श्रीगणेशाय नमः।

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 231–240

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 231–240

पृष्ठ 231

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पा ० २ ] चिकित्सितस्थानम् २१७ MAN www.w wwwwww उतार ले । इस छाल को खूब बारीक पीस कर दूध में मिला कर पीवे, अथवा इस छाल का चूर्ण करके दूध के साथ पीवे, अथवा घी और शहद में मिला कर चाटे । जीर्ण होने पर दूध और घी के साथ शालि या साठी का भात खावे | एक साल तक इस प्रकार प्रयोग करने पर एक सौ बरस की जरा ( बुढापा ) से रहित आयु होती है और सब गुण पूर्व की भांति होते है ॥ ११ । बलातिबला - चन्दनागुरु- धव - तिनिश - खदिर- शिंशपासन स्वरसाः पुनर्नवान्ताश्चषधयो दश नागबलया व्याख्याताः । स्वरसानामलाभे त्वयं स्वरसविधिः- चूर्णानामाढकमाढकमुदस्याहोरात्रस्थितं मृदितपूर्त स्वरसवत्प्रयोज्यम् ॥ १२ ॥

बला ( खरैंटी ), अतिबला, चन्दन, अगरु, धब, तिनिश ( सादन, स्यन्दन वृक्ष जिसका रथ बनता था ), खदिर, शिशपा ( शीशम ), असन इनके स्वरस तथा पुनर्नवा तक गिनी हुई अमृता, गिलोय, अभया, हरड, धात्री, आवला, मुक्ता, रास्ना ( जीवन्ती ), श्वेता ( दूर्वा अपराजिता ), जीवन्ती, अतिरसा ( शतावरी ), दस औषधियो का प्रयोग भी नागवला से बतला दिया है । अर्थात् जिस प्रकार नागबला का स्वरस प्रयुक्त होता है, उसी प्रकार से इनका स्वरस प्रयोग करना चाहिये । यदि स्वरस प्राप्त न हो सके तो इनका स्वरस तैय्यार करने का यह प्रकार है कि औषध का चूर्ण एक आढक ओर पानी एक आढक ( परिभाषा से दुगुना ) लेकर चौबीस घन्टे इसमें भिंगो कर रखना चाहिये । फिर इसको मथ कर, छान कर स्वरस के समान प्रयोग करना चाहिये । [ स्वरस के न मिलने पर यह भी विधि है कि शुष्क द्रव्य को आठ गुणे जल में क्वाथ करना चाहिये । चतुर्थीश रहने पर छान कर प्रयोग करना चाहिये । बला आदि के स्वरस का ही ऐसा

प्रयोग करना चाहिये I । भोजन विधि नागबला के ही समान जाने ] ॥ १२ ॥

भल्लातकान्यनुपहतान्यनामयान्या पूर्णरसप्रमाणबीर्याणि पक्क जा- -म्बव- प्रकाशानि शुचौ शुक्रे वा मासे सगृह्य यवपल्ले मापपल्ले वा निधा-पयेत्, तानि चतुर्मासस्थितानि सहसि महस्ये वा मासे प्रयोक्तमारभेत शीत - स्निग्ध - मधुरोपस्कृत - शरीरः पूर्वं दश भल्लत कान्या पोथ्याष्टगुणेना-म्भसा साधु साधयेत् " तेषा रसमष्टभागावशिष्टं पूतं सपयस्कं पिबेत् सर्पिषाऽन्तर्मुखमभ्यज्य । तान्येकैकभल्लातकोत्कर्षापकर्षेण दश भल्लात-कान्यात्रिशतः प्रयोज्यानि, नातः परमुत्कर्षः प्रयोगविधानेन, सहस्रपर एव भल्लातकप्रयोगः । जीर्णे च ससर्पिषा पयसा शालिषष्टिकाशनमुप-

पृष्ठ 232

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२१८ चरकसंहिता [ अ ० १ चारः, प्रयोगान्ते च द्विस्तावत् पयसैवोपचारः । तत्प्रयोगाद्वर्षशतमजरं वयस्तिष्ठतीति समानं पूर्वेण ॥ १३ ॥ इति भल्लातकक्षीरम् ।

भल्लातक वीर - जिन पर किसी प्रकार की चोट न लगी हो, जिनमें किसो प्रकार का रोग ( कृमि आदि ) न हो, जो रस और वीर्य से भरपूर हों, अच्छे परिपुष्ट हों, तथा जो पके हुए जामुन के समान काले रंग के हों, ऐसे मिलाबों को ज्येष्ठ ओर आढ मास में एकत्रित करके जौ से मरे कोठे में या उड़द के ढेर में रख देवे । चार माम अम्भ करे । [ जौ आदि में शीत काल में धान गुण युक्त खाने मे पूर्व चरर को शोतल इनको सेवन करने का प्रकार आठ गुण पानी से पकावे । कर इसमें दूध मिला कर पवे के पीछे अगहन या पोत्र मास में इनका सेवन M निकाल कर तुरन्त इनका रोवन न करे, बल्कि शरीरावस्था में हो इनका उपयोग करे ] । अर्थात् , स्नग्व तथा मधुर वस्तुओं से सस्कृत करे । यह है कि पहिले दस मिळावो को कुचल कर जब आठवा भाग रस रह जाये तब इसको छान आर पीने से पूर्व मुख म घी का लेप लगा लेव जिसले मुत्र कातर का सारी त्वचा चिकनी हो जाय । इस प्रकार से प्रति दिन एक एक भिलावे को बढाते हुए तो मिळावे तक बढावे । तीस मे ऊर भिलावे की मात्रा नहीं बढावे और फिर उसी प्रकार से घटा कर दस तक ले आवे । इस प्रकार से एक हजार मिळावों का प्रयोग करे । भिलात्रों के जीर्ण होंने पर घी और दूध के साथ शालि या साठो के चावल खाबे 1 | प्रयोग के उपरान्त [ जितने दिन मिलावों को प्रयोग किया उसमे दुगुने दिनों तक ] दूध का ही उपयोग करे अर्थात् दानों समय दूध पीने । इस प्रकार करने से एक सौ बरस की बिना वृद्धावस्था के आयु होता है । क्षेत्र पूर्व की भाति गुण है । [ अष्टाग संग्रह के टीकाकार इन्दु ने निम्न प्रकार से खाने की विधि बताई है प्रथम दिन १० भिलावें, दूसरे दिन ११, तीसरे दिन १२ इस प्रकार से बढ़ाते हुए बीसवें दिन २६, इक्कीसवे दिन ३०, बाईस से लेकर २७ वे दिन तक तीस तीस ही ले, आगे न बढाये । २८ वे दिन २६, २६ वें दिन २८, तीसवें दिन २७, इस प्रकार से घटा कर सैनालिसवें दिन १० पर ले आवे, ४८ वें दिन भी दस ही देवे । इस प्रकार से एक हजार पूरे हो जायेगे । यह एक हज़ार संख्या आवश्यकतानुसार कम भी हो सकती है । प्रकृति की अपेक्षा से कम में भी परि-त्याग किया जा सकता है । अष्टागसग्रह के अनुसार जितने दिन मिलावे का प्रयोग किया हो उससे तिगुने दिनों तक दूध चावल खाना चाहिये ] ॥ १३ ॥

भल्लातकानां जर्जरीकृतानां पिष्टस्वेदनं पूरयित्वा भूमावाकण्ठं

पृष्ठ 233

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पा ० २ ] चिकित्सितस्थानम् २१६ निखातस्य स्नेहभावतस्य दृढस्योपरि कुम्भस्याऽऽरोप्योडुपेनापिधाय कृष्णमृत्तिकावलिप्त गोमयाग्निभिरुपस्वेदयेत् तेषा यः म्वरसः कुम्भ प्रपद्येत तमष्टभाग- मधु संप्रयुक्तं द्विगुणघृतमद्यात् । तत्प्रयोगाद्वर्षशतम-जरं वयस्तिष्ठतीति समानं पूर्वेण ॥ १४ ॥ इति भल्लातकक्षौद्रम् ।

भल्लातक ौद्र - भिलावो को कुचल कर पिष्ट स्वेद विधि से ( पेदी में छिद्र किये हुए ) घड़े में रखे । एक दूसरे घड़े में घी का लेप करके इस घड़े को गले तक मिट्टी मे गाड़ दे । इस बड़े के मुख पर भिलावेवाला घड़ा रख कर इसका मुख ढक्कन से बन्द कर दे । इनकी सन्धियों को काली मिट्टी से बन्द कर दे । अब ऊपर के घड़े के चारों ओर उपले बिन कर आग लगावे । आग की आच से तैल निचले घड़े में आयेगा । इस तेल में आठवा भाग मधु और दुगना घी मिलाकर खावे । [ मात्रा आधा बूद से २ बूद तक ] । इसके प्रयोग से एक सौ बरस की बुढ़ापे से रहित परम आयु होती है । शेष गुण पूर्वोक्त रसायनों के समान है || १४ भल्लातकतलपात्र सपयस्कं मधुकेन कल्केनाक्षमात्रेण शतपार्क कुर्यात् । समानं पूर्वेण ॥ १५ ॥ इति भल्लातकतलम् ।

भल्लातक तैल - पूर्वोक विध से तैयार किया भल्लातक तैल दो आढक, दूध आठ आढक और मुलहठी का कल्क १ अक्ष ( २ तोला ) इनसे यथा-विधि पाक करे । इस प्रकार मे एक सौ बार पाक करके तैल सिद्ध करे । उसका

सेवन पूर्व के तुल्य ही करे । इसके गुण भी पूर्व को भाति ही समझें ॥१५ ॥

भल्लातकक्षीर भल्लातकक्षोद्र भल्लातकतैलमेव गुडभल्लातकं भल्लातक-यूषो भल्लातक - सर्पि भल्लातक- पललं भल्लातकसक्तना भल्लातकलवणं भल्ला-तकतर्पणमिति भल्लातकविधानमुक्तम् || १६ || इति भल्लातकविधि. | भल्लातक विधान - भल्लातक क्षीर, भल्लातक क्षोद्र, भल्लातक तैल के समान भल्लातक घी, भल्लातक गुड़ ( भिलावे का गुड़ के साथ ), भल्लातक यूष ( भला-तक चीर के समान ), भल्लातक तेल, भल्लातक पलल ( भिलावे का तिल फल्क के साथ ), भल्लातकक्त ( भिलावे का जौ के सत्त के साथ ), भल्लातक लवण ( भिलावे का सेन्धा नमक के साथ ), भल्लातक तर्पण ( मिलावे का लाजा के सत्तुओं के साथ सेवन ) होता है, ये भल्लातक विधान भी पूर्व के तुल्य ही जानने चाहिये ॥ १६ ॥

[ अष्टाग संग्रह में भल्लातकप्राश घृत का भी प्रयोग लिखा है – पुष्ट, परि-पक्क आढ़क भर भल्लातक लेकर उनको ईंट के चूर्ण से रगड कर जल से धोकर

पृष्ठ 234

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२२० चरकसंहिता [ अ ० १ वायु से सुखा कर कूट कर, एक जल के घड़े में पकावे, एक चौथाई बचे तो उसे छान कर ठण्डा करले, फिर उसको दूध के घड़े में पकावे, एक चतुर्थांश बचे तो बराबर मात्रा घी की लेकर उसमें मिला कर धान्य के ढेर में सात दिन तक रखे । इस प्रकार ' अमृतरसपाक ' बनता है, उसका सेवन करे और पचने के उपरान्त यथेष्ट जल, दूध या रस का सेवन करे । इससे स्मृति, मति, बल, मेघा, सत्त्व और सार इनसे सम्पन्न होकर सोने के समान उज्ज्वल गौर शरीर होकर दीर्घ आयु का भोग करता है । ]

भवन्ति चात्र - भल्लातकानि तीक्ष्णानि पाकीन्यग्निसमानि च ।

भवन्त्यमृतकल्पानि प्रयुक्तानि यथाविधि ॥ १७ ॥

एते दशविधारत्वेषां प्रयोगाः परिकीर्तिताः ।

रोगप्रकृति सात्म्यज्ञस्तान् प्रयोगान् प्रकल्पयेत् ॥१८ ॥

कफजो न स रोगोऽस्ति न विबन्धोऽस्ति कश्चन । यं न भज्ञातकं हन्याच्छीघ्रं मेधाग्निवर्धनम् प्राणकामाः पुरा जीर्णाश्च्यवनाद्या महर्षयः रसायनैः शिरेतैर्बभूवुरमितायुषः ॥ २०

ज्ञान ' तपो ब्रह्मचर्यमध्यात्म्यध्यानमेव च ।

दीर्घायुषो यथाकामं संभृत्य त्रिदिवं गताः ॥

तस्मादायुःप्रकर्पार्थं प्राणकामैः सुखाथिभिः रसायनविधिः सेव्यो विधिवत्सुसमाहिते ॥ ॥ १६ ॥

।

॥

२१ ॥

।

२२ ॥

भिलावे अग्नि के समान तीक्षण और पकानेवाले ( पाक रोग उत्पन्न करने वाले ) होते हैं । परन्तु यदि इनका विविपूर्वक प्रयोग किया जाये तो अमृत के समान होते हैं । यहाँ पर भिलावे के दस प्रयोगों का वर्णन कर दिया है । रोग और प्रकृति की और सात्म्य की विवेचना करके इनका प्रयोग करे । ऐसा कोई भी I कफजन्य रोग नहीं है और नाहीं कोई ऐसी स्रोतो की रुकावट है, जिसको कि भिलावा दूर न कर सके । यह शीघ्र ही मेधा तथा अग्नि को बढ़ाता है । [ भल्लातक के प्रयोग में अपथ्य कुल्ल्थी, दधि, शुक्त ( आचार आदि ), तैल का देह मे लगाना, अग्नि का सेवन और गरम पानी इनका त्याग करना चाहिये । ] पुरातन काल मे प्राणों की कामना करनेवाले वृद्ध च्यवन आदि महर्षियों ने इन्हीं कल्याणकारी रसायनों के सेवन से अपरिमित आयु प्राप्त की थी । १ ' ब्राह्म ' इति च पाठ ।

पृष्ठ 235

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पा ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २२१ ये दीर्घ आयुबाले महर्षि यथेच्छ ज्ञान, तप, ब्रह्मचर्य्य, अन्यात्म ध्यान ( ब्रह्मध्यान ) का सञ्चय करके स्वर्ग मे गये । इसलिये प्राणों की कामना रखनेवाले सुख, आरोग्य के इच्छुक पुरुषों को चाहिये कि दीर्घायु प्राप्त करने के लिये विधिपूर्वक बड़ी सावधानी से रसायन - विधि का सेवन करें ॥२२ ॥

तत्र श्लोकः– रसायनाना सयोगाः सिद्धा भूतहितैषिणा ।

निर्दिष्टाः प्राणकामीये सप्तत्रिंशन्महर्षिणा ॥ २३ ॥

प्राणियों के हित को चाहनेवाले महर्षि आत्रेय ने प्राणकामीय अध्याय में रसायनों के ये ३७ प्रयोग बतलाये हैं ॥ २३ ॥

इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सास्थाने प्राणकामीयो नाम रसायनपादो द्वितीयः । ( तृतीयः पादः ) अथातः करप्रचितीय रसायनपादं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब हम ' करप्रचितीय ' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं । भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥ करचितानां यथोक्त गुणाना मामलकानामुद्धृतारथनां शुष्कचूर्णि तानां पुनर्माघे फाल्गुने वा मासे त्रिःसप्तकृत्वः स्वरसपरिपीतानां पुनः शुष्क चूर्णीकृतानामाढकमेकं ग्राहयेत्, अथ जीवनीयानां बृंहणीयानां स्तन्यजननानां वयःस्थापनानां षड्विरेचनशताश्रितीयोक्तानामौषधग-णानां चन्दनागुरु - धव- तिनिश - खदिर- शिशपासन- साराणां चाणुशः क्षिप्तानामभया - बिभीतक पिप्पली - वचा- चव्य - चित्रक - विडङ्गानां च सम-स्वानामाढकमेकं दशगुणनाम्भसा साधयेत् " तस्मिन्नाढकावशेषे रसे सुपूते तान्यामलकचूर्णानि दत्त्वा गोमयाग्निभिर्वश विदल - शर - तेजना-ग्निभिवा साधयेद्यावदपनयाद्रसस्य, तमनुपद्ग्वमुपहृत्यायसीषु पात्री-वास्तीर्य शाषयेत्, सुशुष्क कृष्णाजिनस्योपरि तद् - दृषदि ऋण पिष्ट-मयःस्थाल्या निधापयेत्सम्यक्, तच्चूर्णमयश्वर्णाष्टभागसंप्रयुक्तं मधुस-पिंभ्र्भ्यामग्निबलमभिसमीक्ष्य प्रयोजयेदिति ॥ ३ ॥

आमलकायस ब्रह्म रसायन - माघ या फाल्गुन मास में पूर्वोक्त गुणोंवाले आवलों को वृक्ष पर से हाथों द्वारा तोड़ कर एकत्र करे ( भूमि पर गिरे आवकों

पृष्ठ 236

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२२२ चरकसंहिता [ अ ० १ को ग्रहण नहीं करे ) । इनकी गुठली निकाल कर छाया में शुष्क करे । इनको इक्कीस बार आवलों का स्वरस पिलाबे । इस चूर्ण की एक आढक मात्राले लेवे । ' षडूविरेचन शताश्रितीय ' अध्याय में वर्णित जीवनीय, वृहणीय, स्तन्यजनक, वय स्थापक ओषधि समूह और चन्दन, अगरु, धव तिनिश ( साघने ), खैर, शीशम और असन इन वृक्षों के सार ( मध्य काठ ) को टुकड़े २ करके तथा हरड़, बहेड़ा, पिप्पली, वचा, चव्य, चित्रक, वायविडंग इन सब मिलित द्रव्यों का एक आढक लेकर दस गुणे जल मे पकावे और जब रस एक आढक रह जाये तब इसको छान-कर पूर्व तयार किया आवले का चूर्ण मिला दे । फिर उपले और बास की खप्पच सरकण्डा, तेजबल की लकड़ियो से आग को तेज करके इस को पकाता जाये । जब सब रस शुष्क हो जाये ( चूर्ण जले नदी ) तब उतार ले | बिना जले हुए अवलेह को उतार कर लाहे की थालियों में फैलाकर शुष्क करे । शुष्क हो जाने पर काले मृग की खाऊ पर रक्खी शिला पर खूब बारीक पीसकर लोहे की थाली में रख दे । इस चूर्ण में लोह भस्म आठवा भाग मिलाकर घी और मधु के साथ अग्निबल को देख कर सेवन करे ॥ ३ ॥

तत्र श्लोकाः -- एतद्रसायनं पूर्वं वसिष्ठः कश्यपोऽङ्गिराः ।

जमदग्निर्भरद्वाजो भृगुरन्ये च तद्विधाः ॥ ४ ॥

प्रयुज्य प्रयता मुक्ताः श्रमव्याधिजराभयात् ।

यावदच्छस्तपस्तेपुस्तत्प्रभावान्महाबलाः ॥

तपसा ब्रह्मचर्येण ध्यानेन प्रशमेन च ।

रसायनविधानेन कालयुक्तेन चाऽऽयुषा ॥

स्थिता महर्षयः पूर्वम्, प्रथम वासेष्ठ, कश्यप, अगिरा, जमदग्नि, भरद्वाज, भृगु, प्रकार के ऋषियों ने इसका प्रयोग किया था । इसके प्रयोग रोग और बुढ़ापे से मुक्त हो गये थे । इसके प्रभाव से उन्होंने ५ ॥ ६ ॥ तथा अन्य इसी करने पर वे श्रम, यथेच्छ तप किया था । पूर्व काल में महर्षि रसायन विधि के द्वारा तप, ब्रह्मचर्य, व्यान, प्रथम तथा अनियत काल तक आयु का उपभाग करते रहे हैं ॥ ४-६ ॥

न हि किचिद्रसायनम् ।

ग्राम्याणामन्यकार्याणां सिध्यत्यपयतात्मनाम् ॥ ७ ॥

इदं रसायन चक्रे ब्रह्मा वार्षसहस्रिकम् ।

जराव्याधिप्रशमनं बुद्धीन्द्रियवलप्रदम् ॥ ८ ॥

इत्यामलकाय सब्रहारसायनम् ।

पृष्ठ 237

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पा ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २२३ कोई भी रसायन ग्राम्य ( नगर में रहने वाले ) पुरुषों तथा काम - धन्धे में फंसे हुए तथा ब्रह्मचर्य आदि सयम का पालन न करनेवाले पुरुषों मे फलवती नहीं होती । इसलिये इनसे पृथक होकर एकाग्र चित्त से रसायन विधि करनी चाहिये । सहस्र वर्ष की आयु प्रदान करने वाले और जरा तथा रोग को दूर , करनेवाले तथा बुद्धि और इन्द्रिय बल को देनेवाले इस आमलक रसायन का ब्रह्मा ने आविष्कार किया था ॥ ७-८ ॥

संवत्सरं पयोवृत्तिर्गवां मध्ये वसेत्सदा ।

सावित्री मनसा ध्यायन् ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ॥ ६ ॥

संवत्सरान्ते पौषी वा माघी वा फाल्गुनी तिथिम् ।

त्र्यहोपवासी शुद्धच प्रविश्यामलकीवनम् ॥ १० ॥

बृहत्फलाढ्यमारुह्य द्रमं शाखागत फलम् ।

गृहीत्वा पाणिना तिष्ठज्जपन् ब्रह्मामृतागमात् ॥

तदा ह्यवश्यममृतं वसत्यामलके क्षणम् ।

शर्करामधुकल्पानि स्नेहवन्ति मृदूनि ॥ १२

भवन्त्यमृतसंयोगान्तानि यावन्ति भश्येत् ।

जीवेद्वर्षसहस्राणि तावन्त्यागतयौवन ॥ १० ॥

सौहित्यमेषां गत्वा तु भवत्यमरमन्निभ ।

११ ॥

॥

स्वयं चास्योपतिष्ठन्ते श्रीर्वेदा वाकू च रूपिणी ॥ १४ ॥

इति केवमामलकं रसायनम् । देवळामलक रसायन- - एक वर्ष तक केवल दूध पर निर्वाह रखकर गायों के बीच में बास करे । वहा पर ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए मन से सावित्री का ध्यान करे । एक साल के पीछे पौष या भाव उथका फाल्गुन की किसी शुभ तिथि मे आवले के जंगल मे पहुॅचे । वहां पर जाने से पूर्व तीन दिन उपवास करे । फिर शुद्ध होकर वन में घुसे । वहा पर कावले ते लदे नड़े वृक्ष पर चढकर हाथ से फल को पकड़ कर अमृत के आने तक ब्रह्म, ' ओकार का जप करना रहे । इस प्रकार जप करने से क्षण भ ० के लिये आवले अमृतत्व आ जाता है | अमृत के आने से आव शर्करा और मधु के समान नीठे, स्नेहवाले, कामल हो जाते हैं, इनको खावे । वह जितने भी आवले खायेगा उतने हजार वर्षों तक युवा रहकर जीवित रहेगा । यदि भरपेट तृस होकर खाये तो अमर हो जाये, बहुत दीर्घायु हो । कान्ति वेदवाणी, लक्ष्मी, सरस्वती स्वय इसके आगे आकर उपस्थित हो जाती है । ९ -१४३

पृष्ठ 238

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२२४ चरकसंहिता

त्रिफलाया रसे मूत्रे गवां क्षारे च लावणे ।

क्रमेण चेहदीक्षारे किशुकक्षार एव च ॥ १५ ॥

वीक्ष्णायसस्य पत्राणि वह्निवर्णानि वापयेत् ।

चतुरङ्गुलदीर्घाणि तिलोत्सेधसमानि च ॥ १६ ॥

ज्ञात्वा तान्यञ्जनाभानि सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत् ।

तानि चूर्णानि मधुना रसेनामलकस्य च ॥ १७ ॥

युक्तानि ear कुम्भे स्थितानि घृतभाविते ।

सवत्सरं निधेयानि यवपल्ले तदेव च ॥ १८ ॥

दद्यादालोडनं मासे सर्वत्राठोडयन् बुधः ।

सवत्सरात्यये तस्य प्रयोगो मधुसर्पिषा ॥ १६ ॥

प्रातः प्रातर्बलापेक्षी सात्म्यं जीर्णे च भोजनम् ।

एष एव च लोहानां प्रयोगः संप्रकीर्तितः ॥ २० ॥

अनेनैव विधानेन हेनश्च रजतस्य च ।

आयुःप्रकर्षकृत्सिद्धः प्रयोग. सर्वरोगनुत् ॥ २१ ॥

नाभिघातैर्न चातङ्कर्जरया न च मृत्युना ।

स धृष्य स्याद् गजप्राणः सदा चातिबलेन्द्रियः ॥

धीमान् यशस्वी वाक्सिद्धः श्रुतधारी महाधनः ।

भवेत्समा प्रयुञ्जानो नरो लौहरसायनम् ॥ २३ ॥

[ अ ० १ २२ ॥ इति लौहादिरसायनम् । लौहादिरसायन - तीक्ष्ण लौह ( फौलाद ) के चार अगुल लम्बे और तिल भर मोटे पत्रों को आग में लाल करके क्रमशः त्रिफला के काथ में, गोमूत्र मे मालकगनी के क्षारोदक में, तथा इगुदी ( हिंगोट ) के क्षार मे, और पलाश ( ढाक ) के क्षारोद मे बुझा ले । बुझाने से पूर्व फिर २ तपा कर काल कर लिया करे । बुझाने पर जब पत्र अजन के समान काले और टूटनेवाले हो जायें, तब इनका बारीक चूर्ण बना लेवे । इस चूर्ण को मधु तथा आवले के रस मे मिला कर अवलेह को भाति कर ल । इस अबलैह को घा से भावित घड़े मे रख कर एक साल तक जौ के ढेर में दबा दे । प्रत्येक मास लकड़ी के डण्डे से इसको चला देवे | एक साल के पीछे इसको घी और शहद के साथ प्रतिदिन प्रातः अग्निबल के अनुसार प्रयोग करे । जीर्ण होने पर प्रकृति के अनुकूल भोजन करे । इसी प्रकार से अन्य लोहों ( धातुओं ) का प्रयोग करना चाहिये । इस भाति स्वर्ण, चादी का प्रयोग आयु को लम्बा करता है और सम्पूर्ण रोगों को

पृष्ठ 239

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पा ० ३ ] १५ चिकित्सितस्थानम् २२५ नष्ट करता है । लौह रसायन के एक साल तक प्रयोग करने पर पुरुष चोट, रोग, जरा, मृत्यु इनसे पराभूत नहीं होता । हाथी के समान शक्तिशाली हो जाता है, इन्द्रियां अति बलवान् हो जाती हैं । मेधावी, यशस्वी, वाकूसिद्ध ( जो कहेगा सो होगा ), श्रुतधारी ( सुनते ही धारण करनेवाला ), महाधन-शाली ( रसायन के प्रभाव से ही ) हो जाता है ॥। १५-२३ ॥

ऐन्द्री मत्स्याक्षको ब्राह्मी वचा ब्रह्मसुवर्चला ।

पिप्पल्यो लवण हेम शङ्खपुष्पी विषं घृतम् ॥। २४

एषा त्रियवकान् भागान् हेयसर्पिर्विषैर्विना ।

at at तत्र म्नस्तु तिलं दद्याद्विषस्य च ॥ २५

सर्पिषच पलं दद्यात्तदेकध्यं प्रयोजयेत् ।

घृतप्रभूत सक्षौद्रं जीर्णे चान्नं प्रशस्यते ॥ २६ ॥

जराव्याधिप्रशमनं स्मृतिमेधाकर परम् ।

आयुष्यं पौष्टिकं बल्यं स्वरवर्णप्रसादनम् ॥ २७ ॥

परमोजस्करं चैतत्सिद्धमेतद्रसायनम् ।

नैन प्रसहते कन्या नालक्ष्मीर्न विषं न रुक् ॥ २८

॥

॥

॥

श्वित्रं सकुष्ठं जठराणि गुल्माः सीहा पुराणो विषमज्वरश्च ।

मेधास्मृतिज्ञानहराच रोगाः शाम्यन्त्यनेनातिबलाश्च वाताः ॥ २६ ॥

इत्यैन्द्रीरसायनम् । ऐन्द्री रसायन - ऐन्द्री ( इन्द्रवारुणी या दिव्य औषध ), मत्स्यावक ( मछीछी ), ब्राह्म, वचा, ब्रह्मसुवर्चला ( मण्डूकपर्णी ), ' पिप्पली, सैन्धव लवण, स्वर्ण, शखाहुली, विष, घी इनमें स्वर्ण, विष और घी को छोड़कर प्रत्येक तीन २ जौ भर लेना चाहिये । स्वर्ण दो जौ, विष एक तिल भर और घी एक पल मिलाना चाहिये । इसको खाकर प्रभूत घी तथा शहद मिश्रित अन्न जीर्णं होने पर खाना चाहिये । इसके खाने से जरा और रोग शान्त होते हैं, स्मृति और मेधा बढ़ती है । आयुवर्धक, पौष्टिक, बलकारक, स्वर, वर्ण को शुद्ध करता है । यह सिद्ध रसायन अत्यन्त ओज - वर्धक है । इसके प्रयोग से कृत्या ( पाप या आभिचारिक कर्म ), अलक्ष्मी ( दरिद्रता ), विष और रोग भी प्रभाव नहीं करते । श्वित्र, कुष्ठ, उदर रोग, गुल्म, प्लीहा, पुराना विषम ज्वर, मेघा, स्मृति और ज्ञान को नष्ट करनेवाले रोग तथा अत्यन्त बलवान् वायु रोग भी इसके सेवन से नष्ट हो जाते हैं ॥ २८-२६ ॥ १ ब्रह्मसुवर्चला दिव्य औषधी है - ' हिरण्यक्षीरा पुष्करसदृच्चपत्रा । '

पृष्ठ 240

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२२६ चरकसंहिता [ अ ० १ n

मण्डूकपर्ण्याः स्वरसः प्रयोज्यः क्षीरेण यष्टीमधुकस्य चूर्णम् ।

रसो गुडूच्याम्तु समृलपुष्प्याः कल्कः प्रयोज्यः खलु शङ्खपुष्ध्याः ॥। ३० ॥

आयुःप्रदान्यामयनाशनानि बलाग्निवर्णस्वरवर्धनानि ।

मेध्यानि चैतानि रसायनानि मेध्या विशेषेण च शङ्खपुष्पी ॥ ३१ ॥

इति मेध्यरसायनानि । मेधाकर रसायन चार हैं । जैसे - ( १ ) मण्डूकपर्णी का स्वरस प्रयोग करना चाहिये । ( २ ) गाय के दूध के साथ मुलहठी का चूर्ण खाना चाहिये । ( ३ ) गिलोय का रस प्रयोग करना चाहिये । ( ४ ) मूल और पुष्प के साथ शंखाहुली का क्ल्क बरतना चाहिये । * ये चारों रसायन आयुवर्धक, रोग नाशक बल, अग्नि, वर्ण ( कान्ति ) और स्वर को बढ़ाते है । ये रसायन मेधावर्धक ६ । इन में भी शखपुष्पी खास कर बुद्धि को बढ़ाती है ॥ ३०-३१ ॥

प षट् ' सप्त दश वा पिप्पलीमधुसर्पिषा ।

रसायन गुणान्वेषी समामेकां प्रयोजयेत् ॥ २२ ॥

तिस्रस्तिस्रस्तु पूर्वाह्णे भुक्त्वाऽग्रे भोजनस्य च ।

पिपल्यः किशकक्षारभाविता घृतभजिताः ॥ ३३

प्रयोज्या मधुसपियर रसायन गुणैषिणा ।

जेतुं कासं क्षयं शोषं श्वासं हिक्का गलामयान् ॥

अशसि ग्रहणदोषं पाण्डुतां विषमज्वरम् ।

॥

३४ ॥

वैस्वयं पीनस शोफं गुल्मं वातबलासकम् ॥ ३५ ॥

इति पिप्पलीरसायनम् । पिप्पली रसायन - रसायन गुण को चाहने वाले व्यक्ति को चाहिये कि पांच, छः, सात या दस पिप्पली को ( चूर्ण, फाण्ट, क्ल्क ) मधु और घी के साथ एक साल तक भक्षण करे । पिप्पली को पलाश के क्षारोदक से भावना देकर गाय के घृत में भून लेवे । इनमें से तीन तीन पिप्पली को घी में * मण्डूकपर्णी की प्रयोगविधि - दोषों से रहित होकर उक्त प्रकार के आगार में रह कर मण्डूकपर्णी का स्वरस लेकर सहस्र सम्पात आहुति शेष कर बल से जल को आलोडन करके उसका पान करे । इसका दूध अनुपान है । इसके जीर्ण होने पर यवान्न को दूध के साथ खावे । तीन मास दूध ही अन्नपान है । १. ' पञ्चाष्टौ इति च पाठ । २. ' मधुसमिश्रा ' इति च पाठः ।