श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 301–310
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 301–310
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अ ० ३ ] चिकित्सतस्थानम २८७ भ्रमः पिपासा दाहश्च गौरवं शिरसोऽतिरुक् ॥ ६१ ॥
वातपित्तल्बणे विद्याल्लिङ्गं मन्दकफे ज्वरे ।
शैत्यं कासोऽरुचिस्तन्द्रा पिपासा दाहरुव्यथाः ॥ ६२ ॥
वातश्लेष्मोल्बणे व्याधौ लिन पिचावरे विदुः ।
छदिः शैत्यं मुहुर्दाहस्तृष्णा मोहोऽस्थिवेदना ॥ ६३ ॥
मन्दवाते व्यवस्यन्ते लिङ्गं पित्तकफोल्बणे ।
सन्ध्यस्थिशिरसः शूलं प्रलापो गौरवं भ्रमः ॥ ६४ ॥
वातोल्बणे स्याद्यनुगे तृष्णा कण्ठास्यशोषता ।
रक्तविण्मूत्रता दाहः स्वेदस्तृड्बलसंक्षयः ॥ ६५ ॥
मूर्च्छा चेति त्रिदोषे स्यालिङ्गं पित्ते गरीयसि ।
आलस्यारुचिहल्लासदाहवम्यरतिभ्रमैः ॥ ६६ ॥
कफोल्बणं सन्निपातं तन्द्राकासेन चादिशेत् ।
प्रतिश्या छर्दिरालस्यं तन्द्राऽरुच्यग्निमार्दवम् ॥ ६७ ॥
हीनवाते पित्तमध्ये चिह्न श्लेष्माधिके मतम् ।
हारिद्रमूत्रनेत्रत्वं दाहस्तृष्णा भ्रमोऽरुचिः ॥ ८ ॥
हीनवाते मध्यकफे लिङ्गं पित्ताधिके मतम् ।
शिरोरुग्वेपथुः श्वासः प्रलापश्छर्ध रोचकौ ॥ ६६ ॥
हीनपिन्ते मध्यकफे लिङ्ग वाताधिके मतम् ।
शीतको गौरवं तन्द्रा प्रलापोऽस्थिशिरोतिरुक् ॥ १०० ॥
हीनपिन्ते बातमध्ये लिङ्ग श्लेष्माधिके विदुः ।
श्वासकासप्रतिश्याया मुखशोषोऽतिपाश्रुक ॥ १०१ ॥
कफहीने पित्तमध्ये लिङ्ग वातधिके मतम् ।
पर्व भेदोऽग्निमान्द्य च तृष्णा दाहोऽरुचिर्भ्रमः ॥ १०२ ॥
कफहीने बातमध्ये लिङ्ग पित्ताधिके विदुः । प्रथम सूत्ररूप में कहे तेरह प्रकार के सन्निपात ज्वर के लक्षण पृथक पृथक कहूँगा । ( १ ) वात - पित्त प्रधान और मन्दकफ ज्वर के लक्षण - भ्रम, प्यास, दाह, भारीपन, शिर में अधिक वेदना होती है । ( २ ) वात - कफ प्रधान और हीनपित्त ज्वर में शीत लगना, खासी, अरुचि, तन्द्रा, प्यास, दाह, पोड़ा, व्यथा होती, १. ' वमिदाहतृषाभ्रमैः ' इति च पाठः । २. ' ऽग्निदौर्बल्य ' इति च पाठः ।
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२८८ चरकसंहिता [ अ ० ३ है । ( ३ ) पित्त कफ प्रधान हीनवात ज्वर में - वमन, शीत लगना, बार बार दाइ, प्यास, मूर्च्छा, अस्थियों में वेदना होती है । ( ४ ) वातप्रधान, हीनपित्त-कफ ज्वर में सन्धियों में तथा अस्थियों में और शिर में वेदना, प्रलाप, भारी होना, भ्रम, प्यास, कण्ठ और मुख का सूखना होता है । ( ५ ) पित्तप्रधान होन कफ - वात ज्वर मे --- मल और मूत्र में रक्तिमा ( रक्तका सा लाल वर्ण ), जलन, पसीना, प्यास, निर्बलता, मूर्च्छा होती है । ( ६ ) कफ प्रधान हीन पिचवात में- -आलस्य, अरुचि, हल्लास ( जी मचलाना ), जलन, वमन, बेचनी, चक्कर आना, तन्द्रा और कास होता है । ( ७ ) कफप्रधान पित्त मध्य, वात हीन सन्निपात मे-प्रतिश्याय, वमन, आलस्य, तन्द्रा, अरुचि मन्दाग्नि होती है । ( ८ ) पित्तप्रधान, मध्य कफ और हीन बात में मूत्र और आख का हल्दी के समान पीला वर्ण, जलन, प्यास, भ्रम, अरुचि होती है । ( ६ ) वान प्रधान, मध्य कफ और हीन पित्त में - शिर में वेदना, कम्पन, श्वास का तेज चलना, प्रलाप, वमन और अरुचि होती है । ( १० ) कफप्रधान, वात मध्य और हीन पित्त में - शोत का लगना, भारीपन, तन्द्रा, प्रलाप, अस्थियों और शिर में अति वेदना होती है । ( ११ ) वातप्रधान, पिश्च मध्य और कफ हीन सन्निपात में वास, कास, प्रतिश्याय, ( जुकाम ), मुख का सूखना और पसलियों में अति वेदना होती है । ( १२ ) पित्त प्रधान, वात मध्य हीन कफ में - पोरुओं मे फूटन की सी पीड़ा, मन्दाग्नि, प्यास, दाह, अरुचि और चक्कर आता है । [ भालुकि तंत्र से सन्नि-पात ज्वरों के लक्षण तथा नाम भिन्न २ दिये है । जैसे बात पिचाधिक सन्नि-पात ' विभु ' पित्त श्लेष्माधिक सनिपात फल्गु, कफवाताधिक सनिपात मकरी, वाताधिक सन्निपात ' विस्फारक ', विद्याधिक सन्निपात ' शीघ्रकारी और कफाधिक सन्निपात ' उल्बण ' कहाता है । कुछ आचार्य इन लक्षण के प्रकृतिसम समवाय के पाठ को अनाषे मानते हैं । अन्य स्थानों में यह पाठ नही सन्निपातज्वरस्योर्ध्वमतो वक्ष्यामि लक्षणम्
क्षणे दाहः क्षणे शीतमस्थिसन्विशिरोरुजा ।
सास्रावे कलषे रक्ते निर्भुग्ने चापि दशने ॥
सस्वनौ सरुजौ कर्णौ कण्ठः शुकरिवावृत । लक्षण होने से इस
है ] ॥। ६०-१०२ ॥
॥ १०३ ॥
१०४ ॥।
तन्द्रा मोहः प्रलापश्च कासः श्वासोऽरुचिर्भ्रमः ॥ १०५ ॥
परिदग्धा खरस्पर्शा जिह्वा खस्ताङ्गता परम् ।
ष्ठीवनं रक्तपित्तस्य कफेनोन्मिश्रितस्य च ॥ १०६ ॥
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अ ० ३ ] १६ चिकित्सितस्थानम् २ ई
शिरसो लोठन तृष्णा निद्रानाशो हृदि व्यथा ।
स्वेदमूत्रपुरीषाणा चिराद्दर्शनमन्पशः ॥ १०७ ॥
nara नातिगात्राणा प्रतत कण्ठकूजनम् ।
कोठाना श्यावरक्ताना मण्डलाना च दर्शनम् ॥ १०८ ॥
मूकत्वं स्रोतसा पाको गुरुत्वमुदरस्य च ।
चिरात्पाकश्च दोषाणा सन्निपातज्वराकृतिः ॥ १०६ ॥
इसके आगे सन्निपात ज्वर के लक्षण कहते है । जैसे— ( १३ ) क्षण मे दाह, क्षण मे शीत, अस्थि, सन्धि और शिर मे वेदना, नेत्रो से पानी आना, आखो का मैला या लाल वर्ण और कुटिल ' होना, कानो मे आवाज हाना, कानो मे पीडा होना, गला शुक ( गेहूं आदि की बाल ) की भाति काटो से घिरा रहता है, तन्द्रा, मोह, प्रलाप, कास, श्वास, अरुचि, भ्रम, जिह्वा का जले हुए के समान काला, पीला, स्पर्श मे खुरदरा, शरीर का अति शिथिल होना, कफ मिश्रित रक्त पित्त का थूकना, शिर का लोढन ( इधर उधर चलाना, हिलाना डुलाना ), प्यास, निद्रा का न आना, हृदय मे तीव्र पीडा, पसीना मूत्र तथा मल का देर मे आना और थोडा आना ( प्राय. अवरोध रहना ), शरीर मे अधिक निर्बलता का न आना, निरन्तर गले से कराहने का स्वर, कोठ तथा श्याम - रक्त वर्ण के मण्डलो का देह पर दिखाई देना, मूकता, स्रोतो का ( मुख आदि का ) पक जाना, उदर का भारी प्रतीत होना तथा दोषो का देर मे परि-पक्व होना ये सन्निपात ज्वर के लक्षण है ॥ १०४–१०६ ॥ १ निर्भुग्न का ' कुटिल, विस्फारित तथा अन्दर को घुसा आचार्यो ने किया है । २ सुश्रुत में अभिन्यास- ज्वर के लक्षण इस प्रकार दिये है
नात्युष्णशीताऽल्पसजो भ्रान्तप्रेक्षी हतप्रभ ।
खरजिह्व शुष्ककण्ठ स्वेदविण्मूत्रवर्जित ॥
साश्रुनिर्भुग्ननयनो भक्तद्वेषी हतस्वरः ।
श्वसन्निपतित शेत प्रलापापद्रवान्वित ॥
अभिन्यास तु त प्राहुर्हतौजसमथापरे ।
सन्निपातज्वर कृच्छ्रमसाध्यमथवा परे ॥
रहना ' यह अर्थ । जैसे— न बहुत उष्ण, न बहुत शीत, थाड़ी चेतना हो, भौचक्का सा देखे, कान्ति नष्ट हो, जिह्वा खरदरी हो, गला सूखा, पसीना, पाखाना और मूत्र न होता हो, ऑसू आवे, आँखे टेढी हो जॉय, भाजन से द्वेष हो, स्वर मारा जाय, सॉस
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२६० चरकसंहिता [ अ ० अ AA
दोषे विबद्धे नष्टे सर्व सपूर्णलक्षणः ।
सन्निपातज्वरोऽसाध्यः कृच्छ्रसाध्यस्त्वतोऽन्यथा ॥ ११० ॥
सन्निपात ज्वर की साव्य - असाध्यता - यदि दोष ( वातादि और मल ) शरीर के अन्दर ही रुक जाये, अग्नि मन्द हो, सन्निपात ज्वर के सम्पूर्ण लक्षण दिखाई देते हो तो सन्निपात ज्वर असाध्य है । यदि सम्पूर्ण लक्षण दिखाई न दे, दोष बाहर आते हो, अग्नि भी प्रबल हो तो रोग कष्टसाध्य होता है ॥११० ॥
निदाने त्रिविधा प्रोक्ता या पृथग्जज्वराकृतिः ।
संसर्गसन्निपाताना तथा चोक्तं स्वलक्षणम् ॥। १११ ॥
ज्वरनिदान - स्थान मे वर्णित पृथक् पृथक् टोपो से उत्पन्न होने वाले ज्वरो के तीन प्रकार के लक्षण, द्वन्द्वज ज्वरो तथा सन्निपातज ज्वरो के लक्षण मिला कर सात प्रकार के ज्वर कह दिये है ॥ १११ ॥
आगन्तुरष्टमो यस्तु स निर्दिष्टञ्चतुर्विधः ।
अभिघाताभिषड्गाभ्यामभिचाराभिशापतः ॥ ११२ ॥
आठवाँ आगन्तुज ज्वर चार प्रकार का है । जैसे — अभिघातजन्य, अभि-षगजन्य, अभिचारजन्य और अभिशापजन्य ॥ ११२ ॥
शस्त्रलोष्टकशाकाष्ठमुष्ट्यरन्नितलद्विजैः ।
तद्विधैश्च हते मात्रे ज्वरः स्यादभिघातजः ॥ ११३ ॥
तत्राभिघातजे वायुः प्रायो रक्त प्रदूषयन् ।
सव्यथाशोफवैवर्ण्यं करोति सरुजं ज्वरम् ॥ ११४ ॥
इनमे अभिघातजन्य ज्वर - शस्त्र, ढेला, कशा, लकडी, मुक्का, अरबि, हाथ पैर के तले, दॉत तथा अन्य इसी प्रकार के कारणो से देह या अगो पर चोट लगने से उत्पन्न होता है । अभिघातजन्य ज्वर मे प्रायः करके वायु रक्त को दूषित कर पीडा, सूजन, विवर्णता ( रग परिवर्तन ), वेदना तथा स्वर उत्पन्न करता है | ११३-११४ ॥
कामशोकभयक्रोधैरभिषक्त्स्य यो ज्वरः ।
सोऽभिषज्वरो ज्ञेयो यश्च भूताभिषङ्गजः ॥ ११५ ॥
कामशोकभयाद्वायुः क्रोधात्पित्तं त्रयो मलाः ।
भूताभिषङ्गात्कुायन्ति भूतसामान्यलक्षणाः ॥ ११६ ॥
भूताधिकारे व्याख्यातं तदष्टविधलक्षणम् । धौंकनी के तुल्य हो, गिर पडे, सो जाय, बके, उसे अभिन्यास ज्वर कहते है 1 यह सन्निपात - ज्वर असाध्य है ।
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अ ० ३ ] चिकिल्पितस्थानम् २६१ अभिषगजन्य ज्वर - - काम शोक, भय क्रोध तथा भूतो के संसर्ग से आक्रान्त होने पर जो ज्वर उत्पन्न होता है, उसको अभिपगज ज्वर कहते है काम शोक और भय से वायु, क्राध से पित्त, और भूता के आक्रमण से तीनो दोष कुपित होते है । भूतजन्य ज्वर मे भूता के सामान्य लक्षण रहते है । आठ प्रकार के भूतो के लक्षण भूताधिकार ( उन्माद चिकित्सा ) मे कहेंगे ॥ ११५-११६ ॥ विषवृक्षानिलस्पर्शात्तथाऽन्यैर्विपसंभवै ॥। ११७ ॥
अभिपक्तस्य चाप्याहुर्व्वरमेकेऽभिपङ्गजम् ।
चिकित्सया विपन्यैव प्रशम लभते नरः ॥ ११८ ॥
कुछ आचायो का कहना है कि विपैले वृक्षो की वायु का स्पर्श तथा अन्य इसी प्रकार विपयुक्त कारणा से उत्पन्न ज्वर अभिगगजन्य ज्वर है । इस प्रकार का ज्वर विपनाशक चिकित्सा में शान्त होता है । [ विप से उत्पन्न ज्वर मे मुख पर काली झार्ड, दाह, अतीसार और दिल का स्कना, भोजन मे अनिच्छा, कपकपी, मूछी और वल की हानि होती है सु ० । ] ॥ ११७-११८ ॥
अभिचाराभिशापाभ्या सिद्धाना यः प्रवर्तते ।
सन्निपातज्वरो घोरः स विज्ञेयः सुदुःसहः ॥ ११६ ॥
सन्निपातज्वरस्योक्त लिङ्ग यत्तस्य तत्स्मृतम् ।
चित्तेन्द्रियशरीराणामार्तयोऽन्याश्च नैकशः ॥ १२० ॥
सिद्ध पुरुषो के अभिचार ( हिंसा के लिये किये होम आदि से ) या पनि शाप द्वारा जो सन्निपात ज्वर उत्पन्न होता है, वह अतिशय कष्टसाध्य होता है । सन्निपात ज्वर के लक्षण ही इस ज्वर के लक्षण होते हैं । चित्त, इन्द्रिय और शरीर की अन्य पीडाये रोगी को दुःख देती है ' ॥ ११६–१२० ॥
प्रयोगं त्वभिचारस्य दृष्ट्रा शापस्य चैव हि ।
स्वयं श्रुत्वाऽनुमानेन लक्ष्यते प्रशमेन वा ॥ १२१ ॥
१ वृद्ध वाग्भट मे निम्न लक्षण कहे ह -तत्राभिचारिकैर्मत्र + मानस्य तायते ।
पूर्व बेतस्ततो देह. ततो विस्फाटतृभ्रमे ।
सदाहमूच्छीग्रस्तस्य प्रत्यह वर्धते ज्वर ॥
आभिचारिक मन्त्रो मे हवन करने से पहले, चित्त और फिर देह तपता है अनन्तर देह पर फुसिये, प्यास और भ्रम होता है, दाह और मूही ग्रसती है और दिनों दिन ज्वर बढता है ।
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२१२ चरकसहिता [ अ ० ३ ~~
वविध्यादभिचारस्य शापस्य च तदात्मके ।
यथाकमप्रयागेण लक्षण स्यात्पृथग्विवम् ॥ १२२ ॥
अन्य अनेक ज्वरो के लक्षण - अभिचार और अभिशाप ज्वर की परीक्षा स्वय अभिचार के प्रयाग का देखकर, अथवा आभशाप का मुनकर ( रागी के मुख स या स्वयं ), अनुमान द्वारा अथवा इनकी चिकित्सा स शमन हाने पर करनी चाहिये । अभिचार और आभशाप के नाना रूप होने से अनुसार ही इनके लक्षण भी नाना प्रकार क हा जात है ॥
ध्याननिःश्वासबहुल लिङ्ग कामज्वर स्मृतम् ।
शोकजे बाष्पबहुल त्रासप्राय भयज्वर ॥
क्रोधजे बहुसरम्भ भूतावेशे त्वमानुषम् ।
मूच्छीमोहमदग्लानिभूयिष्ठ विपसभवे ॥
केषाचिदेषा लिङ्गाना सन्तापो जायते पुरः ।
पश्चात्तुल्य तु केपाचिदेषु कामज्वरादिषु ॥
कामादिजानामुद्दिष्ट ज्वराणा यद्विशेषणम् । कामादिजाना रोगाणामन्येषामपि तत्स्मृतम् ते पूर्व केवलाः पश्चान्निजैव्यामिश्रलक्षणाः । कमो के प्रयोग के १२१-१२२ ॥ १२३ ॥ १२४ ॥ १२५ ॥ ॥ १२६ ॥
हेत्वौषधविशिष्टाश्च भवन्त्यागन्तवो ज्वराः ॥ १२७ ॥
कामजन्य ज्वर मे — ध्यान ( एक ही चिन्ता ) निश्वास का जोर २ से बाहर आना । शोकजन्य ज्वर मे — आखो मे ऑसू आना, [ और बकना, सु ० ] भयजन्य ज्वर मे डर लगना ( और बकना, सु ० ) हाता हे | [ चित्त का गिरना आलस्य, अर्धनिद्रा, दिल में दर्द शरोर का दुखना | सु ० ] क्रोधजन्य ज्वर मे ज्वर की तीव्रता तथा अन्य लक्षण प्रबल रहते है, ( रागी कापता भी है ) । भूता-विष्ट ज्वर मे अमानुपीय ( मनुष्य की शक्ति से बाहर के ) कार्य करता है । विषजन्य ज्वर मे मूर्च्छी, मोह, मद और ग्लानि होती है । कामजन्य आदि ज्वरा मे कभी कभी सन्ताप इन लक्षणा से पूर्व हा जाता है, कभी पीछे ओर कभी साथ साथ मे होता है । यहा पर कामादि से उत्पन्न ज्वरो के जो विशेष लक्षण कहे है, वे लक्षण कामादि से उत्पन्न अन्य रोगा ( उन्माद आदि ) मे भी होते है । आगन्तुज ज्वर प्रथम स्वतन्त्र रहता है, पीछे से वातादि दोषो के साथ सम्ब-न्धित हो जाता है । इन ज्वरा मे कारण तथा चिकित्सा अन्य ज्वरो से भिन्न रहती है ॥ १२३ - १२७ ॥
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अ ० ३ ] चिकित्सितस्थानम्
' मनस्यभिहते पूर्व कामाद्यैर्न तथा बलम् ।
ज्वरः प्राप्नोति वाताद्यैर्मनो यावन्न दुष्यति ॥
काम आदि द्वारा मन के आकान्त होने पर उत्पन्न बलवान् नहीं होता । परन्तु जब शरीर के वातादि दोषो मे अधिक बलवान् हो जाता है ॥ १२८ ॥
संसृष्टाः सन्निपतिताः पृथग्या कुपिता मलाः ।
रसाख्य धातुमवेत्य पक्ति स्थानान्निरस्य च ॥
स्वेन तेनोष्मणा चैव कृत्या देहोप्मणो वलम् । स्रोतासि रुडूवा समाप्ताः केवल देहमुल्बणाः सन्तापमधिक देहे जनयन्ति नरस्तदा । २ ९ ३ १२८ ॥ ज्वर प्रथम अधिक मिल जाता है, तत्र १२६ ॥ || १३० || भवत्यत्युष्णसर्वाङ्गो ज्वरितस्तेन चोच्यते ॥ १३१ ॥
स्रोतसा सनिरुद्धत्वात्स्वेद ना नाविगच्छति ।
स्वस्थानात्प्रयुते चाग्नौ प्रायास्तरुगे ज्वरे ॥ १३२ ॥
ज्वर —– पृथक् पृथक्, द्वन्द्व रूप में या सन्निपात रूप मे कुपित वातादि दोष रस नामक वातु का सहारा लेकर अग्नि को उसके असली स्थान से ( आमा-शय से ) निकाल कर, अपनी गरमी से देह की गरमी को बढाकर, स्रोतो को बन्द करके, देह मे फैलकर शरीर मे अधिक ( मात्रा से अधिक ) सन्ताप उत्पन्न कर देते है । उससे मनुष्य का ज्वर उत्पन्न हो जाता है । उसके सब अंग गरम हो जाते है, इस अवस्था का ' ज्वर ' कहते है । स्रोतो के रुक जाने से और अग्नि के अपना स्थान छाड देने के कारण तरुण ( नूतन ) ज्वर मे पसीना नही आता ॥ १२६-१३२ ॥
अरुचिश्चाविपाकश्च गुरुत्वमुदरस्य च ।
हृदयस्याविशुद्धिश्च तन्द्रा चाऽऽलस्यमेव च ॥ १३३ ॥
ज्वरोऽविसर्गी वलवान दोपाणामप्रवर्तनम् ।
लालाप्रसेको हल्लासो अन्नाशो विरस मुखम् ॥ १३४ ॥
स्तब्धसुप्रगुरुत च गात्राणा बहुमूत्रता ।
न विड्जीर्णा न च ग्लानिरस्याऽऽमस्य लक्षणम् ॥ १३५ ॥
आमज्वर के लक्षण – अरुचि, अविपाल, पेट मे नारीपन, हृदय ( आमा-( ग ) का साफ न होना, तन्द्रा, आल्म्य, निरन्तर ज्वर का बना रहना, ज्वर १ मनस्यभिद्रुते पूर्व कामाद्यैर्न तथा बलम् । ज्वर प्राप्तोति कामाद्यैर्मनो यावन्न दुष्यति ॥ इति गंगाधरसम्मत. पाठ. ।
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२६४ चरकसहिता [ अ ० ३ ^^ का बलवान् होना, मल वा दात्रों का बाहर न निकलना, मुख से लार बहना, जी मचलाना, भूख का न लगना, मुख का स्वाद बदल जाना ( विरसता ), गात्रो मे जडता, सुतता और भारीपन, बार बार थोडा २ मूत्र का आना, कच्चे मल का आना और ग्लानि ये आमज्वर के लक्षण है ॥ १३३ - १३५ ॥
ज्वरवेगोऽधिकस्तृष्णा प्रलापः श्वसनं भ्रमः ।
मलप्रवृत्तिरुत्क्लेशः पच्यमानस्य लक्षणम् ॥ १३६ ॥
पच्यमान ज्वर के लक्षण – ज्वर का अधिक बढना, प्यास, प्रलाप, सास का जार से चलना, चक्कर आना, मल की प्रवृत्ति, उत्क्लेश ( वमन की अभिरुचि ), ये पच्यमान ज्वर के लक्षण है ॥ १३६ ॥
क्षुत्क्षामता लघुत्व च गात्राणा ज्वरमार्दवम् ।
दोषप्रवृत्तिरष्टाहो निरामज्वरलक्षणम् ॥ १३७ ॥
निराम ज्वर — भूख का लगना, शरीर में हल्कापन, ज्वर का घट जाना, मल - मूत्र स्वेद का बाहर निकलना, तथा आठवे दिन तक दोष का रहना ये निराम ज्वर के लक्षण है । [ साधारणत आठवे दिन मे दोषो का परिपाक हो जाता है । परन्तु कई बार दोष आठ दिन से पूर्व भी पच जाते है और कई बार इससे भी अधिक देर मे पचते है । इसलिये लक्षणा की परीक्षा करे । जब ज्वर आप से आप कम हो जावे, विचलित हो, तब दोषो का पाक हुआ जाने ] ॥ १३७ ॥
नवज्वरे दिवास्वप्रस्नानाभ्यङ्गान्नमैथुनम् ।
क्रोधप्रवातव्यायामकषायाश्च विवर्जयेत् ॥
नवज्वर मे अपथ्य — दिन मे साना, स्नान करना, प्रवात ( वायु का सीधा आना ), व्यायाम और को देख कर पक्क दोष देह हलका हो, मल १३८ ॥ मालिश, मैथुन, क्रोध, कषाय रसवाले ( कषाय स्तम्भक होने से ) सेवन नही करने चाहिये । [ कषाय शब्द से कपाय रस वाले क्वाथ तथा अन्य कषाय कल्पना का भी निषेध है । परन्तु इस अवस्था मे शाधन कषाय न देकर, पाचक, मधुर कषाय दे सकते है । सोलह गुण जल मे चतुर्थ भाग शेष करने से ' कषाय ' बनता है । यह कषाय तरुण ज्वर से न देना चाहिये ] ॥ १३८ ॥
ज्वरे लङ्घनमेवादावुपदिष्टमृते ज्वरात् ।
क्षयानिलभयक्रोधकामशोकश्रमोद्भवात् ॥ १३६ ॥
लङ्घनेन क्षय नीते दोषे संधुक्षितेऽनले ।
विज्वरत्वं लघुत्वं च क्षुच्चैवास्योपजायते ॥ १४० ॥
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अ ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २५
प्राणाविरोधिना चैनं लङ्घनेनोपपादयेत् ।
बलाधिष्ठानमारोग्यं यदर्थोऽय क्रियाक्रमः ॥ १४१ ॥
ज्वर मे लघन - आम से मिलकर दोष अग्नि को मन्द कर देते है, इसलिये ज्वर मे लघन ( उपवास या लघु - भोजन ) करना चाहिये । सब अवस्थाओं मे अग्नि को बढाना चाहिये । इस समय का लघन अमृत के समान गुणकारी होता है । परन्तु क्षयजन्य, वातजन्य, भयजन्य, क्रोधजन्य, कामजन्य, शोकजन्य, श्रमजन्य ज्वरो मे लघन नहीं कराना चाहिये ' । लघन ( उपवास ) से दोषों का क्षय होने पर जाठराग्नि प्रवल हो जाती है, बुखार उतर जाता है, शरीर हल्का हा जाता है, भूख लगने लगती है । लघन तब तक ही कराना चाहिये जिससे कि प्राण या बल ( शक्ति ) का ह्रास न होने पाये । क्योकि आरोग्य बल पर ही निर्भर करता है और यह सब चिकित्सा आरोग्य के लिये ही है | १३६-१४१ ॥
लङ्घन स्वेदनं कालो यवाग्वस्तिक्तको रसः ।
पाचनान्यविपकाना दोपाणा तरुणे ज्वरे ॥। १४२ ॥
तृष्यते सलिल चोष्ण दद्याद्वातकफज्वरे ।
मद्योत्थे पैत्तिकं वाऽथ शीतलं तिक्तकैः शृतम् ॥ १४३ ॥
दीपनं पाचन चेव ज्वरन्नमुभयं हि तत् ।
स्रोतसा शोधन बल्य रुचिस्वेदकर शिवम् ॥ १४४ ॥
दोषो के पाचन – लघन, स्वेदन ( पसीना लाना ), समय पर यवागू, तिक्त रस ये वस्तुएँ तरुण ज्वर मे आम दोषों को पकाती हे । वात - कफजन्य ज्वर मे प्यास लगने पर उष्ण जल देना चाहिये । मद्यपान से उत्पन्न ज्वर मे तिक्त वस्तुओं से सावित शीतल जल देना चाहिये । यह दोनो प्रकार का पानी अग्निदीपक, पाचक, ज्वरनाशक, स्रोतो का शावक, बलकारक, रुचिकारक, पसीना लाने वाला और कल्याणकारक है ॥ १४२ – १४४ ॥ १ लघन से अभिप्राय शरीर का हल्का करने वाले कर्म और द्रव्यों से है । जब दोष आमाशय मे हो और उत्क्लेश ( उबकाई ) हो तो वमन करना उत्तम है | जब तक रोगी के दोष घनीभूत बने रहे तब तक रोगी अनगन करे, उसके बाद भोजन करे! २ लघन की पहिचान -वात, मूत्र, मल हो, गात्र हलका हो, डकार हो, हृदय और कण्ठ शुद्ध हो, आलस्य न हो, पसीना हो, भूख, प्यास एक साथ लगे, चित्त प्रसन्न हो तो जाने लघन ठीक हुआ है ।
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२६ चरकसहिता [ अ ० ३ wwwwwww
मुम्तपर्पटकोशीरचन्दनोदीच्यनागरैः ।
शृतशीतं जल दद्यात्पिपासाज्वरशान्तये ॥ ९ ४५ ॥
षडग पानीय – मोथा, पित्तपापडा, खस, लाल चन्दन, नेत्रवाला और सोंठ इनको एक एक कर्ष लेकर दो प्रस्थ पानी मे उबाले । एक प्रस्थ रहने पर छानकर ठण्डा करके देना चाहिये । इससे प्यास और ज्वर की शान्ति होती है । [ कई स्थान मे सोठ के स्थान पर ' पद्माख ' डालना लिखा है ] ॥१४५ ॥
कफप्रधानानुत्क्लिष्टान्दोपानामाशयस्थितान् ।
बुद्ध्वा ज्वरकरान् काले बम्याना वमनैर्हरेत् ॥ १४६ ॥
अनुपस्थितदोषाणां वमन तरुणे ज्वरे ।
हृद्रोग श्वासमाना मोह च जनयेद् भृशम् ॥ १४७ ॥
सर्व देहानुगाः सामा धातुस्था ' दुःखनिहराः ।
दोषाः फलेभ्य आमेभ्य ' स्वरसा इव सात्ययाः ॥ १४८ ॥
मितं तं काले यवागूभिरुपाचरेत् ।
यथा स्वोषधसिद्धाभिर्मण्डपूर्वाभिरादितः ॥
यावज्ज्वरमृदूभावात्ष s हं वा विचक्षणः । तस्याग्निर्दीप्यते ताभिः समिद्भिरिव पावकः
ताश्च भेषजसयोगा - लघुत्वा चाग्निदीपनाः ।
वातमूत्रपुरीषाणा दोषाणां चानुलोमनाः ॥
स्वेदनाय द्रवोष्णत्वाद् द्रवत्वात्प्रशान्तये आहारभावात्प्राणाय सरत्वाल्लाघवाय च ॥ १४६ ॥ ॥ १५० ॥
१५१ ॥
।
१५२ ॥
ज्वरघ्न्यो ज्वरसात्म्यत्वात्तस्मात्पेयाभिरादितः ।
ज्वरानुपचरेद्धीमानृते मद्यसमुत्थितात् ॥ १५३ ॥
साम ज्वरो मे उपचार — आमाशय मे स्थित कफप्रधान दोष यदि ज्वर का कारण हो, इन दोषो का उत्क्लेश अथात् बाहर निकलने की ओर प्रवृत्ति हो, परन्तु बाहर न निकले और रोगी वमन कराने के योग्य हो तो उचित काल मे वमन करा के दोषो को बाहर कर देना चाहिये । [ उत्क्लेश का लक्षण - मुख मे बहुत पानी या डकार आकर भी अन्न बहुत कष्ट देकर भी न निकले, हृदय पीडित हो उसे ' उत्क्लेश ' कहते है ] यह वमन प्रात काल देना चाहिये । यदि तरुण ज्वर मे दोष बाहर की ओर निकलने की प्रवृत्ति न रखते हो, तो रोगी को १ ' कास ' इति च पाठ । २ ' असुनिर्हराः " इति च पाठ • । ३ ' विबन्धस्यानुलोमिका " इति च पाठ. ।