श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 291–300
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 291–300
पृष्ठ 291
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् II
सन्तापः सारुचिस्तृष्णा चाङ्गमर्दो हृदि व्यथा ।
ज्वरप्रभावो जन्मादौ निधने च महत्तमः ॥ २६ ॥
प्रकृतिश्च प्रवृत्तिश्च प्रभावश्च प्रदशितः ।
निदाने कारणान्यष्टौ पूर्वोक्तानि विभागशः ॥ २७ ॥
सन्ताप, अरुचि, तृष्णा, अगमर्द ( अगों में पीड़ा अगड़ाई आदि ), हृदय में पीड़ा का अनुभव होना यह ज्वर का प्रभाव है । ये लक्षण अपथ्य सेवन से उत्पन्न ज्वर के हैं । जन्म तथा मृत्यु के समय होने वाला ज्वर महा-तम होता है । इस प्रकार से प्रकृति, प्रवृत्ति और प्रभाव कह दिये हैं । निदान-स्थान में ज्वर के आठ कारण विभाग रूप में प्रथम कहे जा
आलस्यं नयने सास्त्रे जृम्भण गौरवं क्लमः ।
ज्वलनातपवाय्खम्बुभक्तिद्वेषाव निश्चितौ ॥ २८
अविपाकस्य वैरस्ये हानिश्च बलवर्णयो ।
शीलवैकृतमल्प च ज्वरलक्षणमग्रजम् ॥ २६ ॥
केवलं समनस्कं च ज्वराधिष्ठानमुच्यते ।
शरीरं, बलकालस्तु निदाने सप्रदर्शितः ॥ ३०
ज्वर का पूर्वरूप - आलस्य, आखों में आलू, जम्भाई चुके हैं ॥ २६-२७ ॥ ॥ ॥ , शरीर में भारीपन, क्लम, आग, धूप, वायु, पानी, भोजन में अनिश्चित रूप से इच्छा और द्वेष का होना, अपचन, मुख की विरसता, बल और वर्ण की हानि, स्वभाव का परिवर्त्तन ये ज्वर के सक्षिप्त पूर्वरूप है । सम्पूर्ण शरीर और मनोयुक्त शरीर ही ज्वर का आश्रय स्थान है । ज्वर का बल - काल निदान स्थान में दिखा दिया है ॥२८-३० ॥
ज्वरप्रत्यात्मिकं लिङ्गं संतापो देहमानसः ।
ज्वरेणाविशता भूतं न हि किचिन्न तप्यते ॥ ३१ ॥
ज्वर का अपना स्वरूप - देह और मन का सन्ताप ही ज्वर का अपना स्वरूप है । ज्वर से आक्रान्त होने पर प्राणि का कोई भी ऐसा अग नहीं होता, जो कि तपता नहीं, गरम नहीं होता । अपितु सारा शरीर अन्दर और बाहर से गरम हो जाता है || ३१ ॥
द्विविधो विधिभेदेन ज्वरः शारीरमानसः ।
पुनश्च द्विविधो दृष्टः सौम्यश्चाग्नेय एव च ॥ ३२ ॥
अन्तर्वेगो बहिर्वेगो द्विविधः पुनरुच्यते ।
प्राकृतो वैकृतश्चैव साध्यश्चासाध्य एव च ॥ ३३ ॥
• पचविध दृष्टदोषकालबलाबलात् ।
पृष्ठ 292
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२७८ चरकसंहिता [ अ ० ३ www . संततः सततोऽन्येद्युस्तृतीयकचतुर्थकौ ॥ ३४ ॥
पुनराश्रयभेदेन धातूनां सप्तधा मतः ।
भिन्नः कारणभेदेन पुनरष्टविधो ज्वर ॥ ३५ ॥
विधि - भेद से ज्वर दो प्रकार का है । एक शारीर ज्वर और दूसरा मानस ज्वर । फिर भी ज्वर दो प्रकार का देखा जाता है । जैसे-- सौम्य और आग्नेय । वेग के अभिप्राय से भी दो प्रकार का है । अन्तर्वेग और बहिर्वेग । प्राकृत और वैकृत । साध्य और असाध्य भेद से भी ज्वर दो प्रकार का है । दोष और काल के बल अबल के भेद से ज्वर पाच प्रकार का देखा गया है । जैसे -- सन्तत, सतत, अन्येद्युष्क, तृतीयक और चतुर्थक । रस आदि सात धातुओं के भेद से ज्वर सात प्रकार का है । जैसे—– रसज, रक्तज, मासज, मेदज, अस्थिज, मजाज और शुक्रज । कारण भेद से ज्वर आठ प्रकार का है । जैसे —- वातज, पित्तज, कफज, पित्त - कफज, वात - कफज, वात - पित्तज, और सन्निपातज तथा आगन्तुज ॥३२-३५ ॥
शारीरो जायते पूर्व देहे मनसि मानसः ।
वैचित्यमरतिग्लनिर्मनसस्तापलक्षणम् ॥ ३६ ॥
इन्द्रियाणा च वैकृत्य देहसन्तापलक्षणम् ।
वातपित्तात्मकः शीतमुष्णं वातकफात्मकः ॥
इच्छत्युभयमेतत्त ज्वरो व्यामिश्रलक्षणः ।
योगवाही परं वायु संयोगादुभयार्थकृत् ॥
दाइकृत्तेजसा युक्तः शीतकृत्सोमसश्रयात् । शारीरिक ज्वर वातादि दोष के कारण प्रथम शरीर में पीछे से मन आक्रान्त होता है । परन्तु मन में उत्पन्न होने में होता है, पीछे से शरीर में आता है । मानस ज्वर ३७ ॥ ३८ ॥ उत्पन्न हो जाता है । वाला ज्वर प्रथम मन के लक्षण - चित्त का विश्चित होना, बेचैनी, ग्लानि का होना है । शारीरिक ज्वर में इन्द्रियों में विकृति उत्पन्न हो जाती है ( अभिलषित विषय भी तब अच्छे नहीं लगते ) । वात-पित्तजन्य ज्वर में उष्णता की चाह करता है ।: मिश्रित लक्षणों वाले ज्वर में शीत और उष्ण दोनों की चाह करता है । वायु अतियोगवाही है – सयोग के कारण दोनों कार्य करता है । पित्त के साथ मिलने से उष्णिमा, कफ के साथ मिलने से शीतलता को उत्पन्न करता है ॥ ३६-३८ ॥ अन्तर्दाहोऽधिकस्तृष्णा प्रलापः श्वसनं भ्रमः ॥ ३६ ॥
सन्ध्यस्थिशूलमस्वेदो दोषवर्चोविनिग्रहः ।
पृष्ठ 293
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २७६ अन्तर्वेगस्य लिङ्गानि ज्वरस्येतानि लक्षयेत् ॥ ४० ॥
अन्तर्वेग वर के लक्षण - शरीर के अन्दर दाह, प्यास का अधिक होना, प्रलाप, बवास का तेज़ी से चलना, चक्कर आना, सन्धियों और अस्थियों में शूल, पसीने का आना, दोषों तथा वर्च ( मल ) का रुक जाना, बाहर न आना, ये अन्तर्वैग वर के लक्षण हैं ॥ ३६-४० ॥
सन्तापोऽभ्यधिको बाह्यस्तृष्णादीना च मार्दवम् ।
बहिर्वेगस्य लिङ्गानि सुखसाध्यत्वमेव च । ४१ ॥
बहिवेंग ज्वर के लक्षण - स्वर मे बाह्य ताप अधिक रहता है, तृष्णा, प्रलाप आदि लक्षण थोड़ी मात्रा में होते हैं, यह ज्वर सुखसाध्य है ॥ ४१ ॥
प्राकृतः सुखसाध्यस्तु वसन्तशरदुद्भवः ।
कालप्रकृतिमुद्दिश्य प्राच्यते प्राकृतो ज्वरः ॥ ४२ ॥
उष्णमुष्णन सवृद्ध पित्त शरदि कुप्यति ।
चित. शीते कफश्चैव वसन्ते समुदीर्यते ॥ ४३ ॥
वसन्त और शरद् ऋतु में उत्पन्न होने वाला प्राकृत ज्वर सुखसाध्य है । वसन्त में उत्पन्न इनिवाला कफज्वर, शरद में उत्पन्न होने वाला पित्तज्वर है । [ वर्षाऋतु में होनेवाला वातज्वर प्राक्का होते हुए भी सुखसाध्य नही है । ] यहॉ पर काल - स्वभाव को देखकर हो यह प्राकृत ज्वर कहा जाता है । सञ्चित हुआ उष्ण गुणवाला पित्त धूर आदि की उष्णिमा के कारण शरद ऋतु में कुपित होता है । इसी प्रकार से शीतकाल में सचित कफ वसन्त ऋतु में कुपित होता है ॥ ४२-४३ ॥
वर्षास्वम्लविपाकाभिरोषधीभि ' सवारिभि. ।
सञ्चितं पित्तमुद्रिक ' I शरद्यादित्यतेजसा ॥ ४४ ॥
ज्वर संजनयत्याशु तस्य चानुबलः कफः ।
प्रकृत्यैव विसर्गाच्च तत्र नानशनाद्भयम् ॥ ४५ ॥
प्राकृत पचिक ज्वर — वर्षाऋतु मे ओषधियों और जलों के अम्लविपाकी होने से सूचित पित्त शरद् ऋतु मे सूर्य के तेज से प्रकुपित होकर शीघ्र ज्वर को उत्पन्न करता है | काल के स्वभाव तथा विसर्ग के कारण इस उवर के साथ कफ का अनुबन्ध हो जाता है । अतः प्रकृति स्वभाव तथा विसर्ग काल होने से लंघन करने पर भी कोई नुकसान नहीं होता ॥ ४४-४५ ॥ १. ' रद्भिरोषधिभिस्तथा ' इति च पाठः । २. ' पित्तमुत्क्लिष्टं ' इति च ।
पृष्ठ 294
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
चरकसंहिता [ अ ० ३
अद्विरोषधिभिचैव मधुराभिश्चितः कफः ।
हेमन्ते सूर्यसन्तप्तः स वसन्ते प्रकुप्यति ॥ ४६ ॥
वसन्ते श्लेष्मणा तम्माज्ज्वरः समुपजायते ।
आदानमध्ये तस्यापि वातपित्तं भवेदनु ॥ ४७ ॥
आदावन्ते च मध्ये च बुद्धवा दोषबलाबलम् ।
शरद्वसन्तयोर्विद्राज्वरस्य प्रतिकारयेत् ॥ ४८ ॥
कालप्रकृतिमुद्दिश्य निर्दिष्टः प्राकृतो ज्वरः । मधुर रस, जल और औषधियों द्वारा हेमन्त ऋतु में संचित कफ, बसन्त-ऋतु में सूर्य की गरमी द्वारा कुपित होता है । इसलिये वसन्तऋतु में कफजन्य ज्वर उत्पन्न होता है । जिससे यह आदान काल का मध्यवर्ती समय होता है, इसलिये वायु और पित्त भी इस कफ के अनुबन्ध बन जाते हैं । इससे इस समय भी थोड़ा लंघन करने से कोई भय नही रहता । कफ और पित्त दोनों द्रव धातु हैं, अतः ये लंघन को सहन कर सकते हैं । इसलिये वैद्य को चाहिये कि शरद् तथा वसन्त ऋतु में उत्पन्न प्राकृत ज्वर की चिकित्सा काल के आदि, अन्त और मध्य में दोष के बलाबल को देखकर करे । वसन्त के प्रारम्भ में कफ प्रबल, मध्य में मध्यबल, और अन्त में निर्बल, शरद् के प्रारम्भ पित्त प्रबल, मध्य में मध्यबल और अन्त में निर्बल होता है । इस प्रकार काल की प्रकृति के उद्देश्य से प्राकृत ज्वर को कह दिया है ॥ ४६-४८ ॥ प्रायेणानिलजो दुःखः कालेष्वन्येषु वैकृतः ॥ ४६ ॥ ॥
वर्षाऋतु में होनेवाला वातजन्य ज्वर प्राकृत होते हुए भी प्रायः कष्टसाध्य होता है । इसी प्रकार अन्य कालों मे ( शरद् ऋतु में कफजन्य या वसन्त में पित्तजन्य ) उत्पन्न वैकृत ज्वर विरुद्ध चिकित्सा होने से कष्टसाध्य है ॥ ४६ ॥
taat fafa धास्तस्य निदाने संप्रदर्शिताः ।
बलवत्स्वल्पदोषेषु ज्वर. साध्योऽनुपद्रवः ॥ ५० ॥
इस वैकृतज्वर के निदान कारणों को निदानस्थान में कह दिया है ।
बलवान् तथा अल्प दोषवाले पुरुषों में उपद्रवों से रहित ज्वर साध्य है ॥ ५० ॥
हेतुभिर्बहुभिर्जातो बलिभिर्बहुलक्षणः ।
ज्वरः प्राणान्तकृद्यश्च शीघ्रमिन्द्रियनाशनः ॥ ५१ ॥
जो ज्वर बहुत प्रबल कारणों को लेकर उत्पन्न होता है, बहुत से लक्षणों से युक्त हो शीघ्र इन्द्रिय - शक्तियों को नष्ट कर देता है, वह ज्वर प्राणनाशक होता है ॥ ५१ ॥
पृष्ठ 295
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ३ ] चिकित्सतस्थानम २८१ MAAAA
सप्ताहाद्वा दशाहाद्वा द्वादशाहात्तथैव च ।
सप्रलापभ्रमश्वासस्तीक्ष्णो हन्याज्ज्वरो नरम् ॥ ५२ ॥
प्रलाप, भ्रम ( चक्कर आना ), श्वास इन लक्षणों से युक्त तीक्ष्ण ज्वर सात दिन में, वातजन्य दस दिन में, पित्तजन्य और बारह दिन में कफजन्य ज्वर घातक होता है ॥ ५२ ॥
ज्वरः क्षीणस्य शूनस्य गम्भीरो ढैर्धरात्रिकः ।
असाध्यो बलवान् यश्च केशसीमन्नकृज्ज्वरः ॥ ५३ ॥
क्षीण और शोष से युक्त व्यक्ति में गम्भीर और दीर्घकाल तक रहने वाला ज्वर असाध्य होता है । बलवान् ज्वर तथा जिसके कारण बालों में सीमंत ( माग ) पड़ जाती है, वह ज्वर भी असाध्य है ॥ ५३ ॥
स्रोतभिर्विता दोषा गुरवो रसवाहिभिः ।
सर्वगात्रानुगा स्तब्धा ज्वरं कुर्वन्ति सन्ततम् ॥ ५४ ॥
प्रकुपित और आम सहित होने से गुरु वातादि दोष रसवाही स्रोतों द्वारा फैलकर सम्पूर्ण अगों ( शरीर ) में पहुच कर जड हो जाते हैं, इससे सन्तत ज्वर उत्पन्न होता है ॥ ५४ ॥
दशाहं द्वादशाहं वा सप्ताहं वा सुदुःसहः ।
स शीघ्र शीघ्रकारित्वात्प्रशमं याति हन्ति वा ॥ ५५ ॥
कालदृष्य प्रकृतिभिर्दोषस्तुल्यो हि सन्ततम् ।
निष्प्रत्यनीकः कुरुते तस्माज्ज्ञेयः सुदुःसहः ॥ ५६
यथा धातुं तथा मूत्रपुरीषं चानिलादयः ।
युगपञ्चानुपद्यन्ते नियमात् सन्तते ज्वरे ॥ ५७ ॥
स शुद्धया वाप्यशुद्धया वा रसादीनामशेषतः ।
सप्ताहादिषु कालेषु प्रशसं याति हन्ति वा ॥ ३८
यदा तु नातिशुध्यन्ति न वा शुध्यन्ति सर्वशः ।
द्वादशैते समुद्दिष्टाः सन्ततस्याऽऽश्रय स्तदा ॥ ५६
विसर्ग द्वादशे कृत्वा दिवसेऽव्यक्तलक्षणम् ।
दुर्लभोपशमः काल दीर्घमप्यनुवर्तते ॥ ६० ॥
इति बुद्ध्वा ज्वरं वैद्य उपक्रामेत्तु सततम् ।
क्रियाक्रमविधौ युक्तः प्रायः प्रापतर्पणै. ॥ ६१ ॥
॥
॥
॥
यह दुःसह सन्तत ज्वर शीघ्रकारी होने के कारण दस दिन में ( पित्तजन्य होने से ), बारह दिन में ( कफजन्य होने से ), अथवा सात दिन में ( वातजन्य
पृष्ठ 296
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२८२ चरकसंहिता [ अ ० ३ होने से ) शीघ्र शान्त हो जाता है, अथवा रोगी को मार देता है । सन्तत ज्वर के दुःसह होने का कारण -काल, दृष्य ( रस आदि धातु ) और प्रकृति के वातादि दावों के तुल्य होने से सन्तत ज्वर कष्टसाध्य होता है । सन्तत ज्वर में वात आदि दोष जिस प्रकार से रस आदि धातुओं में पहुँचते हैं, उसी प्रकार से युगपत् रूप में मूत्र तथा मल में भी पहुचते हैं । यह सन्ततज्वर रस आदियो के सर्वथा शुद्ध होने पर या अशुद्धावस्था में सप्ताह आदि काल के अन्दर या तो स्वय शान्त हो जाता है, अथवा मार देता है । जिस समय सन्तत ज्वर के बाहर आश्रय ( तीन दोप, सात धातु और मल तथा मूत्र ) अत्यन्त शुद्ध नही होते अथवा कुछ शुद्ध हो जाते हैं और कुछ अशुद्ध रहते हैं, तब बारहवें दिन अस्पष्ट लक्षणों से ज्वर उतर जाता है, परन्तु कष्टसाध्य होकर दीर्घ काल तक चलता रहता है | सन्तत ज्वर को इस प्रकार से समझ कर चिकित्सा आरम्भ करनी चाहिये | चिकित्सा में मी प्रथम अपतर्पण ( लघन ) आरम्भ करना चाहिये || ५७-६१ ॥
रक्तधात्वाश्रय प्रायो दोषः सततक ज्वरम् ।
सप्रत्यनीकः कुरुते कालवृद्धिक्षयात्मकम् ॥ ६२ ॥
अहोरात्र सततको द्वो कालावनुवर्तते । विरोधी दोष प्रायः करके रक्त धातु में आश्रित होकर काल में बढ़ने वाले और काल में घटने वाले ( क्षीण होने वाले ) सतत ज्वर को उत्पन्न करते हैं । यह ज्जर समय पर बढ़ता है और समय पर घटता है । काल प्रकृति और दूष्य इनमे से किसी एक का बल प्राप्त करक सतत ज्वर दिन रात में ( २४ घन्टे में ) दो बार आता है ॥ ६२- ॥ कालप्रकृतिदूष्याणा प्राप्यवान्यत्माद्बलम् ॥ ६३ ॥
दोषो मेदोवहा रुद्ध्वा नाडारत्येक ज्वरम् ।
सप्रत्यनीकः कुरुते एककालमहर्निशि ॥ ६४ ॥
दोषोऽस्थिमज्जगः कुर्यात्तनीयक चतुर्थ को । काल प्रकृति और दूष्य इनमें से किसी एक के विरोध होने पर दोष मेदोवहा नाड़ियों को रोक कर अन्येद्युष्क ज्वर को उत्पन्न करते हैं । यह दिन रात में एक वार आता है । अस्थि ओर मजा मे दोष पहुच कर तृतीयक और चतुर्थक ज्वर को उत्पन्न करते हैं । ॥ ६३-६४- ॥ गतिद्वर्थेकान्तरान्येद्यर्दोषस्योकाऽन्यथा परैः ॥ ६५ ॥
रक्तमेवाभिससृज्य कुर्यादन्येद्युक ज्वरम् ।
मांसस्रोतांस्यनुसृतो जनयेत्तु तृतीयकम् ॥ ६६ ॥।
पृष्ठ 297
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ३ ] चिकित्सतस्थानम www
ज्वरं दोषः संसृतो हि मेदो मार्ग चतुर्थकम् ।
अन्येद्युष्कः प्रतिदिनं दिनं क्षिप्त्वा तृतीयकः ॥
दिन यो विश्राम्य प्रत्येति स चतुर्थकः ।
अधिशेते यथा भूमि बीजं काले च रोहति ॥
अधिशेते तथा धातु दोषः काले च कुप्यति ।
स वृद्धि बलकाल च प्राप्य दोषस्तृतीयकम् ॥
चतुर्थक च कुरुते प्रत्यनीकबलक्षयात् । २८३ ६७ ॥ ६८ ॥ ६६ ॥ कृत्वा वेगं गतबलाः स्वे स्वे स्थाने व्यवस्थिता ॥ ७० ॥
पुनर्विवृद्धाः काले ज्वरयन्ति नर मलाः । दोषों की गति - प्रति दिन, एक दिन के अन्तर से और दो दिन के अन्तर से कही गई है । जब प्रति दिन ज्वर आता है उसे अन्येद्युष्क कहते हैं, एक दिन के अन्तर से आवे तो ' तृयीयक ' और दो दिन अतर से आवे तो ' चतुर्थक ' कहते हैं । अन्येद्युष्क ज्वर प्रति दिन लौट कर आता है, तृतीयक ज्वर एक दिन छोड़ कर आता है, चतुर्थक ज्वर दो दिन पीछे लौट कर आता है । जिस प्रकार कि बीज भूमि में पड़ा रहता है और अपने समय पर उगता है, इसी प्रकार से वातादि दोष रस, रक्तादेि धातुओं में पड़े रहते है और समय पाकर प्रकुपित होते हैं । दोष, बल और काल की सहायता पाकर विरोधी बढ के क्षीण होने पर तृतीयक और चतुर्थक ज्वर को उत्पन्न करते हैं । ज्वर वेग को उत्पन्न करके निर्बल हुए दोष अपने अपने स्थानों में पहुच जाते हैं | अपने अनुकूल परिस्थिति ( काल ) में ज्वर को पुनः उत्पन्न कर देते हैं ॥ कफपित्तात् त्रिकग्राही पृष्ठाद् वातकफात्मकः वातपित्ताच्छिरोमाही त्रिविधः स्यात्तृतीयकः तृतीयक ज्वर तीन प्रकार का है । जिस तृतीयक ज्वर ( कूल्हे ) में वेदना होती है, वह कफ - पिच के कारण होता ज्वर में पीठ में वेदना प्रथम होती है वह वात - कफजन्य है
मे शिर में वेदना प्रथम होती है, वह वात - पित्तजन्य है ।
तृतीयक ज्वर तीन प्रकार है ॥ ७१ ॥
६५-७०- ॥
॥ ७१ ॥
। में प्रथम त्रिक स्थान है । जिस तृतीयक । जिस तृतीयक ज्वर इस प्रकार से यह चतुर्थको दर्शयति प्रभावं विविध ज्वरः ॥ ७२ ॥
जङ्घाभ्यां श्लैष्मिकः पूर्व शिरस्तोऽनिलसंभवः ।
विषमज्वर एवान्यश्चतुर्थ कविपर्ययः ॥ ७३ ॥
त्रिविधो धातुरेकैको द्विधातुस्थः करोत्ययम्!
पृष्ठ 298
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२८४ चरकसंहिता [ अ ० ३ चतुर्थक ज्वर दो प्रकार से अपना प्रभाव दिखाता है, अतः वह दो प्रकार का है । जिस ज्वर में आक्रमण जघाओं की ओर से या पाव से होता है वह कफजन्य है और जिसमें शिर पर सबसे प्रथम आक्रमण होता है वह वायुजन्य है । ' चतुर्थक ज्वर का ही एक विपर्यय ( भेद ) विषम ज्वर है । यह तीन धातु वात, पित्त, कफ में से किसी एक धातु के दो धातुओं में स्थिति होने से होता है । इस ज्वर मे एक दिन आक्रमण नहीं होता, फिर अगले दो दिन होता है और फिर एक दिन नहीं होता ॥ ७२-७३- ॥ प्रायशः संनिपातेन दृष्टः पञ्चविधो ज्वरः ॥ ७४ ॥
सन्निपाते तु यो भूयान स दोषः परकीर्तितः । प्रायः करके ( कहीं कहीं अपवाद भी होता है ), सन्तत, सतत, अन्येद्युष्क, तृतीयक, चतुर्थक और सनिपात ( त्रिदोष ) से उत्पन्न यह पाच प्रकार का ज्वर होता है । सनिपात के समय जो भी दोष प्रबल होता है, उसी के नाम से उस ज्वर को कहते हैं दूसरे दोषों का भी अनुबन्ध थोड़ा बहुत रहता है ॥ ७४ ॥
ऋत्वहोरात्रदोषाणा मनसश्च बलाबलात् ॥ ७५ ॥
कालमर्थवशाचैव ज्वरस्त तं प्रपद्यते । ऋतु, दिन, रात, दोष और मन के बल - अबल के कारण तथा अर्थवश ( प्राक्तन कर्म ) के कारण उस उस समय में ज्वर होता है । [ जैसे -- ऋतु के aroras से वर्षाकाल से वर्षाकाल में उत्पन्न वातप्रधान सतत ज्वर विरोधी शरद् ऋतु में अन्येद्युष्क रूप में आ जाता है । अहोरात्र वसन्त काल के मध्य दिवसों मे उत्पन्न वातिक चतुर्थक ज्वर पिछले दिनों में बलवान् होकर तृतीयक हो जाता है । मन के बल से ज्वर अन्य रूप में आ जाता है । कहा भी है " विषाद का करना भी रोग को बढ़ाने वाला है " । ] ॥ ७५ ॥
गुरुत्व दैन्यमुद्वेगः सदनं छर्द्यरोचकौ ॥ ७६ ॥
रसस्थिते बहिस्तापः साङ्गमर्दों विजृम्भणम् ।
रक्तोत्था पिडकास्तृष्णा सरकं ष्टविन मुहुः ॥ ७७ ॥
दाहरागभ्रम मदाः प्रलापो रक्तसंस्थिते ।
अन्तर्दाहोऽधिकस्तृष्णा ग्लानि. संसृष्टविकता ॥ ७८ ॥
१. हारीत सहिता में पित्तजन्य चतुर्थक ज्वर भी माना है । २. ‘ शैत्यमु ' इति च पाठः । ३ ' रक्तोष्ठः ' इति च पाठः । ४ ' श्रम ' इति पाठ । ५. ' अन्त-दहः सतृण्मोहः सग्लानिः सृष्टविकता ' इति वा पाठ. ।
पृष्ठ 299
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २८५ vv
दौर्गन्ध्य गात्रविक्षेपो ' ज्वरे मांसस्थिते भवेत् ।
स्वेदस्तत्रापिपासा च प्रलापो वम्य भीक्ष्णशः ॥ ७६ ॥
स्वगन्वस्यासहत्वं च मेदःस्थे ग्लान्यरोचकौ ।
विरेकवमने चोभे सास्थिभेद 3 प्रकूजनम् ४ ॥ ८० ॥
विक्षेपणं च गात्राणा श्वासवास्थिगते ज्वरे ।
हिक्का " ५ श्वासस्तथा कासस्तमसश्चातिदर्शनम् ॥ ८१ ॥
मर्मच्छेदो बहिः शेत्य दाहोऽन्तश्चैव मज्जगे ।
शुक्रस्थानगते शुक्रमोक्ष कृत्वा विनाश्य च ८२ ॥
प्राणवाय्वग्निसामैश्च सार्धं गच्छत्यसो विभुः ।
रसरक्ताश्रितः साध्यो मेदोमासगतश्च यः ॥ ८३ ॥
अस्थिमज्जगत कृच्छ्रः शुक्रस्थो नैव सिध्यति । सातों धातुओं में आश्रित ज्वर के लक्षण – ( १ ) रस मे ज्वर के आश्रित होने पर भारीपन, दीनता, बेचैनी, शिथिलता, वमन, अरुचि, बाहर ताप, अंगों में पीड़ा और जभाई आती है । ( २ ) रक्त - धातु में आश्रित होने पर रक्तजन्य पिड़काये, प्यास, रक्त मिश्रित थूक का बार बार आना, दाह, राग ( लालिमा ) चक्कर आना, मद, ( मूर्च्छा ) और प्रलाप होता है । ( ३ ) मास में आश्रित होने पर शरीर के अन्तर जलन, प्यास, ग्लानि, अतिसार, दुर्गन्ध, हाथ पाव का फेकना होता है । ( ४ ) मेद में आश्रित होने पर बहुत पसीना आना, प्यास, प्रलाप, बार बार वमन, अपने ही शरीर की गन्ध का सहन न होना, ग्लानि और अरुचि होती है । ( ५ ) अस्थिगत ज्वर में अतीसार, वमन, अस्थियों में पीड़ा, कराहना, हाथ पाव को फेंकना, ज़ोर या तेज़ी से श्वास का चलना होता हूँ । ( ६ ) मजा धातु में ज्वर के आश्रित होने पर चिकी, श्वास, कास आँखों के सामने अन्धकार का दिखाई देना, मर्मान्तक पीड़ा, शरीर का ऊपर से ठण्डा परन्तु अन्दर जलन होता है । ( ७ ) शुक्र ( वीर्य ) में आश्रित होने पर शुक्र का स्राव होता है, इस अवस्था में विभु ( आत्मा ), प्राण, वायु,, अभि और सोम के साथ चला जाता है, रोगी मर जाता है । इनमे से रस, रक्त, मास और मेद में आश्रित ज्वर साध्य है, अस्थि और मजा में आश्रित ज्वर कष्टसाध्य है, शुक्रस्थ ज्वर असाध्य है ॥ ७६-८३ ॥ १. ' ऊष्मान्तर्दाहविक्षेपौ ' इति च । २. ' S रत्यभी ' इति च । ३ ' सास्थि-मेदान्त्रकू ' इति च । ४. ' कुञ्चनम् ' इति च । ५. ' मेह ' इति च पाठः ।
पृष्ठ 300
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२८६ चरकसंहिता हेतुभिर्लक्षणैश्वोक्तः पूर्वमष्टविधो ज्वरः ॥ ८४
समासेनोपदिष्टस्य व्यासतः शृण लक्षणम् ।
शिरोरुक पर्वणां भेदो दाहो रोम्णां प्रहर्षणम् ॥
कण्ठास्यशोषो वमथुस्तृष्णा मूर्च्छा भ्रमोऽरुचिः स्वप्ननाशोऽतिवाग्जृम्भा वातपित्तज्वराकृतिः ॥ शीतको गौरव तन्द्रा स्तैमित्यं पर्वणा च रुक् । [ अ ० ३ ॥ ८५ ॥
' ।
८६ ॥
शिरोग्रहः प्रतिश्यायः कासः स्वेदाप्रवर्तनम् ॥ = ७ ॥
संतापो मध्यवेगश्च वातश्लेष्मज्वराकृति ।
मुहुर्दाहो मुहुः शीतं स्वेदस्तम्भो मुहुमुहुः ॥ ८८ ॥
मोहः कासोऽरुचिस्तृष्णा श्लेष्मपित्तप्रवर्तनम् ।
लिप्ततिक्ताम्यता तन्द्रा इलेष्म पित्तज्वराकृतिः ॥ ८६ ॥
इत्येते द्वन्द्वजाः प्रोक्ताः सन्निपातज उच्यते । प्रथम निदानस्थान में हेतु और लक्षणों सहित आठ प्रकार ज्वर कहा है । वहाँ पर सक्षेप में कहा था, अब उसको विस्तार मे कहते हैं-( १ ) वात पित्त ज्वर के लक्षण - सिर में दर्द, पोरुओं में फूटने की सी पीड़ा, जलन, लोमहर्ष, गले और मुख का शुष्क होना, वमन, पिपासा, मूच्र्छा, भ्रम, अरुचि, निद्रानाश, अविक बोलना और जभाई का आना ये वातपित्त ज्वर के लक्षण हैं । [ यहाँ पर द्वन्द्वज ज्वरों के ही लक्षण कहे हैं । वात, पित्त, कफजन्य ज्वरों के लक्षणों को विस्तार से निदानस्थान में कह दिया है ] । ( २ ) वात कफ ज्वर के लक्षण - शीतक ( शीत लगना या शीत पिस ), भारीपन, तन्द्रा, स्तिमितता ( गीले वस्त्र से आच्छादित के समान अनुभव ), पोरुओं में दर्द, शिर का जकड़ा होना, प्रतिश्याय, कास पसीने का न आना, सन्ताप और ज्वर का मध्यम वेग होना ये वात कफ ज्वर के लक्षण हैं । ( ३ ) कफ - पित्त ज्वर के लक्षण - बार बार दाह ( गरमी ), बार बार शीत ( सर्दी ) लगना, बार बार पसीना आना वा न आना, मोह ( मूर्च्छा ), कास, अरुचि, प्यास, वमन या मल के द्वारा कफ और पित्त की प्रवृत्ति, मुख का कफ से भरा होना तथा कडुवा होना और तन्द्रा ये कफ - पित्त ज्वर के क्षण हैं । अब सन्निपातजन्य ज्वरों को कहा जाता है ॥ ८४-८९ ॥ सन्निपातज्वरस्यध्वं त्रयोदशविधस्य हि ॥ ६० ॥
प्राक्सून्त्रितस्य वक्ष्यामि लक्षणं वै पृथक् पृथक् । १ ' ऽरति ' इति च पाठः ।