श्रीगणेशाय नमः।

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 151–160

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 151–160

पृष्ठ 151

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इन्द्रियस्थानम्

प्रथमोऽध्यायः ।

अथातो वर्णस्वरीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्मा ss ह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

इसके आगे ' वर्णस्वरीय इन्द्रिय ' नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ [ शारीरस्थान के पीछे चिकित्सास्थान आना आवश्यक है । परन्तु चिकि-त्सा साध्य रोगो मे ही कही जाती है, असाध्य रोगों में नहीं । क्योंकि अमाध्य रोग में चिकित्सा करने से धन, विद्या और यश की हानि और बदनामी होती है । इन्द्रिय का अर्थ है रिष्ट । जब रोगी मरणासन्न होता है उस समय के विशेष लक्षणों को ' रिष्ट ' वा ' अरिष्ट ' कहा जाता है । विना रिष्ट ज्ञान के साध्य और असाध्य का ज्ञान भी नही हो सकता । इस लिये चिकित्सा के पूर्व इन्द्रिय-स्थान कहा गया है । ] इह खलु वर्णश्च स्वरश्च गन्धश्च रसश्व स्पर्शश्च चक्षुश्च श्रोत्रं च प्राण च रसन व स्पर्शनं च सत्त्वं च भक्तिश्च शौचं च शीलं चाचारश्च स्मृति-श्वा ss कृतिश्च बल च ग्लानिश्व तन्द्रा चाऽऽरम्भश्च गौरवं च लाघवं चाऽऽ-हारगुणाश्चाऽऽहारपरिणामश्चोपायश्चापायश्च व्याधिश्व व्याधिपूर्वरूप च वेदनाश्चोपद्रवाश्च छाया च प्रतिच्छायाच स्वप्नदर्शन च दूताधिकारश्च पथि चौत्पातिकाश्चाऽऽतुरकुले भावावस्थान्तराणि च भेषजसंवृत्तिश्च भेषज विकार युक्तिश्चेति परीक्ष्याणि प्रत्यक्षानुमानोपदेशैरायुषः प्रमाण-विशेषं जिज्ञासमानेन भिषजा ॥ ३ ॥

रोगी के आयुष्य को विशेष रूप से जानने की इच्छा रखने वाले वैद्य के लिये आवश्यक है कि वह प्रत्यक्ष, अनुमान और आस ( शब्द ) प्रमाण द्वारा रोगी के वर्ण, स्वर, गन्ध, रस, स्पर्श, चक्षु, श्रोत्र, घ्राण, रसना, स्पर्श, सत्त्व ( मन ), भक्ति ( इच्छा ), शौच, शील, आचार, स्मृति, आकृति, बल, ग्लानि, तन्द्रा ( नींद ), आरम्भ, [ अरिष्ट - व्याधि में उत्पत्ति का प्रारम्भ ], भारीपन, लघुता, आहार, आहार का परिणाम, उपाय ( उपगमन ), अपाय ( अपगमन ),

पृष्ठ 152

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अ ० १ ] इन्द्रियस्थानम् १३७ AN ~ व्याधि, व्याधि के पूर्वरूप, वेदना, उपद्रव, शरीर की छाया, ( शारीरिक ), प्रतिछाया, स्वप्न - दर्शन, दूताधिकार, मार्ग के उपद्रव के दृश्य, रोगी के घर की अवस्था, इसके भाव, औषध- सफलता और औषध की रोग सम्बन्ध में योजना - इन सब बातों की अवश्य परीक्षा करे । इनका विस्तार आगे यथास्थान किया जायेगा || ३ ॥ तत्र स्वल्वेषा परीक्ष्याणा कानिचित्पुरुषमनाश्रितानि कानिचिच पुरुषसश्रयाणि । तत्र यानि पुरुषमनाश्रितानि तान्युपदेशतो युक्तितश्च परीक्षेत, पुरुषसंश्रयाणि पुनः प्रकृतितश्च विकृतितश्च ॥ ४ ॥

इन उपरोक्त परीक्षा करने योग्य बातों में से कुछ बातें तो पुरुष में आश्रित हैं और कुछ बातें पुरुष मे आश्रित नहीं हैं । इसलिये जो परीक्षायें पुरुष में आश्रित नही हैं, उनकी परीक्षा आप्तजनों के उपदेश से जाननी चाहिये और जो परीक्षायें पुरुष के शरीर मे आश्रित हैं उनकी परीक्षा प्रकृति और विकृति से करनी चाहिये ॥ ४ ॥

तत्र प्रकृनिजतिप्रसक्ता व कुलप्रसक्ता च देशानुपातिनी च काला-नुपातिनी च वयोऽनुपातिनी च प्रत्यात्मनियता च । जाति - कुल- देश -काल - वयः - प्रत्यात्मनियता हि तेषा तेषां पुरुषाणा ते ते भावविशेषा भवन्ति ॥ ५ ॥

इनमे प्रकृति छः प्रकार की है– ( १ ) जाति से प्राप्त ( २ ) काल से प्राप्त ( ३ ) देशानुसार ( ४ ) कालानुसार ( ५ ) वय के अनुसार और ( ६ ) प्रतिव्यक्ति नियत जाति, देश, कुल, काल, आयु और प्रत्येक पुरुष की भिन्नता के कारण पुरुषों की प्रकृति भिन्न २ हो जाती है ॥ ५ ॥

[ जाति- जापानी लोगों को हैजा कम होता है, हिन्दुओं और यहूदियो को ' मधुमेह ' अधिक होता है । कुल - जिस कुल में क्षय या अर्श रोग चलता हो, उसमें विवाह सम्बन्ध का शास्त्र ने निषेध किया है । देश – मरुस्थल प्रदेश में कफजन्य रोग बहुत कम होते हैं । मदुरा से हाथीपग ( पील - पाव ) और उड़ीसा मे अण्ड - वृद्धि बहुत है । काल -- बसन्त ऋतु मे चेचक रोग तथा टायफाइड ( आन्त्रज्वर ) फैलता है । वयस् -- प्लेग और क्षय जवान ( १८ से २८ तक ) पुरुषो को ही होते हैं । प्रत्यात्म -- जिस आदमी को एक बार चेचक हो जाती है, उसको फिर नहीं होती और कई आदमी जन्म से ही किसी किसी रोग के लिये प्रतिशक्त होते हैं । ( २ ) इसका अर्थ यह भी है कि कइयों में

पृष्ठ 153

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१३८ चरकसंहिता [ अ ० १ शौच आदि गुण प्रकृति से होते है यथा - ब्राह्मण में । कई कुलों में, कई जातियों में शौच गुण ( स्वच्छता ) विशेष रहता है ] । विकृति पुनर्लक्षणनिमित्ता व लक्ष्यनिमित्ता च निमित्तानुरूपा च । तत्र लक्षणनिमित्ता नाम सा, यस्ताः शरीरे लक्षणान्येव हेनुभूतानि भवन्ति देवात् । लक्षणानि हि कानिचिच्छरीरोपनिबद्धानि भवन्ति, यानि हि तस्मिस्तम्मिन् काले तत्राविष्ठानमालाद्य तां ना विकृतिमुत्पा-दयन्ति । लक्ष्यनिमिना तु सा यन्ना उपलभाते निमित्त यथोक्तं निदा-नेषु । निमित्तानुरूग तु निमितार्थ कारिणी या । नामनिमित्ता निमित्त-मायुषः प्रमाणज्ञानरयेच्छन्ति भिपजो भूयश्चायुषः क्षयनिमित्ता प्रेतलि-ङ्गानुरूपाम् । यामायुरोऽगतस्य ज्ञानार्थमुपदिशन्ति वीराः । यामधि-कृत्य पुरुपसश्रयाणि मुमूर्पता लक्षगान्युपश्याम इत्युद्दश । नद्विस्तरे -णानुव्याख्यास्याम ॥ ५ ॥

विकृति तीन प्रकार की द । यथा - ( १ ) लक्षण के निमित्त से, ( २ लक्ष्य के निमित्त से और ( ३ ) निमित्तों के अनुरूप ॥ ६ ॥

( १ ) लक्षणनिमित्ता - जिसके दैववश हेतु रूप लक्षण ही शरीर में उत्पन्न होते हैं । कई एक लक्षण शरीर से ही सम्बद्ध रहते हैं । वे भिन्न २ अनेक समयों में अपना आश्रय बना कर भिन्न २ विकृति ( विकार, रोग, पीड़ा ) को उत्पन्न करते हैं । हाथों में नख रेखा - पद्मादि सामुद्रिक लक्षण होना । ( २ ) लक्ष्यनिमित्ता - जैसा निदानों में निमित्त बतलाया है । तदनुसार जिसका निमित्त उपलब्ध होता है । ( ३ ) निमित्तानुरूप विकृति वह है जो निमित्त के कार्य रूप पयोजन को पूरा करती है, उस निमित्त मे भिन्न विकृति को भी वैद्य लोग आयु के परिमाण ज्ञान का निमित्त मानते हैं, और जिसका, समाप्त होने वाली आयु के ज्ञान के लिये विद्वान् लोग उपदेश करते हैं । जिसका प्रकरण उठा कर पुरुष मे आश्रित, मरणासन्न पुरुषों के लक्षणों का हम उपदेश करेगे । यह उद्देश अर्थात्

अभी नाममात्र कहा है । अब इसका विस्तार से वर्णन करेंगे ॥ ६ ॥

तत्राऽऽदित एव वर्णाधिकारः, तद्यथा - कृष्णः कृष्णश्यामः श्यामाव-दातोऽवदातश्चेति प्रकृतिवर्णाः शरीरस्य भवन्ति, यांश्चापरानुपेक्षमाणो विद्यादनूकतोऽन्यथा वापि निर्दिश्य मानास्तज्ज्ञेः । नील - श्याम - ताम्र- हरित-शक्लाश्च वर्णा शरीरस्य वैकारिका भवन्ति । यांश्चापरानुपेक्षमाणो विद्यात्,

प्राग्विकृतानभूत्वोत्पन्नान् । इति प्रकृतिवर्णा भवन्त्युक्ताः शरीरस्य ॥ ७ ॥

पृष्ठ 154

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अ ० १ ] इन्द्रियस्थानम् १३६ सबसे प्रथम वर्णाधिकार कहते हैं जैसे- कृष्ण ( काला ) कृष्णश्याम ( काला- सावला ) और श्याम अवदात ( श्याम - गार ) और अवदात ( शुद्धगौर ) ये चार शरीर के प्राकृतिक वर्ण है । इनके सिवाय जिन वर्णों का यहा वर्णन नहीं किया और जो इन वर्णों के अनुकूल समान रूप लक्षणो से मिलें वा जिनका विद्वान् मनुष्य वर्णन करे उनको भी प्रकृतिवर्ण जानना चाहिये । नीला, श्याम, ताम्बे का रंग, हरा और श्वेत ये शरीर के वैकारिक ( विकृति से उत्पन्न होने वाले ) वर्ण हैं । इसी प्रकार उपरोक्त प्राकृतिक वर्णो से भिन्न वर्ण जिनको प्रत्यक्ष देख कर जान लें अथवा पहिले कभी उत्पन्न न हुए, बाद में उत्पन्न हुए हों ऐसे जो वर्ण हों उनको वैकृतिक वर्ण समझना चाहिये । इस प्रकार से प्राकृतिक और वैकृतिक वर्ण कह दिये हैं ॥ ७ ॥

तत्र प्रकृतिवर्णमर्धशरीरे विकृतिवर्णमर्धशरीरे द्वावपि वर्णो मर्यादा-विभक्तौ दृष्ट्वा यदेव सव्य - दक्षिण विभागेन यदेव पूर्व - पश्चिम विभागेन यदुत्तरावरविभागेन यदन्तवहिर्विभागेनाऽऽतुरस्य रिष्टमिति विद्यात् ॥ जिस मनुष्य के आधे शरीर मे प्रकृति वर्ण और आधे शरीर में विकृति का वर्ण हो और शरीर मे दानो का विभाग पृथक् २ स्पष्ट दीखता हो, या वाम और दक्षिण भाग में अथवा ऊपर नीचे के भाग में, या अन्दर बाहर के विभाग में हो तो इनको रोगी की मृत्यु का लक्षण समझे ॥ ८ ॥

एवमेव वर्णभेदो मुखेऽप्यन्तो वर्तमानो मरणाय भवति ॥ ६ ॥

वर्णभेदेन ग्लानि - हर्ष- रौक्ष्य - स्नेहा व्याख्याताः ॥ १० ॥

इसी प्रकार मुख में दूसरा बदला हुआ वर्ण मृत्यु के लिये होता है । वर्ण के भेद से, ग्लानि, हर्ष, रूक्षता और स्नेह का भी उपदेश समझे । [ अर्थात् ' थरार के आवे भाग में रूक्षता आदि ओर आवे में स्नेह आदि का होना मृत्यु

का सूचक है । ] ॥ ६-१० ॥

तथा पिप्लव्यङ्ग - तिलकालक- पिड़कानामानने जन्माऽऽतुरस्येवमेवा-प्रशस्तं विद्यात् ॥ ११ ॥

नख - नयन - बदन - मूत्र - पुरीष- हस्त पादौष्ठादिष्वपि च वैकारिकोक्तान वर्णनामन्यतमस्य प्रादुर्भावो हीन - वल - वर्णेन्द्रियेषु लक्षणमायुषः क्षयस्य भवति ॥ १२ ॥

जिस रोगी के मुख पर सहसा पिप्लु, व्यग, तिल, कालक अथवा पिड़िका निकल आये, इसको भी बुरा लक्षण समझे । इसी प्रकार नख, आँख, मुख, मूत्र, पुरीष ( मल ), हाथ, पाव, ओंठ आदि अगों में वैकारिक रंगों में से किसी एक

पृष्ठ 155

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१४० चरकसंहिता [ अ ० १ रंग का उत्पन्न हो जाना, बल वर्ण और इन्द्रियों मे हीनता का आ जाना, ये आयु के क्षय के लक्षण हैं ॥ ११-१२ ॥ यञ्चान्यदपि किचिद्वर्णवैकृतमभूतपूर्वं सहसोत्पद्येतानिमित्तमेव हीय-मानस्याऽऽतुरस्य शश्वत् 9 तच्चारिष्टम् । इति वर्णाधिकारः ॥ १३ ॥

इनके अतिरिक्त और जो कोई वैकृतिक वर्ण, जो पहिले कभी भी नहीं था ऐसा विना कारण के सहसा उत्पन्न हो जाये, इसको निश्चय रूप से मृत्यु का लक्षण समझना चाहिये ॥ १३ ॥

यह वर्णाधिकार समाप्त हुआ । स्वराधिकारस्तु -- – हंस - क्रौन नेमि दुन्दुभि कलविङ्क - काक कपोत- झर्झ-रानुकाराः प्रकृतिस्वरा भवन्ति, याश्चापरानुपेक्षमाणोऽपि विद्यादनूक-तोऽन्यथा वाऽपि निर्दिश्यमानांस्तज्ज्ञः ॥ १४ ॥

स्वराधिकार मनुष्यों का जो स्वर रस, क्रौञ्च, नेमि, दुन्दुभि, कलविङ्क-आदि के स्वर और कौवा, कबूतर इनक स्वर के समान हो, उसको प्राकृतिक स्वर समझना चाहिये । इनके अतिरिक्त इन स्वरों के समान जो प्रकृति स्वर यहा पर नहीं कहे गये और देखने में आवें या सादृश्य से या जिनको तत्वज्ञानी लोग बतलावें उनको भी जाने ॥ १४ ॥

एडक - कल - ग्रश्ताव्यक्त - गद् गद - क्षाम दीनानुकीर्णास्त्वातुराणां स्वरा वैकारिका भवन्ति । याश्चापरानुपेक्षमाणोऽपि विद्यात्प्राविकृतानभूत्वो-त्पन्नान् । इति प्रकृतिविकृतिस्वरा व्याख्याताः ॥ १५ ॥

वैकृतिक स्वर - रोगी का स्वर एडक ( मेडा ) के समान, भे भे की सी आवाज़ हो, अस्पष्ट, गद्गद ( भरा हुआ ), क्षाम ( निर्बल ), दीन ( दुःख से बोला जाने वाला ), कल ( सूक्ष्म ), ग्रस्त ( निगली सी आवाज, मुख से शब्द न निकले ), रोगियों के इस प्रकार के शब्द विकृति के होते हैं । इसी प्रकार जो स्वर प्राकृतिक स्वर से विपरीत अथवा नये प्रकार के देखने में आवें जो पहिले कभी न उत्पन्न हुए हों, उनको भी वैकृतिक स्वर समझे । इस प्रकार से प्राकृतिक और वैकृतिक स्वरो का वर्णन कर दिया ॥ १५ ॥

तत्र प्रकृतिवैकारिकाणां स्वराणामाश्वभिनिर्वृत्तिः स्वरानेकत्वमेकस्य

चानेकत्वमप्रशस्तम् । इति स्वराधिकारः ॥ १६ ॥

जो स्वर प्रकृति और वैकृतिक स्वरो का शीघ्र उत्पन्न होना अथवा एक स्वर का कभी एडक की भाति और कभी दीन या क्षाम हो जाना, यह अमगर सूचक है । यह स्वराधिकार समाप्त हुआ ॥ १६ ॥

पृष्ठ 156

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अ ० १ ] इन्द्रियस्थानम् १४१ इति वर्णस्वराधिकारौ यथावदुक्तौ मुमूर्षता ज्ञानार्थमिति ॥ १७ ॥

मरणोन्मुख रोगी के लक्षणों को जानने के लिये वर्ण और स्वर के लक्षण यथावत् कह दिये हैं ॥ १७ ॥

भवन्ति चात्र - यस्य वैकारिको वर्गः शरीर उपजायते ।

अर्धे वा यदि वा कृत्स्ने निमित्त न च नास्ति सः ॥ १८ ॥

जिस रोगी के आधे या सम्पूर्ण शरीर मे निमित के बिना वेकृतिक वर्ण उत्पन्न हो जाता है तो वह मनुष्य के मरने का लक्षण ही है ॥ १८ ॥

नीळं वा यदि वा श्याव ताम्र वा यदि वाऽरुणम् ।

मुखार्धमन्यथा वर्णों मुखार्थेऽरिष्टमुच्यते ॥ १६ ॥

जिस रोगी का आधा मुख नीला, काला, ताम्बे के रंग का अथवा लाल रंग का हो जाता है और आवा मुख दूसरे प्रकार का रंग का हो, यह लक्षण मृत्यु का है ॥ १६ ॥

स्नेहो मुखार्धे सुव्यको रौक्ष्यमर्धमुखे भृशम् ।

ग्लानिरर्थे तथा हर्षो मुखार्थे प्रेतलक्षणम् ॥ २० ॥

यदि मुख के आधे भाग में स्नेह दीखता हो और आधे में रूक्षता दीखता हो, आधे मुख मे ग्लानि और आधे मुख पर हर्ष के चिह्न हों तो यह मरने वाले के लक्षण हैं ॥ २० ॥

तिलका: पिल्लवो व्यङ्गा राजयश्व पृथग्विधाः ।

आतुरस्याशु जायन्ते मुखे प्राणान्मुमुक्षतः ॥ २१ ॥

प्राण त्यागने वाले रोगी के मुख पर तथा मुख के अन्दर तिल, फुन्सी ( पिप्लु ), व्यंग, भिन्न २ प्रकार की रेखायें शीघ्र उत्पन्न होती हैं ॥ २१ ॥

पुष्पाणि नखदन्ते वा पङ्को वा दन्तसश्रितः ।

चूर्णको वाऽपि दन्तेषु लक्षणं मरणस्य तत् ॥ २२ ॥

जिस रोगी के नख या दातों पर फूल, दातों में मैल और चूर्ण उत्पन्न हो जाता है, यह मरने का लक्षण है ॥ २२ ॥

ओष्ठयोः पादयोः पाण्योरक्ष्णोर्मूत्रपुरीषयोः ।

नखेष्वपि च वैवर्ण्यमेतत्क्षीणबलेऽन्तकृत् ॥ २३ ॥

क्षीण हुए रोगी के ओंठ, पाव हाथ, आख मूत्र और मल तथा नख इनमें रंग परिवर्तन होना रोगी का अन्त कर देता है ॥ २३ ॥

यस्य नीलावुभावोष्ठौ पक जाम्बव - सन्निभौ ।

मुमूर्षुरिति तं विद्यान्नरो धीरो गतायुषम् ॥ २४ ॥

पृष्ठ 157

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१४२ चरकसंहिता [ अ ० २ जिस रोगी के दोनों ओठ नीले रंग के अथवा पके जामुन के समान हो जाये, उसको मरने वाला समझना चाहिये, उसकी आयु समाप्त हो गई है ॥ २४ ॥

एको वा यदि वाऽनेको यस्य वैकारिकः स्वरः ।

सहसोत्पद्यते जन्तोर्हीयमानस्य नास्ति सः ॥ २५ ॥

जिस रोगी में वैकारिक स्वर एक या अनेक प्रकार के स्वर उत्पन्न हो जाते हैं, वह क्षीण होता हुआ रागी जावित नही रहता ॥ २५ ॥

यच्चान्यदपि किचित्स्याद्वैकतं स्वरवर्णयोः ।

बलमासविहीनस्य तत्सर्वं मरणोदयम् ॥ २६ ॥

बल, मास से विहीन रोगी में इनके अतिरिक्त स्वर और वर्ण में कुछ वैका-रिक भाव आ जाये तो यह सब मृत्यु के सूचक हैं ॥ २६ ॥

तत्र श्लोकः - इति वर्णस्वरावुक्तौ लक्षणार्थं मुमूर्षताम् ।

यस्तु सम्यग्विजानाति नाऽऽयुर्ज्ञाने स मुह्यति ॥ २७ ॥

जी वैद्य मरणोन्मुख पुरुषों के वण स्वर के इन लक्षणों को भली प्रकार जानता है, वह आयु के परिज्ञान में कभी धोखा नहीं खाता ॥ २७ ॥

इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते इन्द्रियस्थाने वर्णस्वरीयमिन्द्रिय नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

द्वितीयोऽध्यायः अथात. पुष्पितमिन्द्रिय व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

इसके आगे ' पुष्पितक इन्द्रिय ' नामक अध्याय की व्याख्या करेंगें जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥

पुष्प यथा पूर्वरूपं फलस्येह भविष्यतः ।

तथा लिङ्गमरिष्टाख्यं पूर्वरूपं मरिष्यतः ॥ ३ ॥

अप्येवं तु भवेत्पुष्पं फलेनाननुबन्धि यत् ।

फलं चापि भवेत्किचिद्यस्य पुष्पं न पूर्वजम् ॥ ४ ॥

न त्वरिष्टस्य जातस्य नाशोऽस्ति मरणाहते ।

मरणं चापि तन्नास्ति यन्नारिष्टपुरःसरम् ॥ ५ ॥

जिस प्रकार भविष्य में होने वाले फल का पूर्वरूप ' पुष्प ' प्रकार मरणोन्मुख पुरुष के लक्षण ' अरिष्ट ' नाम से होते हैं । होता है, उसी

पृष्ठ 158

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अ ० २ ] इन्द्रियस्थानम् १४३ VV अपवाद - ऐसे पुष्प भी होते हैं जिनमें कल उत्पन्न नहीं होता और कई ऐसे फल होते हैं जिनमें पहिले फूल नही आता [ जैसे बेंत मे बिना फूल आए द्दी शाखा से ही फल पैदा होता है, इसी प्रकार गूलर में भी फूल नहीं होता ], परन्तु अरिष्ट लक्षणों में ऐसा नहीं होता । ऐसा मरण नही जिसके पूर्व अरिष्ट लक्षण उत्पन्न नहीं होते और अरिष्ट लक्षण उत्पन्न होने के बाद मरण हुए विना नही रहता । [ अरिष्ट लक्षण दो प्रकार के हैं । ( १ ) नियत और ( २ ) अनि-यत । नियत अरिष्ट वे हैं जिनसे मृत्यु का होना निश्चित ही है, अनियत ( अनि-श्चित ) वे हैं जिनसे मरण सदेह में होता है । रसायन और तप द्वारा इन लक्षणो को दूर भी किया जा सकता है । ] ॥ ३-५ ॥

मिथ्यादृष्टमरिष्टाभमनरिष्टमजानता ।

अरिष्टं वाऽप्यबुद्धमेतत्प्रज्ञापराधजम् ॥ ६ ॥

अरिष्ट लक्षणो को यथार्थ न समझना, न उत्पन्न हुए अरिष्ट लक्षणों को बुद्धि दोष से अरिष्ट लक्षण समझ लेना, अथवा उत्पन्न हुए न पहिचान सकना, ये सब बुद्धिदोष से होता है ॥ ६ ॥

ज्ञानसबोधनार्थं तु निर्मरणपूर्वजैः ।

पुष्पितानुपदेक्ष्यामो नरान् बहुविधर्बहून् ॥ ७

नानापुष्पोपमो गन्धो यस्य वाति दिवानिशम् ।

पुष्पितस्य वनस्येव नानाद्रुमलतायतः ॥ ८ ॥

तमाहुः पुष्पित धीरा नरं मरणलक्षणे ।

स ना सवत्सराद्देहं जहातीति विनिश्वयः ॥ ६

पुष्पित का लक्षण -अरिष्ट लक्षणो को ॥ ॥ ज्ञान कराने के लिये मृत्यु से पूर्व होने वाले लक्षणों द्वारा ' पुष्पित ' अरिष्ट युक्त नानाप्रकार के रोगियो का वर्णन करते है । ( १ ) जिस पुरुष के शरीर से नाना प्रकार के वृक्ष लताओं से भरे वन की भाति नाना प्रकार के फूलो की गन्ध के तुल्य गन्ध रात दिन बहती है, उस पुरुष को बुद्धिमान् पुरुष ' पुष्पित ' कहते है, ये मृत्यु के लक्षण है । इन लक्षणो से मनुष्य एक साल के भीतर ही प्राणों को छोड़ता है ॥ ७ - ९ ॥

एवमेकैकश पुष्पर्यस्य गन्ध. समो भवेत् ।

इष्टैर्वा यदि वाऽनिष्टः स च पुष्पित उच्यते ॥ १० ॥

समासेनाशुभान् गन्धानकत्वेनाथ वा पुमान् ।

आजिप्रेद्यस्य गात्रेषु तं विद्यात्पुष्पितं भिषक् ॥ ११ ॥

पृष्ठ 159

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१४४ चरकसंहिता [ अ ० २

आलतानाप्लुते काये यस्य गन्धा शुभाशुभा ।

व्यत्यासेनानिमित्ताः स्युः स च पुष्पित उच्यते ॥ १२ ॥

( २ ) इसी प्रकार जिस मनुष्य के शरीर से अच्छी या बुरी, किसी एक फूल की गन्ध के समान गन्व आये, इसको भी ' पुष्पित ' कहा जाता है । सक्षेप से, ( ३ ) जिस पुरुष के शरीर से नाना प्रकार को अशुभ गन्धों को वैद्य सूघ ले उसे भी ' पुष्पित ' ही जाने । ( ४ ) स्नान किये अथवा विना ही स्नान दिये जिसके शरीर से सुगन्ध या दुगन्ध आये, वह पुष्पित ' कहा जाता है [ अर्थात् स्नान करने पर अशुभ और स्नान न करने पर तो ' पुति ' समझना चाहिये ] ॥ १२ ॥

तद्यथा चन्दन कुष्ठं तगरागुरुणी मधु ।

माल्यं मूत्रपुरीषे च मृतानि कुणपानि च ॥ १३

ये चान्ये विविधात्मानो गन्धा विविधयोनयः ।

तेऽप्यनेनानुमानेन विज्ञेया विकृति गताः ॥ १४

इदं चाप्यतिदेशार्थं लक्षण गन्धसश्रयम् । शुभ गन्ध आये ॥ ॥ वक्ष्यामो यदभिज्ञाय भिपडू मरणमादिशेत् ॥ १५ ॥

वियोनिर्विदुरो यस्य गन्धो गात्रेषु दृश्यते ।

इष्टो वा यदि वाऽनिष्टो न स जीवति ता समाम् ॥ १६ ॥

एतावद् गन्धविज्ञानम् । चन्दन, कूठ, तगर, मवु, फूल, मूत्र, मल, मुर्दे या दूसरे सड़े गन्ध अथवा नाना प्रकार के जो अन्य नाना पदाथो से उत्पन्न होते हैं उन गन्धों को भी अनुमान से विकारजन्य जानना चाहिये | गन्ध के आश्रित लक्षणों को भी विस्तार से कहेंगे; जिनको जान कर वैद्य रोगों के मरण को बतला सके । जिस रोगो के शरीर से विना कारण के स्थिर गन्ध अथवा अच्छी या बुरी गन्ध आती

हो, वह एक साल में अवश्य मर जाता है । गन्ध - विज्ञान प्रकरण इतना ही है ॥१६ ॥

रसज्ञानमतः परम् ।

आतुराणां शरीरेषु वक्ष्यामो विधिपूर्वकम् ॥ १७ ॥

यो रसः प्रकृतिस्थानां नराणा देहसंभवः ।

स एषा चरमे काले विकारान् भजते द्वयम् ॥ १८ ॥

कश्चिदेवास्य वैरस्यमत्यर्थमुपपद्यते ।

स्वादुत्वमपरचापि विपुलं भजते रसः ॥ १६ ॥

पृष्ठ 160

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अ ० ३ ] १० इन्द्रियस्थानम् अब रोगी के शरीर में रस ज्ञान को विधिपूर्वक कहते में प्रकृति अवस्था में जो रस रहता है, वह रस मृत्यु के किसी एक रूप में बदल जाता है । अर्थात् किसी रोगी के अधिक बदल जाता है, बिगड़ जाता है और किसी के अधिक मात्रा में स्वादु बन जाता ॥ १७-१६ ॥

तमनेनानुमानेन विद्याद्विकृतिता गतम् ।

मनुष्यो हि मनुष्यस्य कथं रसमवाप्नुयात् ॥

विकृत हुए रस को अनुमान द्वारा जानना चाहिये । १४५ हैं । मनुष्यों के शरीर समय दो रूपों में से मुख का स्वाद बहुत मुख का स्वाद बहुत २० ॥ क्योंकि इसके सिवाय मनुष्य दूसरे मनुष्य की रस- परीक्षा और किस प्रकार से कर सकता है? ॥ २० ॥

मक्षिकाश्चैव यूकाश्च दंशाश्च मशकैः सह ।

विरसादपसर्पन्ति जन्तो. कायान्मुमूर्षतः ॥ २१ ॥

अत्यर्थरसिकं कार्यं कालपकस्य मक्षिकाः ।

अपिम्नातानुलिप्तस्य भृशमायान्ति सर्वशः ॥ २२ ॥

मरणोन्मुख मनुष्य के शरीर पर से विरसता के उत्पन्न होने से मक्खिया, जुए, डास और मच्छर आदि भी दूर भागने लगते हैं । मरणासन्न रोगी का शरीर बहुत मधुर हो, तो स्नान करके चन्दन लगा देने पर भी मक्खिया इसके शरीर पर मडराती हैं ॥ २१-२२ ॥

तत्र श्लोकः - यान्येतानि मयोक्तानि लिङ्गानि रसगन्धयोः ।

पुष्पितस्य नरस्यैतत्फलं मरणमादिशेत् ॥ २३ ॥

पुष्पित मनुष्य के शरीर में जो रस और गन्ध के लक्षण कहे हैं, इनसे मनुष्य का मरण- फल समझना चाहिये ॥ २३ ॥

इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसत्कृते इन्द्रियस्थाने पुष्पित केन्द्रियं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

तृतीयोऽध्यायः अथातः परिमर्शनीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्मा ss ह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

इसके आगे अब ' परिमर्शनीय इन्द्रिय ' नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे ।

जेसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥

वर्णे स्वरे न्च

च गन्धे च रसे चोक्तं पृथक् पृथक् ।

लिङ्गं मुमूर्षतां सम्यक स्पर्शेष्वपि निबोधत ॥ ३ ॥