श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 221–230
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 221–230
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पा ० १ चिकित्सितस्थानम् II छाल, पाढल की छाल, खरेंटी, चारों पर्णिया ( शालिपणी, पृनिपणी, मुद्ग-पर्णी, माषपर्णी ), पिप्पली, गोखरू, दोनों छोटी बड़ी कटेरी, काकड़ासिङ्गी, तामलकी ( भई आवला ), द्राक्षा, जीवन्ती, पुष्करमूल, अगरु, हरड बड़ी, गिलोय, ऋद्धि, जीवन, ऋषभक, शठी ( कचूर ), नागरमोथा, पुनर्नवा, मेदा, छोटी इलायची, लाल चन्दन, कमल गट्टा, विदारी, अडूसे की जड, काकोली, काकनासा ( कौआ ठोड़ी ), प्रत्येक एक एक पल, आवले १०० इनको एक द्रोण ( परिभाषा से दुगने ) जल में पकावे । पकाते समय आवलों को पाटली में बॉध कर काथ में छोड़ना चाहिये । जब आषधियों का रस काथ मे आ जाये और ओषधिया नीरस हो जायें तब पोटली को निकाल कर काथ छान लेना चाहिये । इन आवलों की गुठलियों को निकाल कर कपड़े में से आवलों को हाथ से रगड़ कर छानना चाहिये । जिससे रेशे निकल जायें और नरम पिट्टी सी बन जाये । इस पिट्ठी को मिलित तैल एव घी के बारह पल भून लेना चाहिये । भूनना इतना चाहिये कि रंग लाल सा हो जाये । क्वाथ में ५० पल राब या दानेदार खाड मिलाकर लेह पकाना चाहिये । पकाने से पूर्व छानकर आवले की पिट्ठी इसमें मिला दे । जब पाक तैयार हो जाय ता इसको उतार ले । ठण्डा होने पर छ. पल ( ४८ तोला ) मधु, वशलाचन ४ पल, पिप्पली दो पल, दालचीनी, इलायची, तेजपात और नागकेसर मिलित १ पक मिला दे । पकाते समय निरन्तर लकड़ी के कौचे ( पलटा ) से चलाता जावे । [ च्यवनप्राश का पाठ कई पुस्तकों में है । चिकित्सा - कलिका, योग रत्ना-कर और शार्ङ्गघर में कुछ ओषधियों का भेद है । किसी में ३५, किसी मे ३८ और किसी मे २६ हैं । क्वाथविधि में भी कहीं चतुर्थाश शेप रखने की विधि लिखी है, कहीं अष्टमाश की । ओषधियों का रख काथ में आना चाहिये । साथ ही शार्ङ्गघर मे तैल के अन्दर आवले भूनने का विधान नहीं । वहा पर केवल घी का ही प्रयोग किया है । ] यह च्यवनप्राश उत्तम रसायन है । खासकर कास, श्वास, को नष्ट करता है । क्षीणक्षत, वृद्ध एव बालकों के अगों को बढाता है । स्वरक्षय, उरोरोग, हृदय-रोग, वात - रक्त, पिपासा, मूत्रस्थान, शुक्रस्थान के रोगों ( वीर्यदोष ) को नष्ट करता है । इस च्यवनप्राश की मात्रा इतनी लेनी चाहिये जिससे भूख नष्ट न हो । इसके प्रयोग से वृद्ध च्यवन ऋषि भी पुनः जवान बन गये थे । इस रसायन के प्रयोग से मेधा, स्मृति, काति, नीरोगता, आयु की दीर्घता, इन्द्रियों की सबलता, मैथुन में समर्थता, देहानि की वृद्धि, वर्ण की निर्मलता, वायु की
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२०८ चरकसंहिता [ अ ० १ III अनुलोमता प्राप्त होती है । कुटी प्रादेशिक विधि में इस रसायन का प्रयोग करने वाला वृद्ध पुरुष भी वार्द्धक्य के चिह्नों से रहित होकर नई जवानी के रूप को धारण करता है, ( मात्रा १ से २ तोला तक ) ॥ ६१-७३ । अथाऽऽमलक - हरीतकीनामामलक - बिभीतकानां हरीतकी - बिभीत-कानामामलक - हरीतकी - बिभीतकाना वा पलाशत्वगवनद्धानां मृदावलि-सानां कुकूलके स्विन्नानामकुलकाना पल- सहस्रमुदूखले सोध्य दधि-घृत - मधु - पलल तैल - शर्करा संप्रयुक्तं भक्षयेदनन्न भुग्यथोक्तेन विधिना, तस्यान्ते यवाग्वादिभिः प्रकृत्यवस्थापनमभ्यङ्गोत्सादन सर्पिपा यवचू-णैश्च, अयं च रसायन - प्रयोग - प्रकर्षो द्विस्तावदग्नि - बलमभिसमीक्ष्य प्रति-भोजनं यूषेण पयसा वा षष्टिकः ससर्पिष्कोऽतः परं यथासुखविहारः कामभक्ष्य. स्यात् । अनेन प्रयोगेणषेय. पुनयुवत्वमवापु, बभूवुश्चानेक-वर्षशतजीविनो निर्विकाराः पर शरीर बुद्धीन्द्रिय - बल - समुदिता, चेरु-श्चात्यन्तनिष्ठया तप इति ॥ ४ ॥ इति चतुर्थामलकरसायनम् ।
73 आमलक रसायन ( ४ ) – आवले और हरड, ( २ ) आवले ओर बहेड़ा ( ३ ) हरड और बहेड़ा, ( ४ ) या आवला हरड और बहेडा इन चारों मे से किसी एक योग का लेकर, ढाक का गोलो छाल से लपेट कर ऊपर से मिट्टी का लेप चढ़ा कर गोहों की आग में स्विन्न करना चाहिये । स्विन्न होने पर इनक गुठलिया निकाल कर एक हजार पल परिमित मात्रा में ऊखल से कूट ले । इनमें दही, घी, शहद, पलल ( तिल कल्क ), तैल, शर्करा मिला कर कुटीप्रावे-शिक विधि से सेवन करे । इस के सेवन के समय दूसरा किसी प्रकार का कोई अन्न आहार नहीं खाना चाहिये । पश्चात् यव " गू आदि पेया द्वारा प्रकृति मे अर्थात् पूर्व भोजन पर लाना चाहिये । प्रति दिन घा का मालिश और जौ के चूर्ण से उबटन करे | आग्न बल को देखते हुए इस रसायन को दा हो बार सेवन करे । भोजन म घी युक्तसाठो को यूत्र या दूध के साथ खाना चाहिये । इसके पश्चात् यथेच्छ आहार - विहार का उपभाग करना चाहिये । इस प्रयोग से ऋषियों ने पुनः युवावस्था को प्राप्त किया था, अनेक वर्षा का आयु भोगो थी, वे देर तक नीरोग और शरोर वृद्धि, इन्द्रिय बल स युक्त रहे, उन्होंने अत्यन्त निष्ठा से तप किया ॥ ७४ ॥
हरीतक्यामलक - बिभीतक पञ्च पञ्चमूल - निर्यूहेण पिप्पली - मधु - मधू-क- काकोली- क्षीरकाकोल्यात्मगुप्ता जीवकर्षभक - शीर- शुक्ला - कल्क- संप्र-* अष्टागपग्रह के अनुसार रसायनाववि प्रयोग के दुगन दिन घी की मालिश और जौ का उबटन करना चाहिये ।
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पा ० १ ] १४ चिकित्सितस्थानम् २०६ A युक्तेन विदारीस्वरसेन क्षीराष्ट्रगुणसंप्रयुक्तेन च सर्पिषः कुम्भं खाघ-यित्वा प्रयुब्जानोऽग्निबलसमा मात्रां, जीर्णे च क्षीरसर्पि शालि षष्टिकमुष्णोदकानुपानमइनन्, जराव्याधि - पापाभिचार - व्यपगत भयः, शरीरेन्द्रिय - बुद्धि - बलम तुलमुपलभ्याप्रतिहत सर्वारम्भः परमायुरवाप्नुया-दिति ॥ ७५ ॥ इति पञ्चमो हरीतकीयागः ' ।
हरितक्यादि योग — हरड़, बहेड़ा, आवला, पाचों पंचमूल इनके सम्मिलित क्वाथ में, पिप्पली, मुलहठी, महुआ, काकोली, क्षीरकाकोली, कौच बीज, जीवक, ऋषभक, क्षीरशुक्ला ( क्षीरविदारी या निशोथ ) इनके कल्क से, विदारी के स्वरस से, आठ गुण दूध मिलाकर दो गुणा गोघृत सिद्ध करे # । जाठराग्नि के बल के अनुसार इसका उपयोग करे । जीर्ण होने पर दूध और घी के साथ शालि ( हेमन्त धान ) या साठी का भात खाना चाहिये । अनुपान गरम जल होना चाहिये । इसके प्रयोग से बुढ़ापा पाप और रोग तथा अभिचार का भय नहीं रहता । इसके सेवन से देह, इन्द्रिय और बुद्धि का अतुल बल हो जाता है । सब कार्य विना बाधा के पूर्ण होते हैं तथा पूर्ण आयु प्राप्त होती है ॥ ७५ ॥
हरीतक्यामलक- बिभीतक हरिद्रा स्थिरा वचा [ बला ] विडङ्गामृत-वल्ली विश्वभेषज मधुक - पिप्पली - सोमवल्क- सिद्धेन क्षीरसर्पिषा मधु-शर्कराभ्यामपि च सन्नीयामलक - स्वरस - शत - पल परिपीत मामलकचूण-मयश्वर्णचतुर्भागसंप्रयुक्त पाणितलमात्रं प्रातः प्रातः प्राश्य यथोक्तेन विधिना साथ मुद्गयूषेण पयसा वा ससर्पिष्क शालिषष्टिकमनीयात् । त्रिवर्षप्रयोगादस्य वर्षशतमजरं वयस्तिष्ठति, श्रतमवतिष्ठत, सर्वामयाः प्रशाम्यन्ति, विषमविषीभवति गात्रे, मात्रमश्मवत् स्थिराभवति, अह [ धृ ] श्यों ( यो ) भूतानां भवतीति ॥ ७६ ॥ इति पष्ठो हरीतकीयोग. ।
१. इतिपञ्चमामलकरसायनम् । पाक विधि - चक्रपाणि के अनुसार हरीतकी आदि का क्वाथ एक भाग, विदारी स्वरस एक भाग, दूव आठ भाग, घी एक भाग । अष्टागसग्रह के अनु-सार - घी ४ द्रोण, क्वाथ ८ द्रोण, स्वरस ८ द्रोण, दूध ३२ द्रोण । परिभाषा नियम से - घी ४ द्रोण, क्वाथ १६ द्रोण, स्वरस १६ द्रोण, दूध ३२ द्राण लेना
चाहिये । यथा-जलस्नेहौषधानाञ्च प्रमाणं यत्र नेरितम् ।
तत्र स्यादौषधः स्नेहः स्नेहातोय चतुर्गुणम् ॥
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२१० चरकसंहिता [ अ ० १ हरितक्यादि योग ( २ ) – हरड़, आवळा, बहेड़ा पृश्निपर्णी, हल्दी, खरैंटी, बायविडंग, गिलोय, सोठ, मुलहठी, पिप्पली, सोमवल्क ( खदिर श्वेत ) इनके क्वाथ से सिद्ध दूध में से बनाये घी के साथ मधु और शर्कग मिलाकर तथा एक सौ आवडों के चूर्ण को आवलों का स्वरस मिलाकर इस चूर्ण से चतुर्थांश लौह भस्म मिलाकर दोनों को सम्मिलित करके प्रति दिन प्रात. कुटि प्रावेशिक विधि से एक कर्प मात्रा में सेवन करे | सायकाल घी मिश्रित शालि या साठी के भात को दूध या मृग के यूष के साथ खाना चाहिये । इस प्रकार से तीन साल तक इस प्रयोग पोकरने पर एक सौ वर्ष तक बिना बुढापे के आयु रहती है, पढा, सुना सब याद रहता है सब रोग नष्ट हो जाते हैं, शरीर मे विष निर्विष हो जाता है, शरीर पत्थर के समान दृढ हो जाता है, प्राणियों से तिरस्कृत नहीं होता । [ ' अदृश्यो भूताना भवति ' के स्थान पर ' अधृष्यो भूताना भवति पाठ ठीक है । यही अर्थ किया है । बल के स्थान पर बचा भी पाठ है । कविराज गंगाधर मेन ने हरितकी आदि द्रव्यों के का r और कल्क दोनों में घृतपाक का विधान किया है ] ॥ ७६ ॥
भवन्ति चात्र - यथाऽमराणाममृतं यथा भोगवता सुधा ।
तथाऽभवन्महर्षीणां रसायनविधिः पुरा ॥ ७७ ॥
न जरा न च दौर्बल्यं नातुर्यं निधनं न च ।
जग्मुर्वर्षसहस्राणि रसायनपराः पुरा ॥ ७८ ॥
न केवलं दीर्घमहाऽऽयुरते रसायनं यो विधिवन्निषेवते ।
गति स देवर्षिनिषेवितां शुभा प्रपद्यते ब्रह्म तथेति चाक्षर ( य ) म् ॥७६ ॥
जिस प्रकार देवताओ के लिये अमृत, नागों के लिये मुधा थी, उसी प्रकार पूर्व काल में महर्षियों के लिये रसायन विधि थी । उस समय में रसायन को सेवन करने वाले महर्षि न वृद्धावस्था, न दुर्बलता, न रोग और न मृत्यु को ही ( काल से पूर्व ) प्राप्त हुए । उन्होंने हजारो वर्षों की आयु भोगी थी । जो पुरुष विधिपूर्वक रसायन का सेवन करता है उसे केवल दीर्घायु ही नही मिलती अपितु वह देवर्षिया से प्राप्त शुभ गति को प्राप्त करता है, ब्रह्म ( परमात्मा ) का साक्षात्कार करता है, उस अक्षय ब्रह्म के प्राप्त होने से मुक्ति मिल जाती है ॥ ७७-७८ ॥
तत्र श्लोकः -- अभयामलकीयेऽस्मिन् षड्योगः परिकीर्तिताः ।
रसायनामा सिद्धानामायुर्यैरनुवतते ॥ ८० ॥
इस अमयामलकीय रसायन पाद में सिद्ध रसायनों के छः प्रयोग कहें हैं, जिनके सेवन से दार्घायु मिलता है ॥ ८० ॥
इत्यनिवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसत्कृते चिकित्सितस्थाने प्रथमेऽध्याये -भयामलकीयो नाम रसायनपादः प्रथमः ।
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पा ० २ ] चिकित्सितस्थानम् २११ ( द्वितीयः पादः ) अथातः प्राणकामीयं रसायनपाद व्याख्यास्यामः ॥ १ । इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब हम ' प्राण कामीय ' नामक रसायन पाद की व्याख्या करते हैं । भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥ प्राणकामाः शुश्रूषध्वमिदमुच्यमानममृतमिवाऽपरमदितिसुतहित-करमचिन्त्याद्भुतप्रभ्भगवमायुष्यमारोग्यकरूं वयसः स्थापनं निद्रा तन्द्रा-श्रम क्लमालस्य दौर्बल्यापहरमनिल - कफ - पित्त - साम्य - करं स्थैयकरमबद्ध-माँसहरमन्तरग्निसंघक्षणं प्रभा - वर्ण - स्वरोत्तमकर रसायनविधानम् । अनेन च्यवनादयो महर्षयः पुनर्युवस्वमापुर्नारीणां चेष्टतमा बभूवुः । स्थिर - सम- सुविभक्त मांसाः मुसहत स्थिरशरीराः सुप्रसन्न -बल - वणन्द्रियाः सर्वत्राप्रतिहतपराक्रमा सर्वक्लेशसहाश्च । सर्वे शरीरदोषा भवन्ति ग्राम्याहाराद्ग्ल - लवण- कटुक - क्षार - शुष्क- शाक - माष ' निल - पलल- पिष्टान्न-भोजिना विरूढ नव - शुक- शमीवान्य- विरुद्धासात्म्य- रूक्ष- क्षाराभिष्य-न्दिभोजिनां क्लिन्न- गुरु पूति- पर्युषित भोजिना विषमाशनाध्यशनप्रि-याणां दिवास्वप्न स्त्री - मद्य - नित्यानां विषमातिमात्र व्यायाम - संक्षोभित-शरीराणां भय - क्रोध - शोक लोभ मोहायास - व बहुलानाम् । अतो निमित्तं हि शिथिली- भवन्ति मांसानि विमुच्यन्ते सन्धयो- विदह्यते रक्तं, विष्यन्दते चानल्पं मेदो, न सन्धीयतेऽस्थिषु भज्जा, शुक्रं न प्रवर्तते, क्षयमुपैत्योजः । स एवभूतो ग्लायति, सीदति, निद्रा तन्द्रा तस्य- समन्वि-तोऽनारतमाशु चेव निरुत्साहः श्वसिति, असमर्थश्चेष्टाना शारीरमान-साना, नह - स्मृति - बुद्धि - च्छायो रोगाणामधिष्ठान नूतो न सर्वमायुर-वाप्नोति । तस्मादेतान्दोपानवेक्षमाणः सर्वान्ययोकानहितानपास्या ss-हारविहारान् रसायनानि प्रयोक्तुमईतीत्युक्त्वा भगवान् पुनवेमुरा-त्रेय उवाच ॥ ३ ॥
आमलकाना सुभूमि नाना कालजानामनुपहत गन्ध - वर्ण - रसाना-मापूर्ण - रस - प्रमाण - वयोणा म्वरसेन पुनर्नवा कल्क - संप्रयुक्तेन मपिष साधयेदाढकं अतः पर विदारीस्वरसेन जीवन्ती कल्क- सप्रयुक्तेन, अत परं चतुर्गुणेन पयसा बलातिबलाकपायेण शतावरी - कल्क - संप्रयुक्तेन । अनेन क्रमेणैकैकं शतपाक सहस्रपाकं वा शर्करा क्षोद्र चतुर्भागसंप्रयुक्त १. ' मास ' इति च पाठः । २ " प्रायाणा ' इति च पाठः ।
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२१२ चरकसंहिता [ अ ० १ www.ww सौवर्णे राजते मार्त्तिके वा शुचौ दृढे घृतभाविते कुम्भे स्थापयेत् । तद्यथोक्तेन विधिना यथाग्नि प्रातः प्रात प्रयोजयेत्, जीर्णे च क्षीर-सपि शालिषष्टिकमनीयात् । अस्य त्रिवर्षप्रयोगाद्वर्षशतं वयो-जरं तिष्ठति, श्रुतमवतिष्ठते, सर्वामयाः प्रशाम्यन्ति, अप्रतिहतगतिः स्त्रीष्वपत्यवान् भवति ॥ ४ ॥
प्राण ( दीर्घ आयु और स्वस्थता ) की कामना रखनेवालों! सुनो जो हम कहते हैं, अमृत जिस प्रकार मे देवताओं के लिये हितकारी है, उसी प्रकार से यह रसायन विधि तुम्हारे लिये दूसरे अमृत के समान हितकारी और उपयोगी है, यह रसायन विधि अचिन्त्य प्रभाव होने से अद्भुत शक्तिवाली, आयुवर्द्धक, आरोग्यदायक, आयुस्थापक, निद्रा ( वैकारिक ), तन्द्रा, श्रम ( थकान ), क्लम ( पीड़ा ), आलस्य और निर्बलता को दूर करनेवाली, वात, कफ और पित्त को शान्त करती है, स्थिरता ( दृढता ) को उत्पन्न करती है, अबद्ध ( शिथिल ) मास को सुगठित बनाती है, कायाग्नि को प्रदीप्त करती है, प्रभा ( कान्ति ), स्वर और वर्ण को श्रेष्ठ बनाती है । इस रसायन विधि से च्यवन आदि महर्षियों ने फिर से जवानी प्राप्त की थी । इसीसे वे स्त्रियों के अति-प्रिय बने, उनके शरीर की मासपेशिया दृढ़, समानरूप, सुगठित हो गई थी, उनके शरीर मजबूत तथा स्थिर हो गये थे, उनके बल, वर्ण और इन्द्रिया श्रेष्ठ कोटि की हो गई थीं । उनका पराक्रम अप्रतिहत ( बेरोक - टोक ) था और वे सब प्रकार के क्लेश उठा सकते थे । जो व्यक्ति खट्टा, लवण, कटु, क्षार, शुष्क, शाक, माष ( वा मास ), तिल कल्क, पिष्टान्न ( पिट्टी के बने पदार्थ ) का सेवन करते हैं, अङ्कुरित ( जड़ाया हुआ ), या नये ( उसी साल के ) शुक्र या शमीधान्य का उपयोग करते हैं, परस्पर विरुद्ध, असात्म्य, रूक्ष, वार, अभिष्यन्दी द्रव्य का सेवन करते हैं, जो किन्न ( गीला ), गुरु, सड़ा, बासी भोजन करते हैं, विषम भोजन या अध्यशन ( भोजन पर और अधिक भोजन ) करते हैं, जो दिन में सोते, स्त्री - सग या मद्य का सेवन करते, विषम या अधिक ब्यायाम के कारण शरीर को चलाते डुलाते हैं, जो भय, क्रोध, शोक, लोभ और आयास से पीड़ित होते हैं, उन व्यक्तियों में ग्राम्य आहार के कारण सब दोष उत्पन्न हो जाते हैं । इसी कारण से उनकी मासपेशिया ढीली पड़ जाती हैं । सन्धिया अलग होने लगती है, रक्त विदग्ध ( जलकुक ) जाता है, मेद अधिक मात्रा मे बाहर आता है, मजा अस्थियों को छोड़ देती है, शुक्र उत्पन्न नहीं होता, ओज क्षीण हो जाता है । इस प्रकार की अवस्था में मनुष्य ग्लानियुक्त ( ढीला, हर्षरहित ) रहता है,
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पा ० २ ] चिकित्सितस्थानम् २१३ दुःखित रहता है, निरन्तर निद्रा, तन्द्रा, आलस्ययुक्त रहता है, शीघ्र ही उत्साह-हीन होकर हापने लगता है, शारीरिक और मानसिक चेष्टाओं में असमर्थ हो जाता है, स्मृति, बुद्धि और छाया ( कान्ति ) नष्ट हो जाती है, रोगों का घर बन जाता है और सम्पूर्ण आयु को भी नहीं भोग पाता । इसलिये इन उपरोक्त दोषों को देखते हुए पूर्व कथित अहित आहारविहार का त्याग करके ही मनुष्य रसायन का उपयोग करने के योग्य होता है । यह कहकर भगवान् पुनर्वसु आत्रेय बोले- अच्छी भूमि मे समय पर उत्पन्न हुए एव जिन के गन्ध, वर्ण और रस नष्ट नहीं हुए हों और जिनका रस वीर्य और प्रभाव भरपूर हो ऐसे आवलों के स्वरस से, पुनर्नवा ( सारोड़ी ) के कल्क द्वारा घी का एक आढ़क ( २ ॥ सेर ) सिद्ध करे । इसी प्रकार विदारीकन्द के स्वरस और जीवन्ती कल्क के द्वारा घी का एक आढक सिद्ध करे । इसी प्रकार दूध ' और बला - अतिबला के कषाय स तथा शतावरी कल्क से घृत सिद्ध करे । इस प्रकार से एक एक घी का शत पाक ( सौ बार ) या हजार बार पाक करे | इस प्रकार से सावित घृत मे चतुर्थाश शर्करा और मधु मिला कर घी से भावित, पवित्र एव दृढ बने स्वर्ण या चादी अथवा मिट्टी के बर्त्तन मे इस घी को रख देना चाहिये । फिर कुटी प्रावेशिक पूर्वोक्त विधि से अपनी पाचनशक्ति के • अनुसार प्रातःकाल प्रतिदिन खाना चाहिये । औषध के जीर्ण होने पर घी और दूध के साथ शालि ( साठी के चावलों ) का भात खाना चाहिये । इस प्रयोग को तीन साल तक सेवन करने पर सौ वर्ष तक विना वृद्धावस्था के आयु बनी रहती है । पढा सुना सब याद रहता है, सब रोग नष्ट हो जाते हैं, बेरोक-टोक के ससार में विचरता है, स्त्रियों में अपत्यशाली होता है, उसके बहुत सन्तान होतो हैं । [ सौ बार की अपेक्षा हजार बार किया पाक अधिक गुणशाली है । एक एक घर का पृथकू २ पाक करना चाहिये । रजत के पात्र की अपेक्षा स्वर्ण मिट्टी के बर्तन की अपेक्षा रजत में अधिक गुण है । ] ॥ ३४ ॥
भवतश्चात्र ।
बृहच्छरीरं गिरिमारसारं स्थिरेन्द्रिय चातिबलेन्द्रियं च ।
अधृष्यमन्यैरतिकान्तरूपं प्रशम्तपूजासुखचित्तभाक्च ॥ ५ ॥
परिभापानुसार स्वरस दुगुना होगा । घी से चार गुणा स्वरस ओर कल्क घी का चौथाई होगा । अर्थात् यदि घृत १ आढ़क हो तो स्वरस ८ आढ़क और कल्क चौथाई आदक होगा । १ आढ़क = ६४ पल = ६ सेर ३२ तोले के ।
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२१४ चरकसंहिता [ अ ० १
बलं महद्वर्णविशुद्धिरण्या स्वरो घनौघस्तनितानुकारी ।
भवत्यपत्यं विपुल स्थिरं च समश्नतो योगमिमं नरस्य ॥ ६ ॥
इत्यामलकघृतम् । इस प्रयोग के सेवन से शरीर लम्बा, चौड़ा तथा लोहे के समान दृढ़ और अति बलवान् हो जाता है । इन्द्रिया मजबूत और बलशाली हो जाती हैं । कोई इसको तिरस्कृत नहीं कर सकता, रूप भी मनोहर हो जाता है, उत्तम पूजा, उत्तम सुख ( आरोग्य ) और उत्तम मन ( या ज्ञान ) युक्त होता है । बल अति अधिक हो जाता है, वर्ण अत्यन्त निर्मल हो जाता है, स्वर बादलों के गर्जन के तुल्य गम्भीर हो जाता है । सन्तान बहुत दृढ़ ( नीराग ) होती है ॥ ५-६ || आमलकसहस्र पिप्पली सहस्रसंप्रयुक्त पलाश तरुण- क्षारोद कोत्तरं तिष्ठेत्, तदनुगतक्षारोद कमनात पशुष्कमनस्थिचूर्णीकृतं चतुर्गुणाच्या मधुसर्पिर्धा संनीय शर्करा चूर्ण चतुर्भाग सप्रयुक्तं घृतभाजनस्थं षण्मा-सान् स्थापयेदन्तर्भूमेः, तस्योत्तरकालमग्निबलसमां मात्रां खादेत् पौवां-ह्निकः प्रयोगः, सात्म्यपध्यश्चाऽऽहारविधिर्ना पराह्निकः । अस्य प्रयोगा-द्वर्षशतमजरं वयस्तिष्ठतीति समानं पूर्वेण ॥ ७ ॥
इत्यामलकावलेहः । आमलकावलेह – एक हजार आवले, और एक हजार पिप्पली, न तो बहुत बच्चे और न बहुत [ क्षारोदक विधि - युवा से ६ गुना जल डाल कर प्रकार इक्कीस बार करना क्षार तैय्यार कर लेते हैं । लिये उसे क्षारोदक कहते तब इनको छाया मे सुखा चार गुणा घी और शहद वृद्ध अपितु तरुण ढाक के क्षारोदक में डूबी रहे । ढाक को जला कर राख कर लेनी चाहिये । इस भस्म बिलोड़ना चाहिये । फिर अगले दिन नितार ले । इस चाहिये । इस सारे निवारे पानी को पका कर नितरे पानी में चार का सब भाग आ जाता है, इस हैं । ] जिस समय क्षार जल इनके अन्दर घुस जाये कर, गुठलिया निकाल कर चूर्ण बना ले । इस चूर्ण में मिलावे । चूर्ण का चतुर्थाश निर्मल खाण्ड मिलावे । अब इसको एक पात्र में रख कर छः मास तक भूभि में गाड़ दे । छः मास के पीछे अग्नि बल के अनुसार इसको मात्रा प्रातःकाल खावे । आहार का विचार सात्म्य की अपेक्षा से है । दिन के उत्तर भाग में सेवन न करे । इसके प्रयोग से सौ वर्ष तक जरारहित आयु रहती है, अन्य सब गुण पूर्वोक्त रसायन के तुल्य
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पा ० २ ] चिकित्सितस्थानम् २१५ ही हैं । [ अष्टागसंग्रह में ' अभयामलकसहस्र ' पाठ है । अभया ५०० और आवला ५०० ] ॥ ७ ॥
आमलक - चूर्णाढकमेकविशतिरात्रमामलक- सहस्र- स्वरस - परिपीत मधुघृताढकाभ्यां द्वाभ्यामेकी कृतमष्ट भागपिप्पलीकं शर्करा - चूर्ण - वतुर्भाग-संप्रयुक्तं घृतभाजनस्थं प्रावृषि भस्मराशौ निदध्यात्, तद्वर्षान्ते सात्म्य-पथ्याशी प्रयोजयेत् । अस्य प्रयोगाद्वर्षशतमजरमायु स्तिष्ठतीति समानं पूर्वेण ॥ ८ ॥ इत्यामलकचूर्णम् ।
आमलक चूर्ण - एक आढक आवले के चूर्ण को एक हजार आवलों के स्वरस में इक्कीस दिन तक भावना देवे । इसमें घी और मधु प्रत्येक के दो दो आढक मिळावे । इन सब का अष्टमाश पिप्पली चूर्ण तथा चूर्ण का चतुर्थाश शर्करा मिला कर घी से नावित पात्र मे व दे । इस पात्र को बरसात में भस्म के ढेर मे गाड़ दे । वर्षा बीत जाने पर सात्म्य भोजा होने पर इसका प्रयोग कर । इसके प्रयोग से आयु सौ बरस तक विना वृद्धावस्था तक रहतो है । रोष गुण पूर्व की भांति है ॥ ८ ॥
विडग तण्डुल- चूर्णानामाढक पिप्पली तण्डुलाना मध्यवीढक सिता-पला- सर्पिस्तेल- मध्वाढकै. षड्भिरेकी कृतं घृतभाजनस्थं प्रावृषि महम-राशाविति सर्वं समानं पूर्वेण यावदाशीः ॥ ६ ॥ इति विडङ्गावलेपः ।
विडंगावलेह -- - छिलके रहित त्रिडंग का चूर्ण एक आढक, पिप्पली बाज का चूर्ण १॥ आदक, मिश्रा घो, तैल और शहद इनका एक एक आढक लेकर छ. वस्तुओं को मिला कर घी से भावित पात्र में बरसात के प्रारम्भ में भस्म के ढेर में दाब दे, आगे सब पूर्व की भाति है ॥ ६ ॥
यथोक्तगुणानामामलकानां सहस्रमार्द्र- पलाश - द्रोण्या सपिधानायां बाष्पमनुद्वमन्त्यासारण्य गोमयाग्निभिरुपस्वेदयेत्, तानि सुस्विन्नशीता-न्युद्घृतकुलकान्यापाध्या ss ढकेन पिप्पलाचूर्णानामाढकेन च विडङ्ग-तण्डुलचूर्णानामभ्यर्धेन चाढकेन शर्कराचूर्णाना द्वाभ्या द्वाभ्यामाढकाभ्यां तैलस्य मधुनः सर्पिषश्च सयाज्य शुचौ दृढे घृतभाविते कुम्भे स्थापयेदे-कविंशतिरात्रमत उर्ध्व प्रयागः, अस्य प्रयोगाद्वर्षशत मजरमायु स्तिष्ठ-तीति समानं पूर्वेण || १० || इत्या मलकावलेहोऽपरः । आमलकावलेह ( २ ) - पूर्वोक गुणवाले एक हजार आवलों को लेकर ढाक की गोली लकड़ी से बनी, ढाक के ढक्कनवाली नाद में भर कर ढक्कन लगा कर जंगली उपलों की आग पर ऐसे गरम करे कि उसके बाप बाहर न
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२१६ चरकसंहिता [ अ ० १ जायें । जिस समय आवले सीज जायें और ठण्डे हो जायें तब निकाल कर, कूट कर, गुठली बाहर कर देनी चाहिये । इनके रेशे साफ करके, इसमें पिप्पली चूर्ण एक आढक, विडग तण्डुल चूर्ण एक आढक, शर्करा ( चीनी ) शाखढ़क, तैल २ आढक, मधु दो आढ़क और घी दो आढक ( परिभाषानुसार ४ । ४ आदक ), मिला कर घी से भावित स्वच्छ और दृढ पात्र में रख देना चाहिये । इक्कीस दिन के पीछे इसका प्रयोग करना चाहिये । इसके प्रयोग से जरारहित आयु एक सौ बरस की होती है और सत्र पूर्व की भाँति लाभ होते हैं ॥ १० ॥
धन्वनि कुशास्तीर्णे स्निग्ध - कृष्ण मधुर- मृत्तिके सुवर्ण - वर्ण- मृत्तिके वा व्यपगत - विष इवापद - पवन - सलिलाग्निदोषे कर्षण- वल्मीक श्मशान-चेत्योषरावसथ वर्जिते देशे यथर्तु - सुख- पवन - सलिलादित्य सेविते जा-तान्यनुपहतान्यनध्यारूढान्यबालान्यजीर्णान्यविगतवीर्याणि शीर्ण - पुराण-पर्णान्यसंजातान्यपर्णानि तपसि तपस्ये वा मासे शुचिः प्रयतः कृत-देवार्चनः स्वस्ति वाचयित्वा द्विजातीन् बले सुमुहूर्ते नागबला-मूलान्युद्धरेत्, तेषां सुप्रक्षालितानां त्वकूपिण्डमात्रमात्रमक्षमात्रं वा श्लक्ष्णपिष्टमालोड्य पयसा प्रातः प्रयोजयेत् चूर्णीकृतानि वा पिबेत् पयसा, मधुसर्पिर्ज्या वा संयोज्य भक्षयेत् । जीर्णे च क्षीरसर्पि शालिषष्टिकमनीयात् । संवत्सर प्रयोगादस्य वर्षशतमजरं वयस्तिष्ठ-तीति समानं पूर्वेण ॥ ११ ॥ इति नागबलारसायनम् ।
नागबला रसायन - जागल प्रदेश में उत्पन्न, कुशा से व्यास भूमि में चिकनी काली और मधुर मिट्टी में या सुवर्ण के समान रंग की मिट्टी में उत्पन्न, विष, हिंस जन्तु, वायु और जल तथा अग्नि के दोषों से रहित, जहां पर हल न चला हो, वल्मीक ( बमीठ ) श्मशान, चैत्य ( देवायतन ), जहा ऊषर भूमि न हो, जो रहने की भूमि न हो, ऋतु के अनुसार जहा पर वायु, पानी, धूप पहुचती हो, ऊचाई पर उत्पन्न, पाले आदि से न मरी, कीड़े आदि से न खाई, समीपस्थ वृक्ष या लता से न घिरी, न तो बहुत छोटी और न बहुत पुरानी, ( अपितु तरुण ), वीर्य से भरपूर, जिसके पुराने पत्ते झड़ गये हो, नये पत्ते अभी उत्पन्न न हुए हों, ऐसी नागबला ( गंगेरन ) को माघ या फाल्गुन मास में उखाड़े । उखाड़ते समय वैद्य पवित्र और सयमवाले मन से देव-ताओं की पूजा करके, मंगल पाठ पढ़ कर, ब्राह्मणो का पूजन करके उत्तम बलवान् मुहूर्त्त में नागबला की जड़ को उखाड़े | इन जड़ों को पानी से भली प्रकार घोकर इनकी त्वचा आम्रमात्र ( एक पल भर ) या अक्ष ( कर्प ) मात्र