श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 271–280
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 271–280
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पा ० २ ] १७ चिकित्सितस्थानम् २५७ ^^ www शष्कुली, वर्त्तिका, पूप ( यूए ), धाना तथा अन्य नाना प्रकार के भक्ष्य बनाने चाहियें ' । इनके प्रयोग मे, वीर्य से पूर्ण होकर अत्यन्त ध्वज के समान यथेच्छ स्त्रियों से मैथुन कर सकता है ॥१०-१३ ॥
आत्मगुप्ताफल माषान् खर्जूराणि शतावरीम् ।
शृङ्गाटकानि मृद्वीका साधयेत्प्रसृतोन्मिताम् ॥
क्षीरप्रस्थ जलप्रस्थमेतत्प्रस्थावशेषितम् ।
शुद्धेन वाससा पूत योजयेत्प्रसृतैस्त्रिभिः ॥ १५
शर्करायास्तुगाक्षीर्याः सर्पिषाऽभिनवस्य च ।
तत्पाययेत सक्षोदं षष्टिकान्नं च भोजयेत् ॥ १६
जरापरीतोऽप्यबलो योगेनानेन विन्दति ।
नरोऽपत्यं सुविपुल वेव च स हृष्यति ॥ १७ ॥
इत्यपत्यकरः स्वरसः अपत्यकर स्वरस - कौच के बीज, उड़द, खजूर, शतावर, इनमें से प्रत्येक एक २ प्रसृत ( २ पल ), दूध २ प्रस्थ, जल हर्ष के साथ घोड़े १४ ॥ ॥ ॥ । सिंघाड़े, मुनक्का, २ प्रस्थ, इनको धीरे धीरे पका कर दूध मात्र शेष रहने देना चाहिये । जल उड़ जाने पर इनको वस्त्र में छान लेवे । इसमें खाड, वशलोचन और ताजा घी मिलित वीन प्रसृत ( ६ पल ) मिला देव | पीछे से मधु मिलाकर इसको साठी का चावल खिलावे | इस प्रयोग से बुढ़ापे से पीड़ित भी अनेक सन्तानों को प्राप्त करता है और युवाओं के प्राप्त करता है ॥ १४-१७ ॥
खर्जूरीमस्तक माषान् पयस्यां सशतावरीम् ।
खर्जूराणि मधूकानि मृद्वीका मजडाफलम् ॥ १८
पलान्मितानि मतिमान् साधयेत्सलिलाढके ।
तेन पादावशेषेण क्षीरप्रस्थं विपाचयेत् ॥ १६ ॥
क्षीरशेषेण तेनाद्याद् घृताढ्यं षष्टिकौदनम् ।
सशर्करेण संयोग एष वृष्यः पर स्मृतः ॥ २० ॥
पिळावे । पीछे निर्बल व्यक्ति समान वज - हर्ष ॥ इति वृष्यक्षीरम् । वृष्यक्षीर योग - खजूर वृक्ष का मस्तक, उड़द, पयस्या ( वीर विदारी ), शतावर, खर्जूर, महुवा, मुनक्का और कौंच के बोज इनमें प्रत्येक एक एक पल १ शुक्र के अभाव में अण्डों का प्रयोग करना चाहिये । अण्डे न मिलें तो मास का प्रयोग हो सकता है ।
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२५८ चरकसंहिता [ अ ० २ लेकर दो आढक जल में पकावे । जब चतुर्थाश शेष रह जाय तब छानकर इसके द्वारा एक प्रस्थ दूध का पाक करे । जब सब रस उड़ जाये केवल मान दूध शेष रह जाये, तब इस दूध के साथ घी मिश्रित साठी के भात, शक्कर मिला कर खावे यह योग अति वृष्य है ॥ १८-२० ॥
atasis मेदा जीवन्तीं श्रावणीद्वयम् ।
खर्जूर मधुकं द्राक्षा पिप्पली विश्वभेषजम् ॥ २१ ॥
शृङ्गाटकं विदारी च नव सर्पिः पयो जलम् ।
सिद्ध घृतावशेष तच्छर्कराक्षौद्रपादिकम् ॥ २२ ॥
पष्टिकान्तेन संयुक्तमुपयोज्यं यथाबलम् ।
वृष्यं बल्य च वर्ण्य च कण्ठ्यं बृहणमुत्तमम् ॥ २३ ॥
इति वृष्यघृतम । वृष्यघृत – जीवक, ऋषभक, मेदा, जीवन्ती, श्रावणी और महाश्रावणी, खर्जूर, मुलहठी, द्राक्षा, पिप्पली, सोंठ सिंघाड़ा, विदारीकन्द मिटित ८ पल, लाजा घी २ प्रस्थ, दूध २ प्रस्थ, जल ६ प्रस्थ । यथाविधि घृतपाक करके छान लेना चाहिये । इसमें शर्करा और शहद ४-४ पल मिलाना चाहिये । इसका सोठी के चावलों के साथ मिलाकर बळानुसार खाना चाहिये । यह प्रयोग वृष्य, बलवर्धक, वर्ण्य कण्ठ के लिये हितकारी बृहण ( पुष्टिदायक ) है । २१-२३ ॥
दध्नः शरं शरच्चन्द्रसंनिभं दोषवर्जितम् ।
शर्कराक्षौद्रमरिचैस्तुगातीर्या च बुद्धिमान् ॥ २४
युक्त्या युक्तं ससूक्ष्मैलं नवे कुम्भे शुचौ पटे ।
मार्जितं प्रक्षिपेच्छीते घृतान्ये षष्टिकौदने ॥ २५ ॥
पिबेन्मात्रां रसालायास्त भुक्त्वा षष्टिकौदनम् ।
वर्णस्वरबलोपेतः पुमास्तेन वृषायते ॥ २६ ॥
इति वृष्यो दधिशरप्रयोगः । दधिशर प्रयोग - शरद् ऋतु के चन्द्रमा के समान निर्मल दही की मलाई में खाण्ड मधु, मरिच वंशलोचन और छोटी ॥ और दोषरहित इलायची डाल कर बुद्धिमान् वैद्य इनको मिट्टी के पात्र में मिला लेवे । फिर इनको शुद्ध बारीक वस्त्र पर डालकर धीरे २ मथ लेवे । इस प्रकार से छनी दही को घी - बहुल ठण्डे हुए साठी भात के साथ खाये । पीछे से मात्रा में रसाला पीनी चाहिये । इससे मनुष्य का वर्ण, स्वर और बल बढाता है तथा शुक्रकी वृद्धि होती है ॥ २४-२६ ॥ चन्द्रांशकल्पं पयसा घृताढ्यं षष्टिकौदनम् ।
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पा ० २ ] चिकित्सितस्थानम् २५६ शर्करामधुसंयुक्त प्रयुञ्जानो वृषायते ॥ २७ ॥
इति वृष्यषष्टिकौदनप्रयोगः । षष्टिकौदन प्रयोग - चन्द्रमा की किरणों के समान निर्मल साठी के चावलों को प्रचुर घी, दूध, शर्करा और मधु के साथ मिलाकर खाने से अत्यधिक वृषता प्राप्त होती ॥ २७ ॥
तप्ते सर्पिषि नकाण्डं ताम्रचूडाण्डमिश्रितम् ।
युक्तं षष्टिक चूर्णेन सर्पिषाऽभिनवेन च ॥ ४८ ॥
पक्त्वा पूपलिकाः खादेद्वारुणीमण्डपो नरः । य इच्छेदश्वद्रन्तुं प्रसेक्तु ं गजवच्च यः ॥ २६ ॥
इति वृष्यपूपलिकाः । वृष्य - पूपलिका - नक्र का अण्डा, मुर्गी का अण्डा, साठी के चावलों का आटा, ताजा घी इनको मिला कर पूपलिकायें बनानी चाहिये । इनको खाकर ऊपर से वारुणी का मण्ड ( ऊपर का स्वच्छ भाग ) पीना चाहिये | इससे अश्व के समान रमण करने की शक्ति और हाथी के समान शुक्र क्षरण का सामर्थ्य होता है ॥ २६ ॥
भवन्ति चात्र - आसिक्क्षीरिके पादे ये योगाः परिकीर्तिताः ।
अष्टावपत्यकामैस्ते प्रयोज्याः पौरुषाथिभिः ॥ ३० ॥
एतैः प्रयोगविविधैर्वपुष्मान् स्नेहोपपन्नो बलवर्णयुक्तः ।
हर्षान्वितो वाजिवदष्टवर्षो भवेत्समर्थश्च वराङ्गनासु ॥ ३१ ॥
यद्यश्च किंचिन्मनसः प्रिय स्याद्रम्या वनान्ताः पुलिनानि शलाः ।
इष्टाः स्त्रियो भूषणगन्धमाल्य प्रिया वयस्याश्च तदत्र योग्यम् ॥३२ ॥
इस आक्ति क्षीरीय नामक पाद में आठ योग कहते हैं । ये सन्तान के इच्छुक तथा पौरुष की कामना करने वालों को सेवन करना चाहिये । इन योगों के प्रयोग करने से मनुष्य सुन्दर शरीर, स्निग्ध वदन, बल, वर्ण से युक्त, अश्व के समान हर्षयुक्त तथा स्त्रियों में अतिसमर्थ होता है । इन प्रयोगों के साथ साथ जो भी मन को प्रिय लगे, रम्य वन, नदियों के सुन्दर किनारे, सुन्दर पर्वत, सुन्दर स्त्रियों, आभूषणों की झकार, मनमोहक सुगन्ध इत्रों की महक, भीनी महक वाली मालाये, 2 प्रिय मित्र ये सब वस्तुए वाजीकरण में सहायक होती हैं ॥ ३०-३२ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सास्थाने आसिकचीरीयो नाम वाजीकरणपादो द्वितीय: ।
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२६० चरकसंहिता [ अ ० २ ( तृतीयः पादः ) अथातो माषपर्णभृतीय वाजीकरणपाद व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्मा SS ह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे ' माषपर्णभृतीय ' नामक वाजीकरण पाद की व्याख्या करते हैं, भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
पर्णभृतां धेनुं गृष्टिपुष्टा चतुःस्तनीम् ।
समानवर्णवत्सां च जीवद्वत्सां च बुद्धिमान् ॥
रोहिणीमथवा कृष्णामूर्ध्वशृङ्गीमदारुणाम् । इक्ष्वादामर्जुनादां वा सान्द्रक्षीरा च धारयेत्
केवलं तु पयस्तस्याः शृतं वाऽश्रुतमेव वा ।
शर्कराक्षौद्रसर्पिभिर्युक्तं तद् वृष्यमुत्तमम् ॥ ५ ॥
जो गाय उड़द के पत्तों पर पाली गई हो, प्रथम वार चार स्तनों वाली हो, जिसका कि बछड़ा जीता हो, बछड़े समान हो, लाल या काले रंग क हो, उन्नत ( खड़े ) सींग या मारने वाला न हो, गन्ने के पत्ते या अर्जुन के पत्ते खाती ३ ॥ ॥ ४ ॥
ही ब्याई हो, चार का रंग माता के वाली हो, भयंकर हो, दूध गाढ़ा हो, बुद्धिमान् व्यक्ति को ऐसी गाय रखनी चाहिये । इस गाय का दूध ही अकेला चाहे धारोष्ण अवस्था में कच्चा ही अथवा गरम करके शर्करा, मधु तथा घी के साथ लेने से उत्तम वाजीकरण होता है । [ ये तीन योग है -- उबला हुआ
दूध, कच्चा दूध और घी आदि से मिला । गाय का भोजन भी तीन प्रकार का है ।
उड़द के पच, गन्ने के पत्ते और अर्जुन के पत्त ] ॥३-५ ॥
शक्रलैर्जीवनीयैश्व बृहणैर्बलवर्धनैः ।
क्षीरसजननैश्चैव पयः सिद्ध पृथक् पृथक् ॥ ६ ॥
युक्तं गोधूमचूर्णेन सघृतक्षोद्रशकरम् ।
पर्यायेण प्रयोक्तव्यमिच्छता शुक्रमक्षयम् ॥ ७ ॥
इति वृष्यक्षीरप्रयोगः । वृष्य चीर प्रयोग — सूत्रस्थान के चतुर्थ अध्याय में वर्णित शुक्रवर्धक, जीव-नीय, बृंहणीय, बल्य और स्तन्यवर्धक इन पाच गणों से पृथक् पृथक् दूध सिद्ध करे । जब दूध सिद्ध हो जाये तब इसमें गेहूं का आटा मिला कर घी में भून ले । इसमें शर्करा भी मिला दे । ठण्डा होने पर शहद मिला कर पृथक् पृथक प्रयोग करे । प्रथम दिन शुक्रवर्धक गण से सिद्ध, दूसरे दिन जीवनीय गण से,
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पा ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २६१ तीसरे दिन बृंहणीय गण से, चौथे दिन बल्य गण से और पाचवें दिन स्तन्य-वर्धक गण से दूध ' को सिद्ध करे । इससे शुक्र की वृद्धि होती है ॥ ६-७ ॥
मेदां पयस्यां जीवन्ती विदारीं कण्टकारिकाम् ।
श्वदंष्ट्रां क्षीरिकान् माषान् गोधूमान् शालिषष्टिकान् ॥ ८ ॥
पयस्यर्धोदके पक्त्वा कार्षिकानाढकोन्मिते ।
विवर्जयेत्पय शेषं तत्पूतं क्षौद्रसर्पिषा ॥ ६ ॥
युक्तं सशर्करं पीत्वा वृद्धः साप्ततिकोऽपि वा ।
विपुलं लभतेऽपत्यं युवेव च स हृष्यति ॥ १० ॥
इत्यपत्यकरक्षीरयोगः । अपत्यकर क्षीर योग - मेदा, जीवन्ती, क्षीरविदारी, विदारी, कटेरी, गोखरू, उड़द, क्षीरिका ( दूधी, खिरनी फल या प्लक्ष ), गेहूं, शालिधान्य, साठी के चावल प्रत्येक १ कर्प, पानी मिला दूध दो आढक मिला कर क्वाथ करले । चतुर्थाश शेष रहने पर छान ले । मेदा आदि को फेंक दे । इस छने काथ में खाण्ड, घी और ठण्डा होने पर मधु मिला कर पान करे । इसको पीस कर सत्तर साल का वृद्ध भी युवा के समान प्रबल शक्ति प्राप्ति करता है और बहुत सन्तान वाला होना है ॥ ८-१० ॥
मण्डलैर्जातरूपस्य तस्या एव पयः शृतम् ।
अपत्यजननं सिद्ध सघृतक्षौद्रशर्करम् ॥ ११ ॥
इत्यपत्यजननक्षीरयोगः । माषपर्ण - भृत वाले वृष्य - क्षीर प्रयोग में वर्णित गाय के दूध में सुवर्ण के वर्क गला कर पकावे । जब दूध गाढ़ा हो जाये तब इसमें घी, शक्कर तथा ठण्ढा
होने पर शहद मिला कर पीवे । यह दूध सन्तानजनक है ॥ ११ ॥
त्रिशत्सुपिष्टाः पिप्पल्य. प्रकुने तैलसर्पिषोः ।
भृष्ट्वा सशर्कराक्षोद्रा क्षीरधारावदोहिता ॥ १२ ॥
पीत्वा यथावल चोर्ध्वं षष्टिकं क्षीरसर्पिषा ।
भुक्त्वा न रात्रिमस्तब्ध लिङ्ग पश्यति ना क्षरत् ॥ १३ ॥
इति वृष्यक्षीरयोग । अपथ्य - जनन क्षीरयोग — खूब बारीक पिसी तीस पिप्पलियो को एक पल तैल और घी में भून कर शर्करा और मधु में मिला कर दूध दोहने के पात्र मे डाल १ दूध पाक करने का नियम- द्रव्य से आठ गुणा दूध और दूध से चौगुना जल मिला कर पकावे । पकाते २ जब केवल दूध मात्र शेष रह जाय तब उता-रले, यह दूध पाक की रीति है ।
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२६२ चरकसंहिता [ अ ० २ दे । इसमें पीने योग्य दूध दोह कर पीले । पीछे से साठी का भात दूध और घी के साथ खावे | इसके सेवन से रात्रि में पुरुष की इन्द्रिय शिथिल नहीं होती और वीर्य का क्षय भी नहीं होता ॥ १२-१३ ॥
श्वदंष्ट्राया विदार्याश्च रसे क्षीरचतुर्गुणे ।
घृताढ्यः साधितो वृष्यो माषषष्टिकपायसः ॥ १४ ॥
इति वृष्यपायस प्रयोगः । वृष्य- पायस योग — गाय के दूध से चार गुणा गोखरू और विदारीकन्द का रस पृथक् २ लेकर दूध पाक करे । इस दूध में घी में भुने हुए उड़द तथा
साठी के चावलों को मिलाकर खीर पकावे । यह अतिशय वृष्य है ॥ १४ ॥
फलाना जावनीयाना स्निग्धाना रुचिकारिणाम् ।
कुडवश्चणिताना स्यात्स्व यंगुप्ताफलस्य च ॥ १५ ॥
कुडवश्चैव मापाणा द्वो द्वौ च तिलमुद्गयोः ।
गोधूमशालिचर्णाना कुडवः कुडवो भवेत् ॥ १६ ।
सपिष. कुडवश्चैकस्तत्सर्व क्षीरसयुतम् ।
पक्त्वा पूपलिकाः खादेद्वह्वयः स्युर्यस्य योषितः ॥ १७ ॥
इति वृष्यपूपलिकाः । वृष्य पूपलिका — जीवनदायक, स्निग्ध एव रुचिकर फलों का चूर्ण १ कुडव, कौच के बीज १ कुडव, माघ १ कुडव, तिल २ कुडव, मूंग दो कुडव, गेहूं का आटा १ कुडव, शालिधान्य का आटा १ कुडव, घी एक कुडव, इनको घी में गूंथकर घी में भूनकर पूपलिकायें बना लेवे । जिसके घर में बहुत सी स्त्रिया हों वह इनका सेवन करे । [ फलों में द्राक्षा, खजूर, बादाम, नारियल, पिस्ता, आम, मीठा अनार लेने चाहिये ] ॥ १५–१७ ॥
घृतं शतावरीगर्भ क्षीर दशगुणे पचेत् ।
शर्करापिप्पलीक्षौद्रयुक्त तद्वृष्यमुत्तमम् ॥ १८ ॥
इति वृष्य शतावरीघृतम् । शतावरी घृत - शतावरी के कल्क ( ८ पल ) से दूध ( २० प्रस्थ ) में घी ( २ प्रस्थ ) सिद्ध करे । इसको शर्करा पिप्पली और मधु के साथ प्रयोग करे । यह अत्यन्त वृष्य है | [ अष्टाग संग्रह में शतावरी कल्क के साथ २ शतावरी रस का प्रयोग लिखा है ] ॥ १८ ॥
कर्ष मधुकचूर्णस्य घृतक्षौद्रसमाशिकम् ।
प्रयुङ्क्ते यः पयश्चानु नित्यवेगः स ना भवेत् ॥ १६ ॥
इति वृष्य मधुकयोगः ।
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पा ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २६३ वृष्य मधुक योग — मुलहठी का चूर्ण १ कर्ष, घी और शहद पृथक् २ एक कर्ष मिलाकर चाटे, पीछे से दूध पी ले । इस प्रयोग से पुरुष का नित्य वेग रहता है ॥ १६ ॥
घृत airaat निर्भीर्निव्र्व्याधिर्नित्यगो युवा ।
सङ्कल्पप्रवणो नित्यं नरः स्त्रीषु वृषायते ॥ २० ॥
जो व्यक्ति प्रतिदिन घी और दूध का पर्याप्त मात्रा में सेवन करता है, भय और रोग रहित, नित्य प्रति व्यवाय करनेवाला, सदा रमण की इच्छा रखता हुआ युवा पुरुष सदा मैथुन करने में समर्थ रहता है ॥ २० ॥
कृतकृत्या. सिद्धार्था ये चान्योन्यानुवर्तिनः ।
कलासु कुशलास्तुल्याः सत्त्वेन वयसा च ये ॥ २१ ॥
कुलमाहात्म्यदाक्षिण्यशीलशौचसमन्विताः ।
ये काम त्या हृष्टा ये विशोका गतव्यथाः ॥ २२ ॥
ये तुल्यगीला ये भक्ता ये प्रिया ये प्रियंवदाः ।
तर्नरः सह विश्रब्ध सुवयस्यैर्वृषायते ॥ २३ ॥
एक ही काम करनेवाले, सिद्ध साध्य ( अथवा जिनके मतलब परस्पर निकलते हैं ), जो एक दूसरे के पीछे चलते हैं एक दूसरे का कहा मानते हैं, गीत, वादित्र आदि कलाओं मे कुशल, मन और आयु में समान, उत्तम कुल, बड़प्पन, दाक्षिण्य ( चतुराई ), शील, पवित्रता से युक्त, सदा कामुक, प्रसन्न चित्त, शोक और पीड़ा से रहित, समान स्वभाव के, परस्पर विश्वासी, प्रिय ( इच्छुक ), मधुर भाषी हों, ऐसे विश्वासपात्र मित्रों के वीर्य सम्पन्न होता है ॥ २१-२३ ॥
अभ्यङ्गोत्सादनस्नानगन्धमाल्यविभूषणैः ।
गृहशय्यासनमुखेर्वासोभिरतः प्रिये. ॥ २४
विहङ्गानां रुतैरिष्टैः स्त्रीणा चाभरणस्वनै. ।
संवाहनर्वरस्त्रीणामिष्टाना च वृषायते ॥ २५
अभ्यग ( मालिश ), उबटन, स्नान, गन्ध, माला, साथ रहने से पुरुष ॥ ॥ आभूषण, आराम-वाला घर, कोमल शय्या, सुन्दर आसन, प्रिय नवान वस्त्र, पक्षियों का कलरव और वाच्छित स्त्रियों से, आभूषणों की झकार से, सुन्दर स्त्रियों द्वारा सवाहन अर्थात् मुट्ठिया भर कर दबाने से पुरुष में वृषता आती है ॥ २४-२५ ॥
मत्तद्विरेफाचरिताः सपद्माः सलिलाशयाः ।
जात्युत्पलसुगन्धीनि शीतगर्भगृहाणि च ॥ २६ ॥
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२६४ चरकसंहिता [ अ ० २
नद्यः फेनोत्तरीयाच गिरयो नीलसानवः ।
उन्नतिर्नीलमेघानां रम्यचन्द्रोदया निशाः ॥ २७ ॥
वायवः सुखसस्पर्शाः कुमुदाकरगन्धिनः ।
रतिभोगक्षमा रात्र्यः संकोचागुरुवल्लभाः ॥ २८ ॥
सुखाः सहाया ' परपुष्टघुष्टाः फुल्ला वनान्ता विशदान्नपानाः ।
गान्धर्वशब्दाश्च सुगन्धयोगाः सत्त्वं विशालं निरुपद्रवं च ॥ २६ ॥
सिद्धार्थता चाभिनयच काम. स्त्री चायुधं सर्वमिहात्मजस्य ।
वयो नवं जातमश्च कालो हर्षस्य योनि परमा नराणाम् ॥ ३० ॥
मत्त भ्रमरों से गुञ्जित और कमलों से भरा तालाब, चमेली और कमल की महक से सुगन्धित शीतल गर्भगृह, तरंगों की टक्करों से उत्पन्न नाग से भरी नदिया, हरी - भरी चोटी वाले पर्वत, नीलवर्ण के मेघों का आकाश में मडराना, सुन्दर चादनी रातें, कुमुदों की महक से तर, स्पर्श में सुखदायक वायु, रतिभोग के लायक रात्रियों ( बादलों का घिरा होना ), [ यहा पर सब ऋतुओं की दृष्टि से वर्णन किया है । ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त, शिशिर और वसन्त सबका ही वर्णन है । ] सकोच ( केशर ) और अगर का लेप लगाये कामिनिया, सुख-दायक, सहायक, खिले हुए और कोयल की कुहू से गुजित वन, विशद ( निर्मल ) अन्नपान, गाना - बजाना ( राग - रागिणिया ), भीनी - भीनी सुगन्ध, शोक चिन्ता से रहित उदार और उपद्रव रहित मन, कार्य की सफलता, नूतन उठा हुआ काम और स्त्रियों ये कामदेव के अस्त्र हैं । नई उठती हुई जवानी, मस्त करने वाला वसन्त का समय जिसमें मद उत्पन्न होता है, ये सब वस्तुएँ पुरुषों मे
हर्ष को उत्पन्न करने वाली हैं । इन भावों से काम उद्दीप्त होता है ॥२६-३० ॥
तत्र श्लोकः - प्रहर्षयोनयो योगा व्याख्याता दश पञ्च च ।
माषपर्णभृतीयेऽस्मिन् पादे शुक्रबलप्रदाः ॥ ३२ ॥
उपसंहार - —— इस माषपर्णीय वाजीकरण तृतीय पाद में प्रहर्ष के कारण तथा शुक्र और बल को बढ़ाने वाले पन्द्रह प्रयोग कहे हैं ॥३१ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रति सस्कृते चिकित्सितस्थाने माषपर्णभृतीयो नाम वाजीकरणपादस्तृतीयः । ( चतुर्थः पादः ) अथातः पुमाञ्जातबलादिकं चतुर्थ वाजीकरणपादं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति स्म isse भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
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पा ० ४ ] चिकित्सितस्थानम २६५ इसके आगे ' पुमान् - जात - बलादिक ' नामक चतुर्थ वाजीकरण पाद की व्याख्या करते हैं । भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है
पुमान् यथा जातबलो यावदिच्छं स्त्रियो व्रजेत् ।
यथा चापत्यवान् सद्यो भवेत्तदुपदेक्ष्यते ॥ ३ ॥
न हि जातबलाः सर्वे नराश्चापत्य भागिनः ।
बृहच्छरीरा बलिनः सन्ति नारीषु दुर्बला ॥ ४
सन्ति चाल्पबलाः स्त्रीषु बलवन्तो बहुप्रजाः ।
प्रकृत्या चाबलाः सन्ति सन्ति चामय दुर्बलाः ॥
नराश्चटकवत्केचिद् व्रजन्ति बहुशः स्त्रियम् ।
गजवच्च प्रसिञ्चन्ति केचिन्न बहुगामिन ॥ ६ ॥
कालयोगबलाः केचित्केचिदभ्यसनभ्र्वा ।
केचित्प्रयत्नैर्बाह्यन्ते वृषाः केचित्स्वभावतः ॥ ७
तस्मात्प्रयोगान्वक्ष्यामो दुर्बलानां बलप्रदान् ।
सुखोपभोगान् बलिना भूयश्च बलवर्धनान् ॥ ८
पुरुष जिस प्रकार से यथेष्ट स्त्रियों में रमण कर सकता है || १-२ ॥ ॥ ५ ॥ ॥ ॥ और जिस प्रकार से सन्तानवान् हो सकता है, उसका विस्तार से वर्णन करते हैं— संसार में यह आवश्यक नहीं कि जितने भी बलवान् व्यक्ति हैं, वे सब सन्तान वाले हों । ऐसे भी बहुत से पुरुष हैं जो बलवान् और पूरे डीलडौक के हैं, परन्तु स्त्रियों के विषय में कमजोर होते हैं । दूसरे पुरुष शरीर रचना में निर्बल हैं, परन्तु स्त्रियों में बलवान् हैं । इनमें कुछ तो प्रकृति से ही निर्बल होते हैं और कुछ रोग आदि से कमजोर हो जाते है । कई व्यक्ति तो चिड़ों के समान बहुत बार ( लगातार जल्दी जल्दी ) स्त्रियों से मैथुन करते हैं और कई व्यक्ति गज के तुल्य कभी कभी मैथुन करते हैं, वे बहुत बार मैथुन नही करते । जब कभी सहवास करते हैं तो हाथी के समान वे बड़ी मात्रा मे, अधिक शुक्र बहाते हैं 1 । कई व्यक्ति विशेष समय में ही बलवान् होते हैं, और कई बार बार अभ्यास ( मैथुन करने ) से समर्थ हो जाते है । कई व्यक्ति चुम्बन, आलिंगन आदि प्रयत्नों से बल प्राप्त करते हैं और कई स्वभाव से ही बलशाली, वीर्यसेचन में समर्थ होते हैं । इसलिये दुर्बलों के लिये बलप्रद और बली पुरुषों के बल को बढानेवाले और उपभोग मे सुखकर वृष्य प्रयोगोग वर्णन करते हैं । १ शुक्र के प्रवाह को नियमित करनेवाले दो केन्द्र हैं । एक मस्तिष्क मे और दूसरा मेरुदण्ड में । प्रथम केन्द्र का सम्बन्ध प्रायः विचारों के साथ और
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२६६ चरकसंहिता [ अ ० २
पूर्व शुद्धशरीराणां निरूहान् सानुवासनान् ।
बलापेक्षा प्रयुञ्जीत शुक्रापत्यविवर्धनान् ॥ ६ ॥
घृततैलरस श्रीरशर्कराम बुसयुताः ।
बस्तयः संविधातव्याः क्षीरमासरसाशिनार ॥ १० ॥
इति वृष्या बनयः । इसके लिये सब से प्रथम शुद्ध ओर स्वस्थ पुरुष को बल के अनुसार शुक्र और उन्तान ad निरूह तथा अनुवासनबस्ति देनी चाहिये । दूध और मास रस का आहार करनेवाले व्यक्ति के लिये घी, तैल, मास रस, दूध, शर्करा और शहद इनसे युक्त बस्तिया दोषानुसार देनी चाहियें । [ अष्टाग संग्रह
विस्तार में बस्तिया दा हैं । चरक में सिद्धिकर में बस्तियों का वर्णन है ] ॥६-१० ॥
पिष्ट्वा वराहनासानि दत्त्वा मरिचसैन्धवे ।
कोलवद् गुडिकाः कृत्वा तप्ते सापषि भजयेत् ॥ ११ ॥
3 भजन स्तम्भितास्ताश्च प्रक्षेयाः कौकुटे रसे ।
घृताये गन्धपिशुने दधिदाडिमसाधिते ॥ १२ ॥
यथा न भिन्द्याद् गुडिकास्तथा तं साधयेद्रसम् ।
त पिबन् भक्षयस्ताश्च लभते शुक्रमक्षयम् ॥ १३ ॥
मासानामेवमन्येषां मेध्यानां कारयेद्भिषक् ।
गुडिकाः सरसानासा प्रयोगः शक्रवधनः ॥ १४ ॥
इति वृष्या मासगुडिकाः । मांसगुड़िका - सुअर के मास को पास कर इसमें मरिच और सैन्धा नमक मिला कर बेर के समान गोलिया बना लेवे । इनको गरम घी में भून ले । भूनने पर जब कठोर हो जायें तब इनको मुर्गे के मास रस मे डुबो दे । इसमे दूसरे का क्रिया के साथ है । परन्तु एक केन्द्र के उत्तेजित होने पर दूसरा केन्द्र स्वय उत्तेजित हो जाता है । इसलिये शुक्र क्षरण में वीर्य की मात्रा एक ही व्यक्ति में समय भेद से भिन्न २ होती है । वैसे तो सब मनुष्यों में मात्रा भेद रहता है 1 । कोई २४ रत्ती, कोई ६० बूद, कोई १० से १५ ग्राम मानता है । देखने में बलवान् पुरुष नपुसक न हो, यह कोई नियम नहीं है । कुश्ती, बठक, दण्ड खास कर बचपन से करने वाले व्यक्ति प्रायः नपुंसक होते हैं । स्त्रीसहवास में विशेष रूप से वे जल्दी क्षरित हो जाते हैं । १ ' पूर्व सुस्थ शरीराणा ' इति च पाठः । २ ' वर्त्तयेत् ' इति च पाठ । ३ ' वर्त्तन ' इति च पाठः