श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 171–180
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 171–180
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अ ०५ ] इन्द्रियस्थानम
कलुषेऽम्भसि पढे वा कूपे वा तमसावृते ।
स्वप्ने मज्जति शीघ्रेण स्रोतसा हियते च यः ॥ ३२
स्नेहपानं तथाऽभ्यङ्गः स्वप्ने बन्धपराजयौ ।
हिरण्यलाभः कलहः प्रच्छर्दनविरेचने ॥ ३३ ॥
उपानद्युगनाशश्च प्रप्रातः पाशुचर्मणोः ।
हर्षः स्वप्ने प्रकुपितैः पितृभिश्चावभर्त्सनम् ॥ ३४ ॥
दन्त - चन्द्रार्क - नक्षत्र - देवता - दीप - चक्षुषाम् । १५७ ॥ पतनं वा विनाशो वा स्वप्ने भेदो नगस्य वा ॥ ३५ ॥
रक्तपुष्प वन भूमि पापकर्मालया चिताम् ।
गुहान्धकारसबाधं स्वप्ने यः प्रविशत्यपि ॥ ३६ ॥
रक्तमाली हसन्नञ्चैदिग्वासा दक्षिणा दिशम् ।
दारुणामटवी स्वप्ने कपियुक्त ' प्रयाति वा ॥ ३७ ॥
कषायिणामसौम्यानां नग्नाना दण्डधारिणाम् ।
कृष्णाना रक्तनेत्राणां स्वप्ने नेच्छन्ति दर्शनम् ॥ ३८ ॥
कृष्णा पापा निराचारा दीर्घकेशनखम्तनी ।
विरागमाल्यवसना स्वप्ने कालनिशा मता ॥ ३६ ॥
इत्येते दारुणाः स्वप्ना रोगी येर्याति पञ्चताम् ।
अरोगः संशय गत्वा कश्चिदेव विमुच्यते ॥ ४० ॥
नीचे कहे जाने वाले दूसरे भयकर स्वप्न जो रोगियों को दिखाई देते हैं, वे स्वप्न मृत्यु अथवा बहुत कष्ट देने के लिये होते हैं । ( १ ) जिस रोगी के सिर पर स्वप्न में बास, पौदे, बेल आदि उत्पन्न हो जाते हैं, स्वप्न मे जिसके शरीर में पक्षी प्रवेश करते हैं, स्वप्न में जिसका सिर मुड जाये, स्वप्न में जिसको गीध, उल्लू, कुत्ते, कौवे आदि घेर लेते हैं, रावस, प्रेत, पिशाच, स्त्री, चाण्डाल, अन्धे आदि जिसको रोक लेते हैं, स्वप्न में जो बास, बेंत, लता जाल, तृण, काटे आदि में फस जाता है, जो स्वप्न में जाता जाता रेत, धूल से युक्त भूमि पर, बल्मकिया राख में गिर पड़ता है, जो स्वप्न मे श्मशान, देवालय, या गड्ढे मे घुसता है, जो दूषित पानी में, कीचड़ में, अन्धकार से भरे कुएं में, जो स्वप्न में डूबता है ( या स्नान करता है ), अथवा-जो स्वप्न में धार में बह जाता है, स्वप्नावस्था मे जो स्नेह पान करे, मालिश करे, वमन करे, विरेचन करे, स्वर्णलाभ हो, झगड़ा हो, स्वप्न में बन्धन और १. ' कपियुक्तेन याति यः ' इति च पाठः ।
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१५८ चरकसंहिता [ अ ० धू पराजय हो, दोनों जूतों को खो देवे, या धूल या चमड़े पर गिरे, स्वप्न में हर्प हो, क्रोधित पितरों से विकारा जावे, दात, चन्द्रमा, सूर्य, नक्षत्र, देवता, दिया या आख अथवा पर्वत को गिरता देखे, या उनका नष्ट होना अथवा फटना आदि स्वप्न में देखे, लाल फूलों से भरा जगल देखे, वध करने अथवा अन्य पाप कर्म के स्थान या चिता मे या गाढे अन्धकार मे घुसे, नींद में लाल माला पहिन कर, जोर से हंसता हुआ, नगा होकर दक्षिण दिशा में जावे, बन्दरों से युक्त घने जंगल मे जावे तो ये स्वप्न रोगियो को विनाश वा भारी कष्ट के लिये होते है | कषाय, भगवें वस्त्र पहिने, उग्र, नगे, दण्ड धारण किये, काले बाल आँखों वाले ऐसे अशुभ मनुष्यों का दर्शन, काली, पापी, अनाचारी, लम्बे बाल, नख और स्तनों वाली, लाल माला तथा लाल वस्त्र पहिने हुई ऐसी स्त्री का दर्शन कालनिशा के समान है ( ये सब दारुण, भयवर स्वप्न है, जिनको देख कर रोगी मर जाता है । नीरोग मनुष्य यदि इस प्रकार के स्वप्न देखे तो उसका जीवन सन्देह में पड़ जाता है । इस प्रकार के अशुभ स्वप्नों को देख कर कोई विरला ही बचता है ) ॥२७-४० ॥
मनोवहानां पूर्णत्वाद्दोषैरतिबलैखिभिः ।
स्रोतसा दारुणान् स्वप्नान् काले पश्यति दारुणे ॥ ४१ ॥
नातिप्रसुप्तः पुरुषः सफलानफलानपि ।
इन्द्रियेशेन मनसा स्वप्नान् पश्यत्यनेकधा ॥ ४२ ॥
स्वप्न दर्शन का कारण - जिस समय कुपित हुए तीनों वात आदि दोष शरीर के मनोवह स्रोतों को भर देते हैं, उस समय मनुष्य को शुभ या अशुभ स्वप्नों का दर्शन होता है । जिस समय मनुष्य पूर्ण गहरी नींद में नहीं होता है, उस समय सफल या निष्फल होने वाले अनेक स्वामी चित्त के द्वारा देखा करता है ॥ ४१-४२ ॥ दृष्टं श्रुतानुभूतं च प्रार्थित कल्पितं तथा । भाविक दोषजं चैव स्वप्न सप्तविध विदु स्वप्न के भेद - स्वप्न सात प्रकार के हैं । जैसे देखा, ( २ ) श्रुत, कान से सुना, ( ३ ) अनुभूत, शेष प्रार्थित, देवता से भागा या वाहा हुआ ( ५ ) कल्पित, ( ६ ) भाविक, भावी शुभ अशुभ फल का सूचक, ( आदि दोष से उत्पन्न ये सात प्रकार के स्वप्न हैं ॥ ४३ ॥
स्वप्नों को इन्द्रियों के ॥ ४३ ॥
- ( १ ) दृष्ट, आख से इन्द्रियों से जाना, ( ४ ) मन से कल्पना किया, ७ ) दोषज, तीव्र वात
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अ ० ६ ] इन्द्रियस्थानम २५ ह
तत्र पचविधं पूर्वमफलं भिषगादिशेत् ।
दिवास्वप्नमतिह्रस्वमतिदीर्घं तथैव च ॥ ४४ ॥
दृष्टः प्रथमरात्रे यः स्वप्नः सोऽल्पफलो भवेत् ।
न स्वपेद्यः पुनर्दृष्ट्वा स सद्यः स्यान्महाफलः ॥ ४ ' ॥
अकल्याणमपि स्वप्न दृष्ट्वा तत्रैव यः पुनः ।
पश्येत्सौम्यं शुभाकार तस्य विद्याच्छुभं फलम् ॥ ४६ ॥
इनमें से प्रथम पाच प्रकार के स्वप्नों को वैद्य व्यर्थ या निष्फल समझें । इसी प्रकार दिन का स्वप्न तथा रात में आया बहुत छोटा या बहुत बड़ा स्वप्न व्यर्थ होता है । रात्रि के प्रथम भाग में जो स्वप्न आता है, वह भी निष्फल होता है । जिस स्वप्न को देख कर फिर नींद न आये, वह स्वप्न शीघ्र ही बड़े फल को देनेवाला होता है । जो मनुष्य पहिले तो अशुभ स्वप्न को देखे, फिर इसी प्रसंग में सौम्य ओर शुभ स्वप्न को देख ले तो इस स्वप्न का शुभ फल समझना चाहिये ॥ ४४-४६ ॥
तत्र श्लोकः -पूर्वरूपाण्यथ स्वप्नान् य इमान्वेत्ति दारुणान् ।
न स मोहादसाध्येषु कर्माण्यारभते भिषक् ॥ ४७ ॥
जो वैद्य इन पूर्वरूपों को तथा मयानक स्वप्नों को जानता है, वह कभी भी आलस्यवश प्रमाद से असाध्य अवस्था में चिकित्सा कर्म आरम्भ नहीं करता ॥ ४७ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते इन्द्रियस्थाने पूर्वरूपीयमिन्द्रिय नाम पञ्चमोऽध्यायः । षष्ठोऽध्यायः अथातः कतमानि शरीरीयमिन्द्रिय व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह म्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
पूर्वरूपों के अनन्तर भावी व्यावि के आश्रय स्थानों के अरिष्ट लक्षण बललाने के लिये ' कतमानि - रीरीय ' इन्द्रिय अध्याय का व्याख्यान करेगे, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
कतमानि शरीराणि व्याधिमन्ति महामुने ।
यानि वैद्यः परिहरेद्येषु कर्म न सिध्यति ॥ ३ ॥
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१६० चरकसंहिता [ अ ० ६ अग्निवेश ने पूछा- हे महामुने । वे कौन से रोगी शरीर हैं, जिनमें चिकित्सा कर्म सफल नही होता, जिनको वैद्य छोड़ दे और चिकित्सा न करे ॥३ ॥
इत्यात्रेयोऽग्निवेशेन प्रश्न पृष्टः सुदुर्वचम् ।
आचचक्षे यथा तस्मै भगवास्तन्निबोधत ॥ ४ ॥
इस प्रकार अग्निवेश के प्रश्न पूछने पर भगवान् आत्रेय ने उसे उपदेश किया, उसको आप भी सुनो और जानो ॥ ४ ॥
यस्य वै भाषमाणस्य रुजत्यूर्ध्व मुरो भृशम् ।
अन्नं च च्यवते भुक्तं स्थित चापि न जीर्यति ॥ ५ ॥
बलं च हीयते यस्य तृष्णा चाभिप्रवर्धते ।
जायते हृदि शूल च तं भिषक् परिवर्जयेत् ॥ ६ ॥
हिक्का गम्भीरजा यस्य शोणितं चातिसार्यते ।
न तस्मै भेषज दद्यात्स्मरन्नात्रेयशासनम् ॥ ७ ॥
आनाहश्चातिसारश्च यमेतो दुर्बल नरम् ।
व्याधितं विशतो रोगो दुर्लभ तस्य जीवितम् ॥ ८
आनाहश्चैव तृष्णा च यमेतो दुर्बल नरम् ।
विशतो विजहत्येनं प्राणा नातिचिरान्नरम् ॥ ६ ॥
( १ ) जिस पुरुष के बोलते समय छाती के ऊपर का भाग खाया हुआ अन्न पेट में न ठहरे ओर पेट में गया हुआ अन्न न बल दिन प्रति दिन कम हो रहा है और प्यास बढ़ती जा रही है
में वेदना होती है, ऐसे रोगी को वैद्य छोड़ देवे ।
॥
बहुत दर्द करे, पचे, जिसका , तथा हृदय में ( २ ) भगवान् आत्रेय के उपदेश को स्मरण रख कर जिस रोगी को नाभि प्रदेश से हिचकी उत्पन्न हो और जिसको रक्तातिसार हो, इन दोनों को औपध नहीं दे । ( ३ ) जिस निर्बल रोगी को आनाह ( पेट का फूलना ) और अतिसार ( पहले पानी वाले दस्त ) रोग उत्पन्न हो जायें, उसका जीना कठिन है । ( ४ ) जिस निर्बल रोगी को आनाह ( पेट का अफारा ) और तृष्णा रोग उत्पन्न हो जाता है, वह शीघ्र ही प्राणों को छोड़ देता है ॥ ५-६ ॥ ज्वरः पौर्वाह्निको यस्य शुष्ककासञ्च दारुणः । [ ज्वरो यस्यापराद्धे तु श्लेष्मकासञ्च दारुणः । ] बलमांसविहीनस्य यथा प्रेतस्तथैव सः ॥ १० ॥।
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अ ० ६ ] ११ इन्द्रियस्थानम् ( ५ ) जिस रोगा को दिन के पूर्वभाग में ज्वर आता है सूखी खासी हो [ वा जिसको दिन के उत्तर भाग में ज्वर आवे खासी का भयकर वेग हा ] ओर शरार मे बल और मास क्षीण रागी प्रेत के समान मरा हुआ ही हैं ॥ १० ॥
यस्य मूत्रं पुरीप च प्रथित संप्रवर्तते ।
निरुष्मणो जठरिणः श्वसनो न स जीवति ॥ ११
१६१ , तथा भयकर और बलगुमदार हो गये हो, ऐसा ॥ . ) जिस उदर - रागी का मल और भूत्र घना ( गाठ सा ), तथा ठण्डा होता है? वह रोगी सास लेता हुआ भी नहीं जीता ॥ ११ ॥
श्वयथुर्यस्य कुक्षिस्था हस्तपादं विसर्पति ।
ज्ञातिसघ स सक्लेश्य तेन रोगेण हन्यते ॥ १२ ॥
श्वयथुर्यस्य पादस्थस्तथा स्रस्ते च पिण्डिके ।
सीदतश्चाप्युभे शङ्ख तं भिषक्परिवर्जयेत् ॥ १३ ॥
शून हस्तं शूनपादं शूनगुह्योदरं नरम् ।
हीनवर्ण थलाहारमौषधै नपपादयेत् ॥ १४ ॥
( ७ ) जिम पुरुष की कोख ( उदर ) में शोथ उत्पन्न होकर हाथ, पाव की आर फलने लगता है, वह भाई बन्धुओं को बहुत कष्ट देकर मरता है, वह स्वयं भी बहुत दुःख भोगता है और अन्त मे मरता है । ( ८ ) जिस रोगी के पाओं में शोथ उत्पन्न हो, पिण्डलियां ढीली पड़ जायें तथा दोनों शख प्रदेश दब जाये, वैद्य ऐसे रोगी की चिकित्सा नहीं करे । ' ९ ) जिस रोगी के हाथ, पाव, गुह्य प्रदेश ( लिङ्ग ) तथा पेट सूज जायें और वर्ग, बल और आहार क्षीण हा जाये, वैद्य ऐसे रोगी को औषध न देवे ॥ १२-१४ ॥
उरोयुक्तो बहुश्लेष्मा नीलः पीतः सलोहितः ।
सतत च्यवते यस्य दूरात्तं परिवजयेत् ॥ १५ ॥
हृष्टरोमा सान्द्रमूत्रः शूनः कासज्वरार्दितः ।
क्षीणमासो नरो दूराद्वय वैद्येन जानता ॥ १६
त्रय. प्रकुपिता यस्य दोषाः कष्टाभिलक्षिताः ।
कृशस्य बलहीनस्य नास्ति तस्य चिकित्सितम् ॥
ज्वरातिसारौ शोफान्ते श्वयथुर्वा तयोः क्षये ।
दुर्बलस्य विशेषेण नरस्यान्ताय जायते ॥ १८ ॥
॥
१७ ॥
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१६२ चरकसंहिता [ अ ० ६ AMMAANaren ( १० ) जिसकी छाती में सचित हुआ बहुत कफ नीले पीले रक्त के साथ निरन्तर निकलता रहता है, ऐसे रोगी को दूर से ही छोड़ दे । ( ११ ) जिसका मूत्र गाढा हो, शरीर पर रोमाच हो अगों पर सूजन आ जाये खासी और ज्वर से पीड़ित शरीर का मास क्षीण हो गया हो, ऐसे रोगी को वैद्य जान बूझ कर दूर से ही छोड दे । ( १२ ) जिस कृश, बलहीन पुरुष के तीनों दोष कुपित होकर भिन्न २ पीड़ा के कारण हो उस पुरुष की चिकित्सा नहीं करनी चाहिये । [ कही ' कोठा भिलक्षिताः ' पाठ है, वहा अर्थ है - तीनो दोष कोठे में देखे जायें ] । ( १३ ) जिस निर्बल मनुष्य को सूजन के पीछे ज्वर और अतिसार हों, अथवा ज्वर और अतिसार के पीछे जिसको सृजन हो आय, वह उसकी मृत्यु का कारण होता है ॥ १५-१८ ॥
पाण्डुरश्च कृशोऽत्यर्थ तृष्णयाऽभिपरिष्ठतः ।
डम्बरी कुपितोच्छ्वासः प्रत्याख्येयो विजानता ॥ १६ ॥
( १४ ) पाण्डु रोगी, अति कृश, अत्यन्त प्यास से पीड़ित हो, डम्बरी अर्थात् जिसकी आखें स्थिरता मे घूर कर देखें और जिसका श्वास कुपित हो, ऐसा रोगी भी जवाब देने योग्य है, चिकित्सा के लिये अयोग्य है ॥ १ ९ ॥
हनुमन्याग्रहस्तृष्णा बलह्रासोऽतिमात्रया ।
प्राणाश्चरसि वर्तन्ते यस्य तं परिवर्जयेत् ॥ २० ॥
ताम्यत्यायच्छते शर्म न किचिदपि विन्दति ।
क्षीणमसिबलाहारो मुमूर्षुरचिरान्नरः ॥ २१ ॥
( १५ ) जिस रोगी को हनुग्रह ( जबाड़ी का बन्द होना ), मन्याग्रह ( गर्दन की मन्या नामक शिराओं का अकड़ना ), तृष्णा और शक्ति का अति ह्रास हो, तथा जिसकी छाती में सास रुक रहें हों, ऐसे रोगी को छोड़ देना चाहिये । ( १६ ) जिस रोगी में बेहोशी रहती हो, जिसको किसी पडती हो, जिस रोगी के मास, बल और आहार क्षीण हो जल्दी ही मर जाता है ॥ २०-२१ ॥ विरुद्धयोनयो यस्य विरुद्धोपक्रमा भृशम् । वर्धन्ते दारुणा रोगाः शीघ्रं शीघ्रं स हन्यते बलं विज्ञानमारोग्य ग्रहणी मांसशोणितम् । एतानि यस्य क्षीयन्ते क्षिप्र क्षिप्रं स हन्यते भी प्रकार चैन न गये हों वह रोगी ॥ २२ ॥
॥ २३ ॥
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अ ० ७ ] इन्द्रियस्थानम् १६३
विकारा यस्य वर्धन्ते प्रकृतिः परिहीयते ।
सहसा सहसा तस्य मृत्युर्हरति जीवितम् ॥ २४ ॥
( १७ ) जिसके शरार में विरोधी कारणों से रोग उत्पन्न हुए हों और जिनकी चिकित्सा परस्पर विपरीत पड़े और रोग बड़े वेग से बढे वह शीघ्र ही मर जाता है । ( १८ ) जिस रोगी का बल, ज्ञान, आरोग्य, ग्रहणी मास और रक्त क्षीण हो गये हों, वह रोगी शीघ्र ही मर जाता है । ( १६ ) जिस रोगी का आरोग्य दिन पर दिन घट रहा हो, तथा प्रकृति स्वभाव ( अथवा जन्म की ' कफ प्रकृति ' आदि प्रकृति ) बदलती जा रही हो उस रोगी के जीवन को मृत्यु एकाएक हर लेता है ॥ २२-२४ ॥
तत्र श्लोकः -- इत्येतानि शरीराणि व्याधिमन्ति विवर्जयेत् ।
न ह्येषु धीराः पश्यन्ति सिद्धि काचिदुपक्रमात् ॥ २५ ॥
वर्णन किये हुए इन रोगी शरीरो का परित्याग करे, क्योंकि इनमें चिकित्सा करने से विद्वान् लोग कुछ लाभ नहीं देखते ॥ २५ ॥
इत्यग्निवेशकृत तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृतं इन्द्रियस्थाने कतमानि शरीरीयमिन्द्रिय नाम षष्ठोऽध्याय ॥ ६ ॥
सप्तमोऽध्यायः अथातः पन्नरूपीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्मा sse भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे छाया - प्रतिच्छाया के विनाश रूप अरिष्ट को बतलाने के लिये ' पन्नरूपीय इन्द्रिय ' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे । जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
दृष्ट्वा यस्य विजानीयात्पन्नरूपा कुमारिकाम् ।
प्रतिच्छायामयीमक्ष्णोर्तेन मिच्छेश्चिकित्सितुम् ॥ ३ ॥
ज्योत्स्नायामातपे दीपे सलिलादर्शयोरपि ।
अङ्गेषु विकृता यस्य च्छाया प्रेतस्तथैव सः ॥ ४ ॥
छिन्ना भिन्नाकुला छाया हीना वाऽप्यधिकाऽपि वा ।
नष्टा तन्वी द्विधा छिन्ना विशिरा विकृता च या ॥ ५ ॥
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१६४ चरकसंहिता [ अ ० ७
एताश्चान्याश्च याः काश्चित्प्रतिच्छाया विगर्हिताः ।
सर्वा मुमूर्पतां ज्ञेया न चेल्लक्ष्यनिमित्तजाः ॥ ६ ॥
( १ ) जिस रोगी मनुष्य की प्रतिबिम्ब छाया दूसरे मनुष्य की आंख की पुतली में अथवा अन्य की प्रतिबिम्ब रूप छाया जिस रोगी मनुष्य की पुतली में पड़ना बन्द हो जाये वैद्य ऐसे पुरुष की चिकित्सा करने की इच्छा न करे । जिस मनुष्य को चादनी, धूप, दीपक के प्रकाश, पानी और शीशे ( दर्पण ) में अपनी छाया और प्रतिबिम्ब मे विकृति दिखाई दे, वह प्रेत के समान होता है । जिस मनुष्य को अपनी छाया छिन्न - भिन्न, अनिश्चित प्रतिबिम्ब वाली, हीन, अथवा अधिक, नष्ट, पतली दो भागों में विभक्त बिगड़ी हुई, विना शिरोभाग के दीखने वाली तथा अन्य निन्दित दूसरी सब प्रतिच्छाया मरने वालो की जाननी चाहिये वर्त्ते ये प्रतिच्छाया किसी कारण से उत्पन्न न हुइ हों ॥ ३०६ ॥
सस्थानेन प्रमाणेन वर्णेन प्रभया तथा ।
छाया विवर्तते यस्य स्वस्थोऽपि प्रेत एव सः ॥ ७ ॥
जिस स्वस्थ पुरुष की छाया, संस्थान ( आकृति ) प्रमाण ( लम्बाई चौड़ाई ) वर्ण ( रंग ) और प्रभा ( कान्ति ) में अन्य प्रकार की हो जाती है, वह पुरुष प्रेत के समान है ॥ ७ ॥
संस्थानमाकृतिर्ज्ञेया सुषमा विषमा चया । सस्थान — सस्थान का अर्थ है आकृति | वह आकृति दो प्रकार की होती
है । ( १ ) सुषमा और ( २ ) विषमा ।
मध्यमल्पं महचोक्तं प्रमाणं त्रिविधं नृणाम् ॥ ८ ॥
प्रमाण तीन प्रकार का है । ( १ ) मध्य, ( २ ) अल्प और ( ३ ) महान् ॥ ८ ॥
प्रतिप्रमाणसस्थाना जलादर्शातपादिषु । छाया या सा प्रतिच्छाया-प्रतिच्छाया - प्रमाण और संस्थान के अनुकूल जो छाया जल, दर्पण या
धूप आदि में दीखती है, उसको ' प्रतिच्छाया ' कहते हैं ।
छाया वर्णप्रभाश्रया ॥ ६ ॥
खादीना पञ्च पञ्चानां छाया विविधलक्षणाः ।
नाभसी निर्मला नीला सस्नेहा सप्रभेव च ॥ १० ॥
रूक्षा श्यावाऽरुणा या तु वायवी सा हतप्रभा ।
विशुद्धरता त्वाग्नेयी दीप्ताभा दर्शनप्रिया ॥ ११ ॥
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अ ० ७ ] इन्द्रियस्थान्यम् १६५ MAM MA AAAAAAA
शुद्धवैदूर्यविमला सुस्निग्धा चाम्भसी मता ।
स्थिरा स्निग्धा घना लक्ष्णा श्यामा श्वेता च पार्थिवी ॥ १२ ॥
वायवी गहिता त्यासा चतस्रः स्युः शुभोदयाः ।
arrat तु विनाशाय क्लेशाय महतेऽपि वा ॥ १३ ॥
छाया - वर्ण प्रभा के साथ रहती है । आकाश आदि पाच महाभूतों के अनुसार छाया भी पाच प्रकार की होती है, क्योंकि शरीर भी पाच महाभूतों से मिल कर बना है । इसलिये इन महाभूतों की छाया भी पाच प्रकार की पड़ती है । इनमें आकाश की छाया निर्मल, नीली, स्नेह और प्रभा ( कान्ति ) से युक्त होती है । वायु की छाया रूक्ष, श्याम, गल और कान्तिहीन होती है । अग्नि की छाया शुद्ध लाल, दीत कान्ति, देखने मे आखों को प्रिय और जल की छाया शुद्ध वैदूर्य के समान साफ, निर्मल, स्निग्ध होती है । पृथिवी की छाया स्थिर, स्निग्ध, घन, श्लक्ष्ण, श्याम ( सावली ) काली और श्वेत होती है । इनमें वायवी छाया निन्दित, नायकारक और अत्यन्त कष्टदायक होती है । शेष चार छायाए सुखदायक होती हैं ॥ ६-१३ ॥
स्यात्तैजसी प्रभा सर्वा सा तु सप्तविधा स्मृता ।
रक्ता पीता सिता श्यावा हरिता पाण्डुराऽसिता ॥ १४ ॥
तासा याः स्युर्विकासिन्यः स्निग्धाश्च विपुलाच ताः शुभा खक्षमलिनाः संक्षिप्ताञ्चाशुभोदयाः ॥
वर्णमाक्रामति च्छाया भास्तु वर्णप्रकाशिनी ।
आसन्ना लक्ष्यते छाया भाः प्रकृष्टा प्रकाशते ॥ ॥
नाच्छायो नाप्रभः कञ्चिद्विशेषाञ्चियन्ति तु ।
नॄणां शुभाशुभोत्पत्तिं काले छायाः प्रभाश्रयाः ॥
प्रभा के सात प्रकार - सब प्रकार की प्रभाए तेजस हैं
याः ।
१५ ॥
१६ ॥
१७ ॥
। यह प्रभा सात प्रकार की हैं । यथा - लाल, पीली, श्वेत, काली, हरी, पाण्डुर ( धूसर ) और असित ( एकदम काली ) इनमें जो प्रभा विकासिनी ( फैलने वाली ), स्निग्ध, और बड़ी हो, वे सब शुभ फलदायक हैं । जो रूक्ष मलिन और सक्षिप्त ( सकुचित ) हैं ये सब अशुभ फल दायक है । छाया - छाया से अक्रान्त होने पर वर्ण उपलब्ध नहीं होता । प्रभा वर्ण को प्रकाशित करती है । छाया समीप से देखी जाती है [ यथा चित्र की छाया समीप से दीखती है ], प्रभा दूर से खूब चमकती है [ यथा, मणि, मुक्ता आदि की प्रभा दूर से दीखती है ] | कोई भी मनुष्य एकाएक छायाहीन या
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१६६ चरकसंहिता [ अ ० ७ प्रभाहीन नहीं हो सकता । मृत्यु के समीप आने पर प्रभा पर आश्रित छाया मनुष्य के शुभाशुभ को प्रकाशित कर देती है ॥ १४-१७ ॥
कामलाक्ष्णोर्मुखं पूर्ण गण्डयोर्युक्तमासता ।
संत्रासचोष्णगात्रं च यस्य त परिवर्जयेत् ॥ १८ ॥
उत्थाप्यमानः शयनात्प्रमोह याति यो नरः ।
मुहुर्मुहुर्न सप्ताह स जीवति विकत्थन ॥ १६ ॥
( १ ) जिस रोगी की आखे कामला रोगी के समान पीली, मुख से लार गिरना, गण्डस्थल गालों पर मास की वृद्धि ( गालों पर मास की अधिकता ) हो जिसको देखकर डर लगे, 3 और शरीर में उष्णता हो, ऐसे रोगी को त्याग दे, उसकी चिकित्सा स्वीकार न करे । ( २ २ ) ) जो रागी प्रातःकाल बिस्तरे से उठते समय मूर्च्छित हो जाता हो, और बार बार अपना शेखो मारता रहे या निरन्तर गालिया बोले वा बड़बड़ावे वह सात दिन में मर जाता है ॥
संसृष्टा व्याधयो यस्य प्रतिलोमानुलोमगाः ।
व्यापन्ना ग्रहणी प्रायः सोऽर्धमास न जीवति ॥
उपरुद्धस्य रोगेण कर्षितस्याल्पमश्नतः ।
बहुमूत्रपुरीषं स्याद्यस्य त परिवर्जयेत् ॥ २१ ॥
दुर्बलो बहु भुक्ते यः प्राग्भुक्तादन्नमातुरः ।
अल्पमूत्रपुरीषश्च यथा प्रेतस्तथैव सः ॥ २२
इष्टं च गुणसंपन्नमन्नमश्नाति यो नरः ।
१८-१६ ॥
२० ॥
॥
शश्वच्च बलवर्णाग्या हीयते न स जीवति ॥ २३ ॥
( ३ ) जिस रोगी में प्रतिलोमगामी और अनुलामगामी दोनों प्रकार के रोग मिले हुए हों, और जिस की ग्रहणी दूषित हो, ( अन्नपाक होना बन्द हो जाये ) वह पन्द्रह दिन से अधिक नहीं जीता । ( ४ ) रोग से पीडित दुर्बल व्यक्ति तथा थोड़ा खाने पर जिसको मत्र ओर मूत्र अधिक परिमाण में आये, वह रोगी त्याज्य है । ( ५ ) जो रोगी निर्बल होकर पहिले की अपेक्षा अधिक भोजन करे, जिसको मल और मूत्र कम परिमाण में आता हो, वह प्रेत के समान है । ( ६ ) जो रोगी मन चाहा और गुणकारी अन्न को खाये, तो भी, बल और वर्ण निरन्तर क्षीण होता जाये, वह नहीं बचता ॥ २०-२३ ॥
प्रकूजति प्रश्वसिति शिथिल चातिसार्यते ।
बलहीनः पिपासार्तः शष्कास्यो न स जीवति ॥ २४ ॥