श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 241–250
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 241–250
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पा ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २२० Mu wwwwwww मिलाकर प्रात: काल भोजन से पूर्व तथा पीछे तीन समय खाना चाहिये । इस प्रकार करने से कास, क्षय, श्वास, शोष, जिसकी, गले की बिमारिया, अर्श, ग्रहणी रोग, पाण्डु, विषम ज्वर, स्वरभंग, पीनस, शोफ, गुल्म और वात, कफजन्य रोग नष्ट होते हैं । [ पिप्पली प्रयोग में पाच से कम पिप्पली का भी प्रयोग कर सकते हैं । इसी प्रकार कफ की मात्रा अत्यधिक बढ़े होने पर प्रातः, मध्यावस्था में होने पर भोजन से पूर्व और कम होने पर भोजन के अन्त में देनी चाहिये । पिप्पली के अति सेवन से उत्पन्न दोष अन्य वस्तुओं के साथ सम्मिलित होने से उत्पन्न नहीं होते । भावना ' देते समय कम से कम सात भावना देनी चाहिये । ] ॥३३-३५ ॥
क्रमवृद्धया दशाहानि दशपैप्पलिकं दिनम् ।
वर्धयेत्पयसा सार्धं तथा चापनयेत्पुनः ॥ ३६ ॥
जीण जीर्णे च भुञ्जीत षष्टिकं क्षीरपिषा ।
पिप्पलीनां सहस्रस्य प्रयोगोऽयं रसायनम् ॥ ३७ ॥
पिष्टास्ता बलिभिः सेव्याः शृता मध्यबलैर्नरैः ।
शीतीकृता ह्रस्वबलैर्योग्या दोषामयान् प्रति ॥ ३८ ॥
दशपैप्पलिक श्रेष्ठो मध्यमः षट् प्रकीर्तितः ।
प्रयोगो यस्त्रिपर्यन्तः स कनीयान् स चाबलैः ॥ ३६ ॥
बृंहणं स्वर्यमायुष्य प्लीहोदरविनाशनम् ।
वयसः स्थापनं मेध्यं पिप्पलीना रसायनम् ॥ ४० ॥
इति पिप्पलीवर्धमानं रसायनम् । पिप्पली वर्धमान - एक दिन में दस पिप्पलियों का दूध के साथ सेवन करे । दुसरे दिन बीस का, और तीसरे दिन तीस का । इस प्रकार से प्रत्येक दिन दस दिनों तक दस दस पिप्पलिया बढ़ाता जावे । साथ में दूध की मात्रा भी बढ़ाता जाय [ पिप्पली- वर्धमान के प्रयोग में दूध की मात्रा एक प्रकुञ्च ( पल ) से आरम्भ करके प्रतिदिन एक एक प्रकुश्च बढानी चाहिये, फिर घटाने के साथ घटा देना चाहिये | ] दस दिन के पीछे ग्यारहवें दिन दस पिप्पली कम करे इस प्रकार से बीसवें दिन फिर दस पर ही आजावे । दूध की मात्रा भी कम
१ भावना विधि - दिवा दिवाऽऽतपे शुष्कं रात्रौ रात्रौ निवासयेत् ।
श्लक्ष्णचूर्ण कृत द्रव्य सप्ताह भावनाविधिः ॥
दिन में धूप में सूखे रात्रि में खुले आकाश के नीचे रहे ।
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२२८ चरकसंहिता [ अ ० १ करे । पिप्पली के जीर्ण होने पर साठी भात दूध और घी के साथ खावे । दोष और रोगों को देख कर बलवान् पुरुष पीसकर, मध्यम बलवाला क्वाथ बना कर और हस्व बलवाला शीत कषाय करके प्रयोग करे । दस पिप्पली के प्रयोग को श्रेष्ठ, छः पिप्पली के प्रयोग को मध्यम और तीन पिप्पली के प्रयोग को अवर कहते हैं । पिप्पली - रसायन पुष्टिदायक, स्वरवर्धक, आयुष्य, प्लीहा, उदर रोग का नाशक, आयु को स्थिर रखने वाली और बुद्धिवर्धक है ॥ ३६-४० ॥ [ गंगाधर कविराज ने छः पिप्पला तथा तीन पिप्पली का प्रयोग भी एक हजार तक लेजाने को कहा है । यथा - प्रथम दिन दस पिप्पली लेवे । दूसरे दिन बारह, इस प्रकार से तेरह दिन तक बढ़ाता जाये और फिर चौदहवें दिन से छः छ. कम करना आरम्भ करे । इस प्रकार से १०२४ पिप्पली का प्रयोग करे । तीन पिप्पली के प्रयोग में अट्ठारह दिन तक क्रमशः तीन तीन बढ़ाते जावें । उन्नीसवें दिन तीन घटा देवें । इस प्रकार से १०२८ पिप्पली का प्रयोग करें । दस पिप्पली का प्रयोग श्लैष्मिक रोगी के लिये, छः का वातिक और तीन का पैत्तिक रोगी के लिये है । सुश्रुत के मत से पिप्पलियों को दूध में पीस कर पांच, खात वा दस की वृद्धि से पान करे । दस दिन तक दूध भात खावे । दस दिन के बाद फिर घटा वे और घटाते २ पाच, सात और दस तक आजावे । ] ॥ ३६-४० ॥
जरणान्तेऽभयामेकां प्राग्भुक्ते द्वे बिभीतके ।
भुक्त्वा तु मधुसपिर्थ्याश्चत्वार्यामलकानि च ॥ ४१ ॥
प्रयोजयेत्समामेकां त्रिफलाया रसायनम् ।
जीवेद्वर्षशतं पूर्णमजरोऽव्याधिरेव च ॥ ४२ ॥
इति त्रिफलानां रसायनम् । त्रिफला रसायन - पूर्व किये भोजन के जीर्ण होने पर एक हरड़ प्रातःकाल, भोजन से पूर्व दो बहेड़ा और भोजन के पश्चात् चार ऑवले मधु और घी के साथ खावे [ इन द्रव्यों को कूटकर मधु और घी के साथ खाना चाहिये ] | इस रसायन का एक वर्ष तक प्रयोग करने से सौ बरस तक बुढ़ापा और रोगो से मुक्त होकर जीता है ॥ ४१-४२ ॥
त्रैफलेनायसीं पात्री कल्केनालेपयेन्नवाम् ।
तमहोरात्रिकं लेपं पिबेत्क्षौद्रोद काष्ठतम् ॥ ४३ ॥
प्रभूतस्नेहमशनं जीर्णे तत्र प्रशस्यते ।
अजरोऽरुक् समाभ्यासाज्जीवेश्चैव समाः शतम् ॥ ४४ ॥
इति त्रिफलारसायनमपरम् ।
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पा ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २२६ त्रिफला रसायन - लोहे के नये घड़े में त्रिफला को पीसकर लेप कर देना चाहिये । चौबीस घन्टे तक इसको लगा रहने देना चाहिये । फिर शहद के पानी में बने घोल मिलाकर पीना चाहिये । इसके जीर्ण होने पर बहुत सा स्नेह ( घी ) पान करना चाहिये । इसके एक साल तक प्रयोग करने पर जरा और रोगों से मुक्त होकर सौ बरम तक जाता है ॥ ४३-४४ ॥
मधुकेन तुगाक्षीर्या पिप्पल्या क्षौद्रसर्पिषा ।
त्रिफला सिता चापि युक्ता सिद्धं रसायनम् ॥ ४५ ॥
इति त्रिफलारसायनमरम् । त्रिफला रसायन - त्रिफला के साथ तुगाश्वीरो ( वशलोचन ) मुलहठी, पिप्पली, घी, मधु और शर्करा इन सबको एकत्र करके सेवन करे । यह एक सिद्ध रसायन है ' ॥ ४५ ॥
सर्वलो हैः सुवर्णन वचया मधुसर्पिषा ।
विडङ्गपिप्पलीभ्यां च त्रिफला लवणेन च ॥ ४६ ॥
संवत्सर प्रयोगेण मेव स्मृतिबलप्रदा ।
भवत्यायुष्प्रदा धन्या जरा । गनिबर्हणी ॥ ४७ ॥
इति त्रिफला रसायनमपरम् । त्रिफला रसायन — त्रिकल्प को सब धातुओं की भस्म ( स्वर्ण, रजत, ताम्र, वंग, सीसक, लोह, यशद ), स्वर्ण, वच, घी, शहद, वायविडंग, पिप्पली और सैन्धा नमक के साथ प्रयोग करे । इसके एक साल तक प्रयोग करने पर मेघा, स्मृति, बल, आयु बढती है, यह रसायन धन्य है तथा जरा और रोग को नष्ट करती है । [ यद्यपि सब धातुओं में स्वर्ण आ जाता है, तथापि पृथक् ग्रहण करने से पृथक् एक अश और डालना चाहिये ] ॥ ४७ ॥
१ कोई कोई आचार्य इनको छः योग मानते हैं । परन्तु संख्या बढ़ जाती है । २ सप्त धातु — स्वर्णतारारताम्राणि नागवंगौ च तीक्ष्णकम् घातत्रः सप्त विज्ञया अष्टमः क्वापि पारदः स्वर्ण तार च ताम्र च वड्डो नागस्तु पचमः रीतिका च तथा घाषो लोहं चेत्यष्टघातवः कविराज श्री गंगाधर सेन ने इनको भी पृथक् पृथक योग मानने से सख्या बढ़ जातो है । यह मानने से
।
॥
।
॥
माना है । ऐसा
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२३० चरकसंहिता अनम्लं च कषायं च कटु पाके शिलाजतु नात्युष्णशीतं धातुभ्यश्चतुर्भ्यस्तस्य संभवः
हेम्नश्च रजतात्ताम्रादूर कृष्णायसादपि ।
रसायनं तद्विधिभिस्तद्वृष्य तच्च रोगनुत् ॥
वातपित्तकफघ्नैस्तु निर्यूहैस्तत्सुभावितम् ।
वीर्योत्कर्ष परं याति सर्वैरेकेकशोऽपि वा ॥
प्रक्षिप्योधनमप्येनं पुनस्तत्प्रक्षिपेद्र से ।
कोष्णे सप्ताहमेतेन विधिना तस्य भावना ॥
शिलाजतु - शिलाजतु में अम्ल रस नहीं, कषाय रस है उसमें ईषद् अम्ल रस मानते हैं ) । विपाक मे कटु, वीर्य अत्यन्त उष्ण और न अत्यन्त शीत, चारों धातुओं ( स्वर्ण, रजत से, कोई २ आचार्यों के मत में त्रपु और सीसक ) से [ अ ० १
।
॥ ४८ ॥
४६ ॥
५२ ॥
५१ ॥
। ( कोई आचार्य में समान, न तो लाइ, ताम्र और यह उत्पन्न होता है । स्वर्ण, चांदी, ताम्र और उत्तम कृष्ण लोह से निकले शिलाजीत को विधि-पूर्वक प्रयोग करने पर यह उत्तम रसायन, वृष्य तथा रोगनाशक होता है । विशुद्ध शिलाजीत को वात, पित्त और कफनाशक औषधियों के क्वाथ से अथवा एक एक औषधि से भावना देने पर अधिक गुण बढ़ता है । [ रोगी के दोष आदि के अनुसार ओषधियों से भावना देनी चाहिये । भावनायें – स्वच्छ पानी से शोभित शिलाजतु में वातघ्न औषधियों का क्वाथ डालकर धूप में सुखा दे । जब सब पानी शुष्क हो जाये तब पुनः कोष्ण काथ डालना चाहिये । इस प्रकार से एक सप्ताह तक करना चाहिये । [ ( १ ) भावना देने के लिये शिलाजतु के बराबर क्वाथ द्रव्य लेकर आठ गुने जल में क्वाथ करना चाहिये । और जब अष्टमाश रह जाये तब छान कर कोष्ण शिलाजतु में डालना चाहिये । यह तो अष्टाग सग्रह का मत है । ( २ ) चक्रपाणि के अनुसार शिलाजतु के समान क्वाथ द्रव्य लेकर इसमें चौगुना पानी डालकर क्वाथ करना चाहिये । चतुर्थाश रहने पर छान लेना चाहिये इसकी भावना देनी चाहिये । ( ३ ) चारपाणि के नियम से शिलाजतु के समान क्वाथ द्रव्य लेकर इसमें अठगुणा पानी मिलाकर क्वाथ करना चाहिये । चतुर्थाश रहने पर छान लेना चाहिये ] || ४८ - ५१ ॥
पूर्वोक्तेन विधानेन लोवर्णीकृतैः सह ।
तत्पीतं पयसां दद्याद्दीर्घमायुः सुखान्वितम् ॥ ५२ ॥
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पा ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २३१ wwwwwwwwww
जराव्याधिप्रशमनं देहदाकर परम् ।
मेघास्मृतिकरं बल्यं क्षीराशी तत्प्रयोजयेत् ॥ ५३ ॥
पूर्वोक्त विधि से लौह आदि धातुओं के बनाये चूर्ण के साथ शिलाजीत मिलाकर दूध के साथ पीने से आरोग्ययुक्त दीर्घ आयु मिलती है । लोह आदि जितने धातु आवश्यक हों उन सबों को मिलाकर या पृथकू २ रूप में शिलाजीत १ ' के साथ उपयोग करे । [ धातुओं की भस्म त्रिफला क्वाथ के साथ बनाने का अष्टाग - सग्रह में उपदेश है ॥ परन्तु रस शास्त्र के आधार से बनी भस्में अधिक उपयोगी होंगी यह हमारी मान्यता है । ] शिलाजीत के प्रयोग के समय दूध का ही सेवन करना चाहिये । इसके सेवन से बुढापा और राग मिटते हैं, शरीर अतिशय दृढ़ होता है 1 । मेवा और स्मृति बढ़ता है, बल भी बढ़ता है ॥५२-५३ ॥
प्रयोगः सप्त समाहास्त्रयश्चैकश्च सप्तकः ।
निदिष्टस्त्रिविधस्तस्य परो मध्योऽवरस्तथा ॥ ५४ ॥
पल पल कर्षो मात्रा तस्य त्रिधा मता । शिलाजीत का प्रयोग तान प्रकार का है । यथा - पर, मध्य और अवर । इनमें सात सप्ताह तक प्रयोग करना ' पर ' प्रयोग, तीन सप्ताह तक प्रयोग करना ' मध्यम ', और एक सप्ताह तक प्रयोग करना अवर प्रयोग है । इसी प्रकार शिलाजतु की मात्रा भी तीन प्रकार की है । जसे - उत्तम मात्रा एक पल, मध्यम मात्रा आधा पल और अवर मात्रा एक कर्ष है । आजकल तो २ से 4 रती की मात्रा उचित रहेगा ॥ ५४ ॥
जातेर्विशेष सविध तस्य वक्ष्याम्यतः परम् ॥ ५५ ॥
हेमाद्याः सूर्यसन्तप्ताः स्रवन्ति गिरिधातवः ।
जत्वाभं मृदु मृत्स्नाच्छ यन्मल तच्छिलाजतु ॥ ५६ ॥
इसके आगे हम इस शिलाजतु का भिन्न २ जातिया कहते हैं-ग्रीष्म काल में स्वर्ण आदि धातुओं वाली शिलाओं में से सूर्य की गरमी से एक प्रकार का रस जो कि स्पर्श में लाख के समान होता है, ( रंग में नहीं ),
चूने लग जाता है, इसी काले से रंग को ' शिलाजतु ' ( शिलाजात ) कहते हैं ।
इसका रंग मिट्टी के समान होता है ॥ ५५-५६ ॥
१ जैसा ' संग्रह ' में कहा है – संस्कृत संस्कृत देहे प्रयुक्त गिरिजाह्वयम् ।
1 युक्त वयस्तैः समस्तैर्वा ताम्रायारूप्य हेमभिः ।
क्षारेणालोडित शीघ्रं फलं कुर्याद् रसायनम् ॥
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२३२ चरकसंहिता [ अ ० १ www
मधुरश्च सतिक्तश्च जपापुष्पनिभश्च यः ।
कटुविपाके शीतश्च स सुवर्णस्य निस्रवः ॥ ५७ ॥
रूप्यस्य कटुकः श्वेतः शीत. स्वादु विपच्यते 1 ताम्रस्य बर्हिकण्ठाभस्तितोष्णा पच्यते कटु ॥
यस्तु गुग्गुलुकाभासस्तिक्तको लवणान्वितः ।
कटुर्विपाके शीतश्च सर्वश्रेष्ठः स चायसः ॥
गोमूत्रगन्धयः सर्वे सर्वकर्मसु यौगिकाः ।
रसायनप्रयोगेषु पश्चिमस्तु विशिष्यते ॥
इनमें से स्वर्ण - शिलाजीत - तिक्तरसयुक्त मधुर, जपा ( समान लाल, विपाक में कटु, शीतवीर्य होता है । रौप्य ( चादी की शिला से निकला ) शिलाजीत --- कटु शीतवीर्य, विपाक में मधुर होता है । ताम्र ( ताँबे से निःसृत ) शिलाजीत - मोर की ग्रीवा ५८ ॥ ५६ ॥ ६० ॥ जासुदी ) फूल के रस, रंग में श्वेत, के समान नीली बॉंई लिये, तिक्त रस, उष्णवीर्य और विपाक में कटु होता है । आस ( लोह से निस्सृत ) शिलाजीत - गुग्गुल के समान काला, भूरा, तिक रस, लवण अनुरस, विपाक में कटु, शीतवीर्य होता है । यह शिलाजतु सब में श्रेष्ठ है । [ कहीं कहीं पर छः प्रकार के शिलाजतुओं का वर्णन है । वहॉ पर त्रपु और सीसक भी गिना है । ] इन सब शिलाजतु में गोमूत्र की गन्ध आती है, ये सब कार्यों में प्रयुक्त होते हैं । परन्तु रसायन कार्य में अन्तिम, आयस शिलाजीत ही अधिक श्रेष्ठ है ॥५७-६० ॥
यथाक्रमं वातपित्ते इलेष्मपित्त कफे त्रिषु ।
विशेषतः प्रशस्यन्ते मला हेमादिधातुजाः ॥ ६१ ॥
खास कर वात पित्त रोग में स्वर्ण शिलाजतु का, कफ - पित्त में रजत शिला-जतु का, कफ में ताम्र शिलाजतु का और वात - पित्त - कफ में का प्रयोग करना चाहिये ॥ ६१ ॥
शिलाजतुप्रयोगेषु विदाहीनि गुरूणि च ।
वर्जयेत्सर्वकालं तु कुलत्थान् ' परिवर्जयेत् ॥
ते अत्यन्तविरुद्धत्वादश्मनो भेदनाः परम् ।
लोके दृष्टास्ततस्तेषां प्रयोगः प्रतिषिध्यते ॥
१ ' कुनखानू ' इति च पाठः । आयस शिलाजतु ६२ ॥ ६३ ॥
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पा ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २३३ शिलाजीत के प्रयोग के समय विदाडी और गुरु पदार्थों का तथा कुलत्थी का एक साल तक ( अथवा जब तक शिलाजतु के गुण शरीर में हों तब तक ) सेवन नहीं करना चाहिये । क्योंकि लोक में हम यह स्पष्ट देखते हैं कि पत्थरों से अत्यन्त विरोध रखने के कारण कुलत्थ पत्थरों तक को फोड़ कर निकलते हैं । बंजर भूमि में, रोहाड़ों में ही कुलत्थी होती है । [ व्यायाम, धूप, वायु, ताप, काकमाची और कपोता ये भी वर्जनीय हैं और वर्षा का, कुएं का या
झरने का जल पथ्य है । अष्टाग संग्रह ] ॥ ६२-६३ ॥
पयसि शुक्तानि ' रसाः सयूषा-स्तोयं समुत्रं विविधाः कषायाः ।
आलोडनार्थं गिरिजस्य शस्ता-स्ते ते प्रयोज्याः प्रसमीक्ष्य कार्यम् ॥ ६४ ॥
शिलाजतु के आलोडन द्रव्य - दूध शुक्त, ( सिरका ), मास रस, यूष, जळ, गोमूत्र आदि मूत्र, नाना प्रकार के क्वाथ, दोष आदि की विवेचना करके, शिलाजतु के आलोडन में इनका प्रयोग करना चाहिये ॥ ६४ ॥
न सोऽस्ति रोगों भुवि साध्यरूपः शिलाह्वयं य न जयेत् प्रसह्य । तत्कालयोगविधिभिः प्रयुक्त स्वस्थस्य चोर्जां विपुलां ददाति ॥ ६५ ॥
इति शिलाजतुरसायनम् । इस पृथ्वी पर ऐसा कोई भी साध्य रोग नहीं है जिसको शिलाजतु उन उन अवस्थाओं के योग्य यागों के साथ विधिपूर्वक प्रयुक्त होने से बलपूर्वक नष्ट नहीं कर देता । वह स्वस्थ पुरुषों को भी पर्य्याप्त बल देता है ॥ ६५ ॥
तत्र श्लोकः - करप्रचितिके पादे दश षट् च महर्षिणा ।
रसायनानां सिद्धानां संयोगाः समुदाहृताः ॥ ६६ ॥
इस करप्रचितीय रसायन पाद में महर्षि ने सोलह सिद्ध रसायनों के प्रयोग कहे हैं ॥ ६६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सास्थाने करप्रचितीयो नाम रसायनपादस्तृतीयः । ' तक्राणि ' इति च पाठः ।
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२३४ चरकसंहिता [ अ ० १ ^ ( चतुर्थः पादः ) अथात आयुर्वेदसमुत्थानीयं रसायनपादं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्मा SS ह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब हम ' आयुर्वेद समुत्थानीय रसायन पाद ' की व्याख्या करते हैं, भग-वान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥ ऋषयः खल - कदाचिच्छालीना यायावराश्च ग्राम्यौषध्याहाराः सन्तः सांपनिका मन्दचेष्टाश्च नातिकल्याणाः प्रायेण बभूवुः । ते सर्वासामि -तिकर्तव्यतानामसमर्थाः सन्तो ग्राम्यवासकृतमात्मदोषं मत्वा पूर्वनि-वास - समपगत - प्राम्य - दोषं मत्वा शिव पुण्यमुदारं मेध्यमगम्य म सुकतिभि-गङ्गाप्रभवममर - गन्धवं यक्ष- किन्नरानु वरितमनेकरत्ननिचयमचिन्त्या-द्रुतप्रभावं ब्रह्मर्षि सिद्ध - चारणानुचरित दिव्य तीर्थौषधि प्रभवमतिश-रण्यं हिमवन्तममराधिपाभिगुप्तं जग्मुर्भुग्वङ्गिरोऽत्रि वशिष्ठ- कश्यपा-गस्त्य - पुलस्त्य - वामदेवासित- गौतम - प्रभृतयो महर्षयः ॥ २ ॥
पहिले किसा समय में शालीन ( घर बना कर रहनेवाले ) सुसम्पन्न और यायावर ( यज्ञशील ) ऋषि नागरिक जनों के आहार के सेवन करने से ऐश्वर्य-शाली पुरुषों के समान मन्द - क्रियाशील हो गये और प्रायः स्वस्थ न रहने लगे । उस समय वसिष्ठ, भृगु, अङ्गिरा, अत्रि, कश्यप, अगस्त्य, पुलस्त्य, वामदेव, असित, गौतम आदि महर्षि तपश्चर्या आदि कर्मों में असमर्थ हो गये । तत्र उनको पता चला कि ग्राम्य ( नगर ) निवास के कारण ही यह दोष उत्पन्न हुआ है । इसलिये वे अपने पुराने स्थान हिमालय में चले गये । यह हिमालय का स्थान ग्राम्य - सम्बन्धी दोषों से रहित, कल्याणकारी, पवित्र, उदार, पुण्य, पापियों से अगम्य, गंगा का उत्पत्तिस्थान, अमर ( देव ) गन्धव, यक्ष, किन्नर और चरणों से सेवित, अनेक रत्नों का खजाना, अचिन्त्य और आश्चर्यमय प्रभाव से युक्त, ब्रह्मर्षि, सिद्ध, चारणों की सचार भूमि, दिव्य तीर्थं और दिव्य औषधियों का उत्पत्ति स्थान, अतिशरण्य देवराज इन्द्र से सुरक्षित था ॥ ३ ॥
वानिन्द्रः सहस्रहगमरगुरुवरोऽब्रवीत् - स्वागतं, ब्रह्मविदां ज्ञानत-पोधनानां ब्रह्मर्षीणामस्ति मनोग्लानिरप्रभावत्व वैस्वर्यं वैवण्यं च प्राम्य-वासकृतमसुखमसुखानुबन्धं च । ग्राम्यो हि वासो मूलमशस्तानाम् । तत्कृतः पुण्यकृद्भिरनुग्रहः प्रजानां स्वशरीरमरक्षिभिः । कालश्चायमायु-वेदोपदेशस्य । ब्रह्मर्षीणामात्मनः प्रजानां चानुप्रहार्थमायुर्वेदमश्विनौ मह्यं प्रायच्छतां प्रजापतिरश्विभ्यां च ब्रह्मा, प्रजानामल्प-
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पा ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् २३५ मायुर्जराव्याधि - बहुलमसुख सुखानुबन्ध मल्पत्वादल्प तपो दम - नियम-दानाध्ययन - संचयं मत्वा पुण्यतममायुःप्रकर्षकरं जराव्याधि- प्रशमन-मूर्जस्करममृतं शिवं शरण्यमुदात्तं मत्तः श्रातुमर्हथोपधारयितुं प्रकाश-यितुं च प्रजानुप्रहार्थमाष ' ब्रह्मचर्यं प्रति मैत्री कारुण्यमात्मनश्चानु-त्तमं पुण्यमुदारं ब्राह्ममक्षयं कर्मेति ॥ ४ ॥
इन महर्षियों को सहस्र- चतु, श्रेष्ठ, देवगुरु इन्द्र ने कहा- आपका स्वागत हो । ब्रह्मज्ञानी ज्ञान और तप क धनी आप ब्रह्मर्षियों में मन की बेचैनी, प्रभाव, कान्ति का न होना, स्वरविकार, विवर्णता, नागरिकनिवास में उत्पन्न रोग, इन रोगों से सम्बद्ध अन्य रोग भी दिखाई पड़ते हैं । सब अधर्म, पाप और रोग आदि बुराइयों का मूल कारण नगर निवास ही है । आप पुण्यकर्मा जनों ने अपने शरीर की परवाह न करके भी अन्य प्रजाओं का बड़ा उपकार किया है और आयुर्वेद के उपदेश के लिये यही उत्तम समय है । इस आयुर्वेद को ब्रह्मा ने प्रजापति को, प्रजापति ने दोनों अश्त्रियों को, दानों अश्वियों ने ब्रह्म-र्षियों को, अपने और प्रजाजनों के लाभ के लिये मुझे प्रदान किया था । प्रजा-जनों की आयु छोटी है, वह भी बुढ़ापा, रोग, अनारोग्य आदि दुःखों से भरी है । आयु के थोड़ा होने से इनका तप, दम, नियम, दान, अध्ययन आदि का सचय भी थोड़ा होता है । यह जानकर तुम मुझमे पुण्यतम, आयु को लम्बा करने वाले, बुढ़ापे और रोग को मिटाने वाले, ओज को बढ़ाने वाले, अमृत के समान, कल्याणकारी शरण लेने योग्य, उदार आयुर्वेद को सुनो । [ इन्द्र की सभा में सहस्रों ऋषि इन्द्र के सहस्र चतु थे । ] सुनकर उसे हृदयगम करके प्रजा की भलाई के लिये आर्ष सत्त्व, ब्रह्म-चर्य के लिये प्राणियों पर मैत्री और करुणाभाव तथा अपने निज श्रेष्ठ पुण्य, उदार, ब्रह्म ( ज्ञान ) सम्बन्धो अक्षय कर्म को प्रकाशित करने के लिये इस आयुर्वेद का श्रवण करो ॥ ४ ॥
तच्छ्रुत्वा विबुधपतिवचनमृषयः सर्व एवामरवरमृग्भिस्तुष्टुवुः प्रहृष्टाश्च तद्वचनमभिननन्दुश्चेति ॥ देवराज इन्द्र के वचनों का सुन कर सब ऋषियों ने ऋचा से इन्द्र की स्तुति की और पुलकित होकर इन्द्र के बचनों का अभिनन्दन किया ॥ ५ ॥
1. अथेन्द्रस्तदायुर्वेदामृतमृषिभ्यः संक्राम्योवा चैतत्सर्वमनुष्ठेयम् । अयं च शिवः कालो रसायनानां दिव्याश्चौषधयो हिमवतः प्रभवाः प्राप्तवीर्याः, " तद्यथा - ऐन्द्री ब्राह्मी पयस्या क्षीरपुष्पी श्रावणी महाश्रावणी
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२३६ चरकसंहिता [ अ ० १ शतावरी विदारी जीवन्ती पुनर्नवा नागबला स्थिरा वचा छत्राऽति-च्छत्रा मेदा महामेदा जीवनोयाश्चान्याः पयसा प्रयुक्ताः षण्मासा-त्परमायुर्वयश्च तरुणमनामयत्वं स्वरवर्णसंपदमुपचयं मेधां स्मृतिमु-तमबलमिष्टाश्चापरान् भावानावहन्ति सिद्धा. ॥ ६ ॥
इतीन्द्रोक्तं रसायनम् । इन्द्रोक्त रसायन -- इसके पीछे इन्द्र ने ऋषियों को आयुर्वेदामृत का उपदेश किया । इस सम्पूर्ण आयुर्वेद का पालन करना चाहिये । रसायन सेवन करने का यह पुण्य कल्याणकारी समय है । इस समय हिमालय में उत्पन्न होने वाली सब दिव्य औषधिया वीर्य से परिपूर्ण हैं । जैसे—– ऐन्द्री, ब्राह्मी, पयस्या ( वीर - विदारी ), श्रीरपुष्पी, श्रावणी ( गोरखमुण्डी ), महाश्रावणी, शतावरी, विदारीकन्द, जीवन्ती, नागबला, स्थिरा ( शालपर्णी ), वचा, छत्रा, अतिछत्रा, मेदा, महामेदा, जीवनीय गुण की अन्य ओषधिया ( काकोली, क्षीर-काकोली, जीवक, प्रभक, मुलहठी, मुद्गपर्णी, माषपर्णी ), इनको दूध के सोथ छः मास तक यथाविधि प्रयोग करने पर दीर्घ आयु, तरुण वय, नीरोगता, स्वर और वर्ण की शुद्धता, वृद्धि, मेघा, स्मृति, उत्तम बल तथा अभिलषित बातों की प्राप्ति होती है * ॥ ६ ॥
ब्रह्मसुवर्चलानामौषधिर्या हिरण्यक्षीरा पुष्कर - सह - पत्रा, आदि-त्यपण नामौषधि सूर्यकान्तेति विज्ञायते सुवर्ण - वर्ण क्षीरा सूर्यमण्ड-लाकारपुष्पा च, नारी नामौषधिरश्वबलेति विज्ञायते या बल्बजसदृश-पत्रा, काष्ठगोधा नामौषधिर्गोधाकारा, सर्पा नामौषधिः सर्पाकारा, * कविराज श्री गंगाधर सेन ने ' ऐन्द्री ' का अर्थ इन्द्रायण किया है । छत्रा और अतिछत्रा का अर्थ डल्हण ने ' द्रोणपुष्पी द्वय ' किया है । वैसे सोया और सौंफ भी होता है ।
श्रावणी - अरत्निमात्रक्षुपका पत्रैद्वर्थेगुलसम्मितैः ।
पुष्पैर्नीलोत्पलाकारैः फलैचाञ्जनसन्निभैः ॥
श्रावणी महती ज्ञेया कनकाभा पयस्विनी । श्रावणी पाण्डुराभासा महाश्रावणिलक्षणा । श्रावणी का एक हाथ भर का पौधा और दो दो अंगुल के पत्ते होते हैं । नील कमल के से आकार के फूल और अजन के समान काले फल होते हैं । महाभावणी स्वर्ग के समान पीले रंग के रस की होती है और श्रावणी का रस श्वेत होता है ।