श्रीगणेशाय नमः।

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 311–320

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 311–320

पृष्ठ 311

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अ ० ३ चिकित्सितस्थानम् २६७ वमन करान से हृदय - राग, श्वास, आनाह, मोह ( मूर्च्छा ), आदि उपद्रव हो जाते है । सम्पूर्ण शरीर मे व्याप्त, वातुओ में स्थित साम दोष को निकालना ऐमे ही अति कठिन और खतरे से खाली नही जिस प्रकार कच्चे फलो से स्वरस को निकालना कठिन होता है, और कभी कभी इस मे फल का भी नाश हो जाता है । वमन या लघन करने के पश्चात् उचित समय पर ( भोजन काल मे आप-वियों से सिद्ध मण्ड और यवागू देनी चाहिये । अधिक द्रव होने से प्रथम मण्ड देना चाहिये, पीछे से यवाग् ( विलेपी ) देनी चाहिये । इस समय पाचक ओष-धियो से सिद्ध करके मण्ड देना चाहिये । जब तक ज्वर घटे नही अथवा छ दिनो तक मण्ड ओर यवागू का प्रयोग करना चाहिये । इसके प्रयोग से जिस प्रकार समिधाओं से अग्नि बढती है, जाठराग्नि प्रदीप्त होती है । ओषवियो का सयोग होने से, लघु होने से, यवागृ अग्नि को बढाती है, वायु, मल मूत्र ओर दोषो का अनुलोमन करती है, द्रव और उष्ण होने से पसीना लाती है, द्रव होने से प्यास बुझाती है, आहार होने के कारण प्राण बल देती है, सर होने से लघुता उत्पन्न करती है ज्वर मे सात्म्य होने मे ज्वरनाशक है । इसलिये बुद्धिमान् को चाहिये कि प्रथम पेयाओ द्वारा ज्वर की चिकित्सा करे । यदि ज्वर मन्त्र से उत्पन्न हुआ है तो पेया न देवे ॥ २४६ - १५३ ॥

मदात्यये मद्यनित्ये ग्रीष्मे पित्तकफाधिके ।

ऊध्वगे रक्तपित्ते च यवागूर्न हिता ज्वरे ॥ १५४

निम्न अवस्थाओ मे यवागू नही देनी चाहिये – मद्यपान मे, मदात्यय मे, नित्य मद्यपान करने वाले को, ग्रीष्म ऋतु में, ज्वर में, ऊर्ध्वग रक्त पित्त मे यवागू हितकर नही होती ॥ १५४

तत्र तर्पणमेवाग्रे प्रयोज्य लाजसत्तुभिः ।

ज्वरापहैः फलरसैर्युक्तं समधुशर्करम् ॥ १५५ ॥

द्राक्षादाडिमखर्जूरप्रियाः सपरूपकैः ।

तर्पणार्हेषु कर्त्तव्य तर्पण ज्वरशान्तये ॥ १५६ ॥

ततः सात्म्यबलापेक्षी भोजयेज्जीर्णतर्पणम् ।

तनुना मुद्गयूषेण जागलाना रसेन वा ॥ १५७ ॥

इन उपरोक्त अवस्थाओ मे - लाजा के सत्तुओ को ॥ से उत्पन्न ज्वर पित्तकफ प्रधान ॥ मधु, खाड तथा अनार आदि फलो के रस के साथ देना चाहिये । यवागू के स्थान पर लाजाओ का तर्पण प्रथम देना चाहिये । जो रोगी तर्पण के योग्य हो उनको ज्वर की शान्ति के लिये अगूर, अनार, खजूर, पियाल, फालसा इनके रसो से

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२६८ चरकसहिता [ अ ० ३ तर्पण करना चाहिये । तर्पण के जीर्ण होने पर सात्म्य आर बल की अपेक्षा से मृग के यूप या जंगल के पशु पक्षिना के मास रस के साथ चापल देना चाहिये ॥ १५५–१३७ ॥

अन्नकालेषु चाप्यस्म विधेय उन्तधावनम् ।

योऽस्य वक्त्रररास्तस्माद्विपरीत प्रिय च यत् ॥ १५८ ॥

तद्स्य मुखवेश प्रकाक्षा चान्नपानयोः ।

धत्ते रसविशेपाणामभिः करोति यत् ॥ १५६ ॥

विगोव्य द्रुमशाखामरास्य प्रक्षाल्य चासकृत् ।

मस्त्विक्षुर समद्याद्ययथाहारमवाप्नुयात् ॥ १६० ॥

पाचन शमनीय वा कपाय पाययेत्तु तम् । अन्न काल मे रागी का दातुन करानी चाहिये । दातुन ऐसी हानी चाहिये जिसका रस रोगी के मुग्य के रस मे विपरीत हा, आर रागी का प्रिय लगे । दातुन करने से मुखवच्छ होता है, खान - पान में रुचि होती है, भिन्न भिन्न रसा का परिज्ञान हाता है । दातुन मे मुख को साफ करके गरम पानी से मुख को स्वच्छ करके, मस्तु ( दही का पानी ), गन्ने का रस, मद्य आदि ( मूग के यूष ) के साथ भोजन करना चाहिये । [ कुछ विद्वाना की सम्मति मे इनका केवल मुख मे वारण करना चाहिये ] | छठे दिन के बीत जाने पर लघु अन्न का भोजन कराके अगले दिन पाचनीय या शमनीय कषाय देना चाहिये । [ लघन की मर्यादा - दात्र के अनुसार ही ज्वर के निमित्त ३, २, या छ ' रात ल्वन करे | ] अपक्क आहार अपक्क दोपा को तथा अपक्क रस का पकाने वाले कषाय को ‘ पाचक ' कहते है । जो दुष्ट दात्रो को बाहर नही निकालता, प्रकुपित दोषों को शमन करता है, प्रकृतिस्थ दाषी, धातुआ में परिवर्तन नहीं लाता उसको ' शमनीय ' कहते हे । [ प्रथम लधन से दोत्रो को शान्त करना पचाना ) चाहिये । छः दिन तक लघन कराने पर भी यदि दोष न पके तो पाचनीय कषाय देना चाहिये | और जब दोत्रो का परिपाक हो जाये तो शमनीय कषाय देना चाहिये ] ॥ १५८-१६० ॥ ज्वरितं पडहेऽतीते लघ्वन्नप्रतिभोजितम् ॥ १६१ ॥

स्तभ्यन्ते न विपच्यन्ते कुर्वन्ति विषमज्वरम् ।

दोपा बद्धाः कषायेण स्तम्भित्वात्तरुणे ज्वरे ॥ १६२ ॥

न तु कल्पनमुद्दिश्य कषायः प्रतिषिध्यते ।

यः कषायः कषायः स्यात्स वर्ज्यस्तरुणज्वरे ॥ १६३ ॥

पृष्ठ 313

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अ ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २६६ AA

यूपैरम्लैरनम्लैर्वा जाङ्गलैर्वा रसैर्हितैः ।

दशाह यावदश्रीयाल्लघ्वन्नं ज्वरशान्तये ॥ १६४ ॥

तरुण ज्वर मे ही कषाय का निषेध है । [ सात दिन तक ज्वर तरुण कहाता है, १२ दिन तक मध्यम आर इससे आगे पुराना ज्वर कहाता है ] चूकि कपाय स्तम्भकारक होते है, इसलिये कषाय से दोष जड बन जाते है, पचते नहीं और विषम ज्वर को उत्पन्न करते । स्वरस, कल्क, शृत, गीत और फाण्ट इस कल्पना का लेकर तरुण ज्वर मे कपान का निषेध नही है । अपितु जो कषाय कपाय रस वाला है, उसका निषेव तरुण ज्वर मे हे । ज्वर की शान्ति के लिये दसवे दिन अनार, आवला आदि फलों के रस से खट्टे बनाये या खड्ड े किये विना मूग आदि का यूष अथवा जागल पशु - पक्षियों का मास-रस हल्के भोजन के साथ देना चाहिये ॥ १६१–१६४ ॥

अत ऊ कफे मन्दे वातपित्तोत्तरे ज्वरे ।

परिपक्केषु दोषेषु सर्पिष्पानं यथाऽमृतम् ॥ १६५ ॥

वृत पान – ज्वर में जब कफ मन्द हो जाय, वात या पित्त अथवा वात-पित्तप्रधान हा और दापो का परिपाक हो जाये, उस समय घृत का पान कराना अमृत के समान है ॥ १६५ ॥

निर्दशाहमपि ज्ञात्वा कफोत्तरमलङ्घितम् ।

न सर्पिः पाययेद्वैद्यः शमनैस्तमुपाचरेत् ॥ १६६ ॥

दम दिन हा जाने पर भी यदि वैद्य को पता लग जाये कि रोगी को लघन नहीं कराया गया तो इसको घृत का पान नही करावे अपितु शमनीय ओषधियों से चिकित्सा करे ॥ १६६ ॥

यावल्लवुत्वादशन दद्यान्मासरसेन च ।

बल ह्यल दोषहर पर तच्च बलप्रदम् ॥ १६७ ॥

जब तक शरीर मे लघुता न आये तब तक मास - रस के साथ लघु आहार देना चाहिये । बल ही दोपा का नष्ट करने में समर्थ है और मामरस उत्तम बलवर्द्धन है ॥ १६७ ॥

दाहतृष्णापरीतस्य वातपित्तोत्तरं ज्वरम् ।

वद्धप्रच्युतदोष वा निराम पयसा जयेत् ॥ १६८ ॥

दाह और तृष्णा से आक्रान्त, वात - पित्तप्रधान निराम ज्वर मे जब कि दोष रुके हा, परन्तु अपने स्थान से हिल गये हो तो उनको दूध के द्वारा जीतना चाहिये ॥ १६८ ॥

पृष्ठ 314

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३०० चरकसहिता [ अ ० ३ vin

क्रियाभिराभिः प्रशम न प्रयाति यदा ज्वरः ।

अक्षीणवलमासाग्नेः शमयेत्त विरेचनैः ॥ १६६ ॥

यदि उपरोक्त क्रियाओं से ज्वर शान्त न हो और रागी का बल आर अग्नि क्षीण न हुए हो ता विरेचन द्वारा ज्वर का शान्त करना चाहिये ॥ १६६ ॥

ज्वरक्षीणम्य न हित वमन न विरेचनम् ।

काम तु पयसा तस्य निरूहैर्वा हरेन्मलान् ॥ १७० ॥

ज्वर के हुए व्यक्ति को वमन या विरचन देना हितकारी नही है । यदि अभीष्ट हो ता दूध के द्वारा अथवा निरूह बस्तियो द्वारा मल को निकालना चाहिये ॥ १७० ॥

निरूहो बलमग्नि च विज्वरत्व मुद रुचिम् ।

परिपक्केषु दोषेषु प्रयुक्तः शीघ्रमावहेत् ॥ १७१ ॥

ज्वर में दोषो के परिपक्क होने पर दिया हुआ निरूह बल ( शक्ति ) और अग्नि को बढ़ाता है, ज्वर को हटाता है, प्रसन्नता उत्पन्न करता है, भोजन मे रुचि उत्पन्न करता है ॥ १७१ ॥

पित्तं वा कफपित्त वा पित्ताशयगत हरेत् ।

स्रसन, त्रीन्मलान् बस्तिर्हरेत्पक्वाशयस्थितान् ॥ १७२ ॥

स्रसन ( विरेचन ) पित्ताशय और ग्रहणी मे स्थित पित्त और कफपित्त काही निकालता है | परन्तु वस्ति पक्काराय ( बृहदत्र ) मे स्थित वात, पित्त, कफ तीनो मलो को बाहर निकालती है ॥ १७२ ॥

ज्वरे पुराणो संक्षीणे कफापित्ते दृढाये ।

रूक्षबद्धपुरीषाय प्रदद्यादनुवासनम् ॥ १७३ ॥

पुराने ज्वर मे कफ पित्त के क्षीण होने पर, मल के कठोर पर यदि रोगी की अग्नि प्रवल हो तो अनुवासन ( स्निग्ध चाहिये ॥ १७३ ||

गौर शिरसः शूले विद्धेन्द्रियेषु च ।

जीर्णज्वरे रुचिकर कुर्यान्मूर्वविरेचनम् ॥। १७४

अभ्यङ्गाश्च प्रदेहाश्च सस्नेहान सावगाहनान् ।

विभज्य शीतोष्णतया कुर्याज्जीर्णे ज्वरे भिषक् ॥

तेराशु हि शम याति वहिर्मार्गगतो ज्वरः । तथा रूक्ष होने बस्ति ) देना ॥ १५५ ॥ लभन्ते सुखमङ्गानि बल वर्णश्च वर्धते ॥ १७६ ॥

धूपनाञ्जनयोगेश्च यान्ति जीर्णज्वराः शमम् ।

पृष्ठ 315

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अ ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३०१ ^^ www m शिरोविरेचन — जीर्णज्वर मे देह के गुरु हाने पर, शिरोवेदना मे, इन्द्रिया के अपने विषय मे प्रवृत्त न होने पर शिगविरेचन देना चाहिये । यह विरेचन रुचि ( विषयो मे प्रीति ) करता है । [ यहा पर वैरेचनिक नस्य से अभिप्राय है | परन्तु यदि शिर मे शून्यता अनुभव हो तो स्नैहिक धूम नस्य, यदि दाह हो तो पित्तनाशक शमनीय धूम का प्रयोग करना चाहिये । ] वैद्य का चाहिये कि जीर्णज्वर मे शीतकारण से उत्पन्न तथा उष्ण कारण से उत्पन्न ज्वर की विवेचना करके अन्यग, प्रदेह, स्नेहयुक्त अवगाहन देवे । यदि शोत कारण से ज्वर उत्पन्न हो तो उष्ण अभ्यग आदि देने चाहिये । उष्ण कारण से उत्पन्न हो ता शीतल अभ्यग देने चाहिये । इन क्रियाओ से बहिर्भाग ( त्वचा एव रक्त धातु ) मे पहुॅचा ज्वर शीघ्र शान्त हो जाता है, अगो को सुख मिलता है, रोगी का बल और कान्ति बढती है ॥ १७६ ॥

त्वमात्रशेपा येषा च भवत्यागन्तुरन्वयः ॥ १७७ ॥

इति क्रियाक्रमः सिद्धो ज्वरन्नः सप्रकाशितः । जा ज्वर केवल त्वचा मे ही शेष रह गये हो, या जिन ज्वरो के साथ आगन्तुज अनुबन्ध लगा रहता है, वे जीर्णज्वर धूपन, अजन प्रयाग से शान्त हो जाते ह । यह ज्वरनाशक, फलप्रद चिकित्सा विवि कह दी ॥ १७७ ॥

येषा त्वेष क्रमस्तानि द्रव्याण्यूर्ध्वमतः शृणु ॥ १७८ ॥ {

रक्तशाल्यादयः शस्ताः पुराणाः षष्टिकैः सह ।

यवाग्वोदनलाजायें ज्वारताना ज्वरापहाः ॥ १७६ ॥

अम्लाभिलापी तामेव दाडिमाम्ला सनागराम् ।

सृष्टविट् पैत्तिको वाऽथ शीता मधुयुता पिबेत् ॥

लाजपेया सुखजरा पिप्पलीनागरः शृताम् ।

पिबेज्ज्वरी ज्वरहरा क्षुद्वानल्पाभिरादितः ॥ १८१

पेया वा रक्तशालीना पार्श्वबस्तिशिरोरुजि । श्वदृष्ट्राकण्टकारीभ्या सिद्धा ज्वरहरा पिवेत् ॥ १ =

ज्वरातिसारी पेया वा पिबेत्साम्ला धृता नरः ।

पृश्चिपणींबलाबिल्व नागरोत्पलधान्यकेः ॥ १८३ ॥

शृता विदारीगन्धाद्यदीपनी स्वेदनी नरः । कासी श्वासी च हिक्की च यवागू ज्वरितः पिबेत्

विबद्धवर्चाः सयवा पिप्पल्यामलकैः शृताम् ।

१८० ॥

॥

२ ॥

॥ १८४ ॥

सर्पिष्मती पिवेत्पेया ज्वरी दोषानुलोमनीम् ॥ १८५ ॥

पृष्ठ 316

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३०२ चरकसंहिता

कोठे विबद्धे सरुजि पिबेत्पेया शृता ज्वरी ।

मृद्वीकापिप्पलीमूलचव्यामलकनागरैः ॥ १८६

पिवेत्सबिल्वा पेया वा ज्वरे सपरिकर्तिके ।

बलावृक्षाम्लकोलाम्लकलशीधावनीभृताम् ॥

अस्वेद निद्रस्तृष्णातः पिबेत्पेया सशर्कराम् ।

नागरामलकैः सिद्धा घृतभृष्टा ज्वरापहाम् ॥

जिन द्रव्यों का यह क्रम है, उनको अब सुनो- ( ज्वर को नाश करने के लिये यवागू, ओदन, लाज, प्रयोग [ अ ० ३ ॥ १८७ ॥ १८८ ॥ १ ) ज्वर के रागी के करने के लिये पुराने लाल चावल और पुराने साठी के चावलों का व्यवहार करना चाहिये । ( २ ) जिस ज्वर रोगी की अग्नि मन्द हो जाये उसको चाहिये कि नूख लगने पर प्रथम ज्वरनाशक, सुख से पचने वाली, पिप्पली और सोठ से सावित लाजाओ की पेया पीये । जिस रोगी को खट्टे रस की चाह हो, उसको चाहिये कि माठ से साधित लाजा की पेया में अनार का रस ( अनारदाना ) मिलाकर पीयें । जिस रोगी को मल पतला आता हो अथवा पैत्तिक प्रकृति हो उसको चाहिये कि लाजा की पेया को ठण्डा करके शहद मिलाकर पीये । ( ३ ) पार्श्व ( पसलियाँ ), बस्ति ( मूत्राशय ) और शिर मे वेदना होने पर लाल चावलो की पेया को गोखरू और छोटी कटेरी के साथ सिद्ध करके पीये । यह पेया फलदायक तथा ज्वरनाशक है । ( ४ ) ज्वर - अतिसार के रोगी को चाहिये कि पृश्निपर्णी ( पिठवन ), खरैटी, बेलगिरी, सोठ, नीला कमल ( कमलगट्टा ) और धनिया इनसे सिद्ध पेया को अनार के रस से खट्टा करके पान करे । ( ५ ) ज्वर रोगी को यदि कास, श्वास, हिचकी आती हो तो विदारी-गधादि गण से सिद्ध पेया को पिये । यह पेया अग्निदीपक और पसीना लाने वाली है | ( विदारीगन्धादि गण मे अभिप्राय स्वल्प पचमूल से हैं, विदारी-गन्धा, पृश्निपर्णी, बृहती, छोटी कटेरी और गोखरू ) । ( ६ ) ज्वर - रोगी को मल रूखा और वधा आता हो तो उसको चाहिये कि जौ, पिप्पली, और आवलो से मिद्ध पेया में घी डालकर पान करे । यह पेया दोषो का अनुलोमन करती है । ( ७ ) यदि कोष्ठ मे कब्ज हो तथा पेट मे दर्द हो तो मुनक्का, पिप्पलीमूल, चव्य, आवला और सोठ से साधित पेया पीवे । ( ८ ) ज्वर मे यदि परिकर्त्तिका ( मलत्याग के समय कटने के समान पीडा ) होती हो तो खरैटी, वृक्षाम्ल ( तिन्तडीक, कोकम, समाकदाना ), खट्टे

पृष्ठ 317

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अ ० ३ ] चिकित्सितस्थानम ३०३ बेर, पृश्निपर्णी, और शालपणी इनसे सावित यवागू मे बिल्व के चूर्ण का प्रक्षेप डाल कर पीने । ( ६ ) जिस ज्वर मे रोगी का नीद और पसीना न आता हा, तथा प्याम लगती हो उसको सोठ, आवले से सावित घी में भूनी पेया को शर्करा डालकर देना चाहिये । यह पेया ज्वरनाशक हे । [ यवागू - पाक की पाक विधि देश लोक मे प्रसिद्ध व्यवहार से देखनी चाहिये । तीक्ष्ण वीर्य द्रव्यो से आधा कर्ष, मृदु द्रव्यों से एक पल लेना, मध्यम वीर्य द्रव्यो का दो कर्प लेना चाहिये । यह रस-प्रधान द्रव्यों की विधि है । काथ द्रव्य ४ पल, जल २ आढक, चतुर्थीश

बचाना चाहिये | ] ॥। १७८-१८८ ॥

मुद्गान्मसूराश्चणकान् कुलत्थान् समकुष्टकान् ।

यूपार्थे यूपसात्म्याना ज्वरिताना प्रकल्पयेत् ॥ १८६ ॥

ज्वर मे जिन पुरुपा का यूष सात्म्न ( अनुकूल ) हो, उनके यूप के लिये मूग, मसूर, चने, कुलत्थी आर मोठ इनका उपयोग करना चाहिये ॥ १८६ ॥

पटोलपत्र सफल कुलक पापचेलिकाम् ।

ककोटकं कठिल्ल च विद्याच्छाक ज्वरे हितम् ॥१६० ॥

ज्वर रागी के शाक के लिये परवल के पत्ते, परवल का फल, कुलक ( पर-वल भेद, या करेला ), पापचेलिका ( पाठा ), ककोटक ( ककोड़ा ), कठिल्लक

( लाल पुनर्नवा ) देना चाहिये । इनका शाक हितकारी है ॥

लावान् कपिञ्जलानेणाश्चकोरानुपचक्रकान् । कुरङ्गान् कालपुच्छाश्च हरिणान्पृषतान् शशान्

कुक्कुटाञ्च मयूराश्च तित्तिरिक्रौञ्चवर्तकान् ।

प्रदद्यान्माससात्म्याय ज्वरिताय ज्वरापहान् ॥

ईत्रदम्लाननम्लान्वा रसान काले विचक्षणः ।

गुरुणत्वान्न शसन्ति ज्वरे केचिश्चिकित्सकाः ॥

लंघनेनानिलबल ज्वरे यद्यविक भवेत् ।

भिपग् मात्रविकल्पज्ञो दद्यात्तानपि कालवित् ॥

जिस ज्वर के रोगी को मास रस का सात्म्य ( अनुकूलता बटेर, कपिंजल ( श्वेत तीतर ), एण ( काला हरिण ), चकार, १६० ॥ ॥ १६१ ॥

१६२ ॥ १६३ ॥ १६४ ॥ ) हो उसके लिये-उपचक्रक ( चकोर का भेद ), कुरंग, कालपुच्छ, हरिण और पृषत ( हरिण भेद ) और खरगोश इनके मास से रस बनाकर देना चाहिये । इस मास रस को अनार के रस आदि से खट्टा करके या बिना खट्टा बनाये देना चाहिये । यह मास रस ज्वरनाशक है | कई चिकित्सको की सम्मति है कि मुर्गा, मोर, तीतर, क्रौच, बत्तक पक्षियो

पृष्ठ 318

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२०४ चरकसहिता [ अ ० ३ का मास गुरु और उग्ण है, इसलिये इनका उपयोग ज्वर मे नही करना चाहिये । परन्तु यदि ज्वर में उपवास के कारण वायु का बल प्रवल हा जाये तो मात्रा और विकल्पों का जानने वाले वयका चाहिने कि इनका भी

धर्माचानुपानार्थ तृतिय प्रदापयेत् ।

मद्य वा मद्यसात्म्याय यथादाप यथाबलम् ॥

गुरुष्णनिग्धमपुरक पायाश्च नवज्वर । ज्वर म प्यास लगने पर उनक आहार के अनुपान चाहिये । जिस रागी का मन्त्र - सात्म्य हा, उसका दात्र और देना चाहिये || १६५ ॥ आहारान् दापपक्त्यर्थ प्रायशः परिवर्जयेत् ॥ अनुपानक्रमः सिद्धा ज्वरन्नः सप्रकाशितः । नवज्वर ( तरुण ज्वर ) मे दात्रा के पाचन के लिय गुरु, प्रयाग करे || १६४ || १६५ ॥ मे गरम पाना देना बल के अनुसार मन्त्र १६६ ॥ उष्ण, स्निग्व, मधुर और कषाय रस वाले भाजना का प्राय करक त्याग कर देना चाहिये । इसप्रकार से ज्वरनाशक आर फलप्रद अनुपान क्रम कह दिया ॥ १६६ ॥

अत ऊ प्रवक्ष्यन्ते कषाया ज्वरनाशनाः ॥ १०७ ॥

पाक्यं शीतकषाय वा मुस्तपर्पटक पिबेत् ।

सनागर पर्पटक पिबेद्वा सदुरालभम् ॥ १६८ ॥

1 कराततिक्तक मुस्त गुडूचा विश्वभेषजम् ।

पाठामुशार सोदाच्य पिबेद्वा ज्वरशान्तये ॥ १६६ ॥

वरना दोपनाश्चते कषाया दोषपाचनाः ।

तृष्णारूाचप्रशमना मुखरस्यनाशनाः ॥ २०० ॥

पटोल सारिवा मुस्त पाठा कटुकरोहिणी ।

कलिङ्गकाः पटोलस्य पत्र कटुकरोहिणी ॥ २०१ ॥

निम्बः पटोलस्त्रिफला मृद्वीका मुस्तवत्सको ।

किराततिक्तममृता चन्दन विश्वभेषजम् ॥ २०२ ॥

गुडूच्यामलक मुस्तमर्धश्लोकसमापनाः ।

कषायाः शमयन्त्याशु पञ्च पञ्चविधाज्वरान् ॥ २०३ ॥

सन्तत सततान्येद्युस्तृतीयकचतुर्थकान् ।

वत्सकारग्वधं पाठा षड्यन्था कटुरोहिणीम् ॥ २०४ ॥

मूर्वा सातिविषा निम्बं पटोल धन्वयासकम् ।

वचा मुस्तमुशीराणि मधुकं त्रिफला बलाम् ॥ २०५ ॥

पृष्ठ 319

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अ ० ३ ] २० चिकित्सितस्थानम् ३०५

पाक्यं शीतकषायं वा पिबेज्ज्वरहरं नरः ।

मधूकम्तमृद्वीकाकाश्मर्याणि परूषकम् ॥ २०६ ॥

त्रायमाणामुशीराणि त्रिफला कटुरोहिणीम् ।

पीत्वा निशिस्थितं जन्तुर्व्वराच्छीघ्र विमुच्यते ॥ २०७ ॥

बृहत् वत्सकं मुस्त देवदारु महौषधम् ।

कोलपल्ली च योगोऽय सनिपातज्वरापहः ॥ २०८ ॥

जात्यामलकमुस्तानि तद्वद्धन्वयवासकम् ।

विवद्धदोपो ज्वरितः कपाय सगुड पिबेत् ॥ २०६ ॥

त्रिफला त्रायमाणा च मृद्वीका कटुरोहिणीम् ।

पित्तश्लेष्महरस्त्वेप कषायो ह्यानुलोमिकः ॥ २१० ॥

त्रिवृताशर्करायुक्तः पित्तश्लेष्मज्वरापहः ।

शटी पुष्करसूलं च व्याघ्री शृङ्गी दुरालभा ॥ २११ ॥

गुडूची नागर पाठा किरात कटुरोहिणी ।

एप ट्यादिको वर्गः सनिपातज्वरापहः ॥ २१२ ॥

कासहृद् ग्रहपार्श्वार्तिश्वासतन्द्रासु शस्यते ।

बृहत् पुष्कर भार्गी शटी शृङ्गी दुरालभा ॥ २१३ ॥

वत्सकस्य च बीजानि पटोल कटुरोहिणी ।

बृहत्यादिर्गणः प्रोक्तः संनिपातज्वरापहः ॥ २१४ ॥

कासादिषु च सर्वेषु दद्यात्सोपद्रवेषु च ।

कषायाश्च यवाग्वश्च पिपासाज्वरनाशनाः ॥ २१५ ॥

निर्दिष्टा भेपजाध्याये भिषक्तानपि योजयेत् । इसके आगे ज्वरनाशक कपायो का उपदेश करते । ( १ ) मोथा, पित्तपापडा, ( पित्त ज्वर मे ), २ – साठ, पित्तपापडा ( पित्त प्रधान ज्वर मे ) । ३ – पित्तपापडा और दुरालभा ( मन्दाग्नियुक्त पित्त कफ मे ) । ४ चिरा-यता, मोथा, गिलोय और सांठ ( गीतप्राय ज्वर में ) । ५ - पाठा, उशीर, उदीच्य नेत्रबाला ( दाहप्रधान ज्वर मे ) । इनका क्वाथ या शीत कषाय ज्वर की शान्ति के लिये रोगी को देना चाहिये । १ ये कषाय ज्वरनाशक, अग्निदीपक, ' आचार्य ने कोई भेद नहीं किया है । इसलिये गंगाधर सेन तो तीन योग मानते है । प्रथम योग पूर्व के समान, दूसरा योग सोठ, पित्तपापड़ा और दुरालभा तक । तीसरा योग सात द्रव्यो का पाठा सप्तक है । जतुकर्ण ने चौथे और पाचवे को एक ही योग माना है । चिरायता आदि को सप्तक माना है ।

पृष्ठ 320

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३०६ चरकसंहिता [ अ ० 3 दोषो को पचाने वाले, तृष्णा अरुचि को नष्ट करते है और मुख की विरसता को मिटाते है । ( २ ) पाच कषाय – १ – इन्द्रजौ, परवल, कुटकी । २ – परवल, सारिवा, नागरमोथा, पाठा, कुटकी । ३ - नीम की छाल, परवल, त्रिफला, मुनक्का नागरमोथा, इन्द्रजौ । ४ - चिरायता, गिलोय, लाल चन्दन, सोठ । ५ – गिलोय, आवला और मोथा ये आवे श्लोक पर समाप्त होने वाले पाच कषाय क्रमश सन्तत, सतत, अन्येद्युष्क, तृतीयक और चतुर्थक पाचो प्रकार के ज्वरो को नष्ट करते है । ( ३ ) इन्द्रजौ, अमलतास, पाठा, श्वेत वच, कुटकी, मूर्वा, अतीस, नीम, परवल, वमासा, वच, नागरमोथा, खस, मुलहठी, त्रिफला और बला, इनका क्वाथ या शीत कषाय ज्वरनाशक हे । [ कई आचार्य कुटकी तक एक योग, बमासा तक दूसरा ओर बला तक तीसरा योग मानते है । षड्ग्रन्था से श्वेत वच लेनी चाहिये । ] ( ४ ) मटुवे के फूल, मोथा, मुनक्का, गम्भारी की छाल, फालसा, त्रायमाणा, खस, त्रिफला, कुटकी इनको कूट कर रात्रि मे भिगो देना चाहिये । प्रात काल छानकर पीना चाहिये । इसके पीने से ज्वर शीघ्र नष्ट होता है । ( ५ ) छोटी और बडी कटेरी दोना, इन्द्रजौ, मोथा, देवदारु, कोल बल्ली ( चत्रिका या गज पीपल ) इनका क्वाथ सन्निपात ज्वर को नष्ट करता है । ( ६ ) जाती ( चमेली के पत्ते ), आवला, मोथा, धमासा इनके क्वाथ मे गुड डालकर पीने से रुके हुए दोष शान्त होते है । ( ७ ) त्रिफला, त्रायमाणा ( इन्द्रायण की जड ), मुनका, कुटकी, इनका क्वाथ पित्त - कफज्वर को नष्ट करता है । परन्तु यदि मलावरोध हो तो इस क्वाथ मे निशोथ ओर मिलाकर क्वाथ करके इसमे शर्करा मिलाकर पीना चाहिये । वह क्वाथ पित्त-कफज्वर का नाशक तथा मल और वायु का अनुलोमन करता है । ( ८ ) शटी ( कचूर ) पोहकरमूल, छोटी कटेरी, काकडसिंगी, दुरालभा, गिलोय, सोठ, पाठा, चिरायता, कुटकी यह गत्यादि वर्ग है । इससे सन्निपात ज्वर, कास, हृदयरोग, पार्श्व - शूल, श्वास, तन्द्रा नष्ट होती है । इसका काथ प्रयोग करना चाहिये । ( ६ ) बृहत्यादि गण - छोटी और बडी कटेरी दोनो, पोहकरमूल, भार्गी, कचूर, काकडाशृगी, दुरालभा, इन्द्रजौ, परबल कुटकी इनका क्वाथ सन्निपात ज्वर का नाशक तथा कास आदि से युक्त ज्वर मे देना चाहिये । सूत्रस्थान के भेषजचतुष्क अध्यायो मे पिपासा और ज्वर को नाश करने वाले जो कषाय और यवागू कहे है, उनका भी विवेचनापूर्वक प्रयोग वैद्य को करना चाहिये || १६७-२१५ ॥ जैट ने दो योग माने हैं । चिरायता, मोथा, गिलोय और सोठ को ' चातुर्भद्र‍ भी कहते है । इनको पृथक् २ या मिलाकर भी प्रयुक्त कर सकते है ।