श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 261–270
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 261–270
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पा ० १ ] चिकित्सितस्थानम् २४७ धर्म है, ऐसा समझ कर चिकित्सा में जो प्रवृत्त होता है उसकी सब कामनायें पूर्ण होती हैं, उसको अत्यन्त सुख मिलता है ॥ ६०-६२ ॥
तत्र श्लोकः -- आयुर्वेदसमुत्थानं दिव्यौषधिविधिः शुभः ।
अमृताल्पान्तरगुणं सिद्धं रत्नरसायनम् ॥ ६३ ॥
सिद्धेभ्यो ब्रह्मचारिभ्यो यदुवाचामरेश्वरः ।
आयुर्वेदसमुत्थाने तत्सर्वं सप्रकाशितम् ॥ ६४ ॥
आयुर्वेद की उत्पत्ति, दिव्य आषधियों का हितकर विधान, अमृत से थोड़े कम गुण रखने वाले सिद्ध रसायन, जिन को देवराज इन्द्र ने सिद्ध, ब्रह्मचा-रियों को उपदेश किया था, वह सब भगवान् पुनर्वसु ने इस ' आयुर्वेद - समुत्थान ' अध्याय में कह दिया ॥ ६३-६४ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सास्थाने आयुर्वेद-समुत्थानीयो नाम रसायनपादश्चतुर्थः ॥ ४ ॥
समातश्चायं प्रथमो रसायनाध्यायः ॥ १ ॥
द्वितीयोऽध्यायः ( प्रथमः पादः ) [ स्वस्थ पुरुष के ऊर्ज को बढ़ाने के लिये रसायन और वाजीकरण हैं । रसायन के पीछे वाजीकरण औषध प्रयोग करने चाहियें । तभी इनका प्रभाव उत्तम होता है । इसलिये इस अध्याय का अवतरण करते हैं । ] अथातः संप्रयोगशरमूलीयं वाजीकरणपादं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब आगे ' सप्रयाग- शरमूलीय ' नामक वाजीकरण पाद की व्याख्या करते हैं, भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
वाजीकरणमन्विच्छेत् पुरुषो नित्यमात्मवान् ।
तदायत्तौ हि धर्मार्थौ प्रीतिश्च यश एव च ॥ ३ ॥
पुत्रस्याऽऽयतनं ह्येतद् गुणाश्चैते सुताश्रयाः । जितेन्द्रिय पुरुष प्रतिदिन वाजीकरण की इच्छा करे । इसके ऊपर ही धर्म, अर्थ, प्रीति और यश आश्रित हैं । यह वाजीकरण पुत्रोत्पत्ति का कारण है और धर्म, अर्थ, प्रीति, यज्ञ आदि समस्त गुण पुत्र के ऊपर आश्रित हैं ॥ ३ ॥
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२४८ चरकसंहिता [ अ ० २ वाजीकरणमग्र्यं च क्षेत्रं स्त्री या प्रहर्षिणी ॥ ४ ॥
इष्टा ह्येकैकशोऽप्यर्थाः पर प्रीतिकराः स्मृताः ।
कि पुनः स्त्रीशरीरे ये सड्घातेन व्यवस्थिताः ॥ ५ ॥
सङ्घातो हीन्द्रियार्थानां स्त्रीषु नान्यत्र विद्यते ।
त्र्याश्रयो हीन्द्रियार्थो यः स प्रीतिजननोऽधिकम् ॥ ६ ॥
स्त्रीषु प्रीतिविशेषेण स्त्रीष्वपत्यं प्रतिष्ठितम् ।
धर्माय स्त्रीषु लक्ष्मीश्च स्त्रीषु लोकाः प्रतिष्ठिता ॥७ ॥
सुरूपा यौवनस्था या लक्षणेर्या विभूषिता या वश्या शिक्षिता या च सा स्त्री वृष्यतमा मता ॥ ८ ॥
सब से प्रधान वाजीकरण - सब से श्रेष्ठ वाजीकरण ' क्षेत्र ' है, और हर्ष को उत्पन्न करने वाली स्त्री ' क्षेत्र ' है । [ स्त्री में बीज का वपन अर्थात् आधान होता है, इसलिये स्त्री को ' क्षेत्र ' कहते हैं । ] एक एक भी मनचाहा ब्राह्म विषय रूप, रस, गन्ध आदि अत्यन्त प्रीति को उत्पन्न करता है । परन्तु ये सब रूप आदि विषय सम्मिलित होकर स्त्री के शरीर में उपस्थित होते हैं, तब फिर क्यों न उसमें प्रीति उत्पन्न हो, अवश्य होगी । स्त्रियों में आश्रित इन्द्रियों के विषय ही प्रीति को अधिक उत्पन्न करते हैं, अन्य स्थानों में आश्रित विषय इतनी प्रीति को उत्पन्न नहीं करते । मनुष्य की स्त्रियों में ही विशेषतः प्रीति अर्थात् ( स्नेह की मात्रा अति अधिक रहती है ) । सन्तान स्त्रियों में ही प्रति ष्ठित है । धर्म, अर्थ और लक्ष्मी भी स्त्रियों में ही प्रतिष्ठित है । स्त्रियों में ही सब लोक प्रतिष्ठित हैं । जो स्त्री रूपवती, युवती, ( काम - शास्त्र में वर्णित ) उत्तम २ लक्षणों से सुभूषित, वश में रहनेवाली, ( कामशास्त्र में वर्णित ६४ कलाओं में ) शिक्षित, निपुण हो, वह स्त्री सबसे उत्तम वाजीकरण है ॥४-८ ॥
नानाभक्त्या तु लोकस्य देवयोगाश्च योषिताम् ।
तं तं प्राप्य विवर्धन्ते नरं रूपादयो गुणाः ॥ ६ ॥
लोगों की भिन्न भिन्न रुचि होने के कारण और दैवयोग से स्त्रियों के रूप आदि गुण उस उस प्रकार की रुचि वाले पुरुष के मिलने से बढ़ते हैं । [ स्त्रियों के गुणों के अनुकूल यदि पुरुष मिल जाये तब तो गुण बढ़ते हैं, अन्यथा घट जाते हैं, नष्ट हो जाते हैं ] ॥ ६ ॥
वयोरूपवचोहावै'र्या यस्य परमाङ्गना ।
प्रविशत्याशु हृदयं दैवाद्वा कर्मणोऽपि वा ॥ १० ॥
हृदयोत्सव रूपा या या समानमनोरमा ' । १. ' मुजाहावे ' इति च पाठः । २. ' समानमन. शया ' इति च पाठः ।
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पा ० १ चिकित्सतस्थानम् २४६ wwwww. A N समानसत्त्वा या वश्या या यस्य प्रीयते प्रियैः ॥ ११ ॥
या पाशभृता सर्वेषामिन्द्रियाणा परैर्गुणैः ।
यया वियुक्तो निस्त्रीकमरतिर्मन्यते जगत् ॥ १२ ॥।
यस्या ऋते शरीरं ना धत्ते शून्यमिवेन्द्रियैः ।
शोकोद्वेगार तिभयै दृष्ट्वा नाभिभूयते ॥ १३ ॥
यातियां प्राप्य विस्रम्भ दृष्ट्वा हृष्यत्यतीव याम् ।
अपूर्वामिव यां याति नित्यं हर्षातिवेगतः ॥ १४ ॥
गत्वा गत्वाऽपि बहुशो या तृप्तिं नैव गच्छति ।
सा स्त्री वृष्यतमा तस्य नानाभावा हि मानवाः ॥ १५ ॥
जो स्त्री आयु, रूप, वाणी, हाव ( शृंगार आदि चेष्टा ) आदि के द्वारा या दैवयोग से अथवा अन्य कर्मों से मनुष्य के हृदय में उतर जाती है, जो हृदय में आनन्द का सञ्चार करती है, जिसकी कामचेष्टा मनुष्य के समान होती है, जिसका सत्व ( चित्त ) पुरुष के समान है, जो पुरुष के वश में रहती है, जो स्त्री पुरुष की प्रिय वस्तुओं से प्रसन्न होती है । जो स्त्री अग्ने उत्कृष्ट गुणों के कारण पुरुष की समस्त इन्द्रियों के लिये जाल रूप है ( जिसमे पुरुष फसा रहता है ), जिससे छूटकर रति रहित, बेचैन होकर पुरुष समस्त ससारको स्त्री से शून्य मानता है, जिस स्त्री के विना पुरुष अपने शरीर को इन्द्रियों से रहित मानता है जिसको देखकर शोक, उद्वेग, बेचैनी, भय आदि सब भूल जाता है, जिसको देखते ही शान्ति अनुभव करता है, जिसके दर्शन से अत्यन्त खुशी अनुभव करने लगता है, जिस स्त्री के साथ नित्य प्रति अत्यन्त हर्ष ( कामोद्वेग ) के कारण नूतन स्त्री के रूप में सम्भोग करता और वार वार मैथुन करने पर भी तृस नहीं होता वह स्त्री उस पुरुष के लिये सबसे उत्तम वृष्य ( वाजी-करण रसायन ) है ॥ १०-१५ ॥
अतुल्यगोत्रां वृष्यां च प्रहृष्टां निरुपद्रवाम् ।
शुद्धस्नातां व्रजेन्नारोमपत्यार्थी निरामयः ॥ १६ ॥
सन्तान की चाह रखनेवाला पुरुष स्वय रोगरहित होकर अपने से भिन्न गोत्रवाली, वृष्यतम, हर्षयुक्त [ प्रसन्न मन ], रोग आदि उपद्रवों से रहित, रजोधर्म के पीछे स्नान कर शुद्ध हुई स्त्री के साथ सहवास करे ॥ १६ ॥
अच्छायश्चैकशाखश्च निष्फलश्च यथा द्रुमः ।
अनिष्टागन्धश्चैकश्च निरपत्यस्तथा नरः ॥ १७ ॥
चित्रदीपः सरः शुष्कमधातुर्धातुसन्निभः ।
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२५० चरकसंहिता [ अ ० २ निष्प्रजस्तृणपूलीति ज्ञातव्या पुरषाकृतिः ॥ १८ ॥
अप्रतिष्ठश्च नग्नश्च शून्यश्चैकेन्द्रियश्च ना ।
मन्तव्यो निष्क्रियश्चैव यस्यापत्यं न विद्यते ॥ १६ ॥
अपत्यरहित पुरुष - जिस प्रकार अकेला वृक्ष छायारहित, एक शाखावाला, फलरहित तथा अनिष्ट गन्धवाल होता है, उसी प्रकार से पुत्ररहित मनुष्य भी अकेला है । जिस प्रकार चित्र में बना दीपक हो जैसा सूखा हुआ तालाब हो, जैसे विना धातु के, धातु के समान चमकने वाला पदार्थ हो, जैसे चॉदी के समान चमकने वाला सीप हो, इसी प्रकार पुत्ररहित मनुष्य है । उसे तिनकों वाघास की पूली से बना पुरुष के आकार का पुतला ही समझना चाहिये । जिस पुरुष के सन्तान नहीं होती उसकी कोई प्रतिष्ठा नहीं होतो । वह नंगा, अकेला ( निःसहाय ), शून्य, एक ही इन्द्रियवाला और निष्क्रिय होता है ॥ १७-१६ ॥
बहुमूतिर्वहुमुखो बहुव्यूहो बहुक्रियः ।
बहुच क्षुबहुज्ञानो बह्वात्मा च बहुप्रज ॥ २० ॥
मङ्गल्योऽय प्रशस्तोऽयं धान्योऽय वीर्यवानयम् ।
बहुशाखोऽयमिति च स्तूयते ना बहुप्रजः ॥ २१ ॥
बहुत सन्तानवाला पुरुष - जिस पुरुष के बहुत सन्तान होती है, वह बहुत सी मूर्तियोंवाला, बहुत से मुखोंवाला, बहुत से व्यूह ( सघात ) वाळा, बहुत सी क्रियाओंवाला, बहुत सी आँखोंवाला, बहुत ज्ञानवाला, बहुत से आत्माओंवाला होता है | बहुत सन्तानवाले पुरुष की लोग स्तुति करते है कि वह मंगलमय है, धन्य है, वीर्यवान् है, बहुत शाखाओंवाला है ॥ २०-२१ ॥
प्रीतिर्बल सुख वृत्तिविस्तारो विपुल कुलम् ।
यशो लोकाः सुखोदर्कास्तुष्टिश्चापत्यश्रिता ॥ २२ ॥
तस्मादपत्यमन्विच्छन् गुणाश्चापत्यसश्रितान् ।
वाजीकरणनित्यः स्यादिच्छन् कामसुखानि च ॥ २३ ॥
प्रीति, बल, सुख, वृत्ति, विस्तार, कुल का विस्तार, यश, सुख देनेवाले लोक, सन्तोष ये सब गुण सुतों पर आश्रित हैं । इसलिये सन्तान की चाह रखने वाला तथा सन्तान पर आश्रित गुणों की कामना करनेवाला पुरुष सदा बाजी -करण का सेवन करे और काम्य सुखों की भी इच्छा करे || २२-२३ ॥
उपभोगसुखान् सिद्धान् वीर्यापत्यविवधनान् ।
वाजीकरणसंयोगान् प्रवक्ष्याम्यत उत्तरम् ॥ २४ ॥
इसके आगे उपभोग में सुख देने वाले, वीर्य और अन्त्य को बढ़ाने वाले, सिद्ध, वाजीकरण प्रयोगों का उपदेश करूंगा ॥ २४ ॥
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पा ० १ ] चिकित्सतस्थानम् २५१ V
शरमलेक्षुमूलानि काण्डेक्षुः सेक्षुवालिका ।
शतावरी पयस्या च विदारी कण्टकारिका ॥ २५ ॥
जीवन्तो जीवको मेदा वीरो वर्षभको बला ।
ऋद्धिर्गोक्षुरकं रास्ना सात्मगुप्ता पुनर्नवा ॥ २६
एषां त्रिपलिकान् भागान् माषाणामाढकं नवम् विपाचयेज्जलद्रोणे चतुर्भागं च शेषयेत् ॥ २७ ॥
तत्र पेष्याणि मधुकं द्राक्षा फल्गूनि पिप्पली ।
आत्मगुप्ता मधूकानि खर्जूराणि शतावरी ॥ २८
विदार्यामलकेक्षूणां रसस्य च पृथक् पृथक् ।
सर्पिषाढकं दद्यात्क्षरद्रोण च तद्भिषक् ॥ २६
साधयेद् घृतशेष च सुपूतं योजयेत्पुनः ।
शर्करायास्तुगाक्षीर्याश्वणै. प्रस्थोन्मितैः पृथक् ॥
पलैश्चतुभिर्मागध्याः पलेन मरिचस्य च ।
त्वगेलाकेशराणां च चूर्णैरर्धपलोन्मितेः ॥ ३१ ॥
मधुनः कुडवाभ्या च द्वाभ्यां तत्कारयेद्भिषक् ।
पलिका गुलिकास्त्यानास्ता यथाग्नि प्रयोजयेत् ॥
एष वृष्य. परो योगो बृहणो बलवर्धनः ।
अनेनाश्व इवोदीर्णो लिङ्गमर्पयते स्त्रियाम् ॥ ३३
इति बृहणीगुडिका ॥
।
॥
॥
३० ॥
३२ ॥
॥
| बृंहणी गुटिका - शरमूल ( सरकण्डे की जड़ ), गन्ने की जड़, काण्डेक्षु ( ईख का भेद ) की जड़, इक्षुबालिका नाम ईख ' की जड़, शतावरी, श्रीरविदारी, विदारी, कटेरी, जीवन्ती, जीवक, मेदा, वीरा ( काकोली या शालपणी ), ऋषभक, बलामूल, ऋद्धि, गोखरू, रास्ना कौच और पुनर्नवा प्रत्येक ३ पल, नये उड़द १ आढ़क, इन को एक द्रोण जल मे ( परिभाषानुसार दुगने जल में ५१ सेर १६ तोला ) क्वाथ करके चतुर्थांश रहने पर छान लेवे । कल्कार्थं द्रव्य —मुलहठी, सुनक्का, गूलर, पिप्पली, कौंच, महुआ, खजूर, शतावरी मिलित सब आधा आढक, विदारीकन्द का स्वरस, ऑवले का स्वरस, गन्ने का रस और घी प्रत्येक दो दो आढक, दूध दो द्रोण, इनका घृत पाक विधि से घृत सिद्ध करले । सिद्ध घी को छान कर इसमें शर्करा का चूर्ण १ प्रस्थ, वंशलोचन १ प्रस्थ, पिप्पली ४ पल, मरिच १ पल, दालचीनी, इलायची, १ इस ईख में फूल आता है, जो कि कास के फूल की भॉति होता है ।
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२५२ चरकसंहिता [ अ ० २ www.www. नागकेशर मिति आधा पल, शहद दो कुडव मिळावे । इससे एक एक पल की गुटिका बना कर अग्नि के बलानुसार खावे । यह प्रयोग अत्यन्त वीर्यवर्धक, पुष्टि-वर्धक, बलवर्धक है । इसके प्रय ग से अत्यन्त मैथुन शक्ति बढ़ जाती है । कोई २ [ आचार्य शहद १६ पल डालते हैं । एक कुडव = चार पल ]
माषाणामात्मगुप्ताया बीजानामाढकं नवम् ।
atravratari मेदामृद्धिगतावरीम् ॥ ३४
मधुकं चाश्वगन्धां च साधयेत्कुडवोन्मिताम् ।
रसे तस्मिन् घृनप्रस्थं गव्यं दशगुण पयः ॥ ३५
विदारणा र प्रस्थ प्रम्थमिक्षुरसस्य च ।
दत्त्वा मृद्वग्निना साध्यं पिद्धं सर्पिर्निधापयेत् ॥
शर्करायास्तुगाक्षीर्याः क्षौद्रस्य च पृथक् पृथक् ।
॥ २५-३३ ॥
॥
॥
३६ ॥
भागाश्चतुष्पलास्तत्र पिप्पल्याश्चावपेत्पलम् ॥ ३७ ॥
पलं पूर्वमतो लीवा ततोऽन्नमुपयोजयेत् ।
य इच्छेदक्षय शुक्रं शेफसश्चोत्तम बलम् ॥ ३८ ॥
इति वाजीकरणं घृतम् । वाजीकरण घृत — नवीन उड़द १ आढक, कौंच के बीज १ आढक, जीवक, ऋषभक, वीरा ( काकोली या शतावरी ), मेदा, ऋद्धि, शतावरी, मुलहठी, अश्वगन्धा प्रत्येक एक कुडव इनको आठ गुणे जल में क्वाथ करना चाहिये । चतुर्थीश रहने पर छान लेना चाहिये । गाय का घी एक प्रस्थ, दूध घी से दस गुना ( दस प्रस्थ ), विदारी का स्वरस १ प्रस्थ, गन्ने का रस १ प्रस्थ, मिला कर मृदु अग्नि पर घृत सिद्ध करना चाहिये । घी सिद्ध हो जाने पर खाद, वशलोचन और शहद प्रत्येक चार चार पल और पिपली एक पल मिलाना चाहिये । इस ओषध को एक पल खाकर पीछे से अन्न का भोजन करना चाहिये । इससे शुक्र का अक्षय भण्डार तथा जननेन्द्रिय में उत्तम बल आता है || ३४-३८ ॥
शर्करा माषविदलास्तुगाक्षीरी पयो घृतम् ।
गोधूमचूर्णषष्ठानि सर्पिष्युत्कारिकां पचेत् ॥ ३६
तां नातिकां मृदितां कौक्कटे मधुरे रसे ।
सुगन्धे प्रक्षिपेदुष्णे यथा सान्द्रीभवेद्रसः ॥ ४०
एष पिण्डरसो वृष्यः पौष्टिको बलवर्धनः ।
अनेनाश्व इवोदीर्णो बली लिंगं समर्पयेत् ॥ ४१
॥
॥
॥
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पा ० १ । चिकित्सतस्थानम् २५३ शिखितित्तिरिहंसानामेवं पिण्डरसो मतः । इति वजिकरणपिण्डरसाः । वाजीकरण पिण्डरस - खाड, उड़द की दाल, वशलाचन, दूध, घी ओर गेहू का आटा इनको उचित परिणाम में लेकर उत्कारिका बना कर घी में तल लेवे । इसको बहुत न पकाये । पीछे हाथों में मल कर मुर्गे के गरम मासरस में डाल देवे । इसमें शर्करा, इलायची, केशर आदि सुगन्ध भी डाल देवे, इससे रख गाढ़ा हो जायेगा । यह पिण्डरस शुक्रवधक, पौष्टिक और इसके प्रयोग से पुरुष में घाड़े के समान मथुन शक्ति आती है ।
मोर, तीतर और हसों के मास रस से भी पिण्ड रस बनते हैं ।
इसी प्रकार से हैं ॥ ३६-४१ ॥
घृतं माषान् सबस्ताण्डान् साधयेन्माहिषे रसे 1 भर्जयत्त रस पूतं फलाम्लं नवसर्पिषि ॥ ४२ ॥
ईषत्सलवण युक्त धान्यजीरकनागरैः ।
एष वृष्यश्च बल्यश्च बृंहणश्च रसात्तम. ॥ ४३ ॥
बलवर्धक है । इसी प्रकार से इनके गुण भी इति वृष्यमाहिषरसः । घा, माष ( उड़द ) और बस्ताण्ड ( बकरे व अण्डकोषों ) को भैंस के मास रस मे सिद्ध करना चाहिये । इस रस को छान कर नये घी में भूनना चाहिये । इसको अनार, आवला आदि फलों के रस से खट्टा करना चाहिये । इसमें थोड़ा सा नमक, धनिया, जीरा और सोंठ भी मिला देनी चाहिये । यह रस वृष्यकारक, बलवर्धक और बृंहण है ॥ ४२-४३ ॥
चटकांस्तित्तिरिरसे तित्तिरीन् कौक्कुटे रसे ।
कुक्कटान् बाहिरसे हाँसे बाहिणमेव च ॥ ४४ ॥
नवसपिषि संतप्तान् फलाग्लान् कारयेद्रसान् । मधुरान्वा यथासात्म्यं गन्धाढ यान् बलवर्धनान् इति वृष्यरसाः वृष्य रस --- चिड़ियों को तित्तिर के रस में, तीतरों को मुर्गे ॥ ४५ ॥
। के रस में, मुर्गों को मोर के रस में, मोरों को हंसों के मास रस में सिद्ध करना चाहिये । इन चारों रसों को ताजे घी में भून कर अनार के रस से खट्टा करके अथवा मधुर रूप में सेवन करना चाहिये | सेवन करने के पूर्व इलायची, केशर आदि से सुगन्धित
कर लेना आवश्यक है । यह रस बलवर्धक है ॥ ४४-४५ ॥
चटकांसानां गत्वा योऽनुपिबेत्पयः ।
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२५४ चरकसंहिता [ अ ० २ न तस्य लिङ्गशैथिल्यं स्यान्न शक्रक्षयो निशि ॥ ४६ ॥
इति वृष्यमांसम् । ( १ ) जो पुरुष चटक के मास को भर पेट खाकर ऊपर से दूध पी लेता है, उसका बल ( लिंग ) शिथिल नहीं होता और रात भर वीर्य का क्षय नहीं होता, यह वीर्यस्तम्भक है ॥ ४६ ॥
मायूपेण यो भुक्त्वा घृताढच षष्टिकौदनम् ।
पयः पिबति रात्रि स कृत्स्नां जागति वेगवान् ॥ ४७ ॥
इति वृष्यमाषयोगः । ( २ ) खूब घी वाले साठी के चावलों को उड़द के यूष के साथ खाकर जो ऊपर से दूध पी लेता है, वह काम - वेग से आतुर होकर सारी रात जागता रहता है ॥ ४७ ॥
न रात्रिषु स्वपिति ना निस्तब्धेन च शेफसा ।
तृप्तः कुक्कुटमांसाना भृष्ानां नक्ररेतसि ॥ ४८ ॥
इति वृष्यं भृष्टमासम् । ( ३ ) मुर्गे के मास को न के रेत में भून कर खाने से पुरुष स्तब्धलिंग
होकर सारी रात नहीं सोता । उसके सारी गत ध्वज - हर्ष करता है ॥ ४८ ॥
निःस्राव्य मत्स्याण्डरस भृष्टं सर्पिषि भक्षयेत् ।
हंसबहिंणदक्षाणा चैवमण्डानि भक्षयेत् ॥ ४६ ॥
इति वृष्या अण्डरसाः । ( ४ ) मछली के अण्डों के रस को निकाल कर इसको घी में भून कर खावे । इसी प्रकार से हंस, मोर और मुर्गी के अण्डे का भी रस भून कर खावे ॥ ४ ९ ॥
भवतश्चान्त्र – स्रोतःसु शुद्धेष्वमले शरीरे वृष्य यदा ना मितमति काले ।
वृषायते तेन परं मनुष्यस्तद् बृहणं चैव बलप्रदं च ॥ ५० ॥
तस्मात्पुरा शोधनमेव कार्यं बलानुरूपं न हि वृष्ययोगाः ।
सिध्यन्ति देहे मलिने प्रयुक्ताः क्लिष्टे यथा वाससि रागयोगाः ॥ ५१ ॥
शुक्रवह आदि स्रोतों के शुद्ध होने पर, शरीर के निर्मल ( धुला ) होने पर, उचित समय पर उचित मात्रा में जो वृष्य वस्तुओं का सेवन करता है उसका वीर्य और पुंस्त्वशक्ति बढ़ जाती है । उसको यह बृंहण और बलवर्धक होता है । इसलिये वृष्य प्रयोग सेवन करने से पूर्व बलानुसार शरीर का वमन, विरेचन आदि से शोधन कर लेना चाहिये । जिस प्रकार मदिन वस्त्र पर रंग
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पा ० २ ] चिकित्सितस्थानम् २५५ नहीं चढ़ता उसी प्रकार मलिन शरीर में प्रयोग किये वृष्य योग अपना फल नहीं देते || ५०-३१ ||
तत्र श्लोकौ - वाजीकरणसामर्थ्य क्षेत्रं स्त्री यस्य चैव या ।
ये दोषा निरपत्यानां गुणाः पुत्रवतां च ये ॥ ५२ ॥
दश पञ्च च सयोगा वीर्यापत्यविवर्धनाः । उक्तास्ते शरमूलीये पादे पुष्टिबलप्रदाः ॥ २३ ॥ इति ।
वाजीकरण का सामर्थ्य, क्षेत्ररूप स्त्री, और किस पुरुष के लिये कैसी स्त्री उचित है, और अपत्यरहित पुरुषों के दोष, पुत्रवान् पिताओं के गुण, और सन्तानवर्धक १५ प्रयोग इस शरमूलीय पाद में कह दिये हैं ॥ ५२-५३ ॥ इयग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सास्थाने सप्रयोग-घरमूलीयो नाम वाजीकरणपाद. प्रथमः । ( द्वितीयः पादः ) अथात आसिक्क्षीरीयं बाजीकरणपादं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्मा ss ह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब हम ' आसितक्षीरीय ' नामक वाजीकरण पाद की व्याख्या करते हैं, ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥१-२ ॥
आसिक्त क्षीरमापूर्ण मशुष्कं शुद्धषष्टिकम् ।
उदूखले समापोथ्य पीडयेत्क्षीरमर्दितम् ॥ ३
क्षुण्णं विमृदितं क्षीरे पीडयेत्सुसमाहितः ।
गृहीत्वा तं रसं पूतं गव्येन पयसा सह ॥ ४ ॥
बीजानामात्मगुप्ताया धान्यमाषरसेन च ।
बलाया शूर्पपण्यश्च जीवन्त्या जीवकस्य च ॥
ऋद्धयर्षभक काकोलीश्वदृष्ट्रामधुकस्य च ।
शतावर्या विदार्याश्व द्राक्षाखर्जूरयोरपि ॥ ६
संयुक्त मात्रया वैद्यः साधयेत्तत्र चावपेत् ।
तुगाक्षीर्याः समाषाणा शालीनां षष्टिकस्य च ॥
गोधूमानां च चूर्णानि यैः स सान्द्रीभवेद्रसः ।
सान्द्रीभूतच कुर्यात्प्रभूतमधुशर्करम् ॥ ८ ॥
गुडिका बदरैस्तुल्यास्ताच सपिषि भर्जयेत् ।
ता यथाग्नि प्रयुञ्जानः क्षीरमांसरसाशनः ।
॥
५ ॥
॥
७ ॥
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२५६ चरकसंहिता पश्यत्यपत्यं विपुलं वृद्धोऽप्यात्मजमक्षयम् ॥ ६ ॥
इत्यपत्यकरा षष्टिकादिगुडिका । षष्टिकादिगुटिका - शुद्ध साठी के कच्चे चावलों को दूध के जब ये फूल जायें और गीले हों तब इनको ऊखल में कूटे । जायें तब निचोड़ कर रस निकाल ले । बचे भाग को दूध के [ अ ० २ AV या अन्दर भिगोवे । जब दरकच हो साथ फिर कूटे और फिर रस निकाल लेवे । इस प्रकार से सारा रस निकाल कर इसके रस के बराबर गाय का दूध तथा कौच के बीजों का काथ मिलाकर मन्द मन्द आच पर पकावे । अनन्तर जब यह क्वाथ शुष्क हो जाये तब उड़द के क्वाथ के साथ, पकावे | इसके खुश्क होने पर बला काथ, मुद्गपर्णी ओर माषपणों क्वाथ, जीवन्ती क्वाथ, जीवक क्वाथ, ऋद्धि काथ, काकाला काथ, गातुर क्वाथ, सुल-इठी क्वाथ, शतावरी रस, विदारी रस, द्राक्षा रस, खजूर रस से पाक करे । अन्तिम पाक के समय वसलोचन, उड़द का आटा, शालि चावलों का आटा और गेहूँ का आटा मिलावे जिससे वह कठोर हो जाये । इसमें मधु और शर्करा पर्यात मिळाकर मीठा कर लेवे । इसकी बेर के बराबर गोलिया बनाकर घी में तल लेवे । इनको अग्नि बल के समान खाकर पीछे से दूध और मास रस का भोजन करे । इससे वृद्ध भी पुरुष सन्तान और अक्षय वीर्य को पाता है ' ॥३६ ॥
चटकानां सहसाना दक्षाणां शिखिनां तथा ।
शिशुमारस्य नस्य भिषक् शक्राणि संहरेत् ॥ १०
गव्य सर्पिर्वराहस्य कुलिङ्गस्य वसामपि ।
षष्टिकाना च चूर्णानि चूर्णं गोधूमकस्य च ॥ ११ ॥
एभिः पूपलिकाः कार्याः शष्कुल्यो वर्तिकास्तथा ।
पूपा धानाश्च विविधा भक्ष्याश्चान्ये पृथग्विधाः ॥
एषा प्रयोगाद्भक्ष्याणां स्तब्धेनापूर्णरेतसा ।
शेफसा वाजिवद्याति यावदिच्छेत् स्त्रियो नरः ॥
इति वृष्यभक्ष्याः । वृष्यभक्ष्य — वैद्य को चाहिये कि चिड़िया, हस, मुर्गे, मोर, ॥ १२ ॥ १३ ॥ शिशुमार, नक्र इनके वीर्य को, गाय का घी, सुअर और कुलिंग की वसा ( चर्बी ) को, साठी के चावलों का आटा, गेहूं का आटा एकत्रित करके यथाविधि पूपलिकायें, १ श्री गंगाधर कविराज ने ' धान्य ' शब्द से धनिया लिया है, परन्तु छोक में प्रसिद्ध है कि धनिया शुक्र शक्ति को घटा कर नपुंसक बना देता है । इस-लिये वह नहीं लिया जाता ।