श्रीगणेशाय नमः।

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 211–220

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 211–220

पृष्ठ 211

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पा ० १ ] चिकित्सितस्थानम् १६७ www होकर स्त्रियों से अप्रतिहत रूप में ( विना शक्ति नष्ट हुए, विना झिझक के ) सम्भोग कर सकता है, जिसके सेवन से पुरुष स्त्रियों का अतिप्रिय बन जाता है, जिसके सेवन से पुष्टि, बल मिलता है, जिसके सेवन से वृद्धावस्था में जीर्ण होता हुआ भी पुरुष अक्षय शुक्र के भण्डार को प्राप्त करके पुत्रवान् हो सकता है, जिसके सेवन से मनुष्य वृक्ष के समान अनेक शाखोंवाला ( पुत्र, पौत्र, सगे सम्बन्धियोंवाला ) बन जाता है, जिसके सेवन से पुरुष चैत्य ( ग्राम तरु या देवमन्दिर ) के समान बहुत प्रजावाला, बहुत मानवाला, सर्वप्रिय, पूजनीय होता है, जिसके सेवन से पुरुष मर कर भी सन्तान के कारण होनेवाली अन-न्तता, यश, रत्न, बल, पुष्टि को प्राप्त करता है । उस औषध को ' वाजीकरण ' कहते हैं ॥ ६-१२ ॥

स्वस्थस्योजस्कर त्वेतद् द्विविध प्रोक्तमौषधम् ।

यद् व्याधिनिर्घातकरं वक्ष्यते तश्चिकित्सिते ॥ १३ ॥

स्वस्थ पुरुष के लिये जो दो प्रकार के औषव ऊर्ज को उत्पन्न करते हैं वह कह दिये है और जो औषध राग का नाश करता है, उसको चिकित्सा-धिकार में कहेगे ॥ १३ ॥

चिकित्सितार्थं एतावान्विकाराणा यदोषधम् ।

रसायनविधिश्वाद्ये वाजीकरणमेव च ॥ १४ ॥

ज्वर आदि रोगों को शमन करनेवाले औषध का उपदेश ही चिकित्सा-अधिकार का प्रयोजन है । वैसे रसायन और वाजीकरण भी चिकित्सा में ही सम्मिलित है । ज्वर आदि रोगों की चिकित्सा से पूर्व रसायन और वाजीकरण को कहा है ॥ १४ ॥

अभेषज मिति ज्ञेयं विपरीत यदोषधात् ।

तदसेव्यं, निषेव्यं, तु प्रवक्ष्यामि यदोषधम् ॥ १५ ॥

अभेषज का लक्षण – जो औषध मे विपरीत हो, उसका नाम अभेषज है, यह सेवन के अयोग्य है । जो औषध सेवन करने योग्य है, उसका अब उपदेश करते हैं || १५ ||

रसायनाना द्विविधं प्रयोगमृषयो विदुः ।

कुटीप्रादेशिक चैव वातातपिकमेव च ॥ १६ ॥

ऋषियों ने रसायनों के प्रयोग की दो प्रकार की विधि कही है । ( १ ) वातातपिक और ( २ ) कुटो - प्रावेशिक । इनमें कुटी - प्रशवेशिक विधि अधिक प्रभावशाली है || १६ ||

पृष्ठ 212

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१६८ चरकसंहिता

कुटी प्रावेशिकस्या ss दौ विधिः समुपदेक्ष्यते ।

नृपवेद्यद्विजातीना साधूना पुण्यकर्मणाम् ॥ १७ ॥

निवासे निर्भये रास्ते प्राप्योपकरणे पुरे ।

दिशि पूर्वोत्तरस्या तु सुभूमौ कारयेत्कुटीम् ॥ १८

विस्तारोत्सेध संपन्ना त्रिगर्भा सूक्ष्मलोचनाम् ।

घनभत्तिमृतुसुखा सुस्पष्टा मनसः प्रियाम् ॥ १६

शब्दादीनामशस्तानामगम्यां स्त्रीविवर्जिताम् ।

इष्टोपकरणोपेतां सज्जवैद्यौषधद्विजाम् ॥ २० ॥

अब कुटी प्रवेशिक विधि का उपदेश करेगे -अ ० १ ॥ ॥ कुटी प्रावेशिक विधि – जिस स्थान पर राजा, वैद्य, ब्राह्मण और पुण्य कर्म करनेवाले साधु सन्त रहते हों, जो स्थान निर्भय, प्रशस्त हो, जहा पर सब प्रकार के साधन मिल सके, ऐसे नगर मे अच्छी भूमि पर पूर्व या उत्तर दिशा में कुटी बनवावे । वह कुटी पर्याप्त लम्बी चौड़ी, ऊंची होनी चाहिये । इसमें तीन गर्भ ऐसे हों कि एक के अन्दर दूसरा और दूसरे में तीसरा घर हो । इसमें छोटे २ रोशनदान ( झरोखे ) हों । इस कुटी की दीवारे मोटी, ऋतु के अनुकूल सुखदायक, खूब प्रकाशयुक्त, मन को लुभानेवाली, अशुभ शब्द आदि की पहुंच से बाहर, स्त्री रहित, आकाक्षित साधनों से सज्जित और वैद्य, औषध और ब्राह्मण जहा पर सदा रह सके, ऐसी कुटी बनानी चाहिये ॥ १७–२० ॥

अथोदगयने शुक्ले तिथिनक्षत्रपूजिते ।

मुहूर्त करणोपेते प्रशस्ते कृतवापनः ॥ २१ ॥

धृतिस्मृतिबलं कृत्वा श्रद्धधानः समाहितः ।

विधूय मानसान्दोषान्मैत्री भूतेषु चिन्तयन् ॥ २२ ॥

देवताः पूजयित्वा द्विजातींश्च प्रदक्षिणम् ।

देवगोब्राह्मणान्कृत्वा ततस्तां प्रविशेत्कुटोम् ॥ २३ ॥

जिस दिन सूर्य भगवान् उत्तरायण में हो, शुक्ल पक्ष हो, प्रशस्त तिथि, नक्षत्र, मुहूर्त, करण में मुण्डन करा के श्रद्धा और एकाग्र मन से धृति ( धैर्य ), स्मृति के बल से, रज, तम, आदि मानसिक दोषों को जीत कर सब प्राणियों मे मैत्री का चिन्तन करते हुए, प्रथम देव, ब्राह्मण की पूजा करके, देवता, गौ और ब्राह्मणों की प्रदक्षिणा करके कुटी में प्रवेश करे ॥ २१-२३ ॥

तस्या संशोधनैः शुद्धः सुखी जातबलः पुनः ।

रसायनं प्रयुञ्जीत तत्प्रवक्ष्यामि शोधनम् ॥ २४ ॥

पृष्ठ 213

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पा ० १ ] चिकित्सितस्थानम् १६६ " कुटी में प्रविष्ट होकर सशोधन ओषवियों से शुद्ध होकर पुनः बलवान् होने

पर रसायन का प्रयोग करे । इसलिये प्रथम सशोधनों को कहते हैं ॥ २४ ॥

हरीतकीनां चूर्णानि सैन्धवामलके गुडम् । वचां विडङ्गं रजनी पिप्पलीं विश्वभेषजम् पिबेदुष्णाम्बुना जन्तुः स्नेहस्वेदोपपादितः ॥ तेन शुद्धशरीराय कृतसंसर्जनाय च ।

त्रिरात्र यावकं दद्यात्पञ्चाहं वाऽपि सर्पिषा ।

सप्ताहं वा पुराणस्य यावच्छुद्धेस्तु वर्चसः ॥

शुद्धकोष्टं तु त ज्ञात्वा रसायनमुपाचरेत् ।

वयःप्रकृतिसात्म्यज्ञो योगिकं यस्य यद्भवेत् ॥

।

२५ ॥

२६ ॥

२७ ॥

सशोधन - हरड़ का चूर्ण, सेन्धा नमक, आवला, गुड़, वच, बायबिडंग, हल्दी, पीपल और सोंठ इनके चूर्ण को गरम पानी के साथ पीना चाहिये । संशोधन देने से पूर्व रागी को स्नेहन और स्वेदन दे दना चाहिये । इस प्रकार से शरीर के शुद्ध होने पर पेया आदि पथ्य के क्रम का अनुष्ठान कर चुकने पर हीन, मध्यम और उत्तम शुद्धि की दृष्टि से तीन दिन, पाच दिन और सात दिन जब तक पुराना मल बाहर न हो जाये तब तक यवान्न ( जौ का बना भोजन वा कुल्माष, मोटा धान्य ) घो के साथ देना चाहिये । जिस समय कोष्ठ शुद्ध हो जाये उस समय रसायन का उपयोग करे । वय, प्रकृति और सारम्य को समझनेवाले वैद्य को चाहिये कि जो रसायन उपयोगी हो उसी का प्रयोग करे ॥ २५-२७ ॥

हरीतकीं पञ्चरसामुष्णामळवणा शिवाम् ।

दोषानुलोमनीं लघ्वीं विद्याद्दीपनपाचनीम् ॥ २८ ॥

आयुष्या पौष्टिकी धन्या वयसः स्थापनी पराम् ।

सर्वरोगप्रशमनीं बुद्धीन्द्रियबलप्रदाम् ॥ २६ ॥

हरड़ के गुण - यद्यपि आयुःस्थापक द्रव्यों में आवला ही श्रेष्ठ है, परन्तु विरेचक गुण क होने से रोगनिवारक वस्तुओं में हरड़ ही श्रेष्ठ है । हरड़ मे लवण रस को छोड़ कर शेष पाचो रस है, उसे उष्ण वोर्य, कल्याणकारिणी, दोषों का अनुलोमन करनेवाली, लघु, अग्निदीपक, पाचक, आयु को बढ़ानेवाली, पौष्टिक, धन्य, उत्कृष्ट आयु.स्थापक, सब रोगों का नाश करने वाली, बुद्धि इन्द्रिय बल को देने वाली जाने । २८-२९ ॥

कुष्ठ गुल्ममुदावर्त शोषं पाण्ड्वामय मदम् ।

अशसि ग्रहणदोषं पुराण विषमज्वरम् ॥ ३० ॥

पृष्ठ 214

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२०० चरकसंहिता

हृद्रोगं सशिरोरोगमतीसारमरोचकम् ।

कासं प्रमेहमानाह सीहानमुदरं नवम् ॥ ३१

कफप्रसेकं वेस्वयं वैवर्ण्य कामला कृमीन् ।

श्वयथु तमकं छर्दि क्लैव्यमनावसादनम् ॥

स्रोतोविबन्धान्विविधान् प्रलेपं हृदयोरसोः स्मृतिबुद्धिप्रमोह च जयेच्छीत्रं हरीतकी ॥ कुष्ठ, गुल्म, उदावर्त्त, शोत्र, पाण्डुरोग, मद, अर्श, [ अ ० १ ॥ ३२ ॥

।

३३ ॥

ग्रहणी, पुराने विषम ज्वर, हृदयरोग, शिरोरोग, अतिसार, अरुचि, कास, प्रमेह, आनाह ( अफरा ), प्लीहा ( बढ़ी तिल्ली ), नवीन उदररोग, कफ - प्रसेक ( मुख से लार बहना, कफ का जाना ), स्वरभेद, विवर्णता, कामला, कृमिरोग, श्वयथु ( शोथ ), तमक, छर्दि ( कै ), क्लीबता, अगों का अवसाद ( शिथिलता ), रसवह आदि स्रोतों के अवरोध, हृदय और छाती की कफ आदि से उत्पन्न लिसता, स्मृति और बुद्धिनाश ( अज्ञान ) इन विकारों को हरड शघ्र ही जीत लेती है ॥ ३०-३३ ॥

अजीर्णिनो रूक्षभुजः स्त्रीमद्यविषकर्षिता ।

सेवेरन्नभयामेते क्षुत्तृष्णोष्णादिताश्च ये ॥ ३४ ॥

हरीतकी सेवन के योग्य व्यक्ति - अजीर्ण के रोगी, रूक्ष आहार करनेवाले, स्त्री - सम्भोग या विष के कारण दुर्बल व्यक्ति भूख, प्यास और गरमी से पीड़ित पुरुष हरड का सेवन करें ॥ ३४ ॥

तान् गुणांस्तानि कर्माणि विद्यादामलकेष्वपि । यान्युक्तानि हरीतक्या वीर्यस्य तु विपर्ययः

अतश्चामृतकल्पानि विद्यात्कर्मभिरीश ।

etaarai शस्यानि भिषगामलकस्य च ॥

ओषधीनां परा भूमिर्हिमवान् शैलसत्तमः । तस्मात्फलानि तज्जानि ग्राहयेत्कालजानि तु आपूर्णरसवीर्याणि काले काले यथाविधि । आदित्य सलिल - च्छाया - पवन प्रीणितानि च यान्यदग्धान्यपूतीनि निर्व्रणान्यगदानि च ॥। ३५ ॥ ३६ ॥ || ३७ ॥ ॥ ३८ ॥

तेषां प्रयोगं वक्ष्यामि फलानां कर्म चोत्तमम् ॥ ३६ ॥

आंवले के गुण - कर्म- हरड़ के समान ही आवले में गुण और कर्म जाने । परन्तु आवले का वीर्य हरड़ से विपरीत अर्थात् शीत है । इसलिये उपरोक्त गुण के कारण अस्थिरहित बीजरहित आवले और हरड़ को अमृत के समान समझना

पृष्ठ 215

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पा ० १ ] चिकित्सितस्थानम् २०१ चाहिये । गुठलीरहित हरड़ आवले का प्रयोग और परिमाण जानना चाहिये । श्रेष्ठ हिमालय पर्वत ही औषधियों के लिये उत्कृष्ट भूमि है । इसलिये अपनी ऋतु में उत्पन्न मौसमी फलो को हिमालय पर्वत से समय समय पर लेना चाहिये । ये फल रस और वीर्य से पारपुष्ट होने चाहियें । ये फल सूर्य, वायु, छाया, पानी से तृप्त व हरे - भरे होने चाहिये । जो फल कृमि आदि से न खाये हों सड़े न हों, जिन पर चोट न लगी हो, रोग रहित हो, उन फलों का प्रयोग और उत्तम कर्मों का अब उपदेश करूगा ॥ ३५-३६ ॥

पञ्चानां पञ्चमूलानां भागान्दशपलोम्मितान् ।

हरितकी सहस्र च त्रिगुणामलक नवम् ॥ ४० ॥

विदारिगन्धा वृहतीं पृश्निपर्णी निदिग्धिकाम् ।

विद्याद्विदारिगन्धाद्यं श्वदंष्ट्रापञ्चम गणम् ॥। ४१ ॥

विवाग्निमन्थस्योनाकं काश्मर्यमथ पाटलाम् ।

पुनर्नवां शूर्पपण्य बलामैरण्डमेव च ॥ ४२ ॥

जीवकभको मेदा जीवन्तीं सशतावरीम् ।

शरेक्षुदर्भकाशाना शालीनां मूलमेव च ॥ ४३ ॥

इत्येषा पञ्चमूलानां पञ्चानामुपकल्पयेत् ।

भागान्यथोक्तस्तत्सर्व साध्यं दशगुणेऽम्भसि ॥

दशभागावशेषं तु पूतं तं ग्राहयेद्रसम् ।

हरीतकीश्च ताः सर्वाः सर्वाण्यामलकानि च ॥

तानि सर्वाण्यनस्थीनि फलान्यापोथ्य कूर्चनैः ।

४४ ॥

४५ ॥

विनीय तस्मिन्निर्यूहे चूर्णानीमानि दापयेत् ॥ ४६ ॥

मण्डूकपर्ण्याः पिप्पल्याः शङ्खपुष्प्याः सवस्य च ।

मुस्तानां सविडङ्गानां चन्दनागुरुणोस्तथा ॥ ४७ ॥

मधुक्रम्य हरिद्राया वचायाः कनकस्य च । भागांश्चतुष्पलान् कृत्वा सूक्ष्मे लायास्त्वचस्तथा सितोपला सहस्र च चूर्णित तुल्याऽधिकम् । तैलस्य द्वयाढकं तत्र दद्यात् त्रीणि च सर्पिषः

साध्यमौदुम्बरे पात्रे तत्सर्व मृदुनाऽग्निना ।

ज्ञात्वा लेहमदग्ध च शीत क्षौद्रेण ससृजेत् ॥

क्षौद्रप्रमाणं स्नेहार्थं तत्सर्वं घृतभाजने ।

॥ ४८ ॥

॥ ४६ ॥

५० ॥

तिष्ठेत्समूहितं तस्य मात्रा काले प्रयोजयेत् ॥ ५१ ॥

पृष्ठ 216

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२०२ चरकसंहिता [ अ ० १ AMAN ^

या नोपरुन्ध्यादाहारमेतं मात्रां जरां प्रति ।

षष्टिकः पयसा चात्र जीर्णे भोजनमिष्यते ॥ ५२ ॥

ब्राह्म रसायन - पाचों पंच मूलो के पृथक् पृथक् दस पल ( एक पल = ८ तोले के ) लेने चाहिये । हरड़ एक हजार, नया आवला तीन हजार लेने चाहियें । पाच पचमूल पहला ( १ ) पचमूल विदारिगन्धा ( शालपणी ), ( २ ) बृहती ( बड़ी कटेरी ), ( ३ ) पृपिणी, ( ४ ) निदिग्धिका ( छोटी कटेरी ) और ( ५ ) गोखरू ये पाच विदारोगन्वादि पत्रमूळ है । इसको क्षुद्र पचमूल भी कहते हैं । ( २ ) दूसरा पचसूल - बिल्व ( बेल ), अग्निमन्थ ( अरणो ), स्योनाक ( सोनापाठा ), काश्मरा ( गम्भारी ) और पाटला इसे महा - पचमूल कहते हैं । ( ३ ) तीसरा पचमूल—– पुनर्नवा, शूर्पपर्णी, ( मुद्गपर्णी और माषपणी ), बला और एरण्ड | ( ४ ) चौथा पचमूल ऋषभक, जीवक, मेदा, जीवन्ती और शतावरी । ( ५ ) पाचवा पचमूल - घर, इक्षु, दर्भ, काश तथा शाली की जड़ । उपरोक औषधियों को दस गुणे जल में डाल कर क्वाथ करना चाहिये और जल का दसवा भाग शत्र रहने पर निर्मल वस्त्र से छान लेवे । हरड़ और आवलों को निकाल कर इनकी गुठलियों को बाहर कर देना चाहिये । फिर कुचल कर कूर्चनों से इनके रेशे बाहर कर लेने चाहियें । रेशे निकल जाने पर हरड़ और आंवले की पिट्ठी को क्वाथ में डाल देना चाहिये । साथ में निम्न वस्तुओं का चूर्ण भी क्वाथ में मिला देना चाहिये । यथा - मण्डूकपर्णी, पिप्पली, शखपुष्पी, लव ( केवटी मोथा ), मोथा, वायविडंग, लालचन्दन, अगरु, मुलहठी, हल्दी, वच, कनक ( नाग केसर ), छोटी इलायची और दालचीनी, प्रत्येक चार पल, मिश्री १००० पल, तैल २ आढक, घी ३ * ( १ ) आवल और हरड़ के रेशे निकालने के लिये कूर्चनों का उपयोग करते हैं । एक लकड़ी में तीन चार सूइया लगो रहती हैं । उन को इन पर फेरने से रेशे इन में फस जाते हैं । हरड़ और आवले मे सूत होते हैं, इसलिये लकड़ी के कूर्चनो का उपयोग करना चाहिये । अथवा हरड़ और आंवले को कपड़े में मथ कर निकालना चाहिये । इससे रेशे ऊपर रह जाते हैं ।

पृष्ठ 217

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पा ० १ ] चिकित्सितस्थानम् २०३ आदक # इन सब को औडुम्बर ( ताम्र ) के कलई किये बर्तन मे कोमलाग्नि पर पाक करना चाहिये । जब लेह भली प्रकार बन जाये और जले नहीं, तब उतार लेना चाहिये । ठण्डा होनेपर इसमें शहद मिलाना चाहिये । शहद की मात्रा घी और तेल की मात्रा से आधी होनी चाहिये । इन सब को घा से भावित पात्र में रखना चाहिये | मात्रा ओर समय को देख कर इतना इस अवलेह का खाये जो पच जाये और भूख को नष्ट न करे । [ साधारण मात्रा एक तोला ] । सेवन करनेवाला व्यक्ति पूर्ववत् आहार राशि का उपयोग करे । इस अवलेह के जीर्ण होने पर दूध के साथ साठी चावलों का भात खाना चाहिये || ४०-५२ ॥

वैखानसा बालखिल्यास्तथा चान्ये तपोधनाः ।

रसायनमिद् प्राश्य बभूवुरमितायुषः ॥ ५३ ॥

भुक्त्वा जीर्णं वपुश्चाग्र्यमवापुरतरुणं वय ।

वीत तन्द्रा - क्लम - श्वासा निरातङ्काः समाहिताः ॥

मेधा - स्मृति - वलोपेताश्चिररात्र तपोधनाः ।

ब्राह्म तपो ब्रह्मचर्यं चेरुश्चात्यन्तनिष्ठया ॥ ५५ ॥

रसायनमिद ब्राह्ममायुष्कामः प्रयाजयेत् ।

५४ ॥

दीर्घमायुर्वश्वाय कामाचेष्टान् समश्नुते ॥ ५६ ॥

इति ब्राह्मरसायनम् । वैखानस, वालखिल्य और अन्य तपस्वी लोगों ने इस रसायन के सेवन से अपरिमित आयु प्राप्त की । जीर्ण शीर्ण, वृद्ध शरीर त्याग कर नया सुन्दर जवान शरीर और आयु पाई । इसके सेवन से तपस्वी लोग तन्द्रा, क्लम ( थकान ) श्वास ( श्रमजन्य ) से रहित, नीरोग, मेधा, स्मृति, बल से युक्त होकर बहुत * परिभाषा नियम से, घी और तैल द्विगुण करना चाहिये | अष्टाग - सग्रह में यह योग आया है । वहा पर दुगने का विधान दिया है । यहा पर सब घा, तैल, काथ, चूर्ण, मिश्री को एक साथ पाक करने की बताई है । यदि इनको पृथक् पृथक् भी पकाये तो भी कार्य हो जायेगा । हरड़ और आवले तो घी और तेल में भून कर रख ल । इस पिट्ठी को काथ और मिश्री में मिला कर पाक करें । आसन्न पाक होने पर मण्डूकपणी आदि का चूर्ण मिला कर उतार लें और ज्ञानल हाने पर शहद मिला देवें । हरड़ और आवले को भूनते समय लोहे की कड़ाही या कोंचे का उपयोग न करके कलई वाले पात्र तथा लकड़ी का प्रयोग करना उत्तम है ।

पृष्ठ 218

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२०४ चरकसंहिता [ अ ० १ ~ दिनों तक ब्रह्म, तप, एवं ब्रह्मचर्य का अत्यन्त एकाग्रता ( निष्ठा ) के साथ पालन कर सके । दीर्घायु को चाहनेवाले व्यक्ति को चाहिये कि इस रसायन का उपयोग करे । इसके सेवन में दीर्घायु, श्रेष्ठ वय, मनचाही कामनायें प्राप्त

होती हैं । ५३-५६ ॥

यथोक्तगुणानामामलकाना सहस्र पिष्ट - स्वेदन विधिना पयस ऊष्मणा सुस्विन्नमनात पशुष्कमनस्थि चूर्णयेत्, तदामलकसहस्रं स्वरसपरिपीतं स्थिरा- पुनर्नवा जीवन्ती - नागबला ब्रह्मसुवर्चला - मण्डूकपर्णी - शतावरी -शङ्खपुष्पी - पिप्पली - वचा - विडङ्ग स्वयगुप्तामृता - चन्दनागुरु - मधुक मधूक-पुष्पोत्पल - पद्म- मालती युवती यूथिका चूर्णाष्टभाग- संयुक्तं, पुनर्नागबला-महस्रपल- स्वरस - परिपीतमनातपशुष्कं द्विगुणितमपिषा क्षौद्रसर्पिषा वा क्षुद्रकृति कृत्वा च दृढे घृतभाविते कुम्भे भस्मराशेरधः स्थापयेदन्त-भूमेः पक्षं कृतरक्षाविधानमथर्ववेदविदा, पञ्जात्यये चोद्धृत्य कनक रजत-ताम्र - प्रवाल- कालायस - चूर्णाष्टभाग सयुक्तमर्धक वृद्धा यथोक्तेन विधिना प्रातः प्रातः प्रयुञ्जानोऽग्निबलमभिसमीक्ष्य जीर्णे च षष्टिकं पयसा ससर्पिष्कमुपसेवमानो यथोक्तान् गुणान् समश्नुत इति ॥ ५७ ॥

ब्राह्म रसायन --- ऊपर कहे हुए गुणों से युक्त एक हजार आवलों को पिष्ट-स्वेदन विधि द्वारा दूध की गरमी से स्विन्न करना चाहिये । जब भली प्रकार से स्विन्न हो जायें तब इनकी गुठली निकाल कर इनको छाया में शुष्ककर लेना चाहिये । शुष्क होने पर इनक चूर्ण को एक एक हजार आव * पिष्ट - स्वेदन विधि कई प्रकार को है । जैसे-( १ ) एक मलमल मे आवले बाधकर हाड़ी के सुख में लटका देना चाहिये । हाडी मे दूध भर देना चाहिये दूध आवलों को हुए नहीं । इसको कोमल आग पर गरम करना चाहिये । जब आवले नरम हो जाये तब बाहर कर ले । ( २ ) हाडी मे दूध भर कर हाडी के मुख पर जाली या मलमल बाधकर उस पर आवले रख दें । ऊपर से दूसरी हाडी ढाप दे । फिर गरम करें । ( ३ ) छाडी में दूध भर कर ऊपर मुख पर घास आदि रखकर उस पर आवले रख कर गरम करें । ( २ ) क्षुद्र गुड़ाकृति का अर्थ चक्रपाणि ने फाणित, राब किया है । राव के समान होने पर ( ३ ) अष्टाग सग्रह में-- ' द्विगुण- सर्पिषा क्षौद्रेण ' यह पाठ है । अर्थात् शहद से घी दुगुना लेना चाहिये । यह ठीक भी है ।

पृष्ठ 219

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पा ० १ ] चिकित्सितस्थानम २०५ ^^^^^^ ~ का स्वरस पिला देना चाहिये! आवलों के ताजे रस में इस चूर्ण को रख देना चाहिये । रस के शुष्क होने पर शालिपर्णी, पुनर्नवा, नागबला, ब्रह्म सुवर्चला ( ब्राह्मी ), मण्डूकपर्णी, शतावरी, शंखपुष्पी ( शखाहूली ), पिप्पली, वच, वायविडंग, कौच, गिलोय, लाल चन्दन, अगरु, मुलहठी, महुवे के फूल, नीला कमल, श्वेत कमल, मालती, युवती ( नवमालिका, मागरा ), यूथिका ( जूही, श्वेतपुष्पा ), इनका चूर्ण मिलाना चाहिये । इन सब का चूर्ण स्वरस से भावित आवले के चूर्ण से अष्टमाश होना चाहिये । फिर इस सम्पूर्ण चूर्ण में एक हज़ार पल नागवला का स्वरस डालकर छाया मे शुष्क करना चाहिये । शुष्क होने पर दुगना घी अथवा एक साथ मिले घा और शहद मिलाकर गुड़ के समान बन जाने पर छोटा छोटी डलिया बाधकर घी से भावित पवित्र दृढ़ पात्र मे रखकर उपलों की राख मे भूमि के अन्दर गाड़ देना चाहिये । अथर्ववेद के ज्ञाता विद्वानों से रक्षाविधान कराके गर्त में गाड़ना चाहिये । पन्द्रह दिन तक ओषव को भूमि मे गड़े रहने देना चाहिये । पन्द्रह दिन के पीछे निकाल कर स्वर्ण, चादी, ताम्र, प्रवाल, कालायस ( फोलाद ) की भरमों को औषध मे अष्टमाश मिलाना चाहिये । इस रसायन को कुटी - प्रावेशिक विधि के अनुसार आधा कर्ष ( १ तोला ) से प्रारम्भ करके धीरे धीरे आधा आधा कर्प बढ़ाते हुए प्रात. सेवन करना चाहिये । इसका प्रयोग करते समय अग्नि के बल का ध्यान रखना चाहिये । जब यह औषघ जीर्ण हा जाये तब घी से मिश्रित साठा के भात को दूध के साथ खाना चाहिये । इस रसायन से उपरोक्त कहे गुण प्राप्त होते हैं ॥ ५७ ॥

भवन्ति चात्र—- इदं रसायन ब्राह्मं महर्षिगणसेवितम् ।

भवत्यरोगो दीर्घायुः प्रयुञ्जानो महाबलः ॥ ५८ ॥

कान्तः प्रजाना सिद्धार्थश्चन्द्रादित्यसमद्युतिः ।

श्रुतं धारयते सत्त्वमार्षं चास्य प्रवर्तते ॥ ५६ ॥

धरणीधरसार वायुना समविक्रमः ।

स भवत्यविष चास्य गात्रे संपद्यते विषम् ॥ ६० ॥

इति ब्राह्मरसायनद्वितीययोगः । इस ब्राह्म रसायन को महर्षियों ने सेवन किया था । इसके सेवन से पुरुष नीरोग, दीर्घायु, महाबलशाली जनता मे प्रिय, सुन्दर ( जिसे जनता चाहती है ), उसकी सब इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं । वह चन्द्रमा और सूर्य के समान कान्तियुक्त होता है, वह सुनते ही याद कर लेता है, उसका मन आर्षप्रकृति का

पृष्ठ 220

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२०६ चरकसंहिता ~ ^ ~ n www हो जाता है, वह पर्वत के समान लम्बा - चौड़ा डीलडौल का, पराक्रमी हो जाता है । विष भी इसके शरीर में पहुचकर अविष बन जाता है । यह ब्राह्म रसायन का द्वितीय योग है । ५८-६०

बिल्वोग्निमन्थः स्योनाक. काश्मरी पाटलिर्बला ।

पर्ण्यश्चतस्रः पिप्पल्यः श्वदृष्ट्रा बृहतीद्वयम् ॥ ६१

शृङ्गी तामलकी द्राक्षा जीवन्ती पुष्करागुरुः ।

अभया चामृता ऋद्धिर्जीविकर्षभकौ राठी ॥ ६२ ॥

मुस्तं पुनर्नवा मेदा एला चन्दनमुत्पलम् ।

विदारी वृषमूलानि काकोली काकनासिका ॥ ६३

एषां पलोन्मितान्भागाव्शतान्यामलकस्य च ।

पञ्च दद्यात्तदेकत्र जलद्रोणे विपाचयेत् ॥ ६४ ॥

ज्ञात्वा गतरसान्येतान्यौषधान्यथ तं रसम् ।

तच्चाऽऽमलकमुद्धृत्य निष्कुल तैलसर्पिषोः ॥ ६५ ॥

पलद्वादशके भृष्ट्वा दत्त्वा चार्धतुला भिषक् । [ अ ० १ वायु के समान , ( विषरहित ) ॥ ॥ ॥ मत्स्यण्डिकायाः पूताया लेहवत्साधु साधयेत् ॥ ६६ ॥

षट्पलं मधुनश्चात्र सिद्धशीते समावपेत् ।

चतुष्पल तुगाक्षीर्याः पिप्पलीद्विपळ तथा ॥ ६७ ॥

पलमेकं निदध्याच्च त्वगेलापत्र केशरात् ।

इत्ययं च्यवनप्राशः परमुक्तं रसायनम् ॥ ६८ ॥

कासश्वासहरचैष विशेषेणोपदिश्यते ।

क्षीणतानां वृद्धानां बालानां चाङ्गवर्धनः ॥ ६६ ॥

स्वरक्षायमुरोरोगं हृद्रोगं वातशोणितम् ।

पिपासां मूत्रशुक्रस्थान्दोषांश्चाप्यपकर्षति ॥ ७० ॥

अस्य मात्रां प्रयुञ्जीत योपरुन्ध्यान्न भोजनम् ।

अस्य प्रयोगाच्च्यवनः सुवृद्धोऽभूत्पुनर्युवा ॥ ७१ ॥।

मेघां स्मृतिं कान्तिमनामयत्वमायुःप्रकर्षं बलमिन्द्रियाणाम् ।

स्त्रीषु हर्ष परमग्निवृद्धि वर्णप्रसाद पवनानुलोम्यम् ॥ ७२ ॥

रसायनस्यास्य नरः प्रयोगाल्लभेत जीर्णोऽपि कुटीप्रवेशात् ।

जराकृत रूपमपास्य सर्वं बिभर्ति रूपं नवयौवनस्य ॥ ७३ ॥

इति च्यवनप्राशः । च्यवनप्राश - बेल की छाल, अरणी की छाल, अरलु की छाल, गम्भारी की