श्रीगणेशाय नमः।

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 31–40

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 31–40

पृष्ठ 31

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१६ चरकसंहिता [ अ ० १ AAAA क्षेत्रज्ञ आत्मा का आदि नही है । क्षेत्र अर्थात् शरीर की परम्परा ( एक छूटने पर दूसरा प्राप्त होना ) भी अनादि है । आत्मा का शरीर के साथ प्रथम सम्बन्ध कब हुआ इस को कोई नहीं जानता । इसलिये दोनों के अनादि होने से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ में कोन पहिले था यह नहीं कहा जा सकता ॥ ८२ ॥

ज्ञः साक्षीत्युच्यते नाज्ञः साक्षी ह्यात्मा यतः स्मृतः ।

सर्वे भावा हि सर्वेषा भूतानामात्मसाक्षिकाः ॥ ८३ ॥

ज्ञानवान् चेतन ही साक्षी कहा जाता है, अज्ञानवान् पाषाण आदि को साक्षी नहीं कहते । इसलिये आत्मा ही साक्षी है । आकाश आदि ( अव्यक्त ) सब भूतों के सब ग्राह्य धर्म आत्मा को ही साक्षात् होते हैं ॥ ८३ ॥

नैकः कदाचिद् भूतात्मा लक्षणैरुपलभ्यते ।

विशेषोऽनुपलभ्यस्य तस्य नैकस्य विद्यते ॥ ८४ ॥

संयोगपुरुषस्येष्टो विशेषो वेदनाकृतः ।

वेदना यत्र नियता विशेषस्तत्र तत्कृतः ॥ ८५ ॥

अकेला, केवल शरीर से भिन्न आत्मा कभी भी लक्षणों से उपलब्ध नहीं होता । इसलिये लक्षणों से जिसकी उपलब्धि न हो सके ऐसे आत्मा मे वेदनाकृत कोई विशेष धर्म नहीं है | वेदनाजन्य विशेष धर्म संयोगजन्य पुरुष अर्थात् राशिसज्ञक पाचभौतिक शरीर पुरुष में ही होते हैं । क्योंकि सुख दुःख रूप वेदनाए जहा रहती वहीं पर इन वेदनाओ से होने वाले विशेष धर्म भी रहते हैं ॥ ८४-८५ ॥

चिकित्सति भिषक्सर्वास्त्रिकाला वेदना इति ।

यया युक्त्या वदन्त्येके सा युक्तिरुपधार्यताम् ॥ ८६ ॥

पुनस्तच्छिरसः शूल ज्वरः स पुनरागतः ।

पुनः स कासो बलवांश्छदिः सा पुनरागता ॥ ८५ ॥

एभिः प्रसिद्धवचनैरतीतागमनं मतम् ।

कालश्चायमतीतानामार्तीना पुनरागतः ॥ ८८ ॥

तमर्तिकालमुद्दिश्य भेषज यत्प्रयुज्यते ।

अतीताना प्रशमन वेदनाना तदुच्यते ॥ ८६ ॥

आपस्ताः पुनरायाता याभिः शस्यं पुरा हतम्! यथा प्रक्रियते सेतुः प्रतिकर्म तथाऽऽश्रये ॥ पूर्वरूपं विकाराणा दृष्ट्वा प्रादुर्भविष्यताम् । ' या क्रिया क्रियते सा च वेदना हन्त्यनागताम्

पारम्पर्यानुबन्धस्तु दुःखाना विनिवर्तते ।

सुखहेतूपचारेण सुखं चापि प्रवर्तते ॥ ६२ ॥

६० || ॥ ६१ ॥

पृष्ठ 32

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अ ० १ ] शारीरस्थानम् १७ वैद्य जिस युक्ति से अतीत, भविष्यत् और वर्त्तमान तीनों कालो के रोगों की चिकित्सा करता है वह युक्ति सुनो । वही शिर का दर्द फिर आ गया, वही ज्वर किर हो गया, वह खासी फिर जोर पकड़ गई, वह वमन फिर होने लगा, इन लोक प्रसिद्ध वचनों में अतीत वेदना का पुनः आना सिद्ध है । अतीत अर्थात् लस हुए, रोगों का समय फिर आ गया । इस रोग के समय को लक्ष्य ने रख कर जा औषध दी जाती है, वह अतीत वेदनाओं की शान्ति के लिये है ऐसा कहा जाता है I । जैसे- जिस पानी की बाढ़ से धान का पहले नाश हुआ है, वह फिर आ जाती है । वह बाद न आये, अतः उसको रोकने के लिये बाध बाबा जाता है, उसी प्रकार शरीर में वेदना नाशक प्रतिकर्म अर्थात् चिकित्सा की जाती है । शरीर मे उत्पन्न होने वाले रोगों के पूर्वरूप को देख कर इनको शान्त करने के लिये जो कर्म किया जाता है, वह भविष्य के रोगों को नाश करता है । इससे एक के पीछे आने वाला अन्य रोग छूट जाता है, सुख के कारण का उपाय करने से सुख भी हो जाता है ॥ १८६-६२ ॥

न समा यान्ति वैषम्यं विषमाः समता न च ।

हेतुभिः सदृशा नित्य जायन्ते देहधातवः ॥ ६३ ॥।

युक्तिमेता पुरस्कृत्य त्रिकाला वेदना भिपक ।

हन्तीत्युक्त्वा चिकित्सा तु नैष्ठिकी या विनोपधाम् ॥ ६४ ॥

जो धातु समानावस्था में हैं, वे विषम नही बनते और जो विषम हैं, वे स्वय समान नही होते । शरीर के धातु सदा हेतु के समान हो जाते हैं । हेतु के विषम होने से विषम और हेतु के सम होने से सम हो जाते हैं । इस युक्ति से वैद्य अतीत, वर्त्तमान और भविष्य तीनों कालों की वेदनाओं का नाश करता है । उपधारहित अर्थात् दोषरहित चिकित्सा ही दुःख का सम्पूर्ण रूप से नाश

करने वाली है? ॥। ६३-६४ ॥

उपधा हि परो हेतुर्दु: खदुःखाश्रयप्रदः ।

त्याग सर्वोपधाना च सर्वदुःखव्यपोहकः ॥ ६५ ॥

कोषकारो यथा ह्य॑शूनुपादत्ते वधप्रदान् ।

उपादत्ते तथाऽर्थेभ्यस्तृष्णामज्ञः सदातुरः ॥ ६६ ॥

यस्त्वग्निकल्पानर्थान् ज्ञो ज्ञात्वा तेभ्यो निवर्तते अनारम्भादसयोगात्तं दुःखं नोपतिष्ठते ॥। ६७ ॥

१ उपधा - ' भावदोष उपधा । अदोषोऽनुपधा । " वै ० द ० । १ । ४ ।

अश्रद्धामदमानासूयाप्रभृतिर्मानसदोष उपधा ॥

पृष्ठ 33

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१८ चरकसंहिता [ अ ० १ उपघा - भावदोष ही दुःख और दुख के आश्रय भूत शरीर का मूल कारण है । सब प्रकार की उपधा का परित्याग करना सब प्रकार के शारीरिक एव मानसिक दुःखों के नाश का कारण है । जिस प्रकार रेशम का कीड़ा आप ही सूत्रों को उत्पन्न करके स्वय उन घातक सूत्रों में बंध जाता है, इसी प्रकार मूद, आतुर व्यक्ति विषयजन्य तृष्णा में फस जाता है । इसलिये मूढ़ मनुष्य सदा दुःखी रहता है और जो ज्ञानी अग्नि के समान दुःखदायी विषयो को जान कर इन से हट जाता है, तृष्णा नहीं रखता, कर्म नहीं करता 3, वह वीतराग होने से शरीर, इन्द्रिय का सयोग न होने से दुख नही भोगता । जन्म न होने से दुख नहीं होता ' ॥ ९५-६७ ॥

घीधृतिस्मृतिविभ्रशः संप्राप्ति कालकर्मणाम् ।

असात्म्यार्थागमश्चेति ज्ञातव्या दुःखहेतवः ॥ ६८ ॥

दुख के कारण बी, वृति, स्मृति ( ये प्रज्ञा के भेद है ) इनका विभ्रश होना ' प्रज्ञापराध ' है । काल अर्थात् परिणाम - काल और पूर्व कृत, कर्म और दैव शब्द से कहे जाने वाले कर्म और असात्म्य - इन्द्रियार्थ सयोग ये दुःखों के कारण हैं । कर्मजन्य रोगों का प्रज्ञापराध मे ही अन्तर्भाव करना चाहिये ॥ ६८ ॥

विषमाभिनिवेशो यो नित्यानित्ये हिताहिते ।

ज्ञेय स बुद्धिविभ्रशः, सम बुद्धिर्हि पश्यति ॥ ६६ ॥

नित्य और अनित्य, हित और अहित में सम के विपरीत जो विषम अर्थात् यथावत् ज्ञान का अभाव है, उसे ' बुद्धि का विश्रय ' समझना चाहिये । क्योंकि बुद्धि नित्य अनित्य, हित और अहित को सम ( यथार्थ ) रूप में देखती है ॥ १६ ॥

विषयप्रवणं वित्तं धृतिभ्रशान्न शक्यते ।

नियन्तुमहितादर्थाद् धृतिर्हि नियमात्मिका ॥ १०० ॥

धृति मन का नियन्त्रण करती है । विषय की आर जाते हुए मन का निय-न्त्रण न करना ' वृतिभ्रश ' है । वृतिभ्रंश हो जाने से विषय की ओर लगा हुआ चित्त अहित विषय से रोका नहीं जा सकता ॥ १०० ॥

वस्वज्ञाने स्मृतिर्यस्य रजोमोहावृतात्मनः ।

भ्रश्यते स स्मृतिभ्रंशः, स्मर्तव्य हि स्मृतौ स्थितम् ॥ १०१ ॥

स्मृतिभ्रंश - जिस पुरुष की स्मृति रज और तम से ढकी रहती है, अत: वह पुरुष तवज्ञान का स्मरण नही कर सकता, इसको ' स्मृतिभ्रथ ' १ ' वीतरागजन्मादर्शनात् । " न्याय ० ३ । १ । २५ । २ ' सत्त्व ' इति पाठान्तरम् ।

पृष्ठ 34

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म ० १ ] शारीरस्थानम् रह ^ कहते हैं । क्योंकि स्मृति में स्थित वस्तु का स्मरण होना ही चाहिये, उसका मरण न होना ही ' स्मृतिभ्रश ' है ॥ १०१ ॥

धीधृतिस्मृतिविभ्रष्टः कर्म यत्कुरुतेऽशुभम् ।

प्रज्ञापराध तं विद्यात्सर्वदोपप्रकोपणम् ॥। १०२ ॥

प्रज्ञापराध – बुद्धि, वृति और स्मृति से भ्रष्ट हुआ पुरुष जो अशुभ, अहित कर्म करता है, वह सब शारीरिक एवं मानसिक दोपो को ' प्रज्ञापराध ' कहा जाता है ॥ १२ ॥

उदीरणं गतिमतामुदीर्णाना च निग्रहः ।

सेवन साहसाना च नारीणा चातिसेवनम् ॥

कर्मकालातिपातश्च मिथ्यारम्भश्च कर्मणाम् ।

विनयाचारलोपश्च पूज्यानां चाभिधर्षणम् ॥

ज्ञाताना स्वयमर्थानामहिताना निषेवणम् ।

परमौन्मादिकानां च प्रत्ययानां निषेवणम् ॥

अकालादेशसंचारी मैत्री सक्लिष्टकर्मभिः ।

इन्द्रियोपक्रमोक्तस्य सद् - वृत्तस्य च वजेनम् ॥

ईर्ष्यामानभयक्रोध लोभमोहमदभ्रमाः ।

तज्ज वा कर्म यत्क्लिष्ट यद्वा तद्देहकर्म च ॥

यच्चान्यदीदृश कर्म रजोमोहसमुत्थितम् । प्रज्ञापराधं तं शिष्टा ब्रुवते व्याधिकारणम्

कुपित करने वाल ।

१०३ ॥

१०४ ॥

१०५ ॥

१०६ ॥

१०७ ॥

|| १०८ ॥

गमनशील मूत्र पूरीष के अनुपस्थित वेगो को बलात् निकालना, उपस्थित मलमूत्रादि के वेगों को रोकना, साहसिक कार्यों का करना, स्त्रियो का अति सेवन, चिकित्साकाल का अतिक्रमण, मन आदि कार्यों का मिथ्या - आरम्भ, विनय और आचार का लोप, पूज्य जनों का तिरस्कार, जाने हुए अहितकारा पदाथो का सेवन, उन्माद रोग में कहे कारणो का सेवन करना, निषिद्ध समयों और निषिद्ध स्थानों में जाना, पवित आचार वाले मनुष्यों के साथ मैत्री करना, ' इन्द्रियोपक्रमणीय ' ( सूत्र ० ८ ) अध्याय में कहे सद्वृत्त का पालन न करना, इर्ष्या, मान, भय, क्रोव, लोभ, मोह, मद और भ्रम इन मानस दोषों का वा इन से उत्पन्न निन्दित कर्मों को करना, शरीर को दुःख देने वाले कर्म का करना, इनके अतिरिक्त और जो भी इस प्रकार रज और मोह से उत्पन्न कर्म होते हैं उन सब रोग कारक कारणों को शिष्ट मनुष्य ' प्रज्ञापराध ' ही कहते हैं ॥ १०८ ॥

पृष्ठ 35

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२० चरकसंहिता [ अ ० १

बुद्धया विषमविज्ञानं विषम च प्रवर्तनम् ।

प्रज्ञापराधं जानीयान्मनसो गोचर हि तत् ॥ १०६ ॥

बुद्धि से विषम ( सम के विपरीत, अयथार्थ ) जानना, विषम रूप मे

प्रवृत्ति करना, यह प्रज्ञापराध है । यह प्रज्ञापराध मानस दोप है ॥ १०६ ॥

निर्दिष्टा कालसं प्राप्तिर्व्याधीना हेतुसंग्रहे ।

चयप्रकोपप्रशमाः पित्तादीना यथा पुरा ॥ ११० ॥

रोगों के हेतु रूप से काल को ( कियन्त शिरसीय अध्याय सूत्र ० १७ में ) कह चुके है 1 । वही पर पिचादि का जय, प्रकोप एव प्रशमन भी काल के कारण कह दिया है ॥११० ॥

मिथ्यातिहीनलिङ्गाच वर्षान्ता रोगहेतवः ।

जीर्णभुक्तप्रजीर्णान्नकालाकालस्थितिश्च या ॥ १११ ॥

पूर्व मध्यापराह्नाश्च रात्र्या यामास्त्रयश्च ये ।

तेषु कालेषु नियता ये रोगास्ते च कालजाः ॥ ११२ ॥

कालज रोग - वर्षा के अन्त वा शरद् से प्रारम्भ होने वाली छः ऋतुए मिथ्या, हीन और अति लक्षणों वाला होती हैं । मिथ्या लक्षण जैसे ग्रीष्म ऋतु में शीत होना । होनलिङ्ग जैसे- गरमी में गरमी का कम होना । अति-लिङ्ग जैसे -- ग्रीष्म मे गरमो का अधिक होना इत्यादि । जो भुक्त, जीर्ण और प्रजीर्ण काल में, जो पूर्वाह्न, मध्याह्न एव अपराह्न मे, और जो रोग रात्रि के पूर्व प्रहर, मध्यम प्रहर और अपर प्रहर में होते है वे सब रोग कालजन्य हैं । इन सब में काल कारण होता है । [ अन्न के खाने पर, पूर्वाह्न में और प्रदोष में श्लेष्मा प्रकुपित होता है | अन्न की पच्यमान अवस्था में, मध्याह्न में और रात्रि के मध्य प्रहर मे पित्त और अन्न के जीर्ण होने पर, अपराह्न में और तीसरे याम में वायु कुपित होता है । इन समयों में इन्ही दोषों के रोग होते हैं ] ॥ १११-११२ ॥

अन्येद्युको द्वग्राही तृतीयकचतुर्थ कौ ।

स्वे स्वे काले प्रवर्तन्ते काले ह्येषा बलागमः ॥ ११३ ॥

एते चान्ये च ये केचित्कालजा विविधा गदाः ।

अनागते चिकित्स्यास्ते बलकालौ विजानता ॥ ११४ ॥

प्रतिदिन होने वाला, ' द्वयहग्राही ' दिन में दो बार होने वाला, ' तृतीयक ' एक दिन छोड़ कर तीसरे दिन आने वाला, ' चतुर्थक ' बीच में दो दिन छोड़ कर होने वाला ( ज्वर ) अपने अपने समय में होते हैं, यही इनके बल का

पृष्ठ 36

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अ ० १ ] शारीरस्थानम् २१ समय होता है । ये अथवा जो यहा पर कालजन्य रोग नही कहे, इन सब रोगों में निदान आदि जन्य काल को जान कर बल और काल के आने से पूर्व ही चिकित्सा करनी चाहिये । ज्वर चढने के समय से पूर्व ही चिकित्सा करनी उचित है ॥ ११३ - ११४ ॥

कालस्य परिणामेन जरामृत्युनिमित्तजा ।

रोगाः स्वाभाविका दृष्टाः स्वभावो निष्प्रतिक्रियः ॥ ११५ ॥

काल परिणाम से बुढापा, मृत्यु, मरणरूपी स्वाभाविक रोग होते हैं ।

इनकी कोई चिकित्सा नहीं, क्योंकि स्वभाव का कोई उपाय नहीं है ॥ ११५ ॥

निर्दिष्टं देवशब्देन कर्म यत्पौर्वदेहिकम् ।

हेतुस्तदपि कालेन रोगाणामुपलभ्यते ॥ ११६ ॥

न हि कर्म महत्किचित्फलं यस्य न भुज्यते ।

क्रियान्नाः कर्मजा रोगाः, प्रशमं यान्ति तत्क्षयात् ॥ ११७ ॥

पूर्व शरीर में किये कर्म को ' दैव ' शब्द से कहा जाता है । यह कर्म भी काल वश से रोगों का कारण होता है । ऐसा कोई भी छोटा या बड़ा कर्म नहीं है, जिसका कि फल नहीं भोगना पड़ता । सब कर्मों का फल भोगना ही होता है । कर्मजन्य रोगो मे चिकित्सा सफल नहीं होती । ये रोग चिकित्सा क्रिया को नष्ट करने वाले हैं । वे रोगो के कारण रूप कर्मों के क्षय होने पर ही शान्त हो जाते है | ११५ - ११७ ॥

अत्युग्रशब्दश्रवणाच्छ्रवणात्सर्वशो न च ।

शब्दाना चातिहीनाना भवन्ति श्रवणाज्जडाः ॥ ११८ ॥

परुषोद्भीषणाशन्ताप्रियव्यसनसूचकैः ।

शब्दः श्रवणसयोगो मिथ्यायोग स उच्यते ॥ ११६ ॥

असस्पर्शोऽतिमस्पर्शो हीनसस्पर्श एव च ।

स्पृश्याना सग्रहेणोक्तः स्पर्शनेन्द्रियबाधक ॥ १२० ॥

यो भूतविषवातानामकालेनागतश्च यः ।

स्नेहशीतोष्णसस्पर्शो मिथ्यायोगः स उच्यते ॥

रूपाणां भास्वता दृष्टिर्विनश्यति हि दर्शनात् ।

दर्शनाच्चातिसूक्ष्माणां सर्वशश्चाप्यदर्शनात् ॥

द्विष्टभैरववीभत्सदूरातिश्लिष्टदर्शनात् ।

तामसानां च रूपाणां मिथ्यासयोग उच्यते ॥

अत्यादानमनादान मोकसात्म्यादिभिश्च यत् ।

१२१ ॥

१२२ ॥

१२३ ॥

पृष्ठ 37

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२२ चरकसंहिता [ अ ० १ रसानां विषमादानमल्पादान च दूषणम् ॥ १२४ ॥

अतिमृद्वतितीक्ष्णाना गन्धानामुपसेवनम् ।

असेवनं सर्वशश्च प्राणेन्द्रियविनाशनम् ॥ १२५ ॥

पूनिभूत विषद्विष्टा गन्धा ये चाप्यनार्तवाः ।

तैर्गन्धैत्रीणयागो मिथ्यायोगः स उच्यते ॥ १२६ ॥

अति उम्र शब्दों का सुनना यह शब्द का अतियोग है, शब्द का बिल्कुल न सुनना या बहुत धीमे शब्दों को सुनना हीनयोग और कठोर, भीषण, अनुभ, अप्रिय, विपत्तिसूचक शब्दों का सुनना मिथ्यायोग है । स्पृश्य वस्तुओं का बिल्कुल स्पर्श न करना असस्पर्श, थोड़ा सर्श करना हीनसस्पर्श, अधिक स्पर्श करना अति सस्पर्श, निन्दित द्रव्य विष आदि का सरी वा विना क्रम से उष्ण, शीन स्पर्श करना, स्पर्शक्रिया का मिथ्यायोग है । यह सर्शन इन्द्रियो के नाशक हैं । चमकीले पदार्थों को देखने से दृष्टि नष्ट हो जाती है, इसी प्रकार अतिसूक्ष्म पदाथो को देखने वा रूप को बिल्कुल न देखना भी अयोग है । इससे भी दृष्टनष्ट हो जाती है | अप्रीतिकर, भयंकर, घृणाजनक, दूर के, वा मिले पदार्थों और तामस रूपो को देखना यह रूपो का मिथ्यायोग है । रसों का अति सेवन अतियोग, सर्वथा सेवन न करना या थोड़ा सेवन करना ' अयोग ' ओकसात्म्य आदि से विषम ( ( राशि दोप को छोड़ कर शेष आहार विधि में कहे विशेष अथ्यों को ) सेवन करना मिथ्यायोग है । अति मृदु या अल्प गन्ध वाले पदाथो का सेवन अयोग, अति तीक्ष्ण पदार्थो को सूचना अतियोग, प्राणेन्द्रिय के नाशक पूति ( दुर्गंध ) आदि गन्धों का तथा जो ऋतु काल के गन्ध नहीं है, उन गन्धों का सूघना मिथ्यायोग है ॥११८-१२६ ॥

इत्यसाम्येन्द्रिय संयोग स्त्रिविधो दोषकोपनः ।

असात्म्यमिति तद्विद्याद्यन्न याति सहात्मताम् ॥ १२७ ॥

जो आत्मा के अनुकूल नही होता उसे ' असात्म्य ' जाने | यह असात्म्य

तीन प्रकार का है । और अर्थों का आत्मा के साथ सयोग तीन प्रकार का है ।

अतियोग, अयोग और मिथ्यायोग । इन से दोष कुपित होते हैं ॥ १२७ ॥

मिध्यातिहीन योगेभ्यो यो व्याधिरुपजायते ।

शब्दादीना स विज्ञेयो व्याधिरैन्द्रियको बुधैः ॥ १२८ ॥

शब्द आदि इन्द्रियों से ग्राह्य विषयों के मिथ्यायोग, अयोग और अतियोग से जो व्यावि उत्पन्न होती है, उनको विद्वान् ' ऐन्द्रियक ' ( इन्द्रियों से उत्पन्न

पृष्ठ 38

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अ ० १ ] शारीरस्थानम् २३ हुआ रोग ) कहते हैं । [ रस को छोड़ कर सब असात्म्य विषय अपनी २ इन्द्रिय के रोग उत्पन्न करते हैं । रस सम्पूर्ण शरीर में रोग उत्पन्न करता है, यह ध्यान रखना चाहिये ] ॥ १२८ ॥

वेदनानामसात्म्यानामित्येते हेतवः स्मृताः ।

सुखहेतुर्मतस्त्वेकः समयोग सुदुर्लभः ॥ १२६ ॥

यह विषयों का ( काल और बुद्धि का भी ) अतियोग, अयोग और मिथ्या-यग शारीरिक एवं मानसिक दानों प्रकार के रोगों के तीन प्रकार के कारण है । असात्म्य दुःखों का कारण है । इन विषयों का ( काल और बुद्धि का भी ) समान योग अकेला ही सुख संज्ञक आरोग्य का कारण है । ऐसा समयोग दुर्लभ है ॥ १२६ ॥

नेन्द्रियाणि न चैवार्थाः सुखदुःखस्य हेतवः ।

हेतुस्तु सुखदुखस्य योगो दृष्टश्चतुर्विध ॥ १३० ॥

न तो इन्द्रिया और न इनके विषय ही सुख दुख का कारण हैं । जो योग मुख दुख का कारण होता है वह चार प्रकार का है । इनमें समयोग सुख का कारण है, अतियाग, अयोग और मिथ्यायोग दुख के कारण है ॥ १३० ॥

सन्तीन्द्रियाणि सन्त्यर्था योगो न च न चास्ति रुक् ।

न सुख, कारण तस्माद्याग एव चतुर्विध ॥ १३१ ॥

क्योकि इन्द्रिया भी ह और विषय भी हैं । यदि योग चार प्रकार न हो तो न दुःख हो और न सुख हो । इसलिये अन्वय- व्यतिरेक से यह चार प्रकार का याग ही सुख - दुख का कारण है ॥ १३१ ॥

नात्मेन्द्रियमनोबुद्धिगोचर कर्म वा विना ।

सुखदुखं यथा यच्च बोद्धव्यं तत्तथोच्यते ॥ १३२ ॥

आत्मा, इन्द्रिय, बुद्धि ओर मन के विना, इन्द्रियों के विषयों के विना, अदृष्ट के विना न सुख और न दुख होता है । आत्मा आदि के होने पर जिस प्रकार से सुख दुख होते हैं, उनको उसी प्रकार बतलाते है । [ आत्मा मे उपशय ( अनुकूलता ) होने से सुख और आत्मा में अनुपचय ( प्रतिकूलता ) हाने से दुख होता है । अतियोग, अयोग और मिथ्यायोग ये अनुपशय के कारण हैं और समयोग उपशय का कारण है ] ॥। १३२ ॥

स्पर्शनेन्द्रियसस्पर्शः स्पर्शो मानस एव च ।

द्विविधः सुखदुःखानां वेदनानां प्रवर्तकः ॥ १३३ ॥

पृष्ठ 39

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२४ चरकसहिता [ अ ० १ VA NA ~ स्पर्शनेन्द्रिय ( त्वचा ) का सम्बन्ध और मानस स्पर्श यह दो प्रकार का स्पर्श सुख दुःख वेदनाओं का प्रवर्तक है । [ त्वचा और मन का सयोग होने से ही ज्ञान होता है । त्वचा सब इन्द्रियों में व्याप्त है । मन का त्वचा के साथ सम्बन्ध होने से मन भी सब इन्द्रियो से सम्बन्धित हो जाता है । इस प्रकार मन अणु होने पर भी जिस इन्द्रिय के साथ सम्बन्ध करता है उसी इन्द्रिय का ज्ञान हो जाता है ] ॥ १३३ ॥

इच्छाद्वेषात्मिका तृष्णा सुखदुःखात्प्रवर्तते ।

तृष्णा च सुखदुःखानां कारण पुनरुच्यते ॥

उपादत्ते हि सा भावान् वेदनाश्रयसज्ञकान स्पृश्यते नानुपादाने नाष्टो वेत्ति वेदनाः सुख दुख मे इच्छा और द्वेष रूप तृष्णा उत्पन्न सुख दुख में प्रवृत्ति करके जन्म का कारण होती है १३४ ॥ | || १३५ ॥ होती है । तृष्णा ही । क्योकि यही तृष्णा वेदनाओं के आश्रय स्थान ( मन, देह और इन्द्रियों ) को उत्पन्न करती है । वेदनाओं के आश्रयों की उत्पत्ति न होने से स्पर्शेन्द्रिय और मन का स्पर्श नही होता । स्पर्शेन्द्रिय और मन का स्पर्श न होने से वेदना भी नही होती ॥१३५ ॥

वेदनानामधिष्ठान मनो देहश्व सेन्द्रिय. ।

केशलोमनखाग्रान्नमलद्रवगुणैर्विना ॥ १३६ ॥

सुख दुख आदि वेदनाओं का आश्रय सत्व सज्ञक मन, इन्द्रियों सहित चेतना और जीवित शरीर है । इनमे केश ( ( शिर के बाल ), लोम ( शरार के बाल ) नसों के अग्र भाग, अन्न के मल, द्रव और गुण जैसे – शब्द, गन्ध, रूप, रस, स्पर्श इन को छोड़ कर शेष इन्द्रियों सहित आश्रय स्थान है ॥ १३६ ॥

योगे मोक्षे च सर्वासां वेदनानामवर्त्तनम् ।

मोक्षे निवृत्तिनिःशेषा योगो मोक्षप्रवर्तकः ॥

आत्मेन्द्रियमनोर्थानां सन्निकर्षात्प्रवर्त्तते ।

सुखदुःखमनारम्भादात्मस्थे मनसि स्थिरे ॥

निवर्त्तन्ते तदुभयं वशित्वं चोपजायते ।

सशरीरस्य योगज्ञास्तं योगमृपयो विदुः ॥

योग और मोक्ष ( परम मुक्ति ) में सत्र प्रकार की हो जाती है । मोक्ष मे वेदनाओं की अत्यन्त निवृत्ति शरीर वेदनाओं का १३७ ॥ १३८ ॥ १३६ ॥ वेदनाओं की समाप्ति हो जाती है, योग में ऐसा नहीं होता । योग मोक्ष का प्रवर्त्तक ( साधन ) है । [ योग में मनुष्य

पृष्ठ 40

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अ ० १ ] शारीरस्थानम् २५ जीवन्मुक्त दशा में रहता है, मोक्ष में परम मुक्ति हो जाती है ] । आत्मा, इन्द्रिय, अर्थ, और मन के सन्निकर्ष से सुख दुख उत्पन्न होते है और जब विषयों से हट कर मन आत्मा में स्थिर हो जाता है, तब कर्मों का आरम्भ न होने से सुख - दुख समाप्त हो जाते हैं और वशित्व उत्पन्न हो जाता है, यही योग का फल है । योग को जानने वाले ऋषि शरीर युक्त इस दुख-निवृत्ति रूप स्थिति को योग कहते हैं ॥ १३७ - १३६ ॥

आवेशश्वेतसो ज्ञानमर्थाना छन्दत क्रिया ।

दृष्टिः श्रोत्रं स्मृतिः कान्तिरिष्टतश्चाप्यदर्शनम् ॥ ९ ४० ॥

इत्यष्टविधमाख्यातं योगिना बलमैश्वरम् ।

शुद्धसश्व समाधानात्तत्सर्वमुपजायते ॥ १४१ ॥

योगियों का आठ प्रकार का ऐश्वर्य्य - आवेश ( दूसरे के शरीर में प्रवेश करना ), चित्त का जान अर्थात् ( दूसरे के चित्त को जानना ), विषयों का इच्छानुसार करना, इच्छानुसार दर्शन, श्रवण, अतीन्द्रिय और दूर के भी पदार्थों को देखना, शब्दों को सुनना, इच्छानुसार स्मरण ( पूर्वजन्म का भी स्मरण ), इच्छानुसार रूप बनाना और इच्छानुसार अदृश्य हो जाना यह योगियों का आठ प्रकार का यागजन्य बल है | यह सब शुद्ध सत्त्व, रज और तम से रहित मन को विषयों मे हटा कर आत्मा मे लगाने से उत्पन्न होता है || १४०-१४१ ॥

मोक्षो रजस्तमोऽभावाद्बलवत्कर्मसंक्षयात् ।

वियोग: कर्मसयोगैरपुनर्भाव उच्यते ॥ १४५ ॥

रज और तम दो मानस दोष हैं । इनके निवृत्त होने पर और अवश्य भोक्तव्य कर्मा के ( फल भोग द्वारा ) क्षय होने से कर्मबन्धनों से मुक्ति अर्थात् मोक्ष हो जाता है । मोक्ष होने पर फिर जन्म ग्रहण नहीं करना होता, इसी को ' अपुर्न भव ' कहते हैं ॥१४२ ॥

सतामुपासन सम्यगसता परिवर्जनम् ।

व्रतचर्योपवासश्च नियमाश्च पृथग्विधाः ॥ १४३ ॥

धारण धर्मशास्त्राणा विज्ञानं विजने रतिः ।

विषयेष्वरतिर्मोक्षे व्यवसायः परा धृतिः ॥ १४४ ॥

कर्मणामसमारम्भः कृताना च परिक्षय ' ।

* आत्मस्थे मनसि शरीरस्य दुःखाभव स योग. ॥ वे ० ५० ५ । २ । १६ ॥