श्रीगणेशाय नमः।

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 21–30

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 21–30

पृष्ठ 21

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६ चरकसंहिता [ अ ० १

वाला ( आकाश, वायु, अग्नि, जल ) और पृथिवी पाच गुणों वाली है ।

इस प्रकार अगले भूत का गुण क्रम से दूसरे २ भूत में आता जाता है ॥ २८ ॥

खरद्रवचलोष्णत्वं भूजला निलतेजसाम् ।

आकाशस्याप्रतीघातो दृष्टं लिङ्गं यथाक्रमम् ॥ २६ ॥।

लक्षण सर्वमेवैतत्स्पर्शनेन्द्रियगोचरम् ।

स्पर्शनेन्द्रियविज्ञेयः स्पर्शो हि सविपर्ययः ॥ ३० ॥

पच महाभूतों के लक्षण - खरत्व, द्रवत्व, चलत्व, उष्णत्व और अप्रतिहनन ये पृथिवी, जल, वायु, अग्नि और आकाश के क्रमशः लक्षण समझने चाहिये । ये सब लक्षण स्पर्शनेन्द्रिय ( त्वचा ) से ग्रहण करने योग्य है । इनमें आकाश का अप्रतिहनन ( रोक न करना ) भी स्पर्श के विपरीत अस्पर्श होने से ही त्वचा से ग्रहण करने योग्य है । [ क्योंकि जो द्रव्य जिस इन्द्रिय से ग्रहण किया जाता है, उस द्रव्य के अभाव का भी उसी इन्द्रिय से ग्रहण होता है । इसलिये आकाश का अप्रतिघात गुण भी स्पर्शेन्द्रिय से ही ग्रहण करने योग्य है ] || २ ९ -३० ॥

गुणाः शरीरे गुणिनां निर्दिष्टाश्चिह्नमेव च ।

अर्थाः शब्दादयो ज्ञेया गोचरा विषया गुणाः ॥ ३१ ॥

ग्राह्य - विषय -- शरीर में गुणियों के गुण चिह्न रूप ही कहे हैं । इसलिये खरत्व आदि गुणों का लक्षण शब्द से ही कह दिया है । शब्द आदि पाच भूतों के गुण हैं, वे ही अर्थ हैं । इनको इन्द्रियगोचर या विषय अथवा गुण करके जानना चाहिये ॥ ३१ ॥

या यदिन्द्रियमाश्रित्य जन्तोर्बुद्धिः प्रवर्तते ।

याति सा तेन निर्देशं मनसा च मनोभवा ॥ ३२ ॥

प्राणी की जो बुद्धि ( ज्ञान ) जिस इन्द्रिय की सहायता से उत्पन्न होती है, वह बुद्धि उसी इन्द्रिय से कही जाती है । जैसे आख से प्रवृत्त होने वाली बुद्धि चतुर्बुद्धि कही जाती है । इसी प्रकार मन से उत्पन्न होने वाडी बुद्धि मनोभवा बुद्धि कहती है ॥ ३२ ॥

भेदात्कार्येन्द्रियार्थानां बह्वचो वै बुद्धयः स्मृताः ।

आत्मेन्द्रियमनोर्थानामेकैक संनिकर्षजा ॥ ३३ ॥

१ आकाशपवनदहनतोय भूमिषु यथासस्यमेकोत्तर परिवृद्धा शब्दस्पर्शरूप-रसगन्धाः | ( सुश्रुतसूत्र ४२१० )

पृष्ठ 22

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अ ० १ ] शारीरस्थानम् www. www

अंगुल्यंगुष्ठ तलजस्तंत्रीवीणानखोद्भवः ।

दृष्ट शब्दो यथा बुद्धिर्दृष्टा संयोगजा तथा ॥ ३४ ॥

कार्य, इन्द्रिय और विषयों के बहुत भेद होने से बुद्धिया भी बहुत प्रकार की हैं । इनमें एक एक बुद्धि आत्मा का मन से, मन का इन्द्रियों से और इन्द्रियों का विषय के साथ सयोग होने से उत्पन्न होती हैं । जिस प्रकार शब्द मध्यमागुलि, अगुष्ठ, हथेली तत्री ( तात ), वीणा और नख के संयोग से उत्पन्न होता है, उसी प्रकार प्रत्यक्ष ज्ञान भी आत्मा, इन्द्रिय, मन और विषय के सन्निकर्ष से उत्पन्न होता है ॥ ३३-३४ ॥

बुद्धीन्द्रियमनोर्थाना विद्याद्योगधरं परम् ।

चतुर्विंशक इत्येष राशि पुरुषसंज्ञकः ॥ ३५ ॥

बुद्धि, इन्द्रिय, मन और विषय इन के संयोग को शरीर रूप से धारण करने वाला इनसे पृथक् ' अव्यक्त ' आत्मा है । पाच महाभूत, पाच विषय, दस इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहकार और महान् इन चौवीस तत्त्वों का राशि समूह को ' पुरुष ' कहते है ॥ ३५ ॥

रजस्तमोभ्यां युक्तस्य संयोगोऽयमनन्तवान् । ताभ्यां निराकृताभ्यां तु सत्त्ववृद्ध्या निवर्तते रज और तम से युक्त पुरुष का यह सयोग अन्त लगातार चलता ही रहता है । सत्त्व के प्रबल होने पर कारणरूप रज और तम के हटने पर यह सयोग भी समाप्त पुरुष का मोक्ष है ॥ ३६ ॥

अत्र कर्मफलं चात्र ज्ञानं चात्र प्रतिष्ठितम् ।

अत्र मोहः सुखं दुःख जीवितं मरणं स्वता ॥

एवं यो वेद तत्त्वेन स वेद प्रलयोदयौ ॥ ३६ ॥

वाला नही होता, संसार बन्धन के हो जाता है । यहीं ३७ ॥ पारम्पर्यं चिकित्सा च ज्ञातव्य यश्च किंचन ॥ ३८ ॥

पुरुष आत्मा - अदृष्ट ( कर्म ), कर्मफल, ज्ञान, अज्ञान, अनुकूल एवं प्रति-कूल वेदनायें, जन्म, मरण, मेरी स्त्री, मेरा पुत्र आदि ममत्व ये सब बाते इसी राशिसंज्ञक शरीरपुरुष में प्रतिष्ठित हैं । जो पुरुष इन सब बातों को यथार्थ रूप से जानता है, वह प्रलय ( प्रकृति का महत् आदि में लय ) एव उदय ( उत्पत्ति ) इन दोनों को जानता है । वह वेदनाओं के पारम्पर्य सम्बन्ध और चिकित्सा को भी जानता है । इसके अतिरिक्त इस पुरुष में और भी जो कुछ जानने योग्य होता है वह उस सब को जानता है ॥ ३७-३८ ॥

पृष्ठ 23

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चरकसंहिता 11

भारतम सत्यमनृत वेदाः कर्म शुभाशुभम् ।

न स्यात्कर्ता वेदिता च पुरुषो न भवेद्यदि ॥

नाश्रयो न सुखं नार्तिर्न गतिनगतिर्न वाक् । न विज्ञानं न शास्त्राणि न जन्म मरणं न च न बन्धो न च मोक्षः स्यात्पुरुषो न भवेद्यदि कारण पुरुषस्तस्मात्कारणज्ञैरुदाहृतः ॥ ४१ न चेत्कारणमात्मा स्याद्भा ' दयः स्युरहेतुकाः । न चेषु संभवेञ्ज्ञान न च तैः स्यात्प्रयोजनम्

कृत मृण्डचक्रेव युम्भकाराहते घटम् ।

कृत मृत्तृणकाष्ठैश्च गृहकाराद्विना गृहम् ॥ ४३

यो बत्स वदेद्देहं संभूय करणेः कृतम् । [ अ ० १ ३८ ॥ ॥ ४० ॥

।

॥

॥। ४२ ॥

॥

विना कर्तारमज्ञानायुक्त्यागमबहिष्कृतः ॥ ४४ ॥

आत्मा --- यदि कर्ता, वेदिता ( ज्ञाता ) पुरुष न हो तो प्रकाश, अन्वकार सत्य, झूठ. स्वर्गादि के प्रतिपादक वेद, शुभाशुभ कर्म ये सब निष्प्रयोजन हो जाय । यदि कर्त्ता, बोद्धा पुरुष न हो तो धर्म और अधर्म का कोई आश्रय न रहे, धर्म और अधर्म निराश्रय हो जाए । मुख, दुख, जाना, आना, सत्य वाणी, शास्त्रज्ञान, शास्त्र, जन्म, मरण, बन्ध और मोक्ष कुछ भी न रहे । क्योंकि पुरुष के लिये ही ये सब हैं । इसलिये कारण को जानने वालो ने पुरुष को कारण कहा है । यदि आत्मा कारण न हो तो दीप्ति आदि बिना कारण के हो जाय । पुरुष के न होने पर शरीर की सृष्टि बिना कारण की हो जाय । इतना ही नहीं, इन भूतों से बने शरीर में ज्ञान ( चैतन्य ) भी सभव नहीं । ( क्योंकि भूतों में ज्ञान ( चैतन्य ) का अभाव है ), ज्ञान और चेतना का कारण आत्मा है । आत्मा के न होने पर ये सब निष्प्रयोजन हो जाते हैं । जिस प्रकार कोई कहे कि ' बिना कुम्हार के मिट्टी, दण्डे और चक ने मिल कर घड़ा बना दिया, अथवा बिना घर बनाने वाले के मिट्टी तिनके और काष्ठ से घर बन गया, उसी प्रकार कर्ता रूप आत्मा के बिना ही कारणरूप पत्र महाभूतों ने मिल कर स्त्रय इस शरीर को बनाया है, यह कहना अज्ञान से पूर्ण और युक्ति आदि प्रमाण से रहित है ॥ ४४ ॥

कारणं पुरुषः सर्वैः प्रमाणैरुपलभ्यते ।

येभ्यः प्रमेयं सर्वेभ्यः आगमेभ्य प्रमीयते ॥ ४५ ॥

१ खादय. - यो ०

पृष्ठ 24

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अ ० १ ] शारीरस्थानम ^ कारण रूप पुरुष सब प्रमाणों से सिद्ध है । जिन सब प्रमाणों से प्रमेय जान " जाता है, उन सब प्रमाणों ( प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम आदि ) से पुरुष कारण है, यही ज्ञान होता है ॥ ४५ ॥

न ते तत्सदृशास्त्वन्ये पारम्पर्यसमुत्थिताः ।

सारूप्याद्येत एवेति निर्दिश्यन्ते नवा नवाः ॥ ४६ ॥

भावस्तेषां समुदयो निरीशः सवसंज्ञकः ।

कर्ता भोक्ता न स पुमानिति केचिद् व्यवस्थिताः ॥ ४७ ॥

नास्तिक मत – जो शरीर में जल आदि पदार्थ दिखाई देते हैं । वे वे नहीं हैं । परन्तु परम्परा से उत्पन्न वे उनके सदृश वा भिन्न ही पदार्थ हैं । समान रूप होने से नये से नये भी वे ही है, ऐसे कहे जाते है । उनका समु दाय जिसका कोई स्वामी नहीं है, ' सत्त्व ' कहाता है, पुरुष कोई कर्त्ता और भोक्ता नहीं है, ऐसा कई मानते हैं । इसी प्रकार जो भाव बाल्यावस्था में होते हैं वे यौवनावस्था मे नही रहते । अन्य भाव पूर्व के समान होते हैं, परम्परा से उत्पन्न होने के कारण उनके समान होते है । इस प्रकार से नये से नये भाव समान रूप और सादृश्य होने से वे ही ( पूर्वके ही ) कहे जाते हैं । वाल्यावस्था के देवदत्त युवावस्था में भी रहता है । इन भावों का समुदाय ( पूर्वापर सन्तान ) आत्मारहित सत्व -- सजक, प्राणी होता है । इनके मत में कर्त्ता, कमो का भोक्ता, देह से अतिरिक्त पुरुष नही है । ऐसा कोई देह को ही आत्मा मानने वाले नास्तिक मानते हैं ॥ ४६-४७ ॥

तेषामन्यैः कृतस्यान्ये भावा भावैर्नवा फलम् ।

भुञ्जते सदृशाः प्राप्तं यैरात्मा नोपदिश्यते ॥ ४८ ॥

नास्तिक मत में दोष — जो लोग शरीर से पृथक् आत्मा की स्थिति नही मानते उनके मत में अन्य ' भाव ' ( पदार्थो ) द्वारा किये शुभाशुभ क्मों के फल उनके समान नये नये अन्य ' भाव ' भोगते हैं । जो कर्म करते हैं उन को किये कर्म का फल भोगना नही पता ॥ ४८ ॥

करणान्यान्यता दृष्टा कर्तु कर्ता स एव तु ।

कर्ता हि करणैर्युक्तः कारणं सर्वकर्मणाम् ॥ ४६ ॥

करने वाले कर्त्ता के करण भी अनेक देखे जाते हैं । परन्तु करने वाला वह अकेला होता है । इसी प्रकार यह कर्त्ता इन्द्रिय आदि अनेक उपकरणों से युक्त होकर दर्शन आदि नाना कर्म करता है । इसलिये देह से भिन्न आत्मा सब कर्मों का कारण है ॥ ४६ ॥

पृष्ठ 25

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१० चरकसंहिता [ अ ० १ AN AAA ^ ne

निमेषकालाद्भावानां कालः शीघ्रतरोऽत्यये ।

भग्नानां न ' पुनर्भावः कृत नान्यमुपैति च ॥ ५० ॥

मतं तत्त्वविदामेतद्यस्मात्तस्मात् स कारणम् ।

क्रियोपभोगे भूतानां नित्यः पुरुषसंज्ञकः ॥ ५१ ॥

जितने समय में आख को पलक झपकती है यह ' निमेष काल ' कहाता है । इस निमेष काल से भी अधिक शीघ्रता से भाव बदल रहे हैं, नाथ हो रहे है । नाथ हुए पदाथों का पुन सद्भाव नहीं होता और एक के किये कर्म का फल दूसरा नही भोगता, अपितु जिसने किया होता है वही भोगता है । यही सब तत्वज्ञानियों का सिद्धान्त है । इसलिये प्राणियों के किये हुए कर्म का फल भोगने वाला देह से अतिरिक्त नित्य ' पुरुष ' नामक चेतन आत्मा है ॥ ५०–५१ ॥

अहङ्कारः फल कर्म देहान्तरगतिः स्मृतिः ।

विद्यते सति भूतानां कारणे देहमन्वरा ॥ ५२ ॥

आत्मा के देह से पृथक् होने पर ही अहकार भाव ( मैने यह किया, मै यह जानता हॅू ), फल को उद्देश्य रख कर काम करना, किये कर्म का फल भोगना, एक शरीर से दूसरे शरीर में जाना, स्मृति अर्थात् स्मरण ( बाल्या -वस्था का यौवनावस्था में स्मरण ), ये सब बातें होती है ॥ ५२ ॥

प्रभवो न ह्यनादित्वाद्विद्यते परमात्मनः ।

पुरुषो राशिसज्ञस्तु मोहेच्छाद्वेष कर्मजः ॥ ५३ ॥

परमात्मा का काई उत्पत्ति कारण नहीं है, क्योंकि वह अनादि है । परन्तु राशि - सज्ञक पुरुष को भोगों के आयतन ( आश्रय ) रूप शरीर का मोह, इच्छा, राग और द्वेष ये तीन उत्पन्न करते है ॥ ५३ ॥

आत्मा ज्ञः, करणैर्योगाज्ज्ञान त्वस्य प्रवर्तते ।

करणानामवैमल्यादयोगाद्वा न वर्तते ॥ ४४ ॥

१ ' भग्नाना च पुनर्भाव ' इति पाठान्तरम् । अर्थात् टूटे हाथ पाव आदि भी न बन जाते है, यह भी आत्मा की सत्ता का प्रमाण है । २ तीनों दोषों के तीन पक्ष है । यथा - ( १ ) रागपक्ष -- काम, मत्सर, स्पृहा तृष्णा और लोभ । ( २ ) द्वेष्यपक्ष - क्रोध, ईर्षा, असूया, द्रोह, अमर्ष । ( ३ ) मोहपक्ष - मिथ्याज्ञान, विचिकित्सा, मान और प्रमाद 1 वात्स्यायन ( न्या ० ४ । १३ ) पूर्वकृतफलानुबन्धात् तदुत्पत्तिः । न्याय । दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानाना-मुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः ॥

पृष्ठ 26

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अ ० १ ] शारीरस्थानम् ११

पश्यतोऽपि यथा ss दर्शे सक्लिने नास्ति दर्शनम् ।

तत्त्वं जले वा कलुषे चेतस्युपहते तथा ॥ ५५ ॥

आत्मा ज्ञानी है । करण - मन, बुद्धि और इन्द्रियों इनके सयोग से इस आत्मा को ज्ञान होता है । करण अर्थात् साधनों के निर्मल न होने वा इनके सयोग न होने से ज्ञान नही होता । जिस प्रकार आख से देखने पर भी मलिन दर्पण में मुख दिखाई नहीं देता और जिस प्रकार मलिन जल में प्रतिबिम्ब नही दीखता, उसी प्रकार चक्षु आदि इन्द्रिय और चित्त रूप साधनों के विकृत या दुष्ट होने पर भी ज्ञान नही होता ॥ ५४-५५ ॥

करणानि मनो बुद्धिर्बुद्धिकर्मेन्द्रियाणि च ।

कर्तुः संयोगजं कर्म वेदना बुद्धिरेव च ॥ ५६ ॥

नैकः प्रवर्तते कर्तुं भूतात्मा नाश्नुते फलम् ।

संयोगाद्वर्तते सर्वं तमृते नास्ति किचन ॥ २७ ॥

मन बुद्धि, ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिया करण हैं । करने वाले आत्मा के सयोग से कर्म होता है । करने वाले के सयोग से ही बुद्धि और वेदना भी उत्पन्न होती है | अत्रेला भूतात्मा बिना करणा के प्रवृत्त नहीं हो सकता और नकल का उपभोग कर सकता है । किन्तु शरीर ", सन्त्व, ( मन ) इन्द्रिय इनके

योग से ही सब कुछ होता है । सयोग के बिना कुछ नही होता ॥ ५६-५७ ॥

नको वर्तते भावो वर्तते नाप्यहेतुकः ।

शीघ्रगत्वात्स्वभावात्त्वभावो न व्यतिवर्तते ॥ ५८ ॥

कारण रूप भाव अकेला कार्य - उत्पत्ति में प्रवृत्त नही होता, किन्तु सयोग होने पर ही प्रवृत्त होता है । भाव एक रूप वाले नहीं हैं । क्योंकि परिणामी हैं, बिना हेतु के भी नहीं हैं, वे भाव शीघ्रगामी स्वभाव को नहीं छोड़ते । जैसा पहिले सूत्रस्थान अ ० १६ में कहा है कि - ' प्रवृत्तिहेतुर्भावाना न निरोधेऽस्ति-कारणम् । इति ॥ ५८ ||

अनादिः पुरुषो नित्यो विपरीतस्तु हेतुजः ।

सदकारणवन्नित्य दृष्ट हेतुजमन्यथा ॥ ५६ ॥

तदेव भावादमा नित्यत्व न कुतश्चन ।

भावाज्ज्ञेयं तदव्यक्तमचिन्त्यं व्यक्तमन्यथा ॥ ६० ॥

अनादि पुरुष ( आत्मा ) नित्य है । मोह, इच्छा, द्वेष आदि निमित्त से उत्पन्न ' राशि ' सज्ञक पुरुष इस से विपरीत अर्थात् अनित्य है । जो सत् और अकारणवान् अर्थात् कारण से रहित है वह निस्य है, तथा जो कारणजन्य है

पृष्ठ 27

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१२ चरकसंहिता ॥ अ ० १ वह अनित्य है । ' कोई वस्तु उत्पत्ति कारण वाली होने से नित्य नहीं हो मकती । जो वस्तु कारणजन्य है, वह वस्तु किसी भी प्रकार से नित्य नही हो सकती । क्योंकि उसकी उत्पत्ति हुई है । कारणवान् होने से अनित्य है । इस • लिये यह नित्य- अव्यक्त है, ग्रहण न होने से अव्यक्त है, अचिन्त्य है | इससे

farida व्यक्त और अनित्य है । ५ ९ -६० ॥

अव्यक्तमात्मा क्षेत्रज्ञः शाश्वतो विभुरव्ययः ।

तम्माद्यदन्यत्तद् व्यक्तं, वक्ष्यते चापरं द्वयम् ॥ ६१ ॥

व्यक्तं चैन्द्रियकं चैव गृह्यते तद्यदिन्द्रियैः ।

अतोऽन्यत्पुनरव्यक्त लिङ्गग्राह्यमतीन्द्रियम् ॥ ६२ ॥

आत्मा को अव्यक्त शब्द से कहा जाता है । इसी आत्मा को क्षेत्रज्ञ, शाश्वत, विभु और अव्यय कहते है । आत्मा से पृथक् जो कुछ है वह सब व्यक्त है । अन्य प्रकार मे भी व्यक्त - अव्यक्त कहे जाते ह । जो ऐन्द्रियक अर्थात् इन्द्रियों में उपलब्ध होता है वह सब व्यक्त है । जो इन्द्रिय से ग्रहण नहीं होता

वह अतीन्द्रिय और अव्यक्त है । लक्षणों से इस अव्यक्त का अनुमान होना है ॥ ६२ ॥

खादीनि बुद्धिव्यक्तमहङ्कारस्तथाऽष्टमः । भूतप्रकृतिरूद्दिष्टा-पाच सूक्ष्म भूत, पंच तन्मात्रा ( आकाश, वायु, great ), बुद्धि और महान् ( अव्यक्त ) ये सात अव्यक्त अहकार यह आठ भूत- प्रकृति कही है ॥ विकाराचैव षोडश ॥ ६३ ॥

बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चैव पञ्च कर्मेन्द्रियाणि च । समनस्काश्च पञ्चार्था विकारा इति संज्ञिता । अग्नि, जल और मूल प्रकृति तथा ६४ ॥ इनके सोलह विकार हैं । पाच ज्ञानेन्द्रिय, पाच कर्मेन्द्रिय और मन के साथ पाच अर्थ ( विषय- शब्द, स्पर्श, रूप, रस आर गन्ध ) ये १६ विकार कहे हैं ॥ ६३-६४ ॥ इति क्षेत्रं समुद्दिष्टं सर्वमव्यक्तवर्जितम् । इन चौबीस तत्त्वों में अव्यक्त ( मिलित प्रकृति और पुरुष ) को छोड़ कर

शेष तेईस तत्त्वों को क्षेत्र ( शरीर ) कहा जाता है ।

अव्यक्तमम्य क्षेत्रस्य क्षेत्रज्ञमृषयो विदुः ॥ ६५ ॥

ऋषि लोग अव्यक्त को इमान का जानने वाला ' क्षेत्रज ' कहते हैं ॥ ६५ ॥

१ " सदकारणवन्नित्यम् " वै ० द ० ४१ । १ }

पृष्ठ 28

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अ ० १ ] शारीरस्थानम् १३

जायते बुद्धिरव्यक्ताद्बुद्धयाऽहमिति मन्यते ।

पर खादीन्यहङ्कारादुत्पद्यन्ते यथाक्रमम् ॥ ६६ ॥

ततः स पूर्णसर्वाङ्गो जातोऽभ्युदित उच्यते ।

पुरुषः प्रलये चेष्टः पुनर्भावैर्वियुज्यते ॥ ६७ ॥

अव्यक्त ( मूल प्रकृति से मिले हुए पुरुष ) से बुद्धितत्त्व उत्पन्न होता है । बुद्धि से ' मै ' ऐसा अभिमान करता है । अर्थात् बुद्धि से अहकार उत्पन्न होता है । इसके पश्चात् अहकार से क्रमशः आकाश, वायु, अग्नि 3, जल और पृथिवी ये पाच सूक्ष्म भूत ( तन्मात्रा ) उत्पन्न होते है ' । इन पच तन्मात्राओ से पच महाभूत, इन भूतों से इन्द्रिया उत्पन्न होती हैं । इन पाच भूतों से सम्पूर्ण अगों वाला पुरुष अव्यक्त अवस्था से व्यक्त अवस्था मे उत्पन्न होता है । अब इसको उत्पन्न हो गया वा ' अभ्युदित ' ऐसा कहते है और फिर यह पुरुष प्रलय में ( शरीराम्भक भूतों के कारण में लय होने पर ) बुद्धि आदि इष्ट भावों ( कार्य पदार्थों ) से पृथक् हो जाता है, यही मृत्यु है । अव्यक्त कारण से व्यक्त होना ' जन्म ' कहता है । व्यक्त का कारण में लीन होना ' मृत्यु ' है ॥ ६६-६७ ॥

अव्यक्ताद् व्यक्तता याति व्यक्ताव्यक्ततां पुनः ।

रजस्तमोभ्यामाविष्टश्चक्रवत्परिवर्तते ॥ ६८ ॥

पुरुष रज और तम के कारणों से बधा हुआ अव्यक्त ( कारण ) से व्यक्त रूप में आता है, यही ' जन्म ' है । व्यक्त अवस्था से फिर अव्यक्त अवस्था ( कारण ) में लीन हो जाता है । यही ' मरण ' है । वह फिर व्यक्त होता है । फिर अव्यक्त होता है, इस प्रकार चक्र के भाति जब तक मोक्ष नहीं होता, घूमता रहता है ॥ ६८ ॥

येषां द्वन्द्वे परा ss सक्तिरहङ्कारपराश्च ये ।

उदयप्रलयौ तेषां न तेषां ये त्वतोऽन्यथा ॥ ६६ ॥

जिन पुरुषों की रज और तम के जोड़े मे अत्यन्त आसक्ति है और जो ' मै और यह मेरा है ' ऐसा मिथ्या अभिमान रखते है, उनका ही उदय और प्रलय अर्थात् जन्म और मरण होता है, और जो रज और तम से पृथक् और निरहकार हैं उनका जन्म और मरण नहीं होता ॥ ६६ ॥

१ तन्मात्रा का अर्थ अकेला वही तत्त्व, उसमें ओर किसी भूत का ससर्ग नहीं - जैसे - शब्दतन्मात्र, रूपतन्मात्र आदि । २ अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ गीता ० अ ० २२८

पृष्ठ 29

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१४ चरकसहिता [ अ ० १

प्राणापानौ निमेषाद्या जीवन मनसो गतिः ।

इन्द्रियान्तरसचारः प्रेरण धारण च यत् ॥ ७० ॥

देशान्तरगतिः स्वप्ने पञ्चत्वग्रहण तथा ।

दृष्टस्य दक्षिणेनाक्ष्णा सव्येनावगमस्तथा ॥ ७१

इच्छा द्वेष सुखं दुःख प्रयत्नश्चेतना वृति. ।

बुद्धि: स्मृतिरहङ्कारो लिङ्कानि परसात्मन ॥ ७२ ॥

यस्मात्सनुपलभ्यन्ते लिङ्गान्येतानि जीवत ।

न मृतस्यात्मलिङ्गानि तस्मादाहुर्महर्षयः ॥ ७३ ॥

पुरुष के लक्षण -- शरीर से अतिरिक्त आत्मा के लक्षण प्राण ( शरीर में उस लेना ) ओर अपान ( श्वास पुन छोड़ना ) अर्थात् वायु की ऊर्ध्व और अधोगति होना, उन्मेष निमेष, जीवन, शरीर की वृद्धि, वत और भग्न का सरोहण कार्य, मन का अभिमत विषय मे गमन, एक इन्द्रिय को छोड़ कर दूसरी इन्द्रिय मे मन का जाना, इन्द्रियों को विषय में प्रवृत्त करना, देह को धारण करना, स्वप्नावस्था में देशान्तर मे जाना, मृत्यु का ज्ञान कर लेना, दाये आख ने देखे पदार्थ का बायें आख से ग्रहण करना, इच्छा ( स्वार्थ या परार्थ को प्राप्त करने की चाह ), द्वेष ( अनिष्ट पदार्श को त्यागने की इच्छा ), सुख ( आत्मा के अनुकूल वेदनीय ), दुख ( प्रतिकूल वेदनीय ), प्रयत्न, उत्साह, चेटना, धृति ( धैर्य ), बुद्धि ( ज्ञान ), स्मृति और अहकार ये परम अर्थात् सर्वोपरि आत्मा के लक्षण हैं । ये प्राण आदि समस्त लक्षण जीवित पुरुष मे ही उपलब्ध होते हैं, मृत पुरुष में आत्मा के ये चिह्न नहीं मिलते, इसलिये महर्षियों ने प्राण, अपान आदि सब को आत्मा का लक्षण कहा है ॥७०-७३ ॥

शरीर हि गते तस्मिन् शून्यागारमचेतनम् ।

पञ्चभूतावशेषत्वात् पञ्चत्व गतमुच्यते ॥ ७४ ॥

इस चेतन आत्मा के शरीर से चले जाने पर शरीर शून्य घर की भाति चेतना से रहित हो जाता है । इस शरीर में केवल पाच भून ही शेष लिए शरीर को पञ्चत्व को प्राप्त हुआ कहते हैं ॥ ७४ ॥

अचेतन क्रियावच्च मनश्चेतयिता परः ।

युक्तस्य मनसा तस्य निर्दिश्यन्ते विभोः क्रियाः ॥

चेतनावान् यतञ्चात्मा ततः कर्ता निरुच्यते ।

अचेतनत्वाच मनः क्रियावदपि नोच्यते ॥ ७६ ॥

१ प्राणापाननिमेषोन्मेष जीवन मनोगतीन्द्रियान्तरविकाराः प्रयत्नाश्चात्मनो लिङ्गानि । वैशेषिक ० ३ । २ । ४ । रह जाते हैं, इस ७५ ॥ सुखदुःखेच्छाद्वेष-

पृष्ठ 30

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अ ० १ ] शारीरस्थानम १५ VV मन अचेतन और क्रियावान् है । शरीर को चेतन करने वाला आत्मा चेतन मन से भी पर अर्थात् मुख्य है । क्रियाशील मन के साथ इस विभु आत्मा का योग होने पर आत्मा की ही वे सब क्रिया कही जाती हैं । क्योंकि आत्मा चेतनावान् है, इसी लिये वह कर्ता कहा जाता है । मन क्रियावान् होने पर भी अचेतन है, इसलिये कर्ता नहीं कहा जाता ॥ ७५ -७६ ॥

यथास्वेनात्मनाऽऽत्मानं नयते सर्वयोनिषु ।

प्राणैस्तन्त्रयते प्राणी न ह्यन्योऽस्त्यस्य तन्त्रकः ॥ ७७ ॥

वशी तत्कुरुते कर्म यत्कृत्वा फलमश्नुते ।

वशी चेत समाधत्ते वशी सर्वं निरस्यति ॥ ७८ ॥

आत्मा सब प्राणियों, नर, पशु आदि योनियों मे अपने आप अपने को ले जाता है और अपने आप अपने को प्राणों से युक्त करता है । इस आत्मा का कोई दूसरा सचालक नही है । वह स्वयं वशी ( सब को परवश करने वाला ) आत्मा उस कर्म को करता है जिसे करके वह फल भोगता है । वह वशी आत्मा ही चित्त को लगाता है और वह वशी ही सब कुछ त्याग देता है । [ अर्थात् वही फलार्थी होकर कर्म करता है और चाहे तो कभी फलाकाक्षा को त्याग भी सकता है ] || ७७-७८ ||

देही सर्वगतो ह्यात्मा स्वे स्वे सस्पर्शनेन्द्रिये ।

सर्वाः सर्वाश्रयस्थास्तु नात्माऽतो वेत्ति वेदनाः ॥ ७६ ॥

आत्मा सब में व्यास होकर भी देहवान् बनकर केवल अपनी स्पर्शनेन्द्रिय से युक्त देह मे रहता है । इसलिये अन्य सब शरीरों की वेदनाओ को नहीं जानता ७६

विभुत्वमत एवास्य यस्मात्सर्वगतो महान् ।

मनसश्च समाधनात्पश्यत्यात्मा तिरस्कृतम् ॥ ८० ॥

आत्मा सब मे व्यास और महा परिमाण है, अत ' विभु एका कर, समाधि के बल से भित्ति आदि से छिपे पदार्थों को भी

नित्यानुबन्धं मनसा देहकर्मानुपातिना ।

सर्वयोनिगत विद्यादेकयोनावपि स्थितम् ॥ ८१

शरीर और कर्मों का अनुसरण करने वाले मन के साथ सम्बन्ध है । वह एक योनि में स्थित होने पर भी उसे मन के मेव्यात समझना चाहिये ॥ ८१ ॥

आदिर्नास्त्यात्मन क्षेत्रपारम्पर्यमनादिकम् ।

अतस्तयोरनादित्वात्कि पूर्वमिति नोच्यते ॥ ८२

' है । मन को देख लेता है | ८० | ॥ आत्मा का नित्य द्वारा सब योनियों ॥