श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 121–130
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 121–130
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१०६ चरकसंहिता [ अ ० ८ AAA या श्वेत सरसों के दो दो दानों के साथ दही में मिलाकर पुष्य नक्षत्र में पान करे ' । ( २ ) दूसरी विवि - जीवक, ऋषभक, अपामार्ग, सहचर इनके कल्क को सब के साथ अथवा अलग अलग दूध के साथ इच्छानुसार संस्कृत लेना चाहिये । फिर कुड्य कीट ( भित्तिमत्स्य ) २, मत्स्यको ( मत्सक ), इनको चुल्लू भर पानी में मिला कर पुष्प नक्षत्र में पीना चाहिये । ( ३ ) तीसरी विधि - स्वर्ण, चादी या लोहे से बहुत सूक्ष्म मनुष्य की आकृति बना कर आग में लाल करके, दही दूब या चुल्लू भर पानी में बुझाना चाहिये । फिर पुष्य नक्षत्र मे इसका सम्पूर्ण रूप में पा लेना चाहिये । ( ४ ) चतुर्थ विधि - नुष्य नक्षत्र में ही पकते हुए शाली के आटे की गरमी को सूघ कर और उसी चून को जल वा कर उसके रस को देहली पर शिर रख कर अपने दक्षिण नासापुट रुई के फाये द्वारा सिंचन करे ( जिससे कि मुख में आ जाये ) । यह पुसउन के अनेक प्रकार हैं । इनके अतिरिक्त और भा जिस २ पुसवन या इष्ट कर्म का ब्राह्मण या वृद्ध विद्वान् उपदेश करे उनको भी करे ( जसे--लक्ष्मणा ओषधि के रस को दक्षिण नासा पुट में डालना आदि ) ॥ १७ ॥
अत ऊर्ध्वं गर्भास्थानानि व्याख्यास्यामः – ऐन्द्री ब्राह्मी - शतवीर्या-सहस्रवीर्याऽमोवाऽव्यथा शिवा - बलाऽरिष्टा वाट्य पुष्पी - विष्वक्सेनका-न्ता च । आसामोषधीनां शिरसा दक्षिणेन पाणिना धारण, ear भिचैव सिद्धस्य पयसः सर्पिषो वा पानं, एताभिश्चैव पुष्ये पुष्ये स्नान, सदा समालभेत च ताः, तथा सर्वासां जीवनीयोक्तानामोषधीनां सदोपयो-गस्तैस्तैरुपयोगविधिभिः । इति गर्भास्थापनानि व्याख्यातानि भवन्ति १८ इसके आगे गर्भास्थापन विधियों का उपदेश करते हे ऐन्द्री, ब्राह्मी, शत-वीर्या, सहस्रवीर्या ( दूब के भेद ), अमोवा ( पाटला ), अन्यथा ( गिलोय ) शिवा ( हरीतकी ), अरिष्टा ( कटुरोहिणी ), वाट्यपुष्पा ( पीतबला ), विष्व-क्सेनकान्ता ( प्रियगु ), इन ओषधियों को शिर में तथा दक्षिण हाथ में धारण करना चाहिये । इन ओषधियो से सस्कृत दूध वा घी का पान करना चाहिये । इन ओषधियों के काथ से प्रत्येक पुष्प नक्षत्र में स्नान करना चाहिये । इन १ धान्यमात्र शब्देन - व्रीहि मात्र ग्राहयन्ति, स्वर्णमाष च व्यावर्त्त-यन्ति । चक्रपाणि । २ कुड्य कीट - दिवार में मिट्टी से जो कीड़ा घर बनाता है, ३ गर्भाधान और पुसवन विधि के लिये सस्कारविधि तथा बृहदारण्यकोप-निषद में पुत्रेष्टि - प्रकरण ( बृहद् ० उप ० अ ० ६ | ब्रा ० ४ ॥ )
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अ ० ८ ] शारीरस्थानम् १०७ औषधियों को सदा पास में रखे । इसी प्रकार जीवनीय गण में कही हुई सम्पूर्ण औषधियो का नाना प्रकारों से सदा उपयोग करते रहना चाहिये | यह गर्भ स्थापन विधिया कह दी हे ॥ १८ ॥
गर्भो घातकरास्यि भावा भवन्ति । तद्यथा - उत्कटुक - विषम-कठिनासन- सेविन्या बात -सूत्र - पुरीष- वेगानुपरुन्धत्या दारुणानुचित - व्या-याम - सेविन्यास्तीक्ष्णोष्णातिमात्र लेविन्याश्च गर्भो त्रियतेऽन्न कुक्षेर-काले वा त्रसते शाषी वा भवति, यथाऽभिघातप्रपीडन, श्वभ्र - कूप- प्रपा-नोद्देशावलोकने वीक्ष्ण मातुः प्रपतत्यकाले, नयाऽतिमात्र संशोभि-भिर्यानैरप्रियातिमात्रश्रवणैर्वा । प्रततोत्तानशायिन्याः पुनर्गर्भस्य नाभ्या-या नाडी कण्ठमनुवेष्टयति विवृतशायिनी नक्तचारिणी चोन्मतं जनयनि, अपस्मारण पुनः कलिकलहशीला । व्यवायशाला दुर्वपुष-मह्लीकं खैगं वा । शोकनित्या भीतमपचितमल्पायुष वा । अभिध्यात्री परोपतापिनमीष्णुं स्त्रैणं वा । स्तेनात्यायास बहुलमतिद्रोहिण मकर्मशील बा । अमर्षिणी चण्डमौपधिकमसूयकं वा । स्वप्ननित्या तन्द्रालमबुध-मल्पानि वा । मद्यनित्या पिपासालुमल्पस्मृतिमनवस्थितचित्त वा । गोवा - मास प्रिया शार्करिणमश्मरिण शनैर्मेहिन वा । बराहमांसप्रिया रक्ताक्षं क्रथनमनतिपरुषरोमाण वा । मत्स्यमासनित्या चिरनिमेष स्तब्वाक्षं वा । मधुरनित्या प्रमेहिनं मृकमतिस्थूल वा । अम्लनित्या रक्तपित्तनं त्वगक्षिरोगिणं वा । लवणनित्या शीघ्रवलीपलितं खालित्य-रोगिण वा । कटुकनित्या दुर्बलमल्पशुक्रमनपत्य वा । तिक्तनित्या शो-णिमबलमपचितं वा । कषाय नित्या श्यावमानाहिनमुदावर्तिनं वा, यद्यच्च यस्य यस्य व्याधेर्निदानमुक्त तत्तदासेवमानाऽन्तर्वत्नी तद्विकार-बहुलमपत्यं जनयति । पितृजास्तु शक्रदोषा मातृजैरपचारैर्व्याख्याताः । इति गर्भोपवातकरा भावा भवन्त्युक्ताः ॥ १६ ॥
निम्नलिखित बाते गर्भ का नाश करनेवाली हैं । यथा - उकडू ( घुटनों के बल ) अथवा विषम, टेढे मेढे, 3 ऊचे नीचे या कठिन आसन या स्थिति में बैठने, वात, मूत्र और मल के वेग को रोकने, दारुण या अनुचित व्यायाम का करने, अति तोक्षण या अति उष्ण पदार्थों का सेवन, और भूख से कम ( प्रमित ) भोजन करने से गर्भ गर्भाशय में मर जाता है, अथवा विना समय के बह जाता है, या अन्दर ही सूख जाता है । इसी प्रकार चोट लगने से, दबने से, माता के गहरे गड्ढे में, कुए में, जल - प्रपात के स्थान को बार बार देखने से अकाल
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१०८ चरकसंहिता [ अ ० ८ में गर्भ गिर जाता है । बहुत अधिक हिलने जुलनेवाली सवारी पर चलने से, अप्रिय बातों के बहुत सुनने से, निरन्तर उतान ( चित ) सोने से, गर्भ की नाभि में लगी नाड़ी गर्भ के गले में लिपट जाती है । खुले स्थान में, मैदान मे सोनेवाली या रात मे घूमनेवाली स्त्री के नित्य पागल सतान उत्पन्न होती है, झगडालु स्त्री अपस्मार रोगवाली सतान उत्पन्न करती है । मैथुनशील स्त्रो बुरे शरीर वाले, निर्लज या स्त्री - प्रकृति के सतान को उत्पन्न करती है । नित्य शोका-तुर रहनेवाली स्त्री भीत, निर्बल अथवा थोड़ी उमरवाले सतान को जन्म देती है, मन से द्रोह करनेवाली, दूसरे को पोड़ित करनेवाले, ईर्ष्यालु या स्त्री - प्रकृति के सतान को जन्माती है, चोरी के स्वभाववाली स्त्री बहुत मेहनत करनेवाले, अतिद्रोही अथवा कर्म न करनेवाले सतान को पैदा करती है । क्रोवशील स्त्री चण्ड, शठ या निन्दा करने गले सतान को उत्पन्न करती है । नित्य सोने वाली माता आलसी, मूढ अथवा मन्दाग्नि स्नान को उत्पन्न करती है । मद्यपान करने वाली स्त्री पिपासा वाले, थोड़ी स्मृति और चचल मन वाले सतान को उत्पन्न करता है । गोधा ( गोह ) के मास को खाने वाली स्त्री शर्करामोही, पथरी के रोगी या शनै. मेही को जन्म देती है, सूअर के मास में afa करने वाली स्त्री लाल आखों वाले वा अकस्मात् जिसका श्वास बन्द हो जाये, ऐसे, कठोर बालों वाले सतान को जन्म देती है । मछलियों के मास में रुचि करने वाली स्त्री देर मे पलक गिराने वाले, अथवा बे झपक आख वाले सतान को पैदा करती है 1 । मधुर रस ( दूध को छोड़कर शेत्र मधुर ) को खाने वाली स्त्री प्रमेही, गूगी या बहुत मोटे सतान को जन्म देती है । अम्ल रस का सेवन करने वाली रक्तपित्त के रोगी वा त्वचा और आंख के रोगी को जन्म देती है । लवण रस को सेवन करने वाली स्त्रो शीघ्र बलि ( भुरिया ) या पलित ( सफेद बाल वाले ) तथा गजे सतान को जन्म देती है । कटु रस को सेवन करने वाली स्त्री दुर्बल अल्पशुक्रवाली या सतान रहित सतति को उत्पन्न करती है । तिक्त रस को सेवन करने वाली स्त्री शोषरोगी, निर्बल या छोटी सतति को उत्पन्न करती है । कषाय रस को सेवन करने वाली स्त्री श्याव ( काले ) आनाह वा उदावर्त्त रोगी * शैटेण्डा अस्पताल में एक नवजात बच्चा लगातार चार पाच दिन तक शेता रहा । इसको चुप कराने के लिये सब उपायें किये गये । प्यास के लिये पानी भी दिया, दूध भी दिया, पर चुप न हुआ । अन्त मे मद्य देन पर हो चुप हुआ । इस कारण को छूढने पर पता चला कि इसकी माता शराब पीती थी ।
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अ ० ८ ] शारीरस्थानम् १०६ सतान को उत्पन्न करती है । जिस जिस रोग के जो जो कारण कहे हैं, उन २ कारणों को सेवन करने वाली माता उसी उसी रोग से ग्रस्त सतान को उत्पन्न करती है गर्भ का नाश करने वाले पिता के शुक्र दोषों की व्याख्या माता के किये अपचारों से कर दी है ॥ १६ ॥
तस्मादहितानाहारविहारान् प्रजा संपदमिच्छन्तो बी विशेषेण वर्ज -येत् । साध्वाचारा चाऽऽत्मानमुपचरेद्धिताभ्यामाहारविहाराभ्याम् || २० || इसलिये जो स्त्री यह चाहे कि उसकी सतान गुणवती हो वह अहितकारी आहार - विहार का विशेष रूप से त्याग करदे । वह साधु आचार से रह कर हितकारी आहार - विहार का सेवन करे ॥ २० ॥
व्याधींश्चास्या मृदु - मधुर- शिशिर - सुख सुकुमार- प्रायैरोपधाहारोपचारै-रुपचरेत् । न चास्या वमन विरेचन शिरोविरेचनानि प्रयोजयेत्, न रक्त-मवसेचयेत्, सर्वकाल च नास्थापनमनुवासनं वा कुर्यादन्यत्रात्ययिका-द्वयाः । अष्टमं मासमुपादाय वमनादिसाध्येषु पुन विकारेष्वात्ययिकेषु मृदुभिर्वमनादिभिस्तदर्थकारिभिर्वोपचारः स्यात्, पूर्णमित्र तैलपात्रम सक्षोभयताऽन्तर्वत्नी भवत्युपचर्या ॥ २१ ॥
गर्भिणी के रोगों की चिकित्सा मृदु, मधुर, शीतल, सुख और सुकुमारप्राय औषधियों और ऐसे ही आहार विहारो से करनी चाहिये । गर्भिणी को वमन, विरेचन अथवा शिरोविरेचन नही देने चाहिये । रक्तमोक्षण भी नहीं करना चाहिये । कोई खास रोग को छोड़ कर हर समय आस्थापन या अनुवासन क्रिया भी नहीं बरतनी चाहिये । आठवा मास लग जाने पर यदि कोई ऐसा रोग आ पड़े जिसमें कि वमन आदि क्रिया आवश्यक ही हो, तब कोमल रूप में वमन आदि क्रियाओं को करावे, अथवा ऐसी ही क्रिया करने वाले अन्य उपाय करने चाहियें । गर्भ को तैल से भरे पात्र के समान जान कर क्षोभ आदि उत्पन्न न करते हुए गर्मिणी का उपचार करना चाहिये ॥ २१ ॥
सा चेदपचाराद् द्वयोस्त्रिषु वा मासेषु पुष्प पश्येन्नास्या गर्भः स्था-स्यतीति विद्यात् । अजातसारा हि तस्मिन् काले भवन्ति गर्भाः || २२ || यदि अपचार के कारण दूसरे या तीसरे मास में गर्भिणी को रजोदर्शन हो जाय तो समझना चाहिये कि इसको गर्भ नहीं रहेगा, क्योंकि इस समय तक गर्भ मे सार उत्पन्न नही होता ॥ २२ ॥
सा चेच्चतुःप्रभृतिषु मासेषु क्रोध - शोकासूयेर्ष्या - भय - त्रास व्यवाय व्या-याम सक्षोभ संधारण - विषमासन - शयन - स्थान - क्षुत्पिपासाद्यतियोगात्क-दाहाराद्वा पुष्प पश्येत्तस्या गर्भ - स्थापन विधिमुपदेक्ष्यामः ।
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११० चरकसंहिता [ अ ० ८ यदि गर्भिणी को चौथे आदि मासों मे क्रोध, शोक, ईर्ष्या, भय, त्रास, मैथुन, व्यायाम, विश्वोभ, वेगों के रोकने, विपम आसन, विपम शयन, विषम स्थान, भूख प्यास के अति वेग से अथवा कुत्सित आहार के कारण पुष्प दर्शन होने लगे उसके लिये गर्भ स्थापन विधि का उपदेश करते हैं । पुष्पदर्शनादेवेना ब्रूयात शयनं तावन्मृदु - सुख - शिशिरास्तरण संस्ती-मीतशिरस्क प्रतिपद्यस्येति, ततो यष्टीमधुक - सर्पिर्ध्या परम-शिशिर वारिणि संस्थिताभ्यां पिचुतासाव्योपस्थसमीपे स्थापयेत्तस्या | तथा शतधौत- सहस्रधाताभ्या सर्पिर्ध्यामधो नाभेः सर्वतः प्रदिह्यात् । गव्येन चैना पयसा सुशीतेन मधुकाम्बुना वा न्यग्रोधादिकषायेण वा परिपेचयेधो नाभेः । उदक वा सुशीतमवगाहयेत् क्षीरिणा कषायमाणा च स्वरसपरिपीतानि चेलानि ग्राइयेत् । न्यग्रोधादिसिद्ध-योवी क्षीरसर्पिपोः पिचु ग्राह्येत्, अतश्चैवाक्षमात्र प्राशयेत् । प्राशयेद्वा केवलं च क्षीरसर्पिः । पद्मोत्पल कुमुद - किञ्जल्काश्चास्य समधुशर्करान् लेद्दार्थ दद्यान् । शृङ्गाटक- पुष्कर वीज कशेरुकान् भक्षणार्थं, गन्ध - प्रियङ्ग सितोत्पल - शाल कोदुम्बर- शलाटु न्यग्रोध शुङ्गानि वा पाययेदेनामाजेन पयसा । पयसा चैना बलातिबला - शालि षष्टिकेक्षुमूल- काकोली- शृतेन समधुशर्करं रक्तशालीनामादन मृदु - सुरभि शीत भोजयेत् । लाव- कपि-अल - कुरङ्ग - शम्बर- शश - हरिणैण कालपुच्छक - रसेन वा घृत - सलिल - सिद्धेन सुख - शिशिरोपवात - देशस्था भोजयेत्, तथा क्रोध - शोकायास व्यवाय व्या-यामतश्चाभिरक्षेत्, सौम्याभिश्चैना कथाभिमनोऽनुकूलाभिरुपासीत, तथाऽस्या गर्भस्तिष्ठति ॥ २३ ॥
पुष्प दर्शन ( रजोदर्शन ) होने पर वैद्य इस गर्भिणी को आदेश देवे-बिस्तर कोमल, सुखकारक, शीतल गद्देदार बनावे | इसका शिरोभाग पायते से जरा नीचे रखे | फिर मुलहठी और घी को मिला कर बहुत ठण्डे पानी में रख कर ठण्डा होने पर इससे फाया भिगो कर योनि में रखे । शतधौत या सहस्रधौत ( पानी मे सौ बार या हजार बार धोये ) घो को नाभि के नीचे के प्रदेश में चारों ओर लगा देना चाहिये । नाभि के निचले भाग पर गाय के दूध से अथवा मुलहठी के ठण्डे काथ से या बट आदि के शीतल कषाय से परिसेचन करना चाहिये । अथवा खूब शीतल जल मे बिठावे । दूध वाले ( बड़-पीपल, गूलर आदि ) वृक्षों के या कषाय वृक्ष ( जामुन, पिलखन आदि ) के स्वरस मे भीगे हुए कपड़ों को रखवावे । बड़, पीपल, गूलर आदि के कोमल शुर्गों ( फुनगियों ) से सिद्ध घी और दूध के फाये को रखत्रावे । इसी सिद्ध घी
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अ ० ८ ] शारीरस्थानम १११ की चार तोला मात्रा चाहिये । अथवा केवल दूध से निकाले घी का सेवन करावे । पद्म ( कमल ) उत्पल कुमुद इनका पराग मधु और शर्करा के साथ मिला कर चाटने के लिये देना चाहिये । सिंघाड़ा, कमलगट्टा, कसेरू ये पदार्थ खाने के लिये देना चाहिये । गन्व पिंयगु, मिश्री, शालूक कन्द, गूलर के कच्चे फल और बढ के शुग ( फुनगी ) इनको पीसकर बकरी के दूध के साथ पिलाना चाहिये । बला, अतिबला, शालि, साठी धान्य, गन्ने की जड़ और काकोली द्वारा सस्कार कर दूध के साथ लाल चावलों के मृदु मधुर और शीतल भात को मधु और शर्करा के साथ खिलाना चाहिये । बटेर, कपिञ्जल, करज, शम्बर ( हरिण भेद ), खरगोश, हरिण, ऐणक, कालपुच्छ इनके मास - रस के साथ अथवा पानी मैं सिद्ध किये घी के साथ, सुखदायक, शीतल वायु वाले स्थान मे विठा कर भोजन करना चाहिये । क्रोव, शोक, मेहनत, मैथुन और व्यायाम आदि से बचाना चाहिये | मन के अनुकूल प्रिय कथाओं से इसका मन बहलाना चाहिये । इस प्रकार करने से गर्भ स्थिर हो जाता है ॥ २३ ॥
यस्याः पुनरामान्वयात्पुष्पदर्शन स्यात्, प्रायस्तत्तस्या गर्भबाधकं भवति, विरुद्धोपक्रमत्वात्तयोः । यस्याः पुनरष्णतीक्ष्णोपयोगाद् गभि-ण्या महति सजातसारे गर्भे पुष्पदर्शन स्यादन्यो वा योनिस्रावः, तस्या गर्भो वृद्धि न प्राप्नोति निःस्रुतत्वात् । स कालमवतिष्ठतेऽतिमात्र, तमुपविष्टकमित्याचक्षते केचित् । उपवास व्रत -कर्म - च - परायाः पुनः कदाहा-रायाः स्नेहद्वेषिण्याः वातप्रकोपणोक्तान कान्यासेवमानाया गर्भो न वृद्धि प्राप्नोति परिशुष्कत्वात् । स चापि कालमवतिष्ठतेऽतिमात्र, अस्पन्दनश्च ' भवति, तं तु नागोदरमित्याचक्षते ॥ २४ ॥
जिस गर्भिणी मे आम को उत्पन्न करने वाले कारण से पुष्प दर्शन होता है । उसका गर्भ नष्ट ही हो जाता है । क्योंकि इनकी चिकित्सा परस्पर विरोधी पड़ती हैं । गर्भस्राव मे स्तम्भन औषव बरती जाती है । स्तम्भन औषध शीत, मृदु और मधुर होती है और इधर शीत, मृदु और मधुर औषध आम दोष को उत्पन्न करती है । इसलिये असाध्य है । जिस गर्भिणो मे उष्ण, तीक्ष्ण वस्तुओं के सेवन से, गर्भ के अन्दर सार उत्पन्न होने पर पुष्पदर्शन अथवा आर्त्तव के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार का योनि स्राव होने लगे, तब गर्भ की वृद्धि रुक जाती है । क्योंकि बहने से पोषक पदार्थ के बाहर आ जाने से यह गर्भ बहुत १ अतिमात्रस्पन्दश्च भवति, यह भी पाठ है, परन्तु सुश्रुत में मन्द स्पन्दते दिया है, इसलिये अस्पन्दनश्च भवति ठीक है ।
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११२ चरकसंहिता [ अ ० ८ समय तक रुक जाता है । इसको ' उपविष्टक ' कहते है । और जो गर्भिणी प्राय. उपवास करती है या कुत्सित आहार का सेवन करती है, घी आदि स्नेह से द्वेष करती है, वात प्रकोपक कारणो का सेवन करती है, उसका भी गर्भ वृद्धि को प्राप्त नही होता, क्योंकि वह गर्भ शुष्क हो जाता है! वह गर्भ
बहुत समय तक गर्भाशय में रुका रहता है । इसके अन्दर हरकते नहीं होती ।
reat ' नागोदर ' कहते है ॥ २४ ॥
नार्योस्तयोरुभयोरपि चिकित्सित विशेषमुपदेक्ष्यामः - भोतिक जीवनी-य- बृहणीय - मधुर- वातहर - सिद्धाना सर्पिपामुपयोगः, नागोदरे तु योनिव्या-पन्निदिष्टपयसामामगर्भाणा गभवृद्धिकराणा च, सम्भोजनमेतैरेव सिद्धेश्व घृतादिभिः सुभिक्षायाः, अभीक्ष्ण वान - वाहनावमार्ज नावजृम्भणैरुपपा-दनमिति ॥ २५ ॥
उपरोक्त दोनों प्रकार की स्त्रियो की विशेष चिकित्सा का उपदेश करते है -भूतों ( सूक्ष्म जन्तुओं को दूर करन ) के लिये उपयागी गुग्गुलु सरसों आदि अथवा महापैशाचादि घृत, जीवनीय, बृहणीय, मधुर और वातहर ओषधियों से सिद्ध घृत का उपयोग करना चाहिये । नागोदर गर्भ को अवस्था में योनि व्यापत् अधिकार में कहे घृता का तथा आम - गर्भ और गर्भ को वृद्धि करने वाले भोजनों का उपयोग और इनसे ही सिद्ध वृतों का उपयोग करना चाहिये । यान, वाहन, शरीर शुद्धि, जृम्भण आदि कर्मों को बार बार करना चाहिये ॥ २५ ॥
यस्याः पुनर्गर्भः प्रसुप्तो न स्पन्दते ता श्येन मत्स्य- गवय तित्तिर - ताम्र-चूड - शिखिनामन्यतमस्य सर्पिष्मता रसेन माषयूषेण वा प्रभूतसर्पिषा मूलकयूषेण वा रक्तशालीनामोदन मृदु - मधुर - शीतल भोजयेत्, तैलाभ्य-चास्या अभीक्ष्णमुदरवक्षणोरु- कटी - पार्श्व - पृष्ठ - प्रदेशानीषदुष्णे नोपाचरेत् ॥ २६ ॥
जिस गर्भिणी मे सोया हुआ गर्भ गति न करे उस स्त्री को श्येन, मछली, गवय, मोर कुक्कुट या तीतर इनके मास रस के साथ घी अथवा माषयूष के साथ पर्याप्त घी, मूली के यूप के साथ लाल चावलों का मधुर, मृदु, शीतल भात खिलाना चाहिये । इस स्त्री के शरीर पर वैल की मालिश करके हलके गरम पानी से उदर, पेट, जाध, कटी, पीठ और पार्श्व का बार बार स्नान कराना चाहिये ॥ २६ ॥
यस्याः पुनरुदावर्त - विवन्धः स्यादष्टमे मासे न चानुवासनसाध्यं मन्येत, ततस्तस्यास्तद्विकारप्रशमनमुपकल्पयेन्निरूहम् । उदावर्तो पे-
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अ ० ८ ] C शारीरस्थानम् ११३ क्षितः सहसा सगभी गर्भिणीं गर्भमथवाऽतिपातयेत् । तत्र पीरण- शालि षष्टिक - कुश काशेक्षुबालिका - वेतस परिव्याध - मूलानां भूतीकानन्ता-कारमये परूषक- मधुक - मृद्धीकाना च पयसाऽर्धोदकेनोद्गमय्य रस प्रियाल - बिभीतक - मज्ज - लिकल्क संप्रयुक्तमीषल्लवणमनत्युष्ण निरूहं दद्यात् । व्यपगतविबन्धां चना सुख - सालल - परिषिक्ताङ्गी स्थैर्यकरमवि-दाहिनमाहार भुक्तवती साथ मधुकसिद्धेन तैलेनानुवासयेत् । न्युब्जां त्वेनामास्थापनानु वासनाभ्यामुपचरेत् ॥ २७ ॥
जिस स्त्री का आठवे मास में उदावर्त्त रोग आ पड़े और अनुवासन बस्ति का प्रयोग उचित न हो, तो इस रोग को मिटाने के लिये उचित निरूह बस्ति का प्रयोग करना चाहिये । उपेक्षा किया हुआ यह उदावर्त्त रोग अचानक ही गर्भ के साथ गर्भिणो का अथवा गर्भ की शान्ति के लिये वारण, शालिधान्य, ( वेतस का भेद ) इनकी जड़, भूताक किशमिश इनके पानी से अ वे दूध मे मैं पियाल, बहेड़ा की मजा और तिल कुछ नमकीन बना कर अल्प गरम वट हट जाने पर थाड़े गन्म पानी अविदाही भोजन खिलाना चाहिये । को हा नष्ट कर देता है । उदावर्त्त रोग कुश, काश, गन्ना, वेतस, परिव्याघ , सारिवा, गम्भारी, फालसा, मुलहटी, क्वाथ तैय्यार करना चाहिये । इस काथ इनका कल्क डाल कर सिद्ध किये तथा बस्ति ( निरूह ) देनी चाहिये । रुका-से स्नान कराके, स्थिरता करने वाला, सायकाल ( मधुक ) मुलेठी सिद्ध तैक से अनुवासन बस्ति देना चाहिये । औवी लेटी गर्भिणी का आस्थापन तथा अनुवासन द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये । [ उदर शूल के कारण गर्भिणी की यह स्थिति स्वय हो जाती है ] ॥२७ ॥
यस्याः पुनरतिमात्रदोषोपचयाद्वा तीक्ष्णोष्णातिमात्रसेनाद्वा बार-मूत्रपुरीष- वेग - धारणैर्वा विषमासन - शयन - स्थान सपीडनाभिघातव क्रोध - शोकेर्ष्या सूया - भय - त्रासादिभिर्वा साहसेर्वाऽपरैः कर्मभिरन्तः कुक्षे-गर्भो म्रियते, तस्याः स्तिमित स्तब्धमुदरमात शीतमश्मान्तर्गतमिव भव-त्य स्पन्दनो गर्भः शूलमधिकमुपजायते । न वाव्यः प्रादुर्भवन्ति । योनिर्न प्रस्रवत्यक्षिणी चास्याः स्रस्ते भवतस्ताम्यति व्यथते भ्रमते श्वसित्यर-तिबहुला च भवति । न चास्या वेगप्रादुर्भावो यथावदुपलभ्यत इत्येव-लक्षणां स्त्रियं मृतगर्भेयमिति विद्यात् ॥ २८ ॥
जिस गर्भिणी में दोषों के अधिक सचय होने से अथवा अति तीक्ष्ण या अति उष्ण पदार्थों के सेवन से, वायु, मूत्र, मल के वेगों को रोकने से, विषम
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११४ चरकसंहिता [ अ ० ८ आसन, विषम शयन, विषम स्थान, पीड़न या चोट आदि से, क्रोध, शोक, भय, ईर्षा, त्रास आदि में अथवा अन्य साहसिक काव्यो के कारण गर्भ गर्भाशय के भीतर ही मर जाता है, उसमें इसके कारण पेट, चमडे मे ढपा, जैसा निश्चल, फैला, शीतल हो जाता है । उदर में पत्थर सा पडा हुआ प्रतीत होता है । गर्भ में सन्दन नहीं ह'ता, दर्द बहुत बढ़ जाती है । वकालिक दर्दे उत्पन्न नहीं होतीं । योनि से किसी प्रकार का स्राव नहीं आता । आखे अपने आप बाहर निकलती है, स्त्री भय से कातर हो जाती है । अन्धकार सा दीखता है, पीड़ा होती है, चक्कर आते हैं, श्वास बहुत जोर से चलता है । ठीक प्रकार से वेगों की उत्पत्ति नहीं होती । इन लक्षणों से समझ लेना चाहिये कि इस स्त्री का गर्भ मर गया है || २८ ॥ तस्य गर्भशल्यस्य जरायुप्रपातन कर्म मंशमनमित्याहुरेके । मन्त्रा-दिकमथर्ववेदविहितमित्येके । परिदृष्टकर्मणा शल्यहर्नाऽऽहरणमि-त्येके ॥ २६ ॥
व्यपगतगर्भशल्या तु स्त्रियमामगर्भा सुगशीध्वरिष्ट मधु मदिरासवा-नामन्यतमम सामर्थ्यतः पाययेद् गमकाष्ठविशुद्धयर्थमात्तिविस्म-रणार्थं प्रहर्षणार्थ च । अतः पर बृहगेर्बलानुरक्षिभिरस्नेह - संप्रयुक्त-येवाग्वादिभिर्वा तत्कालयोगिभिराहाररुपाचरेद्दाव - धातु - क्लेद - विशाषण-मात्रं कालम् । अतः परं स्नेहपानैर्वन्तिभिराहारविधिभिच दीपनीय-जीवनीय बृहणीय - मधुर - बाहर- समाख्यातैरुपचरेत् । परिपकगर्भशल्या-याः पुनविमुक्तगर्भशल्यायास्तदहरेव स्नेहोपचारः स्यात् ॥ ३० ॥
इस मृत गर्भ रूपी शल्य को बाहर करने के लिये जरायु को निकालने की विधि बरतनी चाहिये ऐसा कइयों का मत है । अथर्ववेदोक्त मंत्रों से कार्य करना चाहिये यह दूसरों का मत है । जिस वैद्य ने इस कर्म को देखा हुआ हो शल्य निकालने वाले उस वैद्य द्वारा यह काम करवाना चाहिये यह तीसरो का मत है । दोष, धातु, क्लेद इनकी समय पर शान्ति रहे, इसलिये कच्चे गर्भ ( शल्य ) के निकल जाने पर स्त्री को प्रथम सुरा, शीधु, अरिष्ट, मधु, मदिरा, आसव इनमें से कोई एक पदार्थ शक्ति अनुसार पिला देना चाहिये । जिसमे कि गर्भाशय की शुद्धि हो जाये तथा दर्द को भूल जाये और मन में प्रसन्नता आ जाये । इसके पीछे बल की रक्षा करने वाली घी आदि स्नेह से रहित यवागू, आदि तत्कालाचित आहार तब तक देवे जब तक दोषयुक्त धातु की क्लिन्नता न सूख जाये | इसके पश्चात् स्नेह - पान स्नेह वस्तिया, तथा दीपनीय,
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अ ०८ शारीरस्थानम् ११५ जीवनीय, बृंहणीय, मधुर और वातनाशक आहार देना चाहिये । जिस स्त्री का गर्भ - शल्य पूर्ण परिपक्क होकर फिर निकले उस स्त्री को उसी दिन ( जिस दिन मृत गर्भ बाहर आवे ) स्नेह क्रिया ( स्नेह पान, स्नेहयुक्त भोजन ) देनी चाहिये || २६-३० ॥ परमतो निर्विकारमाध्यायमानस्य गर्भस्य मासे मासे कर्मोपदेक्ष्यामः । प्रथमे मासे शङ्किता चेद् गर्भमापन्ना क्षीरमनुपस्कृत मात्रावच्छीतं काले काले पिबेदन्तर्वत्नी, सात्म्यमेव च पुनर्भोजन साय प्रातश्च मुञ्जीत । द्वितीये मासे क्षीरमेव च मधुरौषधसिद्धम्, तृतीये नासे क्षीर मधुस-पिंर्भ्यामुपससृज्य । चतुर्थे मासे तु क्षीरनवनीतमक्षमात्रमश्नीयात् । पञ्चमे मासे क्षीरसर्पिः । षष्ठे मासे क्षीर - सर्पिर्मधुरोषध - सिद्धम् । तदेव सप्तमे मासे । तत्र गर्भस्य केशा जायमाना मातुर्विदाहं जनयन्तीति स्त्रियो भाषन्ते, तन्नेति भगवानात्रेय । किंतु गर्भोत्पीडनाद्धि वातपित्त-श्लेष्माण उरः प्राप्य विदहन्ति । ततः कण्डूरुपजायते, कण्डूमूला च किक्कि-शावाप्तिर्भवति । तत्र कोलोदकेन नवनीतस्य मधुरोषधमिद्धस्य पाणि-तलमात्र काले कालेऽस्यै दद्यात् । चन्दन- मृणाल - कल्कैश्वास्याः स्तनादर विमृद्नीयात् शिरीप धातकी सर्पप - मधुक्र - चूर्णैः कुटजार्जक -बीज- मुस्त-हरिद्रा कल्कैव निम्त्र- कोल - सुर- मञ्जिष्टा- कल्केर्वा पृषत हरिण शश- रुधिर-युतया त्रिकलया वा । करवीरपत्र सिद्धेन वा तेलेनाभ्यङ्ग, परिपेकः पुन. मालतीमधुकसिद्धेनाम्भसा । जातकण्डूश्च कण्डूयन वर्जयेत्वग्भेद - रू प्य - परिहारार्थं, असह्याया तु कण्ड्वा मुन्मर्दनोद्धर्पणाभ्या परिहारः स्यान् । मधुरमाहारजातं वातहर मल्पमस्नेहलवणमल्पोइ कानुपान च भुञ्जीत । अष्टमे मासे क्षीरयवागू सर्पिष्मतीं काले काले पिबेत् । इसके आगे स्वस्थ गर्भ के लिये प्रत्येक मास में करने योग्य कर्मों का उप-देश करते है | यदि प्रथम मास में गर्भ रह जाने की शका हो तो गर्भवती स्त्री कन्चे दूध को मात्रा मे थोड़ा थोड़ा करके दिन में कई बार पीये । प्रातः और साथ काल सात्म्य भोजन करे । दूसरे महीने में मधुर ( मुलहट्टी आदि ) औष-धियो से सिद्ध दूध का पान करे । तीसरे मास में दूध को मधु और घी के साथ मिलाकर सेवन करे । चौथे मास में दूध को तोले भर मक्खन के साथ खाये । पाचवे मास में घी और दूध को । छठे मास में मधुर औषधियों से सिद्ध घी, दूध का सेवन करे । यही सातवें मास में खाये । गर्भ के उत्पन्न होते हुए केश माता के देह में जलन उत्पन्न करते हैं - ऐसा स्त्रिया कहती हैं । भगवान् आत्रेय का कहना है कि यह ठीक नहीं है, [ क्योंकि अग प्रत्यगों के बनने के साथ