श्रीगणेशाय नमः।

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 251–260

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 251–260

पृष्ठ 251

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पा ० ४ । चिकित्सितस्थानम २३७ सोमो नामौषधिराजः पञ्चदशपर्णः स सोम इव हीयते वर्धते च पद्मा नामौषधिः पद्माकारा, पद्मरक्ता, पद्मगन्धा च, अजा नामौषधिस्तु नीलक्षीरा, नीलपुष्पा लताप्रतानबहुला, इत्यासामष्टानामोषधीनां यां यामेवोपलभेत तस्यास्तस्याः स्वरसस्य सौहित्यं गत्वा स्नेहभाविवायामा-पलाश - द्रोण्यां सपिधानायां दिग्वासाः शयीत, तत्र प्रलीयते षण्मासेन पुनः पुनः संभवति, तस्याजं पयः प्रत्यवस्थापनं, षण्मासेन देवतानुकारी भवति वयो वर्ण स्वराकृति - बल- प्रभाभिः, स्वयं चास्य सर्ववाचोगतानि प्रादुर्भवन्ति दिव्यं चास्य चक्षुः श्रोत्रं भवति, गतिर्योजन सहस्रं, दश-वर्षसहस्राण्यायुरनुपद्रवं चेति ॥ ७ ॥

इति द्रोणीप्रावेशिकरसायनम् । द्रोणीप्रावेशिक रसायन - ब्रह्मसुवर्चला नाम की जो ओषधि है, उसका दूध स्वर्ण के समान पीला, पत्ते पुष्कर ( कमल ) के समान होते हैं । आदित्यपर्णी नाम की जो ओषधि सूर्यकान्ता के नाम से प्रसिद्ध है, इसका दूध ( रस ) पीला होता है और इसका पुष्प सूर्य मण्डल के समान होता है । नारी नाम की ओषधि अश्वबला के नाम से जानी जाती है इसके पत्ते बल्वज ( तृण विशेष ) के समान होते हैं । काष्ठगोधा नामक ओषधि का आकार गोधा ( गोह ) के समान होता है । सर्पा नाम की ओषधि सर्प के समान आकार की है । सोम नामक ओषधि सब ओषधियों का राजा ( श्रेष्ठ ) है । इसके पन्द्रह पचे होते हैं । यह ओषधि चन्द्रमा के साथ साथ शुक्ल पक्ष में बढ़ती है और कृष्ण पक्ष में उसी के साथ साथ ह्रास हो जाती है । पद्मा नाम की ओषधि कमल के आकार की रक्त कमल के समान लाल वर्ण और कमल के समान गन्ध वाली है । अजा नाम की ओषधि को ' अजभृंगी ' कहते है | नीला नाम की ओषधि का दूध नीला, फूल भी नीले तथा इसका फैलाव बहुत होता है ' । १ सुश्रुत में इन दिव्य ओषधियों का कुछ वर्णन आया है जैसे—

कनकाभा जलान्तेषु सर्वतः परिसर्पति ।

क्षीरा पद्मिनी प्रख्या देवी ब्रह्मसुवर्चला ॥

मूलिनी पचभिः पत्रैः सरक्ताशुककोमलैः ।

आदित्यपणी विज्ञेया सदादित्यानुवर्त्तिनी ॥

कान्तैर्द्वादशभिः पत्रैः मयूरागरुहोपमैः ।

कन्दजा काञ्चनचीरा कन्या नाम महौषधिः ॥

काश्मीरेषु सरो दिव्य नाम्ना क्षुद्रकमानसम् ।

पृष्ठ 252

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२३८ चरकसंहिता [ अ ० १ ^ इन आठ ( नवीं सोम ) ओषधियों में जो जो भी ओषधि मिल सके उसका स्वरस पेट भर कर पीना चाहिये । फिर घी, तैल आदि स्नेह से भावित, ताजे ( गीले ) ढाक की लकड़ी से बनी, ढक्क 1 से युक्त द्रोणी ( नांद ) में नंगा होकर लेट जाना चाहिये । वहा पर वह छः मास तक अचेत रहता है । [ छः मास के पीछे आहार सेवन से सज्ञा - लाभ होता है ] । इस समय बकरी के दूध से इसे स्वस्थ रखना चाहिये । [ छ मास के पीछे वह करेणुस्तत्र कन्या च छत्रातिच्छत्र के तथा ॥

मण्डलैः कपिलैश्वित्रैः सर्पाभा पचपर्णिनी ।

पचारत्निप्रमाणा वा विज्ञयाजगरी बुधै. ॥

es जगरी नित्य गोनसी चाम्बुदागमे ।

अजास्तनाभकन्दा तु क्षीरा क्षुपरूपिणी ॥

अजा महौषधिर्ज्ञेया शखकुन्देन्दुपाण्डुरा ।

छत्रातिच्छत्र के विद्याद् रक्षोघ्ने कन्दसम्भवे ॥

जरामृत्युनिवारिण्यौ श्वेतकापोतसस्थिते । वय, वर्ण, स्वर, सुश्रुत ० चि ० अ ० ३० । ( १ ) ब्रह्म सुवर्चला पीले से, स्वर्ण तुल्य रंग की, जल के स्थानों के तीर पर फैला करते हैं । वह दूध वाली पद्मिनी के समान होती है ( २ ) आदित्य पर्णी - मूलवाली, खूब लाल नाडियों वाले कोमल २ पाच पत्तों वाली, सदा सूर्य के अनुसार रहती है । ( ३ ) कन्या – - सुन्दर मोर के पॉखों के समान १२ पत्र होते हैं, मूल में एक छोटा सा गोल कन्द होता है दूध सोने के समान पीला होता है । काश्मीर में क्षुद्रक मानस ( छोटा मानसरोवर ) नामक एक दिव्य बड़ा तालाब है । वहा करेणु, कन्या, छत्रा अति छत्रा नाम की ओषधिया उत्पन्न होती हैं । ( ४ ) अजगरी - पीले चितकबरे, गोल २ चकत्तों में चित्रित, उसका रूप साप के सामान होता है, उसके पाच पत्रो होते हैं, उसकी लम्बाई भी पाच बालिश्त होती है, वर्षा काल में वह दीखती है । ( ५ ) गोनसी - इसी प्रकार गोनसी नाम की ओषधि भी वर्षा काल में ही दीखती है । ( ६ ) अजा - अजा ओषधि शख या कुन्द के पुष्प के समान श्वेत रंग की है, उसका छोटा सा पौधा होता है, जड़ में बकरी के स्तन के समान कन्द होता है । ( ७-८ ) छत्रा और अतिछत्रा ये दोनों कन्द से उत्पन्न होती हैं श्वेत कबूतर के समान दिखाई देती हैं, वे दोनों दुष्ट आत्माओं के बुरे प्रभाव को नाश करने वाली, बुढ़ापा और मौत को दूर करती हैं ।

पृष्ठ 253

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पा ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् २३६ आकृति, जल और प्रभा में देवताओं की तुलना करने लगता है ] सत्र विद्यायें, भाषायें स्वयं ही उपस्थित हो जाती हैं ( वह उनको जान जाता है ) । कान और आंखें दिव्य हो जाती हैं, एक हजार योजन तक विना थके चल सकता है, विना रोग आदि उपद्रवों के एक हजार वर्ष की आयु भोगता है । * [ दूध देने के लिये ढक्कन में सुख की सीध में छेद बना कर नाली द्वारा दूध देना चाहिये । जिससे वह लेटा लेटा दूध पी सके । श्वास के लिये अन्य छिद्र रखने चाहियें ] ॥ ७ ॥

भवन्ति चात्र — दिव्यानामौषधीनां य प्रभावः स भवद्विधैः ।

शक्यः सोढुमशक्यस्तु स्यात् सोढुमकृतात्मभिः ॥

ओषधीनां प्रभावेण तिष्ठतां स्वे च कर्मणि ।

भवतां निखिल श्रेय. सर्वमेवोपपत्स्यते ॥ ६ ॥

वानप्रस्थैर्गृहस्थैश्च प्रयतैर्नियतात्मभिः ।

शक्या ओषधयो ह्येताः सेवितु विषयाभिजाः ॥

तासु क्षेत्रगुणैस्तेषां मध्यमेन च कर्मणा ।

मृदुवीर्यतया तासा विधिर्ज्ञेयः स एव तु ॥ ११ ॥

पर्येष्टं ताः प्रयोक्तं वा येऽसमर्थाः सुखार्थिनः ।

रसायनविधिःतेषामयमन्यः प्रशस्यते ॥ १२ ॥

दिव्य औषधियों का जो प्रभाव है, उसको आप जैसे ही हैं । पापी पुरुषों के लिये उनका सहन करना असम्भव है ८ ॥ १० ॥ सहन कर सकते । अपने मार्ग में ( शम, तप आदि साधन करते हुए ) स्थिर रहते हुए औषधियों के प्रभाव से आप लोगों को सम्पूर्ण श्रेय प्राप्त हो जायेगा । वानप्रस्थी, गृहस्थी तथा जो प्रयत्नशील और संयमी पुरुष हैं, वे भी अपने योग्य पुण्य देश मे उत्पन्न औष-धियों का सेवन कर सकते है | दिव्य औषधियाँ अपुण्य देश में उत्पन्न होती ही नहीं, यदि कदाचित् हो जायें तो निर्वीर्य हो जाती हैं । इन साधारण देशों में उत्पन्न दिव्य औषधियों का वीर्य हिमालय की औषधियों से मृदु ( हीन ) रहता है | इसका कारण क्षेत्र ( जहाँ पर ये उत्पन्न होती हैं ), गुण और कर्म ( जरा, व्याधि - नाश रूप ) का मध्यम होना है । इनके प्रयोग की विधि वही है, जो कि हिमालय में उत्पन्न औषधियों की है । सुख, आरोग्य को चाइने वाले जो व्यक्ति इन दिव्य औषधियों को ढूंढने या प्रयोग करने की मेहनत नहीं कर सकते उनके लिये दूसरी रसायन विधि हितकर है ॥ ८-१२ ॥ * प्रलीयते का अर्थ अदृश्य होना भी कहते हैं ।

पृष्ठ 254

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२४० चरकसंहिता wwwww

बल्यानां जीवनीयानां बृहणीयाश्च या दश ।

वयसः स्थापनानां च खदिरस्यासनस्य च ॥ १३

खर्जूराणां मधूकाना मुस्तानामुत्पलस्य च ।

मृद्वीकानां विडङ्गानां वचायाश्चित्रकस्य च ॥ १४

शतावर्याः पयस्यायाः पिप्पल्या जोड्नकस्य च । [ अ ० १ ॥ ॥ ऋद्धया नागबलायाश्च हरिद्राया धवस्य च ॥। १५ ॥ त्रिफलाकण्टकार्योश्च विदार्याश्वन्दनस्य च इक्षूणा शरमूलाना श्रीपर्ण्यास्तिानस्य च ॥ १६

रसाः पृथक् पृथग्ग्राह्याः पलाशक्षार एव च ।

एषां पलोन्मितान् भागान् पयो गव्यं चतुर्गुणम् ॥

द्वे पात्रे तिलतैलस्य द्वे च गव्यस्य सर्पिषः ।

तत्साध्यं सर्वमेकत्र सुसिद्धं स्नेहमुद्धरेत् ॥ १८ ॥

तत्रामलक चूर्णानामाढकं शतभावितम् ।

स्वरसेनैव दातव्य क्षौद्रस्याभिनवस्य च ॥ १६ ॥

शर्कराचर्णपात्र च प्रस्थमेकं प्रदापयेत् ।

॥

१७ ॥

तुगाक्षीर्याः पिप्पल्याः स्थाप्यं संमूच्छितं च तत् ॥ २० ॥

सुचौ मातिके कुम्भे मासार्धं घृतभाविते ।

मानामग्निसमां तस्य तत ऊर्ध्वं प्रयोजयेत् ॥ २१

हेमताम्रप्रवालानामयसः स्फटिकस्य च ।

मुक्तावदूर्यशङ्खानां चूर्णाना रजतस्य च ॥ २२ ॥

प्रक्षिप्य षोडशी मात्रां विहायायासमैथुनम् ।

जीर्णे जीर्णे च भुञ्जीत षष्टिकं क्षीरसपिया ॥ २३

सर्वरोगप्रशमन वृष्यमायुष्यमुत्तनम् ।

सत्त्वस्मृतिशरीराग्निबुद्धीन्द्रियबलप्रदम् ॥ २४ ॥

परमूर्जंस्करं चैव वर्णस्वरकरं तथा ।

विषालक्ष्मोप्रशमन सर्ववाचोगतप्रदम् ॥ २५ ॥

॥

॥

सिद्धार्थतां चाभिनवं वयश्च प्रजाप्रियत्व च यशश्च लोके ।

प्रयोज्यमिच्छद्भिरिदं यथावद्रसायनं ब्राह्ममुदारवीर्यम् ॥ २६ ॥

इतीन्द्रोक्तरसायनमपरम् । इन्द्रोक्त रसायन - सूत्रस्थान में वर्णित बल्य, जीवनीय, बृंहणीय और वयःस्थापक गण की सब दस औषधिया, खैर, असन, खजूर, महुवा, मोथा,

पृष्ठ 255

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पा ० ४ ] १६ चिकित्सितस्थानम् २४१ नीला कमल, काली द्राक्षा, वायविडंग, चीता, बच, शतावरी, पयस्या ( वीर-विदारी ), निष्पली, जोडक ( अगरू ), ऋद्धि, नागबला, द्वारदा ( सागोन, हरिद्रा पाठान्तर में हल्दी ), घव, त्रिफला, कण्टकारी, विदारी, लाल चन्दन, गन्ने की जड़, सरकण्डे की जड़, श्रीपर्णी ( गम्भारी ), तिनिश ( आबनूस, रथद्रुम ), इनका पृथक् पृथक् रस ३२ प्रस्थ, कल्कार्थ पकाय क्षार १ पल, गाय का दूध १२८ प्रस्थ, तिल तेल १६ प्रस्थ, गोघृत १६ प्रस्थ इनका यथा-विधि स्नेहपाक करके छान लेना चाहिये । इन छने स्नेह में आवलों के रस से सौबार भावना दिये आवले का चूर्ण एक आढक मिला देना चाहिये । फिर ताजा शहद दो आढक, शर्करा चूर्ण एक आढक, बसलोचन और पिप्पली प्रत्येक ६४ तोले, मिलाकर आलोड़ित कर देना चाहिये । फिर घी से भावित मिट्टी के पात्र में पन्द्रह दिनों तक रख देना चाहिये । पीछे से स्वर्ण, ताम्र, प्रवाल ( मूगा ), लोह, स्फटिक ( बिल्डोर ), माती, वैडूर्य ( लहसुनिया ), शंख और चादी इनकी भस्मों का एक का १६ वा भाग मिलाना चाहिये । इसके पश्चात् अग्नि बल के अनुसार इसका प्रयोग करना चाहिये । ( आमलकादि चूर्णयुक्त घृत की अपेक्षा से एक का १६ वा भाग लेना चाहिये ) । इसके सेवन करते समय परिश्रम और मैथुन का त्याग करना चाहिये । मात्रा के जीर्ण होने पर साठी के चावलों को दूध और घो के साथ खाना चाहिये ' । यह रसायन सब रोगों को नाश करता है, शुक्रवर्धक, आयुवर्द्धक श्रेष्ठ है । सत्त्व, स्मृति, कायाग्नि, बुद्धि और इन्द्रियों के बल को बढ़ाता है । विष तथा दरिद्रता को दूर करता है । सब वाणियों को उपस्थित कर देता है । कामना सिद्धि, नूतन वय ( तारुण्य ), जनता में सत्कार, ससार में यश चाहने वाले को इस हाल तथा उदार वीर्य रसायन का विधिपूर्वक सेवन करना चाहिये ॥ १३-२६ ॥

समर्थानामरोगाणा धीमता नियतात्मनाम् ।

कुटीप्रवेशः क्षमिणां परिच्छदवता हितः ॥ २७ ॥

अतोऽन्यथा तु ये तेषा सौयमारुतिको विधिः ।

ताभ्यां श्रेष्ठतरः पूर्वो विधिः स तु सुदुष्करः ॥ २८ ॥

रसायनविविभ्रशाज्जायेरन् व्याधयो यदि ।

यथास्वमौषधं तेषां कार्यं मुक्त्वा रसायनम् ॥ २६ ॥

१ षोडशी का अर्थ गंगाधर सन के मत से सम्पूर्ण ओषध का एक का १६ वा भाग प्रत्येक भस्म लेना किया है । जयदेव ने षोडशी का अर्थ एक पल किया है । इसमें प्रमाण -- ' प्रकुञ्च षोडशी बिल्व पलकं वात्र कीर्त्यते ' दिया है ।

पृष्ठ 256

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२४२ चरकसंहिता [ अ ० १ जो पुरुष समर्थ ( शक्तिशाली, ऐश्वर्यवान् ) हों, नीरोगी हों, बुद्धिमान हों और जितेन्द्रिय हों, तथा अपने कार्य धधे मे स्वतंत्र हों, क्षमाशील हों और साधनों से सम्पन्न हों उनके लिये कुटी - प्रावेशिकविधि हितकारी है । इन उप-रोक्क गुणों से जो रहित हों उनके लिये सूर्य मारुतिक ( वातात पिक ) विधि हितकारी है । इन दोनों विधियों में कुटीप्रावेशिक विधि अधिक श्रेष्ठ और करने में अति दुष्कर है रसायन विधि के मिथ्या आचरण से यदि कोई रोग उत्पन्न हो जाय, तो तुरन्त रसायन का प्रयोग छोडकर रोगानुसार औषध करनी चाहिये ॥ २७-२६ ॥

सत्यवादिनमक्रोधं निवृत्तं मद्यमैथुनात् ।

अहिसकमनायास प्रशान्तं प्रियवादिनम् ॥ १० ॥

जप शौचपर दृ धीरं दाननित्यं तपस्विनम् ।

देवगोब्राह्मणाचार्यगुरुवृद्धार्चने रतम् ॥ ३१ ॥

आनृशस्यपरं नित्यं नित्यं करुणवेदिनम् ।

समजागरणस्वप्नं नित्यं क्षीरघृताशिनम् ॥ ३२ ॥

देशकालप्रमाणज्ञं युक्तिज्ञमनहंकृतम् ।

शस्ताचारमसंकीर्णमध्यात्मप्रवणेन्द्रियम् ॥ ३३ ॥

उपासितारं वृद्धानामास्तिकानां जितात्मनाम् ।

धर्मशास्त्रपरं विद्यान्नरं नित्यरसायनम् ॥ ३४ ॥

गुणैरेतैः समुदितै प्रयुङ्क्ते यो रसायनम् । रसायनगुणान् सर्वान् यथोक्तान् स समश्नुते । इत्याचाररसायनम् । आचार- रसायन - सत्यवादी, क्रोध न करनेवाले मद्य मैथुन से पृथक्, अहिंसक ( मन, वचन, कर्म से ), अनायास [ श्रम न करनेवाले ], शान्त, प्रियवादी, यज्ञ- पवित्रता के पालक, धीर, दानी, तपस्वी, द्वन्द्व को सहनेवाले, देवता, गौ, ब्राह्मण, आचार्य, गुरु, इनकी पूजा में सदा तत्पर, नित्य क्रूरता से परे, सदा प्राणियों पर करुणा भाव रखनेवाले, युक्त मात्रा में सोने और जागने वाले, नित्य दूध और घी को खानेवाले, देश, काल मात्रा को जाननेवाले, युक्ति को समझनेवाले, अहंकार से शून्य, सदाचार युक्त, असंकीर्ण ( उदारचेता ) - आत्मज्ञान की ओर झुके, वृद्ध पुरुषों आस्तिकों तथा जितात्मा पुरुषों के पास बैठने वाले, उनकी सेवा में तत्पर, नित्य धर्मशास्त्र का पाठ करनेवाले तथा १. ' याज्यशौच ' इति च पाठः ।

पृष्ठ 257

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पा ० ४ ] चिकित्सतस्थानम् २४३ अनुष्ठान करने वाले व्यक्ति को सदा रसायनसेवी ही जाने । इन सद् वृत्तों के पालनसे रसायनका सेवन करता है, उसको रसायन के पूर्ण गुण मिलते हैं ॥ ३० ३५ ॥

यथा स्थूलमनिर्वाह्यदोषान्शारीरमानसान् ।

रसायन गुणैर्जन्तुर्युज्यते न कदाचन ॥ ३६ ॥

योगा ह्यायुःप्रकर्षार्था जरारोगनिबर्हणाः ।

मनःशरीरशुद्धानां सिध्यन्ति प्रयतात्मनाम् ॥ ३७ ॥

तदेतन्न भवेद्वाच्यं सर्वमेव हतात्मसु ।

अरजोभ्यो ' द्विजातिभ्यः शुश्रूषा येषु नास्ति च ॥ ६८ ॥

ये रसायनसयोगा वृष्ययोगाश्च ये मताः ।

यच्चौषधं विकाराणा सर्वं तद्वैद्यसश्रयम् ॥ ३६ ॥

प्राणाचार्य बुधस्तस्माद्धीमन्तं वेदपारगम् ।

अश्विनाविव देवेन्द्रः पूजयेदतिशक्तितः ॥ ४० ॥

शारीरिक एवं मानसिक दोषों को दूर किये विना जो व्यक्ति रसायन का सेवन करता है, वह रसायन के मोटे मोटे गुणों को छोड़कर शेष सूक्ष्म गुणों को प्राप्त नहीं करता । आयु को लम्बा करनेवाले तथा बुढ़ापे को दूर करने वाले रसायन के प्रयोग उन्हीं पुरुषों में सफल होते हैं, जो जितेन्द्रिय हैं, जिनके शरीर और मन शुद्ध हैं । जिनका आत्मा सदा पापों में लिप्त रहता हो उनको रसायन विधि नहीं सुनानी चाहिये | जो द्विज ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ) पीड़ा से हीन, शारीरिक, मानसिक रोग, रज, तम आदि से रहित हों, जो श्रद्धा से रसायन के गुणों को सुनना नहीं चाहते, उनको भी नहीं बताना चाहिये । जो रसायन के योग हैं, और जो वृष्य प्रयोग हैं, तथा जो ज्वरादि रोगों की औषध हैं, ये सब वैद्य के ही अधान है । इसलिये विद्वान् का कर्त्तव्य है कि बुद्धिमान वेद ( आयुर्वेद ) में निष्ठ, प्राणाचार्य ( वैद्य ) का पूर्ण शक्ति के साथ ऐसे पूजन- सत्कार करे जिस प्रकार कि देवराज इन्द्र ने अश्वियों की पूजा की थी || २६-४० ॥

अश्विनौ देवभिषजौ यज्ञवाहाविति स्मृतौ ।

यज्ञस्य हि शिरश्छिन्नं पुनस्ताभ्या समाहितम् ॥ ४१ ॥

- प्रशीर्णा दशनाः पूष्णो नेत्रे नष्टे भगस्य च ।

वज्रिणश्च भुजस्तम्भस्ताभ्यामेव चिकित्सितः ॥ ४२ ॥

१. ' अरुजेभ्यो ' इति च पाठः । २. ' दक्षस्य ' इति च पाठः ।

पृष्ठ 258

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२४४ चरकसंहिता M

चिकित्सितस्तु ' शीताशर्गृहीतो राजयक्ष्मणा ।

सोमाभिपतितश्चन्द्रः कृतस्ताभ्यां पुनः सुखी ॥

भार्गवश्च्यवनः कामी वृद्धः सन् विकृतिं गतः वीतवर्णस्वरोपेतः कृतस्ताभ्यां पुनर्युवा ॥ ४४ एतैश्चान्यैश्च बहुभि कर्मभिर्भिषगुत्तमौ । [ अ ० १ ४३ ॥

।

॥

बभूवतुर्भृश पूज्याविन्द्रादीनां महात्मनाम् ॥ ४५ ॥

महाः स्तोत्राणि मन्त्राणि तथाऽन्यानि हवींषि च ।

धूमाश्च पशवस्ताभ्यां प्रकल्प्यन्ते द्विजातिभिः ॥

प्रातश्च सवने सोमं शक्रोऽश्विभ्या सहाभूते ।

सौत्रामण्यां च भगवानश्विभ्यां सह मोदते ॥

इन्द्रानी चाश्विनौ चैव स्तूयन्ते प्रायशो द्विज स्तूयन्ते वेदवाक्येषु न तथाऽन्या हि देवताः ॥

अमरैरज रेस्तावद्विबुधैः साधिपैर्धव. ।

पूज्येते प्रयतरेवमश्विनौ भिषजाविति ॥ ४६ ॥

मृत्युव्याधिजरावश्यैर्दुःखप्रायैः सुखार्थिभिः ।

कि पुनभिषजो मत्यैः पूज्याः स्युर्नातिशक्तितः ॥

४६ ॥

४७ ॥

।

४८ ॥

५० ॥

अश्वियों के कार्य — देवों के चिकित्सक अश्वियों को यज्ञवाहक कहा जाता है । जब तक इनको भाग नहीं मिलता तब तक कोई भी यज्ञ पूर्ण नहीं होता! प्राचीन काल मे दक्ष ( यज्ञ ) का शिर कट गया था, इन्होंने ही फिर से उसको जोड़ा था । पूषा के दात टूट गये थे, भग की आँखें नष्ट हो गई थीं, इन्द्र को भुजस्तम्भ होगया था इन अवियों ने ही सब की चिकित्सा का थी । चन्द्रमा को जब यक्ष्मा रोग हो गया था, तब इन्होंने ही चिकित्सा की थी । चन्द्रमा का जब सोम ( वीर्य ) नष्ट हो गया था, तब इन्होने ही इसको स्वस्थ किया था । भृगुवंश में उत्पन्न च्यवन ऋषि अत्यन्त कामी होने से शीघ्र वृद्ध हो गये थे, उनके वर्ण, स्वर नष्ट हो गये थे, इन अवियों ने पुन. उनको युवा कर दिया था । इन उपरोक्त कार्यों से तथा अन्य कार्यों के कारण चिकित्सा मे श्रेष्ठ दोनों अश्विगण इन्द्र आदि महात्माओं के अत्यन्त पूजापात्र हो गये थे । द्विजाति ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ) लोग अश्वियों के लिये ग्रह ( सोम पान के पात्र ), स्तोत्र, मंत्र, अन्य १. ' चिकित्सितः शशी ताभ्या ' इति च पाठः । २. ' तथा नाना ' इति च पाठः । ३. अश्वियों के यज्ञ - भाग की कथा के लिये महाभारत में च्यवन ऋषि की कथा देखिये |

पृष्ठ 259

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पा ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् २४५ हवि ( आहुतिया, अन्न ) और धूमवर्ग के पशुओं की कल्पना किया करते थे ' । इन्द्र प्रातःसवन में ( यज्ञस्थान में ) अश्वियों के साथ सोमपान करते हैं । सौत्रामणि यज्ञ मे भगवान् अश्वियों के साथ प्रसन्न होते हैं । द्विज लोग प्रायः इन्द्र, अग्नि और अश्वियों की स्तुति करते हैं । वेद वाक्यों में अन्य देवताओं की ऐसी स्तुति नहीं की जाती, जैसी कि अश्वियों की है । जरारहित, मृत्युरहित, बुद्धिमान् और स्थिर देवगण भी अपने राजा इन्द्र के साथ बड़े प्रयत्न से चिकित्सक अश्वियों की पूजा करते हैं, तो फिर मृत्यु, रोग तथा बुढ़ापे से निश्चय रूप में पीड़ित होने वाले परन्तु सुख की चाह रखने

वाले मनुष्य किस लिये अपनी पूर्ण शक्ति के साथ इनकी पूजा न करें ।

अवश्य वैद्यों की पूजा मनुष्यों को करनी चाहिये ॥ ५० ॥

शीलवान्मतिमान युक्तो द्विजातिः शास्त्रपारगः ।

प्राणिभिर्गुरुवत्पूज्यः प्राणाचार्यः स हि स्मृतः ॥ ५१ ॥

विद्यासमाप्तौ भिषजस्तृतीया ' जातिरुच्यते ।

अश्नुते वैद्यशब्दं हि न वेद्यः पूर्वजन्मना ॥ ५२ ॥

विद्यासमाप्तौ ब्राह्मं वा सत्त्वमार्षमथापि वा ।

ध्रुवमाविशति ज्ञानात्तस्माद्वैद्य त्रिजः स्मृतः ॥

नाभिध्यायेन चाक्रोशेहितं न समाचरेत् ।

प्राणाचार्य बुधः कश्चिदिच्छन्नायुरनित्वरम् ॥

चिकित्सितस्तु सश्रुत्य यो वाऽसंश्रुत्य मानवः ।

नोपाकरोति वैद्याये नास्ति तस्येह निष्कृतिः ॥

भिषगप्यातुरान् सर्वान् स्वसुतानिव यत्नवान् ।

आबाघेभ्यां हि सरक्षेदिच्छन् धर्ममनुत्तमम् ॥

५३ ॥

५४ ॥

५५ ॥

५६ ॥

सुशील, बुद्धिमान्, द्विजाति आयुर्वेद शास्त्र में निष्ठ व्यक्ति को ' प्राणाचार्य ' कहते हैं । इस व्यक्ति की पूजा लोगों को गुरु के समान करनी चाहिये | आयु-र्वेद की समाप्ति पर ही चिकित्सक की तीसरी ( दूसरी ) जाती होती है । पूर्वजन्म से कोई वैद्य नहीं होता, आयुर्वेद का ज्ञान गुरुमुख से पढने पर ' वैद्य ' कहाता है, विद्या की समाप्ति पर ही ब्राह्म सत्त्व या आर्ष सत्त्व ( मन ) १ ' मत्राणि ' के स्थान पर ' शस्त्राणि ' पाठ भी है । ' वषट्कार से युक्त मन्त्र ही ' शस्त्र ' कहाते हैं । धूम्र के स्थान पर ' धूम ' पाठ करने पर ' धूप ' अगरबत्ती आदि का घूम लेना चाहिये । २. ' भिषजो द्वितीया ' इति च पाठः । ३. ' वैद्यो द्विजः ' इति च पाठः ।

पृष्ठ 260

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२४६ चरकसंहिता [ अ ० १ बनता है । ज्ञान के कारण ही ब्रह्मत्व या आर्षत्व आता है । इसलिये वैद्य को त्रिज ( द्विज ) कहते हैं । उसका यह ती ( दू ) सरा जन्म होता है जो बुद्धिमान् मनुष्य अपनी दीर्घ आयु चाहे उसको चाहिये कि प्राणाचार्य वैद्य का न तो तिरस्कार करे, न उसकी निन्दा करे और न उसका कुछ बुरा ही करे । जो पुरुष वैद्य द्वारा चिकित्सा कराके धन आदि देने की प्रतिज्ञा करके अथवा न करके भी वैद्य का प्रत्युपकार नहीं करता, उसकी कहीं भी निष्कृति ( कल्याण ) नहीं । वैद्य का कर्त्तव्य है कि रोगियों को अपने पुत्र के समान समझे । सर्वो-तम धर्म की इच्छा रखते हुए इनको रोगों से बचावे || ५१-५६ ॥

धर्मार्थं नार्थकामार्थमायुर्वेदो महर्षिभिः ।

प्रकाशितो धर्मपरैरिच्छद्भिः स्थानमक्षरम् ॥ ५७ ॥

नार्थार्थं नापि कामार्थमथ भूतदया प्रति ।

वर्तते यचिकित्सायां स सर्वमतिवर्तते ॥ ५८ ॥

कुर्वते ये तु वृत्त्यर्थं चिकित्सापण्यविक्रयम् ।

ते हित्वा काञ्चन राशि पासुराशिमुपासते ॥ ५६ ॥

धर्मपरायण महर्षियों ने अक्षय स्थान ( मुक्ति, ब्रह्म - साक्षात्कार ) की चाहना से धर्म के लिये आयुर्वेद का प्रकाश किया है । धन की इच्छा से आयुर्वेद का प्रकाश नहीं किया । जो वैद्य केवल प्राणिमात्र के दया भाव से चिकित्सा कार्य में प्रवृत्त होता है, किसी घन की इच्छा ( स्वार्थ ) से प्रवृत्त नहीं होता, वह सब पुण्य कार्यों को अतिक्रमण कर जाता है । जो व्यक्ति पेट के लिये चिकित्सा को दुकानदारी बनाते हैं, वे लोग स्वर्ण की राशि को छोड़ कर कर ), धूळ की ढेरी बॉधते हैं । ( पाप की गठरी सिर पर घरते

दारुणैः कृष्यमाणानां गर्दैर्वैवस्वतक्षयम् ।

छित्वा वैवस्वतान् पाशाञ्जीवितं च प्रयच्छति ॥

धर्मार्थशस्तम्य दाता नेहोपलभ्यते ।

न हि जीवितदानाद्धि दानमन्यद्विशिष्यते ॥ ६१

परो भूतदया धर्म इति मत्वा चिकित्मया ।

वर्तते यः स सिद्धार्थः सुखमत्यन्तमश्नुते ॥ ६२ ॥

( धर्म को छोड़ हैं ) ॥ ५६ ॥

६० ॥ ॥ कठिन पीड़ा देने वाले रोगों से पीड़ित यमालय की ओर जाते हुए व्यक्तियों को यम के पास काट कर छुड़ाता है, उनको जीवन देता है, उसके समान धर्म अर्थ का दाता इस संसार में और कोई नहीं है । क्योंकि जीवन - दान से बढकर और कोई दान ससार में नहीं है । प्राणियों पर दया करना उत्कृष्ट