श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 181–190
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 181–190
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अ ० ७ 1 इन्द्रियस्थानम् १६७ Aan APARNA
ह्रस्वं च यः प्रश्वसिति व्याविद्धं स्पन्दते च यः ।
मृतमेव तमात्रेयो व्याचचक्षे पुनर्वसुः ॥ २५ ॥
ऊर्ध्वं च य. प्रश्वसिति श्लेष्मणा चाभिभूयते ।
हीनवर्णबलाहारो यो नरो न स जीवति ॥ २६ ॥
( ७ ) जो रोगी करा हे, ऊचा गहरा सास ले और पतला मल प्रवाहित ल से क्षीण, प्यास से पीड़ित हो, मुख सूखता हो, ऐसा रोगी नहीं वचता ( ८ ) जिस रोगी का श्वास बहुत अल्प होगया है, और जिसका करे, । हृदय कुटिल अनियमित रूप से स्पन्दन ( धड़कन ) करता है, ऐमे रोगों को आत्रेय पुनर्वसु ने मृतक तुल्य ही कहा है । ( ६ ) जो रोगी ऊचा गहरा श्वास के जिस में कफ का भी प्रकोप हो और जिसके बल, वर्ण और आहार कम हो गये हो वह मनुष्य नहीं बचता ॥ २६ ॥
ऊर्ध्वा नयने यस्य मन्ये चानत कम्पने ।
वलहीनः पिपापासार्तः शुष्कास्यो न स जीवति ॥। २७ ॥
यस्य गण्डावुपचितौ ज्वरकासो च दारुणो ।
शूली प्रद्वेष्टि चाप्यन्नं तस्मिन् कर्म न सिध्यति ॥ २८ ॥
व्यावृत्तमूर्धजिह्वास्यो भ्रुवौ यस्य च विच्युते । 14
कण्टकैश्वाचिता जिह्वा यथा प्रेतस्तथैव सः ॥ २६ ॥
( १० ) जिस रोगी की आखे ऊपर को चढ़ गईं, मन्या सिरायें निरन्तर कापे, जो बलहीन और पिपासा से पीडित हो, जिसका मुख सूखना हो वह रोगी नहीं बचता । 1 ( ११ ) जिस रोगी के गण्डस्थल ऊंचे, मोटे फूले हों, जिसको ज्वर और खासी विकट हो, सारे पेट में शूल चलते हों, जो अन्न से द्वेष करता हो, ऐसे रोगी में चिकित्सा सफल नहीं होतो । ( १२ ) जिस रोगी के मूर्धा ( तालु ) जीभ और मुख फट गये हों, भौहें टेड़ी पड़ गई हो, जीभ काटो से भरी हो वह रोगो मृत के समान है ॥२७-२६ ॥
शेफश्चात्यर्थमुत्सिक्तं निःसृतौ वृषणौ भृशम् ।
अतश्चैव विपर्यास विकृत्या प्रेतलक्षणम् ॥ ३० ॥
( १३ ) जिसका लिंग इन्द्रिय एकदम अन्दर घुस जाये और अण्डकोश बहुत बाहर निकल आये ( वढ जाये ), अथवा इसके विपरीत लिंग आगे free आये और अण्डको व अन्दर घुस जाये इस प्रकार के विकार से रोगीको मृत के समान ही जानना चाहिये ॥ ३० ॥
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१६८ चरकसंहिता [ अ ० ८ ^ MAA
निचितं यस्य मांसं स्यात्त्वगस्थि चैव दृश्यते ।
क्षीणस्यानश्नतस्तस्य मासमायु. पर भवेत् ॥ ३१ ॥
( १४ ) जिस रोगी का मास क्षीण होजावे, शरीर में केवल त्वचा का ही अस्थिपञ्जर दीखे क्षीण तथा भोजन न खाने वाला, ऐसा रोगी एक मास से अधिक नही जीता ॥ ३१ ॥
तत्र श्लोकः - इदं लिङ्गमरिष्टाख्यमनेकमभिजज्ञिवान् ।
आयुर्वेदविदित्याख्यां लभते कुशलो जन ॥ ३२ ॥
जो कुशल पुरुष इन कहे हुए अरिष्ट लक्षणो को भली प्रकार जानता - पह-चानता है, वही कुशल पुरुष ' आयुर्वेद - वित् ' इस उपाधि को प्राप्त करता है || ३२ || इत्यग्निवेशते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने पन्नरूपीय-मिन्द्रिय नाम सप्तमोऽध्याय ॥ ७ ॥
अष्टमोऽध्यायः अथातोऽवाक्शिरसीयमिन्द्रिय व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्म ISSE भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे ' पाव ऊपर शिर नीचे किये ' छाया आदि के अरिष्ट बतलाने के लिये अवाक् शिरसीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे । जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
अवाक्शिरा वा जिल्ला वा यस्य वा विशिरा भवेत् ।
जन्तो रूपप्रतिच्छाया नैनमिच्छे चिकित्सितुम् ॥ ३
जीभूतानि पक्ष्माणि दृष्टिचापि निगृह्यते ।
यस्य जन्तोर्न तं धीरो भेषजेनोपपादयेत् ॥ ४ ॥
यस्य शुनानि वर्त्मनि न समायान्ति शुष्यतः ।
चक्षुषी चोपदिह्येते यथा प्रेतस्तथैव सः ॥ ५ ॥
वोर्वा यदि वा मूर्ध्नि सीमान्तावर्तकान् बहून् ।
अपूर्वा कृतान् ' व्यक्तान् दृष्ट्वा मरणमादिशेत् ॥ ६
त्र्यहमेतेन जीवन्ति लक्षणेनाऽऽतुरा नराः ।
अरोगाणां पुनस्त्वेतत्वात्रं परमुच्यते ॥ ७ ॥
१. ' असजानकृतान् ' इति च पाठः ।
॥
॥
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अ ० ८ J इन्द्रियस्थानम् १६६ ( १ ) जिस रोगी की छाया वा प्रतिबिम्ब के शिर नीचे और पाव उपर ( अवाकू - शिर ) हो, अथवा जिसकी छाया वा प्रतिबिम्ब कुटिल हो, या जिस में शिर का भाग न दीखता हो, वैद्य उस रोगी की चिकित्सा न करे । ( २ ) जिस रोगी की दोनों पलकों के रोम जटा के समान गुझला जाये तथा आखें बन्द हो जायें, ऐसे रोगी का औपघ से उपचार न करे, ऐसे को औषध देना व्यर्थ होता है । ( ३ ) जिस रोगी की आंखें, नाक, कान आदि मूज जायें और फिर अच्छी नहीं वा अपने स्थान में न समावे, तथा आखे लिपसी जावें, वह रागी प्रेत ( मृत ) के समान होता है । ( ४ ) जिस रोगी के भोहों में या शिर के बालों में चमत्कारिक सीमन्त ( माग जैसी रेखा ) या बहुत से भवर ( गोल चक्कर ) विना बनाये, अकारण ही आ जाये उसे मरणासन्न कहे । ( ५ ) ये लक्षण यदि रोगी पुरुष में दीखे, तो वह तीन दिन से अधिक नहीं जीता, और यदि स्वस्थ पुरुष में ये लक्षण हों तो वह छ रात से अधिक नहीं जीता ॥ ३-७ ॥
आयम्योत्पाटितान् केशान् यो नरो नावबुध्यते ।
अनातुरो वा रोगी वा षड्रानं नानिवर्तते ॥ ८ ॥
यस्य केशा निरभ्यङ्गा दृश्यन्तेऽभ्यक्तसनिभाः ।
उपरुद्धायुषं ज्ञात्वा तं धीरः परिवर्जयेत् ॥ ६ ॥
( ६ ) जो स्वस्थ या रोगी पुरुष सिर के बालों को खींचकर उखाड़ने पर भी नहीं जाने वह छ दिन से अधिक नहीं जीता । ( ७ ) शिर के बालों पर तैल न लगाने पर नी जिस रोगी के बालों में तैल की - सी चमक दिखाई दे, उसकी आयु समाप्त जान कर बुद्धिमान् पुरुष उसकी चिकित्सा न करे ॥ ८-६ ॥
ग्लायतो नासिकावंशः पृथुत्वं यस्य गच्छति ।
अशनः शूनसकाशः प्रत्याख्येय स जानता ॥ १० ॥
अत्यर्थविवृता यस्य यस्य चात्यर्थसंवृता ।
जिह्मा वा परिशुष्का वा नासिका न स जीवति ॥ ११ ॥
( ८ ) जिस रोगी का नासिका वश निर्बल होकर नम जाये, या बहुत मोटा वा बड़ा हो जाये वास्तव में सूजन न होने पर सूजा हुआ लगे, वह रोगी त्याज्य है । ( ९ ) जिस रोगी की नासिका बहुत फैल जाये या बहुत सकुचित, तग हो जाये, कुटिल हो जाये वा सूख जाये वह रोगी अधिक नहीं जीता ॥१०-११ ॥
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१७० चरकसंहिता [ अ ० ८
मुखं शब्दश्रवावोष्ठी शुक्लश्यावा तिलोहितौ ।
विकृतौ यस्य वा नीलौ न स रोगाद्विमुच्यते ॥ १२ ॥
( १० ) जिस रोगो का मुत्र, दोनों कान और दोनों ओठ ( विकार के कारण ) श्वेत, काले, लाल, वा नीले हा जाते हैं, वह रोग से मुक्त नहीं होता, वह मर जाता है ॥ १२ ॥
अस्थिश्वेता द्विजा यम्या पुष्पिताः पङ्कसवृताः ।
विकृत्या न स रोग त बिहायाऽऽराग्यमश्नुते ॥ १३ ॥
( ११ ) जिस रोगो के दात विकार में अस्थि के समान श्वेत, पुष्पित अथवा कीचड़ या मै म ढक जाते हैं, वह रोगो रोग से छूट कर कभी आरोग्य लाभ नहीं करता ॥ २३ ॥
स्तब्वा निश्चेतना गुर्वी कण्टकापचिता भृशम् ।
ज्यावा शुष्काऽथवा शूना प्रेतजिह्वा विसर्पिणी ॥ १४ ॥
( १२ ) जिस रोगी की जीभ स्तब्ध, जड़, कड़ी, चेतना रहित, भारी और बहुत से काटों से भर जाये, काली, लाल, सूखी या सूजी हुई अथवा बाहर को निकल २ आवे, यह जिह्वा मृतपुरुष का लक्षण है ॥ १४ ॥
दीर्घमुच्छ्वस्य यो ह्रस्व नरो निःश्वस्य ताम्यति ।
उपरुद्धायुषं ज्ञात्वा तं धीर. परिवर्जयेत् ॥ १५ ॥
( १३ ) जोर से बाहर सास फेंक कर जो रोगी अन्दर छोटा ( थोड़ा वायु ) सास लेता है, और साथ लेते समय कष्ट अनुभव करता या मूर्च्छित हो जाता है, उस रोगी की आयु मरणासन्न समझकर उसे त्यागना चाहिये ॥ १५ ॥
हस्तौ पादौ च मन्ये च तालु चैवातिशीतलम् ।
भवत्यायुःक्षये क्रूरमथवाऽतिभवेन्मृदु ॥ १६ ॥
( १४ ) जीवन के नाश के समय हाथ, पाव, गले की नसे, तालु बहुत ठडे या बहुत कठोर अथवा बहुत कोमल हो जाते हैं ॥ १६ ॥
घट्टयञ्जानुना जानु पादावुद्यम्य पातयन् ।
यो s पास्यति मुहुर्वक्त्रमातुरो न स जीवति ॥ १७ ॥
( १५ ) जो रोगी घुटनों से घुटनों को रगड़ता है, पाव को ऊपर उठाकर जमीन पर पटकता है, बार - बार मुख को इधर - उधर चलाता है वह रोगी नही बचता ॥ १७ ॥
दन्तैश्छिन्दन्नखाग्राणि नखेरिछन्दञ्छिरोरुहान् ।
काष्ठेन भूमिं विलिखन्न रोगात्परिमुच्यते ॥ १८ ॥
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अ ० ८ ] इन्द्रियस्थानम् १७१
दन्तात् खादति यो जाग्रदसाम्ना विरुदन् हसन् ।
विजानाति न चेद् दुःख न स रोगाद्विमुच्यते ॥ १६ ॥
मुहुर्हसन्मुहुः क्ष्वेडञ्छय्यां पादेन हन्ति यः ।
उच्चैरछद्राणि विमृशन्नातुरो न स जीवति ॥ २० ॥
( १६ ) जो रोगी दानों से नखो को काटता है, और नखों से बालों को नोचता है और लकडी से भूमि पर कुरेदता है, वह रोगी रोग से नहीं बच सकता । ( १७ ) जो रोगी जागता हुवा दातों को क्ट क्टता है और बेमत-लब जोर से रोता या हँसता हुआ दुःख का अनुभव नहीं करता, वह रोग से मुक्त नहीं होता । ( १८ ) जो रोगी क्षण मे हसता, क्षण मे रोता, बकवाद करता है, पलंग पर पाव पटकता है, हाथों को ऊचा करके नाक, कान, आख के छिद्रों को स्पर्श करता है वह रोगी नहीं बचना ॥ १८-२० ॥
यैर्विन्दति पुरा भाषे समेतेः परमा रतिम् ।
तैरेवारममाणस्य ग्लास्नोर्मरणमादिशेत् ॥ २१ ॥
( १ ९ ) जिन वस्तुओं से पहिले रोगी का विशेष प्रेम हो और पीछे उन्हीं पदार्थों से वह द्वेष, घृणा प्रकट करे तो ऐसे रोगी की मृत्यु ही
न बिभर्ति शिरोग्रीव न पृष्ठं भारमात्मन ।
न हनू पिण्डमास्यस्थमातुरस्य मुनूषतः ॥ २२
( २० ) जो रोगी अपनी गर्दन या शिर को, अथवा को न सम्भाल सके, जो मुख में स्थित ग्रास को जबड़ों ( जवाड़े खुले रहे ), वह रोगी नही बचता ॥ २२ ॥
सहसा ज्वरसंतापस्तृष्णा मूर्च्छा बलक्षयः ।
विश्लेषणं च संधीना मुमूर्षोरुपजायते ॥ २३ ॥
गोसर्गे वदनाद्यस्य स्वेदः प्रच्यवते भृशम् ।
हुई बतलावे ॥२१ ॥
|| अपनी पीठ के भार मे न सम्भाल सकें, लेपज्वरोपतप्तस्य दुर्लभ तस्य जीवितम् ॥ २४ ॥
( २१ ) मरणासन्न रोगी को एक दम से ज्वर, सन्ताप, प्यास, मूर्च्छा, चलनाथ, अर्थात् सन्विया शिथिल हो जाती हैं । ( २२ ) लेप ज्वर ( प्रलेपक ज्वर ), थोड़ी सी सर्दी से कफ ज्वर हो के रोगी के मुख पर यदि प्रातः काल के समय बहुत पसीना आये, तो उसका बचना असम्भव है ॥ २४ ॥
नोपैति कण्ठमाहारो जिह्वा कण्ठमुपैति च ।
आयुष्यन्तं गते जन्तोर्बल च परिहीयते ॥ २५ ॥
( २३ ) जिस रोगी की आयु समाप्त हो जाता है, उसके गले में पहुचा
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१७२ चरकसंहिता FARM हुआ भोजन भी नीचे नहीं उतरता, और जीभ कण्ठभाग में बल नष्ट हो जाता है ॥ २५ ॥
शिरो विक्षिपते कृच्छ्रान्मुञ्चयित्वा प्रपाणिकौ ।
ललाटप्रस्रुतवेदो मुमूर्षुश्च्युतबन्धनः ॥ २६ ॥
( २४ ) जो रोगी बड़े कष्ट से पीड़ित होकर अपने दोनों नियों को छोड़कर शिर को इतना धुनता पटकता है कि माथे [ अ ० ह आ लगती है तथा कलाईयों या कोह-से पसीना टपकने गे और सन्धबन्ध ढील पड़ जायें वह रोगी मरने वाला होता है ॥ २६ ॥
तत्र श्लोकः ।
इमानि लिङ्गानि नरेषु बुद्धिमान्विभावयेतावहितो मुहुर्मुहुः ।
क्षणेन भूत्वा पयान्ति कानिचिन्न चाफल लिङ्गमिहास्ति किंचन ॥ २७ ॥
बुद्धिमान् मनुष्य को मरणोन्मुख रोगियों में होने वाले लक्षण खूब ध्यान से देखने चाहियें । क्योंकि कितने लक्षण क्षणभर मे उत्पन्न होकर नष्ट हो जाते हैं, इस प्रकरण में कहा एक भी लक्षण निष्फल नहीं ॥। २७ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने अवाक्शिरसीय-मिन्द्रिय नामाष्टमोऽव्याय. ॥ ८ ॥
नवमोऽध्यायः अथातो यस्य यावनिमित्तीयमिन्द्रिय व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्मा SS ह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे ' श्याव- निमित्तीय ' नामक इन्द्रिय- अध्याय का व्याख्यान करेगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
यस्य यावे परिध्वस्ते हरिते चापि दर्शने ।
आपन्नो व्याधिरन्ताय ज्ञेयस्तस्य विजानता ॥ ३ ॥
( १ ) जिस रोगी की दोनों आर्खे काली, लाल रंग को, नष्टप्राय हरे रंग की हो जाये विद्वान् वैद्य उस रोगी की व्याधि प्राण नाश के लिये जाने ॥ ३ ॥
निःसंज्ञः परिशुष्कास्यः संविद्धो व्याधिभिश्च यः ।
उपरुद्धायुषं ज्ञात्वा तं धीरः परिवर्जयेत् ॥ ४ ॥
हरिताश्च सिरा यस्य लोमकूपाश्च संवृताः ।
सोऽम्लाभिलाषी पुरुषः पित्तान्मरणमनुते ॥ ५ ॥
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अ ० है ] इन्द्रियस्थानम् १७३ ( २ ) जो रोगी अचेत हो, जिसका मुख सूखता हो, अनेक रोगों से आक्रान्त हो उस, रोगी की आयु को समाप्त हुआ जान कर बुद्धिमान् मनुष्य उसकी चिकित्सा न करे । ( ३ ) जिस रोगी की सिराये ( त्वचा ) हरी पड़ जाये, जिसके लोग छेद बन्द हा गये हों ( पसीना नहीं आता हो ), खड्डे रस की चाह रखता हो ऐसा रोगी पित्त से ही मरता है ॥ ४-५ ॥
शरीरान्ताश्च शोभन्ते शरीरं चोपशुष्यति ।
बलं च हीयते यस्य राजयक्ष्मा हिनस्ति तम् ॥
अंसाभितापो हिक्का च छर्दनं शाणितस्य च ।
आनाहः पार्श्वशूलं च भवत्यन्ताय शोषिणः ॥ ७
( ४ ) जिव रोगी के हाथ पाव अच्छे दिखाई देते सूखता जाता है, शरीर का बल दिन पर दिन घटता जाता है ६ ॥ ॥ हैं, और शरीर वह रोगी राज यक्ष्मा से मरता है । ( ५ ) जिस रोगी को हिचकी आवे और कन्धे भी दुर्खे, रक्त का वमन हो, पेट में अफारा और पार्श्व मे तीव्र वेदना ( शूल ) हो, ये लक्षण शोष- रोगी की मृत्यु के लिये होते है ॥ ६-७ ॥
वातव्याधिरपस्मारी कुष्ठी शोफी तथोदरी ।
गुल्मी च मधुमेही च राजयक्ष्मी च यो नरः ॥ ८ ॥
अचिकित्स्या भवन्त्येते बलमासक्षये सति ।
अन्ये safe विकारेषु तान्भिषक्परिवर्जयेत् ॥ ६ ॥
विरेचनहृतानाही यस्तृष्णानुगतो नरः ।
विरिक्तः पुनराध्माति यथा प्रेतस्तथेव सः ॥ १०
पेय पातुं न शक्नोति कण्ठस्य च मुखस्य च ।
उरसव विशुष्कत्वाद्यो नरो न स जीवति ॥ ११
स्वरस्य दुर्बलीभावं हानि च बलवर्णयोः ।
रोगवृद्धिमयुक्त्या च दृष्ट्वा मरणमादिशेत् ॥ १५
ऊर्ध्वश्वास गताष्माण शूोपहतबह्मणम् ।
शर्म चानाधिगच्छन्तं बुद्धिमान् परिवर्जयेत् ॥
अपत्वरं भाषमाणं प्राप्त मरणमात्मनः ।
श्रोतारं चाप्यशब्दस्य दूरतः परिवर्जयेत् ॥ १४
॥
॥
॥
१३ ॥
॥
( ६ ) वात रोगी, अपस्मार रोगी, कुष्ठी, शोफयुक्त, उदर रोगी, गुल्मी, मधुमेही और राजयक्ष्मा से पीड़ित मनुष्य बल और मास के क्षय होने पर असाध्य हो जाते हैं । इसके सित्राय इन रोगियों को अन्य कोई दूसरे भी रोग हो जायें
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१७४ चरकसंहिता [ अ ० ह www तो भी असाध्य हैं । ( ७ ) जिस रोगी का विरेचन के द्वारा पेट फूलने का रोग शान्त करने पर प्रबल तृष्णा उत्पन्न हो जाये, अथवा विरेचन के पीछे पुन अनाह ( अफारा ) हो जाये वह रोगी प्रेत के समान है । ( ८ ) जो रोगी कण्ठ, मुख, छाती, के शुष्क होने के कारण जल वा दूव भी नहीं पी सके वह रोगी नही बचता । ( ६ ) आवाज कमजोर पड जाये, बल और वर्ण मे न्यूनता आ जाये, अनुचित रूप से रोग बढ़ जाये, तो ऐसे रोगी का मरण हो कहे । ( १० ) जिस रोगी को ऊ खास आरम्भ हो जाये, अग ठण्डे हो जाये, वक्षण प्रदेश में खूब शूल रहे, किसी भी प्रकार से रोगी को शान्ति न मिले बुद्धिमान् ऐसे रोगी को छोड़ दे । ( ११ ) जो रोगी विकृत स्वर से अपनी आई मृत्यु को बतला रहा हो, जो विना शब्द के भी शब्द सुने, उस रोगी को वैद्य दूर से ही त्याग दे ॥ ८-१४ ॥
यं नरं सहसा रोगो दुर्बलं परिमुचति ।
संशयप्राप्तमात्रेय जीवितं तस्य मन्यते ॥ १५ ॥
अथ चेज्ञातस्तस्य याचरेन् प्रणिपाततः ।
रसेनाद्यादिति ब्रूयान्नास्मै दद्याद्विशोधनम् ॥ १६ ॥।
area ar area विशेषस्तस्य शोभन ।
रश्चान्येहुविधैर्दुर्लभ तस्य जीवितम् ॥ १७ ॥
निष्ठचूत च पुरीषं च रेतश्चाम्भसि मज्जति ।
यस्य तस्याऽऽयुष ' प्राप्तमन्तमाहुर्मनीषिणः ॥ १८ ॥।
निष्ठते यस्य दृश्यन्ते वर्णा बहुविधाः पृथक् ।
तच्च सीदत्यपः प्राप्य न स जीवितुमर्हति ॥ १६ ॥
( १२ ) जिस निर्बल हुए रोगी को रोग एकदम से छोड़ जाये, ऐसे रोगी ' के जीवन को भगवान आत्रेय संशय - ग्रस्त मानते हैं । ( १३ ) जिस रोगी के सब सम्बन्धी बहुत नम्रता और विनय के साथ चिकित्सा करने की प्रार्थना करे, चिकित्सा के समय वैद्य इस रोगी को मास रस देने को कहे । परन्तु साथ मे विरेचन या वमन रूप सशोधन कार्य नही करे । इस प्रकार एक मास तक चिकित्सा करने पर भी कुछ शुभ परिवर्तन न दीखे, इसी प्रकार अनेक प्रकार के भास रस देने पर भी जब फायदा न हो, तो उस रोगी का जीवन दुर्लभ है । ( १४ ) जिस रोगी का थूक ( कफ ), मल और वीर्य पानी में डूब जाता है, बुद्धिमान् लोग उसकी आयु को समाप्त हुआ बतलाते हैं । ( १५ ) जिस रोगी के कफ में नाना प्रकार के बहुत से रंग दिखाई देते हैं और वह कफ पानी में डूब जाता हो तो वह रोगी जी ने मे असमर्थ है ॥ १५-१९ ॥
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अ ० १० ] इन्द्रियस्थानम् १७५
पित्तमूष्मानुगं यस्य शङ्खौ प्राप्य विमूर्च्छति ।
स रोगः शङ्खको नाम्ना त्रिरात्राद्धन्ति जीवितम् ॥ २० ॥
सफेन रुधिरं यस्य मुहुरास्यात्प्रमुच्यते ।
शूलैश्च तुद्यते कुक्षिः प्रत्याख्येयः स तादृशः ॥ २१ ॥
बलमासक्षयस्तीत्रो रोगवृद्विररोचकः ।
यस्या ss तुरस्य लक्ष्यन्ते त्रीन् पक्षान्न स जीवति ॥ २२ ॥
( १६ ) उष्मा से मिला पित्त जिस समय शख प्रदेश ( कनपटियों ) में आकर रुक जाता है, उस समय ' शङ्खक ' नाम का रोग उत्पन्न होता है । इस रोग से तीन दिन में रोगी मर जाता है । ( १७ ) जिस रोगी के मुख से झागदार रक्त गिरता है, और पेट या पार्श्व में तीव्र वेदना रहती हो, उस रगी को असाध्य समझना चाहिये । ( १८ ) जिस रोगी में तीव्रता ( शीघ्रता ) मे बल और मास का क्षय हो रहा हो, रोग में वृद्धि हो, अरुचि हो, वह रोगी तीन पक्ष से अधिक नहीं जाता || २०-२२ ॥
तत्र श्लोकौ - विज्ञानानि मनुष्याणा मरणे प्रत्युपस्थिते ।
भवन्त्येतानि सपश्येदन्यान्येवंविधानि च ॥ २३ ॥
तानि सर्वाणि लक्ष्यन्ते न तु सर्वाणि ' मानवम् ।
विशन्ति विनशिष्यन्तं तस्माद्बोध्यानि सर्वशः ॥ २४ ॥
मरणोन्मुख मनुष्यों में इस प्रकार के तथा अन्य इसी तरह के दूसरे नाना प्रकार के लक्षण होते है । सब लक्षण होते तो अवश्य हैं, परन्तु एक ही रोगी में सब लक्षण स्पष्ट नहीं होते । सब लक्षण एक साथ पुरुष में नहीं आते, इसलिये इनको विशेष रूप से जानना चाहिये ॥ २३-२४ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने यस्य श्याव-निमित्तीयमिन्द्रिय नाम नवमोऽध्याय ॥ ९ ॥
दशमोऽध्यायः अथातः सद्योमरणीयमिन्द्रिय व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे ' सद्यो - मरणीय इन्द्रिय ' नामक अध्याय का व्याख्यान करेगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था १-२ ॥
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१७६ चरकसंहिता [ अ ० १० w
सद्यस्तितिक्षतः प्राणांल्लक्षणानि पृथक् पृथक् ।
अग्निवेश प्रवक्ष्यामि सस्पृष्टो येर्न जीवति ॥ ३ ॥
वाताष्ठीला सुसंवृत्ता तिष्ठन्ती दारुणा हृदि ।
तृष्णाऽभिपरीतस्य सद्यो सुष्णाति जीवितम् ॥ ४ ॥
पिण्डिके शिथिलीकृत्य जिह्मीकृत्य च नासिकाम् ।
वायुः शरीरे विचरन् सद्यो सुष्णाति जीवितम् ॥ 11
हे अग्निवेश ' शीघ्र प्राण छोड़ने वाले रोगी के लक्षगो को पृथक पृथक् कहता हू, जिनसे युक्त होने पर रोगी नहीं बचना । ( १ ) वाताष्ठीला कठोर रूप से व्यानक होकर हृदय- प्रदेश मे आकर रुक जाये, रोगी को प्यास बहुत लगती हो तो उस रोगी का जीवन बहुत शीघ्र हर लेती है । ( २ ) वायु पिण्डलियों को शिथिल बना दे ओर नासिका को टेड़ी कर दे तथा सम्पूर्ण शरीर में वायु दौड़ता फिरे तो वह रोगी का जीवन हर लेता है ॥ ३-५ ॥
वयस्य ते स्थानादन्तर्दाहश्च दारुणः ।
तस्य हिक्काकरो रोगः सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ६ ॥
( ३ ) जिस रोगी का भोहे अपने स्थान से स्खलित हो जायें, शरीर मे बहुत तीव्र, कष्टदायी दाह ( जलन ) हो, और उसका रोग हिचकियें पैदा कर दे तो वह उसके प्राण को हर लेता है ॥ ६ ॥
क्षीणशोणितमासस्य वायुरूर्ध्वगतिश्वरन् ।
उभे मन्ये समे यस्य सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ७ ॥
अन्तरेण गुद् गच्छन्नामि च सहसाऽनिलः ।
कृशस्य वंक्षणो गृह्णन् सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ८ ॥
वितत्य पर्शुकाप्राण गृहीत्वोरश्च मारुतः ।
स्तिमितस्यायताक्षस्य सद्यो सुष्णाति जीवितम् ॥ ६ ॥
हृदय च गुदं चोभे गृहीत्वा मारुतो बली ।
दुर्बलस्य विशेषेण सद्या मुष्णाति जीवितम् ॥ १० ॥
वक्षण च गुद चोभे गृहीत्वा मारुतो बली ।
श्वास संजनयजन्तोः सद्यो मुष्णानि जीवितम् ॥ ११ ॥
नाभि मत्रं बस्तिशीर्ष पुरीप चापि मारुतः ।
विबध्य जनयञ्छूलं सद्या मुष्णाति जीवितम् ॥। १२ ॥
* ' सद्य. ' शब्द से कुछ ता सात दिन गिनते हैं और कुछ आचार्य तीन दिन मानते हैं ।