श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 131–140
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 131–140
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११६ चरकसंहिता [ अ ०८ तीसरे मास में ही केश बनने आरम्भ हो जाते है, सातवें मे नही ] परन्तु गर्भ के उलाइन के कारण वात, पित्त, कफ छाती में आकर जलन उत्पन्न करते है । इस जलन से खाज उत्पन्न होती है । खाज के कारण ही विक्किश अर्थात् चर्म का फटना होता है । इसके लिये बेर के पत्तों के पानी से मधुर औषधियो से संस्कृत मक्खन की पाणितल ( चुल्लू भर ) मात्रा को थोड़ी थोड़ी देर मे देना चाहिये । चन्दन, और बिस इनके कल्क से स्तन और उदर के बीच में लेप करना चाहिये । अथवा तिरस, धाय के फूल, सरसो, महुवा, इनके चूणो से, या कुड़े, अर्जक बीज, मुस्ता, हल्दी इनके कल्क से, अथवा नीम, वेर, तुलसी, मोठ इनके कल्क से, या पृषत् - हरिण, खरगोश इनके रक्त में मिले त्रिफला से स्तन और उदर पर लेप करना चाहिये । अथवा कनेर के पत्तों से सिद्ध तैल की मालिश करनी चाहिये । चमेली, मुलैठी से सस्कृत पानी में स्नान कराना चाहिये । खाज उठने पर स्त्री नही खुजावै जिससे कि त्वचा न फटे या रंग परिवर्तित न हो । यदि खाज असह्य हो तो मर्दन या उद्घर्षण ( उबटन आदि ) से शान्त करनी चाहिये । खाने के लिये मधुर वातनाशक, थोड़े स्नेहवाला, नमकीन आहार, थाड़े पानी के साथ खाना चाहिये | आठवे मास में घी से युक्त दूध में बनी यवागू खावे । तन्नेति भद्रकाप्यः, पैङ्गल्याबाधो ह्यस्या गर्भमागच्छेदिति । अस्त्वत्र पैनल्याबाध इत्याह भगवान् पुनर्वसुररात्रेयः, नत्वेवैतन्न कार्य, एवं कुवती ह्यरोगाऽऽराग्य - बल - वर्ण- स्वर - सहनन- सपदुपेतं ज्ञातीना श्रेष्ठमपत्य जनयति । नवमे तु खल्वेना मासे मधुरौषधाद्धेन तैले-नानुवासयेत्, अतश्ववास्यास्तलपिचु योनो प्रणयद्गर्भस्थानमार्गस्ने-इनार्थम् । यदिद् कर्म प्रथम मासमुपादायोपदिष्टमानवमान्मासात् । तेन गभिण्या गर्भसमये गर्भधारणे कुक्षिकटीपाश्वपृष्ठ मृदु भवति । वातश्वानुलोमः संपद्यते, मूत्रपुरीषे च प्रकृतिभूते सुखेन मार्गावापद्येते, चर्मनखानि च मार्दवमुपयान्ति, बलवर्णौ चोपचीयेते, पुत्रं चेष्ट सपदु-त सुखिन सुखेनंषा काले प्रजायत इति ॥ ३१ ॥
भद्रकाप्य ऋषि का कहना है कि यह ठीक नही है । क्योंकि इस प्रकार करने से गर्भ की आखें पीलो हो जाएगी । भगवान् पुनर्वसु आत्रेय का कथन है कि भले ही गर्भ मे पिंगलता का दोष आजाये तथापि आठवे मास में घी युक्त यवागू ही देनी चाहिये । क्योंकि ऐसा करने से रोगरहित नीरोग, बल, बर्ण स्वर, शरीर इनके उत्तम गुणों से युक्त, बान्धवों में श्रेष्ठ सन्तान उत्पन्न होती
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अ ०८ शारीरस्थानम् ११७ हैं । [ पिंगलता दोष की चिकित्सा उत्तर काल में सुगम है । ] नवम मास में मधुर ओषवियों से सिद्ध तैल से अनुवासन बस्ति देनी चाहिये । मधुर औषध से सिद्ध इसी तैल के फोये को योनि में रखे जिससे गर्भ के आने के मार्ग में स्नेहन ( चिकनापन ) हो जाये । जो गर्भिणो प्रथम मास से लेकर नवम मास तक इस उपर कहे अनुसार कार्य करती रहती है उस स्त्री के कुक्षि, कटि, पीठ और पार्श्व गर्भ समय मे और गर्भ धारण काल में कोमल रहते हैं । वायु का अनुलोमन होना है । मल मूत्र स्वस्थ रूप में सुखपूर्वक बाहर आते हैं । त्वचा और नख भी कोमल रहते हैं । वल वर्ण बढना है, वाञ्छिन, ऐश्वर्य्य-शाली, सुखी पुत्र सुखपूर्वक ठाक समय में उत्पन्न होता है ॥ ३१ ॥
प्रावेवास्था नवमामासात्सूतिकागारं कारयेदपहृतास्थिशर्करा-कपाले देशे प्रशस्त - रूप - रस- गन्धाया भूमौ प्राग्द्वारमुदग्द्वारं वा बैल्वानां काष्टानां तेन्दुकेदकाना भल्लातकानां वारुणानां खादिराणां वा । यानि चान्यान्यपि ब्राह्मणाः शसेयुरथर्ववेदविदः, तद्सनालेपनाच्छादना - पि धान - संपदुपेतं वास्तुविद्या - हृदय - योगाग्नि - सलिलोबल वर्चः स्थान-स्नान - भूमि महान मृतुसुखं च सेवयेत् ॥ ३२ ॥
गर्भिणी के नवा मास लगने से पूर्व ही ऐसा सूतिकागार बनवाले जिस स्थान में हड्डी, मट्टी या ठोकरे आदि न हो 1 । श्रेष्ठ रूप, रस, गन्धवाली भूमि में पूर्व या उत्तर की ओर घर का मुख हो और जिसके चारों ओर तिन्दुक या इगुदी अथवा भिलावे या खैर की लकड़ी से या बिल्व की लकड़ी से चारों ओर का घेरा बनाया जाये । इनके अतिरिक्त अथर्ववेद को जानने वाला ब्राह्मण जो जो बताने वह करे । घर में गर्भिणी के वस्त्र, आलेपन, बिरतर, किवाड़ आदि होने चाहिये । मकान को बनाने की कला के अनुसार आग, जल, ऊखल और मल त्याग के स्थान हों, स्नानगृह, रसोई आदि प्रत्येक ऋतु में सुग्वकारक बनावे और उनका उपयोग करें ॥ ३२ ॥
तत्र सर्पिस्तैल- मधु - सैन्धव - सौवर्चल - काल - विड्- विडङ्ग कुछ- - किलिम-नागर- पिप्पलीपिप्पलीमूल हम्ति - पिप्पली- मण्डूकपण्यैलालाङ्गली -वचा-चव्यचित्रक - चिरबिल्व - हित- सर्षप लशुन - कतक - कण कणिकानी - पातसी-वल्वज - भूर्ज - कुलत्थ- मैरेय - सुरासयाः सन्निहिताः स्युः, तथाऽश्मानौ द्वौ, द्वे च कुण्डमुसले, द्वे उलूखले, खरो वृषभश्च द्वौ च तीक्ष्णौ सूची पिप्पलको सौवर्णराजतौ, शस्त्राणि च तीक्ष्णायसानि, द्वौ च बिल्वमयौ पर्यङ्कौ, * जिससे वायु का शमन हो, प्रसव वेदना कम हो ।
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११८ चरकसंहिता [ अ ० ८ तेन्दुकैङ्गुदानि च काष्ठान्यग्निसंधुक्षणानि, स्त्रियश्च बह्वचो बहुशः प्रजाताः सौहार्दयुक्ताः सततमनुरक्ताः प्रदक्षिणाचाराः प्रतिपत्तिकुशला प्रकृति-वत्सलास्त्यक्तविषादा क्लेशसहिन्योऽभिमताः, ब्राह्मणाश्चाथर्ववेदविदो यच्चान्यदपि तत्र समर्थं मन्येत, यच्चान्यच्च ब्राह्मणा ब्रू ब्रूयुः त्रियश्च वृद्धा, तत् तत् कार्यम् ॥ ३३ ॥
इस सूतिकागार में घी, तैल, शहद, सैन्धा नमक, सौवर्चड, काला नमक विडूर-नमक विडंग, कूठ, देवदारु, सोंठ, पिप्पली, पिप्पलीमूल, गजपिप्पली, मण्डूक-पणी, एला, लागली, वच, चव्य, चित्रक, करज, हींग, सरसों, लहसुन, निर्मली कण, कणिका ( मोटे चावल, चावलों की कणिया ), कदम्ब, अलसी, बल्वज, भोजपत्र, कुलत्थी, मैरेय, सुरा आसव ये वस्तुए पास में होनी चाहियें । द पत्थर, दो छोटे मूसल, दो ऊखल, चण्ड वृषभ, दो तीक्ष्ण सूई रखने के पात्र ( सूई समेत ), सोना चादी से बने शस्त्र, तीक्ष्ण लोहे से बने औज़ार, बेल की लकड़ी से बने दो पलग, अग्नि में जलाने के लिये तिन्दुक और हिंगोट की लकड़िया | जिन्होंने बहुत सी सतान उत्पन्न की हो, स्नेह करने वाली, सौहार्द युक्त, न घबराने वाली, कर्म मे कुशल उत्तम सूझ वाली, स्वभाव से प्रेम रखने वाली, आलस्य रहित, क्लेश को सहन करने वाली ऐसी अनेक स्त्रिया रहनी चाहियें । अथर्ववेद को जानने वाले ब्राह्मण और अन्य ब्राह्मण और वृद्ध स्त्रिया जो २ बतायें वह २ करना चाहिये ॥३३ ॥
ततः प्रवृत्ते नवमे मासे पुण्येऽहनि प्रशस्तनक्षत्रयोगमुपगते प्रशस्ते भगवति शशिनि कल्याणे करणे मैत्रे मुहूर्ते शान्ति कृत्वा गोब्राह्मणम-ग्निमुदकं चादौ प्रवेश्य गोभ्यस्तृणोदकं मधुलाजांश्च प्रदाय ब्राह्मणेभ्यो-S क्षतान्सुमनसो नान्दीमुखानि च फलानीष्टानि दत्त्वा उदकपूर्वमास-नस्थेभ्योऽभिवाद्य पुनराचम्य स्वस्ति वाचयेत्, ततः पुण्याहशब्देन गोब्राह्मणमनुवर्तमाना प्रदक्षिणं प्रविशेत्सूतिकागारं तत्रस्था च प्रसव-काल प्रतीक्षेत || ३४ ॥ नवम मास आरम्भ होने पर पवित्र दिन में, प्रशस्त नक्षत्र के साथ भग-वान् चन्द्रमा का योग होने पर, कल्याणकारी मित्र मुहूर्त्त में, शान्ति होम करके गाय, ब्राह्मण, अग्नि और पानी का प्रथम प्रवेश करावे । गायों को घास, पानी और शहद तथा लाजा देनी चाहिये । ब्राह्मणों को आसन पर बैठा कर अक्षत, फल, नान्दीमुख श्राद्ध मे उपयोगी फल ( खजूर आदि ) जल सहित प्रदान करके आचमन करके स्वस्तिवाचन करावे । इसके पीछे मांगलिक शब्दों के
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अ ० ८ ] शारीरस्थानम् ११६ साथ, गौ, ब्राह्मण के पीछे चलती हुई स्त्री भली प्रकार से सुतिकागार में प्रवेश करे, वहा पर प्रसव काल की प्रतक्षा करे ॥ ३४ ॥
नस्यास्तु खल्विमानि लिङ्गानि प्रजननकालमभितो भवन्ति । तद्यथा - क्लमो गात्राणा, ग्लानराननस्य, अक्षगो. शथिल्यं, त्रिमुक्त-वन्धनत्वमिव वक्षसः, कुदारत्रस्रवन, अधो ' गुरुत्व, वक्षण - बनि कटी- -कुक्षि - पार्श्व - पृष्ठ- निस्तोदो, योनेः स्रवण, अनन्नाभिलाषश्चेति । ततोऽन-न्तरमाचीनां प्रादुर्भावः प्रसेकश्च गर्भोदकस्य ॥। ३५ ॥ प्रसव काल उपस्थित हने पर निम्न लक्षण उपस्थित होते है । जैसे-शरोर में श्रान्ति, चेहरे और आखों मे ग्वनि ( विवर्णता ), बन्धन मुक्त होता प्रतीत होता है, गर्भाशय का नीचे को आना, निचले अंगो में भारीपन वंक्षण, बस्ति, कटि, कुचि, पार्श्व और पीठ में वेदना, योनि मे खाव और भोजन में अनिच्छा होता है । इसके अनन्तर प्रसव काल की वेदना आरम्भ हो जाती है और गर्भ का जल बहने लगता है ॥ ३५ ॥
प्रादुर्भावे तु भूमो शयन विदध्यान्मृद्वास्तरणोपपन्नम् । तद-ध्यासीत सा । तांता समन्ततः परिवार्यं यथाकगुणाः स्त्रिय पर्युपा-सीरन्नाश्वासयन्त्यो वाग्भिप्रहिणीभिः सान्त्वनीयाभिः || ३६ || प्रसव काल की वेदनाओं के आरम्भ होने पर भूमि पर कोमल बिस्तर लगा देना चाहिये । इस बिस्तर पर वह बैठ कर जाये । इसको चारों ओर से स्त्रिया ( पूर्वोक्त गुणोवाली ) घेर ले और शान्ति और आश्वासन देनेवाले वचनों से सान्त्वना देती रहे ॥ ३६ ॥
सा चेदावाभिः संक्लिश्यमाना न प्रजायेताथैन ब्रूयात् - उत्तिष्ठ मुसलमन्यतरत् गृह्णीष्व, अनेन तदुदूखलं धान्यपूर्ण मुहुर्मुहुरभिजहि मुहु-मुहुरवजृम्भस्वचकमस्य चान्तरन्तरा, इत्येवमुपदिशन्त्येके ॥ ३७ ॥
वेदनाओ के कारण पीड़ित होने पर भी यदि बच्चा पैदा न हो तो इसको आदेश करे कि उठ, दोनों में से किसी एक मूसल को लेकर धान्य से परिपूर्ण ऊबल को बार बार कूट, बार बार अगडाई और जभाई ल, बार बार बीच मे चल फिर । ऐसा कई आचार्य कहते हैं ॥ ३७ ॥
तन्नेत्याह भगवानात्रेयः - दारुण व्यायाम वर्जनं हि गर्भिण्याः सततमुपदिश्यते, विशेषतश्च प्रजननकाले प्रचलित सर्वधातु - दोषाया. सुकुमार्या नार्या मुसल- व्यायाम समीरितो वायुरन्तरं लब्ध्वा प्राणाम् स्यात्, दुष्प्रतीकारा हि तस्मिन् काले विशेषेण भवति गर्भिणी, तस्मा-
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१२० चरकसंहिता [ अ ० ८ मुलग्रहणं परिहार्यमृषयो मन्यन्ते, जृम्भणं चङ्क्रमणं च पुनरनु-ष्टेयमिति ॥ ३८ ॥
भगवान् आत्रेय का कहना है कि यह ठीक नहीं है । क्योंकि गर्भिणी स्त्री के लिये कठोर व्यायाम करना सब अवस्थाओं में निषिद्ध है । खास कर प्रसव के समय जब कि शरीर के सब धातु, दोष अस्थिर होते है, उस समय सुकुमार शरीर वाली स्त्री का मूसल लेकर धान कूटने से वायु कारण को पा कर प्राणों का नाश कर दे और उस समय गर्भिणी विशेष रूप से चिकित्सा के लिये कृच्छ्रमाध्य होती है । इसलिये ऋषियों का मत है कि मूसल ग्रहण नही करना चाहिये । अगड़ाई या चलना फिरना अवश्य करना चाहिये ॥ ३८ ॥
अथाग्यै दद्यात्कुटैला लाङ्गलिकी - वचा - चित्रक - चिरबिल्व - चूर्णसुपा-प्रातुं सा तन्मुहुर्मुहुरूपजिघ्रेत्, तथा भूर्जपत्रधूमं शिशपाधूम वा, तस्या-अन्तरान्तरा कटी - पार्व - पृष्ठ - सक्थि- देशानीषदुष्णेन तैलेनाभ्यज्यानुसु-खमवमृद्नीयान्, इत्यनेन तु कर्मणा गर्भोऽवाक्प्रतिपद्यते || ३६ || इसको सूघने के लिये कूट, इलायची, कलिहारी, वच, चित्रक, करज और चविका इनका चूर्ण देना चाहिये । इस चूर्ण को स्त्री बार बार सूघे । इसी प्रकार भोज पत्र के या शीशम के पत्तों का धुवा देना चाहिये 1 । बीच बीच में गर्भिणी की कटि, पार्श्व, पीठ, टागो को गुनगुने तैल से धीरे वीरे मल्ना चाहिये । इस प्रकार करने से गर्भ नीचे की ओर आ जाता है ॥ ३६ ॥
स यदा जानीयाद्विमुच्य हृदयमुदरमस्यास्त्वाविशति, बस्तिशिरोऽ-वगृह्णाति त्वरयन्त्येनामाव्यः " परिवर्तत अधो गर्भ इति, अस्थानव-स्थायां पर्यङ्कमेनामारोप्य प्रवाहितुमुपक्रामयेत् 9 कर्णे चाख्या मन्त्रमिम-मनुकूला स्त्री जपेत् ॥ ४० ॥
जिस समय यह पता लगे कि गर्भ उदर से पृथक् हो गया, गर्म का शिर बस्ति में घुस रहा है, प्रसवकाल की वेदनाये जल्दी जल्दी होने लगी हैं, गर्भ नीचे की ओर घूम रहा है तब इस अवस्था मे स्त्री को पलंग पर लेटा कर प्रवाहण ( बलपूर्वक मूत्र करने का सा जोर लगाने ) के लिये कहे । इस स्त्री के कानों में एक परिचित हितैषिणी स्त्री निम्नलिखित मंत्र का जप करे ॥ ४० ॥
' क्षितिर्जलं वियत्तेजो वायुर्विष्णुः प्रजापतिः ।
सगर्भां त्वां सदा पातु वेशल्यं च दिशन्तु ते ॥४१ ॥
व त्वमविक्लिष्टमविक्लिष्टा शुभानने । कार्तिकेयद्युति पुत्रं कार्तिकेयाभिरक्षितम् || ४२ || इति
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अ ०८ ] शारीरस्थानम् १२१ 5 V VAA पृथ्वी, जल आकाश, अग्नि, वायु, विष्णु और प्रजापति तुझ सगर्भा का सदा पालन करे और तुझे शल्यरहित करें | है शुभ सुन्दर मुख वाली! तू विना किसी कठिनाई के क्लेशरहित गर्भ का प्रसव कर । तू स्कन्द से अभिरक्षित, स्कन्द के समान तेजवाले पुत्र को उत्पन्न कर ॥ ४१ ४२ ॥ ताना यथोक्तगुणाः स्त्रियोऽनुशिष्युः - अनागतावीर्मा प्रवाहिष्ठाः, या ह्यनागतावीः प्रवाहयते व्यर्थमेवास्यास्तत्कर्म भवति । प्रजा चाम्या अविकृता विकृतिमापन्ना वा श्वास - कास - शोष - लीह- प्रसक्ता वा भवति । यथा हि क्षवथूद्गार - वात - मूत्र - पुरीष- वेगान् प्रयतमानोऽप्यप्राप्तकालान्न लभते कृच्छ्रेण बाध्यवाप्नोति तथाऽनागतकालं गर्भमपि प्रवाहमाणा, तथा चैषामेव क्षवध्वादीनां संधारणमुपघातायोपपद्यते तथा प्राप्तका लम्य गर्भस्याप्रवाहणं, सा यथानिर्देशं कुरुध्वेति वक्तव्या, तथा च कुर्वती शनैः शनैः पूर्वं प्रवाहेत ततोऽनन्तर बलवत्तरं, तस्या व प्रवाह-माणायां स्त्रियः शब्द कुर्युः ' प्रजाता प्रजाता धन्यं धन्यं पुत्र ' - मिति, तथाऽस्या हर्षेणाऽऽप्यायन्ते प्राणाः ॥। ४३ ।, पूर्वोक्त गुणो वाली स्त्रिया इस स्त्री को शिक्षा देवे कि विना वेदनाओं के उत्पन्न हुए प्रवाहण ( जोर ) मत करना । जो स्त्री वेदनाओं के उत्पन्न हुए विना प्रवाहण करती ( जोर लगाती ) है उसका श्रम व्यर्थ जाता है । इस स्त्री की स्वस्थ प्रजा विकृत हो जाती है अथवा इस सतान को श्वास, कास, शोष, प्लीहा आदि रोग लग जाते है । जिस प्रकार कि न उपस्थित हुए छीक, उद्गार, वायु, मूत्र और मल के वेगों को बलपूर्वक बाहर नहीं कर सकते अथवा कठिनाई से थोड़ा बाहर करते हैं, उसी प्रकार विना समय के गर्भ को प्रवाहण करने से बाहर नहीं निकाल सकते | जिस प्रकार कि छींक आदि के उपस्थित वेग को रोकने से पीड़ा होती है, उसी प्रकार बाहर आते हुए गर्भ को रोकने में भी कष्ट होता है । इसलिये उसे निर्देशानुसार करने के लिए कहना चाहिये । इस प्रकार विध अनुसार करने मे प्रथम धारे धीरे बल लगावे । इसके पीछे अधिक बल लगावे । बल लगाते ( प्रवाहण के ) समय स्त्रिया शब्द करें, “ पैदा हुआ, पैदा हुआ भाग्यशाली पुत्र, भाग्यशाली पुत्र पैदा हुआ । " इस प्रकार प्रसन्नता के द्वारा प्राणों को बल प्राप्त होता है, उसका उत्साह बना रहता है ॥ ४३ ॥
यदा च प्रजाता स्यात्तदैनामवेक्षेत काचिदस्या अपरा प्रपन्ना अप्र-पन्ना वेति । तम्याश्चेदपरा न प्रपन्ना स्यादथैनामन्यतमा स्त्री दक्षिणेन पाणिना नाभेरुपरिष्टाद्बलवन्निपीड्य सव्येन पृष्ठत उपसंगृह्य सुनिर्धूतं
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१२२ चरकसंहिता अ ० ८ निर्धूनुयात्, अथास्याः पादपार्थ्या श्रोणीमाकोटयेत्, तस्याः स्फिचा-वुपसंगृह्य सुपीडित पीडयेत् । अथास्या बालवेण्या कण्ठताल प्ररिमृ-शेत् । भूर्जपत्र काचमणि - - सर्पनिर्मोकेश्चास्या योनि धूपयेत् । कुटताली-शकल्कं बल्बजमूपे मेरेयसुरामण्डे तीक्ष्णे कोलत्थे वा मण्डूकपिपली-संपाके वा सल्लाव्य पाययेदेना, तथा सूक्ष्मैला- फिलिम कुष्ठ - नागर विड-ङ्ख - कालागुरु - चव्य- पिप्पली - चित्रको कुचिका कल्कं खरवृषभस्य वा जीवतो दक्षिण कर्णमुत्कृत्य हरदि जर्जरीकृत्य बल्बजयूषादीनामाला-वनानामन्यतमसम्मिन् प्रक्षिप्याऽऽलाव्य मुहूर्तस्थित उद्धृत्य तदासावनं पाययेदेनां शतपुष्पा कुष्ट - मदन - हि - सिद्धस्य चैनां तैलस्य पिचु ग्राह-येत् । अतश्चैवानुवासयेत् एतैरेव चाऽऽलावनैः फल जीमूत केक्ष्वाकु धा-मार्गव कुटज कृत वेबन हस्ति - पिप्पल्युपहिते रास्थापयेत्, तदास्थापनम
स्या हि मह वात - मूत्र - पुरी पॅर्निर्हरत्य नराभासक्ता वायोरनुलोमगमनात् ।
अन्यान्यपि हि वात - सूत्र - पुरीषाणि बहिर्गमनशीलानि सज्जन्ति ॥ ४४ ॥
जिस समय गर्भ उत्पन्न हो जाये उस समय देखे कि उसकी अपरा अर्थात् ( आवल नावल, जेर ) बाहर आ गई वा नहीं १ यदि अपरा बाहर न आई हो तो कोई एक स्त्री दायें हाथ से नाभि के ऊपर जोर से दबाये और बायें हाथ से पीठ को पकड़ कर खूब अच्छी प्रकार झटके देवे, कपाव । पाव की एड़ी से इस गर्भिणी की कमर पर दबाव दे । बालो से बनी बेणी द्वारा इसके कण्ठ और तालु को स्पर्श करे ( जिससे कि खाज होकर अपान वायु प्रबल होवे ) । भोज-पत्र, काचमणि, साप को कैचुलो का धुवा यानि में देना चाहिये । कूठ, तालीस -पत्र के कल्क को, बल्वज के क्वाथ मे या मेरेय, सुरा, मण्ड मे या कुलत्था के तीक्ष्ण काथ मे, या मण्डूकपर्णी तथा पिप्पला के सम्मिलित कषाय मे घालकर पिलावे । इसी प्रकार छोटी इलायची, देवदारु, कूठ, सोंठ, विडग, पिप्पली, काळा अगरु, चविका, चित्रक, काला जीरा इनके कल्क को अथवा जोते हुए तीक्ष्ण वृषभ के दक्षिण कान को काट कर पत्थर पर पीस कर बल्वज काथ आदि में से किसी एक काथ में घोल कर कुछ देर रख कर फिर छान कर पिलावे । सौफ, कूठ, मैनफल, हींग इनमे सिद्ध तेल के कषाय के फाये को योनि मे रखे । इसके उपरान्त अनुवासन बस्ति देवे । बल्वजादि क्वाथों के साथ मदनफल, जीमूत इक्ष्वाकु, धामार्गव, कुटज, कृतवेधन, हस्तिनिप्पली के ( कल्पस्थान मे कहे ) कल्पों से आस्थापन करना चाहिये । इस आस्थापन क्रिया करने से फंसी हुई अपरा, वायु, मूत्र, मल के साथ बाहर आ जाती है । वायु के प्रतिलोम होने
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अ ० ८: ] शारीरस्थानम् १२३ से अन्य बाहर निकलने वाले वायु, मूत्र, मह भी अन्दर रुक जाते हैं । वे आस्थापन से बाहर आ जाते हैं ॥ ४४ ॥
तस्यास्तु खल्यपरायाः प्रपतनार्थे कर्मणि क्रियमाणे जानमात्रे -star कुमारस्य कार्याण्येतानि कर्माणि भवन्ति । तद्यथा - अश्मनोः सघट्टन कर्णयोर्मूल, शीतादकेनोष्णोदकेन वा सुखेन परियेकः, तथा संक्लेशवितान् प्राणान् पुनर्लभेत, कृष्णकपालिकाशूर्पेण चैनमभिनि-sy नीयुर्यद्यचेष्टः स्याद्यावत्प्राणाना प्रत्यागमनं तनः प्रत्यागतप्राणं प्रकृतिभूतमभिसमीक्ष्य स्नानोदकग्रहणाभ्यामुपपादयेत् । अपरा को गिराने के लिये उपयुक्त कर्म करते हुए उत्पन्न हुए बच्चे के निम्न कार्य करने योग्य होने हैं यथा— कानों के पास स [ श्रवण शक्ति को जागृत करने के लिये ] पत्थरों को बजाना । ऋतु भेद से गरमियों से शीतल जल से, सदियों में गरम जल से स्नान कराना चाहिये । इस प्रकार करने से योनिच्छद्र में से आने के कारण पीड़ित क्लेश अनुभव करने वाले प्राणों को पुनः सुख प्राप्त कराता है । यदि शिशु चेष्टारहित हो तो इस को सींक से बने छाज से हवा करनी चाहिये, जब तक कि श्वास न आजाये । श्वास आने पर तथा स्वस्थ अवस्था में देख कर उसको स्नान कराना तथा उसके मलमार्ग स्वच्छ करने चाहिये । अथास्य ताल्वोष्ठ - कण्ठ - जिह्वा प्रमार्जनमारभे वाङ्गुल्या सुपरिलि-खितनखया सुप्रक्षालितोपधान - कार्पास - पिचुमत्या, प्रथम प्रमार्जितस्य चास्य शिरस्तालु कार्पासपिचुना स्नेहगर्भेण प्रतिच्छादयेत्, ततोऽस्या-नन्तर कार्यं संन्धवोपहितेन सर्पिषा प्रच्छर्दनम् ॥ ४५ ॥
इस बच्चे के तालु, आठ, कण्ठ, जिह्वा को साफ करना प्रारम्भ करे, इसके लिये जिसके नख कटे हो वह उस से अगुडी घोई हुई स्वच्छ रुई के फाये द्वारा उसे साफ करे, नहाये बच्चे के प्रथम मुख को साफ़ करे और शिरतालु के ऊपर तैल में भीगे रुई के फाये को रखे । इसके पीछे सैन्धव मे मिले घी के द्वारा वमन करावे जिससे कफ निकल जाये ॥ ४५ ॥
अथ नाड्यास्तस्य कल्पनविधिमुपदेक्ष्यामः --- नाभिबन्धनात्प्रभृ-त्यष्टालमभिज्ञान कृत्वा छेदनावकाशस्य द्वयोरन्तरयोः शनैर्गृहीत्वा तीक्ष्णेन रौक्मराजता साना छेदनानामन्यतमेनार्धधारेण छेदयेत्ताम् । अग्रे सूत्रेणोपनिबध्य कण्ठेऽस्य शिथिलमवसृजेत् । तस्य चेन्नाभिः पच्येत, तां लोध्र- मधुक - प्रियहु - देवदारु - हरिद्रा - कल्क- सिद्धेन तैलेनाभ्य-
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१२४ चरकसंहिता [ अ ० ८ www . ज्यात्, एषामेव तै ौषधानां चूर्णेनावचूर्णयेत् 5 एष नाडीकल्पनविधि-रुक्तः सम्यकू ॥ ४६ ॥
इसके पश्चात् नाड़ी के काटने की विधि का उपदेश करते हैं । नाभिबन्ध से लेकर आठ अंगुल ऊपर एक, और उससे जरा ऊपर दूसरा बन्धन लगा कर उन दोनों बन्धनों के बीज के अन्तर में मध्यभाग को धीरे से पड कर स्वर्ण, चादी या लोहे के बने किसी एक तेज अर्धधार शस्त्र से नाड़ी काट दे । नाल के प्रभाग में धागा बाधकर धीरे से ( ढीही ) गले + बॉध देनी चाहिये । यदि बच्चे की नाभि पक जाए तो - लोध, मुलहठी, फूलप्रियगु, देवदार हल्दी इनके बल्क द्वारा संस्कृत तैन्ड को लगाकर इन्हीं ओषवियों के चूर्ण को ऊपर से छिड़क देना चाहिये । यह नाड़ी कल्पन करने की विधि कह दा है ॥ ४६ ॥
असम्यकल्पेन हि नाड्या आयाम व्यायामोतुण्डिका - पिण्डलिका-विनामिका विजृम्भिका गयो भयम् । तत्राविदाहिभिर्वात - पित्त - प्रश मनरभ्यङ्गोत्सादन - परिषेक सर्पिर्भिश्चोपक्रमेत गुरुलाघवमभिस-मीक्ष्य ॥ ४७ ॥
नाडी के भली प्रकार न काटने से नाड़ी की आयाम ( लम्बाई ), व्यायाम चौड़ाई ( विस्तार ), हुण्डिका, [ लम्बा और मोटापन ], पिण्डलिका [ गोक चक्कर के आकार की ], विनामिका [ किनारों से उची, बीच में दबी ], विज-भिका [ बार बार बढने घटने वालो ] आदि रोग हो जाते हैं । दोषों की गुरुता लघुता देख कर दाह उत्पन्न न करने वाले वात पित्त को शान्त करने वाले वृतो से तैलमर्दन, उबटन और स्नान आदि करावे ॥ ४७ ॥
ततोऽनन्तर जातकर्म कुमारस्य कार्यम् । तद्यथा - मधुसर्पिषी मन्त्रोपमन्त्रिते यथाम्नायं प्रथम प्राशितुमस्मै दद्यात्, स्तनमत ऊर्ध्व-मेतेनेव विधिना दक्षिणं पातु पुरस्तात्प्रयच्छत्, अथातः शीर्षतः स्थापयेदुदकुम्भं मन्त्रोपमन्त्रितम् । अथास्य रक्षा विध्यात् - आदमी-खादिर कर्कन्धु पीलु - परूषक - शाखाभिरस्य गृह भिषक्समन्ततः परि-वारयेन, सर्वनश्च सूतिकागारस्य सर्पपानसी तण्डुल - रुण कणिकाः प्रकि रेयुः, तथा तण्डुल - बलि- होमः सततमुभयतः काल क्रियेताऽऽनामकर्मणः 1 द्वारे च मुसल देहलीमनुतिरश्चीनं न्यस्त कुर्यात्, बचा- कुष्ठक्षौमक - हि-सर्षपातसी - लशुन - कण - कणिकानां रक्षोन्नसमाख्यातानां चौषधीना पोट्टलिकां बढ़वा सूतिकागारस्योत्तर देहल्यामवसृजेत्तथा सूतिकायाः कण्ठे सपुत्रायाः स्थाल्युदक- कुम्भ पर्यङ्केष्वपि तथैव च द्वयोर्द्वारपक्षयोः
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अ ०८ ] शारीरस्थानम् १२५ कणकाम्लेन्वनवानग्निस्तिन्दुक काष्टेन्वनश्चाग्निः सूतिकागारस्याभ्यन्तरतो नित्य स्यात्, स्त्रियश्चेना यथाक्तगुणाः सुहृदश्चानुजागृयुः, दशाहं द्वादशाहं वाऽनुपरत प्रदान - मङ्गलागी: - स्तुति गीन वादित्रयन्नपानविशद-मनुरक्त प्रहृष्ट- जन- संपूर्ण च तद्वेश्म कार्य, ब्राह्मणश्चाथर्ववेदवित्स तद-मुभयतः काल शान्ति जुहुयात्स्वस्त्ययनार्थ कुमारस्य तथा सूतिकायः । इत्येतद्रक्षाविधानमुक्तम् ॥ ४८ ॥
इसके पश्चात् बच्चे का जातकर्म सस्कार करना चाहिये यथा - मत्रों द्वारा उपमंत्रित मधु और घा का ( असमान मात्रा में मिला कर ) वेदोक्त विधि स सबसे प्रथम खाने के लिये देवे । इवा प्रकार स्तन को भी विधि पूर्वक मंत्रपूर्वक पीने को देना चाहिये, पहिले दक्षिण स्तन का पीने के लिये देवे । इसक सिराहने की ओर मत्रों से उपमन्त्रित जलकुम्भ ( जल घट ) रखे । इसके पश्चात् बालक की रक्षा का उपाय कर । कडुवा तुम्बी, खैर, बेर, पालु, फालसा इनकी शाखाओं से घर को चारों ओर से घेर दवं । सूतिकागार के चारों ओर सरसा अलसी के कण तथा चावलों का कणिया बिखेर देवे । नामकरण संस्कार ( दसवे दिन ) तक दानों समय प्रात साय चावकों की बलि से होम करना चाहिये । दवजे में दद्दली पर तिरछा मुसल रखना चाहिये । बच, कूठ, क्षौनक ( रेशम ), हींग, सरसों, अलसी, लहसुन की कणिकाये और रक्षो - नाशक गुगुल आदि औषधियों को पोटली बाध कर सूतिकागार के उत्तर दिशा को देहल, मे लटका देनी चाहिये । माता तथा पुत्र के गले में, स्थाली, जल के घड़े तथा पलंग के ऊपर भी यह पाटली बाघ देनो चाहिये | दोना दर्वाजों के पास ( अन्दर बाहर ) सूतिकागार के अन्दर तिन्दुक वृक्ष की लकड़ियों से आग को जलाये रखना चाहिये । पूर्वोक गुणों वाली स्त्रिया तथा मित्र सदा पास में रहे । दस दिन या बारह दिन तक बिना आपस्य के मंगल आशीर्वाद, स्तुति, गात हों, बाजे बजते रहने चाहिये । अच्छे मनोनुकूल खान पान करना चाहिये । स्नेहा, मिलनसार प्रसन्न रहने वाले मनुष्या से घर को भरा रखना चाहिये । अथर्ववेद को जानने वाले ब्राह्मण निरन्तर दानो समय प्रातः काल कुमार और माता के कल्याण के लिये शान्तिपाठ करते रहे । यह रवा - विधि कह दी है ॥ ४८ ॥
सूतिका तु खलु वुभुक्षिता विदत्वा स्नेहं पाययेत् प्रथमं परमया शक्तथा सर्पिस्तैलं बसा मज्जानं वा साम्यीभावमभिसमीक्ष्य पिप्पली-पिप्पलीमूल - चव्य - चित्रक- शृङ्गवेर- चूर्ण- सहितम् । स्नेहं पीतवत्याश्च