श्रीगणेशाय नमः।

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 161–170

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 161–170

पृष्ठ 161

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 161 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

९ ४६ चरकसंहिता [ अ १०३ ० ~~ मरणोन्मुख रोगी के वर्ण, स्वर गन्ध और रस का पृथक् पृथक् वर्णन कर दिया है, अब स्पर्श सम्बन्धी लक्षणों को कहते हैं ॥ ३ ॥

स्पर्शप्राधान्येनैवाऽऽतुरस्याऽऽयुष प्रमाणविशेषं जिज्ञासुः प्रकृति-स्थेन पाणिना केवलमस्य शरीर स्पृशेत् विमर्शयेद्वाऽन्येन ॥ ४ ॥

परिमृशता तु खल्वातुरशरीरमिमे भावास्तत्र तत्राव बोद्धव्या भवन्ति । तद्यथा— सततं स्पन्दमानाना शरीरदेशाना स्तम्भः, नित्योष्मणां शीती-भावः, मृदूना दारुणत्वं, ऋक्षणाना खरत्व, स्थूलाना वृषणादीनां सता-मसद्भावः, सन्धीनां स्रस भ्रंश- च्यवनानि । मासशोणितयोर्वीतीभावो दारुणत्व, स्वेदानुबन्धः स्तम्भो वा । यच्चान्यदपि किचिदीहरा स्पर्शाना

लक्षणमनिमित्तं स्यात् । इति लक्षणानां संग्रहः स्पर्शानाम् ॥ ५ ॥

स्पर्श की प्रधानता से रोगी के आयु का परिणाम जानने की इच्छा से, वैद्य अपने स्वस्थ हाथ से रोगी के सम्पूर्ण शरीर को स्पर्श करे अथवा किसी दूसरे व्यक्ति से ( जिसका स्वस्थ हाथ हो ) स्पर्श करवावे । स्पर्श करते हुए रोगी के शरीर में निम्न बाते जाननी चाहिये । यथा - निरन्तर स्पन्दन करने वाले शरीर के भागों का स्पन्दन करने से रुक जाना, शरीर मे जो अग सदा गरम रहते हैं उनका शीतल हो जाना, कोमल अगों का कठोर हो जाना, चिकने अगों का कर्कश हो जाना, वृषण आदि स्थूल अगों का लुप्त हो जाना, सन्धियों का स्रसन ( गिर जाना ), भ्रशन ( खिसक जाना ), च्यवन ( दूसरे स्थानों में चले जाना ), मास और रक्त का बहुत क्षीण हो जाना और कठोर ( घट्ट ) बन जाना, पसीने का अधिक आना या बिल्कुल न आना । इसी प्रकार के अन्य अकारण स्पर्श जन्य लक्षण जो भी उत्पन्न हों उनकी स्पर्श द्वारा परीक्षा करनी चाहिये । ये सक्षेप में स्पर्श - लक्षणों का सग्रह किया है ॥ ४५ ॥

तद् व्यास तोऽनुव्याख्यास्यामः – तस्य चेत्परिमृश्यमानं पृथक्त्वेन पाद - जङ्घोरु- स्फिगुदर - पार्श्व - पृष्ठेषिका - पाणि- ग्रीवा - ताल्वोष्ठ - ललाटं स्विन्न शीतं स्तब्धं दारुणं वीत - मास - शोणितं वा स्यात्, परासुरयं पुरुषो नचिरात्काळ मरिष्यतीति विद्यात् ॥ ६ ॥

उसीको विस्तार से आगे कहते हैं । रोगी के भिन्न २ अगों मे स्पर्श करने से यदि पाव, जघा. ऊरु, नितम्ब, उदर, प्रार्ख, पृष्ठ वद्य के मणके, हाथ, ग्रीवा, तालु, ओष्ट, ललाट ये अवयव पसीने से युक्त, शीतल या जड़ या कठोर अथवा मास या रक्त से रहित हो तो समझ लेना चाहिये कि रोगी पुरुष बहुत दिनों तक नहीं जीयेगा, उसकी मृत्यु शीघ्र ही होगी ॥ ६ ॥

१ ' भ्रशघावनानि ' इति पाठः ।

पृष्ठ 162

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 162 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ३ ] इन्द्रियस्थानम् १४७ तस्य चेत्परिमृश्यमानानि पृथक्त्वेन गुल्फ - जानु - वक्षण गुद - वृषण-मे - नाभ्यंस- स्तन - मणिक - पर्शका हनु- नासिका - कर्णाक्षि शङ्खादीनि स्रस्तानि व्यस्तानि च्युतानि वा स्थानेभ्यः स्युः, परासुरय पुरुषो न चिरात्कालं मरिष्यतीति विद्यात् ॥ ७ ॥

भिन्न २ अवयवों के स्पर्श करने पर यदि गुल्फ ( टखने ), जानु, वक्षण, गुदा, वृषण, शिश्न, नाभि, अस, स्तन, हाथ ( कलाई ), पसुलिया, हनुसन्धि ( जबाड़ा ), नासिका, कान, आख, भौंह, शंख आदि सन्धिया व्यस्त अवस्था मे या इधर उधर अपने स्थानों से खिसकी हों तो समझ लेना चाहिये कि पुरुष शीघ्र ही मर जायेगा ॥ ७ ॥

तथाऽस्योच्छ्वास- मन्या दन्त - पक्ष्म चक्षुः - केश लोमोदर नखाङ्गलि. गणं च लक्षयेत् । तस्य चेदुच्छ्वासोऽतिदीर्घोऽतिह्रस्वो वा स्यात् परा-सुरिति विद्यात् । तस्य चेन्मन्ये परिमृश्यमाने न रुपन्देयातां परासुरिति विद्यात् । तस्य चेद्दन्ताः परिकीर्णाः श्वेता जातशर्कराः स्युः, परासुरिति विद्यात् । तस्य चेत्पक्ष्माणि जटाबद्धानि स्युः, परासुरिति विद्यात् । इसी प्रकार रोगी पुरुष के उच्छ्रास, मन्या ( गले के पार्श्व में जाने वाली दो धमनिया ), दात, पक्ष्म ( पलक ), आख, केश, लोम, पेट, नख और अंगुली की भी परीक्षा करनी चाहिये । जिस रोगी को श्वास, प्रश्वास, बहुत लम्बा या छोटा हो जावे, उसे मरा हुआ जाने । जिस रोगी के मन्या धमनियों में घड़कन प्रतीत न हो, उसे प्राणशून्य जाने । जिसके दात मैल से भरे, श्वेत अथवा शर्क -रायुक्त हो जाये, उसे प्राणरहित जाने । रोगी पुरुष की पलकों के बाल आपस मे चिपटे ( गुझले हुए ) हुए हों, उसे भी प्राणरहित जाने ॥ तस्य चेचक्षुषी प्रकृतिहीने विकृतियुक्तेऽत्युत्पिण्डितेऽतिप्रविष्टेऽति-जिह्येऽतिविषमेऽतिप्रस्रतेऽतिविमुक्तबन्धने सततोन्मिषिते, सततनिमे-षिते, निमेषोन्मेषातिप्रवृत्ते, विभ्रान्तदृष्टिके, विपरीतदृष्टिके, व्यस्तह-ष्टिके, नकुलान्धे, कपोतान्वेऽलातवर्णे, कृष्ण - नील - पीत - श्याव ताम्र - हरि तन्हारिद्र शुक्ल - वैकारिकाणा वर्णानामन्यतमेनातिष्ठते वा स्यातां, परासुरिति विद्यात् । रोगी की आखे प्रकृतिहीन और विकृति से युक्त अर्थात् बाहर को बहुत निकली, चक्षु गोलकों में अन्दर धसी, बहुत कुटिल, बहुत विषम अथवा एक आख खुली और एक बन्द, आख की मासपेशियां बहुत ढीली हो, बहुत शिथिल, निरन्तर खुली या बन्द रहे, अथवा जल्दी जल्दी खुलें और बन्द हो, भ्रमयुक्त

पृष्ठ 163

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 163 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१४८ चरकसंहिता [ अ ० ३ दृष्टि, अशुद्ध देखने वाली ( विपरीत देखने वाली ), हीनदृष्टि ( जो दूर से न देख सके ), नकुलान्ध कपोतान्ध अलातवर्ण, अगारे के समान आख लाल ही दीखे वा काला, पीला, नीला, श्याम, ताम्बे के समान, हरा, श्वेत इन वैकारिक वर्णों में से किसी एक वर्ण से आक्रान्त हो तो रोगी को मरा हुआ जानना चाहिये । अथास्य केशलोमान्यायच्छेत् — तस्य चेत्केशलोमान्यायम्यमानानि प्रलच्येरन्न च वेदयेयुः परासुरिति विद्यात् । शिर के बाल या शरीर के बाल खींचने पर उखड़ आयें और रोगी को इनके उखड़ने का पता न लगे ( दर्द न हो ) तो उसको मरा हुआ जानना चाहिये । तस्य चेदुदुरे सिराः प्रदृश्येरन् श्याव - ताम्र- नील - हारिद्र शुक्ला वा स्युः परासुरिति विद्यात् । यदि रोगी के पेट की शिरायें दीखने लगे अथवा इनका रंग काला, ताम्बे का रंग, हल्दी के समान पीला या श्वेत हो जाये तो उसे मरा हुआ ही जाने । तस्य चेन्नखा वीतमांसशोणिताः पक्वजाम्बववर्णाः स्युः, परासु-रिति विद्यात् । जिस रोगी के नखों का मास और रक्त क्षीण हो जाये, पकी हुई जामुन के समान नख काले नीले हो जायें तो उसे मरा हुआ समझें । अथास्याङ्गुलीरायच्छेत्तस्य चेदङ्गुलय आयम्यमाना न चेत्स्फुटेयुः, परासुरिति विद्यात् ॥ ८ ॥

रोगी पुरुष का अंगुलियों को पकड़कर खीचे और यदि उसकी अगुलियों में चटकने की आवाज़ न आये, तो उसे गतायु ( मृत ) ही समझे ॥ ८ ॥

भवति चात्र - एतान् स्पृश्यान् बहून् भावान् यः स्पृशन्नावबुध्यते ।

आतुरे न स संमोहमायुर्ज्ञानस्य गच्छति ॥ ६ ॥

वर्णन किये हुए स्पृश्य अंगों को स्पर्श करके सम्पूर्ण लक्षणों को जो वैद्य भली प्रकार से जान लेता है, वह रुग्ण पुरुष के आयुर्ज्ञान मे कभी धोखा नही खाता ॥ ६ ॥

इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रति सस्कृते इन्द्रियस्थाने परिमर्शनीयेन्द्रिय नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

पृष्ठ 164

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 164 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१५० चरकसहिता योऽग्नि प्रकृतिवर्णस्थ नीलं पश्यति निष्प्रभम् । कृष्ण वा यदि वा शुक्लमग्नौ वसति सप्तमीम्

मरीचीनसतो मेघान्मेघान्वाप्यसतोऽम्बरे ।

विद्युतो वा विना मेघात् पश्यन्मरणमृच्छति ॥

मृण्मयीमिव यः पात्री कृष्णाम्बरसमावृताम् । [ अ ० ४ ww www. ~ ॥ ११ ॥

१२ ॥ आदित्यमीक्षते शुद्धं चन्द्र वा न स जीवति ॥ १३ ॥

अपर्वणि यदा पश्येत्सूर्याचन्द्रमसोर्ब्रहम् ।

अव्याधितो व्याधितो वा तदन्तं तस्य जीवितम् ॥ १४ ॥

नक्त सूर्यमहश्चन्द्रमनग्नौ धूममुत्थितम् ।

अग्निं वा निष्प्रभं रात्रौ दृष्ट्वा मरणमृच्छति ॥ १२ ॥

प्रभावतः प्रभाहीनान्निष्प्रभान् वा प्रभावतः ।

बरा विलिङ्गान् पश्यन्ति भावान् प्राणाखिहासवः ॥ १६ ॥

व्याकृतानि विवर्णानि विसरूयोपगतानि च ।

विनिमित्तानि पश्यन्ति रूपाण्यायुः धाये नराः ॥ १७ ॥

यच पश्यत्यदृश्यान् वै दृश्यान् यश्च न पश्यति ।

वावुभौ पश्यतः क्षिप्रं यमालयम संशयम् ॥ १८ ॥

अब इन्हीं का आगे विस्तार से वर्णन करते हैं-( १ ) जो रोगी आकाश को ठोस ( कठिन ) रूप में देखता है, अथवा पृथ्वी को आकाश की भांति शून्यरूप में देखता है, दोनों प्रकार का विपरीत दर्शन करता हुआ पुरुष मृत्युको प्राप्त होता है । ( २ ) जिस रोगी को आकाश में बहने वाली ( अदृश्य ) वायु दिखाई देने लगे और जलती हुई आग दिखाई न देवे उस रोगी का आयु समाप्त हुआ जाने । ( ३ ) शुद्ध निर्मल जालरहित जल मे जाल ( - तन्तु ) देखे और स्थिर पानी को चलता ( बहता ) देखे वह भी शीघ्र ही प्राणत्याग करेगा । ( ४ ) जो रोगी मनुष्य जागता हुआ प्रेत, राक्षस अथवा अन्य किसी प्रकार का आश्चर्यकारक पदार्थ देखता है वह रोगी जीने में समर्थ नहीं है । ( ५ ) जो रोगी प्रकृति में स्थित ( लाल, कपिल वर्ण की ) अग्नि को नीली और कान्ति से रहित, काळी या श्वेत वर्ण की देखता है, वह सातवीं रात्रि में स्वयं अग्नि ( चिता ) मे वास करता है । ( ६ ) जो रोगी आकाश में सूर्य की किरणों के न होने पर भी किरणों को, १. ' निशा व्रजति, इति च पाठ, वह सातवीं रात चढ बसता है ।

पृष्ठ 165

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 165 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ४ ] इन्द्रियस्थानम् १५१ मेघों के न होते हुए मेघों को आकाश मे देखे, अथवा बिना बादलों के बिजली को देखे, उसे मरणोन्मुख समझना चाहिये । ( ७ ) जो रोगी मेघ आदि से न छिपे, शुद्ध सूर्य या चन्द्रमा को काले वस्त्रों से टपे कटोरे वा मिट्टी के बर्तन के रूप में देखता है, वह नहीं जीता । ( ८ ) जो मनुष्य ग्रहण योग के बिना सूर्य या चन्द्रमा में ग्रहण देखता है, उस स्वस्थ या रोगी पुरुष की आयु समाप्त समझनी चाहिये । ( ६ ) जिस रोगी को रात्रि में सूर्य, दिन में चन्द्रमा ओर विना आग के बुवा तथा रात्रि मे प्रभा के बिना आग दीखे [ दिन मे आग का निष्प्रभ दीखना अरिष्ट नहीं ] उस रोगी को गतायु ( मृत ) समझना चाहिये । ( १० ) जिन पुरुषों ने अञ्जन आदि नहीं लगाया उनमें अञ्जन आदि देखे ( विना कान्ति के पुरुषों में कान्ति का दीखना ), तथा प्रभावान् पुरुषों को निष्प्रभ देखना, इस प्रकार स्वाभाविक लक्षणों से रहित पुरुषों को प्राणों को छोड़ने वाला पुरुष ही देखता है । ( ११ ) आयु के क्षय होने पर रोगा मनुष्य पदार्थों के विकृत रूप, विपरीत रंग, अशुद्ध सख्या से युक्त, विना कारण के आकृति में परिवर्तन देखता है । ( १२ ) जो मनुष्य अदृश्य रूपों को देखता है और आख से दीखने वाले पदार्थों को नहीं देखता, वे दोनों निश्चय से शोघ्र ही यमलोक मे जाते हैं ॥६- १८ ॥

अशब्दस्य च यः श्रोता शब्दान् यश्च न बुध्यते ।

द्वावप्येतौ यथा प्रेतौ तथा ज्ञेयौ विजानता ॥ १६ ॥

सवृत्त्याङ्गुलिभिः कर्णौ ज्वालाशब्द य आतुरः ।

न शृणोति गतासुं तं बुद्धिमान् परिवर्जयेत् ॥ २० ॥

( १३ ) जो मनुष्य बिना शब्द के शब्द सुने और शब्द को नहीं सुनता, इन दोनों मनुष्यों को प्रेत के समान गिनने चाहिये ( मरे हुए समझने चाहिये ) । ( १४ ) अगुलियों से कानों को बन्द करने पर जिस रोगी को कानों में ' ज्वाला - शब्द ' ' घनघन ' आवाज सुनाई न देवे उसे मरा हुआ समझना चाहिये, उसकी चिकित्सा न करे ॥ १६-२० ॥

विपर्ययेण यो विद्याद् गन्धाना साध्वसाधुताम् ।

न वा तान् सर्वशो विद्यात्त विद्याद् विगतायुषम् ॥ २१ ॥

( १५ ) जो मनुष्य शुभ गन्ध को अशुभ और अशुभ गन्ध को शुभ इस प्रकार विरुद्ध रूप से तथा जो मनुष्य सर्वथा गन्ध को नहीं पहिचानता, इन दोनों को मरणासन्न समझना चाहिये ॥ २१ ॥

पृष्ठ 166

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 166 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१५२ चरकसंहिता [ अ ०४

यो रसान्न विजानाति न वा जानाति तत्त्वतः ।

मुखपाकादृते पक्कं तमाहुः कुशला नरम् ॥ २२ ॥

( १६ ) जो मनुष्य ' मुख- पाक ' के बिना ही रसों को नहीं जानता अथवा रसों को उनके स्वकीय रूप ( जैसे हैं वैसे रूप ) में नहीं पहिचानता, वह शीघ्र मर जाता है, कुशल पुरुष उसकी आयु को पूर्ण हुई कहते हैं ॥ २२ ॥

उष्णाशीतान् खरान् लक्षणान्मृदूनपि च दारुणान् ।

स्पृश्यान् स्पृष्ट्वा ततोऽन्यत्वं मुमूर्षुस्तेषु मन्यते ॥ २३ ॥

( १७ ) जो मनुष्य उष्ण, शीत, खर, श्लक्ष्ण, चिकने, कोमल या कठोर पदार्थों को स्पर्श करके विपरीत रूप में ( यथा उष्ण को शीत और शीत को उष्ण ) जानता है वह मरणासन्न है ऐसा समझना चाहिये ॥ २३ ॥

अन्तरेण तपस्तीत्रं योग वा विधिपूर्वकम् ।

इन्द्रियैरधिकं पश्यन् पञ्चत्वमधिगच्छति ॥ २४ ॥

इन्द्रियाणामृते दृष्टेरिन्द्रियार्थान्न पश्यति ।

विपर्ययेण यो विद्याचं विद्याद्विगतायुषम् ॥ २५ ॥

स्वस्थाः प्रज्ञाविपर्यासैरिन्द्रयार्थेषु वैकृतम् ।

पश्यन्ति ये सुबहुरास्तेषां मरणमादिशेत् ॥ २६ ॥

( १८ ) जो मनुष्य तीव्र तप के विना अथवा विधिपूर्वक योगसमाधि से ज्ञान प्राप्त किये विना, साधारण मनुष्यों से अधिक इन्द्रिय ज्ञान देखता है, वह मरणासन्न है । [ समाधि - ज्ञान तथा तीव्र तप ही अतीन्द्रिय ज्ञान करा सकते हैं ] | ( १६ ) जो मनुष्य इन्द्रियों की शक्ति से अप्राप्य पदार्थों को इन्द्रियों द्वारा देखने या प्राप्त करने लगता है वह जीवित नहीं रहता है । ( २० ) नीरोग, स्वस्थ पुरुष जो कि बुद्धिदोष के कारण प्रायः करके ( एक बार नहीं ) इन्द्रियों के विषयों को विपरीत रूप में अथवा असद् रूप में देखते हैं वे शीघ्र मृत्यु को प्राप्त होते हैं ॥ २४-२६ ॥

तत्र श्लोकाः -- एतदिन्द्रियविज्ञानं यः पश्यति यथातथम् ।

मरणं जीवितं चैव स भिषग्ज्ञातुमर्हति ॥। २७ ॥

जो पुरुष इस इन्द्रिय विज्ञान को भली प्रकार से देखता है, वह वैद्य मृत्यु और जीवन दोनों को भली प्रकार से जान सकता है ॥ २७ ॥

इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने इन्द्रियानीकमिन्द्रियं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

पृष्ठ 167

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 167 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ५ ] इन्द्रियस्थानम १५३ पञ्चमोऽध्यायः अथातः पूर्वरूपीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ इति ह स्मा SS ह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

इसके आगे ' पूर्वरूपीय इन्द्रिय ' नामक अध्याय की व्याख्या भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥

पूर्वरूपाण्यसाध्याना विकाराणां पृथक पृथक् ।

भिन्नाभिन्नानि वक्ष्यामो भिषजां ज्ञानवृद्धये ॥

पूर्वरूपाणि सर्वाणि ज्वरोक्तान्यतिमात्रया ।

॥

करेगे । जैसा ३ ॥ यं विशन्ति विशत्येन मृत्युर्ध्वरपुरःसरः ॥ ४ ॥

अन्यान्यपि च रोगस्य पूर्वरूपाणि य नरम् ।

विशन्त्येतेन कल्पेन तस्यापि मरणं ध्रुवम् ॥ ५ ॥

वैद्यों के ज्ञान बढाने के लिये असाध्य रोगों के भिन्न भिन्न पूर्वरूप पृथक् पृथक् रूप से कहेंगे । ज्वर में कहे हुए पूर्वरूप जिस ज्वर रोगी में सम्पूर्ण रूप में या बहुत अधिक प्रमाण मे प्रविष्ट होते हैं, उसमें ज्वर साक्षात् मृत्यु रूप से घुस जाता है । इसी प्रकार अन्य किसी भी रोग में पूर्वरूप सम्पूर्ण रूप से या बहुत प्रमाण में रोगी में दिखाई दें, तो उसकी भी निश्चय मृत्यु होती है ॥ ३५ ॥

पूर्वरूपैकदेशांस्तु वक्ष्यामोऽन्यान् सुदारुणान् ।

ये रोगाननुबध्नन्ति मृत्युयैरनुबध्यते ॥ ६ ॥

बलं च हीयते यस्य प्रतिश्यायश्च वर्धते 1 तम्य नारीप्रसक्तम्य शोषोऽन्तायोपजायते ॥ ७ ॥

श्वभिरुष्ठैः खरैर्वाऽपि याति यो दक्षिणां दिशम् ।

स्वप्ने यक्ष्माणमासाद्य जीवित स विमुञ्चति ॥ ८ ॥

इसके आगे रोगों के भयकर पूर्वरूपों के एक अश का वर्णन करते हैं, जो रोगों के साथ दिखाई देते हैं तथा जिनके साथ मृत्यु का निश्चय सम्बन्ध है । ( १ ) जिस क्षय रोगी का बल घट गया हो और प्रतिश्याय ( कफ ) बढ रहा हो, ऐसी अवस्था में भी रोगी स्त्री - उग का व्यसनी हो तो क्षय रोग उसकी मृत्यु के लिये होता है । ( २ ) जो क्षयरोगी स्वप्न में कुत्ते, ऊट, गधे आदि पर चढ़ कर दक्षिण दिशा में गमन करता हो वह रोगी कभी जीता नहीं बच सकता ॥६-८ ॥

प्रेतैः सह पिबेन्मद्य स्वप्ने यः कृष्यते शुना ।

सुघोरं ज्वरमासाद्य स जीवमवसृज्जते ॥ ६ ॥

पृष्ठ 168

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 168 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१५४ चरकसंहिता [ अ ० ५ ( ३ ) जो रोगी नींद में प्रेतों के साथ मद्यपान करे और स्वप्न मे जिसको कुत्ते घसीटते हो वह रोगी पुरुष घोर ज्वरी होकर जीता नहीं बच सकता ॥६ ॥

लाक्षारक्ताम्बराभं य पश्यत्यम्बरमन्तिकात् ।

स रक्तपित्तमासाद्य तेनैवान्ताय नीयते ॥ १० ॥

रक्तस्रग् रक्तसर्वाङ्गो रक्तवासा मुहुर्हसन् ।

यः स्वप्ने ह्रियते नार्या स रक्तं प्राप्य सीदति ॥ ११ ॥

( ४ ) जो रोगी समीप मे ही आकाश को लाख के रस या मेंहदी के रंग में रंगे कपड़े के समान लाल देखे, वह रक्तपित्त रोग में ग्रस्त से मृत्यु को प्राप्त हो जाता है । ( ५ ) जो रोगी स्वप्न में लाल माला पहिने, सब अगों लाल कपड़ा पहिने, बार बार हसता हुआ, स्त्री से कहीं अन्यत्र वह पुरुष रक्त पित्त का रोगी हो कर मर जाता है ॥ १०-११

शूलाटोपात्राच दर्बिल्य चातिमात्रया ।

नखादिषु च वण्य गुल्मेनान्तकरो ग्रहः ॥ १२ ॥

aat surfeit यस्य दारुणा हृदि जायते ।

स्वप्ने गुल्मस्तमन्ताय क्रूरो विशति मानवम् ॥

होकर उसी रोग को लाल देखे, ले जाया जाये, ॥ १३ ॥ ( ६ ) जिस रोगो को शूल, आध्मान ( आफुरा ), आतों का कूजना शब्द, और बहुत अधिक दुर्बलता हो, तथा नख आदि जिसके श्वेत हो जाये उस रोगी का गुल्म ही मृत्युकारी होता है । ( ७ ) जिस रोगी के हृदय में स्वप्न में काटेदार बेल उत्पन्न हो, उस रोगी को गुल्म रोग मृत्युरूप से आता है ॥ १२-१३ ॥

कायेऽल्पमपि स्पृष्टं सुभृश यस्य दीर्यते ।

शतानि च न रोहन्ति कुष्ठैमृत्यु हिनस्ति तम् ॥ १४ ॥

नग्नस्याज्यावसितस्य जुह्वतोऽग्निमनचिषम् ।

पद्मान्युरसि जायन्ते स्वप्ने कुष्ठैर्मरिष्यतः ॥ १५ ॥

( ८ ) जिस रोगी के शरीर पर थोड़ा सा स्पर्श किया हुआ बहुत अधिक घाव कर देता है, तथा जिसके व्रण नहीं भरते, वह मनुष्य कुष्ठ रोग के कारण मरता है । ( 2 ) जो मनुष्य स्वप्न में नगा होकर, अंगों पर घी लगा कर बिना ज्वाला के अग्नि में हवन करता वा जिसके हृदय में से कमल उलब होता है, वह कुष्ठ रोग से मरता है ॥ १४-१५ ॥

पृष्ठ 169

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 169 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ५ ] इन्द्रियस्थानम् १५५

स्नातानुलिप्तगात्रेऽपि यस्मिन् गृध्नन्ति मक्षिकाः ।

स प्रमेहेण संस्पर्शं प्राप्य तेनैव हन्यते ॥ १६ ॥

स्नेह बहुविधं स्वप्ने चण्डालैः सह यः पिवेत् ।

वध्यते स प्रमेहेण स्पृश्यतेऽन्वाय मानवः ॥ १७ ॥

( १० ) जिस मनुष्य के स्नान करने और चन्दन का लेप करने पर भी मक्खिया शरीर पर से नहीं उड़तीं वह प्रमेह का रोगी होकर उसी से मृत्यु को प्राप्त होता है । ( ११ ) जो मनुष्य स्वप्न में नाना प्रकार के स्नेहों का चाण्डालों के साथ पान करता है, वह प्रमेह के रोग से आक्रान्त होकर प्रमेह से मरता है ॥१६-१७ ॥

ध्यानायासी तथोद्वेगो मोहश्वास्थानसंभवः ।

अरतिर्बलहानिश्च मृत्युरुन्मादपूर्वकः ॥ १८ ॥

आहारद्वेषिण पश्यल्लप्रचित्तमुद्दितम् ।

विद्याद्धीरो मुमृतमुन्मादेनातिपातिना ॥ १६ ॥

क्रोधन त्रासबहुल सकृत्प्रहसिताननम् ।

मूर्च्छापिपासाबहुल हन्त्युन्मादः शरीरिणम् ॥ २० ॥

नृत्यन् रक्षोगणैः साध य. स्वप्नेऽम्भसि सीदति ।

स प्राप्य भृशमुन्माद याति लोकमतः परम् ॥ २१ ॥

( १२ ) जिसको ध्यान और श्रम, उद्वेग और मोह आदि विना अवसर के ( समय के विना जहा नहीं करने चाहिये वहा ) हों, उदासीनता और बलहानि हो जाये, उसकी मृत्यु उन्माद रोग से होती है । ( १३ ) भोजन से द्वेष करनेवाला, जिसका चित्त नष्ट हो गया हो, ( अस्थिर चित्त ), तथा ऊर्ध्व वात से पीडित हो, ऐसा रोगी उन्माद रोग सेमरता है । ( १४ ) अत्यन्त क्रोधी, बहुत डरने वाला, एकदम सहसा हसने लगे, अतिशय मूर्छा प्यासवाला रोगी उन्माद से मरता है । ( १५ ) जो मनुष्य स्वप्न में राक्षसों के साथ नृत्य करता हुआ पानी में डूब जाता है, वह तीव्र उन्माद रोग से मृत्यु को प्राप्त होता है ॥ १८-२१ ॥

असत्तमः पश्यति यो यः शृणोत्यसत. स्वरान् ।

बहून् बहुविधाञ्जाग्रत्सोऽपस्मारेण वध्यते ॥ २२ ॥

मत्तं नृत्यन्तमाविध्य प्रेतो हरति यं नरम् ।

स्वप्ने हरति तं मृत्युर पस्मारपुरःसरः ॥ २३ ॥

पृष्ठ 170

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड), पृष्ठ 170 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१५६ चरकसंहिता [ अ ० ५ A ( १६ ) अन्धकार के विना जो अन्धकार को देखता है और जागता हुआ भी विना शब्दों के जो अनेक शब्द सुनता है, यह रोगी अपस्मार से मारा जाता है । ( १७ ) स्वप्न में मत होकर 9 नाचता हुआ प्रेत जिस मनुष्य को शिर नीचा करके हर लेते हैं उसकी मृत्यु अपस्मार से होती है ॥ २२-२३ ॥

स्तभ्येते प्रतिबुद्धम्य हनू मन्ये तथाऽक्षिणी ।

यस्य तं बहिरायामो गृहीत्वा हन्त्यसंशयम् ॥ २४ ॥

शष्कुलीरप्यपूपान् वा स्वप्ने खादति यो नर ।

सत्ताक्छति प्रतिबुद्धो न जीवति ॥ २५ ॥

( १८ ) जिस रोगी के जागते समय हनु ( जबड़े ), मन्या, सिरा तथा आखें स्तम्भित ( जड़ ) रह जायें, वह रोगी ' बहिरायाम ' नाम ( वात व्याधि से ) मरता है । [ इस रोग में प्राण बाहर के बाहर ही रह जाते हैं, भीतर प्रवेश नहीं करते । ] ( १ ९ ) जो मनुष्य स्वप्न में पूरी, पूए आदि वस्तु खाये और जागने पर उसी प्रकार का फिर वमन करे, वह नहीं जीता । वह अवश्य मृत्यु को प्राप्त होता है ॥ २४-२५ ॥

एतानि पूर्वरूपाणि यः सम्यगवबुध्यते ।

स एषामनुबन्ध च फल च ज्ञातुमर्हति ॥ २६

जो वैद्य इन पूर्वरूपो को भली प्रकार से समझता है, और फलों को भली प्रकार से कह सकता है ॥ २६ ॥

य इमाश्चापरान् स्वप्नान् दारुणानुपलक्षयेत् । व्याधितानां विनाशाय क्लेशाय महतेऽपि वा

यस्योत्तमाङ्गे जायन्ते वंशगुल्मलतादयः ।

॥

वह इनके अनुबन्ध ॥। २७ ॥ वयांसि च विलीयन्ते स्वप्ने मौण्ड्यमियाञ्च यः ॥ २८ ॥

गृधोकश्वकाकाद्यैः स्वप्ने यः परिवार्यते ।

रक्षः प्रेत - पिशाच- स्त्री- चण्डाल - द्रवितान्धकै ॥

वंश - वेत्र - लता -पाश - तृण - कण्टक- सकटे । प्रमुह्यति ' हि य स्वप्ने यो गच्छन् प्रपतत्यपि भूमौ पांशुपधानाया वल्मीके वाऽय भस्मनि श्मशानायतने श्वभ्रे स्वप्ने यः प्रविशत्यपि ॥

१ ' स सब्बति हि य ' इति च पाठः ।

२६ ॥

॥ ३० ॥

।

३१ ॥