श्रीगणेशाय नमः।

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 141–150

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 141–150

पृष्ठ 141

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१२६ चरकसंहिता [ अ ० ८ AAJ सर्पिस्तैलाभ्यामभ्यज्य वेष्टये दुदरं महता वाससा, तथा ' तस्या न वायु-रुदरे विकृतिमुत्पादयत्यनवकाशत्वात् । जीर्णे तु स्नेहे पिप्पल्यादिभिरेव सिद्धा यवागू सुस्निग्धा द्रवा मात्रशः पाययेत्, उभयतः कालमच्छेन चोष्णोदकेन परिषेचयेत्प्राकस्नेहयवागूरानाभ्याम् । एव पञ्चरात्र सप्तरात्रं

वानुपाल्य ततः क्रमेणाप्याययेत् । स्वस्थवृत्तमेतावत्सूतिकायाः ॥ ४६ ॥

जच्चा स्त्री को भूख लगने पर शक्ति के अनुसार खूत्र यत्न से स्नेहपान कराना चाहिये । घी, तेल, वसा या मजा जो सन्ह जच्चा के प्रकृति के अनुकूल हो, उसके साथ पिप्पलीमूल, चविका, चित्रक और सोंठ का चूर्ण मिला कर देना चाहिये । स्नेहपान करते समय पेट पर घी या तैल मल कर भारी वस्त्र लपेट देना चाहिये । इस प्रकार करने से उदर में वायु विकार उत्पन्न नहीं होते, क्योंकि वायु को अवकाश नहीं मिलता । स्नेह के जीर्ण होने पर पिप्पलीमूल आदि से सिद्ध की हुई, घृत युक्त, पतली यवागू को थोड़ी मात्रा में प्रात: और सायं दोनो समय देना चाहिये । स्नेह और यवागू पिलाने से पूर्व निर्मल गरम पानी से स्नान करवा देना चाहिये । इस प्रकार पाच या सात रात्रि तक इस विधि को बरत कर पीछे क्रम से [ साधारण आहार - विहार ] बढ़ाना चाहिये । यह सूतिका स्त्री का स्वस्थवृत्त है ॥ ४ ९ ॥ तस्यास्तु खलु यो व्याधिरुत्पद्यते स कृच्छ्रसाध्यो भवत्यसाध्यो वा गर्भवृद्धि क्षयित शिथिल- सर्वशरीर - धातुत्वात्प्रवाहण - वेदना क्लेदन - रक्त-निःस्रुति- विशेष -शून्य- शरीरत्वाच्च तस्मात्ता यथोक्तेन विधिनोपचरत् । भौतिक जीवनीय बृहणीय - मधुर - वातहर - सिद्धैरभ्यङ्गात्सादन - परिषेका-वगाहनान्नपान - विधिभिर्विशेषतश्चोपचरेत् । विशेषतो हि शून्यशरीराः स्त्रियः प्रजाता भवन्ति ॥ ५० ॥

प्रसूता स्त्री को विपरीत आहार विहार के कारण जो रोग उत्पन्न हो जाता है, वह कष्टसाध्य अथवा असाध्य होता है । क्योंकि गर्भ की वृद्धि के कारण अन्य धातुओं का पोषण न होने से सब धातु क्षीण और शिथिल हो जाते हैं । इसी प्रकार गर्भ के प्रवाहण के कारण उत्पन्न वेदना, क्लेदन ( स्राव ), तथा रक्त के विशेष रूप में निकलने से सम्पूर्ण शरीर शून्य, नि सज्ञ बना होता है । भूतइर गुग्गुलु, महापैशाचादि घृत, जीवनीय, बृहणीय, मधुर और वातहर ओषधियों से सिद्ध स्नेह - पान, अभ्यग, उत्सादन, परिषेक, अवगाहन, खान-पान विधि विशेष रूप से बरतनी चाहिये । इस विधि के सेवन से अचेत हुई स्त्रियों में भी चेतना आ जाती है ॥ ५० ॥

पृष्ठ 142

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अ ० ८ ] शारीरम्थानम १२७ दशम्यां निश्यतीताया सपुत्रा स्त्री सर्वगन्धोपधेगौरसर्षपैश्च स्नाता लवहतशुचिवस्त्र परिधाय पवित्रेष्ट लघु - विचित्र - भूषणवती च सश्य मङ्गलान्युचितामर्चयित्वा च देवता शिखिनः शुक्लवाससोऽव्यङ्गाश्च ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयित्वा कुमार महतेन शुचिवाससाऽऽच्छादयेत् प्राक्शिरसमुद विशरसं वा सवेश्य, ' देवतापूर्वं द्विजातिभ्यः प्रणमती-त्युक्त्वा, कुमारस्य पिता द्वे नामनी कारयेन्नाक्षत्रिक नामाभिप्रायिक च । तत्राविप्रायिक नाम घाषवदाद्यन्तस्थान्तमूष्मान्न वा वृद्धत्रिपु रुषानूकमनवप्रतिष्ठित, नाक्षत्रिक तु नक्षत्र देवतासमानाख्य द्वयक्षर चतुरक्षर वा ॥ ५१ ॥

दसवें दिन स्त्री पुत्र के साथ सम्पूर्ण गन्ध युक्त ओषधियों से तथा श्वेत सरसों के उबटन से स्नान करके लघु ( हलके ), नवीन और पवित्र वस्त्र को धारण करे । पवित्र, मन चाहे लघु, विचित्र आभूषणों को धारण करे । मंगल जनक ( घी, दही आदि ) वस्तुओं को स्पर्श करके, इष्ट देव की पूजा करके शिखा वाले, शुक्ल वत्त्र पहिने, व्यगरहित, शोभन आकृतिवाले ब्राह्मणो से स्व-स्ति पाठ करावे, कुमार के लिये नवीन वस्त्रो का संग्रह करे । शिशु का सिर पूर्व दिशा अथवा उत्तर दिशा की आर करके, कहे कि बालक देवा और विद्वानों को नमस्कार करता ह ऐसा वह कर शिशु का पिता नक्षत्र देवता वाला [ जिस नक्षत्र में कुमार उत्पन्न हुआ है उस नक्षत्र के संकेत बाला ] शिशु का नाम करे । बच्चे के दो प्रकार के नाम करे, एक नक्षत्र त्र - - ते देवता के नाम पर और दूसरा अभिप्राय अर्थात् अर्थयुक्त । इनमें अभिप्राय वाला नाम घोपवर ( वर्ग का चौथा अक्षर - घ, झ, ढ, ध, भ, ), अन्तस्थ ( य र ल व ) औस् उष्मान्त ( श, ष, स, ह, ), और कुल के वृद्ध तीन पुरुषों के नामों में से किसी एक के समान, निन्दारहित नाम करना चाहिये । नक्षत्र देवतावाला नाम नक्षत्र देवता के समान होना चाहिये । नाम दो अक्षर वाला अथवा चार अक्षरों वाला रखना चाहिये ॥ ५१ ॥

कृते च नामकर्मणि कुमारं परीक्षितुमुपक्रामेदायुषः प्रमाणज्ञान-हेतोः । तत्रेमान्यायुष्मता कुमाराणां लक्षणानि भवन्ति । तद्यथा एके-कजा मृदवोऽल्पाः स्निग्धाः सुबद्धमूलाः कृष्णाः केशाः प्रशस्यन्ते, स्थिरा बहला त्वक् प्रकृत्या, प्रकृतिसुसंपन्नमीषत्प्रमाणातिवृत्तमनुरूपमात-पत्रोपमं शिरा, व्यूढं दृढं समं सुष्टि शङ्ख - सन्ध्यूर्ध्व - व्यञ्जनमुपचितं बिलनमर्धचन्द्राकृति ललाटं, बहलौ विपुलसमपीठौ नीचैर्वृद्धौ पृष्ठतोऽ-

पृष्ठ 143

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१२ = चरकसंहिता [ अ ०८ वनतो सुलिष्ट कर्ण पुत्रौ महाच्छिद्रौ कर्णी, ईषत्प्रलम्बिन्यावसङ्गगवे समे संहते महत्यौ भ्रुवौ समे समाहितदर्शने व्यक्तभागविभागे बल-वती तेजसेोपपन्ने स्वङ्ग पाने चक्षुषा, ऋज्ञी महोच्छ्वासा वशसंपन्ने-श्रवनताप्रा नासिका, महहजु सुनिविष्टदन्तमास्य, आयामविस्तारोप-पन्ना श्लक्ष्णा तन्वी प्रकृतिवर्णयुक्ता जिह्वा, लक्ष्ण युक्तोप चयमूष्मोपपन्न रक्तं तालु, महानदीनः स्निग्वाऽनुनादी गम्भीरसमुत्था धारः स्वरः, नासिम्थूलो नातिकृशावास्यप्रच्छादनो रक्तावोष्ठौ, महत्यो हनू, वृत्ता नातिमहती श्रीचा व्यूढमुपचितमुरः, गूढ जत्रु पृष्ठवशश्च विप्रकृष्टा-न्तरो स्तनों, असपातिनी स्थिरे पाइर्वे, वृत्तपारेपूर्णायतो बाहू, सक्थिनी अङ्गुलयश्च महदुपचित पाणिपाद, स्थिरा वृत्ताः स्निग्धास्ताम्रास्तुगा कूर्माकारा करजाः, प्रदक्षिणावर्ता सोत्सङ्गा च नाभिः, उखि भागहाना समा समुपचितमासा क्टी, वृत्तौ स्थिरोपचितमासौ नात्युन्नतौ स्फिचौ, अनुपूर्व वृत्तावुपचययुक्तावरू, नात्युपचिते नात्यपचिते एणापदे प्रगूढ-सिरास्थि सन्धी जड्वे, नात्युपचितौ नात्यपचितौ गुल्फों, पूर्वोपदिष्ट-गुणौ पादौ कर्माकारों, प्रकृतियुक्तानि वातमूत्रपुरीषाणि तथा स्वप्न-जागरणायास- स्मित- रुदित स्तनग्रहणानि । यच्च किचिदन्यदप्यनुक्तमस्ति

तदपि सर्व प्रकृतियुक्तमिष्टम्, विपरीत पुनरनिष्टम् । इति दीर्घायु-लक्षणानि ॥ ५२ ॥

नामकरण संस्कार हो चुकने पर आयु के प्रमाण ज्ञान के लिये कुमार की परीक्षा करनो चाहिये । आयुष्य वाले कुमारो के निम्न लक्षण होते है । यथा— एक एक पृथकू, कोमल स्थिर, स्वाभाविक त्ववा चौड़ा ) सम्पन्न, शरीर के दृढ, समान शंख सधि से न्द्राकार ललाट प्रशस्त है पीछे से नीचे, खूब मिले लटकते हुए कान ( जैसे , छोटे, स्निग्ध, दृढमूल वाले काले बाल उत्तम है । प्रशस्त है । प्रकृति ( छ अगुल ऊचा, ३२ अगुल अनुरूप, छाते के समान गोल शिर प्रशस्त है । चाड़ी भली प्रकार जुड़ा, ऊपर को उठा, बलवान्, अर्द्धच-। बड़े, विशाल, समान पीठ वाले, नीचे की ओर बड़े, कर्णपुत्रक, प्रशस्त है । बहुत बड़े छिद्रों वाले, थोड़े कि कान भगवान् बुद्ध की मूर्तियों मे बने होते हैं ) प्रशस्त है । परस्पर न मिलीं परन्तु परस्पर समान एक दूसरे के तुल्य बड़ी भोहे प्रशस्त हैं । समान तुल्य, उत्तम दृष्टि युक्त, काला और श्वेत भाग स्पष्ट दीखता हो, बलवान्, तेज से युक्त, अपने अग और उपाग युक्त आखें प्रशस्त हैं । सीधी, बड़े उवास से युक्त, उन्नत वश वाली आगे से थोड़ी, झुकती नासिका प्रशस्त है । महान, सरल, खूब एक समान जुड़े हुए दान्तों वाला मुख उत्तम है ।

पृष्ठ 144

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अ ०८ 1 है शारीरस्थानम् १२६ लम्बाई और विस्तार से युक्त, चिकनी, पतली, स्वाभाविक वर्ण से युक्त जीभ प्रशस्त है । चिकना, ठीक प्रमाण में बढा, गरमी से युक्त, लाल तालु प्रशस्त है । नदी के आवाज के समान महान्, स्निग्ध, प्रतिध्वनि युक्त, गम्भीर और धीर स्वर प्रशस्त है । न तो बहुत मोटे और न बहुत पतले, मुख को ढापने वाले लाल ओठ प्रशस्त है । बड़ी हनु ( जबाड़े ) गाल बहुत बडे न हों, छोटी ग्रीवा प्रशस्त है । चौड़ी उन्नत छाती प्रशस्त है । गूढ छिपे हुर जत्रु ( अश सन्धि ) पृष्ठ वश, उत्तम है - जत्रु और पृष्ठ वश की अस्थिया छूने पर प्रतीत न हो । दूर दूर अन्तरवाले स्तन प्रशस्त हैं । कक्षा से बाहर निकले स्थिर पार्श्व प्रशस्त है । गोल, परिपूर्ण, लम्बे बाहू, टागे और अगुलिया प्रशस्त हैं । बडे २ भरे हुए हाथ और पाव प्रशस्त है । स्थिर गोल, स्निग्ध ताम्र रंग के उन्नत, कछुए के समान उठे हुए नख प्रशस्त हैं । दक्षिण आवर्त्त वाली और उन्नत नाभि प्रशस्त है । छाती से एक तिहाई कम, समान, उपचित मास वाली कटि प्रशस्त है । गोड, स्थिर, उन्नत मास वाले न तो बहुत उन्नत और न बहुत नीचे कूल्हे प्रशस्त है । गोल, स्थिर, मास से भरी टार्गे प्रशन्त हैं । न तो बहुत बढे हुए और न बहुत घटे हुए, हरिणी को जघा के समान छिपी सिंग, अस्थि, और सन्धि बाली जधाए प्रशस्त है न तो बहुत मोटे, और न बहुत दबे हुए गुल्क प्रशस्त हैं । पूर्वोक्त गुणो से युक्त, कछुवे के आकार के ( महराबदार ) पाव प्रशस्त हैं । स्वाभाविक रूप में वायु, मूत्र, मल का आना और नींद, जागरण, आयास, हास्य, रोदन, स्तनपान आदि बातों का प्रकृतिसिद्ध, स्वाभाविक रूप मे होना उत्तम है । इनके अति-रिक्त और जो बातें यहा पर नहीं कही, वे भी स्वाभाविक रूप मे होनी चाहियें यही इष्ट है । प्राकृतिक बातों से विपरीत होना बुरा, अनिष्टकारक है । ये दीर्घायु कुमारों के लक्षण हैं ॥ ५२ ॥

अतो धात्री परीक्षामुपदेक्ष्यामः - अथ ब्रूयात् धात्रीमानयतेत्ति, समानवर्णा यौवनस्थां निभृतामनातुरामव्यङ्गामव्यसनामविरूपामजु-गुप्सिता देशजातीयामक्षुद्रामक्षुद्रकर्मिणी कुलेजातां वत्सला जीवद्वत्सां पुंवत्सा दोन्ध्रीमप्रमत्ता ' मशायिनीमनुच्चारशायिनीमनन्त्यावशायिनी कुशलोपचारा शुचिमशुचिद्वेषिणी स्तनस्तन्यस पदुपेतामिति ॥ ५३ ॥

इसके अनन्तर धात्री की परीक्षा का उपदेश करते हैं । अब आज्ञा देवे कि धात्री ( धाई ) को लाओ धात्री माता की समान जाति वाली, युवती, नम्र-१. ' अप्रमत्तामनन्त्यावशायिनीं ' इतिपाठ. |

पृष्ठ 145

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१३० चरकसंहिता [ अ ० ८ स्वभाव, नीरोग, सुन्दर अंगों वाली, सब प्रकार के व्यसनों से रहित, सुन्दर— रूपवती, घृणायोग्यरूप से रहित, जो मैली कुचैली न रहती हो, समान देश वाली, उदार चित्त वाली, घिनौने कर्माने विचारों और कमों से रहित, नीच कर्म न करने वाली, उत्तम कुल में उत्पन्न, बच्चे से प्यार करने वाली, प्रमाद से राहत, न सोनेवाली, बालक को मलमूत्रादि में न लेटाने वाली, नीच, चण्डाउ कुलों से भिन्न कुल की, सेवा में कुशल, पवित्र, स्वच्छ, अपवित्रता से द्वेष करने वाली, स्तन और दूध के उत्तम गुणों से युक्त, स्त्री को यात्री के रूप में नियुक्त करें । [ धात्री को तभी नियुक्त करना चाहिये जब बच्चे की माता अति निर्बल हो, दूब काफी न उतरता हो, या दूध बालक के अनुकूल न पड़ता हो । ] ॥५३ ॥

तत्रेयं स्तनसंपत्— नात्यूर्ध्वो नातिलम्बावनतिकृशावनतिपीनौ युक्तपिप्पलको सुखप्रपानौ चेति स्तनसंपत् ॥ ५४ ॥

स्तन के उत्तम लक्षण -- स्तन न बहुत ऊचे, न बहुत लटकने वाले, न बहुत कृश, न बहुत मोटे, उत्तम चूचुक ( घुण्डियो ) वाले, ऐसे हों जिन से बच्चा सुख से दूध पो सके, ये स्तन के उधम लक्षण हैं ॥ ५४ ॥

स्तन्यसंपत्त - - प्रकृत वर्ण- गन्ध - रस स्पर्शमुदपात्रे दुह्यमानमुदक व्येति प्रकृतिभूतत्वात् 2 तत्पुष्टिकरमारोग्यकर चेति स्तन्यसंपत् ॥५५ ॥

दूध के उत्तम लक्षण - दूध का स्वाभाविक वर्ण हो, स्वाभाविक गन्ध हो, स्वाभाविक रस हो और स्वाभाविक स्पर्श हा, यदि दूध को जल के पात्र में दुहा जाय तो वह सारे जल में फैल जाये । क्योंकि यह दूध का स्वाभाविक गुण है । इसके अतिरिक्त दूध पुष्टिकारक और आरोग्यकारक होना आवश्यक है, ये दूध के उत्तम लक्षण है ॥ ५५ ॥

अतोऽन्यथा व्यापन्नं ज्ञेयम् । तस्य विशेषाः - श्यावारुणवर्ण कषायानुरसं विशदमनतिलक्ष्यगन्धं रूक्षां द्रवं फेनिल लघ्वतृप्तिकर कर्षणं, वातविकाराणां कर्तृ वातोपसृष्टं क्षीरमभिज्ञेयम् । कृष्ण - नील-पीत - ताम्रावभासं तिक्ताम्लकटुकानुरस कुणपरुधिरगन्धि भृशोष्णं पित्त-विकाराणा कर्तृ पित्तापसृष्ट क्षीरमभिज्ञेयम् । अत्यर्थशुक्लमतिमाधु-र्योपपन्न लवणानुरसं घृत - तैल- वसा - भज्जगन्धि पिच्छिल तन्तुमदुदपा-त्रेऽवसीदच्छूलेष्म विकाराणां कर्तृ श्लेष्मोपसृष्टं क्षीरमभिज्ञेयम् ॥१६ ॥

इन लक्षणों से विपरीत दूध दूषित समझना चाहिये । इसके विशेष लक्षण ये हैं - वात विकार वाली स्त्रियों का वात से दूषित दूध, श्याव ( लाल - काले ) रंग का, कषाय अनुरस वाला, विशद ( पुटकी वाला ), स्पष्ट गन्ध से रहित,

पृष्ठ 146

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अ ० ८ शारीरस्थानम् १३१ www रूक्ष, द्रव, झाग वाला, हलका, पीने पर पूर्ण तृप्ति नहीं करने तथा शिशु को सुनाने वाला होता है । ऐसा दूध बात के विकारों को उत्पन्न करता है । वह वात से दूषित दूध होता है 1 । पिच से दूषित दूध - काला, नीला, पीला, ताम्बे के रंग का, तिक्त, अम्ल, कटु अनुरस वाला, दुर्गन्ध या रक्त की गन्ध वाला, बहुत गरम होता है । कफ विकार वाला वा कफ से दूषित दूध बहुत सफेद, बहुत मधुर, पीने पर पिछे मे नमकीन स्वाद वाला, घी, तेल, वसा, मजा की गन्ध से युक्त, पिच्छिल, धागे या सूतों वाला, जो पानी के पात्र में नीचे बैठ जाता है, ऐसे दूध को कफ के विकारों को उत्पन्न करनेवाला, कफ से दूषित जानना चाहिये ॥ ५६ ॥

तेषां त्रयाणामपि क्षीरदोषाणां प्रति प्रतिविशेषमभिसमीक्ष्य यथास्वं यथादोषं च वमनविरेचनाम्थापनानुवासनानि विभज्य कृतानि प्रश-मनाय । इन तीनों प्रकार के दूध के दोषों ने वात, पित्त, कफ प्रत्येक दोष के अनुसार अपने अपने दोष के लक्षणों को देख कर वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन आदि का विभाग करके सचत रूप मे शान्ति के लिये व्यवहार करना चाहिये । पानाशनविधिस्तु दुष्टश्रीराया यव- गोधूम - शालि षष्टिक मुद्ग- हरे-णुक - कुलत्थ सुरा सावीरक - तुषोदक मैरेय- मेदक लशुन- करञ्ज - प्राय. स्यात्, क्षीरदोष - विशेषाञ्चावेक्ष्यावेक्ष्य तत्तद्विधानं कार्यं स्यात्, पाठा - महौषध-सुरदारु - मुस्त - मूर्वा गुडूची- वत्सक फल किरात तिक्त • कटुक - रोहिणी -सारिबा कपायाणा च पानं प्रशस्यते । तथाऽन्येषा तिक्तकषाय - कटुक-मधुराणा द्रव्याणां प्रयोग इति क्षीर - विकार - विशेषानभिसमीक्ष्य मात्रां काल चेति क्षीरविशोधनानि ॥ ५७ ॥

दूषित दूध वाला स्त्री के दूध के शोधने लिये खान पान विधि - जिस स्त्री का दूध दूषित हो उसे जौ, गेहूँ, हेमन्त धान्य, साठी चावल, मूग, हरेणु, कुल्स्थी, सुरा, सौवीरक, धान्याम्ल, तुपोदक, मैरेय, मेदक, लशुन, करंज आदि का सेवन करना चाहिये । दूषित क्षीर के विशेष २ लक्षणों को ( वात आदि को ) देख २ कर उनकी यथायोग्य चित्किसा करनी चाहिये । पाठा, सोंठ, देवदारू, नागरमोथा, मूर्वा, गिलोय, इन्द्रजौ, चिरायता, कुटकी, सारिवा इन पदार्थों के कषायों का पान उत्तम है । इसी प्रकार अन्य तिक्त, कषाय, कटु और मधुर रस वाले द्रव्यों का प्रयोग दूध के विकारों के कारणों को जान कर मात्रा में समय पर करना चाहिये । यह दूधको साफ करने वाले उपायोंका वर्णन कर दिये हैं

पृष्ठ 147

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१३२ चरकसंहिता [ अ ० ८ क्षीरजननानि तु मद्यानि सीधुवर्ज्यानि प्राम्यानूपौदकानि च शाक धान्य मासानि द्रव - मधुराम्ल - भूयिष्ठाश्चाहाराः क्षीरिण्यश्वौषधयः श्रीरपान चानायासश्चेति, वीर - शालिषष्टिक्षुवालिका दभ - कुश काश-गुन्द्रेत्कट - मूल कषायणां च पानमिति क्षीरजननान्युक्तानि ॥ ५८ ॥

दूध - वर्धक पदार्थ - सीधु नामक मद्य को छोड़ कर शेष सब मद्य, ग्राम्य और आनूप देशों में उत्पन्न शाक, धान्य या मांस, द्रव, मधुर, अम्ल, लवण, बहुत भोजन, दूध - वर्धक ओषधिया, दूब का पान और मेहनत न करना । वीरण, माठी, हेमन्त वान्य, गन्ना, दाभ, कुश, काय गुन्द्रा, इत्कट इनकी जड़ों के कषायों को पिलाना दूध वर्धक है ॥ ५८ ॥

धात्री तु यदा स्वादु बहुल - शुद्ध- दुग्धा म्यात्तदा स्नातानुलिप्ता शुक्ल वस्त्र परिधायैन्द्री ब्राह्मी शतवीर्याममोघामव्यथा शिवामरिष्टा वाट्यपुष्पी विष्वक्सेनकान्ता वा बिभ्रत्योषधि कुमारं प्राङ्मुख प्रथम दक्षिण स्तनं पाययेदिति धान्रीकर्म ॥ ५६ ॥

धात्री की नियुक्ति - जिस समय धात्री का दूध बहुत स्वाद, बहुत शुद्ध हो, उस दिन स्नान कराके चन्दन लगाकर सफेद वस्त्रों को पहिनाकर ऐन्द्री, ब्राह्मी, शतवीर्या, सहस्त्रवीर्या, अमोघा, गिलोय, शिरा, वाट्यपुष्पी, अरिष्टा, विष्वक्सेन-कान्ता आदि ओषधियो को धारण कराके शिशु का शिर पूर्व की ओर करके प्रथम दक्षिण स्तन पीने के लिये देना चाहिये | यह धात्री - कर्म का उपदेश कर दिया है || ५६ || अतोऽनन्तरं कुमारागारविधिमनुव्याख्यान्याम: - वास्तु - विद्या-कुशलः प्रशस्तं रम्यमतमस्क निवातं प्रवातैकदेश दृढनपगत श्वापद- पशु दृष्ट्रि - मूषिक पतङ्ग सुसंविभक्त - सलिलोदूखल - मूत्र - वर्च: -स्थान- स्नान-भूमि- महान समृतु सुख यथर्तुशयनासनास्तरणसंपन्न कुर्यात्तथा सुविहित-रक्षा विधान - बलि - मङ्गल होम प्रायश्चित्तं शुचि वृद्ध - वैद्यानुरक्त - जन - सपू-मिति कुमारागारविधिः ॥ ६० ॥

कुमारागार विधि - इसके आगे कुमारागार विधि का वर्णन करते हैं । मकान की रचना को जानने वाला वास्तुविद्या में कुशल पुरुष उत्तम, सुन्दर, प्रकाशयुक्त, वायुदार ( परन्तु जोर से चारों ओर की वायु न आये ), मजबूत, गाय, बकरी, पशु आदि और बिल्ली आदि दाढ़ वाले पशु, चूहे, पतंग आदि से रहित, पानी, उलूखल, मूत्रस्थान, मलस्थान, स्नानगृह, रसोई आदि पृथक् पृथकू ऋतु के अनुकूल, ऋतु के अनुसार, विस्तर आसन, बिछौने से युक्त घर

पृष्ठ 148

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अ ०८ ] शारीरस्थानम् १३३ को सजावे । इस घर मे भली प्रकार से रक्षा का प्रबन्ध करे । बलि, मगल, होम,

प्रायश्चित्त आदि क्रिया करे । पवित्र, वृद्ध, वैद्य, स्नेही मित्रों से भरा रहे ।

यह कुमारागार विधि है ॥ ६० ॥

शयनासनास्तरण - प्रावरणानि कुमारस्य मृदु लघु शुचि - सुगन्धीनि स्युः । स्वेदमलजन्तुमन्ति मन्त्रपुरीषोपसृष्टानि च वर्ज्यानि स्युः ॥ ६१ ॥

असति संभवेऽन्येषा तान्येव च सुप्रक्षालितोपधूपितानि सुशुद्ध-शुष्काण्युपयोगं गच्छेयुः ॥ ६२ ॥

कुमार के बिस्तर, आसन, बिछौने आदि नेमल, हल्के, पवित्र और सुग-न्धियुक्त हों, वे पसीने, जू आदि वाले तथा मूत्र मल वाले न हों । यदि अन्य दूसरे वस्त्र न हों तो इन्हीं वस्त्रों को भली प्रकार वोकर सुखा कर ( बुवा देकर ) साफ और शुष्क करके काम में लाया जावे ॥ ६२ ॥

धूपनानि पुनर्वाससा शयनास्तरणप्रावरणानां च यव - सर्षपातसी-हिड्न गुग्गुलु बच्चा चोरक - व्यःस्था - गोलोमी - जटिला पलङ्कषाशोक- रोहि-णीसर्पनिर्मकाणि घृतसक्तानि स्युः ॥ ६३ ॥

वस्त्रों के रोगनाशक धूम - बिस्तर, आसन, बिछौने चादर आदि कपड़े को धुवा देने के लिये जौ, सग्लो अलसा, हींग, गुग्गुल, वच, चोरक, ब्राह्मी, श्वेत दूब, जटामासी, गुग्गुलु, अशोर, कुटकी और सार की कैचली इनको घी में मिला कर इन त्रा देना चाहिये ॥ ६३ ॥

मणयश्च धारणीयाः कुमारस्य खड्ग हरु भावय- वृषभाणा जीवतामेव दक्षिणेभ्यो विषाणेभ्यस्त्वत्राणि गृहीनानि स्युः । मत्राद्याश्रौषधयो जीव-कर्षभकौ यानि चान्यान्यपि ब्राह्मणाः प्रशसेयुरथर्ववेदविदः || ६४ ॥ बालक के आभूषण - शिशु को नाना प्रकार की मणिया, जीवित गैंडा रुरु ( मृग ), गवय ( नीलगाय ) और साड के दक्षिण सीग के अगले भागों को लेवर धारण कराने चाहिये | मंत्र आदि, जीव, ऋषभक आदि ओषधियों को तथा अन्य जिन २ वस्तुओ को अथर्व वेद के जानने वाले विद्वान् ब्राह्मण बतावे वे २ पदार्थ धारण करावे ॥ ६४ ॥

क्रीडनकानि खल्वस्य विचित्राणि घोषवन्त्यभिरामाण्यगुरूण्यतीक्ष्णा-ग्राण्यनास्यप्रवेशीन्यप्राणहराण्यवित्रासनानि च स्युः ॥ ६५ ॥

बच्चे के खिलौने -- कुमार के खिलौने विचित्र रूप के, शब्द करने वाले, सुन्दर, हलके, जिनके अग्रभाग तीखे न हो, जा बच्चे के मुख में न जा सकें,

पृष्ठ 149

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१३४ चरकसंहिता [ अ ० = ^^ बच्चों का प्राणहरण करने वाले न हों तथा बच्चों को भय देने वाले न हों ऐसे होने चाहिये ॥ ६५ ॥

न ह्यस्य वित्रासनं साधु तम्मात्तस्मिन् रुदत्यभुञ्जाने वाऽन्यत्र बाऽ-विधेयतां गच्छति राक्षस - पिशाच- -पूतनाद्याना नामानि चाऽऽह्वयता कुमारस्य वित्रासनार्थं नामग्रहण न कार्यं स्यान् ॥ ६६ ॥

शिशु को भय देना - शिशु को डराना, भय दिखाना अच्छा नहीं, रोते हुए भोजन न करने पर अथवा अन्य इसी प्राकर को अवस्था में जब बालक काबू में न आवे तो शिशु को डराने के लिये राक्षस, पिशाच, पूतना आदि का नाम नहीं लेना चाहिये ॥ ६६ ॥

यदि त्वायं किचित्कुमारमा गच्छेत्प्रकृति - निमित्त - पूर्वरूप - लिङ्गो-पशय - विशेषैस्तत्त्वतोऽनुबुध्य सर्वविशेषानातुरौपध - देश - कलाश्रयानवे-क्षमाणश्चिकित्सितुमारभेतेनं मधुर - मृदु - लघु - सुरभि शीत - शङ्करं कर्म प्रवर्तयन्, एवं सात्म्या हि कुमारा भवन्नि, तथा ते शर्म लभन्तेऽचि -राय । अरोगेष्वरोगवृत्तमातिष्ठेत् ॥ ६७ ॥

यदि कभी शिशु रोगा हो जाये तो वात आदि प्रकृति, कारण, पूर्वरूप, लक्षण, उपशय आदि से रोग का वास्तविक रूप जान कर रोगी सम्बन्धी सब बातों की देश, काल और शरीर को देखकर चिकित्सा आरम्भ करे I । चिकित्सा मे मधुर, मृदु, लघु, सुगन्धित, शीतल, कल्याणकारी कर्म ( औषध ) करना चाहिये | कुमार भी इसी सात्म्य के ( मधुर, मृदु, शीतल, लघु ) होते हैं, ऐसी ही औषध उनको लाभदायक है । इस प्रकार से बालक शोत्र ही सुखी, नीरोग हो जाते हैं । स्वस्थ अवस्था में स्वस्थ वृत्त का पालन करना चाहिये ॥६७ ॥

देश - कालात्म - गुण - विपर्ययेण वर्तमानः क्रमेणासाम्यानि परिवत्यों-पयुञ्जानः सर्वाण्यहितानि वर्जयेत् । तथा बलवर्णशरीरायुषां संपद-मवाप्नोतीति ॥ ६८ ॥

देश, काल और आत्मा इनके गुणों के विपरीत अवस्था मे कुमार को असात्म्य देश, काल से क्रमश सात्म्य देश, काल, आत्म- गुणों पर बदलना चाहिये । सब प्रकार के अहित वस्तुओं का त्याग करना चाहिये । इस प्रकार से उत्तम बल, वर्ण शरीर और उत्तम आयु प्राप्त होती है ॥ ६८ ॥

एवमेनं कुमारमायौवनप्राप्तेर्धर्मार्थ कौशलाग मनाच्चानुपालयेत् ।

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अ ०८ = ] शारीरस्थानम् १३५ WANANA AN इस प्रकार से कुमार की यौवनावस्था के आने तक धर्म, अर्थ, कौशल उत्पन्न होने तक रक्षा करनी चाहिये । इति पुत्राशिषा समृद्धिकरं कर्म व्याख्यातम् । तदाचरन् यथोक्ते-विधिभिः पूजा यथेष्टं लभतेऽनसूयक इति ॥ ६६ ॥

पुत्र को चाहने वालों के लिये फलकारक और समृद्धिकारक कर्म का उप-देश कर दिया है | बच्चों को देवकर चित्त में बुरा भाव न रखने और पुत्र को अत्यन्त उत्तमता को चाहने वाला मनुष्य यथाक्त विधि से इन कर्मों का करता हुआ, यथेष्ट फल और पूजा ( आदर ) को प्राप्त करता है ॥ ६६ ॥

तत्र श्लोक |

पुत्राशिषा कर्म समृद्धिकारक यदुक्तमेतन्महदर्थं संहितम् ।

तदाचरन् ज्ञो विधिभियेथातथ पूजां यथेष्ट लभतेऽनसूयकः ॥७० ॥

शरीरं चिन्त्यते सर्वं देवमानुपसपदा ।

सर्वभावयतस्तस्माच्छारीर स्थानमुच्यते ॥ ७१ ॥

पुत्र की प्रार्थनानुरूप फलकारक, समृद्विकारक, बहुत अर्थ से परिपूर्ण जो कार्य कहा है, जो बुद्धिमान् मनुष्य इस कर्म को विधिपूर्वक करता है वह परम समृद्धि का देख कर न कुढने वाला भला आदमी यथेष्ट आदर को प्राप्त करता है । देवता और मनुष्यों के उत्तम २ लक्षणो सहित सब प्रकार मे यहा सम्पूर्ण शरीर का विचार करते है । इसलिये यह शारीरस्थान महाप्रकरण कहा जाता है ॥ ७०-७१ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने जाति सूत्रीयशारीर नामाष्टमोऽध्याय ॥ ८ ॥

॥ इति शारीरस्थानं समाप्तम् ॥