श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 191–200
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 191–200
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अ ० १० ] १२ इन्द्रियस्थानम् १७७
भिद्येते वक्षणौ यस्य वातशूलैः समन्ततः ।
भिन्नं पुरीष तृष्णा च सद्यः प्राणाञ्जहाति सः ॥ १३ ॥
आप्लतं मारुतेनेह शरीरं यस्य केवलम् ।
भिन्नं पुरीषं तृष्णा च सद्यो जह्यात्स जीवितम् ॥ १४ ॥
शरीरं शोफितं यस्य वातशोफेन देहिनः ।
भिन्नं पुरीष तृष्णा च सद्यो जह्यात्स जीवितम् ॥ १५ ॥
( ४ ) शरीर में रक्त और मास क्षीण हो जाये, वायु उर्ध्व गति करे, दोनों मन्याएं ( ग्रीवा की सिराये ) एक समान हो तो वायु उस रोगी का जीवन शीघ्र हर लेता है । ( ५ ) जिस निर्बल रोगी में वायु गुद द्वार से प्रवेश करके नाभि प्रदेश में पहुँच कर वक्षण प्रदेश को पीड़ित करता है वह वायु रोगी का जीवन शीघ्र ही हर लेता है । ( ६ ) जिस रोगी में वायु उरो भाग ( छाती ) में पहुँच कर पर्शुकाओं के अग्र भागों को दबाता है और रोगो स्तब्व तथा आखें फैलाये हो, तो वायु उसके शीघ्र प्राण ले लेता है । ( ७ ) जिस निर्बल शरीर वाले रोगी के हृदय और गुदा इन दोनों अवयवों में बलवान् वायु व्याप्त हो जाता है, वह रोगा शीघ्र मर जाता है । ( ८ ) बलवान् वायु वक्षण ओर गुदा को पीड़ित करके ऊर्ध्वं श्वास उत्पन्न कर दे तो रोगी के प्राणों को वायु शीघ्र ही हर लेता है । ( ६ ) वायु, नाभि, मूत्र, बस्ति, शिर और मल इनको बन्द करदे अथवा इन स्थानो पर काटने के समान ( छदन के समान ) शूल उत्पन्न कर दे तो वायु उसके प्राणों को शीघ्र हर लेता है । ( १० ) वात शूल क कारण जिस रोगी के वक्षण प्रदेशों में सर्वत्र और भिन्न भिन्न प्रकार की वेदना होती रहती है, रोगी को अतिसार और प्यास रहती हो तो वह प्राणों को शीघ्र छोड़ देता है । ( ११ ) जिस रागी के सम्पूर्ण शरीर में वायु व्याप्त हो जाये, अतिसार तथा प्यास हो वह रोगी शीघ्र ही प्राण त्याग देता है । ( १२ ) जिस रोगी का शरार वायु के शोफ के कारण सूज जाये, रोगो को अतिसार हो तथा प्यास रहे वह शीघ्र प्राणों को छोड़ देता है ॥ ७–१५ ॥
आमाशयसमुत्थाना यस्य स्यात्परिकर्तिका ।
तृष्णा गुदग्रहश्चाग्रः सद्या जह्यात्स जीवितम् ॥ १६ ॥
पकाशयमधिष्ठाय हत्वा सज्ञा च मारुतः ।
कण्ठे घुघुरकं कृत्वा सद्यो हरति जोवितम् ॥ १७ ॥
दन्ताः कर्दमचूर्णाभा मुख चूर्णकसनिभम् ।
सिप्रायन्ते च गात्राणि लिग सद्यो मरिष्यतः ॥ १८ ॥
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१७८ चरकसंहिता [ अ ० ११
तृष्णा श्वास- शिरोरोग - मोह- दौर्बल्य- कूजनैः ।
स्पृष्टः प्राणाञ्जहात्याशु शकृद्भेदेन चाऽऽतुरः ॥ १६ ॥
( १३ ) जिस रोगी के आमाशय मे काटने के समान ( परिकर्तिका ) वेदना उत्पन्न हो, प्यास हो, गुदा का अवरोध हो, वह रोगी शीघ्र मर जाता है । ( १४ ) वायु पक्वाशय का आश्रय लेकर सज्ञा ( चेतना ) को नष्ट करने, तथा गले में घुर्धर शब्द उत्पन्न हो जाये तो रोगी शीघ्र मर जाता है । ( १५ ) दान्नों में कीचड के लेप के समान और सुख ( चेहरा ) चूने के समान सफेद हो जाये और शरीर के अगों पर पसीना ( सिप्रा नदी के समान ) आने लगे वा वे ढीले पड़ जायें तो ये शीघ्र मरने वाले के लक्षण हैं । ( १६ ) जिस रोगी को प्यार, श्वास, शिरोरोग, मोह, दुर्बलता, अगो में कूजन तथा अतीसार हो, वह रोगी शीघ्र मर जाता है ॥ १६ १६ ॥
तन्त्र श्लोक - एतानि खलु लिङ्गानि यः सम्यगवबुध्यते ।
स जीवितं च मर्त्याना मरणं चावबुध्यते ॥ २० ॥
जो वैद्य इन लक्षणों को भली प्रकार जानता है वह मनुष्यों के जीवन और मरण को भली प्रकार जानता है ॥ २० ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने सद्योमरणी-यमिन्द्रियं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
एकादशोऽध्यायः अथातोऽणुज्योतीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्मा sse नगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे ' अणुज्योतीय ' ( मन्दाग्नि ) अथवा ' शरीर का मन्द- तेज ' नामक इन्द्रिय- अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ।१-२ ।
अण्ज्योतिरनेकाम्रो दुरछायो दुर्मनाः सदा ।
रति न लभते याति परलोकं समान्तरम् ॥ ३ ॥
बलि बलिभुजो यस्य प्रणीतं नोपभुञ्जते ।
लोकान्तरगतः पिण्डं भुक्ते सवत्सरेण सः ॥ ४ ॥
सप्तर्षीणां समीपस्था यो न पश्यत्यरुन्धतीम् ।
संवत्सरान्ते जन्तुः स संपश्यति महत्तमः ॥ ५ ॥
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अ ० ११ ] इन्द्रियस्थानम् १७६
विकृत्या विनिमित्तं यः शोभामुपचय धनम् ।
प्राप्नोत्यतो वा विभ्रंशं समान्तं न स जीवति ॥ ६ ॥
वर्षान्त अरिष्ट -( १ ) अणुज्योति अर्थात् मन्द जाठराग्नि वाला व्याकुल चित्त, अशुभ छाया वाला, निर्बल दुःखी मनवाला, जा किसी भी प्रकार से सुख अनुभव नही करता, ऐसा पुरुष एक वर्ष के अन्दर २ मर जाता है । ( २ ) जिस रोगी की दी हुई बलि ( अन्न ) को कौवे आदि पक्षी नहीं खाते, वह एक साल के अन्दर परलोक मे पिण्ड ( कर्मफल ) का भोग करता है । ( ३ ) जो सप्तर्षियों के पास स्थित अरुन्धती नाम नक्षत्र को नहीं देखता, वह एक साल के अन्दर महा - अन्धकार ( मृत्यु ) को देखता है । ( ४ ) जो मनुष्य विना किसी कारण शोभा ( शरीर की पुष्टि, अथवा वन सञ्चय को या इनके सहसा विनाश को पाता है वह एक साल पर्यन्त भी नहीं जीता ॥ ३-६ ॥
भक्तिः शीलं स्मृतिस्त्यागो बुद्धिर्वलमहेतुक्म् ।
षडेतानि निवर्तन्ते षड्भिर्मासैर्नरिष्यतः ॥ ७ ॥
धमनीनामपूर्वाणां जालमत्यर्थशोभनम् ।
ललाटे दृश्यते यस्य षण्मासान्न स जीवति ॥ ८ ॥
लेखाभिश्चन्द्रवकाभिर्ललाटमुपचीयते ।
यस्य तस्यायुषः षड्भर्मासैरन्तं समादिशेत् ॥ ९ ॥
( ५ ) षण्मासान्त अरिष्ट छः मास में मरने वाले मनुष्य के छः गुण भक्ति - इच्छा, शील स्वभाव, स्मृति, व्याग, बुद्धि और बल विना कारण के ही नष्ट हो जाते हैं । ( ६ ) जिस रोगी के माथे पर नाड़ियों का सुन्दर जाल दीखने लगे ( जो पहिले न हों ), वह छः मास के पीछे नहीं जीता । ( ७ ) जिसके माथे पर द्वितीया या तृतीया के चन्द्रमा के समान टेडी रेखाये दीखने लगें, उसकी आयु छः मास में समाप्त हुई बता दे ॥ ७-६ ॥
शरीरकम्पः समोहो गतिर्वचनमेव च ।
मन्तस्यैवोपन्ते यस्य मासं न जीवति ॥ १० ॥
रेतोमूत्रपुरीषाणि चस्थ मज्जन्ति चाम्भसि ।
स माहाल्बजनद्वेष्टा मृत्युदारिणि मज्जति ॥ ११ ॥
हस्तपादं सुखं चोभी विशेषाद्यस्य शुष्यतः ।
शूयेते या विना देहात्स च मामं न जीवति ॥ १२ ॥
( ८ ) मासान्त अरिष्ट - जिसके शरीर में कम्पन, मूर्छा और चाल और बाणी शराबी की भाति हो जाती हैं, वह मास भर भी नहीं जीता । ( ६ ) जिस-
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१८० चरकसंहिता का वीर्य, मूत्र और मल पानी में डूब जाता है, जो स्वबन्धुओं वह व्यक्ति एक मास के भीतर मृत्यु के पानी में डूब जाता है हाथ, पाव और मुख बिना दाह के शुष्क होने लगें वह एक नहीं जीता ॥ १०-१२ ॥
ललाटे मूनि बस्तौ च नीला यस्य प्रकाशते ।
राजी बालेन्दुकुटिला न स जीवितुमर्हति ॥ १३
प्रवालगुटिकाभासा यस्य गात्र मसूरिकाः ।
उत्पद्याशु विनश्यन्ति न चिरात्स विनश्यति ॥
ग्रीवावमर्दो बलवाजिह्वाश्वयथुरेव च ।
ब्रध्नास्यगलपाकश्च यस्य पक्क तमादिशेत् ॥ १५
सभ्रमोऽति प्रलापोऽति भेदोऽस्थनामतिदारुणः ।
कालपाशपरीतस्य त्रयमेतत्प्रवर्तते ॥ १६ ॥
[ अ ० ११ से द्वेष करता हो, । ( १० ) जिसके मास से अधिक ॥ १४ ॥ ॥ ( ११ ) सद्योमरण के अरिष्ट - जिस रोगो के माथे, शिर और बस्ति मे मे नवीन चन्द्रमा के समान टेड़ो नीली रेखाये दीखती हैं उसकी मृत्यु निकट समझनी चाहिये । ( १२ ) जिस रोगी के शरीर पर मूगे के समान फुन्सिया ( मसूरिका चेचक ) निकल कर शीघ्र ही फिर नष्ट हो जायें वह शीघ्र ही मरता है । ( १३ ) जिस रोगी की ग्रीवा में अकड़ान ( दर्द ) बहुत अधिक हो, जीभ पर सूजन हो जाये, गुदा, गला, और मुख पक जाये वह शीघ्र मर जाता है । ( १४ ) भ्रम, प्रलाप और भयंकर रूप में अस्थियों का टूटना हो, काल के पाश में फसे मनुष्य में ये तीन लक्षण होने लगते हैं ॥ १२-१६ ॥
प्रमुह्य लुञ्चयेत्केशान् परिगृह्णात्यतीव च ।
नरः स्वस्थवदाहारमबलः कालचादितः ॥ १७ ॥
समीपे चक्षुषोः कृत्वा मृगयेताङ्गुलीकरम् ।
स्मयतेऽपि च कालान्ध ऊध्र्वगानिमिषेक्षणः ॥ १८ ॥
शयनादासनादङ्गात्काष्टात्कुड्यादथापि वा ।
असन्मृगयते किंचित्स मुन्कालचोदितः ॥। १६ ॥
अहाम्यहासी समुह्यन् प्रलेढि दशनच्छदौ ।
शीतपादकरोच्छ्वासो यो नरो न स जीवति ॥ २० ॥
आह्वयन्तं समीपस्थं स्वजनं जनमेव वा ।
महामोहावृतमनाः पश्यन्नपि न पश्यति ॥ २१ ॥
( १४ ) जो रोगी बेसुध होकर बालों को खींचता तथा स्वस्थ पुरुष के समान भोजन करता है वह काल से प्रेरित होता है । ( १५ ) जो मनुष्य आख
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अ ० ११ ] इन्द्रियस्थानम् १८१ ANU के समीप और अगुलियों को रखकर फिर उनको खोजता, ऊपर को देखता, हैरान होता है, वह मानों काल के कारण अन्धा है । जो बिस्तर, आसन, अंग, लकड़ी अथवा भित्ति पर कुछ न होते हुए भी कुछ टटोलता रहता है, वह काल ( मृत्यु ) से प्रेरित होकर मोह में पड़कर ऐसा करता है । ( १६ ) जो हंसने का कारण न रहने पर भी हंसे, ओठों को चाटता रहे, हाथ पांव और श्वास ठंडे हों, और ऊर्ध्व श्वास चलता हो तो वह रोगी नहीं बचता । ( १७ ) अपने बान्धव या अन्य मनुष्य को समीप में खड़े, उमे बुलाते हुए को न देखे, न सुने वह बड़े भारी अन्धकार से घिरा होने के कारण देखता हुआ भी नहीं देखता ॥ २१ ॥
अयोगमतियोगं वा शरीरे मतिमान् भिषक् ।
खादीना युगपद् दृष्ट्वा भेज नावचारयेत् ॥ २२ ॥
अतिप्रवृद्धया रोगाणा मनसश्च बलक्षयात् ।
वासमुत्सृजति क्षिप्र शरीरी देहसंज्ञकम् ॥ २३ ॥
वर्णस्वराग्निवलं बागिन्द्रियमनोबलम् ।
atest निद्रा नित्या भवति वा न वा ॥ २४ ॥
( १८ ) आकाश, वायु, अग्नि जल और पृथ्वी इन भूतों का शरीर में अयोग या अतियोग दीखने लगे, तब वैद्य चिकित्सा नहीं करे । ( १६ ) रोग के बहुत बढ़ जाने से तथा मानसिक बल के क्षय होने से, मनुष्य उस शरीर के वासस्थान को शीघ्र छोड़ देता है, मर जाता है । ( २० ) मरणासन्न मनुष्य में वर्ण, स्वर, अग्नि, बल, वाणी, इन्द्रिय और मन का बल कम हो जाता है और रोगी को या तो नींद खूब आती है अथवा आती ही नहीं ॥ २२-२४ ॥
भिषग्भेषजपानान्न गुरु - मित्र द्विपश्च ये ।
वशगाः सर्व एवैते बोद्धव्याः समवर्तिन ॥ २५ ॥
एतेषु रोगः क्रमते भेषजं प्रतिहन्यते ।
नैषामन्नानि भुञ्जीत न चोदकमपि स्पृशेत् ॥ २६ ॥
पादाः समेताश्चत्वार संपन्नाः साधकैर्गुणैः ।
व्यर्थ गतानुषो द्रव्य विना नाम्ति गुणोदय ॥
परीक्ष्यमायुर्भिषजा नीरुजम्या ss सुरस्य च ।
आयुर्ज्ञानफल ' कृत्स्नमायुर्वे ह्यनुवर्तते ॥ २८ ॥
( २१ ) वैद्य, औषध खान, पान, गुरु और मित्र से तो समझना चाहिये कि ये यम के वश में हैं, वे मरनेवाले
१. ' आयुर्वेदफल ' इति च पाठः ।
२७ ॥
जो रोगी द्वेष करें हैं । ऐसे रोगियों
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१८२ चरकसंहिता [ अ ० १२ के रोग भली प्रकार चिकित्सा करने पर भी बढते हैं, औषध कुछ काम नहीं करती । इन रोगियों का न तो अन्न खाना चाहिये और न पानी छूना चाहिये । गतायुष मनुष्य में सारक गुणों से युक्त चिकित्सा के भी चारों चरण व्यर्थ होते है । जिस प्रकार गुण द्रव्न के आश्रय से रहते और प्रकट होते हैं, उसी प्रकार चिकित्सा का गुण आयुष्य के कारण से ही प्रकट होता है । वैद्य का
चाहिये कि वह रोगी और स्वस्थ दोनो व्यक्तियों की आयु का परीक्षा करे ।
आयु का जानना ही आयुर्वेद का फल है, आत्मा ही आयुष्य का सहचारी है ॥ २८ ॥
तत्र श्लोकः - क्रियापथगतिक्रान्ताः केवलं देहमाप्लुता! चिह्न कुर्वन्ति यद्दोषास्तदरिष्टं निरुच्यते ॥ २६ ॥
जब सब दोष चिकित्सा कर्म के मार्ग को लाघ कर शरीर मे व्यास होकर लक्षणों को प्रकट करते हैं, तत्र इन लक्षणों को ' अरिष्ट ' कहते हैं ॥ २६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तत्रे चरकप्रतिसत्कृते इन्द्रियस्थानेऽणु ज्योतीय-मिन्द्रिय नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
द्वादशोऽध्यायः अथातो गोमयचूर्णीयमिन्द्रिय व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्मा sss भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे ' गोमयचूणीय ' नामक इन्द्रिय स्थान का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
यस्य गोमयचूर्णाभं चूर्ण मूर्धनि जायते ।
सस्नेह भ्रश्यते चैव मासान्त तस्य जीवितम् ॥
निकषन्निव यः पादौ च्युतांसः परिधावति ।
विकृत्या न स लोकेऽस्मिंश्चिरं वसति मानवः ॥
यस्य स्नातानुलिप्तस्य पूर्वं शुष्यत्युरा भृशम् ।
आर्द्रेषु सर्वगात्रेषु सोऽर्घमासं न जीवति ॥ ५ ॥
यमुद्दिश्या ss तुर वैद्यः संवर्तयितुमौषधम् ।
यतमानो न शक्नोति दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥
३ ॥
४ ॥
६ ॥
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अ ० १२ ] इन्द्रियस्थानम् १८३
विज्ञातं बहुशः सिद्ध विधिवच्चावचारितम् ।
न सिध्यत्यौषधं यस्य नास्ति तस्य चिकित्सितम् ॥ ७ ॥
आहारमुपयुञ्जानो भिषजा सूपकल्पितम् ।
यः फलं तस्य नाऽऽप्नोति दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥ ८ ॥
( १ ) जिस रोगी के सिर पर गोमय ( गोबर ) के चूर्ण के समान भुर-भुरा चूर्ण उत्पन्न हो, रूक्षता आ जाये और शिर पर तेल या चिकनाई के साथ नीचे बह आवे, उसका जीवन एक मास तक ही होता है । ( २ ) जो मनुष्य पाव को जमीन पर घिस कर चढता है और विकृति के कारण जिसके कन्धे बैठ गये हों या जो कन्धों को आगे झुका कर ( छाता को अन्दर की ओर दबा कर ) दौडता है, वह मनुष्य देर तक इस लोक में नहीं रहता, वह शीघ्र मर जाता है । ( ३ ) जिस मनुष्य के स्नान करने के उपरान्त चन्दनादि के लेप करने पर भी पहिले छाती पर लगा लेप सूखता है और शेष अंगों पर लेप गीला रहना है वह पन्द्रह दिन भी नहीं जीत ' । ( ४ ) जिस रोगी को लक्ष्य कर वैद्य अति प्रयत्न करने पर भी औषव तैयार नहीं कर पाता उस रोगी का जीना बहुत कठिन हैं । ( ५ ) बहुत प्रकार से जानी हुई नियमपूर्वक रोगो पर सफलता पूर्वक प्रयोग की हुई, विविपूर्वक दी हुई औषध भी जिस रोगो पर फल न देवे, सफल न हो, उस रोगी का बचना असम्भव है । ( ६ ) वैद्य द्वारा उत्तम रीति से बनाये भोजन का उपयोग करता हुआ भी जो रोगी उत्तम फल न पाये उस रोगी का जीवित रहना असम्भव है ॥ ३-८ ॥
दूताधिकारे वक्ष्यामो लक्षणानि मुमूर्षताम् ।
यानि दृष्ट्वा भिषक् प्राज्ञः प्रत्याख्यायादसंशयम् ॥ १ ॥
मुक्तकेशेऽथवा नग्ने रुदत्यप्रयतेऽथवा ।
भिषगभ्यागत दृष्ट्वा दूतं मरणम दिशेत् ॥ १० ॥
सुप्ते भिषजि ये दूताश्छिन्दत्यपि च भिन्दति ।
आगच्छन्ति भिषक् तेषा न भर्तारमनुव्रजेत् ॥ ११ ॥
जुह्वत्यग्नि तथा पिण्ड पितृभ्यो नित्यपि ।
वेद्ये दूताय आयान्ति ते व्नन्ति प्रजिघांसवः ॥ १२ ॥
कथयत्यप्रशस्तानि चिन्तयत्यथवा पुनः ।
वैद्ये दूता मनुष्याणामागच्छन्ति मुमूर्षताम् ॥ १३ ॥
मृतदग्धविनष्टानि भजति व्याहरत्यपि ।
अप्रशस्तानि चान्यानि वैद्ये दूता मुमूर्षताम् ॥ १४ ॥
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१८४ चरकसंहिता [ अ ० १२ दूतारिष्ट - ( १ ) वैद्यगत अरिष्ट लक्षण-इसके आगे दूताधिकार में मरणोन्मुख रोगियो के देख कर बुद्धिमान् वैद्य मरणोन्मुख रोगी को तत्काल उनकी चिकित्सा न करे । ( १ ) यदि वैद्य के बाल में, रोते हुए अथवा अपवित्र अवस्था मे, वैद्य को दूत को देख कर रोगी की मृत्यु बतलावे । ( २ ) वैद्य के फोड़ कर घर में आते हैं, इन दूतो के स्वामी को वैद्य लक्षण कहते हैं, जिनको निश्चय से पहिचान कर खोले हुए, नग्न अवस्था बुलाने आवे तो वैद्य दूत सोते हुए जो दूत तोड़ देखने न जाये ( उनको मृतप्राय जाने ) | ( ३ ) वैद्य यदि अग्नि में हवन कर रहा हो अथवा पितरों को पिण्डदान कर रहा हो, ऐसी अवस्था में जो दूत बुलाने आते हैं वे रोगी को मारने वाले होते हैं । [ यद्यपि दूत स्वय रोगी की हितचिन्ता से आते हैं, वे स्वयं रोगी को नहीं मारते तो भी ऐमे दूत रोगी की मृत्यु की सूचना देते हैं, रोगी के मरण के पूर्व ऐमे दूतों के आने और दूतों के पूर्व भावी होने से उपचार ने कारणरूप मान लिया है ] । ( ४ ) वैद्य के अशुभ बातचीत करते हुए अथवा चिन्ता करते समय दूत द्वारा वैद्य को बुलाने वाले रोगी अति शीघ्र मरने वाले होते हैं । ( ५ ) वैद्य किसी मृत पुरुष के सम्बन्ध में या जली अथवा नष्ट वस्तु के विषय में या इसी प्रकार की किसी अशुभ घटना के विषय मे बातचीत कर रहा हो, ऐसी अवस्था में जो दूत बुलाने आते हैं, वे मरणासन्न रोगियों के ही होते हैं । उनका रोगी मृत्यु के सुख में रहता है ॥ ९ -१४ ॥
विकारसामान्यगुणे देशे कालेऽथवा भिषक् ।
दूतमभ्यागतं दृष्ट्रा नाऽऽतुरं तमुपाचरेत् ॥ १५ ॥
दीन - भीत - द्रत त्रस्त मलिनामसती स्त्रियम् ।
त्रीन् व्याकृताश्च षण्ढाश्च दूतान्विद्यान्मुमूर्षताम् ॥ १६ ॥
( २ ) देश काल गत अरिष्ट लक्षण-( ६ ) रोग के समान गुणवाले देश या काल में यदि दूत आवे तो उस रोगी के पास दूत के बुलाने पर न जाये उनकी चिकित्सा न करे । [ रोग के समान गुणवाला देश जैसे रक्त - पित्त रोग मे अग्नि के समीप स्थान हो, काल जैसे रक्त - पित्त का मध्याह्न काल है ] । ( ७ ) मलिन, असती ( वेश्या आदि ) स्त्री, दीनता से युक्त, भयभीत, भागती हुई, घबड़ाई हुई वा तीन मनुष्य एक साथ या एक के पीछे एक लगातार और नपुंसक दूत बुलाने आयें तो समझना चाहिये कि उनके रोगी मरना ही चाहते हैं । १५-१६ ॥ अङ्गव्यसनिनं दूतं लिङ्गिनं व्याधितं तथा संप्रेक्ष्य चोप्रकर्माणं न वैद्यो गन्तुमर्हति ॥ १७ ॥
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अ ० १२ ] इन्द्रियस्थानम्
आतुरार्थमनुप्राप्तं खरोष्ट्ररथवाहनम् ।
दूतं दृष्ट्वा भिषग्विद्यादातुरस्य पराभवम् ॥ १८
पलाल - बुस - मांसास्थि - केश - लोम - नख - द्विजान् ।
मार्जनीं मसलं सूर्पनुपानञ्चर्म विध्युतम् ॥ १६
तृणकाष्ठ- तुषाङ्गार स्पृशन्तो लोष्टमम च ।
तत्पूर्व दर्शने दूता व्याहरन्ति ममूर्षताम् ॥ २०
यस्मिश्च दूते ब्रुवति वाक्यमातुरसंश्रयम् । १८५ ॥ ॥ ॥ पइयेन्निमित्तमशुभं तं च नानुव्रजेद्विषक् ॥ २१ ॥
तथा व्यसनिन प्रेतं प्रेतालङ्कारमेव वा ।
भिन्नं दग्ध विनष्टं वा तद्वादीनि बच्चासि वा ॥ २२ ॥
रमो वा कटुकस्तीव्रो गन्धो वा कौणपो महान् ।
स्पर्शो वा विपुलः क्रूरो यद्वाऽन्यदशुभं भवेत् ॥ २३ ॥
( ३ ) दूतगत अरिष्ट लक्षण— ( ८ ) जिस दूत के नाक, कान आदि कोई अंग कटा फटा हो, संन्यासी, रोगी, वध आदि उग्र काम करने वाले दूत को देख कर वैद्य को रोगी के घर जाना ठीक नहीं । ( ६ ) दूत यदि गवे, ऊठ या रथ या सवारी पर चढ कर बुलाने के लिये आवें, तो वैद्य समझ ले कि रोगी का मरण होगा । ( १० ) पळाल ( पुराली ), भूसा, सीसक, अस्थि, केश, लोम, नख, दात, झाडू, भूषण, छाज, जूता, चमड़ा, टूटो या गिरी हुई वस्तु, तिनका, काठ, लकड़ी, तुप, अंगार, मिट्टी का ढेला, पत्थर इन वस्तुओं का प्रथम प्रवेश काल मे ही स्पर्श करते हुए दूत मरने वाले रोगी की सूचना देते हे । ( ११ ) रोगी के सम्बन्ध में बात करते हुए जिस दूत में वैद्य को अशुभ लक्षण दिखाई देवे, उस रोगी के घर वैद्य न जावे । ( १२ ) अशुभ लक्षण - दूत में किसी प्रकार का व्यसन ( शराब पीना या जुआ खेलना ), मृत मनुष्य की कथा का कहना, मृतक के अलकार धारण करना, टूटी, जली अथवा नष्ट हुई वस्तु की बातचीत, क्टु रस या तीव्र ( इन्द्रियों को उद्विग्न करने वाला ) गन्ध, अथण मुर्दे को दुर्गन्ध, तीव्र या उम्र स्पर्श, क्रूर अन्य इसी प्रकार के अशुभ लक्षण हों तो इनको अशुभ जाने ॥१७-२३ ॥
तत्पूर्वमभितो वाक्यं वाक्यकालेऽथवा पुनः ।
दूतानां व्याहृतं कृत्वा धीरो मरणमादिशेत् ॥ २४ ॥
इति दूताधिकारोऽयमुक्तः कृत्स्नो मुमूर्षताम् । ( ४ ) पूर्वापर लक्षण -१३ ) दूत के वचन से पूर्व भूतकाल के द्योतक वचनों में रोगी को
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१८६ चरकसंहिता [ अ ० १२ अवस्था का श्रवण करना अथवा रोगी का वर्णन करते समय भूतकाल की क्रियाओं को सुनना अशुभ लक्षण हैं । ऐसा सुन कर रोगी की मृत्यु समझनी चाहिये । इस प्रकार ले मरणोन्मुख रोगियों के दूतों का वर्णन सम्पूर्ण रूप में कह दिया ॥ २४ ॥
पथ्यातुरकुलानां च वक्ष्याम्योत्पतिकं पुनः ॥ २५ ॥
अवक्षुतमधोत्कुष्टं स्वलनं पतनं तथा ।
आक्रोशः संप्रहारो वा प्रतिषेधो विगर्हणम् ॥ २६ ॥
वखोष्णीषोत्तरावजरछत्रोपानद्युगाश्रयन् ।
व्यसनं दर्शनं चापि तव्यसनिनां तथा २७ ॥
चैत्यब्वजपताकानां पूर्णानां पतनानि च ।
हतानिष्टप्रवादाश्च दर्शनं ममपांसुभिः ॥ ८ ॥
पथच्छेदो विडालेन शना सर्पेण वा पुनः ।
मृगद्विजानां क्रूराणां गिरो दीप्तां दिशं प्रति ॥ २३ ॥
शयनासनयानानामुत्तानानां प्रदर्शनम् ।
इत्येतान्यप्रशस्तानि सर्वाण्याहुर्मनीषिणः ॥ ३० ॥
एतानि पथि वैद्येन पश्यताऽऽतुरवेश्मनि ।
शृण्वता च न गन्तव्यं तदागारं विपश्चिता ॥ ३१ ॥
इत्यौपातिकमाख्यातं पथि वैद्यविगर्हितम् । ( ५ ) मार्ग के लक्षण -रोगी के घर जाते समय रास्ते में जो अरिष्ट सूचक लक्षण ( अशुभ चिह्न ) होते हैं उनको कहते हैं -- छींक का आना, डर कर रोना, फिसलना, गिरना, चिल्लाना, चोट लगना, प्रतिषेध ( मत जाओ ऐसी रुकावट होना ), निन्दा, वस्त्र, पगड़ी, चादर ( डुपट्टा ), छतरी, जूता इन पदार्थों का फट जाना, मार्ग में दुःखी अथवा मृत या कान, नाक अथवा अंग से हीन व्यक्ति का दर्शन होना, चैत्य ( मन्दिर ), ध्वजा, पताका अथवा पानी से भरे घड़ों का गिरना; मरना या कोई अनिष्ट बात, या वस्तु का नाश सुनाई देना; राख या रेत - मट्टी इन सहित दीखना; बिल्ली, सांप या कुत्ता इनका रास्ता काट कर जाना; जिस दिशा में सूर्य हो उधर ही शृंगाल, गोदड़, गीध आदि क्रूर पशु पक्षी चिल्ला रहे हों; बिछौना, आसन, गाड़ी आदि वस्तुएं उत्तान रूप से रास्ते में पड़ी हों तो बुद्धिमान् इनको अशुभ लक्षण समझें । रोगी के घर में जाते समय ये लक्षण हों तो रोगी के घर नहीं जाना चाहिये । वैद्य के लिए निन्दित इन ' औत्पातिक ' लक्षणों को कह दिया ॥ २५-३१ ॥ * दोसा दिक्- ' दक्षिण दिशा ' भी अर्थ है ।