श्रीगणेशाय नमः।

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 281–290

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 281–290

पृष्ठ 281

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पा ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् २६७ प्रचुर घी, इलायची, केशर, कर्पूर आदि को गन्ध, दही और अनार रस मिला कर इस प्रकार से पकावे जिससे कि गुटिकायें टूटे नही । इन गुटिकाओं को खाने से तथा मास रस को पीने से शुक्र की वृद्धि होती है । इसी प्रकार से अन्य मेध्य ( मेदुर या भक्ष्य ) मासों को, गुटिकाओं को मास रस में सिद्ध करके प्रयोग करने से वीर्य की वृद्धि होती है ॥११- १४ ॥

माषानङ्करिता शुद्धान्नस्तुषान् साजडाफलान् ।

घृताये माहिषर से दधिदाडिमसारिके ॥ १५ ॥

प्रक्षिपेन्मात्रया युक्तान् धान्यजी रकनागरैः ।

भुक्त पीतश्च स रसः कुरुते शुक्रमक्षयम् ॥ १६ ॥

इति वृष्यो माहिषरसः । माहिष रस - उड़दों को जड़ाकर अकुरित कर ले । इनको धोकर छिलके उतार दे । इसी प्रकार से कौच के फलों का भी छिलका उतार दे । इनको प्रचुर घी, भैंसे का मांस रस, दही और अनार के रस के साथ पकावे । पकते समय इसमें परिमाण से धनिया, जीरा और सोंठ मिला दे । इनको खाने तथा पीने सेशन अत्यन्त बढता है ॥ १६ ॥

आर्द्राणि मत्स्यमासानि भृष्टाश्च शफरीश्च वा ।

तप्ते सर्पिषि यः खादेत्स गच्छेत्स्रोषु न क्षयम् ॥ १७ ॥

इति वृष्य घृतभृष्टमत्स्य मासानि । मछलियों ( खासकर रोहित ) का ताज़ा मास और शफरी मछली को घी में भून कर खाने से संभोग के समय शुक्र क्षरित नहीं होता ॥१७ ॥

घृतभृष्टान् रसे छागे रोहितान फलसारिके ।

अनुपीतरसान् सिद्धानपत्यार्थी प्रयोजयेत् ॥ १८ ॥

इति गर्भाधानकरा योगः । सन्तान को चाहने वाले व्यक्ति रोहित ( रोहू ) मछली को घी में भून कर बकरे के मास रस में डालकर अनार के रस के साथ पकाकर इनको खाये तथा मास रस पीये ॥ १८ ॥

कुट्टकं मत्स्यमासानां हिसेन्धवधान्यकैः ।

युक्तं गोधूमचूर्णेन घृते पूपलिकाः पचेत् ॥ १६ ॥

पूपलिका योग — मछलियों के मास को कूटकर इसमें हींग, सैन्धानमक, धनिया मिलाकर गेहूं के आटे में खान घी मे पूपलिकायें ( कचौरिया ) पकावे । अथवा गेहूं के आटे में मछलियों के मास का कीमा भरकर कचौरी की तरह पकावे || १६ ||

पृष्ठ 282

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२६८ चरकसंहिता [ अ ० २

माहिषे च रसे मत्स्यान् स्निग्धाम्ललवणान् पचेत् ।

रसे चानुगते मांसं पोथयेत्तत्र चावपेत् ॥ २० ॥

मरिचं जीरकं धान्यमल्पं हि नवं घृतम् ।

माषपूपलिकानां तद् गर्भार्थमुपकल्पयेत् ॥ २१ ॥

एतौ पूपलिकायोग बृंहणौ बलवर्धनौ ।

हर्षसौभाग्यजननौ परं शुक्राभिवर्धनौ ॥ २२ ॥

इति वृष्यौ पूपलिकायोगौ । मछलियों के मास को घी, अनार का रस और सैन्धानमक के साथ भैंस के मास रस में पकाना चाहिये । जब मास रस शुष्क हो जाये तब मास को कूट कर इसमें मरिच, जीरा, धनिया, थोड़ा सा हींग और ताज़ा घी मिलाना चाहिये । अब उड़द के आटे में इसको पिट्ठी के रूप में भरकर घी में तल लेवे । ये दोनो प्रकार की पूपलिकायें बृहण ( पुष्टिदायक ) बलवर्द्धक, प्रहर्ष और सौभाग्य को उत्पन्न करनेवाली तथा शुक्रवर्द्धक हैं ॥ २०-२२ ॥

माषात्मगुप्तागोधूमशालिषष्टिकपौष्टिकम् ।

शर्कराया विदार्याश्च चूर्णमिक्षुरकस्य च ॥ २२ ॥

संयोज्य मसृणे क्षीरे घृते पूपलिकाः पचेत् ।

पयोऽनुपानास्ताः शीघ्रं कुर्वन्ति वृषतां परम् ॥ २४ ॥।

इति वृष्या माषादिपूपलिकाः । माषादि पूपलिका—- उड़द, कौंच, गेहूँ, शाली चावल, साठी चावल, इन सब का आटा, शर्करा, विदारीकन्द का चूर्ण, तालमखाने का चूर्ण, इनको दूध के साथ गूधकर घी में तल लेवे । इनको खाकर ऊपर से दूध पीले । ये

अत्यन्त शुक्रवर्धक है । २३–२४ ॥

शर्करायास्तुका स्यादेका गव्यस्य सर्पिषः ।

प्रस्थो विदार्याश्वर्णस्य पिप्पल्याः प्रस्थ एव च ॥ २५ ॥

अर्धाढकं तुगाक्षीर्याः क्षौद्रस्याभिनवस्य च ।

तत्सर्वं मूच्छितं तिष्ठेन्मार्तिके घृतभाजने ॥ २६ ॥

मात्राग्निसमां तस्य प्रातः प्रातः प्रयोजयेत् ।

एष वृष्य. परं योगो बल्यो बृंहण एव च ॥ २७

इति वृष्ययोगः । वृष्य योग - खाण्ड १ तुला ( १०० पल ), गाय का घी १ कन्द का चूर्ण १ प्रस्थ, पिप्पली एक प्रस्थ, वशलोचन आधा तुला, विदारी-आढक, ताजा

पृष्ठ 283

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पा ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् २६ मधु १ आढक, इन सबको घी से भावित मिट्टी के पात्र में डालकर रखे । इसकी अग्नि - बल के अनुसार मात्रा प्रतिदिन प्रातःकाल खावे । यह योग अत्यन्त वृष्य बल्य एव बृहण है ॥। २७ ॥

शतावर्या विदार्याश्च तथा माषात्मगुप्तायोः ।

श्वदंष्ट्रायाश्च निष्काथान् जलेषु च पृथक पृथक ॥ २८ ॥

साधयित्वा घृतप्रस्थं पयस्यष्टगुणे पुनः ।

शर्करामधुसंयुक्तमपत्यार्थी प्रयाजयेत् ॥ २६ ॥

इत्यपत्यकरं घृतम् । अपत्यकर घृत - शतावरी, विदारीकन्द, कौंच, उड़द, गाखरू इनका पृथक् पृथक् वाथ बनावे | इन सब काथों से एव आठ प्रस्थ ( परिभाषा के अनुसार द्विगुण १६ प्रस्थ ) दूध के साथ एक प्रस्थ घी पकावे । इस घी को शर्करा और मधु के साथ मिला कर संतानाथी पुरुष खावे ॥ २८-२६ ॥

घृतपात्रं शतगुणे विदारीस्वरसे पचेत् ।

सिद्धं पुनः शतगुणे गव्ये पयसि साधयेत् ॥ ३० ॥।

शर्करायास्तुगाक्षीर्याः क्षौद्रस्येक्षुरसस्थ च ।

पिप्पल्याः साजडायाश्च भागेः पादाशिकेर्युतम् ॥ ३१ ॥

गुडिकाः कारयेद्वैद्यो यथा स्थूलमुदुम्बरम् ।

तासा प्रयागात्पुरुषः कुलिङ्ग इव हृष्यति ॥ ३२ ॥

इति वृष्यगुटिकाः । वृष्य गुटिका - गाय के ८ प्रस्थ घी को ८०० प्रस्थ विदारीकन्द के रस में सिद्ध करे । इस सिद्ध घी को ८०० प्रस्थ गाय के दूध में पकावे । इस प्रकार से सिद्ध घी में खाड, वंसलोचन, शहद, गन्ने का रस, पिप्पली, कौंच ये घी से चतु-थश मिलावे | इसकी मोटे गूलर के समान गोलिया बना कर प्रयोग करे | इसके प्रयोग से पुरुष कुलिंग की भाति हर्षयुक्त होता है । [ यहा पर यदि प्रक्षेप द्रव्य प्रत्येक चतुर्थाश लिया जाये तो गोलिया आराम से बन जायेंगी । ] ॥३०-३२ ॥

सितोपलापलशतं तदर्ध नवसपिषः ।

क्षौद्रपादेन सयुक्त साधयेज्जलपादिकम् ॥ ३३ ॥

सान्द्र गोधूमचूर्णाना पाद स्तीर्णे शिलातले ।

शच लक्षणे समुत्कीय मर्दनेनापपादयेत् ॥ ३४ ॥

शुद्धा उत्कारिका कार्याश्चन्द्रमण्डलसन्निभाः ।

तासां प्रयोगाद् गजवन्नारीः संतर्पयेन्नरः ॥ ३५ ॥

इति वृष्योत्कारिका ।

पृष्ठ 284

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२७० चरकसंहिता | अ ० २ वृष्योत्कारिका - मिसरी १०० पल, ताज़ा घी ५० पल, मधु २० पल, जल २५ पल इनको यथाविधि मिलावे । पहिले पानी और मिश्री से चास पका कर घी डाले, ठण्डा होने पर मधु मिळावे । इसमें गेहूं का कर मथे । अब इसको साफ चिकनी शिला पर फैला कर

ये उत्कारिकार्ये चन्द्रमा के मण्डल के समान गोल हों ।

हाथी के समान स्त्रियों को तृप्त करता है ॥ ३३-३५ ॥

यत्किञ्चिन्मधुरं स्निग्धं जीवनं बृहणं गुरु ।

हृषणं मसश्चैव सर्वं तद्वृध्यमुच्यते ॥ ३६

द्रव्यैरेवंविधैस्तस्माद्भावितः प्रमदा व्रजेत् ।

आत्मवेगेन चोदीर्णः स्त्रीगुणैश्च प्रहर्षितः ॥

गत्वा स्नात्वा पयः पीत्वा रस चानुशयीत तथाऽस्याप्यायते भूयः शुक्र च बलमेव च ॥

यथा मुकुलपुष्पस्य सुगन्धो नोपलभ्यते ।

लभ्यते तद्विकाशात्तु तथा शुक्रं हि देहिनाम् ॥

नर्ते वै षोडशाद्वर्षात्सप्तत्या. परता न च । आयुष्कामो नरः स्त्रीभिः संयोगं कर्तुमर्हति अतिबालो ह्यसपूर्णसर्वधातु स्त्रियो व्रजन् । आटा २५ पल मिला उत्कारिकायें बनावे । इनके प्रयोग से पुरुष ॥ ३७ ॥

ना ।

३८ ॥

३६ ॥

॥ ४० ॥।

उपनप्येत सहसा तडागमिव काजलम् ॥ ४१ ॥

शुष्कं रूक्षं यथा काष्ठ जन्तुजग्ध विजर्जरम् ।

स्पृष्टमाशु विशीर्येत तथा वृद्धः स्त्रियो व्रजन् ॥ ४२ ॥

वृष्य का लक्षण – जो कोई भी वृष्य मधुर, स्निग्ध, जीवनदायक, पौष्टिक, गुरु, मन में हर्ष उत्पन्न करता है, वह सब वृष्यगुण वाले हैं । अतः वृष्य द्रव्यों के सेवन से, अपने बल तथा कामवेग से प्रेरित, स्त्री के रूप, हाव, भाव आदि गुणों से आकर्षित होकर मैथुन करे । मैथुन के पीछे स्नान करके, दूध या मासरस को पीकर सो जाने से ह्रास हुआ शुक्र और बल पुनः प्राप्त हो जाता है । जिस प्रकार कि फूल के डोडे में गन्ध का पता नहीं चलता, परन्तु फूल के खिलने पर गन्ध स्पष्ट हो जाती है, इसी प्रकार बाल्यावस्था में शुक्र प्रकट नहीं होता । परन्तु यौवनावस्था में शुक्र प्रकट हो जाता है । जो पुरुष दीर्घ आयु १ बारह वर्ष तक अष्ठीला ग्रन्थि तथा शिश्न के अन्दर की ग्रन्थियों का रस आता है जो कि देखने में प्रायः वीर्य से मिलता है । इसमें न तो शुक्राणु होते ह आर न वह सन्तानोत्पत्ति ही कर सकता है ।

पृष्ठ 285

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पा ० ४ ] चिकित्सितस्थानम २७१ चाहता हो वह सोलह वर्ष से पूर्व और सत्तर साल के पीछे स्त्री के साथ सहवास न करे । क्योंकि सोलह वर्ष से पूर्व छोटी अवस्था में धातुओं के असम्पूर्ण, कच्ची अवस्था में होने से सम्भोग करने पर थोडे पानी वाले तालाब की भाँति सूख जाता है, क्षीण हो जाता है । जिस प्रकार से थोड़े पानी वाला तालाब ज़रा सी गरमी से खुश्क हो जाता है, इसी प्रकार थोड़े से ही शुक्र क्षय से पुरुष भी क्षीण हो जाता है और यदि सत्तर वर्ष की आयु का वृद्ध पुरुष स्त्री- सहवास करता है, तो वह सूखा, रूखा ( स्नेह रहित ), जिस प्रकार कि सूखी, जजरित घुण से खाई लकड़ी छूने से गिर जाती है, इसी प्रकार वह वृद्ध पुरुष भी सहवास के झटके को सह नहीं सकता, गिर पडता है ॥ ४०-४२ ॥

जरया चिन्तया शुक्र व्याधिभिः कर्मकर्षणात् ।

क्षयं गच्छत्यनशनात्स्त्रीणा चातिनिषेवणात् ॥ ४३ ॥

निम्न कारणों से शुक्र का क्षय होता है - बुढापे से, चिन्ता से, रोगों से, अति शारीरिक या मानसिक श्रम से, भोजन न करने से और सेवन से शुक्र क्षय होता है ॥ ४३ ॥

क्षयाइयादविश्रम्भाच्छाकात्त्रीदोषदर्शनात् ।

नारीणामरसज्ञत्वादभिचागदसेवनात् ॥ ४४ ॥

तृप्तस्यापि स्त्रियो गन्तु न शाक्तरुपजायते ।

देहसन्त्वबलापेक्षी हर्षः शक्तिश्च हर्षजा ॥ ४५ ॥

रस इक्षौ यथा दहिन सर्पितैलं लेि यथा ।

सर्वत्रानुगतं देहे शुक्रं संस्पर्शने तथा ॥ ४६ ॥

तत्स्त्रीपुरुषसंयोगे चेष्टासंकल्पपीडनात् ।

शुक्र प्रच्यवते म्थानाज्जलमार्द्रात्पटादिव ॥ ४७ ॥

निम्न अवस्थाओं में शुक्र प्रवृत्त नहीं होता - - धातुओं के शुक्र के ) श्वय से, भय से, विश्वास ( निश्चिन्तता ) न होने से में दोष देखने से, स्त्रियों के फूहड़ ( अरसज्ञ ) होने से, सकल्प स्त्रियों के अति ( विशेष रूप से , शोक से, स्त्री अर्थात् मनोयोग न होने से, सहवास न करने से, मैथुन से तृप्त होने से, शुक्र उत्पन्न नहीं होता । हर्ष ( उत्तेजना ) शरीर और मन तथा बल की अपेक्षा रखती है । शक्ति ( मैथुन, सामर्थ्य ) हर्ष से उत्पन्न होती है । जिस प्रकार कि रस सम्पूर्ण गन्ने में रहता है, घी सम्पूर्ण दही के कण कण में व्यास है, तैल तिल के अणु अणु में भरा होता है, इसी प्रकार से शुक्र भी शरीर की स्व - इन्द्रिय में, स्पर्शज्ञान - युक्त स्थानों में रहता है, वह सर्वत्र व्याप्त है । [ कइयों के मत से नख और केशाग्र में

पृष्ठ 286

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III चरकसहिता [ अ ० २ शुक्र नहीं है । परन्तु जब इनकी वृद्धि और ह्रास होता है तो शुक्र का होना भी निश्चित है । शरीर का कोई भी अश ऐसा नहीं जहा वीर्य न हो ] । यह शुक्र स्त्री और पुरुष के सयोग होने पर, चेष्टा, सकल्प तथा परस्पर पीड़न ( सम्मूर्छन, दबाने ) के कारण अपने वास्तविक स्थान से पृथक् होकर झरने लगता है, जिस प्रकार कि गीले कपड़े से पानी टपकने लगता है ॥४४-४७ ॥

हर्षात्तर्षात्सरत्वाश्च पैच्छिल्याद् गौरवादपि ।

अणुप्रवणभावाच्च द्रुतत्वान्मारुतस्य च ॥ ४८ ॥

अष्टाभ्य एभ्यो हेतुभ्यः शुक्रं देहात्प्रसिच्यते । निम्न आठ कारणों से शुक्र सम्पूर्ण शरीर से मथा जाकर प्रवृत्त होता है । हर्ष से, वर्ष ( उपभोग की इच्छा ) से, सर गुण होने से ( बहने का स्वभाव होने से ), पिच्छिल ( चिकना ) होने से, गौरव ( गुरु ) होने से, अणु ( सूक्ष्म ) होने से, प्रवण ( बाहर निकलने का स्वभाव होने से ), १ वायु के शीघ्रगामी होने से वीर्य बाहर आता है ॥ ४८- ॥ १. कावराज गंगाधर सन ने ' हषात्सरत्वारसोम्याच ' यह पाठ दिया है । इसी प्रकार ' अणु - प्रवण - भावाच्च ' के स्थान पर ' अनुप्लवनभावाच्च ' यह पाठ पढ़ा है । ' अनुप्लवन ' का अर्थ शिश्न को मास पेशियों का रह रह कर संकोच होना बताया है । इन कोचों के कारण वीर्य झटकों के साथ बाहर आता है । वीर्य का वरण वात पर निर्भर है । यह केन्द्र मस्तिष्क और मेरुदण्ड में है । " सुप्रसन्न मनस्तत्र हर्षणे हेतुरुच्यते । " सुश्रुत २. साधारणत. जब कामेच्छा उत्पन्न होती है उस समय शरीर के अवयवों में परिवर्तन आरम्भ हो जाता है । यह परिवर्तन मुख्य रूप से श्वास का तेज होना, गालों में लालिमा का दौड़ना, किसी काम में दिल न लगना, शिश्न में हर्ष, छाती में कम्पन होता है । इस अवस्था में रक्तसंचार में भो अन्तर आ जाता है । रक्तसन्चार की गति बढ़ जाती है । इतना ही नहीं, रक्त के अन्दर स्वय परिवर्तन आ जाता है । इसका प्रभाव माता के दूध पर भी पड़ जाता है । कामेच्छा के समय पिलाया दूध शिशु को हानि करता है । इन परिवर्तनों के कारण पुरुष के अण्ड अपना अन्तः स्त्राव को उत्पन्न करने का कार्य बन्द करके, बहि. साव पैदा करने लगते हैं । इस वीर्य के गाढ़ा होने के कारण यह शिश्न तक पहुँच जाये इसलिये इसमें पौरुष ग्रन्थि तथा शिश्न में मूत्र मार्ग की दिवारों मे रहने वाली ग्रन्थिया अपना अपना रस मिला देती हैं । यदि यह रस बहुत मिल जाये तो वीर्य पतला हो जाता है ।

पृष्ठ 287

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पा ० ४ ] १८ चिकित्सितस्थानम् २७३ चरतो विश्वरूपस्य रूपद्रव्यं यदुच्यते ॥ ४६ ॥

मनुष्य, पशु, पक्षी आदि नाना योनियों में विचरने वाले विश्वरूप आत्मा के रूप को प्रकट करने वाला यही द्रव्यरूपी वीर्य है । इसी वीर्य के कारण आत्मा का अव्यक्त रूप स्पष्ट होता है ॥४६ ॥

बहलं मधुरं स्निग्धमवित्रं गुरु पिच्छिलम् ।

शुक्लं बहु च यच्छुक फलवत्तदखशयम् ॥ ५० ॥

येन नारीषु सामर्थ्य वाजीवल्लभते नरः ।

ब्रजेश्वाभ्यधिकं येन वाजीकरणमेव तत् ॥ ५१ ॥

प्रशस्त शुक्र- बहल ( घना ), मधुर ( गन्ध में, प्रतिक्रिया में मधुर, उदा-सीन ), स्निग्ध, अविस्र ( दुर्गन्धरहित ), गुरु, पिच्छिल ( चिक्कास से युक्त ), श्वेत वर्ण, मात्रा मे अधिक जो शुक्र होता है, वह अवश्य सतानोत्पत्ति मे कारण बनता है । शुक्र की प्रतिक्रिया मृदु क्षारीय है और यह क्षारीय ( मृदु ) माध्यम को ही पसन्द करता है । जिन ओषव या आहार - विहार के कारण पुरुष घाड़े के समान स्त्रियों में रमण करने के लिये सामथ्र्यवान् बनता है, जिनके द्वारा अधिक समय तक मैथुन कर सकता है, उनका वाजीकरण कहते है ॥५० - ३१ ॥

तत्र श्लोको - हेतुयोगापदेशस्य यागा द्वादश चोत्तमाः ।

यत्पूर्व मथुनात्सव्य सव्य यन्मथुनादतु ॥ ५२ ॥

यदा न सव्याः प्रमदाः कृत्स्नः शुक्रावानश्चयः ।

निरुक्तं चेह निदिष्टं पुमाञ्जातबलादिके ॥। ५३ ॥

इस पाद में वाजाकरण योगो के उपदेश का कारण, बारह उत्तम प्रयोग, मैथुन से पूर्व तथा पीछे जिन वस्तुओं का सेवन करना चाहिये उनको, जब मैथुन नहीं करना चाहिये, वीर्य का सम्पूर्ण ज्ञान, वाजीकरण की निरुक्ति इस ' पुमाञ्जातबलादिक ' पाद मे कह दी है ॥ ५२-५३ ॥ इत्यग्निवशकृत तन्त्र चरकप्रतिसस्कृत चिकित्सास्थाने पुमाञ्जातबलादिको

नाम वाजीकरणपादश्चतुर्थ. ।

समासश्चाय द्विताया वाज करणाऽव्याय. ॥ २ ॥

तृतीयोऽध्यायः अथातो ज्वरचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्मा ss ह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

इसके आगे ' ज्वर- चिकित्सा ' की व्याख्या करते हैं, भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥

पृष्ठ 288

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२७४ चरकसंहिता [ अ ० ३

विज्वरं ज्वरसंदेहं पर्यपृच्छत्पुनर्वसुम् ।

विविक्ते शान्तमासीनमग्निवेश कृताञ्जलिः ॥ ३ ॥

देहेन्द्रियमनस्तापी सर्वरोगाग्रजो बली ।

ज्वरः प्रधानं रोगाणामुक्तो भगवता पुरा ॥ ४ ॥

तस्य प्राणिसपत्नस्य ध्रुवश्य प्रलयोदये ।

प्रकृति च प्रवृत्ति च प्रभाव कारणानि च ॥ ५ ॥

पूर्वरूपमधिष्ठानं बलकालात्मलक्षणम् ।

व्यासतो विधिभेदाच्च पृथग्भिन्नस्य चाकृतिम् ॥

लिङ्गमागस्य जीर्णस्य सौषधं च क्रियाक्रमम् ।

६ ॥

विमुञ्चतः प्रशान्तस्य चिह्नं यच्च पृथक् पृथक् ॥ ७ ॥

ज्वरावशिष्टो रक्ष्यश्च यावत्कालं यतो यतः ।

प्रशान्तः कारणैर्यैश्व पुनरावर्तते ज्वरः ॥ ८ ॥

यावापि पुनरावृत्ति क्रियाः प्रशमयन्ति तम् ।

जगद्धितार्थं तत्सर्वं भगवन् 1 । वक्तमर्हसि ॥ ६ ॥

ज्वर ( सन्ताप, बाधा ) रहित, नीरोग शान्तरूप में एकान्त स्थान में बैठे हुए पुनर्वसु से हाथ जोड़कर अग्निवेश ने अपने ज्वरसम्बन्धी सन्देह को पूछा । हे भगवन्! आपने निदानस्थान में देह और इन्द्रिय तथा मन को तपाने बाला, सब रोगों में प्रथम, बलवान् तथा सब रोगों में प्रधान ज्वर को बतलाया था । प्राणिमात्र के शत्रु, जन्म और मृत्यु के समय अवश्यम्भावी इस ज्वर की प्रकृति, प्रवृत्ति ( उत्पत्ति ), कारण, पूर्वरूप, अधिष्ठान ( आश्रय ), बल, काल, आत्मलक्षण ( ज्वर के अपने लक्षण ), विस्तार रूप में भिन्न हुए ज्वर के लक्षण, आमज्वर के लक्षण, जीर्ण ज्वर के लक्षण, इनकी औषध, चिकित्सा क्रम, छोड़ते हुए तथा शान्त ज्वर के पृथक् २ लक्षण, ज्वर से मुक्त व्यक्ति को कितने समय तक किन बातों से बचना उचित है, शान्त होने पर भी किन किन कारणों से ज्वर पुनः आ जाता है, दुबारा लौटे हुए ज्वर की चिकित्सा यह शान्त होता है, इन सब बातों को आप जगत् की उपदेश करे ॥ ३ ९ ॥

तदग्निवेशस्य बच्चो निशम्य गुरुरब्रवीत् ।

ज्वराधिकारे यद्वाच्यं तत्सौम्य! निखिलं शृण ॥

ज्वरो विकारो रोगश्च व्याधिरातङ्क एव च ।

एकोऽर्थो नामपर्यायैर्विविधैरभिधीयते ॥ ११ ॥

क्रम, जिनसे कि भलाई के लिये १० ॥

पृष्ठ 289

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अ ० ३ ] चिकित्सतस्थानम् ^ ^^^^ V

तस्य प्रकृतिरुद्दिष्टा दोषाः शारीरमानसाः ।

देहिनं नहि निर्दोषं ज्वरः समुपसेवते ॥ १२ ॥

क्षयस्तमो ज्वरः पाप्मा मृत्युश्वोक्ता यमात्मकाः पञ्चत्वप्रत्ययान्नृणा क्लिश्यता स्वेन कर्मणा ॥ १३

इत्यस्य प्रकृतिः प्रोक्ता, प्रवृत्तिस्तु परिग्रहात् ।

निदाने पूर्वमुद्दिष्टा रुद्रकोपाच्च दारुणात् ॥ १४

अग्निवेश के इस प्रकार कहे वचनों को सुनकर भगवान् हे सौम्य! ज्वर के विषय मे जो कुछ भी कहना है वह २७५ ″ ॥॥। आत्रेय ने कहा सब सुनो । ज्वर, विकार, रोग, व्याधि, आतक इन सब विविध नाम पर्यायों से एक ही बात कही जाती है, ये सब रोग के पर्याय हैं । शारीरिक और मानसिक दोष इस ज्वर की प्रकृति ( समवायि - कारण ) हैं । इन शारीरिक तथा मानसिक दोषों से रहित पुरुष को ज्वर नहीं आता । अपने अपने कर्मों के कारण क्लेश पाते हुए मनुष्यों को पञ्चत्व ( मृत्यु ) की प्रतीति होने से क्षय, तम, ज्वर, पाप्मा, मृत्यु ये सब रोग ( विकार ) यम रूप होते हैं । यह ज्वर की प्रकृति अर्थात् स्वाभाविक रूप है । परिग्रह ( धनादि मे ममता ) के कारण इसकी प्रवृत्ति ( उत्पत्ति ) होती है । तथा निदानस्थान में दारुण रुद्र कोप से भी ज्वर की उत्पत्ति बतलाई है | [ परिग्रह से ज्वर की उत्पत्ति देखो जनपदाध्वंसनीय अध्याय ( विमान ० अ ० ३ ) ' अश्यति तु कृतयुगे ' इत्यादि ] ॥ १०–१४ ॥

द्वितीये हि युगे शर्वमक्रोधव्रतमास्थितम् ।

दिव्यं सहस्र वर्षाणामसुरा अभिदुद्रुवुः ॥ १५ ॥

तपोविघ्नं शमीकर्तुं तपोविघ्नं महात्मनाम् ।

पश्यन समर्थश्चोपेक्षां चक्रे दक्षः प्रजापतिः ॥ १६ ॥

पुनर्महेश्वर भाग ध्रुवं दक्षः प्रजापतिः ।

यज्ञेन कल्पयामास प्रोच्यमानः सुरेरपि ॥ १७ ॥

ऋऋचः पशुपतेर्याश्च शेव्यश्वाहुतयश्च याः ।

यज्ञसिद्धिप्रदास्ताभिर्हीनं चैव स इष्टवान् ॥ १८ ॥

अथोत्तीर्णव्रतो देवो बुद्धवा दक्षव्यतिक्रमम् ।

रुद्रो रौद्रं पुरस्कृत्य भावमात्मविदात्मनः ॥ १६ ॥

सृष्ट्वा ललाटे चक्षुर्वै दग्ध्वा तानसुरान् प्रभुः ।

बाणं क्रोधाग्निसंततमसृजत्सत्रनाशनम् ॥ २० ॥

ततो यज्ञः स विध्वस्तो व्यथिताश्च दिवौकसः ।

पृष्ठ 290

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२७६ चरकसंहिता [ अ ० ३ दाहव्यथापरीताश्च भ्रान्ता भूतगणा दिशः ॥ २१ ॥

अथेश्वरं देवगणः सह सप्तर्षिभिविभुम् ।

तमृग्भिरस्तुवद्यावच्छेवे भावे शिवः स्थितः ॥ २२ ॥

शिवं शिवाय भूताना स्थित ज्ञात्वा कृताञ्जलिः ।

भिया भस्मप्रहरणस्त्रिशिरा नवलोचनः ॥ २३ ॥

ज्वालामालाकुलो रौद्रो हस्त्रजवोदरः क्रमात् ।

क्रोधाग्निरुक्तवान् देवमह कि करवाणि ते ॥ २४ ॥

तमुवाचेश्वरः क्रोधं ज्वरो लोके भविष्यसि ।

जन्मादौ निधने च त्वमपचारान्तरेषु च ॥ २५ ॥

दूसरे युग ( त्रेता ) में क्रोध न करने का व्रत पालन करते हुए शर्व ( महादेव ) के समय हज़ारों दिव्य वर्षों तक तप में विह्नकारी असुर लोग महात्माओं के तप में विघ्न करने के लिये अनेक उपद्रव करने लगे । परन्तु इस समय समर्थशील होते हुए भी दक्ष प्रजापति ने इनकी उपेक्षा की । दक्ष ने यज्ञ की रचना की । देवताओं के कहने पर भी दक्ष प्रजापति ने महादेव के / लिये यज्ञभाग ( रुद्र - भाग ) नहीं दिया । इतना ही नहीं, अपितु यज्ञ की सफलता को देने वाली पशुपति सम्बन्धी ऋचाओं तथा शिव - सम्बन्धी आहुतियों को छोड़ते हुए, उनसे रहित यज्ञ किया । इसके पश्चात् जब महादेव कात पूरा हुआ, तब दक्ष प्रजापति का व्यतिक्रम ( नियम भग ) हुआ जान कर आत्म-ज्ञानी शिव ने अपना रौद्र रूप प्रकट किया । अपने माथे में स्थित तृतीय चतु को खोल कर, असुरों को जला कर भस्म कर दिया । फिर रुद्र ने क्रोधाग्नि से तपा बाण सत्र ( यज्ञ ) के नाश के लिये फेंका । इससे यज्ञ तो नष्ट हो गया परन्तु देवता भी दुःखित हुए । समस्त प्राणी दाह और व्यथा से चिल्लाने लगे । वे दिशाओं में भागने लगे, सब ओर तहलका मच गया । इसके पीछे सप्तर्षियों के साथ देवताओं ने ऋचाओं द्वारा भगवान् महादेव की तब तक स्तुति की जब तक कि वे अपने पुन. शिवरूप में नहीं आ गये । स्तुति से रुद्र प्रसन्न हो गये । वे रौद्र रूप को त्याग शिव रूप में आ गये । जब महादेव ने प्राणियों के कल्याण की इच्छा से शिवरूप धारण कर लिया, उस समय क्रोधाग्नि ने भयभीत होकर कहा कि मैं आपकी क्या सेवा करूँ, मुझको आदेश दीजिये । इस क्रोधाग्नि के शस्त्र भस्म थे, तीन शिर, नौ आख, ज्वालाओं से व्यास, रुद्र, भयंकर, छोटी जघाए, छोटा पेट था । महेश्वर ने क्रोध को कहा ससार में प्राणियों के जन्म और मृत्यु के समय, तथा अन्य अपचारों ( ज्वर - निदान के सेवन आदि ) से तू लोक में ' ज्वर ' होगा ॥ १५-२५ ॥