श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 201–210
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 201–210
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अ ० १२ ] इन्द्रियस्थानम् इमामपि च बुध्येत गृहावस्थां मुमूर्षताम् ॥ ३२ ॥
प्रवेशे पूर्णकुम्भाग्निमृद्धीजफलसर्पिषाम् ।
वृषत्राह्मणरत्नान्नदेवतानां विनिर्गतिम् ॥ २३ ॥
अग्निपूर्णानि पात्राणि भिन्नानि विशिखानि च ।
भिषगू मुमूर्षतां वेश्म प्रविशन्नेव पश्यति ॥ ३४ ॥
छिन्नभिन्नविदग्धानि भग्नानि मृदितानि च ।
दुर्बलानि च सेवन्ते सुपर्विहिमका जनाः ॥ ३५
( शयनं वलनं यानं गमनं भोजनं कृतम् । १८७ ॥ श्रूयतेऽमङ्गलं यस्य नास्ति तस्य चिकित्सितम् || ३६ || )
शयनं वसनं यानमन्यद्वापि परिच्छदन् ।
प्रेतवद्यस्य कुर्वन्ति सुहृदः प्रेत एव सः ॥ ३७ ॥
अन्नं व्यापद्यतेऽत्यर्थं ज्योतिश्चैवोपशाम्यति ।
निवाते सेन्धनं यस्य तस्य नास्ति चिकित्सितम् ॥ ३८ ॥
आतुरस्य गृहे यस्य भिद्यन्ते वा पतन्ति वा ।
अतिमात्रममन्त्राणि दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥ ३६ ॥
निम्नलिखित लक्षणों से भी मरने वाले रोगी के घर की अवस्था का ज्ञान कर लेना चाहिये । ( १ ) घर में घुसने के समय पानी से भरे पात्र, आग, मिट्टी, बीज, फल, घी, बैल ( गाय ), ब्राह्मण, रत्न, अन्न या देवताओं की प्रतिमा आदि को यदि घर से बाहर कोई ले जा रहा हो, अग्नि से भरे पात्र अथवा टूटे और खाली पात्रों को वैद्य रोगी के घर में घुसते देखे तो अशुभ है । ( २ ) इसी प्रकार मिट्टी के टूटे - फूटे, जले बर्त्तन दिखाई दें, घर के आदमी निर्बल, तेजहीन दिखाई दें, तो रोगी नहीं बचता । ( ३ ) जिस रोगी का विस्तर ( उत्तर को सिर, दक्षिण दिशा में पांव ) वस्त्र, यान अथवा अन्य सामान मृतक के समान किया जा रहा हो, तो उसे भी मृतक का भाई गिनना चाहिये । ( ४ ) जिस रोगी का आहार अत्यन्त बिगड़ा हुआ हो, और वायु के झोंके से रहित स्थान में इंधन के होने पर भी आग बुझती हो, वह रोगो चिकित्सा के अयोग्य है । ( ५ ) जिस रोगी के घर में थाली, कटोरे आदि पात्र बहुत करके टूटते या गिरते हों, उस रोगो का जीवन कठिन है ॥ ३२-३६ ॥
भवन्ति चात्र- यद् द्वादशभिरध्यायैर्व्यासतः परिकीर्तितम् ।
मुमूर्षतां मनुष्याणां लक्षणं जीवितान्तकृत् ॥ ४० ॥
तत्समासेन वक्ष्यामः पर्यायान्तरमाश्रितम् ।
पर्यायवचनं ह्यर्थविज्ञानायोपपद्यते ॥ ४१ ॥
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१८८ चरकसंहिता [ अ ० १२
इत्यर्थं पुनरेवेयं विवक्षा नो विधीयते ।
तस्मिन्नेवाधिकरणे यत्पूर्वमभिदर्शितम् ॥ ४२ ॥
इन बारह अध्यायों में मरणोन्मुख रोगी के लक्षणों को विस्तार से कह दिया है । अब संक्षेप में इनके पर्य्याय कहते हैं । पय्याय द्वारा अर्थ का ज्ञान भली प्रकार से हो जाता है । इसलिये इसी विस्तार को अब सक्षेप में कहते हैं - इसमे पुनरुक्ति दोष नहीं मानना ॥ ४०-४२ ॥
वसतां चरमे काले शरीरेषु शरीरिणाम् ।
अभ्युमाणां विनाशाय देहेभ्यः प्रविवत्सताम् ॥ ४३ ॥
इष्टास्तितिक्षता प्राणान् कान्तं वासं जिहासताम् ।
तन्त्रयन्त्रेषु भिन्नेषु तमोऽन्त्य प्रविविक्षताम् ॥ ४४ ॥
विनाशायेह रूपाणि यान्यवस्थान्तराणि च ।
भवन्ति तानि वक्ष्यामि यथाद्देशं यथागमम् ॥ ४५ ॥
प्राणाः समुपतप्यन्ते विज्ञानमुपरुध्यते ।
वमन्ति बलमङ्गानि चेधा व्युपमरन्ति च ॥ ४६ ॥
इन्द्रियाणि विनश्यन्ति खिलीभवति चेतना ।
औत्सुक्य भजते सत्व चेतो भीराविशत्यपि ॥। ४७ ।
स्मृतिस्त्यजति मेधा च हीश्रियो चापसर्पतः ।
उपवन्ते पाप्मान ओजस्तेजश्च नश्यति ॥ ४८ ॥
शील व्यावर्ततेऽत्यर्थं भव परिवर्तते ।
विक्रियन्ते प्रतिच्छायाश्छायाश्च विकृतिं प्रति ॥ ४६ ॥
शुक्र प्रच्यवते स्थानादुन्मार्ग भजतेऽनिलः । क्षय मासानि गच्छन्ति गच्छत्यसृगुपक्षयम् ऊष्माणः प्रलयं यान्ति विशेष यान्ति संधयः गन्धा विकृतता यान्ति भेद वर्णम्वरी तथा ॥
वैवर्ण्य भजते कायः कायच्छिद्रं विशुष्यति ।
धूमः संजायते मूर्ध्नि दारुणाख्यश्च चूर्णकः ॥
सततस्पन्दना देशाः शरीरे येऽभिलक्षिताः ।
ते स्तम्भानुगताः सर्वे न चलन्ति कथंचन ॥
गुणाः शरीरदेशाना शीतोष्णमृदुदारुणाः ।
॥ ५० ॥
।
५१ ॥
५२ ॥
५३ ॥
विपर्यासेन वर्तन्ते स्थानेष्वन्येषु तद्विधाः ॥ ५४ ॥
नखेषु जायते पुष्प पङ्को दन्तेषु जायते ।
जटाः पक्ष्मसु जायन्ते सीमन्ताश्चापि मूर्धनि ॥ ५५ ॥
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अ ० १२ } इन्द्रियस्थानम् १८६
भेषजानि न संवृत्ति प्राप्नुवन्ति यथारुचिम् ।
यानि चाप्युपपद्यन्ते तेषां वीर्य न सिध्यति ॥ ५६ ॥
नानाप्रकृतयः क्रूरा विकारा विविधौषधाः ।
क्षिप्रं समभिवर्तन्ते प्रतिहत्य बलौजसी ॥। ५७ ॥
शब्दः स्पर्शो रसो रूपं गन्धचेष्टा विचिन्तितम् ।
उत्पद्यन्तेऽशुभान्येव प्रतिकमप्रवृत्तिषु ॥ ५८ ॥
दृश्यन्ते दारुणाः स्वप्ना दोरात्म्यमुपजायते ।
प्रेष्याः प्रतीपता यान्ति प्रेताकृतिरुदीर्यते ॥ ५६
प्रकृतिर्हीयतेऽत्यर्थं विकृतिञ्चाभिवर्धते ।
कृत्स्नमौत्पातिकं घोरमरिष्टमुपलक्ष्यते ॥ ६० ॥
इत्येतानि मनुष्याणां भवन्ति विनशिष्यताम् ।
॥
लक्षणानि यथोद्देशं यान्युक्तानि चथागमम् ॥ ६१ ॥
अन्तकाल अर्थात् मृत्यु के समय में प्रिय प्राणों के निकलते समय, शरीर के सिरा, स्नायु आदि में जो परिवर्तन होते हैं, शरीर के नाश होने के समय जो व्याकुल दशा होती है, इनके कारण शरीर के अवयवों की जो दशा होती है, उसका शास्त्रानुसार वर्णन करते है: - --प्राण पीड़ित होते हैं, ज्ञान की गति बन्द हो जाती है, अगों का बल नष्ट हो जाता है, क्रियायें बन्द ( नष्ट ) हो जाती है, चेतना बिखरती जाती है, मन मे आकाक्षा, उत्सुकता रहती है, चित्त में भय समा जाता " स्मरण शक्ति लुप्त हो जाती है, बुद्धि, लजा और कान्ति भी नष्ट हो जाती है, पाप से उत्पन्न होने वाले रोग पैदा होने लगते हैं, ओज और तेज ( शुक्र ) कान्ति नष्ट हो जाती है, शीळ - स्वभाव बहुत बदल जाता हैं, भक्ति नष्ट हो जाती है, कान्ति और प्रभा विकृत हो जाती है, शुक्र स्थान से भ्रष्ट हो जाता है, वायु ऊपर को चढ़ने लगता है, मासका क्षय हो जाता है, रक्त भी कम हो जाता है, शरीर की गरमी नष्ट हो जाती है, सन्धिया शिथिल हो जाती हैं, गन्ध, वर्ण, स्वर, विकृत हो जाते हैं, शरीर का रंग बदल जाता है, शरीर के रोमकूप बन्द हो जाते है, शिर पर धूम हो जाता है, गोमय के समान भयानक चूर्ण उत्पन्न हो जाता है ( स्नेह नहीं रहता ), शरीर के जिन स्थानो पर निरन्तर स्पन्दन ( कम्पन ) रहता है, उन स्थानों पर जड़ता आ जाती है, वे किसी भी प्रकार से गति नहीं करते, शरीर के स्थानों मे शीत, मृदु, दारुण आदि गुण भी बदल जाते हैं, ( शीत के स्थान पर उष्णिमा, मृदु के स्थान पर कठोरता, कठोरता के स्थान पर मृदुता, उष्णिमा के स्थान पर शीत हो जाता है ), नखों में पुष्प ( फूल, श्वेत चिह्न ), उत्पन्न हो जाता है, दातों में मलिनता आ जाती है, पलकों में गुश्चिया
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१६० चरकसंहिता [ अ ० १२ VAAN N ( जटा ) पड़ जाती हैं, बालों में भाग निकल आती है, रोगी के लिये जरूरी औषध नहीं मिलती, तथा जो मिलती है वह फलप्रद नही होती, रुचि के अनुसार ही हुई औषध से भी सफलता नहीं होती, बल और ओज को कम करके नाना प्रकार के भयानक तथा अनेक ओषधियो से अच्छे होने वाले रोग शीघ्र उत्पन्न हे जाते हैं, शब्द, रूप, रस, गन्ध और अनेक प्रकार की अशुभ चेष्टा और बेचार उत्पन्न होते हैं, चिकित्सा करने पर भी अशुभ फल दीखता है, नाना प्रकार के भयानक स्वप्न दिखाई देते है, स्वभाव दुष्ट बन जाता है, सेवक, परिचारक विरुद्ध एव निराश हो जाते हैं, रोगी की आकृति मृतक के समान जाती है, प्रकृति विशेष रूप में कम हो जाती है और विकृति विशेष रूप मे बढ़ जाती है । ये सब उत्पात घोर अनिष्टसूचक है । ये सब लक्षण मरणासन्न मनुष्य में होते हैं । शास्त्र प्रमाण के अनुसार मरने वाले मनुष्य के ये
कहे हैं । ४३-६१ ॥
मरणायेत रूपाणि पश्यताऽपि भिषग्विदा ।
अपृष्टेन न वक्तव्य मरण प्रत्युपस्थितम् ॥ ६२ ॥
पृष्टेनापि न वक्तव्य तत्र यत्रोपघातकम् ।
आतुरस्य भवेद् दुःखमथवाऽल्यस्य कस्यचित् ॥ ६३ ॥
अब्रुवन् मरण तस्य नैनमिच्छेश्चिकित्सितुम् । वैद्य के कर्त्तव्य – इन लक्षणों को वैद्य देख कर भी बिना पूछे किसी को नहीं कहे और जहा पर रोगी को अथवा किसी अन्य आदमी को दुख या मृत्यु हो तो वहा पर पूछने पर भी रोगी की मृत्यु न कहे । उनसे रोगी की चिकित्सा नहीं करना चाहता ॥ ६२–६३ ॥ यस्य पश्येद्विनाशाय लिङ्गानि कालो भिषक् ॥
लिड्गेभ्यो मरणाख्येभ्यो विपरीतानि पश्यना ।
लिङ्गान्यारोग्यगागन्तुं वचनं भिषजा ध्रुवम् ॥
दूतैरौत्पातिकैर्भावैः पथ्याटुरकुलाश्रयेः ।
आदुराचार - शीळेष्ट - द्रव्य - संपत्ति - लक्षणैः ॥ ६६ ॥
रोगी के अच्छे लक्षण - जिस मरणासन्न रोगी मे वैद्य कह दे कि मैं इस ६४ ॥ ६५ ॥ अच्छे लक्षण देखे, जैसे — मरणसूचक लक्षणों से विपरीत लक्षण हों, वैद्य को बुलानेवाले वृत सद्भाव युक्त हों, वैद्य के मार्ग मे उत्पात न हों, रोगी के घर में अमंगल लक्षण गोचर न हों, इत्यादि लक्षणों को देखकर रोगी का आरोग्य सम्बन्धियों तथा रोगी को अवश्य कह देना चाहिये ॥ ६४-६६ ॥
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अ ० १२ ] इन्द्रियस्थानम १६१
स्वाचारं हृष्टमव्यङ्गं यशस्य शुक्तवाससम् ।
अमुण्डमज दून जातिवेश क्रियासमम् ॥ ६७
अनुष्ट्रखरयानस्थमसन्ध्याम्वग्रहेषु च ।
अदारुणेषु नक्षत्रेष्वनुत्रेषु ध्रुवेषु च ॥ ६८ ॥
शुभ लक्षण -- रोगी का आचार, शील, इष्ट पदार्थ समझना चाहिये कि रोगी अच्छा हो जायेगा । इस प्रकार प्रसन्नचित, शरीर का कोई अवयव विकृत न हो, यशस्त्री, शिखा समेत सुण्डन न कराये, उचित जाति के समान वस्त्र ॥ बिगड़े न हों, तो दूत आचारवान्, सफेद वस्त्र पहिने, पहिने तथा उचित क्रियावान् हो, वह दूत उत्तम है । ऊट, गवा इन पर सवारी न किये हों, सन्ध्याकाल मे, अप्रशस्त ग्रहों में, क्रूर नक्षत्र में, ध्रुव नक्षत्र के उदय काल मे वैद्य को बुलाने के लिये नहीं जाना चाहिये ॥ ६७-६८ ॥
विना चतुर्थी नवमी विना रिक्ता चतुर्दशीम् ।
मध्याहं चार्धरात्र च भूकम्प राहुदर्शनम् ॥ ६६ ॥
विना देशमशस्तं च शस्तोत्पादिलक्षणम् ।
दूतं प्रशस्तमव्यग्र निर्दिशेदागतं भिषक ॥ ७० ॥
दध्यक्षतद्विजातीना वृषभाणा नृपस्य च ।
रत्नानां पूर्णकुम्भाना सितस्य तुरगस्य च ॥ ७१ ॥।
सुरध्वजपताकाना फलाना यवकस्य च ।
कन्यापुंवर्धमानानां बद्धस्यैकपोस्तथा ॥ ७२ ॥
पृथिव्या उद्धृतायाश्च वह्नेः प्रोज्ज्वलितस्य च ।
मोदकानां सुमनसां शुक्तानां चन्दनस्य च ॥ ७३ ॥
मनोज्ञस्थान्नपानस्य पूर्णस्य शकटस्य च ।
नृभिर्धेन्वाः सवत्साया वडवायाः स्त्रियास्तथा ॥ ७४ ॥
जीवजीवक सिद्धार्थसारसप्रियाविनन् ।
हंसानां शत्पत्राणा पाषाण शि खनां तथा ॥ ७५ ॥
मत्स्यानि प्रियः धृतरच च ।
रोधिकादसिद्धाना रोचनायाञ्च दर्शनम् ॥ ७६ ॥
चतुथी, नवमी, चतुर्दशी या रिक्त तिथि मे मध्याह, आधी रात में, भूकम्प, अथवा ग्रहण काल में, जिस गमय वैद्य अप्रशस्त स्थान में स्थित हो, अथवा जब औधानिक लक्षण दीखते हो, उस समय मे घबराहट के साथ वैद्य को बुलाने के लिये दूत न जावे । इन उपरोक्त लक्षणों से बचा, प्रशस्त लक्षणों वाला दूत उत्तम है | वेद्य जब रोगी को देखने जावे, और मार्ग में अवदा रोगी
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१६२ चरकसंहिता [ अ ० १२ के घर में घुसते समय निम्नलिखित लक्षण दिखाई दे तो शुभ लक्षण समझने चाहिये । जैसे— दही, अक्षत ( खोलें चावल ), ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, गाय, राजा, रत्न, पानी से भरे घड़े, सफ़ेद घोड़ा, शक्र ध्वजा, फल, यावक ( यावक-अन्न ), गाद में चढ़ा कन्या या पुत्र वधा हुआ श्रेष्ठ पशु, खोदी हुई मिट्टी वाली भूमि, जलती हुई आग, लड्डू, सफेद फूल, चन्दन, मनोनुकूल खान - पान, मनुष्यों से भरी गाड़ी, बछड़े समेत गाय, बछेरी समेत घोड़ों, लड़के समेत स्त्री, जीवजीवक ( चकोर ), सिद्धार्थक, सारस, प्रियवादी ( चातक ), चाष ( भास पक्षी ), मोर, मछली, बकरा, ब्राह्मण, राख, प्रियंगु, शीशा ( दर्पण ), सफेद सरसों, रोचना इन सब पदार्थो का दर्शन शुभ
गन्धः सुगन्धो वर्णश्च सुशुक्लो मधुरो रसः ।
मृगपक्षिमनुष्याणा प्रशस्ताश्च गिरः शुभाः ॥ ७७
छत्रध्वजपताकानामुत्क्षेपणमभिष्टुतिः ।
भेरीमृदङ्गशङ्खाना शब्दाः पुण्याहनिस्वनाः ॥ ७८
वेदाध्ययनशब्दाच सुखो वायुः प्रदक्षिणः ।
पथि वेश्मप्रवेशे तु विद्यादारोग्यलक्षणम् ॥ ७६ ॥
हल, कटफोड़ा, घृत, गोरोचना, है ॥ ६६-७६ ॥ ॥ ॥ सुगन्ध, श्वेत वर्ण, मधुर रस, मनुष्य, पशु, पक्षियों की शुभ वाणी प्रशस्त समझनी चाहिये । छत्र, ध्वजा, पताकाओं का ऊपर चढ़ा रहना, अथवा इधर उधर आकाश में उड़ते रहना, भेरी, मृदग, शख आदि बाजों के पवित्र शब्द, वेद के पढने का शब्द, सुखकारक दक्षिण दिशा की वायु का बहना - ये सब शुभ चिह्न हैं । इन लक्षणो को रास्ते में देख कर रोगी का आरोग्यता को समझ लेना चाहिये ॥ ७७-७६ ॥
मङ्गलाचारसपन्नः सातुरो वैश्मिको जनः ।
श्रद्दधानोऽनुकूलश्च प्रभूतद्रव्यसंग्रहः ॥ ८० ॥
धनैश्वर्य सुखावाप्तिरिष्टलाभः सुखेन च ।
द्रव्याणा तत्र याग्याना योजना सिद्धिरेव च ॥ ८१ ॥
रोगी और उसके घर के मनुष्य यदि मंगल आचार वाले, श्रद्धावाले, अनु-कूल, बहुत अधिक सामान ( धन आदि ) वाले, धन - ऐश्वर्य सुख से परिपूर्ण हों, इष्ट वस्तु सुगमता से मिल सके, उचित तथा अभीष्ट वस्तु की योजना सुग-मता से की जा सके, ऐसी अवस्था में सफलता शीघ्र मिलती है ॥ ८०-८१ ॥
गृहप्रासादशैलाना नागानां वृषभस्य च ।
हयानां पुरुषाणां च स्वप्ने समधिरोहणम ॥ ८२ ॥
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अ ० १२ ] १३ इन्द्रियस्थानम् १ ९ ३
अर्णवाना प्रतरण वृद्धिः सवाधनिःसृतिः ।
स्वप्ने देवः सपितृभिः प्रसन्नैश्चाभिभाषणम् ॥ ८३ ॥
सोमार्काग्निद्विजातीना गवा नृणा यशस्विनाम् ।
दर्शनं शुक्लवबाणां हृदस्य विमलस्य च ॥ ८४ ॥
मास - मत्स्य - विषामेध्यच्छत्रादर्शपरिग्रहः ।
स्वप्ने सुमनसां चैव शुक्लाना दर्शन शुभम् ॥ ८५ ॥
अश्वगोरथयानं च यान पूर्वोत्तरेण च ।
रोदन पतितात्थानं द्विषता चावमर्दनम् ॥ ८६ ॥
रोगी का स्वप्न में घर, महल, पर्वत, हाथी बैल घोड़े आदि पर चढ़ना, समुद्रों को तैरना, समुद्र का बढ़ना, दुःखों से पार होना, प्रसन्न हुए देवताओं और पितरों से बातचीत करना, चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, गाय और कीर्तिशाली पुरुषों का दर्शन करना, सफेद वस्त्रों का दर्शन, निर्मल सरोवर का दर्शन होना, मास, मछली, विष, अपवित्र वस्तु, छत्र, दर्पण इन वस्तुओं को ग्रहण करना, सफेद फूलों का दर्शन या धारण करना, घोड़ा, बैल या रथ पर बैठ कर सवारी करना, पूर्व उत्तर में जाना, रोना वा गिरे हुओं का उठना, शत्रुओं का अवमर्दन करना, ये लक्षण हो तो स्वस्थ हो जायगा ॥ ८२-८६ ॥
सत्त्वलक्षणसंयोगो भक्तिर्वैद्य द्विजातिषु ।
साध्यत्व न च निर्वेदस्तदाराग्यस्य लक्षणम् ॥
आरोग्याद् बलमायुश्च सुख च लभते महत् ।
इष्टॉश्चाप्यपरान् भावान् पुरुषः शुभलक्षणः ॥
जिस रोगी की वृत्तिसत्त्व गुण के लक्षणों से युक्त हों, जो जाने कि रोगी ८७ ॥ ८८ ॥ रोगी वैद्य और ब्राह्मणों में भक्ति रखता हो, रोगी में आत्मग्लानि भाव न हो तो रोगी को साध्य समझे । उपरोक्त शुभ लक्षणो से मनुष्य को आरोग्य दीर्घायु, महान् सुख एव अन्य वाञ्छित फल प्राप्त होते हैं । ८७ ८८ ॥
तत्र श्लोकः – उक्तं गोमयचूर्णीये मरणारोग्यलक्षणम् ।
दूत स्वप्नान्तरोत्पातयुक्तिसिद्धिव्यपाश्रयम् ॥ ८६ ॥
' इस गोमयचूर्णीय ' नामक अध्याय में मरण व आराग्य के लक्षण दूत के लक्षण, स्वप्न के लक्षण, मार्ग मे जाते समय शुभ अशुभ उत्पात, रोगी के घर मे होने वाले लक्षण, युक्ति और सिद्धि में वर्णन कर दी है ॥ ६ ॥
भवति चात्र - इतीदमुक्तं प्रकृतं यथा तथा तदन्ववेक्ष्य सतत भिषग्विदा ।
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१४ चरकसंहिता [ अ ० १२ तथा हि सिद्धि च यशश्च शाश्वतं स सिद्धकर्मा लभते धनानि च ॥ ६० ॥
इस इन्द्रिय स्थान में जिन जिन बातों का वर्णन किया है, वे बातें वैद्य को अवश्य भली प्रकार जाननी चाहियें । इनको जाननेवाला वैद्य ' सिद्धकर्मा ' होता है और उसकी चिकित्सा सदा सफल होती है । इससे उसको निरन्तर यश और धन मिलता है ॥ ६० ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने गोमयचूर्णी-यमिन्द्रिय नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इतीन्द्रियस्थानं संपूर्णम् ।
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चिकित्सितस्थानम् प्रथमोऽध्यायः ( प्रथमः पादः ) [ चिकित्सा शास्त्र के हेतु लिंग और औषध ज्ञान ये तीन ही अग हैं । ये तीनों अग स्वस्थ और रोगी दोनों पुरुषो के लिये उपयोगी है । इनमें से हेतु और लिंग इन दो बातों का विवेचन पोछे कर चुके हैं । अब औषधज्ञान की व्याख्या के लिये इस स्थान का अवतरण करते हैं । औषध ज्ञान रूप चिकित्सा धर्म, अर्थ और यश को देती है । इस चिकित्सा भी रसायन और वाजीकरण-चिकित्सा अधिक फलदायक है । क्योंकि इनसे बुढापा आदि स्वाभाविक रोग दूर होते हैं, पुत्रैषणा पूर्ण होती है और रसायन द्वारा अपरिमित आयु प्राप्त होती है, इसलिये रसायनचिकित्सा अधिक महत्व की है । ] अथातोऽभयामलकीयं रसायनपादं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्मा ss ह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब हम " अभयामलकीय नामक रसायन पाद " की व्याख्या करते है, भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया था ॥ १-२ ॥
चिकित्सितं व्याधिहरं पथ्यं साधनमौषधम् ।
प्रायश्चित्तं प्रशमनं प्रकृतिस्थापनं हितम् ॥ ३ ॥
विद्याद्वेषजनामानि -भेषज के पर्याय - चिकित्सा, व्याधिहर, पथ्य, साधन, औषध, प्रायश्चित्त, प्रशमन, प्रकृतिस्थापन और हित ये सब भेषज के पर्याय हैं ॥ ३ ॥
भेषजं द्विविधं च तत् ।
स्वस्थस्योजस्करं किचित्किचिदार्तस्य रोगनुत् ॥ ४ ॥
भेषज के दो भेद - यह मैत्रज दो प्रकार का है । एक स्वस्थ पुरुष के ओज, शक्ति या जीवन को बढ़ानेवाला, दूसरा रोगी पुरुष के रोग को नष्ट करनेवाला । अभेषजं च द्विविधं बाधन सानुबाधनम् । अभेषज - अभेषज भी दो प्रकार का है । जैसे एक बाधन और दूसरा सानु -बाधन | इनसे बाधन अमेषन उसी समय के लिये पीड़ा देता है ( जैसे - चीता या राई
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१६६ चरकसंहिता [ अ ० १ अथवा भिलावे का लेप ) । और सानुबाधन औषध - दीर्घकाल तक रहनेवाले कुष्ठ आदि विकारों को उत्पन्न करता है ( जैसे - मत्स्य को दूध के साथ खाना ) ॥ ४ ॥
स्वस्थस्योजस्करं यत्तु तद् वृष्य तद् रसायनम् ॥ ५ ॥
प्रायः, प्रायेण रोगाणां द्वितीयं प्रशमे मतम् ।
प्रायः शब्दो विशेषार्थो ह्यभयं भयार्थकृत् ॥ ६ ॥
रसायन — जो औषध स्वस्थ पुरुष के बल वीर्य को बढाता है वह औषध प्राय. वृष्य और रसायन होता है । दूसरी प्रकार का औषध प्रायः रोगों का शमन करता है । यहाँ पर प्रयुक्त हुआ ' प्रायः ' शब्द विशेषार्थवाची है । साधा-रणतः दोनों प्रकार के कार्य करते 1 [ जैसे -क्षतक्षीण अध्याय में कहा सर्पि-गुड़ रसायन और वृष्य दानों है । ] ॥ ५६ ॥
दीर्घमायुः स्मृति मेधामारोग्य तरुणं वयः ।
प्रभावर्णस्वरौदार्य देहेन्द्रियबलं परम् ॥ ७ ॥
वाक्सिद्धि प्रणति कान्ति लभते ना रसायनात् ।
लाभोपाया हि शस्तानां रसादीना रसायनम् ॥ = ॥
रसायन के कार्य- - रसायन के सेवन से पुरुष दीर्घ आयु, स्मृति ( पूर्व अनुभूत का स्मरण करने का सामर्थ्य ), मेधा ( धारणात्मिका बुद्धि ), आरोग्य, तरुण वय ( जवानी ), प्रभा, वर्ण, स्वर की उदारता ( प्रशस्तता ), उत्कृष्ट देह - बल, इन्द्रिय - बल, वाकू - सिद्धि ( जो कहा जाय वह अवश्य होकर रहे ), प्रणति ( लोकों की पूजनीयता ) और कान्ति प्राप्त करता है । इन गुणों की प्राप्ति में कारण- - प्रशस्त रस ( आहार, वार्य, विपाक ) आदि
के लाभ के उपाय ही रसायन है । ( उत्तम रस से धातु भी उत्तम होते हैं ) ॥ ७-८ ॥
अपत्यसन्तानकरं यत्सद्यः समहर्षणम् ।
वाजीवातिबलो येन यात्यप्रतिहतः स्त्रियः ॥ ६ ॥
भवत्यतिप्रियः स्त्रीणां येन येनोपचीयते ।
जीर्यतोऽप्यक्षयं शुक्रं फलवद्येन दृश्यते ॥ १० ॥
प्रभूतशाख. शाखीव येन चैत्या यथा महान् ।
भवत्यच्र्यो बहुमतः प्रजानां सुबहु प्रजः ॥ ११ ॥
सन्तानमूलं येनेह प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते ।
यशः श्रिय बलं पुष्टि वाजीकरणमेव तत् ॥ १२ ॥
वाजीकरण औषध ----- – जो औषध सन्तान - परम्परा ( सन्तान तन्तु ) पुत्र पौत्रादि की शृङ्खला को बनाती है, जिसके सेवन से प्रहर्ष ( लिंग में कामोत्ते-जना, हर्ष ) होता है, जिसके सेवन से पुरुष घोड़े के समान अति बलशाली