणां वा प्रजा जनयति । अतिबालामतिवृद्धां दीर्घरोगिणीमन्येन वा बिकारे गोपसृष्टा वर्जयेत् । पुरुषेऽप्येत एव दोषा ' । गर्भाधान के अयोग्य स्त्री - पुरुष — बहुत भोजन करने पर, भूखे होने पर, प्यास लगी होने पर, डरी होने पर, मन प्रसन्न न होने पर या अन्य वस्तु में मन लगे होने पर, शोकयुक्त, क्रुद्ध, अन्य पुरुष को चाहने वाली, अधिक सम्भोग को चाहने वाली स्त्री गर्भ धारण नही करती । यदि भाग्य से गर्भ रह भी जाये तो गुणरहित सतान उत्पन्न होती है । इसी प्रकार बहुत छोटी आयु वाली, अति वृद्ध, चिरकाल से रोगिणी, अथवा अन्य किसी रोग से आक्रान्त स्त्री को भी गर्भाधान क्रिया मे अयोग्य जानना चाहिये । इसी प्रकार के पुरुष भी गर्भाधान क्रिया में अयोग्य होते हैं । ' १. ' गर्भ ' इति च पाठ ' ।
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१०० चरकसंहिता [ अ ० ८ wwwww अतः सर्वदोषवर्जितौ स्त्री पुरुषौ ससृज्येयाताम् । संजातहर्षो मैथुने चानुकूलाविष्टगन्धं स्वास्तीर्णं सुखं शयनमुपकल्प्य मनोज्ञं हितमशन-मशित्वा नात्यशितौ । दक्षिणपादेन पुमान् वामपादेन स्त्री चारोहेत् । तत्र मंत्रं प्रयुञ्जीत -गर्भाधान के नियम - इसलिये सब प्रकार के दोषों से रहित स्त्री और पुरुष ही गर्भाधान करे । मथुन की इच्छा उत्पन्न होने पर प्रसन्न चित्त, अनुकूल सुगन्धि से युक्त, मन के अनुकूल, स्वच्छ, विछे बिस्तर पर, हितकारी भोजन खा कर, दक्षिण पाव को पुरुष और वाम पाव को स्त्री प्रथम रख कर शय्या पर चढे । वे दोनों भोजन बहुत अधिक न खावें । इस समय निम्नलिखित मत्र बोले । अहिरसि आयुरसि सर्वतः प्रतिष्ठाऽसि । धाता वा दधातु विधातात्वा दधातु ब्रह्मवर्चसा भवेदिति ॥ १ ॥
ब्रह्मा बृहस्पतिर्विष्णुः सोमः सूर्यस्तथाऽश्विनौ ।
भगोऽथ मित्रावरुणौ पुत्र वीरं दधातु मे ॥ २ ॥
मन्त्रार्थ – - तू अहि है, तू आयु है, तू सब स्थान मे प्रतिष्ठित है, धाता, तुझे धारण करे, विधाता तुझको धारण करे, तू ब्रह्म तेज से युक्त हो ॥ १ ॥
ब्रह्मा, बृहस्पति, विष्णु, सोम, सूर्य, दोनों अश्वी, भग, मित्र और वरुण मुझको वीर पुत्र धारण करावें ॥ २ ॥
इत्युक्त्वा संवसेताम् ॥ ३ ॥
यह मंत्र पढ़ कर वे दोनों मैथुन कर्म करे ॥ ३ । सा चेदेवमाशासीत बृहन्तमवदातं हर्यक्षमोजस्विन शुचि सत्त्वसंपन्नं पुत्रमिच्छेयमिति शुद्धस्नानात्प्रभृत्यस्यै मन्थमवदातयवानी मधुसर्पि ससृज्य श्वेताया गाः सरूपवत्सायाः पयसाऽऽलोड्य राजते कास्ये वा पात्रे काले काले सप्ताहं सतत प्रयच्छेत्पानाय, प्रातश्च शालियवान्नवि-कारान् दधि - मधु सपिर्भिः पयोभिर्वा ससृज्य भुञ्जीत, तथा सायमव-दात - शरण - शयनासन यान- वसन - भूषणा च स्यात्, साय प्रातश्च शश्व-च्छ्वेतं महान्तमृषभमाजानेयं हरिचन्दनाङ्गदं पश्येत्, सौम्याभिश्चैनां कथाभिर्मनोऽनुकूलाभिरुपासीत, सौम्याकृति बचनोपचार- चेष्टांश्च स्त्री-पुरुषानितरानपि चेन्द्रियार्थानवदातान् पश्येत्, सहचर्यश्चनां प्रियहि-ताभ्यां सततमुपचरेयुः तथा भर्ता । न च मिश्रीभावमापद्येयाताम् ।
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अ ०८ शारीरस्थानम् १०१ पुत्रेष्टि यदि स्त्री चाहै कि मेरा पुत्र बड़ा शुद्ध चरित्र, प्रतिभाशाली, सिंह के समान पराक्रमी, पवित्र और बलसम्पन्न हो तो — ऋतुकाल के उपरान्त स्नान करने पर लगातार सात दिनों तक समय २ पर [ प्रातः साथ दोनों समय ] स्त्री शुद्ध साफ ( तुषों से रहित ) किये जो के मन्थ को मधु और घी में मिला कर श्वेत सुन्दर बछड़े वाली श्वेत गाय के दूध में घोल कर चादी या कासे के पात्र मे खावे और प्रातःकाल हेमन्त - धान्य ( चावल ) तथा जौ से बने खाद्य पदार्थों को दही, मधु और घी के साथ अथवा दूध के साथ मिलाकर खाना चाहिये । और सायकाल निर्मल घर, बिस्तर, आसन, वस्त्र और भूषणों का उपयोग करे । सायं प्रातः निरन्तर, श्वेत, बड़े, आच्छा नसल के, श्वेत चन्दन से लिप्त अंगों वाले बैल का दर्शन करे, सौम्य एव मनोहर अनुकूल कथाओं द्वारा पुरुष स्त्री को प्रसन्न करे । वह स्त्रा सोम्य आकृति वाली, सौम्य वचन, सौम्य आचार और सौम्य चेष्टा वाले स्त्री पुरुषों को तथा अन्य इन्द्रियों के निर्मल ग्राह्य पदर्थों को देखे । इस स्त्री की प्रिय और हितकारी बातों से सहेलिया सदा सेवा करती रहें । इसी प्रकार पति भी अपना आहार विहार करे । वे दोनो इस अवसर में सम्भोग न करें ॥ इत्यनेन विधिना सप्तरात्रं स्थित्वाऽष्टमेऽहन्याप्लुत्याद्भिः सशिरस्कं भत्र सह चाहतानि वस्त्राण्याच्छादयेदवदातानि । अवदाताश्च स्रजो भूषणानि विभृयात् ॥ ७ ॥
इस प्रकार उपरोक्त विधि से सात रात तक रह कर आठवें दिन पति के साथ शिर आदि सब अगों सहित स्नान करके पवित्र, बये निर्मल वस्त्रों को धारण करे 1 । वे सुन्दर माला और आभूषणों को धारण करें ॥ ७ ॥
तत ऋत्विक्प्रागुत्तरस्या दिश्यागारस्य प्राक्प्रवणमुदक्प्रवणं वा प्रदेशमभिसमीक्ष्य गोमयोदकाभ्या स्थण्डिलमुपस लिप्य, प्रोक्ष्य चोदन वेदिमस्मिन् स्थापयेत् । ता पश्चिमेनानाहतवस्त्रसंचये श्वेतार्षभे वाऽप्य-जिन उपविशेत् ब्राह्मणप्रयुक्तः, राजन्यप्रयुक्तस्तु वया चर्मण्यानुडुद्दे वा, वैश्यप्रयुक्तस्तु रौरवे वास्ते वा । तत्रोपविष्टः पालाशीभिरैङ्गदीभिरौ-दुम्बरीभिर्माधूकीभिर्वा समिद्भिरग्निमुपसमाधाय, कुझे परिस्तीर्य, परिधिभिश्व परिधाय, लाजे: शुक्लाभिश्च गन्धवतीभि सुमनोभिरुपा-किरेत् । तत्र प्रणीतोदपात्रं पवित्र पूतमुपसंस्कृत्य सर्पिराज्यार्थ यथोक्त-वर्णानाजानेयादीन् समन्ततः स्थापयेत् ।
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१०२ चरकसंहिता [ अ ० ८ इसके पश्चात् यज्ञ कराने वाला ऋत्विग्घर के पूर्व या उत्तर दिशा में अथवा पूर्व या उत्तर की ओर को ढाल लिये देश को देख कर उसे गोबर से लेप कर स्थान तैयार करे । इस स्थान को पानी छिड़क कर यहा पर वेदी का स्थापन करे । वेदी की पश्चिम दिशा में नूतन वस्त्रो की बनी गद्दी पर अथवा श्वेत बैल के चर्म पर यज्ञ कराने वाला ब्राह्मण बैठे । यदि पुत्रेष्टि के लिये क्षत्रिय यज्ञ करा रहा हो तो वह व्याघ्र के या वैल के चर्म पर बेठे, वैश्य द्वारा प्रयुक्त हो तो रुरु ( मृग ) के या बकरे के चर्म पर बैठे । वहां बैठकर ढाक, इगुदी ( हिंगोट ), गूलर और महुनाको समिवाओं से अग्नि को प्रज्वलित करके, चारों ओर कुशाओं को बिछा कर परिचिया ( केले के चार खम्वे ) लगा कर, लाजा डाल कर, सफेद लाजा और गन्ध वाले फूलो को वेदी के चारो ओर बिखेर देवे | इसके पीछे मन्त्र से पवित्र जल पात्र को रख कर पवित्र, उपसस्कन मंत्र आदि से सम्कृत घो को यज्ञ के लिये रक्खे और उत्तम वर्ण के उत्तम तथा नसल के बैलो आदि को भी चारों ओर बैठवादे ॥ ७ ॥
ततः पुत्रकामा पश्चिमतोऽग्नि दक्षिणनो ब्राह्मणमुपविश्यानुलभेत सह भर्त्रा यथेष्टं पुत्रमाशासाना, ततस्तस्या आशामानाया ऋत्विक् प्रजापतिमभिनिर्दिश्य योनौ तस्या कामपरिपूरणार्थ काम्यामिष्टिं निर्व-पेत् ' विष्णुर्योनि कल्पयतु ' इत्यनया ऋचा, ततश्चैवाऽऽज्येन स्थालीपा कमभिघार्य त्रिर्जुहुयात्, यथाम्नाय चोपमंत्रितमुदकपात्र तस्यै दद्या-सर्वोदकार्थान् कुरुष्वेति । इसके पीछे पुत्र की कामनावाली स्त्री अग्नि के पश्चिम में और ब्राह्मण के दक्षिण में बैठ कर पति के साथ यथेष्ट पुत्र की कामना करती हुई समस्त विधि करे । स्त्री के यथेष्ट पुत्र की कामना करते हुए ऋत्विक् प्रजापति को लक्ष्य करके, स्त्री के गर्भ मे उसकी इच्छा परिपूर्ण होने के अर्थ और गर्भ स्थिर रहने के लिये पुत्र काम्येष्टि करे । वह ' विष्णुयोनिं कल्पयतु ० इस मन्त्र से आहुति करे । इसके पीछे घी से स्थालीपाक का सचित कर शास्त्रानुसार तोन आहुति देवे । उपमन्त्रित जलपात्र उस स्त्री को देवे और आदेश कर दे कि सब जल के कार्य तू इसी पानी से कर । ततः समाप्ते कर्मणि पूर्व दक्षिणपादमभिहरन्ती प्रदक्षिणमग्निमनु-परिक्रामेत्, ततो ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयित्वा सह भर्त्राऽऽज्य शेष प्राश्नी-यात् । पूर्व पुमान् पश्चात्स्त्री । न चाच्छिष्टमवशेषयेत् । ततस्तौ सह संव-सेतामष्ट्ररात्र तथाविधपरिच्छदावेव च स्यातां, तथेष्टपुत्र जनयेताम् || ८ || * विष्णुर्योनिं कल्पयतु ० ऋग्वेद मण्डल १० । सू ० १८४ । १ ॥
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अ ० ८ ] शारीरस्थानम् १०३ ^^ पुत्रेष्टि यज्ञ की विधि समाप्त होने पर प्रथम दक्षिण पात्र को आगे रख कर स्त्री अग्नि की प्रदक्षिणा करे । इसके पीछे ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराके पति के साथ अवशिष्ट आज्यशेप ( बचा हुआ घी ) खावे । इसमे भी पहिले पुरुष खाये और पीछे स्त्री । अवशिष्ट कुछ भी शेष न रक्खे । दोनो परस्पर अगले आठ रात्रि शयन करे । जिस प्रकार के पुत्र को कामना हो उसी प्रकार के ( वर्ण ) के वस्त्र पहिने । इससे मनोवाञ्छित सतान उत्पन्न होता है ॥ ८ ॥
यात्री श्यामं लोहिताक्षं व्यूढोरस्कं महाबाहु च पुत्रमाशासीत, या वा कृष्ण कृष्ण - मृदु - दीर्घ - केशं शुक्लाक्षं शुक्लदन्तं तेजस्विनमात्सव-न्तम् । एष एवानयोरनेि होमविधिः । किंतु परिबर्ह वयं स्यात्, पुत्रव-र्णानुरूपस्तु यथाशीः परिबर्होऽन्यः कार्यः स्यात् ॥ ६ ॥
जो स्त्री काले, लाल आखों वाले, चौड़ा छाती और विशाल बाहु वाले पुत्र की कामना करे, अथवा काले रंग के,, काले, कोमल लम्बे २ बालों वाले, सफेद आख के, सफेद दातों वाले, तेजस्त्री ओर जितेन्द्रिय पुत्र को चाहे तो इन दोनों के लिये भी यही विधि है । किन्तु शयन, असन, पुष्प आदि परिच्छद भिन्न हैं । जैसे वर्ण के पुत्र की चाह हो वैसा हो परिच्छद पोशाक आर बिछावन करे । इष्ट पुत्र के वर्ण के अनुरूप सब वस्त्रादि होना चाहिये ॥ ६ ॥
शूद्रा तु नमस्कारमेव कुर्याद्देवाग्नि द्विज गुरु - तपस्वि सिद्धेभ्यः ॥१० ॥
शुद्रा स्त्रो मत्र - विधि से होम न करके देवता, अग्नि, ब्राह्मण, गुरु, सिद्ध और तपस्वियों को नमस्कार मात्र ही करे [ क्योंकि शूद्रा मूर्ख होने से यज्ञादि ठीक प्रकार से करने में असमर्थ होती है ] ॥ १० । या या च यथाविधं पुत्रमाशासीत तस्यास्तस्यास्तां तां पुत्राशिष-मनुनिशम्य ताम्तान् जनपदान् मनसाऽनुपरिक्रामयेत् । ताननुपरिक्रम्य या या येषां येषा जनपदाना मनुष्याणामनुरूप पुत्रमाशासीत सा सा तेषा तेषां जनपदानामाहार - विहारोपचार- परिच्छदाननुविधस्वेति वाच्या स्यात् । इत्येतत्सवें पुत्राशिषा समृद्धिकर कर्म व्याख्यातं भवति ॥ ११ ॥
जो जो स्त्री जिस जिस प्रकार के पुत्र की इच्छा करे उम्र उस की उस उस प्रकार के पुत्र की इच्छा को सुन कर उन नाना जनपदों में उस स्त्री को मन द्वारा भ्रमण करावे, उनका अनेक बार चिन्तन कराये । जो जो स्त्री जिन २ जनपदों के राष्ट्रनिवासियों के सदृश पुत्र को चाहे वह इन देशवासियों जैसा जैसा आहार - विहार, उपचार, परिच्छद आदि करते हैं वैसा
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१०४ चरकसंहिता [ अ ०८ w v करने को कहे । यह सब पुत्र को चाहने वाली स्त्रियों के आशानुरूप समृद्धि करने वाले पुत्र के अनुकूल कर्म का उपदेश कर दिया है ॥ ११ ॥
न तु खलु केवलमेतदेव कर्म वर्णवैशेष्यकरं भवति, अपि खलु तेजोधातुरप्युदकान्तरिक्ष - धातु प्रायोऽवदात वर्णकरो भवति । पृथिवी -वायु धातु प्रायः कृष्णवर्णकरः सम - सर्व धातु प्रायः श्यामवर्णकरः || १२ || केवल इतना ही कर्म वर्ण की विशेषता को उत्पन्न नहीं करता । बल्कि तेजो धातु, जल और अन्तरिक्ष धातु अधिक मात्रा से वर्ग को चमकीला, स्वच्छ कान्तिमान् बनाते हैं । यही तेजो धातु पृथ्वी, वायु की अधिकता के कारण वर्ण को काला कर देता है । सब धातुओं की समान मात्रा वर्ण को इनाम ( सावला ) करती है ॥ १२ ॥
सत्त्ववैशेष्यकराणि पुनस्तेषां तेषां प्राणिनां मातापितृसत्त्वान्यन्तर्व-ल्याः श्रुतयश्चाभीक्ष्ण स्वोचित च कर्म सत्त्वविशेपाभ्यासश्चेति || १३ || उन उन प्राणियों के माता पिता के सत्त्व, गर्भिणी का सच्व, बार बार बातों का सुनना, गर्भ के पूर्व जन्म के सचित कर्म, जन्मान्तर में जिस प्रकार के तत्त्व का पुरुष अभ्यास करता है यह बातें सत्व ( मन ) की विशेषता को उत्पन्न करती हैं ॥ १३ ॥
यथोक्तेन विधिनोपसंस्कृतशरीरयोः स्त्रीपुरुषयोमिश्रीभावमापन्नयो शुक्रं शोणितेन सह समेत्याव्यापन्नमव्यापन्नेन योनावनुपहतायामप्रदुष्टे-गर्भाशये गर्भमभिनिर्वर्तयत्येकान्तेन । तद्यथा निर्मले वाससि सुपरि-कल्पिते रञ्जनं समुदितगुणमुपनिपातादेव रागमभिनिर्वर्तयति, तद्वत् । यथा वा क्षीर दनाऽभिषुतमभिषवणाद्विहाय स्वभावमापद्यते दधि-मावं शुक्र तद्वत् ॥ १४ ॥
उपरोक्त विधि के अनुसार संस्कृत शरीर वाले स्त्री पुरुषों के परस्पर सयुक्त होने पर शुक्र आर्त्तव के साथ मिल कर निर्दोष शुक्र निर्दोष आर्त्तव से, नीरोग-स्वस्थ योनि में मिल कर, निर्दोष गर्भाशय में सम्पूर्ण रूप में गर्भ को बनाता है । जिस प्रकार निर्मल, स्वच्छ, अच्छी प्रकार से धोये वस्त्र पर थोड़ा सा भी उत्तम रंग गिरने पर रंग चढा देता है, उसी प्रकार शुद्ध निर्मल गर्भाशय में निर्दोष शुक्र आर्त्तव से मिल कर गर्भ को उत्पन्न कर देता है । जिस प्रकार थोड़ी सी दहीं, बहुत से दूध के साथ मिल कर उसको भी दही रूप में कर देती हैं, उसी प्रकार थोड़ा सा शुक्र भी गर्भ को स्वभावतः उत्पन्न कर देता हैं ॥ १४ ॥
एवमभिनिर्वर्त्तमानस्य गर्भस्य स्त्रीपुरुषत्वे हेतुः पूर्वमुक्तः ॥ १५ ॥
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अ ० ८ शारीरस्थानम् १०५ यथा हि चीजमनुपतप्तमुप्तं स्वा स्वां प्रकृतिमनुविधीयते व्रीहिर्वा व्रीहित्वं यवो वा यवत्वं तथा स्त्रीपुरुषावपि यथोक्तं हेतुविभागमनु-विधीयते ॥ १६ ॥
इस प्रकार से बनते हुए गर्भ में क्न्या या पुत्र की उत्पत्ति का कारण हमने प्रथम ही कह दिया है । [ रक्त की अधिकता से कन्या और शुक्र की अधिकता से पुत्र उत्पन्न होता है । ] जिस प्रकार निर्दोष अथवा दूषित बीज अपनी अपनी प्रकृति का अनुसरण करके धान्य से धान्य और जौ के बीजों से जौ को उत्पन्न करते हैं, उसी प्रकार कन्या और पुत्र की उत्पत्ति में भी स्त्री और पुरुष अपने र कारणानुसार कार्य करते हैं ॥ १५-१६ ॥ तयोः कर्मणा वेदोक्तेन विवर्तनमुपदिश्यते प्राग्व्यक्तीभावात् प्रयु-न सम्यक् । कर्मणां हि देशकालसंपदुपेताना नियतमिष्टफलत्व, तथेतरेषामितरत्वम् । तस्मादापन्नगर्भा स्त्रियमभिसमीक्ष्य प्राग्व्यक्ती-भावाद् गर्भस्य पुसवनमस्यै दद्यान्- गाठे जातस्य न्यग्रोधस्य प्रागु-त्तराभ्या शाखाभ्यां शुद्धे अनुपहते आदाय द्वाभ्या धान्यमाषा यां सपदुपेताभ्या वा सह दध्नि प्रक्षिप्य पुष्ये पिवेत्, तथैवापराञ्जी वकर्षभकापामार्ग - सहचर - फल्काश्च युगपदेकेकशो यथेष्ट वायु-पसस्कृत्य पयसा, कुड्यकीटकं मत्म्यकोद्र चोदकाञ्जलौ प्रक्षिप्य पुष्ये पिबेत्, तथा कनकमयान् राजनानाय साश्च पुरुषकानग्निवर्णानणुप्रमाणान् दनि पयस्युदकाञ्जलौ वा प्रक्षिप्य पिबेदनवशषतः पुष्येण, पुष्येणैव च शा-लिपिष्टस्य पच्यमानस्योष्माणमुपाहाय तस्यैव च पिष्टस्योदकसंसृष्टस्य रस देहलीमुपनिधाय दक्षिणे नासापुढे स्वयमासिलिना । इति पुस-वनानि । यच्चान्यदपि ब्राह्मणा ब्रूयुराप्ता वा पुसवनमिष्ट तच्चानुष्ठेयम् || १७ || पुसवन विधि - वेदोक्त कर्म के अनुसार ठीक प्रकार से कार्य अनुष्ठान करने वा भेदक लक्षणो के उत्पन्न होने से पूर्व ही लिंगादि में परिवर्तन करना सम्भव है । उत्तम गुणयुक्त देश, काल में किये कर्मों मे इष्ट फल अवश्य प्राप्त होता है । उत्तम देश काल के गुणों से रहित कमों मे इष्ट फल नहीं मिलता । इस लिये स्त्री में गर्भ रहने पर गर्भ के लक्षणों के स्पष्ट होने से पूर्व ही गर्भ में पुसवन करने का प्रयोग करना चाहिये । [ गर्भ के लिंग विभेदक लक्षण दूसरे महांने मे स्पष्ट होते हैं । अतः दूसरे मास से पूर्व पुसवन कर्म का प्रयोग करे ] ( १ ) गौओं के बैठने के स्थान में लगे बड़ वृक्ष की उत्तर और पूर्व की दिशा की ओर लगी दो शाखाओं से दो शुंग ( फुनगो ) तोड़ कर उत्तम गुण वाले उड़द